Friday, March 27, 2026
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कान में भारतीय फैशन के बजाए फिल्मों की बात क्यों नहीं होती

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कान फिल्म फेस्टिवल के आखिरी दिनों में मैं लॉरियल के ब्रैंड एंबेसडर के रेड कार्पेट पर चलने की तस्वीरें ही पोस्ट करती रही. ऐश्वर्य राय बच्चन, दीपिका पादुकोण, सोनम कपूर…पर, आखिर वो फिल्में कहां हैं, जो हम हर साल बनाते हैं। मुझे नहीं लगता कि इस साल कान फिल्म फेस्टिवल में किसी भारतीय फिल्म को जगह मिली.

शबाना आजमी ने हाल ही में अपने सहयोगियों के साथ एक तस्वीर सोशल मीडिया पर पोस्ट की थी। इसमें लिखा था ‘1976 में कान फिल्म फेस्टिवल में, आधिकारिक सेक्शन में फिल्म निशांत के लिए’. फिल्म में सबसे खूबसूरत बात इसकी सादगी थी। फिल्म अहम थी, कपड़े नहीं.

शायद बहुत कम लोगों को मालूम हो कि फिल्म और टेलिविजन इंस्टीट्यूट की छात्रा पायल कपाड़िया की फिल्म ‘आफ्टरनून क्लाउड्स’ को कान फिल्म फेस्टिवल सिने फाउंडेशन सेक्शन में दिखाया जा रहा है। मीडिया इस सेक्शन को बिल्कुल तवज्जो नहीं देता.

पायल की सीनियर राजश्री ने कहा कि मैं अपनी जूनियर पायल पर गर्व करती हूं. उस भविष्य के लिए शुभकामनाएं! यहां आकर लगा कि कान फिल्म फेस्टिवल है, गाउन फेस्टिवल नहीं! राजश्री का ये तंज अपनी ड्रेस के लिए चर्चा में आई भारतीय अभिनेत्रियों पर था।

पूरी दुनिया में घूम-घूमकर फिल्म फेस्टिवल कवर करने वाले असीम छाबड़ा ने भी कमोबेश यही बात कही। छाबड़ा ने कहा, ‘भारत की फिल्म इंडस्ट्री सौ साल से भी ज्यादा पुरानी है। ये दुनिया का सबसे बड़ा फिल्म उद्योग है. लेकिन हम एक भी ऐसी फिल्म नहीं बना पाते, जिसे दुनिया सराहे, उसकी समीक्षा करे। कान फिल्म फेस्टिवल में लोग उसे देखना चाहें. आखिर ये दुनिया का सबसे चर्चित फिल्म फेस्टिवल है. यहां तो भारत की कुछ अभिनेत्रियां रेड कार्पेट पर चलती हैं. वो ऐसे कपड़े पहनती हैं, जिनमें जरा भी भारतीयता नहीं होती। वो अपने देश की परंपराओं, कला और उम्मीदों से एकदम कटी नजर आती हैं।.’

उन्होंने कहा, ‘भारत अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में दिखाने लायक एक भी फिल्म नहीं बना पाता। फिर भी ये अभिनेत्रियां कान जैसे फिल्म फेस्टिवल में भारत की इकलौती नुमाइंदगी करती हैं। ये खूबसूरत अभिनेत्रियां रेड कार्पेट चलते वक्त भारत की जरा भी नुमाइंदगी नहीं करतीं’.

हम कान फिल्म फेस्टिवल में गोल्डेन गाउन और रेड कार्पेट पर चलने वाली अभिनेत्रियों के फैशन की गलतियों की चर्चा के बारे में सुनते रहते हैं. सच तो ये है कि ऐश्वर्य जैसी अभिनेत्रियां कभी फिल्म फेस्टिवल में फिल्मों के साथ नहीं आईं। शायद उन्हें पता भी न हो कि कौन सी फिल्में यहां दिखाई जा रही हैं। उन्हें शायद ये भी न मालूम हो कि फिल्म इंस्टीट्यूट की एक छात्रा की फिल्म यहां दिखाने के लिए चुनी गई है।

जब शबाना आजमी को बताया गया कि कान फिल्म फेस्टिवल को लेकर उनकी भविष्यवाणी सही साबित हुई, तो उन्होंने कहा, ‘चेतन आनंद की नीचा नगर, सत्यजित रे की पाथेर पंचाली, मीरा नायर की सलाम बॉम्बे, विक्रमादित्य की उड़ान जैसी फिल्मों ने कान फिल्म फेस्टिवल में अवार्ड जीते हैं. लेकिन ये सच है कि हम कान फिल्म फेस्टिवल में बहुत कम अवार्ड जीते हैं।

उन्होंने कहा, ‘सच तो ये है कि इस फिल्म फेस्टिवल के लिए बहुत कम भारतीय फिल्मों का चुनाव होता है। बहुत कम ऐसी होती हैं जो मुकाबले में उतरने लायक मानी जाती हैं। इनमें से श्याम बेनेगल की निशांत और मृणाल सेन की जेनेसिस में मैंने भी काम किया था. ये मेरे लिए फख्र की बात है. बरसों बाद मुझे कान में अवार्ड देने के लिए बुलाया गया था। मैं चर्चित कार्लटन होटल में ठहरी थी. कभी मैं उसे देखते हुए गुजर जाया करती थी। जब मैं निशांत फिल्म के लिए कान गई थी तो हम वहां कॉफी भी नहीं पी सकते थे. कान बहुत अहम फिल्म फेस्टिवल है। वहां जीतने वाली फिल्में बेहद शानदार होती हैं। ये बड़ा बाजार भी है. अफसोस की बात है कि हम वहां जाकर फिल्मों के बजाय इस बात पर चर्चा करते रहते हैं कि किसने क्या पहना।

‘कई साल पहले जब पता चला कि फेस्टिवल के आयोजकों ने वहां चप्पल पहनकर रेड कार्रेपट पर चलने पर रोक लगा दी है, तो मैं बहुत नाराज हुई थी। अच्छी बात ये रही कि इस रोक पर बहुत हो-हल्ला हुआ। मैंने भी इस पाबंदी पर अपनी नाराजगी जाहिर की. इसके बाद ये आदेश वापस ले लिया गया।’

‘मीडिया ने रेड कार्पेट पर चलने के वक्त पहने जाने वाले कपड़ों को कुछ ज्यादा ही हवा दे दी है। फैशन ब्रांड बड़े सितारों को ब्रांड एंबेसडर बनाते हैं। उन पर काफी पैसे खर्च करते हैं ताकि ब्रांड की नुमाइश और प्रचार हो सके लेकिन मेरा मानना है कि किसी भी फिल्म फेस्टिवल में किसी देश की सबसे अच्छी नुमाइंदगी उस देश की अच्छी फिल्में ही कर सकती हैं। अगर उनका चुनाव आधिकारिक दर्जे में होता है तो ये देश के लिए फख्र की बात होती है। अगर आपकी फिल्म को कुछ खरीदार मिल जाएं तो और भी अच्छा होता है। मुझे अच्छा लगता है कि कुछ भारतीय फिल्मों ने इसमें कामयाबी हासिल की है।

(साभार – फर्स्ट पोस्ट)

 आएगा एक रुपये का गुलाबी-हरे रंग का नया नोट

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भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) जल्द ही एक रुपये का नया नोट जारी करेगा। नया नोट गुलाबी-हरे रंग का होगा। इसके पिछले हिस्से पर एक रुपये के सिक्के की तस्वीर छपी होगी और छपाई वर्ष 2017 अंकित होगा।

इस पर तेल अन्वेषण प्लेटफॉर्म सागर सम्राट की तस्वीर होगी। एक रुपये का नोट सरकार द्वारा छापा जाता है। इस पर वित्त मंत्रालय के सचिव शक्तिकांत दास के हस्ताक्षर होंगे। गौरतलब है कि अन्य नोटों पर आरबीआई गवर्नर के हस्ताक्षर होते हैं।

फिलहाल देश में एक रुपये के सिक्के ढाले जाते हैं। 1994 में एक रुपये के नोट की प्रिंटिंग बंद कर दी गई थी लेकिन 2015 में इन्हें फिर से लांच किया गया था।

 

मेरे मां-बाप ने कभी बेटा-बेटी का फर्क नहीं समझाः नंदिनी के आर

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यूपीएसएसी की ओर से आयोजित सिविल सेवा परीक्षा में कर्नाटक की नंदिनी ने टॉप किया है। नंदिनी बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं। पढ़ाई में शुरू से ही मेधावी नंदिनी को खेल के साथ-साथ साहित्य में भी गहरी रुचि है।

वह वॉलीबाल की खिलाड़ी हैं और बचपन से ही कन्नड़ साहित्य पढ़ती रही हैं। शुरुआती पढ़ाई कर्नाटक के कोलार में करने वाली नंदिनी ने अपनी सफलता का श्रेय माता-पिता को दिया।

उनके पिता रमेश केवी हाई स्कूल में शिक्षक हैं जबकि माता गृहिणी हैं। समाज में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव को नंदिनी बड़ी समस्या मानती हैं और महिला सशक्तीकरण की दिशा में कुछ करना चाहती हैं।

फरीदाबाद में राष्ट्रीय सीमा शुल्क एवं नशीले पदार्थ अकादमी में ट्रेनिंग कर रहीं 26 वर्षीय नंदिनी ने बताया कि सिविल सर्विस परीक्षा टॉप करने की जानकारी उन्हें उनकी मित्र खुशबू ने दी।

नियमित रूप से पढ़ाई करने वाली नंदिनी ने बताया कि उन्होंने कभी अपने आप पर दबाव नहीं बनाया। खुले दिमाग से तैयारी की और कांसेप्ट पर ध्यान दिया। एक सवाल के जवाब में कहा कि उन्हें जहां काम करने का  मौका मिलेगा, वहां बेस्ट देने का प्रयास करेंगी।

उन्होंने कहा कि वक्त बदल रहा है। अब लड़कियां हर क्षेत्र में आगे निकल रही हैं। लोगों की भी सोच बदल रही है। मेरे माता-पिता ने कभी बेटे-बेटी में फर्क नहीं समझा। उन्होंने मुझे बेहतर शिक्षा दिलाने की हरसंभव कोशिश की।

अपनी सफलता पर उत्साहित नंदिनी ने कहा कि आत्मविश्वास होना चाहिए, लक्ष्य आसानी से हासिल किया जा सकता है। परीक्षा परिणाम आते ही केंद्रीय राज्य मंत्री कृष्णपाल गुर्जर उन्हें बधाई देने पहुंचे।

चौथे प्रयास में सफलता हासिल करने वाली नंदिनी ने बताया कि इस बार यह तय कर लिया था कि सफलता हासिल करनी ही है और यह अंतिम प्रयास होगा। उन्होंने कहा कि सेवा की दृष्टि से कर्नाटक उनकी प्राथमिकता में है।

 

एक थी ‘कनुप्रिया’…

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धोखा मत खाइएगा ये धर्मवीर भारती की कालजयी कविता ‘कनुप्रिया’ की पात्र नहीं बल्कि भगवतीचरण वर्मा की बहू की दास्तान है। विडंबना देखिये, भगवतीचरण वर्मा का पहला उपन्यास था ‘पतन’ (1928) और आखिरी उपन्यास था ‘सबहीं नचावत राम गोसाईं’ (1970). ऐसा लगता है जैसे इन दो उपन्यासों के नाम में उनके बेटे के परिवार कि अंतर्कथा छुपी हुई है, जिसके पतन के आखिरी गवाह खुद उनके पौत्र रवि वर्मा हैं, जो कानपुर से 50 किलोमीटर और कन्नौज से 30 किलोमीटर पर स्थित ‘बिल्हौर’ में एक मुस्लिम परिवार के आश्रय पर किसी तरह जीवन गुजार रहे हैं।

कनुप्रिया मंजरी वर्मा, भगवतीचरण वर्मा के तीसरे बेटे चतुर्भुज प्रताप वर्मा की पत्नी थीं. आइए आधुनिक हिंदी साहित्य के एक बड़े हस्ताक्षर और ‘चित्रलेखा’ जैसे कालजयी उपन्यास के लेखक भगवतीचरण वर्मा की बहू की दर्द भरी दास्तान को उनके पौत्र की जुबानी सुनते हैं।

दास्तान सुनाने से पहले एक अहम बात; रवि वर्मा जो पेशे से और स्वभाव से भी एक पेंटर हैं, उनकी बातों में न तो बनावट है न ही तथ्यों को तोड़ने-मरोड़ने की क्षमता। पतलून को, बेल्ट की जगह सुतली की डोर से बांधे और बीड़ी पीते रवि के शब्दों और आवाज में उसी आत्म-सम्मान के दर्शन होते हैं जो एक साहित्यकार के पौत्र, एक कला प्रेमी कत्थक नृत्यांगना और जांबाज एयरफोर्स पायलट के बेटे में स्वाभाविक रूप से आने चाहिए…. तो दास्तान कुछ इस तरह है।

‘जी, मेरी मां और पिता का विवाह 3 जून, 1962 में हुआ. मेरी मां आईटी कॉलेज, लखनऊ यूनिवर्सिटी की पढ़ी हुई थीं। विवाह से पहले वो लखनऊ कॉलेज ऑफ आर्ट्स में थीं। चूंकि मेरे पिता पायलट थे, पहले वो इंडियन एयरफोर्स में थे बाद में उन्होंने इंडियन एयरलाइन्स ज्वाइन कर ली’।

‘फिर मेरी सिस्टर पैदा हुई 1963 में, और 1964 में, 3 जून को मैं पैदा हुआ। फिर मेरी मां ने गुरु कालू शंकर रॉय चौधरी से डांस सीखना शुरू किया जब हमलोग 4-5 साल के थे। उस समय हमलोग कोलकाता में रहते थे. कोलकाता में हम नौ साल रहे वहीं हमने स्कूलिंग की, साउथ-प्वाइंट स्कूल में।

‘फिर हमलोग 1975 में दिल्ली आ गए। दिल्ली आकर वसंत-विहार में एक किराए के मकान में रहने लगे। इसी बीच हमारे दादा भगवतीचरण वर्मा जी राज्य-सभा के सदस्य बन गए. उन्हें मकान मिल गया लुटियन देहली में। जब वो दिल्ली आये तो हमें अपने साथ रख लिया। हमलोग उन्हीं के पास शिफ्ट हो गए. 3-4 साल हमलोग वहीं रहे, वहां काफी लोग आया करते थे बड़े-बड़े राइटर, लेखक, प्रोफेसर आते थे दादा जी से मिलने।.

‘चूंकि मेरे पिता पायलट थे इसलिए उनकी दोस्ती राजीव गांधी से भी थी। उनलोगों ने मिलकर उस समय एक थर्ड-लेवल एयरलाइन्स भी शुरू की थी, जो मेरे पिता का आयडिया था.. 70 के दशक में, अमेरिका में इसका बड़ा चलन था. मुझे याद नहीं कि फिर इस कल्पना का क्या हुआ. मैं 18-19 साल का था उस समय। मेरे घर में राजीव जी के फोन आया करते थे, पिता जी भी 10 जनपथ जाया करते थे।

‘फिर मेरी बहन के साथ हादसा हो गया, वो मिरांडा कॉलेज से इंग्लिश ऑनर्स कर रही थीं। वो एक अच्छी पेंटर भी थीं और त्रिवेणी कला संगम से जुडी हुई थीं। वहां से उन्हें सनावर स्कूल, शिमला का निमंत्रण मिला कि आप हमारे यहां आकर बच्चों को पेंटिंग सिखाइए लेकिन शिमला जाते समय, 91 में उनकी कार-दुर्घटना में मौत हो गयी।

‘दीदी का चला जाना हम सब के लिए, मेरे परिवार के लिए दुःख का पहाड़ था. उसी के बाद पिता ने नौकरी से अवकाश ले लिया. मेरी मां जो एक प्रतिष्ठित कत्थक डांसर बन चुकी थीं, वो भी टूट सी गईं’.

‘मां के लिए ये भावनात्मक अाघात था. उसके बाद उन्होंने खुद को कथक में लीन कर दिया. कभी 15 घंटे तो कभी साठ घंटे तक डांस करते रहना उनकी नियति बन गई. उन्होंने हिमाचल-भवन में 101 घंटे तक कथक नृत्य करके एक रिकॉर्ड बनाया था तो ‘दैनिक-जागरण’ की एक पत्रकार ने उनसे पूछा था. मंजरी जी ‘व्योम से व्योम तक’ 101 घंटे नृत्य की प्रेरणा कहां से मिली? तो उनका जवाब था- मेरे अंदर एक आग दहक रही थी, अपनी बेटी को खो देने की आग, मैंने इस आग को कुछ करके ठंडी करना चाहा, और 101 घंटे नृत्य किया. ये सब अपने आप बिना इरादे के हो गया’.

‘जो लोग कथक के बारे में जानते हैं वो ये भी जानते हैं कि 101 घंटे नृत्य करना कितना मुश्किल काम है. इसके लिए मां ने दो साल तक रोज़ दस-दस घंटे का रियाज़ किया. शायद दीदी को भुलाने का यही तरीका था उनके पास।

‘मां काफी हंसने-बोलने वाली महिला थीं. कभी किसी कि बुराई में उनका मन नहीं लगा. मेरे पिता भी ऐसे ही थे. फिर हमलोगों ने गुड़गांव में प्रॉपर्टी ली, उसमें लैंड माफिया बीच में आ गए और इसी बीच मेरे पिता की डेथ हो गई. कुछ लोगों का कहना है कि मेरे पिता कि मौत में उन्हीं लैंड माफियाओं का हाथ था. फिर हमें धमकी भरे फोन आने लगे कि इस जमीन को खाली कर दो. इसी बीच मेरी मां को भी जहर देने कि कोशिश की गई. इन सबसे घबराकर हमनें जमीन बेच दी और गुड़गांव छोड़ दिया’.

‘अचानक एक परिवर्तन हमने देखा, क्योंकि हमारे पास पैसे आ गए थे इसलिए मां के कई रिश्तेदार हमारे प्रति सहानुभूति दिखाने लगे. कुछ पैसा इस तरह भी उड़ा. इसी बीच उन्हें हार्ट-अटैक भी हुआ दिल्ली में, उसमें भी काफी पैसा लगा’.

‘फिर हमलोग लखनऊ आए, लखनऊ में मेरे दादा का मकान है लेकिन हमारे ताऊ और चाचा ने न तो हमारी कोई मदद की न ही हमें घर में जगह दी. जब कोई आसरा नहीं बचा तो हम अपने पिता के बचपन के दोस्त तारिक इब्राहिम, जो कानपुर में रहते थे उनके पास गए. तारिक ने जब हमारा हाल देखा तो बेचैन हो गए और मां को हर तरह से मदद का दिलासा दिया’.

‘तारिक चाचा की बिल्हौर में, एक सरिया मिल थी. वहीं एक कमरे में उन्होंने हमारे रहने की व्यवस्था कर दी. मां तारिक से वचन ले चुकी थीं कि वो किसी को नहीं बताएंगे कि वो कौन हैं. मां नहीं चाहती थीं कि लोगों को पता चले कि भगवती चरण वर्मा कि बहू किस दुर्दशा में रह रही है. वहीं एक साल बाद पहली जून 2012 में उन्होंने अंतिम सांस ली’.

‘चूंकि मां के कहने पर तारिक चाचा ने उनकी पहचान छुपाई थी और फैक्ट्री का मैनेजर तनवीर अहमद ही उनके खाने-पीने का खयाल रखता था इसलिए जब वो मर गईं और उनके अंतिम संस्कार के लिए पंडितों को तारिक चाचा ने लाना चाहा तो वो लोग तैयार नहीं हुए. एक अजनबी औरत को वो लोग मुसलमान समझे. मजबूरन तारिक चाचा को अपना वचन तोड़ना पड़ा और उन्होंने हिन्दुओं को बताया कि ये भगवतीचरण वर्मा कि बहू हैं’.

‘मां टूट चुकी थीं समाज के व्यवहार से वो अक्सर कहती थीं कि मैं उस हिंदुस्तान को छोड़ दूंगी जहां कला का खजाना तो है लेकिन कलाकार की कोई कद्र नहीं है. ये विडंबना भी देखिए कि तारिक इब्राहिम और उनके परिवार ने उन्हें आश्रय दिया और उनके अंतिम संस्कार का सारा प्रबंध किया. तनवीर अहमद और इमरान अहमद ने उनके लिए शांति पाठ कराया’।

तो ये थी वो दास्तान जो उनके बेटे ने हमें सुनाई और हमारी आंखों को नम कर दिया. पूछने पर रवि बड़े दुःख के साथ बताते हैं कि मां के देहांत के बाद रात में ही लखनऊ में ताऊ और चाचा को सूचना दे दी गई थी लेकिन अंतिम संस्कार में भी कोई नहीं आया.

रवि वर्मा, मां के जाने के बाद, अब उसी कमरे में मां की यादों के सहारे रह रहे हैं. इस बीच एक दो जगह शिक्षक कि नौकरी भी की, ट्यूशन भी पढ़ाए, लेकिन जीवन चलाने की समस्या आज तक बनी हुई है. कमरे के एक कोने में मां के लिखे हुए उपन्यासों की पांडुलिपिया, कविता संग्रह, अच्छे दिनों की तस्वीरें, जिनपर वक्त के धब्बे बढ़ते जा रहे हैं, दादा का पद्मभूषण अवार्ड, समाचार-पत्रों कि कतरनें भरी हुई हैं.

बिल्हौर में भी इक्का-दुक्का लोगों को ही पता है कि रवि कौन हैं? वही गाहे-बगाहे उनकी मदद के लिए आ जाते हैं. रवि खुद बेचैन रहते हैं कि कोई उनकी मां के उपन्यास छाप दे और उनकी कविताओं का संग्रह प्रकाशित कर दे. लेकिन बिल्हौर में उन्हें कोई प्रकाशक कैसे मिलेगा. बिल्हौर से बहार जाने की न उनमें हिम्मत है और न संसाधन. 52-53 कि उम्र है लेकिन गरीबी ने नक्शों-निगार ऐसे बना दिए हैं कि खुद आईना भी 65-66 बरस से नीचे मानने को तैयार नहीं होता.

कनुप्रिया मंजरी की एक कविता:

मेरा रंग-मंच, समूची-धरा सारा का सारा बाहें फैलाए आकाश… मेरी भावनाएं गहन गंभीर सिन्धु-अठखेलियाँ करता सागर “मैं स्वयं” नृत्य-मय स्वयं-मुग्धा कनु कि प्रिया, कनुप्रिया केतकी मेरे दर्शक-गण समूचा ब्रह्माण्ड… जलते-बुझते तारक… और शून्य में समाते … नक्षत्र

चित्रलेखा की कथा पाप और पुण्य की समस्या पर आधारित है-पाप क्या है? उसका निवास कहां है? इन प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए महाप्रभु रत्नांबर के दो शिष्य, श्वेतांक और विशालदेव, क्रमश: सामंत बीजगुप्त और योगी कुमारगिरि की शरण में जाते हैं. और उनके निष्कर्षों पर महाप्रभु रत्नांबर की टिप्पणी है, ‘संसार में पाप कुछ भी नहीं है, यह केवल मनुष्य के दृष्टिकोण की विषमता का दूसरा नाम है. हम न पाप करते हैं और न पुण्य करते हैं, हम केवल वह करते हैं जो हमें करना पड़ता है.’

भगवती चरण वर्मा का जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के शफीपुर गांव में हुआ था. वर्माजी ने इलाहाबाद से बीए, एलएलबी की डिग्री प्राप्त की और प्रारंभ में कविता लेखन किया. फिर उपन्यासकार के नाते विख्यात हुए. 1933 के करीब प्रतापगढ़ के राजा साहब भदरी के साथ रहे.

1936 के लगभग फिल्म कॉरपोरेशन, कलकत्ता में कार्य किया. कुछ दिनों ‘विचार’ नामक साप्ताहिक का प्रकाशन-संपादन, इसके बाद बंबई में फिल्म-कथालेखन तथा दैनिक ‘नवजीवन’ का संपादन, फिर आकाशवाणी के कई केंद्रो में कार्य. बाद में, 1957 से मृत्यु-पर्यंत स्वतंत्र साहित्यकार के रूप में लेखन. ‘चित्रलेखा’ उपन्यास पर दो बार फिल्म-निर्माण और ‘भूले-बिसरे चित्र’ साहित्य अकादमी से सम्मानित. पद्मभूषण तथा राज्यसभा की मानद सदस्यता प्राप्त.

यह अपना-अपना भाग्य, मिला। अभिशाप मुझे, वरदान तुम्हें॥ जग की लघुता का ज्ञान मुझे। अपनी गुरुता का ज्ञान तुम्हें॥

(साभार – फर्स्ट पोस्ट हिन्दी)

जीएसटी लागू होने पर सोना होगा सस्ता, 500 रुपए से अधिक के जूते-बीड़ी होंगे महंगे

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गुड्स एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) 1 जुलाई से लागू होने से पहले  जीएसटी काउंसिल की  बैठक में वित्त मंत्री अरुण जेटली की अध्यक्षता में 2 हजार से अधिक अहम वस्तुओं के टैक्स स्लैब को तय किया गया। सूत्रों के मुताबिक, गोल्ड पर 3 फीसदी टैक्स लगेगा, वहीं बीड़ी पर 28 फीसदी टैक्स पर सहमति बनी है। इसके साथ ही 500 रुपये से कम के फुटवियर पर 5 फीसदी टैक्स लगेगा। इससे अधिक के फुटवियर पर 18 फीसदी की दर से टैक्स वसूला जाएगा।

जीएसटी काउंसिल की इस बैठक में 1 जुलाई से पूरे देश में एक टैक्स लागू करने पर पूरी सहमति बन गई है। काउंसिल की बैठक में जहां एक तरफ गुड्स के रिटर्न और एक राज्य से दूसरे राज्य में प्रवेश को लेकर नियम बन गए हैं।
केरल के वित्त मंत्री थॉमस आईसैक के अनुसार गोल्ड को छोड़कर के सभी मुद्दों पर सहमति बन गई है। हालांकि इसमें अभी 2500 से अधिक सामानों पर क्या दर तय की गई है, इसके बारे में जानकारी नहीं मिल पाई है।
होटल और रेस्तरां पर लग सकता है मल्टीपल टैक्स स्लैब 
काउंसिल की बैठक में होटल और रेस्तरां पर मल्टीपल टैक्स स्लैब लगाने पर भी फैसला होगा। महंगे बिस्किट की तुलना में सस्ते बिस्किट पर लगने वाले टैक्स में अंतर हो सकता है। इस मीटिंग में ब्रांडेड कपड़ों, गोल्ड, बेशकीमती मेटल्स, मोती, हीरा और अन्य ज्वैलरी स्टोन, इमिटेशन ज्वैलरी पर फैसला लिया जाएगा।
बाकी चीजों में टेक्सटाइल, बिस्किट, फुटवियर, बिजली से चलने वाले एग्रीकल्चर इक्विपमेंट्स और बीड़ी, तेंदूपत्ता शामिल हैं। फाइनेंस मिनिस्ट्री के एक ऑफिशियल ने बताया कि हैंडीक्राफ्ट और बायोडीजल पर भी टैक्स रेट इसी मीटिंग में तय हो सकता है। इस मीटिंग में राज्यों के वित्त मंत्री भी शामिल होंगे।
नए जीएसटी बिल में 1200 आइटमों में टैक्स लगाने की दरें तय की गई हैं। इनके अलावा रोजाना इस्तेमाल होने वाली सात फीसदी आइटम में कोई टैक्स नहीं होगा। 14 प्रतिशत आइटम न्यूनतम ब्रेकेट में हैं और इनमें जीएसटी की सबसे कम दर केवल चार फीसदी ही होगी।
रोजाना इस्तेमाल होने वाली चीजें जैसी चीनी, चाय, कॉफी, खाद्य तेल, जीवनरक्षक दवाओं आदि पर कम से कम टैक्स होगा। दही और दूध को भी इससे मुक्त रखा गया है। टैक्स का भुगतान भी इलेक्ट्रानिक विधि अथवा इंटरनेट से होगा। जीएसटी भुगतान क्रेडिट कार्ड, आरटीजीएस और नेफ्ट से भी हो सकता है। टैक्स भुगतान करने के सभी चालान ऑनलाइन होंगे। मतलब ये भी होगा कि इससे केवल चीजें ही सस्ती नहीं होंगी, बल्कि भ्रष्टाचार भी खत्म होगा।

 

गर्मी में ऐसे रखें अपने बगीचे को हरा-भरा

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गर्मियां आते ही आइसक्रीम और आमों का ख्याल मन में आने लगता है इसके साथ ही हम ऐ.सी. की ठंडी हवा के लिए बेताब हो जाते हैं । इस समय जब हम गर्मियों में ठंडक देने वाले खानों और खुद को ठण्ड पहुंचाने वाली चीजों से जुड़ने लगते हैं, हमारे बगीचे सूरज के तपती किरणों को झेल कर सूखते चले जाते हैं । आइये हम आपको बताते हैं कुछ ऐसे सरल उपायों के बारे में जिससे कडाके की धूप में भी हमारे पौधे सुरक्षित रहे ।

मौसमी पौधे मौसम के अनुसार ढल जाते हैं – तरबूज गर्मियों के लिए एक उपयुक्त पौधा है।  पौधे मौसम के अनुसार बढ़ते हैं । कुछ जाड़ों में बड़े होते हैं तो कुछ गर्मियों में । आवश्यकता के अनुसार पानी और खाद मिलने पर मिर्च, खीरे, बैंगन और तरबूज इस मौसम के लिए बेहतर विकल्प हैं और इन्हें हम गमलों में भी उगा सकते हैं ।

सही समय पर दी गयी छाँव के फायदे – छाँव के लिए काम आने वाले कपड़ों पर कुछ पैसे खर्च कीजिये। ये आपको ऑनलाइन या फिर किसी भी बागवानी के दूकान में आसानी से मिल जायेंगे।अपने पौधों के हिसाब से आप इनका चुनाव कर सकते है। इसे पेड़ों के ऊपर या किनारे लगायें।

सही समय पर पानी दीजिये – गर्मी के मौसम में पौधों को पानी देने का सबसे बढ़िया समय या तो सुबह है या शाम क्यूंकि इस समय पानी ठंडा रहता है । बागवानी करने का उचित समय? सुबह १० बजे के पहले या शाम ४ बजे के बाद ।

थोड़ी मात्रा में पानी का छिडकाव करें – पानी के झरने,मग या बाल्टियों से हम पानी का छिडकाव कर सकते हैं। पानी के पाईप की जगह मग या छिड़काव के लिए बाज़ार में मिलने वाले बर्तनों का इस्तेमाल करें । गर्मियों में हर जगह पानी की दिक्कत बनी रहती है इस लिए यह ज़रूरी है की हम सबसे उचित साधन को चुनें ।

पौधे भी हमारे दोस्त बन सकते हैं – बड़े और मज़बूत पेड़ अक्सर छोटे पौधों को छाँव देने का काम करते हैं। इसे अपना मित्र मानें और अपने बगीचे की व्यवस्था इस सिद्धांत पर करें ।

साहित्य और अकादमिक क्षेत्र में विमर्श का नया क्षेत्र है सबाल्टर्न 

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 डॉ. राजश्री शुक्ला

सर्बाल्टन साहित्य आज साहित्य का ही नहीं बल्कि सभी प्रकार के अकादमिक विमर्शों का एक प्रासंगिक विषय है। सबाल्टर्न का प्रारम्भ जब हुआ था तो यह फौज के निचले तबके के लोगों के लिए प्रयोग में लाया जाने वाला शब्द था, आज साहित्यिक विमर्श में इसका उपयोग होता है। सबाल्टर्न का अर्थ होता है – निम्नवर्गीय लेकिन सिर्फ निम्नवर्गीय ही नहीं बल्कि हाशिये की आवाजें, वो जिनको कभी आवाज मिली नहीं, जैसे कि सबाल्टर्न में एक प्रचलित विमर्श है कि सबाल्टर्न बोलते हैं।

एक और प्रश्‍न है कि क्या सबाल्टर्न बोल सकते हैं, तो ये उनकी आवाज है जिन्होंने कभी बोला नहीं है। बोलना चाहते थे मगर तब उनको आवाज मिली नहीं। भारतीय भाषाओं में, खासकर बांग्ला में, सबाल्टर्न का अर्थ होता है निम्नवर्गीय चेतना। हिन्दी में हम सबाल्टर्न को लेते हैं हाशिए के साथ में।

साहित्य में ही नहीं बल्कि जीवन के विविध क्षेत्रों में सबाल्टर्न है। अब इस पद की अर्थ व्याप्ति हो गयी है – भौगोलिक सबाल्टर्न है जैसे विश्‍व के सन्दर्भ में दक्षिण एशिया का जो पूरा प्रांत है और इन देशों और यहांँ के निवासी, चिंतन और संस्कृति हैं, ये सब सबाल्टर्न के अंतर्गत हैं। अगर इसे भारत के सन्दर्भ में देखते हैं तो केन्द्रीय जनता और समाज को छोड़कर जिनको मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, त्रिपुरा, असम, नगालेैंड, अरुणाचल प्रदेश, जिनको हम पूर्वोत्तर कहते हैं, लेकिन पूर्वोत्तर शब्द ही हमारे भीतर बैठे सबाल्टर्न को दिखाता है।

पूर्वोत्तर के लोग कहते हैं कि हमें पूर्वोत्तर क्यों कहा जाता है जबकि इनमें से हर राज्य की अपनी अस्मिता है, अपनी अलग – अलग विशेष संस्कृति हैं। भारत चूँकि केन्द्र में है इसलिए हाशिए के क्षेत्र को पूर्वोत्तर कह दिया मगर मणिपुरी संस्कृति अरुणाचल से अलग है, नगालैंड बिलकुल अलग है। जैसे हम कहते हैं – बंगाली मानसिकता, मराठी मानसिकता, उसी तरह हम कहें मेघालयी संस्कृति या मणिपुरी चिंतन, तो हम मान सकते हैं कि हमारे दिमाग से सबाल्टर्न प्रभाव हट रहा है।

मूलतः सबाल्टर्न का अर्थ है, वह सारा समुदाय जो अभिजात परम्परा के विरोेध में खड़ा होता है। अभिजात का विलोम है सबाल्टर्न यानी दमित, शोषित और हाशिए पर, मूक जिनको बोलने नहीं दिया गया और यह मान लिया गया कि वे बोलना नहीं जानते।

सबाल्टर्न का बड़ा हिस्सा है आदिवासी समुदाय। हम जानते है कि हिन्दी आलोचना आज आदिवासी विमर्श को लेकर भी चल रही है। आदिवासी शब्द से प्रतीत होता है कि ये पहले से आए हैं यानी प्रकृति के अधिक नजदीक हैं लेकिन आर्थिक विकास और बाजारवाद, पूँजीवाद ने खास तरीके से जो प्रकृति के नजदीक थे, उनको धकेल दिया। जो शिक्षा के केन्द्र में थे, उन्होंने एक वर्चस्ववादी समूह बना लिया और जो उनके बीच नहीं थे उनको सबाल्टर्न बनाकर छोड़ दिया। आज का समय हाशिए के लोगों को सुनने का समय है।

हिन्दी साहित्य में उत्तर आधुनिकता के काल से यह दौर आरम्भ हुआ है, तब से दलित साहित्य प्रमुख हो गया। आज दलित और स्त्री के साथ आदिवासी विमर्श पर विद्यार्थी बड़ी तादाद में शोध कर रहे हैं। संजीव के उपन्यास उस वर्ग के बारे में हैं जो अपनी आवाज नहीं उठा सकता। पाठ्यक्रम में शामिल करने के लिए पाठ्यक्रम को बदलने की जरूरत है। अभी यह चर्चा और विमर्श तक है, इस पर जो लिखा जा रहा है, उस पर बात कर रहा है। एम. ए. में दलित और स्त्री विमर्श पाठ्यक्रम में हैं।

सभी भारतीय भाषाओं को विश्‍व के परिदृश्य में सबाल्टर्न के रूप में देख सकते हैं, अँग्रेजी इसके विरोध में खड़ी हुई है। मूल रूप से ही इनको बोलते समय अगर नीचे धरातल पर खड़े होते हैं तो यह भाषा भी सबाल्टर्न है। अँग्रेजी जब कोई बोलता है तो कोई उसके ज्ञान का स्तर नहीं देखा जाता है। भाषा जिस जगह सामाजिक स्तर बताने लगती है, अपने साथ दूसरा कुछ व्यक्त करने लगती है तो वहाँ तुरन्त यह जुड़ जाता है।

युवाओं को जब जोड़ना है तो जरूरी है कि इस पर कुछ लिखा जाए लेकिन यह प्रश्‍न है कि भारतीय युवाओं में कितने प्रतिशत युवा पढ़ना चाहते हैं या पढ़ते हैं। सिर्फ पाठ्यक्रम से जोड़ने पर ही वे क्यों पढ़ेंगे? केन्द्र में लाने से ज्यादा जरूरी है कि सबाल्टर्न – जो कहना चाहते हैं उनको संवेदना के साथ सुना और समझा जाए। चेतना की दृष्टि से मुक्त होना पहला कदम है। चेतना की दृष्टि से सशक्त स्त्री सबाल्टर्न विमर्श में हस्तक्षेप कर सकती है।

(लेखिका कलकत्ता विश्वविद्यालय की हिन्दी विभागाध्यक्ष तथा प्रखर वक्ता हैं)

 

मिठाईवाला 

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भगवतीप्रसाद वाजपेयी 

बहुत ही मीठे स्वरों के साथ वह गलियों में घूमता हुआ कहता – “बच्चों को बहलानेवाला, खिलौनेवाला।”

इस अधूरे वाक्य को वह ऐसे विचित्र किन्तु मादक-मधुर ढंग से गाकर कहता कि सुननेवाले एक बार अस्थिर हो उठते। उनके स्नेहाभिषिक्त कंठ से फूटा हुआ उपयुक्त गान सुनकर निकट के मकानों में हलचल मच जाती। छोटे-छोटे बच्चों को अपनी गोद में लिए युवतियाँ चिकों को उठाकर छज्जों पर नीचे झाँकने लगतीं। गलियों और उनके अन्तर्व्यापी छोटे-छोटे उद्यानों में खेलते और इठलाते हुए बच्चों का झुंड उसे घेर लेता और तब वह खिलौनेवाला वहीं बैठकर खिलौने की पेटी खोल देता।

बच्चे खिलौने देखकर पुलकित हो उठते। वे पैसे लाकर खिलौने का मोल-भाव करने लगते। पूछते – “इछका दाम क्या है, औल इछका? औल इछका?” खिलौनेवाला बच्चों को देखता, और उनकी नन्हीं-नन्हीं उँगलियों से पैसे ले लेता, और बच्चों की इच्छानुसार उन्हें खिलौने दे देता। खिलौने लेकर फिर बच्चे उछलने-कूदने लगते और तब फिर खिलौनेवाला उसी प्रकार गाकर कहता – “बच्चों को बहलानेवाला, खिलौनेवाला।” सागर की हिलोर की भाँति उसका यह मादक गान गली भर के मकानों में इस ओर से उस ओर तक, लहराता हुआ पहुँचता, और खिलौनेवाला आगे बढ़ जाता।

राय विजयबहादुर के बच्चे भी एक दिन खिलौने लेकर घर आए! वे दो बच्चे थे – चुन्नू और मुन्नू! चुन्नू जब खिलौने ले आया, तो बोला – “मेला घोला कैछा छुन्दल ऐ?”

मुन्नू बोला – “औल देखो, मेला कैछा छुन्दल ऐ?”

दोनों अपने हाथी-घोड़े लेकर घर भर में उछलने लगे। इन बच्चों की माँ रोहिणी कुछ देर तक खड़े-खड़े उनका खेल निरखती रही। अन्त में दोनों बच्चों को बुलाकर उसने पूछा – “अरे ओ चुन्नू – मुन्नू, ये खिलौने तुमने कितने में लिए है?”

मुन्नू बोला – “दो पैछे में! खिलौनेवाला दे गया ऐ।”

रोहिणी सोचने लगी – इतने सस्ते कैसे दे गया है? कैसे दे गया है, यह तो वही जाने। लेकिन दे तो गया ही है, इतना तो निश्चय है!

एक जरा-सी बात ठहरी। रोहिणी अपने काम में लग गई। फिर कभी उसे इस पर विचार की आवश्यकता भी भला क्यों पड़ती।

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छह महीने बाद।

नगर भर में दो-चार दिनों से एक मुरलीवाले के आने का समाचार फैल गया। लोग कहने लगे – “भाई वाह! मुरली बजाने में वह एक ही उस्ताद है। मुरली बजाकर, गाना सुनाकर वह मुरली बेचता भी है सो भी दो-दो पैसे भला, इसमें उसे क्या मिलता होगा। मेहनत भी तो न आती होगी!”

एक व्यक्ति ने पूछ लिया – “कैसा है वह मुरलीवाला, मैंने तो उसे नही देखा!”

उत्तर मिला – “उम्र तो उसकी अभी अधिक न होगी, यही तीस-बत्तीस का होगा। दुबला-पतला गोरा युवक है, बीकानेरी रंगीन साफा बाँधता है।”

“वही तो नहीं, जो पहले खिलौने बेचा करता था?”

“क्या वह पहले खिलौने भी बेचा करता था?’

“हाँ, जो आकार-प्रकार तुमने बतलाया, उसी प्रकार का वह भी था।”

“तो वही होगा। पर भई, है वह एक उस्ताद।”

प्रतिदिन इसी प्रकार उस मुरलीवाले की चर्चा होती। प्रतिदिन नगर की प्रत्येक गली में उसका मादक, मृदुल स्वर सुनाई पड़ता – “बच्चों को बहलानेवाला, मुरलियावाला।”

रोहिणी ने भी मुरलीवाले का यह स्वर सुना। तुरन्त ही उसे खिलौनेवाले का स्मरण हो आया। उसने मन ही मन कहा – “खिलौनेवाला भी इसी तरह गा-गाकर खिलौने बेचा करता था।”

रोहिणी उठकर अपने पति विजय बाबू के पास गई – “जरा उस मुरलीवाले को बुलाओ तो, चुन्नू-मुन्नू के लिए ले लूँ। क्या पता यह फिर इधर आए, न आए। वे भी, जान पड़ता है, पार्क में खेलने निकल गए है।”

विजय बाबू एक समाचार पत्र पढ़ रहे थे। उसी तरह उसे लिए हुए वे दरवाजे पर आकर मुरलीवाले से बोले – “क्यों भई, किस तरह देते हो मुरली?”

किसी की टोपी गली में गिर पड़ी। किसी का जूता पार्क में ही छूट गया, और किसी की सोथनी (पाजामा) ही ढीली होकर लटक आई है। इस तरह दौड़ते-हाँफते हुए बच्चों का झुण्ड आ पहुँचा। एक स्वर से सब बोल उठे – “अम बी लेंदे मुल्ली, और अम बी लेंदे मुल्ली।”

मुरलीवाला हर्ष-गद्गद हो उठा। बोला – “देंगे भैया! लेकिन जरा रुको, ठहरो, एक-एक को देने दो। अभी इतनी जल्दी हम कहीं लौट थोड़े ही जाएँगे। बेचने तो आए ही हैं, और हैं भी इस समय मेरे पास एक-दो नहीं, पूरी सत्तावन।… हाँ, बाबूजी, क्या पूछा था आपने कितने में दीं!… दी तो वैसे तीन-तीन पैसे के हिसाब से है, पर आपको दो-दो पैसे में ही दे दूँगा।”

विजय बाबू भीतर-बाहर दोनों रूपों में मुस्करा दिए। मन ही मन कहने लगे – कैसा है। देता तो सबको इसी भाव से है, पर मुझ पर उलटा एहसान लाद रहा है। फिर बोले – “तुम लोगों की झूठ बोलने की आदत होती है। देते होगे सभी को दो-दो पैसे में, पर एहसान का बोझा मेरे ही ऊपर लाद रहे हो।”

मुरलीवाला एकदम अप्रतिभ हो उठा। बोला – “आपको क्या पता बाबू जी कि इनकी असली लागत क्या है। यह तो ग्राहकों का दस्तूर होता है कि दुकानदार चाहे हानि उठाकर चीज क्यों न बेचे, पर ग्राहक यही समझते हैं – दुकानदार मुझे लूट रहा है। आप भला काहे को विश्वास करेंगे? लेकिन सच पूछिए तो बाबूजी, असली दाम दो ही पैसा है। आप कहीं से दो पैसे में ये मुरलियाँ नहीं पा सकते। मैंने तो पूरी एक हजार बनवाई थीं, तब मुझे इस भाव पड़ी हैं।”

विजय बाबू बोले – “अच्छा, मुझे ज्यादा वक्त नहीं, जल्दी से दो ठो निकाल दो।”

दो मुरलियाँ लेकर विजय बाबू फिर मकान के भीतर पहुँच गए। मुरलीवाला देर तक उन बच्चों के झुण्ड में मुरलियाँ बेचता रहा। उसके पास कई रंग की मुरलियाँ थीं। बच्चे जो रंग पसन्द करते, मुरलीवाला उसी रंग की मुरली निकाल देता।

“यह बड़ी अच्छी मुरली है। तुम यही ले लो बाबू, राजा बाबू तुम्हारे लायक तो बस यह है। हाँ भैए, तुमको वही देंगे। ये लो।… तुमको वैसी न चाहिए, यह नारंगी रंग की, अच्छा वही लो।…. ले आए पैसे? अच्छा, ये लो तुम्हारे लिए मैंने पहले ही निकाल रखी थी…! तुमको पैसे नहीं मिले। तुमने अम्मा से ठीक तरह माँगे न होंगे। धोती पकड़कर पैरों में लिपटकर, अम्मा से पैसे माँगे जाते हैं बाबू! हाँ, फिर जाओ। अबकी बार मिल जाएँगे…। दुअन्नी है? तो क्या हुआ, ये लो पैसे वापस लो। ठीक हो गया न हिसाब?….मिल गए पैसे? देखो, मैंने तरकीब बताई! अच्छा अब तो किसी को नहीं लेना है? सब ले चुके? तुम्हारी माँ के पैसे नहीं हैं? अच्छा, तुम भी यह लो। अच्छा, तो अब मैं चलता हूँ।”

इस तरह मुरलीवाला फिर आगे बढ़ गया।

3

आज अपने मकान में बैठी हुई रोहिणी मुरलीवाले की सारी बातें सुनती रही। आज भी उसने अनुभव किया, बच्चों के साथ इतने प्यार से बातें करनेवाला फेरीवाला पहले कभी नहीं आया। फिर यह सौदा भी कैसा सस्ता बेचता है! भला आदमी जान पड़ता है। समय की बात है, जो बेचारा इस तरह मारा-मारा फिरता है। पेट जो न कराए, सो थोड़ा!

इसी समय मुरलीवाले का क्षीण स्वर दूसरी निकट की गली से सुनाई पड़ा – “बच्चों को बहलानेवाला, मुरलियावाला!”

रोहिणी इसे सुनकर मन ही मन कहने लगी – और स्वर कैसा मीठा है इसका!

बहुत दिनों तक रोहिणी को मुरलीवाले का वह मीठा स्वर और उसकी बच्चों के प्रति वे स्नेहसिक्त बातें याद आती रहीं। महीने के महीने आए और चले गए। फिर मुरलीवाला न आया। धीरे-धीरे उसकी स्मृति भी क्षीण हो गई।

4

आठ मास बाद –

सर्दी के दिन थे। रोहिणी स्नान करके मकान की छत पर चढ़कर आजानुलंबित केश-राशि सुखा रही थी। इसी समय नीचे की गली में सुनाई पड़ा – “बच्चों को बहलानेवाला, मिठाईवाला।”

मिठाईवाले का स्वर उसके लिए परिचित था, झट से रोहिणी नीचे उतर आई। उस समय उसके पति मकान में नहीं थे। हाँ, उनकी वृद्धा दादी थीं। रोहिणी उनके निकट आकर बोली – “दादी, चुन्नू-मुन्नू के लिए मिठाई लेनी है। जरा कमरे में चलकर ठहराओ। मैं उधर कैसे जाऊँ, कोई आता न हो। जरा हटकर मैं भी चिक की ओट में बैठी रहूँगी।”

दादी उठकर कमरे में आकर बोलीं – “ए मिठाईवाले, इधर आना।”

मिठाईवाला निकट आ गया। बोला – “कितनी मिठाई दूँ, माँ? ये नए तरह की मिठाइयाँ हैं – रंग-बिरंगी, कुछ-कुछ खट्टी, कुछ-कुछ मीठी, जायकेदार, बड़ी देर तक मुँह में टिकती हैं। जल्दी नहीं घुलतीं। बच्चे बड़े चाव से चूसते हैं। इन गुणों के सिवा ये खाँसी भी दूर करती हैं! कितनी दूँ? चपटी, गोल, पहलदार गोलियाँ हैं। पैसे की सोलह देता हूँ।”

दादी बोलीं – “सोलह तो बहुत कम होती हैं, भला पचीस तो देते।”

मिठाईवाला – “नहीं दादी, अधिक नहीं दे सकता। इतना भी देता हूँ, यह अब मैं तुम्हें क्या… खैर, मैं अधिक न दे सकूँगा।”

रोहिणी दादी के पास ही थी। बोली – “दादी, फिर भी काफी सस्ता दे रहा है। चार पैसे की ले लो। यह पैसे रहे।

मिठाईवाला मिठाइयाँ गिनने लगा।

“तो चार की दे दो। अच्छा, पच्चीस नहीं सही, बीस ही दो। अरे हाँ, मैं बूढ़ी हुई मोल-भाव अब मुझे ज्यादा करना आता भी नहीं।”

कहते हुए दादी के पोपले मुँह से जरा-सी मुस्कराहरट फूट निकली।

रोहिणी ने दादी से कहा – “दादी, इससे पूछो, तुम इस शहर में और भी कभी आए थे या पहली बार आए हो? यहाँ के निवासी तो तुम हो नहीं।”

दादी ने इस कथन को दोहराने की चेष्टा की ही थी कि मिठाईवाले ने उत्तर दिया – “पहली बार नहीं, और भी कई बार आ चुका है।”

रोहिणी चिक की आड़ ही से बोली – “पहले यही मिठाई बेचते हुए आए थे, या और कोई चीज लेकर?”

मिठाईवाला हर्ष, संशय और विस्मयादि भावों मे डूबकर बोला – “इससे पहले मुरली लेकर आया था, और उससे भी पहले खिलौने लेकर।”

रोहिणी का अनुमान ठीक निकला। अब तो वह उससे और भी कुछ बातें पूछने के लिए अस्थिर हो उठी। वह बोली – “इन व्यवसायों में भला तुम्हें क्या मिलता होगा?”

वह बोला – “मिलता भला क्या है! यही खाने भर को मिल जाता है। कभी नहीं भी मिलता है। पर हाँ; सन्तोष, धीरज और कभी-कभी असीम सुख जरूर मिलता है और यही मैं चाहता भी हूँ।”

“सो कैसे? वह भी बताओ।”

“अब व्यर्थ उन बातों की क्यों चर्चा करुँ? उन्हें आप जाने ही दें। उन बातों को सुनकर आप को दु:ख ही होगा।”

“जब इतना बताया है, तब और भी बता दो। मैं बहुत उत्सुक हूँ। तुम्हारा हर्जा न होगा। मिठाई मैं और भी कुछ ले लूँगी।”

अतिशय गम्भीरता के साथ मिठाईवाले ने कहा – “मैं भी अपने नगर का एक प्रतिष्ठित आदमी था। मकान-व्यवसाय, गाड़ी-घोड़े, नौकर-चाकर सभी कुछ था। स्त्री थी, छोटे-छोटे दो बच्चे भी थे। मेरा वह सोने का संसार था। बाहर संपत्ति का वैभव था, भीतर सांसारिक सुख था। स्त्री सुन्दरी थी, मेरी प्राण थी। बच्चे ऐसे सुन्दर थे, जैसे सोने के सजीव खिलौने। उनकी अठखेलियों के मारे घर में कोलाहल मचा रहता था। समय की गति! विधाता की लीला। अब कोई नहीं है। दादी, प्राण निकाले नहीं निकले। इसलिए अपने उन बच्चों की खोज में निकला हूँ। वे सब अन्त में होंगे, तो यहीं कहीं। आखिर, कहीं न जन्मे ही होंगे। उस तरह रहता, घुल-घुल कर मरता। इस तरह सुख-संतोष के साथ मरूँगा। इस तरह के जीवन में कभी-कभी अपने उन बच्चों की एक झलक-सी मिल जाता है। ऐसा जान पड़ता है, जैसे वे इन्हीं में उछल-उछलकर हँस-खेल रहे हैं। पैसों की कमी थोड़े ही है, आपकी दया से पैसे तो काफी हैं। जो नहीं है, इस तरह उसी को पा जाता हूँ।”

रोहिणी ने अब मिठाईवाले की ओर देखा – उसकी आँखें आँसुओं से तर हैं।

इसी समय चुन्नू-मुन्नू आ गए। रोहिणी से लिपटकर, उसका आँचल पकड़कर बोले – “अम्माँ, मिठाई!”

“मुझसे लो।” यह कहकर, तत्काल कागज की दो पुड़ियाँ, मिठाइयों से भरी, मिठाईवाले ने चुन्नू-मुन्नू को दे दीं!

रोहिणी ने भीतर से पैसे फेंक दिए।

मिठाईवाले ने पेटी उठाई, और कहा – “अब इस बार ये पैसे न लूँगा।”

दादी बोली – “अरे-अरे, न न, अपने पैसे लिए जा भाई!”

तब तक आगे फिर सुनाई पड़ा उसी प्रकार मादक-मृदुल स्वर में – “बच्चों को बहलानेवाला मिठाईवाला।”

साहित्यिकी द्वारा ‘ रेंगती परछाइयाँ ‘ पर परिसंवाद का आयोजन

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कोलकाता -‘ साहित्यिकी ‘ के तत्वावधान में हाल ही में भारतीय भाषा परिषद् के सभागार में महानगर की ही प्रतिष्ठित नाट्य -संस्था ‘ लिटिल थेस्पियन ‘ से जुड़ी उमा झुनझुनवाला के नाटक ‘ रेंगती परछाइयाँ ‘ पर परिसंवाद का सफल आयोजन किया गया । सर्वप्रथम ‘ साहित्यिकी ‘ की सचिव गीता दूबे ने संस्था की विविध गतिविधियों का परिचय देते हुए यह रेखांकित किया कि लगभग ५० महिलाओं द्वारा परिचालित यह संस्था सन् १९९८ से सामाजिक , साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों के हित में कार्यरत है । अज़हर आलम द्वारा निर्देशित इस नाटक की कुछ महत्वपूर्ण झलकियों के पर्दे पर प्रदर्शन ने परिसंवाद के लिये  अनुकूल पृष्ठभूमि तैयार की । ‘ साहित्यिकी ‘ की ओर से वक्तव्य देते हुए रेवा जाजोदिया ने कहा कि इस  नाटक में रचनाकार ने बड़ी कुशलता से , बिना श्लीलता  का अतिक्रमण किए , स्त्री हृदय की उन नितान्त अन्दरूनी  और गूढ़ पर्त्तों को खोला है , जो देह-विज्ञान और मनोविज्ञान की युति है , जिन्हें स्त्री महसूस तो करती है , पर ख़ुद से भी साझा नहीं करती ।’हंस ‘ पत्रिका के संपादक संजय सहाय ने कहा कि यह नाट्य-कृति थियेटर ऑफ़ एब्सर्ड है , जो बहुत सारे सवाल छोड़ जाती है , जिनका उत्तर खोज पाना संभव नहीं।’ साहित्यिकी ‘ की महिलाओं द्वारा किए जा रहे कार्य को उन्होंने क्रान्तिकारी बताया । नाटक के निर्देशक अज़हर आलम ने बताया कि सधे एवं प्रवाहपूर्ण  संवादों में लिखे गए इस नाटक का प्लॉट पेचीदा नहीं है और पिछले दस-बारह वर्षों में कोलकाता में लिखा गया यह महत्वपूर्ण मौलिक नाटक है । नाट्य-लेखिका उमा झुनझुनवाला ने संवाद – सत्र में यह बताया कि नाटक का अंत स्त्री -आक्रोश का संश्लेष है और पितृसत्तात्मक समाज की यह विडम्बना है कि अक्सर स्त्रियाँ पुरूषों की भाषा ही समझती हैं । संवाद-सत्र में भागीदारी करते हुए कुसुम जैन ने इस नाटक को काफ्का के साहित्य की तरह सामाजिक घावों को कुरेदने वाला तथा वाणीश्री बाजोरिया ने इसे निम्न -मध्यवर्गीय स्त्री की घनीभूत पीड़ा का विस्फोट बताया ।कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए किरण सिपानी ने कहा कि हर साहित्य-प्रेमी पाठक को ‘ हंस ‘ पत्रिका की प्रतीक्षा रहती है ।उमाजी के बहुआयामी व्यक्तित्व पर  प्रकाश डालते हुए कहा कि इस नाटक में स्त्री जज़्बातों और अरमानों की परछाइयाँ रेंगतीं दिखाई देती हैँ । कार्यक्रम का संचालन करते हुए पूनम पाठक ने ‘ लिटिल थेस्पियन ‘ के अवदान और उपलब्धियों का उल्लेख किया । संस्था की निदेशक विद्या भंडारी ने धन्यवाद ज्ञापन किया ।

अपना दूध दान करके अनगिनत बच्चों की ज़िंदगी बचाने वाली माएँ

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हमारे रूढ़िवादी समाज में अगर कोई औरत बाकी की औरतों से थोड़ा अलग हट कर कोई काम करने निकलती है, तो हो सकता है उसे डराया जाये या उस पर टिप्पणियां की जायें, लेकिन शरण्या जैसी महिलाएं बिना किसी की परवाह के न जाने कितने नवजातों की जिंदगी बचाने में लगी हैं।

मदर मिल्क बैंक में तीन तरह की महिलाएं दूध दान करती हैं। पहली वे जिनका दूध ज्यादा बनता है, दूसरी वे जिनके बच्चे ICU में भर्ती होने की वजह से दूध नहीं पी सकते और तीसरी वे जिनके बच्चों की मौत हो जाती है, साथ ही कुछ महिलाएं ऐसी भी होती हैं, जिन्हें दूध तो बनता है लेकिन किसी वजह से वे अपने शिशुओं को अपना दूध पिला नहीं पातीं, ऐसे में दूध को दान कर देना सबसे बेहतर विकल्प है।

शरण्या के पति रेगुलर ब्लड डोनर हैं। कभी भी जरूरत पड़ने पर वह रक्त दान करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। दान करने की प्रेरणा शरण्या ने अपने पति से ही ली है।

भारत में शिशु मृत्यु दर काफी अधिक है। यहां हर साल 1,000 में से 37 नवजातों की किसी न किसी कारण से मौत हो जाती है। लेकिन इन मौतों की सबसे बड़ी वजह है कुपोषण। कुपोषण यानी बच्चो को सही से पोषण न मिल पाना। नवजातों को मां के दूध की सबसे अधिक जरूरत होती है। अगर किसी वजह से मां का दूध बच्चे को नहीं मिल पाता है, तो मुसीबत खड़ी हो जाती है। क्योंकि मां के दूध का कोई विकल्प नहीं होता। इस समस्या को दूर करने के लिए देश में ऐसे कई मदर मिल्क बैंक बनाए गए हैं, जहां महिलाएं दूध दान करती हैं।

चेन्नई की शरण्या ऐसी ही एक महिला हैं, जो शहर के कांची चाइल्ड ट्रस्ट अस्पताल के मिल्क बैंक में दूध दान कर रही हैं। शरण्या दूसरी बार मां बनी हैं और पिछले दो महीने से लगातार दूध दान कर रही हैं। इस नेक काम की शुरुआत के बारे में बताते हुए शरण्या कहती हैं, कि जब वो प्रेग्नेंट थीं तो उन्हें फेसबुक के जरिए पता चला कि मां का दूध न मिलने की वजह से कई बच्चों की मौत हो जाती है और फिर उन्हें मदर मिल्क बैंक के बारे में पता चला जहां पर अपना दूध दान किया जा सकता था। वह हर पांच दिन पर मिल्क बैंक जाती हैं और 150ml तक दूध दान करती हैं। मदर मिल्क बैंक में तीन तरह की महिलाएं दूध दान करती हैं। एक तो वे जिनका दूध ज्यादा बनता है, दूसरी वे जिनके बच्चे ICU में भर्ती होने की वजह से दूध नहीं पी सकते हैं और तीसरी वे जिनके बच्चों की मौत हो जाती है। कुछ महिलाएं ऐसी भी होती हैं, जिन्हें दूध तो बनता है लेकिन किसी वजह सेे वे अपने शिशुओं को दूध पिला नहीं पातीं।

कैसे दान करती हैं माँऐं मिल्क बैंक में दूध?

महिलाओं का दूध पंप या इलेक्ट्रिक पंप के जरिए निकालकर मिल्क बैंक में इकट्ठा कर लिया जाता है। ये दूध 6 महीने तक स्टोर किया जा सकता है। दूध लेने से पहले महिला की एचआइवी और हेपटॉइटिस जैसे कुछ रोगों की जांच की जाती है। इकट्ठा किये गये दूध को पॉश्चरीकृत कर जमा किया जाता है। शरण्या ने जब दूध दान करना शुरू किया, तो उन्होंने सोचा कि ये उन बच्चों के लिए होगा, जिनकी मां दूध पिलाने में सक्षम नहीं होती हैं, लेकिन जब वो अस्पताल के बच्चों वाले वॉर्ड में गईं तो दंग रह गईं। उन्होंने देखा कि वहां पर कई शिशु ऐसे भी थे जो समय से पहले पैदा हो गए थे। कुछ का साइज तो हथेली के बराबर था। यही वो मौका था जब शरण्या ने सोच लिया, कि वह किसी भी हालत में दूध दान करने आया करेंगी।

अपने परिवार के बारे में बताते हुए शरण्या कहती हैं, कि उनके परिवार वाले इस काम में उनका काफी सपोर्ट करते हैं। शरण्या की एक बेटी भी है, जो उनके साथ अस्पताल तक जाती है। वह मां से कहती है कि आप जब तक चाहें दूध दान करना जारी रख सकती हैं। शरण्या के पति रेगुलर ब्लड डोनर हैं। कभी भी जरूरत पड़ने पर वह रक्त दान करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। दान करने की प्रेरणा शरण्या ने उनसे ही ली है। शरण्या इस बात की पूरी जानकारी रखती हैं, कि उनका दूध किसी बच्चे को दिया जा रहा है। वह उस शिशु की मां से भी मिलती हैं। वह बताती हैं कि जब पैरेंट्स उनसे पूछते हैं कि इसके लिए कितने पैसे दें तो इससे उनकी आंखों में आंसू आ जाते हैं। वह लोगों से कहती हैं, कि ‘मां का दूध अनमोल है, इसे किसी को बेचा नहीं जा सकता।’

हमारे रूढ़िवादी समाज में अगर कोई महिला इस तरह का काम करने निकले तो हो सकता है कि उसे डराया जाये या उस पर टिप्पणियां की जायें, लेकिन शरण्य जैसी महिलाएं बिना किसी परवाह के न जाने कितने नवजातों की जिंदगी बचाने में लगी हैं। शरण्या खुश होकर गर्व के साथ ये बात कहती हैं, कि वे कई नवजात शिशुओं की जिंदगी बचाने का काम कर रही हैं।

(साभार – योर स्टोरी)