Thursday, March 19, 2026
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हमारी आज़ादी भी मुकम्मल हो जाएगी, अगर

डॉ. आनंद श्रीवास्तव

आज़ादी, कहने को 78 साल गुजर गये हैं, हमारे देशभक्तों के द्वारा दिए गए बलिदान और उस बलिदान के बदले मिली आज़ादी को‌ । हमने आंखों में स्वतंत्रता के सपने भरकर जीवन के एक पूरे पहलू को काट लिया है । स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व की भीत पर खड़ी आज़ादी का मूल मंत्र हमारे मौलिक अधिकारों की रक्षा और सुरक्षा भरा आत्मविश्वास रहा है। आज वर्ष 2024 में ऐसा लगता है कि आज़ादी का पुनर्मूल्यांकन जरूरी है। हम वास्तव में आज़ाद हुए हैं भी या नहीं? मानवीय मूल्यों की सुरक्षा क्या सचमुच बची हुई है? वर्षों से हमने सुना है कि हम स्वतंत्र हैं पर क्यों महसूस नहीं कर पाते हैं हमलोग इस स्वतंत्रता को? दलतंत्र और नेता तंत्र ने आज़ादी को एजेंडा बना लिया है। आज हर कार्यक्रम के केंद्र में दलगत प्रचार सम्मिलित है पर केंद्र में राष्ट्रहित की अपेक्षा दलगत हित ही सर्वोपरि है। राजनेता जो आज़ादी दिखाते हैं, यह उनकी दृष्टि है, हमने जब स्वयं को केन्द्र में रखकर सोचा तो पता चला हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां अभिव्यक्ति कीआज़ादी भी सम्भव नहीं है, ऐसा पहली बार नहीं हुआ है । इतिहास गवाह है कि अभिव्यक्ति पर मौन के पहरे पहले भी बैठाएं गए हैं। आज़ादी के 78 साल बाद भारत की जनता को क्या मिला है ? बेरोज़गारी,असुरक्षा, तिरस्कार, अपमान, शोषण, उत्पीड़न ने ही अपने पैर पसारा है। धर्म निरपेक्ष होकर भी हम धर्म के नाम पर लड़ते हैं, बहुभाषी समाज का हिस्सा होकर भी भाषा -विवाद में फंसे हैं, नौकरशाही ने हमें गुलाम बना रखा है। प्रगतिशीलता के नाम पर हम और अधिक नंगे और अधिक खोख़ले ही हुए हैं। हम विवाद कर सकते हैं पर समाधान नहीं निकाल सकते क्योंकि समाधान हमारे अधिकार से परे है। युवा पीढ़ी शिक्षित बेरोज़गारी की शिकार हैं । उनको दया की भीख दिखाकर राजनीति के दलदल में खींचने की कोशिश की जाती है और वे फंसते भी हैं। यही वजह है कि एक मानसिक बेचैनी और अवसाद से घिरी युवा पीढ़ी न्याय और अन्याय के बीच का फर्क भूल जाती हैं। हमारे नेता सभाओं से कहते हैं कि हम नागरिकों को मुफ़्त राशन दे रहे हैं, प्रश्न तो यह है कि अगर हमारा देश प्रगति करता तो जनता इतनी सफल होती कि उसे मुफ़्त की जरूरत ही ना पड़ती। हम ए. आई तकनीक की बात करते हैं और राशन मुफ़्त में चाहिए। वोटबैंक की राजनीति ऐसी है कि हम अपने मौलिक अधिकारों को बेच देते हैं चंद रुपये की लालसा (जो नेताओं के द्वारा दान के रूप में दी जाती है) ने हमारे विवेक को निगल लिया है। हम उचित-अनुचित तक पहुंचना ही नहीं चाहते। हत्या, अपराध और तो और जहां बलात्कार पर भी राजनीति होती है, वहां हम किस आज़ादी की बात करते  हैं । चोरी दलाली ने सबकुछ अपने नाम कर लिया है। बलात्कार पर भी बोली लगती है, दलगत राजनीति  के लिए बलात्कार भी एजेंडा बनाया जाता है । क्या ऐसे असुरक्षित समाज की परिकल्पना के साथ हमलोग बड़े हुए थे? नहीं हमने तो सुरक्षा भाव को ही जीवन का अभिन्न अंग माना था। ब्रिटिश साम्राज्यवादी शक्ति ने भारत में कब़्जा जरूर किया था पर उनसे चुनौती देने के क्रम में हमने अपने विवेक और विचारों को जगाया था।हम शिक्षित और संगठित बने थे, इतने भटकाव के शिकार तो हम तब नहीं थे जब भारत की जनता को आज़ादी का मूल मंत्र तक पता नहीं था। आज़ादी की लड़ाई में जाति, धर्म और भाषा की दीवार नहीं थी पर आज़ाद मुल्क पर इस विभाजन का पहरा है। मुक्ति की आकांक्षा सबमें है पर पंख काटकर उड़ान भरने की कला नहीं सिखाईं जा सकती,कबीले से राज्य और राज्य से राष्ट्र बने कई वर्ष बीत गए पर आज भी बल सिद्धांत ज्यों का त्यों हैं, ताकतवर से लोहा लेने का साहस किसी में नहीं हैं, हम सिर्फ़ मोमबत्ती जलाकर और सोशल मीडिया पर ब्लैक डे मनाकर प्रतिवाद कर अपने को संतुष्ट कर लेते हैं। मेरा सवाल उन नेताओं से है जो चुनाव के दौरान दरवाज़े – दरवाज़े घूमकर वोट मांगते वक्त हमारी सुरक्षा का दावा करते हैं और जब कोई आपराधिक घटना घटजाती है तब उनकी भूमिका अपनी कुर्सी बचाने में लग जाती है। हरबार एक परिवार किसी अपने को खोता है और दलतंत्र उसमें अपने मुनाफे का गुणा-भाग लेकर बैठ जाता है। सोचनीय प्रश्न है कि जिस समाज में चारों ओर बौद्धिक विवाद हो रहे हैं, हाशिए और केंद्र की बात की जा रही है वहीं इतना असुरक्षित महसूस करना क्या हमें आज़ाद घोषित करता है? क्या सचमुच हम आज़ाद हैं? पता चलेगा एक खोखला स्वांग भरते हुए हम आज भी अस्तित्व की लड़ाई  लड़ रहे हैं। लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन निजी स्वार्थ की वेदी पर हर दिन बलि चढ़कर हो रहा है। शर्मसार मानवता मुंह खोलने से भी डरती है । फिर भी हम आज़ाद हैं। आत्महंता की स्थिति में हैं फिर भी हम आज़ाद हैं। पदाधिकारी नेतागण चौंकने की नहीं सोचने की जरूरत है आपके दिखाए सपने पर आस्था रखकर हम ऐसे दोराहे पर खड़े हैं जहां से ना आगे बढ़ पा रहे हैं और ना ही पीछे लौट पा रहे हैं। लोकतंत्र काअर्थ ही सुरक्षा है पर असुरक्षा और भय ने जनता को आतंक से भर दिया है । क्या ऐसी त्रासद स्थिति हमारे जनप्रतिनिधियों को नहीं दिखती । याद रहे आपके हाथों में ही आम जनता का भविष्य है, आसान नहीं भावनाओं को ठगना, आंदोलन, हड़ताल और नारे तो लगते रहेंगे पर जिस दिन हम आत्मसफल और सुरक्षित हो जाएंगे उसी दिन हमारी आज़ादी भी मुकम्मल हो जाएगी। हमारे छाता बनने के लिए ही आपको चुना गया है पर इतने छेद के साथ अगर आप हमारे सिर पर विराजेंगे तो बरसात ही हर बूंद हमें भींगाते रहेगी। समता तब भी लहुलुहान थी आज भी लहुलुहान है। हमने सिर्फ़ बंटवारे की राजनीति की है। कभी भाषा,कभी जाति,कभी धर्म के नाम पर टुकड़ों में बांटकर हमआज़ाद नहीं हो सकते।आज़ादी काअर्थ ही आत्मसुरक्षा के साथ आगे बढ़ना ।

हर एक गलत को डंके की चोट पर खारिज करना, न कहना ही असली आजादी है

ईश्वर ने रात और दिन का बँटवारा जेंडर देखकर नहीं किया…इसलिए दिन और रात सभी के हैं…। लड़कियों रात को सुरक्षा के साथ काम करना हक है तुम्हारा..छा जाओ। ये समझ में आ गया ये अपराध आगे बढ़ने वाली लडकियों को पीछे धकेलने के लिए हैं तो जितनी लड़कियां सड़क पर होंगी अंकुश उतना ही लगेगा मगर लडकियों आज़ादी का मतलब दारू पीकर बेवड़ा बनना नहीं है…अपनी देह दिखाना और खुलेआम देह में डूबना नहीं है…शॉर्टकट के लिए किसी को पटाकर प्रोमोशन पाना नहीं है. इससे आप वही कर रही हैं जो पुरुष चाहता रहा है..
गुड़िया बनकर किसी को जब आप रिझाने चलती हैं..वहीं आपकी आजादी खत्म हो जाती है और दूसरी लडकियों के लिए आप एक घिनौनी राह विरासत में देती हैं…यही बात लड़कों के लिए है…कोई जरूरत नहीं किसी के लिए अपनी अच्छाई और सादगी को छोड़ने की
असली साहस और बोल्ड होना…हर उस प्रस्ताव को डंके की चोट पर खारिज करना है जो आपकी गरिमा को चोट पहुंचाता हो…न करना सीखो…भले ही इसके बाद घर और बाहर तुम्हारी जिंदगी नर्क बना दी जाये…मगर तुम खुद को बचा ले जाओगे…ये कठिन है..असंभव नहीं है…ऐसे लोगों को झाड़ना सीखो और सबसे सामने झाड़ दो…घुटना नहीं नहीं है…अगर किसी बेवड़े या अपराधी के साथ हो…सीधे बहिष्कार करो । जो नशे में खुद को नहीं सम्भाल सकता वो किसी को क्या सुरक्षा देगा या देगी? जिसे अपने कपड़ों का होश नहीं..वो तुम्हारी गरिमा को क्या मान देगा या देगी? जो व्यक्ति अपने घर को छोड़कर तुमसे प्रेम का दावा कर रहा/रही है…किसी और के आने पर तुमको नहीं छोड़ेगा…इसकी क्या गारन्टी है??
रिश्ते निभाने के लिए आदर और स्नेह काफी है…इससे ज्यादा की तो जरूरत ही नहीं. .प्यार करना है..खुद से करो. ..अपने आत्मसम्मान से..अपने भविष्य से. ..अपनी रुचियों से. .अपने लक्ष्य से..अपनी किताबों से..अपने दोस्तों से करो. ..तुम्हारे लिए सबसे बड़ा संबल तुम खुद हो. ..क्योंकि हर बार तुम्हारे जीवन का युद्ध खुद तुमको लड़ना है…तुम्हारा सबसे बड़ा सहारा. ..सबसे बड़ी शक्ति तुम खुद हो और वो जो ऊपर है. ..वही है. .सारथी उसे बनाओ. ..रास्ते खुद ही खुल जायेंगे । लडकियों रक्षा बंधन आ रहा है और ये तुम ही कर सकती हो….अगर तुम्हारे भाई ऐसे हैं तो दूसरी बहनों के बारे में सोचो और अपने साथ उनकी भी सुरक्षा का वचन लो…लड़के भी ऐसा ही करें…जो गलत राह पर जाने से रोके…असली संबंध वही है…हर गलत को न कह सको …असली आज़ादी..असली साहस वही है पर इसकी शुरुआत खुद से होगी । पहले आजादी का मतलब समझो और समझाओ

‘ रहिमन पानी ’

डॉ. किरण सिपानी

तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिये लड़ा जाएगा, इस बात के आसार अब नज़र आने लगे हैं। बांग्लादेश, पाकिस्तान से नदी जल बंटवारे को लेकर जब-तब गर्मा–गर्मी होती रहती है। इसी तरह तिब्बत में चीन एक बहुत बड़ा बांध बना रहा है। उसके उत्तर-पूर्व में बहने वाली नदियाँ तो सुख ही जाएंगी, साथ ही अधिकतर देशों में भयंकर सुखा पड़ेगा। चीन की विस्तारवादी नीति को देखते हुए चीन इस बाँध के पानी का प्रयोग भारत में ‘पानी बम’ के रूप में कर सकता है। एकदम पानी छोड़ देने से उत्तर-पूर्व के जलमग्न होकर डूबने का खतरा है। देश के भीतर के हालात भी पानी को लेकर कम खतरनाक नहीं हैं। स्वार्थी राजनेता कुर्सी के चक्कर में क्षेत्रवाद की राजनीति करते हैं। पंजाब, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, आंध्र, कर्नाटक, आदि प्रांत पानी के बंटवारे से संतुष्ट नहीं हैं । नदी जल-वितरण का कोई ऐसा सर्वमान्य ‘फॉर्मूला’ भी नहीं बनाया गया। नहर के जल से सिंचाई को लेकर किसान जब आपस में लड़ते हैं तो खून-खराबा आम बात है। वे जब आपस में लड़ते हैं तो पानी खून से महंगा हो जाता है। गर्मियों के मौसम में पीने के पानी को लेकर जैसी त्राहि-त्राहि मचती है, वह भी कोई छुपी हुई बात नहीं है। अभी भी अगर नहीं जागे तो इसका कितना मूल्य चुकाना पड़ सकता है, इसकी आज कल्पना भी नहीं की जा सकती।

कहावत है कि दिवाला निकाला हुआ व्यापारी (बनिया) पुराने बही-खाते संभालने लगता है। यह बात यहाँ भी लागू होती है। पुराने जमाने में न तो इस भाँति नहरों के जाल थे, और न ही इतने ट्यूबवेल और न ही वाटर वर्क्स आदि। फिर आज की तरह पानी की किल्लत नहीं थी। इसका क्या कारण था ? इस बात का दुबारा चिंतन-मनन करने की जरूरत है। पहली बात तो यह है कि उन लोगों ने ‘रहिमन पानी राखिए’ के मंत्र को पूरी तरह आत्मसात कर रखा था। पानी के मामले में वे किसी सरकार पर आश्रित नहीं थे, बल्कि उनके खुद के साधन थे। वे वर्ष के पानी की एक-एक बूँद का उपयोग करना जानते थे। वर्षा की ऋतु में वे अपने लिये इतना पानी सहेज लेते थे कि आने वाले समय में इस बात की चिंता उन्हें नहीं सताती थी। घर-घर या मुहल्ले-मुहल्ले में चाहे नलें नहीं लागि हुई थी, पर जैसे कुएं, बावड़ी, जोहड़ आदि थे, वे सार्वजनिक थे और उनका ध्यान भी सब लोग रखा करते थे। कुएं, जोहड़, बावड़ी आदि के पास गंदगी फैलाना पाप और दंडनीय अपराध था। आजादी  के बाद जब सरकार ने लोगों को पानी की सुविधा देनी शुरु की तो लोग पारंपरिक जलस्रोतों को उपेक्षित छोड़ भूल गए। आज  वे अपनी बदतर हालत में नष्ट होने की कगार पर खड़े हैं। पानी को व्यवहार में लाने के लिये पुराने जमाने में कुछ नियम हुआ करते थे। सबसे पहली बात तो यह कि पानी को लेकर वे लापरवाह नहीं थे। एक कहावत प्रचलित थी कि आग कभी नहीं बुझनी चाहिए और पलींडे (पानी रखने का स्थान) में कभी पानी खत्म नहीं होना चाहिए। आज घरों में पलींडे रहे ही नहीं। शहरों के घरों में तो एक घड़ा भी मिल जाए तो गनीमत समझिए। पानी के मामले में लोग कितने किफायती थे- मेरे दादाजी ने बताया कि एक बार वे नोहर के किसी गाँव में बारात में गए। बारात के डेरे पर दो कुंड थे। एक बाराती पानी की दो बाल्टियाँ भर कर नहाने लगा तो घर का मालिक हाथ जोड़कर बोले- “ सगा जी ! (समधीजी) यह मीठा पानी पीने के लिये है। मैं दूसरा पानी मँगवा दूंगा। आप चाहे तो दूसरे कुंड में घी है, आप उससे नहा लें, पर पानी मत बर्बाद कीजिए।” आज, पानी के लिये क्या ऐसी चेतना लोगों में है?

पानी को लेकर जैसी भावना या संस्कार पुरानी पीढ़ी में थी, वह नई पीढ़ी में नहीं है। पुरानी पीढ़ी का आप यह अंधविश्वास मान सकते हैं कि वे जल को देवता मानते थे। आज पानी उपभोक्ता-वस्तु है, इसलिए दुरुपयोग भी बढ़ गया है। पश्चिमी देशों की जीवनशैली को अपनाने के कारण भी पानी का दुरुपयोग बढ़ा है। पहले लोग बाल्टी लेकर खुले में बैठकर नहा लिया करते थे। अब बाथ टब या फव्वारे से नहाने के कारण पानी तो ज्यादा लगेगा ही। इसी कारण वाशिंग मशीन में कपड़ा धोने के कारण सुख तो मिलने लगा, पर पानी का खर्च बढ़ गया। ‘फ्लश टॉयलेट’ में जितना पानी बर्बाद होता है वह पीने का पानी होता है। पहले हमारे यहाँ बर्तन राख से माँजे जाते थे। एक शब्द हुआ करता था राखुंड़ा अर्थात जहाँ राख से बर्तन माँजे जाते थे।   अब तो गाँव तक में रसोई गैस पँहुच गई है। राख होगी तो राखुंड़ा होगा। आने वाले समय में राखुंड़ा शब्द किसी किसी शब्दकोश में ही मिलेगा। बर्तन धोने का रिवाज भी नहीं था। बर्तन माँज दिए और सूखे कपड़े से पोंछ दिए। आँगन भी कच्चे और गोबर से लीपे हुए होते थे। झाड़ू दिया और सफाई हो गई। चूल्हे-चौके की शुद्धता के लिये स्त्रियाँ रोज सुबह उठकर चौका लीपती थीं। अब फर्श पर धोने के लिये जितना पानी लगता है, उतने से एक छोटे परिवार के पीने के पानी का काम चल जाता है। इस तरह पानी का खर्च तो बढ़ गया, पर उसकी एक हद है। कहाँ से आएगा इतना पानी ?

प्राचीन भारतीय जीवन शैली प्रकृति से तालमेल बनाकर चलती थी। प्रकृति से अनुचित फायदा लेना या दोहन करना वे (पुराने लोग) पाप समझते थे। प्रकृति से जितना कुछ भी लेते उतना वापस लौटाने की कोशिश भी करते थे। अनाज हो या पानी, हर एक चीज में किफ़ायत करते थे। जीवन जीने में प्रदर्शन का भाव नहीं था। जरूरत के अनुसार ही किसी चीज का उपयोग करते थे। घर फालतू चीजों का कबाड़खाना नहीं था। आज पानी की बचत को लेकर या भंडारण के लिये जो तरीके सुझाए जाते हैं, वे पहले भी थे, पर लोग उन पर अमल नहीं करते थे।

आज इतने प्रचार-तंत्र के बावजूद लोग लापरवाह हैं क्योंकि उन्हें पानी आसानी से मिल जाता है। पहले कुएं से पानी लेकर घर पहुंचना युद्ध जीतने जैसा था। इस संदर्भ में एक कविता प्रस्तुत है –

सात-सात कोस

जाते थे चल के

करते थे सारी-सारी रात काली

कुएं की डोर खींचते-खींचते

ज़िंदगी को

साँसे छोटी पड़ गईं

भागते-भागते

पीछे के पीछे।

प्राकृतिक संसाधनों की भी एक हद होती है। प्रकृति मनुष्य की जरूरत तो पूरी कर सकती है, पर उसके लालच को पूरा नहीं कर सकती। जिस तरह आज मनुष्य प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर उसकी कोख सूनी करता जा रहा है, आप सोचिए, क्या प्रकृति कभी बदल नहीं लेगी ? राजस्थान के बत्तीस जिलों में धरती के भीतर के पानी को लेकर तीन चौथाई से ज्यादा ‘डार्क ज़ोन’ में है। सबसे ज्यादा पानी की जरूरत खेती-बाड़ी और कारखानों में होती है। अपने देश की फसलें ज्यादातर मानसून पर आश्रित हैं। मानसून कब और कितना बरसेगा, यह किसी के वश में नहीं है। मानसून के काम बरसने पर बांध पानी से नहीं भर पाएंगे तो नहरें कैसे चलेंगी ? नहरें नहीं चलेंगी तो फसलों की सिंचाई खटाई  में। अब बच गया धरती से पानी लेना। खींच लाओ। दिनोंदिन ‘वाटर लेवल’ गिरता जा रहा है। वैसे भी पानी नहीं होगा तो बिजली कैसे बनेगी ? सब कुछ ठप्प। पेट्रोलियम पदार्थों की एक हद है तो पानी की भी है।

पानी को लेकर बड़े देश और बड़े आदमी दोनों ही लापरवाह हैं क्योंकि जिनके पाँव में बिवाई नहीं फटी, वे क्या ही जाने पीर पराई ? बागवानी, गाड़ी धोना, छिड़काव, फ्लश टॉयलेट, स्नान घर, रसोई, आदि में बड़े लोगों के पचास घरों में जितना पानी लगता है, उतने पानी से गाँव के दो सौ घरों का काम चल सकता है। हालांकि पानी को लेकर गाँव के लोगों में भी पहले जैसी चेतना नहीं है, इसके बावजूद खेती के अलावा यहाँ पानी की लागत कम है। पानी के संदर्भ में लोगों की लापरवाही इस बात में देखी जा सकती है कि खुली नलें चलती रहती हैं और अमृत सरीखा पानी गंदी नालियों मेन बहता राहत है। आज बाजार मेंपीनेका साफ पानी दूध से भी ज्यादा महंगा पड़ता है।

दरअसल पानी के प्रबंधन के सिलसिले में देशों और राज्य की सरकारों को जिस दिशा  में ध्यान देना चाहिए था, नहीं दिया गया। अपने देश में तो हालात यह है कि एक तरफ तो अकाल में लोग प्यासे मर रहे हैं और दूसरी तरफ बाढ़ में डूब रहे हैं। यदि बाढ़ के उस पानी का प्रबंधन ठीक से किया जाए तो बाढ़ और सूखा दोनों समस्याओं से निजात मिल सकती है। कौन करे ? राहत के काम दामों तरफ चलते हैं। कहावत है कि लड्डू टूटेगा तो दाने तो बिखरेंगे ही। अगर देश की सारी नदियां आपस में जुड़ जाए तो काफी हद तक सूखे और बाढ़ की समस्या हल हो जाएगी।

मनुष्य की नादानी और लालच के कारण ‘ग्लोबल वार्मिंग’ और पर्यावरण प्रदूषण जैसी समस्याएं आज लगातार डरावनी होती जा रही हैं। ग्लोबल वार्मिंग के कारण शिखरों की बर्फ पिघल कर समुद्र में जा रही है। पर्यावरणविदों के अनुसार आने वाले पचास-साठ वर्षों में गंगा नदी सूख सकती है।  इसी तरह बारह महीने बहने वाली नदियाँ जो ग्लेशियरों से जुड़ी हुई हैं, उन पर भी खतरा मंडरा रहा है।  समुद्र में पानी बढ़ने के कारण बांग्लादेश, मालदीवजैसे देश और समुद्र किनारे बसे मुंबई जैसे महानगरों पर भी खतरे मंडरा रहे हैं।  पानी का यह डरावना रूप धरती पर प्रलय ला सकता है।  पर्यावरण प्रदुषण के कारण और धरती पर अल्ट्रा वायलेट किरणों के पड़ने के कारण जो खतरनाक बीमारियाँ और खतरे मंडरा रहे हैं, उन सबका मुकाबला करने में मनुष्य  अभी तक पूर्ण रूप से सक्षम नहीं है।  उसकी भलाई ‘बचाव और सिर्फ बचाव’ में ही है।

इतने बड़े ब्रह्माण्ड में प्रकृति अपनी लीला में व्यस्त है।  निर्माण और विनाश की प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है। पता नहीं सूरज, धरती, चाँद, तारे इस ब्रह्माण्ड में बने हैं, ख़त्म हुए हैं और बनते रहेंगे। इस बात से प्रकृति को तो कोई फर्क नहीं पड़ता कि ‘हिम युग’ है या ‘गर्म युग’; पर मनुष्य को ज़रूर पड़ेगा।  अपने साथ-साथ मनुष्य जिव-सृष्टिकी कब्र भी खोदता जा रहा है।  धरती, आकाश, पानी, समीर और आग सबका आपस में एक खास संतुलन है, इसलिए यह जिंदगी है, हरियाली है। संतुलन बिगड़ने पर क्या होगा, यह तो भविष्य ही बता सकता है। इसधरती पर जीवों के रहने लायक वातावरण बनने में करोड़ोंवर्ष लग गए, पर ख़त्म होने के लिए एक पल काफी है।  इसलिएसावधानरहनाज़रूरी है।

धरती के दो तिहाई हस्सेमें समुद्र है।  परपीने वाले पानी और सिंचाई के सन्दर्भ में कह सकते है- ‘पानी बिच मीन पियासी’।  इस हालातों को देखते हुए ख़बरदार हो जाना चाहिए। सबसे पहले पुराने परम्परागत जलस्रोतोंकी खैर-खबर ली जानी चाहिए।  उनमेंसुधार कर उनको पानी के भण्डारण योग्य बनाना चाहिए।  सिंचाई के चालू तरीकों को छोड़कर नए तरीके ईजाद किये जाएं जिनमें कम से कम पानी का ज्यादा से ज्यादा उपयोगकिया जा सके। ऐसेबीजोंकी खोज कीजाये जो कम पानी में तैयार हो जाएं। हर एक शहर, कस्बे या गाँव में पानी को पुनर्चक्रित (Recycle)करबारी-बारी से उपयोग में लाया जाये।  सबकी सहमति से राष्ट्रीय जल नीति बनाई जाये।  और भी बहुत उपाय है जिनको अपनाकर भविष्य में जल-संकट का समना किया जा सकता है। वरना, ‘बिन पानी सब सून। ’ रहीम तो पहले ही कह चुके हैं।  इसलिए सिर पर मंडराते खतरे को देखते हुए आज समाज को अपना रहन-सहन और जीवनशैली बदल लेनी चाहिए।

  मूल : डॉ.  मंगत बादल,‘बातरी बात’

     राजस्थानी निबंध संग्रै से साभार

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टंकण सहयोग – विवेक तिवारी (छात्र )

 

 

7.28 करोड़ आयकर रिटर्न दाखिल, 7.5 फीसदी अधिक 

नयी दिल्ली । देश में इस बार करदाताओं ने आयकर रिटर्न फाइल करने का नया रिकॉर्ड बनाया। असेसमेंट ईयर 2024-25 के लिए आईटीआर फाइलिंग की आखिरी तारीख 31 जुलाई 2024 थी। वित्त मंत्रालय की ओर से शुक्रवार को इस साल टैक्स रिटर्न फाइलिंग की जानकारी दी गई है। इसके मुताबिक, 31 जुलाई तक कुल 7.28 करोड़ आईटीआर दाखिल हुए। यह पिछले साल के मुकाबले 7.5 फीसदी अधिक हैं, असेसमेंट ईयर 2023-24 में कुल 6.77 करोड़ रिटर्न फाइल हुए थे।
5.27 करोड़ ने न्यू रिजीम का विकल्प चुना – मंत्रालय ने यह भी बताया है कि इस साल करदाताओं के न्यू टैक्स रिजीम (नई कर व्यवस्था) चुनने के प्रति रुझान बढ़ा है। इस बार फाइल हुए 7.28 करोड़ आईटीआर में से 5.27 करोड़ ने न्यू रिजीम का ऑप्शन चुना है, जबकि ओल्ड टैक्स रिजीम के तहत सिर्फ 2.01 करोड़ रिटर्न दाखिल हुए हैं। इस साल कुल 58.57 लाख आईटीआर पहली बार फाइलिंग करने वालों ने दाखिल किए हैं।
31 तारीख को भरे गए करीब 70 लाख आईटीआर रिटर्न – 31 जुलाई 2024 को नौकरीपेशा करदाता – और नॉन टैक्स ऑडिट केस वाले इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करने की आखिरी तारीफ थी और इस दिन बड़ी संख्या में टैक्स रिटर्न दाखिल किए गए। एक ही दिन में 69.92 लाख रिटर्न भरे गए। इसके साथ ही ई-फाइलिंग पोर्टल पर शाम 7 से रात 8 बजे के बीच रिटर्न दाखिल करने की प्रति घंटे दर 5.07 पहुंच गई। वित्त मंत्रालय ने कहा है कि सरकार की ओर से करदाताओं को नए और पुराने रिजीम के प्रति जागरूक करने के लिए अभियान चलाए गए। इस दौरान उन्हें FAQs और वीडियो के जरिए ई-फाइलिंग पोर्टल पर अलग-अलग भाषाओं में जानकारी प्रदान की गई। साथ ही इनकम टैक्स इंडिया के सोशल मीडिया हैंडल्स से भी टैक्सपेयर्स को समय पर आईटीआर दाखिल करने के लिए प्रेरित किया गया। मंत्रालय ने बताया कि इस साल फाइल हुए 6.21 करोड़ रिटर्न ई-वेरिफाइड हो चुके हैं। इनमें से 5.81 करोड़ आईटीआर आधार बेस़्ड ओटीपी (करीब 94%) के जरिए ई-वेरिफाइ किए गए। ई-फाइलिंग हेल्पडेस्क टीम ने टैक्सपेयर्स के करीब 11 लाख सवालों के जबाव दिए। ताकि उन्हें समय पर रिटर्न फाइल करने में कोई परेशानी न आए।
इसके साथ ही वित्त मंत्रालय ने आईटीआर दाखिल करने वाले सभी करदाताओं से अपील की है कि वे फाइलिंग के 30 दिनों के भीतर रिटर्न को ई-वेरिफाई जरूर करें। साथ ही जो करदाता किसी कारणवश तय समय पर आईटीआर नहीं भर पाए, वे भी जल्दी इस प्रक्रिया को निपटाएं।

35 बार सरकारी नौकरी की परीक्षा में हुए असफल, अब हैं आईएएस अधिकारी

नयी दिल्ली ।  कहते हैं न कि जो हारकर भी जीत जाता है वही बाजीगर होता है. कुछ ऐसी ही कहानी हरियाणा के एक शख्स की है। वह किसी भी सरकारी नौकरी की परीक्षा में सफल नहीं हुए लेकिन देश की सबसे कठिन परीक्षा यूपीएससी को पास करने में सफल रहे। इतनी असफलताओं के बावजूद भी हौसला बनाए रखा और फिर से सफलता हासिल करने के लिए उठ खड़े होते. उन्हें खुद पर भरोसा था कि वह कामयाब होंगे और उनकी दृढ़ता ने रंग दिखाया और अब वह एक आईएएस अधिकारी हैं. उनका नाम विजय वर्धन है।
आईएएस विजय वर्धन हरियाणा के सिरसा में पले-बढ़े, जहां उनका जन्म हुआ था. उन्होंने हिसार से इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की है। इसके बाद वह यूपीएससी की तैयारी के लिए दिल्ली चले गए. विजय हर परीक्षा में असफल रहे। वह 35 बार सरकारी नौकरी की परीक्षाओं में शामिल हुए लेकिन एक भी परीक्षा को पास नहीं कर पाए. साथ ही उन्हें कई बार यूपीएससी में भी हार का सामना करना पड़ा लेकिन आशावादी होने की वजह से डटे रहे। आखिरकार वह वर्ष 2018 में यूपीएससी की परीक्षा को पास करने में सफल रहे और 104वीं रैंक हासिल की।
दो बार क्रैक किया यूपीएससी
वर्ष 2018 में यूपीएससी की परीक्षा में 104वीं रैंक लाने पर विजय वर्धन का चयन आईपीएस ऑफिसर के तौर पर हुई. लेकिन वह इससे नाखुश थे क्यों उन्हें आईएएस ऑफिसर बनना था। इसके बाद फिर से वर्ष 2021 में यूपीएससी की परीक्षा में शामिल हुए और आईएएस बनने के अपने सपने को पूरा करने में कामयाब रहे। उन्होंने वर्ष 2018 और 2021 में दो बार यूपीएससी परीक्षा पास कीय़ युवाओं के लिए वह कहते हैं कि खुद पर कभी भरोसा मत खोना। उन्होंने एक बार कहा था कि उम्मीदवार ही उनका सबसे बड़ा शिक्षक होता है।
गलतियों से सीखें – विजय वर्धन ने बार-बार असफल होने से निराश होने के बजाय ‘अपनी गलतियों से सीखा। प्रत्येक असफलता के बाद उन्होंने ईमानदारी से अपने प्रदर्शन का मूल्यांकन किया। हालांकि शुरुआत में उन्हें एक आईपीएस अधिकारी के रूप में चुना गया था, लेकिन वे अपनी स्थिति से असंतुष्ट होकर आगे के प्रयास करते रहे। आखिरकार उन्होंने आईएएस अधिकारी बनकर अपना लक्ष्य हासिल करने में सफल रहे।

रक्षाबंधन पर दमकता रहे आपका चेहरा

रक्षाबंधन, स्वाधीनता दिवस और जन्माष्टमी जैसे त्योहार सामने हैं और सुन्दर तो दिखना ही है। तो चलिए सुन्दर दिखिए और ये तरीके आजमा लीजिए –
 सबसे पहले चेहरे को कच्चे दूध से साफ कर लें – मेकअप शुरू करने से पहले चेहरे को साफ करना बहुत जरूरी है। इसके लिए आप कच्चे दूध का इस्तेमाल कर सकते हैं. कच्चे दूध से चेहरे की अच्छे से मसाज करें और फिर ताजे पानी से चेहरा धो लें।
जेल आधारित क्रीम लगाएं – चेहरे को साफ करने के बाद चेहरे पर जेल बेस्ड क्रीम लगाएं। इसके बाद अगर आप मेकअप लगाना शुरू करेंगी तो मेकअप लंबे समय तक टिकेगा और मेकअप पर कोई दरार नहीं आएगी।
अब फाउंडेशन लगाएं – हमेशा अपनी त्वचा के रंग से मेल खाता हुआ फाउंडेशन ही इस्तेमाल करें। डार्क या लाइट शेड का फाउंडेशन आपके लुक को खराब कर सकता है।
कंटूरिंग करें – मेकअप के समय कॉन्टूरिंग जरूर करें। इससे आपके चेहरे को सही आकार मिलेगा। इससे चेहरे पर निखार आता है और मेकअप अच्छा लगता है।
ब्लश और हाइलाइटर – मेकअप के बाद ब्लश और हाइलाइटर का इस्तेमाल जरूर करें। ब्लश और हाइलाइटर मेकअप को फाइनल टच देने का काम करते हैं।
आंखों का मेकअप और लिपस्टिक – अगर आप डार्क आई मेकअप कर रही हैं तो हल्के रंग की लिपस्टिक लगाएं। वहीं अगर आप लिपस्टिक डार्क लगा रही हैं तो आंखों का मेकअप हल्का रखें।
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त्योहारों के दिन हैं, कुछ मीठा तो चाहिए

बादाम पेड़ा

सामग्री:  1 कप भीगे और छिलके उतारे हुए बादाम, 1/4 कप दूध, 2 बड़े चम्मच घी, 1/2 कप या स्वादानुसार चीनी, 1/2 चम्मच इलायची पाउडर, चुटकी भर इच्छानुसार केसर, सजावट के लिए पिस्ता
विधि: बादाम का पेस्ट तैयार करें। सबसे पहले रात भर भीगे हुए बादामों को दूध के साथ मिलाकर एक चिकना पेस्ट बना लें। इस पेस्ट को ज्यादा पतला न करें ।
मिश्रण पकाएं: अब एक पैन में घी गर्म करें और उसमें बादाम का पेस्ट डालें। इसे मध्यम आंच पर लगातार चलाते हुए पकाएं जब तक कि इसका रंग हल्का सुनहरा न हो जाए और घी अलग न होने लगे।
चीनी मिलाएं: अब इसमें चीनी डालें और अच्छी तरह मिलाएं। चीनी पिघलने के बाद, इलायची पाउडर और केसर डालें। इसे तब तक पकाएं जब तक कि मिश्रण गाढ़ा होकर पैन के किनारों से अलग न होने लगे।
पेड़े का आकार दें: अब इस मिश्रण को आंच से उतार लें और थोड़ा ठंडा होने दें। अपने हथेली पर हल्‍का घी लगाएं और इस मिश्रण को छोटे-छोटे पेडों का आकार दें। हर पेडे के ऊपर एक-एक पिस्ता का टुकड़ा रखें और हल्के हाथ से दबाएं।
ठंडा करें और परोसें: अब इन पेड़ों को आप फ्रिज में रख कर ठंडा कर सकते हैं। जब पेड़े अच्‍छी तरह ठंडे हो जाएं तो आप इन्‍हें परोसें।
इन बातों का रखें ख्‍याल
– इसे एयरटाइट कंटेनर में स्टोर करें जिससे यह अधिक दिनों तक ताजा रहे। अगर आप इसे और भी अधिक पौष्टिक बनाना चाहते हैं तो इसमें काजू भी डाल सकते हैं।
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अंगूरी रसमलाई


सामग्री : डेढ़ लीटर दूध, 1/3 कप कंडेंस्ड मिल्क, 1 बड़ा चम्मच नींबू का रस, 1 कप चीनी, 4 इलायची, 1 चुटकी केसर, सजाने के लिए कटे हुए बादाम और पिस्ता
विधि : अंगूरी रसमलाई बनाने के लिए सबसे पहले एक पैन में दूध गर्म कर लें। जब इस दूध में उबाल आने लगे तो उसमें नींबू का रस मिलाकर दूध को फाड़ लें। अब एक मलमल का कपड़ा लेकर उसमें गाढ़ा दूध निकाल दें। नींबू के रस की खटास छैने से दूर करने के लिए उसे पानी से धो लें। अंगूरी रसमलाई बनाने के लिए आपका छैना बनकर तैयार हो चुका है। अब एक दूसरे पैन में बचे हुए एक लीटर दूध को गर्म करें। दूध को गर्म करते समय इसमें केसर, चीनी, कटे हुए बादाम और इलायची पाउडर मिलाकर दूध को आधा होने तक पकाएं। अब पहले से तैयार किया हुआ छैना लेकर उसे सॉफ्ट आटे की तरह गूंधें। इसके बाद इस छैने से छोटी-छोटी आकार के गोले बना कर तैयार करें। इन बॉल्स को अपनी हथेलियों से दबाएं। अब अंगूरी रस मलाई की चाशनी बनाने के लिए एक पैन में चार कप पानी गर्म, डेढ़ कप चीनी डालकर उबाल लें। जब चाशनी उबलने लगे, तब उसमें तैयार की हुई छैना बॉल्‍स डालकर कुछ देर इन्हें चाशनी के साथ ही पकने दें। कुछ देर बाद, बॉल्‍स को चाशनी से बाहर निकालकर दूध वाले मिश्रण के बॉउल में डाल दें। आपकी अंगूरी रसमलाई बनकर बिल्कुल तैयार है। आप इस डेजर्ट रेसिपी को ठंडा करके खाना चाहते हैं तो इसे 4-5 घंटे फ्रिज में ठंडा होने के लिए रख दे। अंगूरी रसमलाई को सर्व करने से पहले उसके ऊपर अपने मनपसंद के कटे हुए मेवे डालकर गार्निश करें।

दोसा प्रीमिक्स और दोसा

दोसा सभी को पसंद होता है और घर पर बने डोसे के स्वाद का तो कोई मुकाबला ही नहीं .. पर डोसा बनाने की तैयारी लम्बी होती है , जो कई बार करना मुश्किल होता है। प्रीमिक्स बना के रख लिजिये और जब भी डोसा बनाना हो , 1/2 घंटे भिगो के रखिये और दोसे का घोल तैयार…जितने मन करे दोसे बनाये..यह पौष्टिक भी है सस्ता भी..विधि यह रही जो हमें फेसबुक के एक पेज पर मिली –
दोसा प्रीमिक्स
सामग्री – 1 कटोरी उड़द दाल, 2 टेबल स्पून चना दाल , 1/2 कटोरी पोहा , 1/2 छोटी चम्मच मेथीदाना, सेंधा
नमक या साधारण नमक, 1 चम्मच चीनी पाउडर, 3 कटोरी चावल का आटा
विधि – एक पैन में उड़द, चना दाल मेथीदाना को 3-4 मिनिट भूनिये। पोहा मिलाइये और 2 मिनिट और भूनिये। ठंडा होने पर नमक, चीनी पाउडर डालिये और मिक्सर में पीस कर लें। चावल का आटा मिलाइये और चलाइये। एयर टाइट कंटेनर में स्टोर करें। बाहर रख के 1 महीने और फ्रीज में रख के 3-4 महीने तक इस्तेमाल कर सकते हैं।
दोसा बनाने के लिए- 1 कप डोसा मिक्स में 1/2 कप दही मिलाये और पानी मिला के पकोड़े के जैसा घोल बना ले। 1/2 घंटा रख दे और बाद में नॉन स्टिक या डोसा तवा पर डोसा का घोल डाले । 2 मिनट बाद किनारों पर तेल डाले और कुरकुरा होने तक सेक ले। .सादा डोसा ऐसे ही बनाएं और मसाला डोसा में बीच में मसाला रखे और मोड़ दे।

न्यूयॉर्क में आयोजित गणित प्रतियोगिता में बर्दवान की छात्रा कांस्य पदक जीता

बर्दवान/पानागढ़ । पूर्व बर्दवान जिले के बर्दवान की एक होनहार और तेज छात्रा ने विदेश में जाकर अपनी मेधा का प्रदर्शन कर कांस्य पदक जीत कर बर्दवान समेत बंगाल का नाम रोशन किया है। बर्दवान म्युनिसिपल गर्ल्स की आठवीं कक्षा की छात्रा अद्रिजा मंडल ने हाल ही में कोलंबिया न्यूयॉर्क में गणित विषय पर दुनिया के प्रतिभाशाली छात्रों को लेकर आयोजित प्रतियोगिता में पूरे भारत से महज तीन विद्यार्थियों में बर्दवान की छात्रा अद्रिजा मंडल ने कांस्य पदक जीता है। गणित प्रतियोगिता में भाग लेकर अद्रिजा मंडल ने अपने विद्यालय का नाम रोशन किया है। बताया जाता है की दुनिया भर के गणित में मेधावी छात्र छात्राओं को लेकर यह विश्व प्रतियोगिता आयोजित की गई थी। यह प्रतियोगिता 14 जुलाई से 18 जुलाई तक कोलंबिया न्यूयॉर्क में आयोजित की गई थी। इस प्रतियोगिता में भारत से महज तीन विद्यार्थी ही पहुंचे थे जिनमे पूर्व बर्दवान जिले के बर्दवान म्युनिसिपल गर्ल्स की आठवीं कक्षा की छात्रा अद्रिजा मंडल भी थी। इस मेधावी छात्रा ने कई चरणों में अपने प्रतिद्वंदियों को पराजित कर आगे बढ़ी। बताया जाता है की छात्रा अद्रिजा मंडल को गणित में उनकी योग्यता के लिए कोलंबिया न्यूयॉर्क में आयोजित समारोह में कोलंबिया विश्वविद्यालय द्वारा एक प्रमाण पत्र और कांस्य पदक देकर सम्मानित किया गया। इस समारोह में छात्रा के पिता अरुण मंडल और मां विजयलक्ष्मी मंडल सहित दुनिया के विभिन्न हिस्सों से छात्रों के माता-पिता शामिल हुए है। अद्रिजा मंडल बताती है की वह भविष्य में गणित को लेकर ही शोध करेंगी.

बावड़ी जिसमें पसन्द नहीं आने वाली रानियां रखी जाती थीं

मांडू । राजाओं ने रानियों की लिए बहुत किले और महल बनवाए लेकिन मध्य प्रदेश के मांडू में बनी चंपा बावड़ी एक अलग कहानी दिखाती है। लोगों का कहना है कि राजा ने इस बावड़ी को कई कारणों से बनवाया था। एक कारण राजा की कम पसंदीदा रानियां भी थीं. वो यहां रहा करती थीं. इस 500 साल पुरानी बावड़ी की बनावट भी उम्दा है। मांडू की चंपा बावड़ी की कहानी – 14वी-15वीं शताब्दी में बनी चंपा बावड़ी सिर्फ एक बावड़ी नहीं है। यह धरती के नीचे बना एक महल है। पानी को इक्कठा करने के लिए बावड़ी को बनवाया गया था। दुश्मनों से बचने के लिए रानी बावड़ी के पानी में कूदा करती थीं। पानी के नीचे बनी सुंरगे कोठरियों से जुड़ती थी। इसका इस्तेमाल सिर्फ राजसी परिवार किया करता था। लोगों का कहना है कि राजा अपनी कम पसंदीदा रानियों को भी इस कोठरी में जगह देता था।
कमाल की इंजीनियरिंग है उदाहरण – ऊपर से देखने पर चंपा बावड़ी जलाशय की तरह दिखती है. लेकिन जैसे-जैसे नीचे उतरो एक मंजिल और नजर आने लगती है। कई सारे भूमिगत कमरे यहां बने हैं, जो किसी भूलभुलैया जैसे हैं. धनुषाकार के कमरे हैं. उन पर अलमारियां बनी हैं। कमरों तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां बनी हैं। रोशनी और वेंटिलेशन का भी इंजीनियर ने पूरा ख्याल रखा है। गर्मी के दिनों में भी यह बावड़ी ठंडी रहती है.
कैसे रखा चंपा बावड़ी नाम – राजा ने इस बावड़ी का नाम चंपा की क्यों रखा? इसके पीछे कई कहानी हैं। एक कारण है चंपा की बेले, जो बावड़ी में मौजूद हैं। इसी वजह से पानी से भी चंपा की खुशबू आती थी। कुछ लोग ऐसा भी कहते हैं कि इस बावड़ी का आकार चंपा के फूल जैसा है, जिसकी 5 पंखुड़ी होती है। तभी लोग इसे चंपा बावड़ी कहते हैं।
इस बावड़ी के पास एक हमाम भी बना हैं। यहां रानियां नहाया करती थीं। हमाम में रोशनी और हवा सही तरीके से पहुंचे, इसके लिए छत पर सितारों के डिजाइन बनाए गए हैं। हमाम में ठंडे और गर्म पानी का प्रबंध मौजूद था।
हमला होने पर कूद जाती थीं महिलाएं – चंपा बावड़ी जल प्रबंधन और दुश्मनों से सुरक्षा के लिए भी खास है। हमले की स्थिति में शाही महिलाएं बावड़ी के पानी में कूद जाती थीं। बावड़ी के अंदर ही अंदर कई रास्ते थे, जिनकी मदद से शाही परिवार भाग जाता था।
कहां है बावड़ी – मांडू के जहाज महल के उत्तर-पश्चिम में यह बावड़ी बनी हुई है. इंदौर या भोपाल से होते हुए आप यहां पहुंच सकते हैं। रेलवे स्टेशन तक बावड़ी तक का आप रिक्शा कर सकते हैं।