रक्षाबंधन पर बना लें यह मिठाइयां
इंद्र देव सहित इन भगवानों ने भी निभाया था राखी का रक्षा वचन
सावन माह की पूर्णिमा के दिन रक्षा बंधन का पर्व मनाया जाता है। इस बार 19 अगस्त 2024 सोमवार के दिन यह त्योहार मनाया जाएगा। बहन अपने भाई की कलाई पर राखी यानी रक्षा सूत्र बांधती है जिससे भाई की रक्षा होती है और तब भाई भी बहन को रक्षा का वचन देता है। प्राचीन काल या पौराणिक काल में इस राखी के बंधन को भगवानों ने भी निभाया था, जानते हैं ऐसे ही किस्सें।
1. सबसे पहले भगवान इंद्र अपना राज्य असुर वृत्रा के हाथों गंवाने के बाद उसके विरुद्ध जब युद्ध के लिए जाने लगे तो भगवान बृहस्पति के अनुरोध पर इंद्र देव की पत्नी सचि ने उन्हें रक्षासूत्र बांधकर संग्राम में विजय होने के साथ-साथ उनकी रक्षा की प्रार्थना की थी। इंद्र ने इस बंधन की लाज रखी और वृत्तासुर को हराकार घर लौटे।
2. येन बद्धो बलिः राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥ इस श्लोक का हिन्दी भावार्थ है- “जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र राजा बलि को बांधा गया था, उसी सूत्र से मैं तुझे बांधती हूं, तू अपने संकल्प से कभी भी विचलित न होना।”
दरअसल, भगवान वामन ने महाराज बलि को वचन के सूत्र में बांधकर उससे तीन पग भूमि मांगकर उन्हें पाताललोक का राजा बना दिया तब राजा बलि ने भी वर के रूप में भगवान से रात-दिन अपने सामने रहने का वचन भी ले लिया था। भगवान को वामनावतार के बाद पुन: लक्ष्मी के पास जाना था लेकिन भगवान ये वचन देकर फंस गए और वे वहीं रसातल में बलि के यहां रहने लगे। उधर, इस बात से माता लक्ष्मी चिंतित हो गई। ऐसे में नारदजी ने लक्ष्मीजी को एक उपाय बताया। तब लक्ष्मीजी ने राजा बलि को राखी बांधकर अपना भाई बनाया और अपने पति को अपने साथ ले आईं। उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी। तभी से यह रक्षा बंधन का त्योहार प्रचलन में हैं।
3. एक और वृत्तांत के अनुसार यमराज की बहन यमुना ने राखी बांध कर उन्हें अजरता और अमरता के वरदान से संपूर्ण किया था।
4. शिशुपाल का वध करते समय सुदर्शन चक्र से भगवान श्रीकृष्ण की तर्जनी में चोट आ गई थी तो कहते हैं कि द्रौपदी ने लहू रोकने के लिए अपनी साड़ी फाड़कर उनकी अंगुली पर बांध दी थी। यह द्रोपदी का बंधन था। इसके बाद जब द्रौपदी का जब चीरहरण हो रहा था तब श्रीकृष्ण ने इस बंधन का फर्ज निभाया और द्रौपदी की लाज बचाई थी।
5. जब युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से पूछा कि मैं सभी संकटों को कैसे पार कर सकता हूं, तब कृष्ण ने उनकी तथा उनकी सेना की रक्षा के लिए राखी का त्योहार मनाने की सलाह दी थी।
(साभार – वेबुदुनिया)
आरजीकर कांड : न्याय की मांग आधी रात सड़क पर उतरी नारी शक्ति
कोलकाता। कोलकाता के सरकारी आरजी कर अस्पताल की स्नातकोत्तर प्रशिक्षु महिला चिकित्सक के साथ दुष्कर्म व उसकी हत्या की घटना के खिलाफ कोलकाता व राज्य के जिलों में बुधवार आधी रात को महिलाएं-लड़कियां सड़कों पर उतरीं और उन्होंने न्याय की मांग की। इस विरोध प्रदर्शन में पुरुष भी शामिल थे। जिस अकेली युवती के आह्वान पर आधी रात को सड़कों पर महिलाएं उतरीं उनका नाम रिमझिम सिन्हा है। प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय की पूर्व छात्रा व वर्तमान शोधार्थी महिला चिकित्सक से साथ दुष्कर्म व हत्या की घटना का इंसाफ चाहती हैं। पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर में आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल बलात्कार-हत्या की घटना के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया गया। प्रदर्शनकारी महिलाओं ने पीड़िता को श्रद्धांजलि भी दी। दरअसल 10 अगस्त की रात को उन्होंने फेसबुक पर पोस्ट करके लड़कियों से आधी रात को सड़क पर उतरने का आह्वान किया था। इसका उन्हें लड़कियों की ओर से जबरदस्त समर्थन मिला। इस कार्यक्रम का नाम लड़कियां रात पर कब्जा करें दिया गया था। कार्यक्रम का नारा था स्वंतत्रता दिवस की आधी रात महिलाओं की आजादी के लिए। लड़कियों ने इस कार्यक्रम के लिए अनेक वाट्सएप ग्रुप बनाया था। कोलकाता में कॉलेज स्ट्रीट से लेकर बागुईआटी से लेकर न्यूटाउन से लेकर श्यामबाजार की सड़कों पर सैलाब उमड़ा। देश भर में इस आन्दोलन की गूंज सुनाई दी और महिलाओं का ऐतिहासिक विरोध भी दर्ज हुआ।
न चलती बस में, न अपने घर, न ऑफिस में… मेरी आजादी किस डिब्बे में बंद है?
आजादी के बाद रेलवे ; स्टीम इंजन से वंदे भारत तक का तय किया सफर
वैसे तो भारतीय रेलवे का इतिहास आजादी से पहले का है, लेकिन जब सफर की बात आती है तो इसमें बड़े बदलाव आजादी के बाद देखने को मिले। अपने उतार-चढ़ाव भरे सफर के साथ आज भारतीय रेलवे अमृत महोत्सव के गंतव्य तक पहुंच गया है।
दुनिया के लिए मिसाल है भारतीय रेलवे – दुनिया में सबसे बड़े रेल नेटवर्क की जब भी बात आती है तो भारतीय रेलवे का नाम जरूर आता है। भारतीय रेलवे का नेटवर्क लगभग वर्तमान में करीब 1.26 लाख किलोमीटर से ज्यादा का हो गया है। भारतीय रेल नेटवर्क के जरिए हर दिन करोड़ों की संख्या में लोग यात्रा करते हैं। भारत में ट्रेनें रोजाना जितनी दूरी तय करती हैं, अगर उसे मापें तो कुल दूरी करीब 36.78 लाख किलोमीटर की होगी। अब अगर इसकी तुलना अंतरिक्ष में धरती का एक चक्कर लगाने से करें, तो यह 97 बार पृथ्वी का चक्कर लगाने जितनी होगी। इसका मतलब है कि भारतीय रेलवे रोजाना धरती के चारों ओर 97 बार चक्कर लगाने जितनी दूरी तय करती है।
भारतीय रेलवे का विकास – आजादी के बाद से भारतीय रेलवे ने काफी विकास किया है। भारतीय रेलवे का भाप इंजन से लेकर वंदे भारत तक का यह सफर काफी अनोखा है। उम्मीद है कि आगामी पांच सालों में यह सफर शानदार रहने वाला है। देश के अभी कई रूट्स पर वंदे भारत दौड़ रही है और कुछ सालों में पहाड़ी इलाकों पर भी वंदे भारत दौड़ने लगेगी। अब रेलवे नेटवर्क में कश्मीर, पूर्वोत्तर और लद्दाख जैसे पहाड़ी इलाकों को भी जोड़ा जा रहा है। इसके अलावा आर्थिक विकास के लिए रेलवे डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर का निर्माण हो रहा है। रेलवे के विकास में वंदे भारत की अहम भूमिका है। यह भारत की बड़ी आबादी के लिए महत्वपूर्ण जीवन रेखा है। आने वाले कुछ वर्षों में भारतीय रेलवे विश्व स्तरीय सुविधाओं और अत्याधुनिक तकनीक वाली ट्रेनों से लैस होगा। इसका मतलब है कि रेलवे यात्रियों को और सुगम सुविधाएं मिलेगी।
जल्द दौड़ेगी बुलेट ट्रेन – भारत में वर्ष 2026 तक बुलेट ट्रेन के चलने की संभावना है। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बुलेट ट्रेन परियोजना की समीक्षा की थी और बताया था कि साल 2026 तक भारत की पटरियों पर बुलेट ट्रेन दौड़ती हुई दिख सकती है। भारत की पहली बुलेट ट्रेन मुंबई और अहमदाबाद के बीच चलेगी। आज के समय में जहां मुंबई और अहमदाबाद के बीच सफर करने में छह घंटे लगते हैं। वही, बुलेट ट्रेन के बाद यह समय आधा हो जाएगा।
आर्च ब्रिज है उपलब्धि – भारत के चिनाब नदी पर आर्च ब्रिज बन चुका है। इस ब्रिज का निर्माण यूएसबीआरएल प्रोजेक्ट के तहत हुआ। आर्च ब्रिज और अंजी ब्रिज इंजीनियरिंग का एक अद्वितीय उदाहरण पेश करती है। आर्च ब्रिज की वजह से रेल नेटवर्क में कश्मीर को सफलतापूर्वक जोड़ा गया है। आर्च ब्रिज के जरिये देशवासी आसानी से ट्रेन के माध्यम से कश्मीर पहुंच पाएंगे।
भारतीय रेलवे अपने नेटवर्क के विस्तार के साथ यात्रियों की सुरक्षा के लिए भी काम कर रहा है। इसके लिए भारतीय रेलवे द्वारा राजधानी दिल्ली के करीब 118 किलोमीटर और बाकी मंडलों पर भी 1175 किलोमीटर रेलवे ट्रैक पर ट्रेनों की टक्कर को रोकने के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस तकनीक का नाम’कवच’ है, इससे ट्रेन हादसे को रोकने में सफलता हासिल होगी।
पीएम ने युवाओं से की राजनीति में आने की अपील
नयी दिल्ली । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से युवाओं से खास खास अपील करते हुए राजनीति में आने को कहा। उन्होंने एक लाख युवाओं को राजनीति में जन प्रतिनिधियों के रूप में लाने का आह्वान किया, विशेष रूप से उन परिवारों के युवाओं को, जिनकी कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि न हो। उन्होंने कहा कि इस कदम से जातिवाद और वंशवाद की राजनीति को समाप्त करने में भी मदद मिलेगी।
78वें स्वंतत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से देशवासियों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि ऐसे युवा जरूरी नहीं कि एक ही पार्टी में शामिल हों, वे अपनी पसंद की किसी भी पार्टी में शामिल हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि देश में राजनीति के क्षेत्र में, हम एक लाख जनप्रतिनिधि चाहते हैं। हम एक लाख ऐसे युवाओं को जोड़ना चाहते हैं जिनकी कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं है। मोदी ने कहा कि उनके माता-पिता, भाई-बहन, चाचा-चाची, भतीजे किसी भी पीढ़ी में राजनीति में कभी नहीं रहे हैं। ऐसे प्रतिभाशाली युवा, नया खून। और, चाहे वह पंचायत, नगरपालिका के लिए हों, जिला परिषद के लिए हों या विधानसभा के लिए हों या लोकसभा के लिए हों। उस परिवार की कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं होनी चाहिए ताकि जातिवाद और वंशवाद की राजनीति से छुटकारा मिल सके।”
प्रधानमंत्री ने कहा कि यह कदम नए विचारों और क्षमताओं के साथ राजनीति में ‘नया खून’ लाएगा। उन्होंने कहा कि जब 40 करोड़ देशवासी गुलामी की जंजीरों को तोड़कर देश को आजाद कर सकते हैं तो आज 140 करोड़ ‘परिवारजन’ इसी भाव से समृद्ध भारत भी बना सकते हैं।
उन्होंने कहा कि ‘विकसित भारत 2047’ सिर्फ भाषण के शब्द नहीं हैं बल्कि इसके पीछे कठोर परिश्रम जारी है और देश के सामान्य जन से सुझाव लिए जा रहे हैं। आजादी के आंदोलन में अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्होंने देशवासियों को स्वतंत्रता की सांस लेने का सौभाग्य दिया है और यह देश उनका ऋणी रहेगा। प्रधानमंत्री ने कहा कि आज यह समय है देश के लिए जीने की प्रतिबद्धता का और अगर देश के लिए मरने की प्रतिबद्धता आजादी दिला सकती है तो देश के लिए जीने की प्रतिबद्धता समृद्ध भारत भी बना सकती है। प्रधानमंत्री ने इस बात पर प्रसन्नता जताई कि देश के करोड़ों नागरिकों ने विकसित भारत के लिए अनगिनत सुझाव दिए हैं और इसमें हर देशवासी का सपना उसमें प्रतिबिंबित हो रहा है, हर देशवासी का संकल्प झलकता है। प्रधानमंत्री ने जातिवाद और भाई-भतीजावाद से भारतीय राजनीति को मुक्त करने के लिए अपने जोर को दोहराया।
15 अगस्त की रात आजादी मिलने के बाद सेंट्रल हॉल में सबसे पहले बजाया गया था शंख
याचना नहीं, अब रण होगा….
सुषमा त्रिपाठी कनुप्रिया
जस्टिस फॉर निर्भया..
जस्टिस फॉर पार्क स्ट्रीट
जस्टिस फॉर कामदुनी..
जस्टिस फॉर संदेशखाली..
अब
जस्टिस फॉर आर जी कर
क्या हम जस्टिस ही मांगते रहेंगे। आंखें खोलिए क्योंकि अपराधियों को बचाने वाली और स्त्री का चरित्र हनन करने वाली भी खुद स्त्रियां ही हैं..इस राज्य की मुख्यमंत्री भी एक स्त्री ही है….हमारे आपके घरों में अपराधियों को बढ़ाने और बचाने वाली भी स्त्री है जो दुष्कर्म करने वाले अपने बेटे..पति …पिता या भाई को गर्म रोटियां बनाकर खिला रही होती है…इनका बचाव कर रही होती है..। पूरा सिस्टम अपराधियों को बचा रहा है…परिवारों में…दफ्तरों में…समाज में बचा रहा है…हमारी लड़ाई सिर्फ अपराधी से नहीं पूरे सिस्टम से होनी चाहिए….जो अपराधी को बचाए…बहिष्कार उनका कीजिए…वर्ना पत्ते उखाड़ कर कोई लाभ नहीं…। एक रात को सड़क पर उतरिए पर ये काफी नहीं…इस कार्य संस्कृति में महिलाओं के हस्तक्षेप की सख्त जरूरत है…। आज जब लिख रही हूँ तो अन्दर से कुछ टूट रहा है और कुछ खौल भी रहा है..। पत्रकारिता के क्षेत्र में जब कदम रखा था तो एक स्कूली छात्रा से दुष्कर्म व हत्या का मामला सामने था। इसी को लेकर रिपोर्टिंग की शुरुआत हुई। तब अलीपुर सेंट्रल जेल में 14 अगस्त 2004 में धनंजय चटर्जी को फांसी दी गई थी। चटर्जी ने 14 वर्षीय हेतल पारिख के साथ बलात्कार कर उसकी हत्या कर दी थी। इसके बाद 2012 में निर्भया कांड सामने आया जिसने पूरे देश को हिला दिया। स्थिति ऐसी हो गयी थी कि जब भी किसी पुरुष को देखती, अनायास ही क्रोध उमड़ जाता। उस दौरान न चाहते हुए बहुतों से उलझ पड़ती थी। निराशा, खीझ, हताशा…का यह दौर रुका नहीं….देश में अलग – अलग जगहों पर इस तरह की घटनाएं होती रहती हैं। पार्क स्ट्राट कांड जब हुआ तो उस महिला के चरित्र की छीछालेदर करने वाले खड़े हो गये…यह कहा गया रात को घूमने वाली, नशा करने वाली महिला थी, उसके साथ यही होना था। इसके बाद कामदुनी कांड और फिर रूह कंपा देने वाले संदेशखाली कांड का उजागर होना और उस पर हो रही राजनीति ने मन में वितृष्णा भर दी। खुद अपने साथ और अपने आस- पास इस तरह का व्यवहार देखा और मन में खटास तब भर आती है जब अपराधियों की सामाजिक प्रतिष्ठा पर कोई असर नहीं पड़ता, परिवार में उनकी जगह जस की तस बनी रहती है। उनकी हिफाजत के लिए घर की ही स्त्रियां ध्वज लेकर खड़ी होती हैं और जिसने सहा है, चरित्र हनन उसी का किया जाता है। 20 साल के पत्रकारिता के कॅरियर में आने से पहले भी महिला उत्पीड़न और उससे जुड़े दोगलेपन को जीने के बाद अनुभवों का दायरा बहुत विस्तृत हो गया है। आखिर कब तक हम अपने हिस्से की आजादी खैरात की तरह लेते रहेंगे? क्यों बांधती हो ऐसे भाइयों की कलाई पर राखी, जिनको राखी बांधना ही रक्षाबंधन की पवित्रता को गाली देना है। बचपन से ही पिता, भाई और बाद में पति व बेटे से मार खाते, गालियां सहते हुए यही विरासत छोड़ते हुए क्या लज्जा नहीं आती तुम्हें? पुरातन पीढ़ी और आज की पीढ़ी की लड़कियां आजादी के नाम पर हो -हल्ला तो खूब मचा रही हैं मगर क्या उनको आजादी का सही अर्थ पता है? गुड़िया बनकर किसी को जब आप रिझाने चलती हैं..वहीं आपकी आजादी खत्म हो जाती है और दूसरी लडकियों के लिए आप एक घिनौनी राह विरासत में देती हैं…यही बात लड़कों के लिए है…कोई जरूरत नहीं किसी के लिए अपनी अच्छाई और सादगी को छोड़ने की
असली साहस और बोल्ड होना…हर उस प्रस्ताव को डंके की चोट पर खारिज करना है जो आपकी गरिमा को चोट पहुंचाता हो…न करना सीखो…भले ही इसके बाद घर और बाहर तुम्हारी जिंदगी नर्क बना दी जाये…मगर तुम खुद को बचा ले जाओगे…ये कठिन है..असंभव नहीं है…ऐसे लोगों को झाड़ना सीखो और सबसे सामने झाड़ दो…घुटना नहीं नहीं है…अगर किसी बेवड़े या अपराधी के साथ हो…सीधे बहिष्कार करो । जो नशे में खुद को नहीं सम्भाल सकता वो किसी को क्या सुरक्षा देगा या देगी? जिसे अपने कपड़ों का होश नहीं..वो तुम्हारी गरिमा को क्या मान देगा या देगी? जो व्यक्ति अपने घर को छोड़कर तुमसे प्रेम का दावा कर रहा/रही है…किसी और के आने पर तुमको नहीं छोड़ेगा…इसकी क्या गारन्टी है??
रिश्ते निभाने के लिए आदर और स्नेह काफी है…इससे ज्यादा की तो जरूरत ही नहीं. .प्यार करना है..खुद से करो. ..अपने आत्मसम्मान से..अपने भविष्य से. ..अपनी रुचियों से. .अपने लक्ष्य से..अपनी किताबों से..
अपने दोस्तों से करो. ..तुम्हारे लिए सबसे बड़ा संबल तुम खुद हो. ..क्योंकि हर बार तुम्हारे जीवन का युद्ध खुद तुमको लड़ना है…तुम्हारा सबसे बड़ा सहारा. ..सबसे बड़ी शक्ति तुम खुद हो और वो जो ऊपर है. ..वही है. .सारथी उसे बनाओ. ..रास्ते खुद ही खुल जायेंगे । लडकियों रक्षा बंधन आ रहा है और ये तुम ही कर सकती हो….अगर तुम्हारे भाई ऐसे हैं तो दूसरी बहनों के बारे में सोचो और अपने साथ उनकी भी सुरक्षा का वचन लो…लड़के भी ऐसा ही करें…जो गलत राह पर जाने से रोके…असली संबंध वही है…हर गलत को न कह सको …असली आज़ादी..असली साहस वही है पर इसकी शुरुआत खुद से होगी । पहले आजादी का मतलब समझो और समझाओ ।
आखिर इतनी नृशंसता आती कहां से है? ये कौन से संस्कार परवरिश के नाम पर बच्चों को दिए जा रहे हैं जहाँ भटकाव के अतिरिक्त कुछ नहीं। क्या शराबखोरी को महिमामंडित करके आप अपराध कम कर सकते हैं? क्या मां – बहनों के नाम की गाली देकर आप समाज में स्त्री स्वाधीनता को प्रतिष्ठित कर सकते हैं? ऐसा क्यों है कि हर एक स्त्री आपके लिए सिर्फ एक देह बनकर रह जाती है? स्वाधीनता दिवस का उत्सव सारा देश मना रहा है मगर उत्सव जैसा कुछ लगे तब तो हम उत्सव मनाएं। क्या 15 अगस्त और 26 जनवरी पर झंडा फहराकर और दो – चार देशभक्ति गीत गा लेना ही स्वाधीनता का मतलब रह गया है।
इस देश में माताओं को बड़ा आदर दिया जाता है, जरा माताएं पूछें खुद से कि अपने बेटों को कैसे संस्कार दे रही हैं ? क्या परवरिश का मतलब प्यार में अंधा होकर समाज को अपराधी देना भर रह गया है? क्या आप अपनी भूमिका के साथ न्याय कर पा रही हैं और अगर नहीं कर पा रही हैं तो आपको सम्मान मिलना ही क्यों चाहिए? क्या मुफ्तखोर संस्कृति हम पर इतनी भारी है कि हम सच को सच कहने का साहस नहीं जुटा पा रहे ..क्या यही वह बंगाल है जहां प्रीतिलता वादेदर, बाघा जतीन, खुदीराम बोस, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने जन्म लिया ? क्या कैसा बंगाल है जो अपने पूर्वजों के अपमान पर चन्द रुपयों के लालच में चुप्पी साधे रहा । हम सब जानते हैं कि संदेशखाली में किस तरह की बर्बरता की गयी, सब जानते हैं कि किस प्रकार वहाँ पर गुंडों ने आतंक मचाया…क्या यह वही ममता हैं जो तापसी मलिक की लाश लेकर राजनीति करती रही हैं। निर्भया कांड में सवाल उठे कि रात को वह क्या कर रही थी, पार्क स्ट्रीट में इस सवाल के साथ चरित्र हनन भी जोड़ दिया गया। सब जानते हैं कि आरजी कर कांड में सत्ता का वरदहस्त प्राप्त अपराधी शामिल हैं मगर कोई कुछ नहीं कह रहा है, सबके मुंह पर ताले पड़ गये हैं ।
आरजी कर मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में महिला डॉक्टर के साथ हुई हैवानियत का सच सामने आ गया है। यहां चेस्ट विभाग में पीजी के दूसरे साल की छात्रा का शव सेमिनार हॉल में मिला था।शव को देखते हुए दुष्कर्म के बाद हत्या की आशंका जताई गई थी और पोस्टमार्टम रिपोर्ट में इसकी पुष्टि हुई है। रिपोर्ट में सामने आया है कि गला घोंटकर महिला की हत्या की गई। इस दौरान लगातार उसका मुंह और गला दबाए रखा ताकि उसकी आवाज न निकले। इसी वजह से महिला के गले की हड्डी भी टूट गई। चार पन्ने की रिपोर्ट में बताया गया है कि महिला के साथ अप्राकृतिक यौन संबंध जबरन बनाए गए। इसी वजह से उसके प्राइवेट पार्ट्स से खून निकल रहा था। महिला डॉक्टर की हत्या और दुष्कर्म 9 अगस्त को तड़के 3 बजे से 5 बजे के बीच हुआ था। आरोपी ने महिला का मुंह और नाक बंद करके उसका सिर दीवार से सटा दिया ताकि वह चीख चिल्ला न सके। महिला के चेहरे पर खरोंच के निशान हैं, जो आरोपी के नाखूनों से बने हैं। इससे साफ होता है कि महिला ने खुद को बचाने और लड़ने की पूरी कोशिश की थी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि महिला की दोनों आखों, मुंह और प्राइवेट पार्ट से खून निकल रहा था। हालांकि, आंखों से खून निकलने की वजह पोस्टमार्टम में नहीं पता चल पाई है। आरोपी ने स्वीकार किया है कि वह बॉक्सर रह चुका है और जब उसने महिला के चेहरे पर मुक्का मारा तो चश्मे का कांच उसकी आंखों में चला गया। इसी वजह से आंख से खून निकला था। आरोपी अस्पताल में ही काम करता था। उसके पास सभी विभागों में आने-जाने की अनुमति थी। सीसीटीवी फुटेज में वह सुबह 4 बजे सेमिनार हॉल में जाता दिखा था। इसके बाद पुलिस ने उसे गिरफ्तार करके पूछताछ की। महिला के शव के पास ब्लूटूथ इयरफोन भी मिले थे, जो आरोपी के फोन से कनेक्ट हो गए। ऐसे में पुलिस का शक यकीन में बदल गया। आरोपी ने भी दुष्कर्म और हत्या की बात स्वीकार की है। हाईकोर्ट ने मामले की जांच सीबीआई को सौंप भले दी हो मगर सबूतों को मिटाने का प्रयास आरम्भ हो गया है। वैसे भी सीबीआई के पास पहले से ही इतने मामले हैं..एक के बाद एक मामले जुड़ते रहेंगे पर क्या इससे कोई ठोस समाधान निकलेगा? कल्पना कीजिए कि देश के सुदूर देहात में क्या स्थिति होगी और वहां की मीडिया के लिए काम करना कितना कठिन होगा..एक अजीब सी घुटन और एक अजीब सी संड़ाध इस पूरे वातावरण में है…
क्या अपने सम्मान..अस्तित्व की रक्षा करते हुए आगे बढ़ना क्या इतना बड़ा अपराध है कि बार – बार हर जगह लड़कियों को औकात ही दिखाई जाती रहती है? क्या एक स्वस्थ समाज की रचना और उसे सहेजना इतना कठिन है कि हम आने वाली पीढ़ी को कुछ दे ही न सकें। क्यों नहीं ..स्त्री – पुरुष एक दूसरे की उपस्थिति को सम्मान दे पा रहे हैं। आजादी के बीच आजादी का सही अर्थ तलाशने की जरूरत है कि हम भारतीय होने के नाते आने वाली पीढ़ी को एक सशक्त भारत दे सकें।
लंगड़ी दुनिया और हम

शुक्रवार (9 अगस्त) को कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल की पोस्ट ग्रैजुएशन कर रही महिला ट्रेनी डॉक्टर की रेप के बाद नृशंस हत्या कर दी गई। समय गुजरने के साथ ऐसे ब्यौरे सामने आ रहे है कि मन अस्थिर और भयाकुल हो रहा है। जीवन में आगे बढ़नेवाली, संघर्ष करनेवाली नई युवा पीढ़ी की लड़कियों के लिए समाज का यह चेहरा खौफ़ज़दा करने वाला है। हम जानना चाहते हैं कि क्या ये दुनिया हमारी नही है? आगे बढ़ने की महत्वाकांछा, आनंद करने के मौके और खुश रह कर गुजारा जानेवाला समय, अच्छे दोस्त और बेहतर मानसिकता क्या इतनी मुश्किल है? दुख होता है कहते हुए, किंतु भारतीय समाज में ये आज भी सच है जहां हर कोई ऐरा -गैरा जब चाहे लड़कियों को साइज़ कर देने के उपक्रम में रहता है। हालत यह है कि जितनी लड़कियां आगे आ रही है ऐसे लोगों की असुरक्षा बढ़ रही है, वे तेजी से सनक रहे है, बीमार हो रहे है , हिंसक और अत्याचारी भी। ऐसी गैरवाजिब आक्रामकता वैयक्तिक, पारिवारिक, सांस्थानिक और सामाजिक ही नहीं मानसिक भी है। अच्छे पढ़ें लिखे भले मानुषों से भी हमारा पाला पड़ता है जो स्त्री पुरुष के मध्य स्पष्टतः सार्वजनिक और वैयक्तिक भेद को स्वीकार करते हैं। इनका मानना है कि अपनी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए स्त्री को स्वतः उन सब कार्यों, भूमिकाओं और आनंद की जगहों से दूर हो जाना चाहिए जहां लेशमात्र भी खतरे की भनक हो। न तो ये दुनिया बदलेगी और न ही पुरुष। यानी स्त्री की सुरक्षा उसकी प्रत्युत्पन्न मति और खतरे को कोसों दूर से सूंघ लेने वाले विवेक पर आधारित है।
ऐसी ही बेहद केयरफुल किंतु बैसाखी युक्त बातों ने स्त्रियों का साथ न देकर उनका नुकसान किया है। पहली बात, यहां स्त्री की निजी इच्छा और आकांछा का कोई मोल नहीं दिखता। स्त्री को पहले हाड़ मांस के मनुष्य के रूप में देखे तभी उनके प्रति न्याय और सम्मान की बात हो पाएगी। दूसरी बात, कि क्या यह दुनिया अकेले किसी एक लिंग, जाति या वर्ग की है? नहीं, इस पर सबका समान अधिकार है, तो औरतों को भी अपने अधिकार की जमीन, खुला आकाश और मुक्त हवा मिलनी चाहिए। यहां उसके होने, न होने या कितना होने की शर्तों को लागू करने का अधिकार किसी को नहीं है। केयर और प्यार के नाम पर उसे श्रृंखलाएं नहीं खुला, स्वस्थ स्पेस चाहिए।
इसी से जुड़ा एक अनुभव साझा करना चाहूंगी। एक शॉर्ट विडियो से मेरा भी साबका पड़ा। मित्र ने दिखाया कि किसी गेम का हिस्सा बनी लड़की की सहायता के लिए वहां उपस्थित दो वॉलिंटियर्स में से एक जब उसे ऊपर उठाता है तो वह उसे गलत तरीके से छूता है। यह काम वह इतनी सहजता और क्षिप्रता से करता है कि खेल की गति में लड़की को इसका आभास भी नहीं हो पाता कि उसके साथ कोई ऐसी अवांछित हरकत की गई है। यह सब कुछ बाकायदा वीडियो रिकॉर्डिंग में दर्ज होता जाता है। यहां मेरी मित्र का कहना है कि ऐसी जगह पर लड़कियों को जाना ही नहीं चाहिए या उनकी हिस्सेदारी नहीं होनी चाहिए क्योंकि यहां सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं है। ऐसी बातें हैं निश्चित रूप से काफी बेचैन करने वाली है कि क्या दुनिया, दुनिया की विविधता, खेल,मनोरंजन आनंद, ज्ञान, आर्थिक उपार्जन के अवसर क्या स्त्रियों के लिए नहीं हैं? क्या संसार, साधन और अवसर एक ध्रुवीय हैं? क्या वहां हम स्त्रियों की कोई हिस्सेदारी नहीं होनी चाहिए क्योंकि हमेशा वहां कुछ ऐसे पुरुष मौजूद होंगे जो उन स्थितियों का फायदा लेकर औरतों के साथ अनुचित व्यवहार करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ेंगे। ऐसी अर्द्ध विकसित लंगड़ी दुनिया लेकर हम क्या करेंगे? ऐसे में तो पार्क, सड़कें, स्कूल, कॉलेज, बाजार, यात्रा, अस्पताल, मॉल, फिल्म …सबसे औरतें वंचित रह जाएंगी और ये सब तो होने से रहा। यहां दिक्कतलब ऐसी मानसिकता है जो सुरक्षा के नाम पर बार बार महिलाओं को बंदी बनाना चाहती है। नया जागरूक समाज ही समाज के लंपट तत्त्वों के खिलाफ खड़ा हो सकता है। यह मानसिकता अंततः लड़की को जिम्मेदार मानती है। इससे लंपट लोगों की हौसला अफजाई होती है और यह कतई उचित नहीं है।
तीसरी और बेहद ख़ास बात कि दृश्य श्रव्य माध्यमों में सॉफ्ट पोर्न के रूप में जो जहर परोसा जा रहा है, उसके कारण लड़कियां ही नहीं लड़के भी असुरक्षित हुए है। तयशुदा लिंगीय अस्मिता से इतर लोगों का जीना मुश्किल हुआ है। यानी संकट के घेरे में केवल लड़कियां ही नहीं और भी समूह आ गए है क्योंकि कुछ लोगों के लिए ये मनुष्य नहीं मनोरंजन के औजार हैं। यूज़ एंड थ्रो की नीति ही यहां सर्वोत्तम है। सॉफ्ट पोर्न के लगातार अबाधित प्रस्तुतीकरण ने इसे न केवल सहज बल्कि जायज़ जैसा बना दिया है।
स्थितियां आसान नहीं कठिन हुई हैं। काम और हिंसा के कोहरे में आनंद लेता भटकता बेसुध समाज अपने ही नागरिकों की बलि ले रहा है। समाज की सनक और पागलपन से परे लड़कियों ने अपने पंख खोल लिए है। उन्हें पता है कि जो कुछ आसान नहीं, उसका इलाज संघर्ष और विरोध है। उन्हें इस मुश्किल का जवाब लक्ष्य के प्रति अपने जुनून से देना है। इस कुरूप हो आई दुनिया के ज़ख्मों पर मलहम लगाना है। इसे जीने लायक बनाना है।
कार्यस्थल पर जेंडर समानता एक मिथक है
शिवांशी तनु
जी, आपने सही सुना है, किसी भी प्रोफेशन में लड़कियां सुरक्षित नहीं होती हैं। न मेडिकल, न मीडिया, न ही किसी भी और प्रोफेशन में। पर ज्यादातर समय लड़कों को बहुत ज्यादा परेशानी नहीं होती (हां, कुछ मामले ऐसे भी जरूर हुए है या होते हैं जब एक लड़के को भी उतनी ही या उस तरह की समस्याएं झेलनी पड़ती है, जितनी किसी लड़की को)
वेतन के लिहाज से तो समानता होती ही नहीं है… क्योंकि लड़कों को तो घर चलाना होता है.. इसलिए उन्हें ज्यादा और टाइम पर सैलरी दी जाती है (पर्सनल एक्सपीरियंस है भई)
सेक्सुअल हैरेसमेंट… काम करना है तो बर्दाश्त करना सीखो… और अगर किसी से शिकायत भी कर दिए तो ये भी सुनने के लिए तैयार रहो कि लड़की ने ही प्रोवोक किया था… अगर एक्शन लिया गया तो ये सुनो कि लड़की ने उस लड़के का कॅरियर बर्बाद कर दिया।
पर इन सब में क्या किसी ने कभी भी उस लड़की के बारे में सोचा, जो रात दिन एक करके लड़कों के बराबर काम करती है या शायद कभी लड़कों से भी ज्यादा। क्योंकि जब एक लड़की अपने प्रोफेशन लाइफ में काम करने आती है तब वो ये भूल जाती है कि वो लड़की है… उसकी लिमिट्स क्या है…वो कितनी देर या कौन सा काम कर सकती है। एक लड़की सिर्फ अपना 100% देकर काम करती है।
और सेक्सुअल हैरेसमेंट, तो जनाब जब आप अपने ऊपर किसी और का हुकुम चलाना पसंद नहीं करते तो एक लड़की को उसकी मर्जी के बिना छूने की हिम्मत कैसे कर लेते हैं?




