Thursday, March 19, 2026
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बॉलीवुड की पहली कॉमेडियन थीं टुनटुन

जीवन के आखिरी दिन एक चॉल में बिताए
लगभग 425 फिल्मों में काम किया

उमा देवी उर्फ टुन टुन भारत की पहली महिला कॉमेडियन थीं. लेकिन फिल्म इंडस्ट्री में अपने शानदार सालों के बावजूद उन्होंने सबसे दुखद जीवन जिया। बॉलीवुड में 40 के दशक में एक ऐसी स्टार आईं जिन्होंने महिलाओं की छवि को बदला। जी हां हम बात कर रहे हैं भारत की पहली महिला कॉमेडियन टुनटुन की। हिंदी सिनेमा में हास्य कलाकार के रूप में जानी जाने वाली टुन टुन हिंदी सिनेमा की पहली महिला हास्य कलाकार थीं। उन्होंने लोगों को जितना हंसाया, उतना ही उनका खुद का जीवन भी दुखद भरा रहा.उन्होंने लोगों को हंसाया, लेकिन उनकी कहानी गरीबी और अकेलेपन से भी जुड़ी हुई थी।
टुनटुन यानी उमा देवी खत्री का जन्म उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले के पास एक छोटे से गांव में 11 जुलाई 1923 में हुआ था। उमा देवी बचपन से ही गरीबी में पली-बढ़ी. बचपन में टुनटुन अपने चाचा के साथ रहती थी और उन्हें अपना पेट भरने के लिए लोगों के घरों में झाड़ू भी लगाना पड़ता था । 23 साल की उम्र तक उन्हें काफी कुछ सहना पड़ा । उमा देवी जब बहुत छोटी थी तो ज़मीन के विवाद में उनके मां-बाप की हत्या कर दी गई । मृत्यु से पहले एक बार इंटरव्यू में टुनटुन ने बताया था कि मुझे तो अपने मां बाप का चेहरा तक याद नहीं कि वो कैसे दिखते थे? मेरा 8-9 साल का एक भाई था,जिसका नाम हरि था । मुझे याद है हम अलीपुर में रहते थे। एक दिन मेरे भाई की भी हत्या कर दी गई । तब मैं चार-पांच साल की थी. वह बहुत कम उम्र में अनाथ हो गई थीं। उनके माता-पिता और भाई के चेहरे उनके दिमाग में बस एक धुंधली याद बनकर रह गए थे।
बचपन में ही गरीबी और इतने सारे दुख झेलने के बाद वो दिल्ली चली गईं, कहा उनकी मुलाक़ात आबकारी ड्यूटी इंस्पेक्टर अख्तर अब्बास काज़ी से हुई, जिन्होंने उन्हें नौकरी दिलाने में मदद की और उन्हें गायन जारी रखने के लिए प्रेरित भी किया। विभाजन के दौरान काजी पाकिस्तान चले गए, और उमा ने 23 वर्ष की आयु में बॉम्बे जाने का फैसला किया। मुंबई आने के बाद उनके एक नए जीवन की शुरुआत हुई. मुंबई में उन्होंने संगीतकार नौशाद जी का दरवाजा खटखटाया और बोला मैं बहुत अच्छा गाना गाती हूं मुझे एक मौका दे दीजिए वरना मैं मुंबई के समुद्र में कूद जाऊंगी। हालांकि वह प्रशिक्षित गायिका नहीं थीं, लेकिन उनकी बातें सुनकर नौशाद जी ने उनका ऑडिशन लिया और फिर उन्हें गाना गाने का मौका दिया और इस तरह से उमा ने 1946 में फ़िल्म वामिक अज़रा से गायन में पदार्पण किया।
1947 में ‘दर्द’ फिल्म का ये गाना ‘अफसाना लिख रही हूं दिल-ए-बेक़रार का आँखों में रंग भर के तेरे इंतजार का’ उमा देवी का पहला गाना आया और ये गाना सुपरहिट रहा। यहीं से उन्हें उन्हें सफलता मिली. इस गाने के बाद उनके कई और हिट गाने भी रहे जैसे ‘आज मची है धूम’, ‘ये कौन चला’, ‘बेताब है दिल’ आदि. दर्द फिल्म के बाद उन्होंने दुलारी, चांदनी रात, सौदामिनी, भिखारी, चंद्रलेखा आदि जैसी फिल्मों में गीत गाए।
उस दौर में लता मंगेशकर जैसी और कई गायिकाएं आईं जिनके बाद नौशाद जी ने उन्हें अभिनय करने की सलाह दी। ये बात सुनकर टुनटुन ने कहा कि वो अभिनय करेंगी लेकिन सिर्फ दिलीप कुमार के साथ। ये बात सुनकर नौशाद जी हंसने लगे. भगवान ने जैसे टुनटुन की बात सुन ली और उन्हें 1950 में ‘बाबुल’ फिल्म में दिलीप कुमार के साथ काम करने का मौका मिला। इस फिल्म में दिलीप कुमार के साथ नरगिस लीड रोल में थी।
अभिनय के रूप में उमा देवी की पहली फिल्म ‘बाबुल’ थी. जिसमें वह दिलीप कुमार जी के साथ काम कर रही थी. एक दिन शूटिंग के दौरान दिलीप कुमार के साथ एक सीन करते हुए वह उनके ऊपर गिर गई जिसके बाद दिलीप कुमार ने उमा देवी को टुनटुन उपनाम दिया। उस समय, मोटापे को लेकर शर्मिंदगी को ठीक माना जाता था और उमा देवी ने खुशी-खुशी यह उपनाम स्वीकार कर लिया. आगे चलकर यही नाम उनकी पहचान बना और लोगों ने उन्हें कॉमेडियन टुनटुन के रूप में बहुत पसंद किया। अख्तर अब्बास काजी ने उनके साथ रहने के लिए पाकिस्तान छोड़ने का फैसला किया और उनसे शादी करने के लिए बॉम्बे चले गए। इनके चार बच्चे थे और 1992 में काजी के निधन तक उन्होंने एक साथ जीवन बिताया।
टुनटुन ने अपने फिल्मी करियर में लगभग 425 फिल्मों में काम किया। अपने पाँच दशक के करियर में टुनटुन ने कई भाषाओं में अभिनय किया और आवारा, मिस्टर एंड मिसेज 55, प्यासा और कई अन्य फ़िल्मों से बॉलीवुड में अपनी एक स्थायी पहचान बनाई। 90 का दशक आते-आते उन्होंने फिल्मों से दूरी बनानी शुरू कर दी। उनकी आखिरी फिल्म 1990 में कसम धंधे की रही । इसके बाद उन्होंने फिल्मों में काम नहीं किया। फिल्मी करियर छोड़ने के बाद टुनटुन अपने परिवार के साथ समय बिताने लगी । हिंदी सिनेमा के लिए दुखद दिन 23 नवंबर 2003 का था,जिस दिन टुनटुन ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया.
सिनेमा को अपनी ज़िंदगी का एक अच्छा हिस्सा देने के बावजूद, टुन टुन को कभी कोई पुरस्कार या सम्मान नहीं मिला । एक गायिका और एक स्थायी हास्य कलाकार के रूप में उनके योगदान को इंडस्ट्री ने हल्के में लिया, लेकिन उन्होंने उन्हें उनके जीवन के अंतिम वर्षों में ही छोड़ दिया। अभिनेत्री ने अपने जीवन के आखिरी साल एक चॉल में गुजारे, जहां उन्होंने अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए संघर्ष किया।
अभिनेता और प्रोड्यूसर शशि रंजन ने टाइम्स ऑफ इंडिया को एक इंटरव्यू के दौरान नटुन टुन के फेम से लेकर चॉल तक के दिनों को याद करते हुए बताया था कि जब मैंने उन्हें पाया, तो वह एक चॉल में रह रही थीं और उनकी हालत बहुत खराब थी और वह बहुत बीमार थीं। जब प्रोडक्शन के लोग उनसे मिले, तो उन्होंने कहा कि वह चल नहीं सकतीं और उन्हें खुद के लिए खाना भी नहीं मिल पा रहा था। जब मुझे इस बारे में पता चला, तो मैं उनसे मिलने गया और उनसे साक्षात्कार के लिए अनुरोध किया । वह बहुत खुश थीं लेकिन जब उन्होंने मुझे बताया कि कैसे वह कुछ पैसे जुटा रही थीं ताकि वह दवाइयां खरीद सकें, तो मुझे बहुत दुख हुआ. इसलिए, मैंने उन्हें हमारे साथ इंटरव्यू करने के लिए मैंने उन्हें 25,000 रुपये का पेमेंट किया ।

मिलेगा महंगे रिचार्ज से छुटकारा, सरकार लगाएगी 5 करोड़ वाई- फाई हॉटस्पॉट

नयी दिल्ली । भारत में डिजिटल कनेक्टिविटी को बढ़ावा देने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने पीएम वाणी (पीएम – वाणी) योजना की शुरुआत की है। इसका मुख्य उद्देश्य देश के हर नागरिक को सस्ती और आसानी से उपलब्ध इंटरनेट सेवा प्रदान करना है। इस योजना के तहत, सरकार ने 5 करोड़ पीएम-वाईफाई हॉटस्पॉट स्थापित करने का लक्ष्य रखा है, जिससे गांवों और दूर-दराज के इलाकों में भी इंटरनेट की पहुंच सुनिश्चित की जाएगी। सस्ती ब्रॉडबैंड इंटरनेट सेवाएं होंगी उपलब्ध वर्तमान में, इंटरनेट सेवा मोबाइल टावर्स के माध्यम से दी जाती है, लेकिन कई क्षेत्रों में मोबाइल टावर्स की कमी है। इसका परिणाम यह है कि लोग इंटरनेट और मोबाइल कॉल की सुविधाओं से वंचित रह जाते हैं। पीएम वाणी योजना के तहत, सरकार छोटे-छोटे वाईफाई हॉटस्पॉट्स स्थापित कर रही है, जिससे सस्ती ब्रॉडबैंड इंटरनेट सेवाएं उपलब्ध होंगी।
लाखों लोगों को मिलेंगी सस्ती इंटरनेट सेवाएं ब्रॉडबैंड इंडिया फोरम (बीआईएफ) के अध्ययन के अनुसार, पीएम वाणी एक महत्वपूर्ण पहल है, जो सरकार के लिए घाटे का कारण नहीं बनेगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि इस योजना के तहत, टेलीकॉम कंपनियों को अतिरिक्त 60,000 करोड़ रुपये की आय होने की संभावना है। इससे टेलीकॉम कंपनियों की चिंताएं कुछ हद तक दूर हो सकती हैं। हालांकि, वोडाफोन-आईडिया, जियो और एयरटेल जैसी कंपनियों को इस योजना से अपने राजस्व में कमी की आशंका है। उनका मानना है कि पीएम वाणी के तहत स्थापित वाईफाई हॉटस्पॉट्स उनके व्यवसाय पर काफी प्रभाव डाल सकते हैं। लेकिन सरकार का मानना है कि इससे लाखों लोगों को सस्ती इंटरनेट सेवाएं मिलेंगी, जिससे उनका जीवन बेहतर होगा।
गौरतलब है कि पीएम वाणी का पूरा नाम प्रधानमंत्री वाईफाई एक्सेस नेटवर्क इंटरफेस है, जो 9 दिसंबर 2020 को शुरू हुआ। इसके तहत, लोगों को ओपन एयर वाईफाई नेटवर्क के माध्यम से इंटरनेट सेवा प्रदान की जाएगी। सरकार ने इसमें कुछ बदलाव किए हैं, जिससे यह प्रणाली और प्रभावी बनेगी। आजकल, कंप्यूटर, टैबलेट और स्मार्ट टीवी जैसे उपकरणों का इस्तेमाल बढ़ गया है और मोबाइल डेटा अब पर्याप्त नहीं है। ऐसे में, पीएम वाणी एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। सरकार इस योजना को तेजी से लागू करने के लिए प्रयासरत है, जिससे पूरे देश में वाईफाई कनेक्टिविटी का विस्तार हो सके। यह एक वाईफाई क्रांति की तरह होगा, जो सभी के लिए डिजिटल दुनिया के दरवाजे खोलेगा।

सहारा समूह की योजनाओं में पैसा लगाने वाले निवेशकों को राहत

अब मिलेंगे 50,000 रुपये
नयी दिल्ली । सहारा समूह में पैसा लगाने वाले निवेशकों के लिए राहत की खबर है। अबर सरकार 10,000 रुपये की जगह 50,000 रुपये वापिस करेगी। सरकार ने पैसे की लिमिट बढ़ाकर 50,000 रुपये कर दी है। ऐसे में जिन लोगों ने सहारा की स्कीमों में ज्यादा पैसा लगाया था, उन्हे थोडी राहत जरूर मिलेगी। सरकार ने सहारा समूह सहकारी समितियों के छोटे जमाकर्ताओं के लिए वापस की जाने वाले अमाउंट की सीमा को 10,000 रुपये से बढ़ाकर 50,000 रुपये कर दिया है। सहकारिता मंत्रालय के एक अधिकारी ने यह जानकारी दी। सरकार ने अब तक सीआरसीएस (सहकारी समितियों के केंद्रीय पंजीयक)-सहारा रिफंड पोर्टल के माध्यम से सहारा समूह की सहकारी समितियों के 4.29 लाख से अधिक जमाकर्ताओं को 370 करोड़ रुपये जारी किए हैं। अधिकारी ने कहा कि रिफंड राशि की सीमा 50,000 रुपये तक बढ़ने से अगले 10 दिन में लगभग 1,000 करोड़ रुपये का पेमेंट किया जाएगा। उन्होंने कहा कि पिछले हफ्ते छोटे इन्वेस्टर के लिए ‘रिफंड’ अमाउंट की लिमिट 10,000 रुपये से बढ़ाकर 50,000 रुपये कर दी गई थी। सरकार ‘रिफंड’ जारी करने से पहले जमाकर्ताओं के दावों की सावधानीपूर्वक जांच कर रही है। उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद सहारा समूह की चार बहु-राज्य सहकारी समितियों के वास्तविक जमाकर्ताओं की वैलिड जमा अमाउंट की वापसी के दावे प्रस्तुत करने के लिए सीआरसीएस-सहारा रिफंड पोर्टल 18 जुलाई 2023 को पेश किया गया था।ये सहमारी समितियां हैं… सहारा क्रेडिट कोऑपरेटिव सोसायटी लि., लखनऊ, सहारायन यूनिवर्सल मल्टीपर्पज सोसायटी लि., भोपाल, हमारा इंडिया क्रेडिट कोऑपरेटिव सोसायटी लि., कोलकाता और स्टार्स मल्टीपर्पज कोऑपरेटिव सोसायटी लिमिटेड, हैदराबाद। न्यायालय के 29 मार्च 2023 के आदेश के तहत 19 मई, 2023 को सेबी-सहारा रिफंड खाते से 5,000 करोड़ रुपये की राशि केंद्रीय सहकारी समितियों के पंजीयक (सीआरसीएस) को अलॉट की थी। शीर्ष अदालत के न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर सुभाष रेड्डी डिजिटल तरीके से पैसे के डिस्ट्रीब्यूषन मामले की देख-रेख कर रहे हैं।

बच्चों के लिए सरकार लाई एनपीएस वात्सल्य योजना

नयी दिल्ली । वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने18 सितंबर 2024 को एनपीएस वात्सल्य योजना शुरू की । इस योजना की घोषणा आम बजट में की गई थी। यह योजना बच्चों के लिए बनाई गई है। योजना के तहत माता – पिता एवं अभिभावक बच्चे के लिए हर साल निवेश करेंगे जिसका लाभ बच्चों को 18 साल होने के बाद मिलेगा। यह सेविंग-कम-रिटायरमेंट स्कीम है। दरअसल, इस स्कीम में बच्चों को उनके रिटायरमेंट की उम्र के बाद पेंशन का लाभ भी मिलेगा। एनपीएस वात्सल्य योजना में अधिकतम निवेश की कोई सीमा नहीं है, लेकिन सालाना कम से कम 1,000 रुपये का निवेश करना होगा। इस स्कीम में आंशिक निकासी की भी सुविधा मिलती है। इसके अलावा पेंशन का लाभ भी मिलता है।
बता दें कि यह योजना 18 साल से कम उम्र वाले बच्चों के लिए डिजाइन की गई है। इस स्कीम में माता-पिता या फिर अभिभावक निवेश करते हैं। लेकिन , जब बच्चा 18 साल का हो जाता है तो माता-पिता स्कीम से बाहर हो जाते हैं और एनपीएस वात्सल्य का फंड एनपीएस टीयर-1 में बदल जाता है। एनपीएस वात्सल्य फंड बच्चे के 18 साल होने के बाद मैच्योर हो जाती है। अगर स्कीम को जारी रखना है तो बच्चा का केवाईसी करके इसे जारी रखा जा सकता है। यह बच्चे के केवाईसी के बाद सामान्य एनपीसी स्कीम की तरह ही काम करता है। वहीं अगर 18 साल के बाद पूरा फंड निकालना है तो उसके नियम अलग है।
अगर फंड में 2.5 लाख रुपये से कम की राशि है तब पूरी निकासी की अनुमति होती है। 2.5 लाख रुपये से ज्यादा की राशि होने पर निवेशक केवल 20 फीसदी ही निकाल सकता है बाकी 80 फीसदी की एन्युटी खरीद सकते हैं जो हर महीने बच्चे को पेंशन के तौर पर मिलेगी। एनपीएस वात्सल्य को लेकर कई निवेशकों के मन में सवाल है कि इसमें निवेश और ब्याज का हिसाब-किताब कैसे होगा। अगर आप अपने बच्चे के लिए 1,000 रुपये का सालाना निवेश करते हैं तो हर साल आपको लगभग 10 फीसदी का रिटर्न मिलेगा। इस हिसाब से 18 साल में आपने 2.16 लाख रुपये का निवेश किया है। इस निवेश राशि पर करीब 3,89,568 रुपये का ब्याज मिलेगा। यानी की बच्चे के 18 साल पूरे होने के बाद 6,05,568 रुपये का फंड जमा हो जाएगा। अगर बच्चे के 18 साल पूरे होने के बाद भी अगर फंड को जारी रखते हैं तब बच्चे की 60 साल की उम्र में 3.83 करोड़ रुपये का फंड हो जाएगा। 60 साल के बाद अगर एनपीएस वात्सल्य अकाउंट की राशि से कोई एन्युटी प्लान खरीद लेते हैं, जिसपर 5 से 6 फीसदी का ब्याज मिलता है। ऐसे में 60 साल के बाद निवेशक को करीब 19 से 22 लाख रुपये का सालाना ब्याज मिलेंगा। वहीं पेंशन की बात करें तो हर महीने लगभग 1.50 लाख रुपये पेंशन के तौर पर मिल सकता है।

ऑस्कर के लिए जाएगी किरण राव की फिल्म लापता लेडीज

नयी दिल्ली । किरण राव की ‘लापता लेडीज’ को ऑस्कर पुरस्कार 2025 के लिए भारत की आधिकारिक प्रविष्टि के तौर पर चुना गया है। ‘फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया’ ने सोमवार को यहां यह घोषणा की। पितृसत्ता पर हल्के-फुल्के व्यंग्य से भरपूर इस हिंदी फिल्म को 29 फिल्मों में से चुना गया है जिनमें बॉलीवुड की हिट फिल्म ‘‘एनिमल’’, मलयालम की राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता ‘‘अट्टम’’ और कान फिल्म महोत्सव की विजेता ‘‘ऑल वी इमेजिन एज लाइट’’ शामिल हैं। असमिया फिल्म निर्देशक जाहनु बरुआ की अध्यक्षता वाली 13 सदस्यीय चयन समिति ने आमिर खान और किरण राव द्वारा निर्मित ‘‘लापता लेडीज’’ को एकेडमी अवॉर्ड्स में सर्वश्रेष्ठ अंतरराष्ट्रीय फिल्म श्रेणी के लिए ‘‘सर्वसम्मति’’ से चुना है। इस श्रेणी में शामिल होने की दौड़ में 29 फिल्मों में हिंदी फिल्म ‘‘श्रीकांत’’, तमिल फिल्म ‘‘वाज़हाई’’ और ‘‘तंगलान’’ तथा मलयालम फिल्म ‘‘उल्लोझुक्कु’’ थीं।
मार्च में रिलीज हुई ‘‘लापता लेडीज’’ 2001 में ग्रामीण भारत में दो दुल्हनों की दिल छू लेने वाली कहानी है जिनकी एक ट्रेन यात्रा के दौरान अदला-बदली हो जाती है। फिल्म का निर्माण राव के किंडलिंग प्रोडक्शंस, आमिर खान प्रोडक्शंस और जियो स्टूडियोज ने किया है। राव ने कहा कि वह ‘‘बेहद सम्मानित और खुश’’ महसूस कर रही हैं कि उनकी फिल्म 97वें एकेडमी अवॉर्ड्स में भारत का प्रतिनिधित्व करेगी। उन्होंने कहा, ‘‘सिनेमा हमेशा दिलों को जोड़ने, सीमाओं को पार करने और सार्थक संवाद शुरू करने का एक शक्तिशाली माध्यम रहा है। मुझे उम्मीद है कि यह फिल्म भारत की तरह दुनिया भर के दर्शकों को पसंद आएगी।’’ फिल्म निर्देशक ने एक बयान में कहा, ‘‘मैं इस फिल्म पर भरोसा जताने वाली चयन समिति और हर व्यक्ति का हार्दिक आभार व्यक्त करता चाहती हूं। इस वर्ष ऐसी अद्भुत भारतीय फिल्मों में से चुना जाना वास्तव में एक बड़ा सौभाग्य है – जो इस सम्मान के लिए समान रूप से योग्य दावेदार हैं।’’करीब 13 साल के अंतराल के बाद ‘लापता लेडीज’ के साथ निर्देशन की दुनिया में लौटीं राव ने कहा कि वह और उनकी टीम ‘‘बड़े उत्साह’’ के साथ इस यात्रा को आगे बढ़ाने के लिए उत्सुक हैं। राव ने मुंबई में विभिन्न वर्गों के लोगों पर केंद्रित 2010 में आयी फिल्म ‘‘धोबी घाट’’ से निर्देशन की दुनिया में कदम रखा था। नितांशी गोयल, प्रतिभा रांटा और स्पर्श श्रीवास्तव की मुख्य भूमिकाओं के साथ ही फिल्म में रवि किशन, छाया कदम और गीता अग्रवाल शर्मा ने भी अभिनय किया है। इस हिंदी फिल्म को 2023 टोरंटो अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में दिखाया गया था। रवि किशन ने इस उपलब्धि का श्रेय राव, खान, सह-कलाकारों और लेखकों को दिया है। अभिनेता एवं भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सांसद किशन ने इस फिल्म में दो दुल्हनों की अदला-बदली के मामले की जांच कर रहे पुलिस कर्मी का किरदार निभाया है। किशन ने गोरखपुर में कहा, ‘‘मैंने कभी नहीं सोचा था कि यह फिल्म ऑस्कर में जाएगी। पूरी दुनिया ऑस्कर के मंच पर भारतीय समाज खासतौर से ग्रामीण भारत को देखेगी जिसमें देश की 80 फीसदी आबादी रहती है।’’उन्होंने इस फिल्म को भारत की बेटियों को समर्पित करते हुए कहा, ‘‘वे देखेंगे कि भारत की बेटियां कैसे आगे बढ़ रही हैं। फिल्म यह खूबसूरत संदेश देती है कि कैसे इन बेटियों ने अपने ख्वाब नहीं छोड़े, चाहे वह आत्म-निर्भर बनने का हो या जैविक खेती करने का।’’ एक फिल्म के प्रीमियर के लिए अभी स्पेन में मौजूद छाया कदम के लिए यह साल दोहरी खुशी का है। मई में वह 2024 कान फिल्म महोत्सव में शामिल हुई थीं जहां पायल कपाड़िया के निर्देशन वाली उनकी फिल्म ‘‘ऑल वी इमेजिन एज लाइट’’ ग्रां प्री पुरस्कार जीतने वाली भारत की पहली फिल्म बनी। कदम ने ‘‘लापता लेडीज’’ में चाय बेचने वाली एक तेजतर्रार महिला मंजू माई का किरदार निभाया है जिसके दिल में फिल्म की एक नायिका के लिए स्नेह छिपा होता है। कदम ने कहा कि उन्होंने अनुमान जताया था कि इस फिल्म को एकेडमी अवॉर्ड्स में भारत की आधिकारिक प्रविष्टि के रूप में चुना जाएगा। उन्होंने फोन पर कहा, ‘‘यह खुशी केवल मेरी नहीं है बल्कि यह भारतीय सिनेमा की खुशी है। मुझे उम्मीद थी कि ऐसा कुछ होगा और मुझे बहुत अच्छा लग रहा है कि असल में ऐसा हुआ है।
मैंने मराठी में किरण को एक संदेश भेजते हुए कहा था कि ‘हम ऑस्कर में जाएंगे।’ और आज जब यह खबर आयी तो मैंने उन्हें फोन किया और कहा, ‘मैंने आपसे कहा था न।’’’ तमिल फिल्म ‘‘महाराजा’’, तेलुगु फिल्म ‘‘कल्की 2898 एडी’’ और ‘‘हनु-मान’’ के साथ ही हिंदी फिल्म ‘‘स्वातंत्र्य वीर सावरकर’’ और ‘‘आर्टिकल 370’’ भी 29 फिल्मों की उस सूची का हिस्सा थीं जिनमें से लापता लेडीज को चुना गया। आमिर खान अभिनीत 2002 में आयी फिल्म ‘‘लगान’’ के बाद से कोई भी भारतीय फिल्म ऑस्कर में सर्वश्रेष्ठ अंतरराष्ट्रीय फीचर फिल्म के लिए नामांकित नहीं हुई है। पहले केवल दो अन्य फिल्मों ने अंतिम पांच में जगह बनायी थी और वे नरगिस अभिनीत ‘‘मदर इंडिया’’ और मीरा नायर की ‘‘सलाम बॉम्बे’’ हैं। पिछले साल ऑस्कर के लिए मलयालम सुपरहिट फिल्म ‘‘2018: एवरीवन इज ए हीरो’’ को भारत की आधिकारिक प्रविष्टि के तौर पर भेजा गया ।

टूटा 9 दशकों का कीर्तिमान, शतरंज ओलंपियाड में भारत ने जीते स्वर्ण

बुडापेस्ट ।  ओलंपियाड शतरंज प्रतियोगिता ने भारत ने पहली बार स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया। ग्रैंडमास्टर डी गुकेश, अर्जुन एरिगेसी और आर प्रज्ञानानंदा ने स्लोवेनिया के खिलाफ 11वें दौर में अपने अपने मैच जीत लिए। विश्व चैम्पियनशिप चैलेंजर गुकेश और अर्जुन एरिगेसी ने एक बार फिर अहम मुकाबलों में अच्छा प्रदर्शन किया जिससे भारत को ओपन वर्ग में अपना पहला खिताब जीतने में मदद मिली। भारतीय महिलाओं ने अजरबेजान को 3.5-0.5 से हराकर देश के लिए गोल्ड मेडल हासिल किया। डी हरिका ने पहले बोर्ड पर तकनीकी श्रेष्ठता दिखाई और दिव्या देशमुख ने एक बार फिर अपने प्रतिद्वंद्वी को पछाड़कर तीसरे बोर्ड पर अपना व्यक्तिगत स्वर्ण पदक पक्का किया। आर वैशाली के ड्रा खेलने के बाद वंतिका अग्रवाल की शानदार जीत से भारतीय टीम ने गोल्ड मेडल सुनिश्चित किया। ऐसे में आइए जानते हैं कौन हैं भारत के ये चाणक्य।
भाई-बहन हैं प्रज्ञानानंदा और वैशाली – ओलंपियाड शतरंज प्रतियोगिता में प्रज्ञानानंदा और वैशाली ने अपनी बिसात से पूरी दुनिया को हैरान कर दिया। तमिलनाडु के रहने वाले प्रज्ञानानंदा और वैशाली दोनों भाई-बहन हैं। भारत के ये ग्रैंडमास्टर कई बड़े इंटरनेशनल टूर्नामेंट में एक साथ हिस्सा ले चुके हैं। इन दोनों ने ओलंपियाड शतरंज प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और अपने दमदार खेल से भारत को पहली बार गोल्ड मेडल दिलाने में अहम भूमिका निभाई।
कमाल के ग्रैंडमास्टर हैं डी गुकेश -17 साल के ग्रैंडमास्टर डी गुकेश भी ओलंपियाड शतरंज प्रतियोगिता में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। तमिलनाडु के रहने वाले गुकेश कैंडिडेट्स शतरंज टूर्नामेंट के चैंपियन बने थे और उन्होंने भारत को ओलंपियाड में गोल्ड मेडल दिलाया। गुकेश का जन्म 29 मई 2006 को हुआ था। उन्होंने सिर्फ सात साल की उम्र में शतरंज खेलना शुरू कर दिया था।
अर्जुन ने मचाया है तहलका- 21 साल के ग्रैंडमास्टर अर्जुन एरिगैसी ने शतरंज की दुनिया में तहलका मचा रखे हैं। ओलंपियाड से पहले उन्होंने इंटरनेशनल चेस फेडरेशन की वर्ल्ड रैंकिंग लिस्ट में 9वां स्थान हासिल किया था। वारंगल के रहने वाले अर्जुन ने प्रज्ञानानंदा और गुकेश के साथ मिलकर भारत को ओलंपियाड में गोल्ड मेडल में दिलाने में अहम भूमिका निभाई।
पद्मश्री से सम्मानित हैं डी हारिका – द्रोणावल्ली हरिका भारत की एक ऐसी महिला शतरंज खिलाड़ी हैं, जिन्होंने फिडे का खिताब अपने नाम किया है। उन्होंने साल 2012, 2015 और 2017 में महिला विश्व शतरंज चैंपियनशिप में तीन ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किए। साल 2022 में गर्भ अवस्था में होने के बावजूद ओलंपियाड में भाग लिया था और इस बार उन्होंने दमदार खेल दिखाते हुए भारत को गोल्ड मेडल दिलाने में अहम भूमिका निभाई। शतरंज में उनके खेल के लिए अर्जुन और पद्मश्री पुरस्कार से उन्हें सम्मानित किया जा चुका है।
पांच साल की उम्र में से शतरंज खेल रही हैं दिव्या – 18 साल की दिव्या देशमुख महाराष्ट्र के नागपुर की रहने वाली हैं। दिव्या कुछ ही सालों में शतरंज के खेल में खूब चर्चित हो गई हैं। दिव्या ने सिर्फ 6 साल की उम्र में शतरंज खेलने शुरू कर दिया था। हालांकि, उनकी फैमिली नहीं चाहती थी कि वह शतरंज में अपना करियर बनाए। उनके मात-पिता की चाहत थी कि वह बैडमिंटन की में आगे बढ़े, लेकिन दिव्या मन शतरंज में लग गया। कम उम्र में ही दिव्या ने शतरंज में कई बड़े मैच जीतकर सबको हैरान कर दिया था। वहीं अब उन्होंने देश को ओलंपियाड में गोल्ड दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

भारतीय शतरंज में प्रगति के जनक: ‘स्वर्णिम पीढ़ी’ को तराशने में आनंद की भूमिका

नयी दिल्ली । विश्वनाथन आनंद को भरोसा था कि भारत इस बार शतरंज ओलंपियाड में स्वर्ण पदक जीतने की स्थिति में होगा और भारतीय शतरंज में कुछ सबसे प्रतिभाशाली युवाओं को तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले इस दिग्गज ग्रैंडमास्टर को उस समय बहुत खुशी हुई होगी जब देश ने हंगरी के बुडापेस्ट में 45वें शतरंज ओलंपियाड में पुरुष और महिला दोनों वर्गों में स्वर्ण पदक जीता। विश्व चैंपियनशिप के चैलेंजर डी गुकेश, आर प्रज्ञानानंदा, अर्जुन एरिगेसी, विदित गुजराती और पी हरिकृष्णा की मौजूदगी वाली भारतीय पुरुष टीम ने ओपन वर्ग में स्वर्ण पदक जीता और शीर्ष वरीयता प्राप्त अमेरिका और उज्बेकिस्तान को पीछे छोड़ा।
हरिका द्रोणावल्ली, आर वैशाली, दिव्या देशमुख, वंतिका अग्रवाल और तानिया सचदेव ने महिलाओं के वर्ग में कजाखस्तान और अमेरिका की टीमों को पछाड़कर भारत को स्वर्ण पदक दिलाया। भारत की दोनों टीमों ने पहली बार स्वर्ण पदक जीता और देश के पहले शतरंज सुपरस्टार आनंद की इसमें भूमिका रही।

दोनों टीमों ने चेन्नई में घरेलू सरजमीं पर हुए पिछले ओलंपियाड में कांस्य पदक जीते थे। आनंद को पता था कि उस समय वे स्वर्ण पदक जीतने के करीब पहुंचे थे लेकिन अंतिम चरण में पिछड़ गए। हालांकि ओलंपियाड से पहले ‘पीटीआई’ को दिए साक्षात्कार में पांच बार के विश्व चैंपियन आनंद ने बुडापेस्ट में दोनों टीमों की खिताब जीतने की क्षमता पर भरोसा जताया था और यह यह सोने पर सुहागा था कि वह हंगरी की राजधानी में इन टीमों द्वारा बनाए गए इतिहास को देखने के लिए वहां मौजूद थे।

उन्होंने कहा था, ‘‘आप जानते हैं, अगर मुझे पासा फेंकना पड़े, तो ये अच्छी टीमें हैं (दांव लगाने के लिए)।’’गुकेश, प्रज्ञानानंदा, एरिगेसी और वैशाली ने वेस्टब्रिज आनंद शतरंज अकादमी में ट्रेनिंग ली है जिसे 54 वर्षीय आनंद ने चार साल पहले चेन्नई में स्थापित किया था।

18 वर्षीय गुकेश और 19 वर्षीय प्रज्ञानानंदा ने अक्सर कहा है कि वे ‘विशी सर’ के बिना उस मुकाम पर नहीं पहुंच पाते जहां वे हैं इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं थी कि अंतरराष्ट्रीय शतरंज महासंघ (फिडे) ने उन्हें ‘भारतीय शतरंज में प्रगति के जनक’ के रूप में संबोधित किया।

इससे पहले महान ग्रैंडमास्टर गैरी कास्परोव ने आनंद की सराहना करते हुए कहा था कि ‘विशी आनंद के शिष्य धूम मचा रहे हैं’। उन्होंने गुकेश के अप्रैल में कैंडिडेट्स टूर्नामेंट जीतकर सबसे कम उम्र में विश्व खिताब का चैलेंजर बनने के बाद यह बात कही थी।
आनंद इसका श्रेय खिलाड़ियों के माता-पिता और प्रारंभिक प्रशिक्षकों के साथ साझा करना पसंद करते हैं लेकिन उनका कहना है कि शतरंज अकादमी के उनके विचार ने भी अपनी भूमिका निभाई जो तीन दशक से भी अधिक समय पहले सोवियत संघ में देखे गए स्कूलों से प्रेरित था।
ओलंपियाड के दौरान फिडे के साथ बातचीत में आनंद ने स्वीकार किया था कि वे गुकेश और प्रज्ञानानंदा जैसे खिलाड़ियों की प्रगति से आश्चर्यचकित हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘मैंने उन सभी युवाओं को लिया जो 14 वर्ष की आयु से पहले ग्रैंडमास्टर बन गए थे। ईमानदारी से कहूं तो मेरा विचार उन्हें शीर्ष जूनियर से लेकर विश्व विजेता बनने तक समर्थन करना था।’’आनंद ने कहा, ‘‘मेरे शुरुआती समूह में प्रज्ञानानंदा और गुकेश था, अर्जुन कुछ समय बाद शामिल हुआ। लड़कियों में वैशाली भी थी। क्या मुझे उम्मीद थी कि ये इतनी तेजी से आगे बढ़ेगा? वास्तव में नहीं। क्या मुझे उम्मीद थी कि ऐसा हो सकता है? हां। लेकिन यह अविश्वसनीय है।’’
(साभार – द प्रिंट)

वाणी प्रवाह 2024 – पुस्तक समीक्षा- जानकीदास तैजपाल मैनशन

नाम- सौरभ कुमार सिंह स्नातकोत्तर शिक्षण संस्थान – प्रेसीडेंसी यूनिवर्सिटी कोलकाता ईमेल आईडी– [email protected]

किसी भी उपन्यास की समीक्षा करना तभी संभव है, जब पता हो कि वह उपन्यास किस घटना पर लिखा गया है और वह कौन से समय का उपन्यास है? कोई भी साहित्यकार अपने युग की घटनाओं और समस्याओं से अछूता नहीं रह सकता। वह अपने युग की समस्याएं और घटनाओं से प्रभावित होकर ही उपन्यास की रचना करता है। दूसरी बात यह है कि कोई भी उपन्यास पाठक के मानस पर क्या प्रभाव डालता है और कितना प्रभाव डालता है? यह उसकी सकारात्मकता का स्तर तय करता है। किसी भी उपन्यास का प्रभाव पाठक पर कितनी अवधि तक रहता है, यह उपन्यास की कला की सुंदरता को दर्शाता है। पात्रों को पाठक के साथ एकाकार हो जाना उपन्यासकार की यह मूर्तिकला होती है। कोई भी उपन्यासकार कागज के पात्रों को अपनी शिल्प की कला से जिंदा इंसान बना देता है। देश की महान उपन्यासकार अलका सरावगी ने भी अपने उपन्यासों में अपनी मूर्तिकला के माध्यम से कागज के पात्रों को जिंदा इंसान बनाया है और पाठक के हृदय तक पहुंचाया है।

एक सशक्त उपन्यासकार के रूप में स्थापित हो चुकीं अलका सरावगी का पहला उपन्यास ‘कलिकथा वाया बायपास’ 1996 प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास के पात्रों को अपने शिल्प की कला से जिंदा इंसान बना देती है। इन्हें इस उपन्यास पर साहित्य अकादमी सम्मान (2001) भी मिला है। उसके बाद इनके और तीन उपन्यास प्रकाशित हुए हैं- ‘शेष कादम्बरी’, ‘कोई बात नहीं’ , ‘एक ब्रेक के बाद’। 2008 के बाद अलका सरावगी का नया उपन्यास अब आया है, जिसका नाम है “जानकी दास तेजपाल मैनशन”। इसका प्रकाशन वर्ष 2015 है।

उपन्यास को कथानक और कथावस्तु के ढांचे में देखें तो यह घटनाओं, चरित्रों तथा वर्णनो को आपस में बांधता है।

उपन्यास का कथानक पूरी तरह कलकाता में विकसित हुआ है। कलकत्ता के सेंट्रल एवेन्यू के पास ‘जानकी दास तेजपाल मैनशन’ नाम की एक बड़ी कोठी है। इसमें अस्सी परिवार रहते हैं। यह प्राचीन कोठी इस देश की तरह है, जिसे तोड़े जाने की कोशिश पैदा होते देखकर दर्द होता है। यही भावनाओं की कहानी है यह ‘जानकी दास तेजपाल मेनशन’।

एक अच्छे कथानक की पहचान उसके ‘अनुपात’ और ‘गति’ से मानी जाती है। इस उपन्यास में घटनाओं या वर्णनों और चरित्रों का अनुपात भरकर देखने को नहीं मिलता। वह  घटनाएं चाहे कलकत्ता में घटी हों, चाहे बम्बई में घटी हों या अमेरिका में घटी हों। पाठक सभी चरित्रों और घटनाओं के साथ संगति बैठा पाता है और उपन्यास का आस्वादन करने में उसे समस्या नहीं आती।

बहुदा पाठक को उपन्यास पढ़ते समय ऐसा लगता है कि घटनाएं बहुत तेज गति के साथ आगे बढ़ता है। लेकिन जानकी दास तेजपाल मेनशन का कथानक किसी भी साहित्यप्रेमी पाठक को बोरियत महसूस करा ही नहीं सकता, क्योंकि उपन्यास का हर एक अध्याय दूसरे अध्याय से जुड़ा हुआ है।

अलका सरावगी ने स्वयं कहा है कि “ इस उपन्यास को लिखने में मुझे सात साल लगे। पहला अध्याय लिखने के बाद उसी को पढ़कर आगे का लिखती थी।“

इस उपन्यास में लेखिका ने संबंध निर्वाह को जिस तरह से जोड़ा है, वह अत्यंत प्रशंसनीय है। दूसरे शब्दों में कहें तो जानकीदास तेजपाल मेंशन एक उपन्यास नहीं बल्कि दो उपन्यास है। इसको हम पहले अध्याय और दूसरे अध्याय को आधारित बनाकर समझ सकते हैं। पहला अध्ययन में अलकाजी ने हिंदी उपन्यास के कथ्य में बिल्कुल नया अंदाज और अत्यंत प्रभावशाली प्रयोग किया है। दूसरा अध्ययन शुरू होने के साथ ही पाठक खुद को नई दुनिया में पाता है। दूसरा अध्याय पढ़ते समय पता चलता है कि पहला अध्याय आत्मकथा है-

जयगोविन्द ने हाथ के लिखे हुए चालीस में चार कम यानी छत्तीस पन्नों के पहले अध्याय को एक साँस में पढ़कर वापस उसी पीले फोल्डर में डाल दिया। दो साल पहले उसने ‘जयदीप‘नाम से एक आत्मकथात्मक उपन्यास लिखना शुरू किया था।“

उपन्यास के अंदर उपन्यास कथानक में इस तरह का प्रयोग 21वीं सदी में ही किया जा सकता है। प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह के इस कथन से सहमत हुआ जा सकता है कि अलका सरावगी 21वीं सदी की लेखिका हैं। पाठक को हमेशा इस तरह का कथ्य पढ़ना अच्छा लगता है जिसमें उपन्यासकार ने अपने परिवेश तथा घटनाओं को शामिल करता है और ऐसी उपन्यास जिसमें पाठक संपूर्णता में जुड़ाव महसूस करे। जानकीदास तेजपाल मेंशन 184 पन्नों में एक लंबी कलावरी को समेटे  हुए हैं। इसका पता पृष्ठभूमि के परिवर्तन से ही चलता है।

अलका सरावगी का कथन है-

“मुझे ऐसी कथा लिखना बहुत उबाऊ लगता है जो जान बूझकर यौवन अवस्था, यौवन से प्रौढ़ावस्था और प्रौढ़ा से मरने तक का हो।”

इस प्रकार उपन्यास की कथावस्तु विश्वसनीय और प्रमाणिक लगती है।

भारत के उपन्याससम्राट प्रेमचंद का कथन है“बिना उद्देश्य की रचना हो ही नहीं सकता”। 1950 ई. के बाद के साहित्य में उद्देश्य का महत्व कम हुआ है। जब यथार्थवाद इतना सघन हो गया है कि अधिकांश लेखक सिर्फ यथार्थ का वर्णन करना चाहते हैं। अलका सरावगी ने भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए जानकीदास तेजपाल मेंशन को यथार्थ के ढांचे में ही रचा है। लेखिका ने यथार्थ से जुड़े अनेक मुद्दों को इस उपन्यास में उठाया।

कहा जाता है कि कोई भी नया निर्माण देश को प्रगति के पथ पर आगे बढ़ाता है। भारत में मेट्रो रेल की सेवा पहली बार कलकत्ता में शुरू हुई थी। पहली बार यह नया निर्णय हो रहा था और यह फैसला किया गया था कि अंडरग्राउंड लाइन बिछाई जाएगी। लेखिका लिखती है –

“देश की पहली भूगर्भ मेट्रो रेल के जब कलकत्ता में बनने की शुरुआत हुई , तो सबसे खुश हुए थे बड़ाबाजार के लोग। कहावत थी कि बिना पाँव वाला आदमी रेंगकर भी जल्दी पहुँच जाता है, पर बड़ाबाजार के ट्रैफिक में गाड़ी में आदमी बैठा का बैठा रह जाता है। तब लगा था कि अब कलकत्ता के और खासकर सेंट्रल एवेन्यू के पुराने दिन लौट आएँगे।“

लेकिन जिन्होंने उसे शुरू होने का वक्त देखा है, कोलकाता के मेट्रो रेल के सुरंगो को बनने के दौरान क्या हुआ होगा? अलका सरावगी ने इसका बड़ा ही सटीक चित्रण अपने इस उपन्यास में किया है। यह निर्माण बड़ा ही घातक साबित हुआ क्योंकि कलकत्ता जैसे पुराने देश में पहली बार मकान के नीचे सुरंग बनाकर मेट्रो लाइन बिछाना आसान काम नहीं था। इसका परिणाम यह हुआ कि मेट्रो लाइन बिछाने के कारण ऊपर की कोठरियाँ और मकान हिलने लगे। कई लोगों को अपने घर से बेघर होना पड़ा। लेखिका ने इस उपन्यास में सबसे पुरानी बिल्डिंग सेंट्रल एवेन्यू के जानकीदास तेजपाल मेनशन को केंद्र बनाया है। इस मेनशन के पास वाले सड़क पर जब बस गुजरती है तो जानकीदास तेजपाल मेनशन हिलता हुआ नज़र आता है। लेखिका कहती हैं-

“सड़क पर गुजरती हर बस के साथ हिलता जानकीदास तेजपाल मैनशन ‘एक नया अर्थ – संकेत है- पूरे देश का,जिसका ढहाया जाना तय है। राजनीति, प्रशासन , पुलिस और पूँजी के बीच बिचौलियों का तंत्र सबसे कमजोर को सबसे पहले बेदखल करने में लगा हुआ है। “

किस तरह से प्रशासन, पुलिस, राजनीति के बीच बिचौलियों का तंत्र सबसे कमजोर को दबाता है उसका सटीक चित्रण लेखिका ने किया है। जयगोविंद 1970 के दशक में अमेरिका से पढ़कर कोलकाता लौट आया है और वह एक कंप्यूटर इंजीनियर है जो इधर का रहता है और ना ही उधर का रह पाता है। वह जहां भी नौकरी मांगने जाता है उसको नीचा दिखाकर दबाने की कोशिश की जाती है। इसका एक प्रसंग देख सकते हैं-

“अमेरिका से पढ़कर लौटे हो। यहाँ काम कर सकोगे?“–‘घुरघुर‘ बोला था। कम्पनी नम्बर दो या नम्बर तीन आदमी और ऐसी आवाज? ………. उसने जवाब दिया था- काम करने के पहले कैसे बताया जा सकता है !“ अनजाने ही उसकी आवाज जवाब देते समय कुछ फटी हुई – सी निकली थी। ……जयदीप जानता था कि उसे आदरपूर्वक कहना चाहिए था— “ सर , एक मौका मिले तो करके ही बता सकता हूँ। “ पर घुरघुर के शब्दों में ही सिर्फ अविश्वास नहीं था , उसकी पूरी ‘ बॉडी लैंग्वेज ‘ यानी हाव – भाव से यह साफ था कि वह यकीनन जानता है कि जयदीप वहाँ काम नहीं कर सकेगा”

जिस तरह से जयदीप यह सारा कुछ सह जाता है। लेकिन एक वाक्य आता है-

अनजाने में ही उसकी आवाज जवाब देती हुई फटी हुई सी निकली थी। यह सब कुछ कह देता हैयहां पर लेखिका का वह दर्द देखने को मिलता है।

लेखिका ने बहुत ही कुशलता के साथ आज़ादी के बाद का यह चित्रण प्रस्तुत किया है। किस तरह बंगाल में नक्सलवाद पैदा हुआ, बड़ा और अंत में कैसे खत्म हुआ। यह आगे चलकर समझ आता है कि नक्सलवादियों के परिवारों पर क्या गुजरी होगी। भारत से अमेरिका पढ़ने जाने वाले लोग और जो उनमें से ज़्यादातर वही बस गये। उसके साथ वियतनाम के अमेरिकी आक्रमण का उन पर क्या प्रभाव पड़ा होगा जो लोग वहां पढ़ने गए थे। इसका बड़ा ही सटीक चित्रण अलका सरावगी ने इस उपन्यास में किया है।

लेखिका लिखतीहैं-

“अमेरिका से एडवोकेट बाबू ने बुला लिया , तो क्या ? उसे खुद मालूम है कि अमेरिका उसके लिए ठौर नहीं बन सकता था। वह तो मन ही मन तरस खाता है उन लोगों पर जो वहीं रह गए और अब चाहकर भी वापस नहीं आ सकते। उनके बीवी – बच्चे ही तैयार नहीं होंगे – ‘ हीट एंड डस्ट ‘ और ‘ इनफेक्शन ‘ भरी इस धरती पर लौटने के लिए।“

जिस जयदीप को अमेरिका इतना पसंद था अब वह खुश है। सोचता है कि अच्छा हुआ मैं अमेरिका से वापस आ गया। क्योंकि उसके जितने एन.आर. आई. दोस्त हैं वह इंडिया आने के लिए तड़पते हैं पर इनफेक्शन के डर से नहीं आ पाते। कहा जाता है कि अपना घर अपना ही होता है हम दुनिया के जिस भी कोने में चले जाएं पर वह सुकून अपने ही घर में वापिस आकर मिलता है। लेखिका ने इस मुहावरे का बड़ा ही सटीक उदाहरण जयदीप और उसके दोस्तों के माध्यम से दिया है। जयदीप का दोस्त विजय को देख सकते हैं कि कैसे वह अपने देश में लौटने के लिए बेचैन है। वह कहता है-  “ विजय के चेहरे की बेचारगी और भी गहरी हो गई थी— “ मैं अपने देश में मरना चाहता हूँ।

लेखिका ने इस उपन्यास में कुछ और संदेश को भी दिखाती है। जैसे उपन्यास में प्रेम से उपजा भरोसा भी है और उस भरोसे का टूटना भी “जाने यह प्रेम क्या चीज है कि बाकी सारी बातें बेमानी हो जाती हैं। पर ऐसा प्रेम भी कितनों के नसीब में होता है!”

लेखिका लिखतीहै-

जयगोविंद को अफसोस है कि वह दीपा को वह प्रेम नहीं दे पाया जो दीपा ने उसे दिया था। उसको दीपा के प्रेम से उपजा भरोसा तो मिला। उसे लगता है कि वह दीपा के उस प्रेम के भरोसे को तोड़ दिया।

लेखिका इसके पीछे के कारण को बताते हुए लिखती हैं कि- “दरअसल जयगोविन्द जैसे बड़ा हुआ , जैसी जिन्दगी उसने आस – पास देखी , जिस तरह के रिश्तों को जाना , उसमें कोई प्रेम जैसी चीज कभी . नजर नहीं आई।”

लेखिका ने अपने इस उपन्यास में कलकत्ता के मारवाड़ी समाज को भी चित्रित किया है। कलकत्ता में रहते हुए मारवाड़ी समाज को बहुत करीब से देखा है। मारवाड़ी समाज के साथ-साथ अन्य सभी समाजों के बीच के संबंधों को दिखाया हैं। इन संबंधों को पूरी तरह से जगह नहीं दे पाई है पर फिर भीइ इतने कम पन्नों में उन्हें लिखा भी नहीं जा सकता।

अंत में कहा जा सकता है कि मुख्यतः लेखिका ने जानकीदास तेजपाल मेनशन को वह रूपक बनाया है, जो दिखाता है कि कैसे आधुनिकता और विकास इतिहास को नष्ट करता है। कैसे एक ईमानदार इंसान व्यवस्था के कारण बेईमान बन जाता है।

कोई भी रचनाकार यदि कथा के माध्यम से अपनी बात कहना चाहता है तो उसे कुछ पात्र या चरित्र गढ़ने पड़ते हैं ताकि उसकी क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं के माध्यम से अपने भाव का संप्रेषण कर सके। अलका जी ने भी अनेक चरित्र गढ़े हैं। जयगोविंद या जयदीप, एडवोकेट बाबू, दीपा, रोहित और जयदीप की मां। यह सब सहभागी चरित्र के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं। दूसरी तरफ जयदीप के अमेरिका के एन. आर. आई. दोस्त और भारत के सारे दोस्त और उसके दफ्तर के लोग हैं। यह सब प्रेक्षक चरित्र के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं। जो मुख्यकथा को आगे बढ़ाने में अपना सहयोग देते हैं।

लेखिका ने अपने इस उपन्यास में चरित्र के माध्यम से एक नया प्रयोग किया है।  लेखिका कहती हैं“ कलकत्ता मेरे उपन्यासों में पात्र के रूप में मौजूद रहता है । ”

इसका उदाहरण लेखिका के ही उपन्यास ‘कलिकथा वाया बायपास’ में देख सकते है। इस उपन्यास में लेखिका ने दिखाया है कि किस तरह शहर का इतिहास आदमी के इतिहास से जुड़ा हुआ है। उसे अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। उन्होंने जानकीदास तेजपाल मेनशन में भी इसका प्रयोग किया है। जयदीप को उन्होंने इस उपन्यास का नायक बनाया है। जयदीप के चरित्र से कोलकाता और अमेरिका के प्रसंग को इस तरह से लेखिका ने जोड़ा है कि उसको अलग करके नहीं देखा जा सकता। जयदीप जो अमेरिका से पढ़कर आया है, एक ऐसे हिलते हुए मकान में जीवन जी रहा है और उसकी लड़ाई लड़ रहा है। उसके पीछे उसकी कौन सी प्रेरणा है? कौन सी मानसिकता है? यह कौन सी दुनिया है? और यह कौन सी व्यवस्था है? यह सब भूलकर वह लड़ने में दम लगाए हुए हैं। यह सारा परिदृश्य उपन्यास में उभरता है। यह सारा उपन्यास में पिरोया हुआ है।

इतना ही नहीं यह सारा एक खास समय में कैसे उभरता है। वियतनाम मे आंदोलन चल रहा था और उस समय में यह अमेरिका जाता है। यहां नक्सलवाद शुरू हो गया है। इसमें भी इसकी भागीदारी है, पर यह उसका हिस्सा नहीं बनता है। वह लौटकर आता है और फिर मकान को बचाने के लिए जान लगाए रहता है। यह एक ऐसा पात्र है जो अपने आप में अपने पूरे समय को समेटे हुआ है।

एक अच्छे पात्र की पहचान होती है कि वह लेखक के हाथों कठपुतली ना बना रहे, बल्कि वह स्वतंत्र रूप में चले। अच्छाई और बुराई दोनों को धारण करता हो। लेखिका ने पात्र को स्वतंत्र बनाया है वह अपने अनुसार चलता है और निर्णय लेता है। इस कहानी का पात्र अपनी कहानी को लिखने के साथ-साथ अगर उसको सही ना लगे, तो उससे असहमत भी होता है। उसमें अपनी अनकही कथाएं जोड़ते चलता है। हमारा जीवन भी ऐसे ही चलता है – विचारों को छोड़ते हैं और नए विचारों को अपनाते हैं। यह एक स्वतंत्र पात्र की पहचान है। लेखिका लिखती है-

“मेरे लिए शिल्प इसलिए अलग है क्योंकि मैं खुद ऊब ना जाऊं। मुझे कथारस ना मिले तो मैं अभी से हजार झमेलों में लिखूं क्यों।”

इस तरह के पात्रों का चयन करना तभी संभव है जब लेखक की सोच में ऊंचाई के साथ-साथ उतनी गहराई भी हो। तभी ऐसी कृति लिखी जा सकती है। इस तरह का पात्र रचा जा सकता है।

लेखक चरित्र के सिर्फ बाहरी पक्षों का वर्णन नहीं करता बल्कि लेखक उसके मन के भीतर प्रविष्ट होकर मनोवैज्ञानिक स्थितियों का भी सूक्ष्म अंकन करता है। लेखिका ने जयदीप के माध्यम से इसका बड़ा ही सुंदर चित्रण किया है। वह उन सभी अस्थापनाओं से असहमत होता है जो उसने पहले अपने जीवन में अपनाएं थे। इसके साथ वह अपनी कही हुई बातों को भी खारिज करता रहता है। समय की परिवर्तनशीलता के साथ-साथ वह खुद में भी परिवर्तन लाता है ताकि वह समय के सा ताल से ताल मिलाकर चल सके। लेखिका ने उसके बाहरी पक्षों के साथ उसके मन के भीतर प्रविष्ट होकर मनोवैज्ञानिक स्थितियों का सूक्ष्म आकलन किया है।

अलका सरावगी ने चरित्र योजना में साधारण जीवन के पात्रों को लिया। जो हमारे आसपास होते हैं । लेखिका ने अपनी शिल्पकला के माध्यम से कागज के पात्रों को जिंदा इंसान बनाया है और पाठक के हृदय तक पहुंचाया है।

कहा जाता है कि भाषा का गद्य रूप उपन्यास में व्यक्त होता है। हर रचना अपने काल के अनुसार भाषा ग्रहण करती है। जानकीदास तेजपाल मेनशन उत्तर आधुनिकता की रचना होने के कारण इसमें बहुत से अंग्रेजी और हिंदी शब्द आए हैं। जैसे – जादवपुर यूनिवर्सिटी, अटैच्ट बाथरूम, सेंट्रल एवेन्यूआदि।

मुहावरे और लोकोक्ति के प्रयोग से उपन्यास की रचना और आकृष्ट बनती है ।जानकीदास तेजपाल मेनशन में कहावतें और मुहावरे का प्रयोग देखने को मिलता है जो निम्नलिखित है-

  1. कहावत थी कि बिना पाँव वाला आदमी रेंगकर भी जल्दी पहुँच जाता है , पर बड़ाबाजार के ट्रैफिक में गाड़ी में आदमी बैठा का बैठा रह जाता है।
  2. कहा कि सेठजी , अगर आदमी को ईमान से पेट भरना हो , तो उतने ही पाँव फैलाने चाहिए , जितनी उसकी चादर हो।

3.जयदीप मन की बात मन में रखने की उक्ति – ‘ पेट में रखो तो लाख की मुँह से निकले तो खाक की ‘ – का इरमिज कायल नहीं था।

4“बूँद – बूँद से घड़ा भरता है, “वह अपने हजारों मुहावरों से एक जब – तब निकाल लेता- “ घोड़ा घास से यारी करेगा , तो खाएगा क्या ? है कि नहीं ? “ – कहकर वह जोर का .. ठहाका लगाता।

भाषा के अंतर्गत यह भी देखा जाता है कि क्या लेखक ने प्रतीकों, बिम्बों तथा उपमानों की भाषा का प्रयोग किया है? इन तत्वों के प्रयोग से भाषा की प्रभाव – क्षमता काफी बढ़ जाती है। उपन्यास में इनके प्रयोग अनेक जगह देखने को मिलते हैं-

1.उपन्यास का नाम ही प्रतीकात्मक है। लेखिका ने जानकीदास तेजपाल मेनशन नाम एक प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया है। यह प्रतीक है पूरे देश का जिसका ढ़हाया जाना तय है। राजनीति, प्रशासन और पुलिस के बीच बिचौलियों का तंत्र सबसे कमजोर को सबसे पहले बेदखल करने में लगा हुआ है।

2.लेखिका ने जानकीदास तेजपाल मेनशन को उपमा के रूप में भी प्रयोग किया। इस मेनशन को जिस तरह नष्ट किया जा रहा है, ठीक उसी के समान कैसे आधुनिकता और विकास इतिहास को नष्ट करता है। कैसे एक ईमानदार इंसान इस व्यवस्था के कारण बेईमान बन जाता है।

3.यहां पर देख सकते हैं कि आदमी की उपमा घोड़े के साथ दी गयी है- उच्छल घोड़ा – यानी उछलने वाला घोड़ा। यानी कि वह गया- गुजरा आदमी , जो बेवजह उछलता है और अन्त में गिरकर हाथ – पैर तोड़ लेता है।

4.लेखिका ने बिम्बों का भी बहुत ही सुंदर प्रयोग इस उपन्यास में किया है। पूरा उपन्यास कलकत्ता की पृष्ठभूमि पर लिखा गया है। उपन्यास को पढ़ते समय हमें बड़ाबाजार, सेंट्रल एवेन्यू, जादवपुर विश्वविद्यालय का बिम्ब दिखाई देता है।

लेखिका ने व्यंग्य का प्रयोग बड़े ही सटीक तरीके से किया है। इसके प्रयोग से समाज की विकृतियों पर जोरदार तरीके से चोट करना संभव होता है। कोलकाता का बंगाली समाज सोचता है कि वह प्रवासी होकर भी वह दूसरों पर अहसान करता है। लेखिका का कथन है- कलकत्ता के बंगालियों को तो देखकर ऐसा ही लगता है। पर मजे की बात कि बंगाली भले ही दिल्ली में रहे या पेरिस या न्यूयॉर्क में , ऐसे रहता है जैसे वह प्रवासी होकर भी दूसरों पर अहसान कर रहा हो। एकाध रवीन्द्रनाथ या सत्यजीत राय क्या हो गए , हर बंगाली को लगता है कि उसकी संस्कृति का साम्राज्य दुनिया भर में फैला है।

लेखिका ने उपन्यास में फ्लैशबैक शैली का अत्यंत रमणीय और रोचक प्रयोग किया है। जिसमें देखने को मिलता है कि कैसे वह कहानी लिखते-लिखते तुरंत फ्लैशबैक में बार-बार चली जाती है।

उपन्यास की भाषा शैली आकर्षक, रोचक, सहज और सरल है। भाषा में मुहावरे, लोकोक्तियां, कहावतों के साथ-साथ व्यंग्य का बड़ा ही सुंदर प्रयोग किया गया है, जिससे भाषा की प्रभाव क्षमता काफी बड़ी है।

किसी भी रचना की संवाद योजना उतनी ही महत्वपूर्ण होती है, जितनी रचना की भाषा। चरित्रों के मध्य सीधी बातचीत कराई जाए तो प्रभाव क्षमता बढ़ जाती है और पाठक सीधे चरित्रों से रूबरू होता है।

अलका सरावगी ने इसका पूरी तरह ख्याल रखा है। उपन्यास की पहली लाइन से ही वे पाठक को खींच लेती हैं- चलते रहो। चलते रहो। पीछे मुड़कर मत देखो। तेज मत चलो। ऐसे चलो जैसे कुछ हुआ ही न हो तुम हाँफ क्यों रहे हो ? चलते जाओ ‘ – अपने से बात करता जयदीप उसी तरह चलता रहा। उसने रुककर पीछे मुड़कर देखा और न अपनी चाल तेज की।

उपन्यास के प्रारंभ होते ही पाठक को ऐसा महसूस होता है कि वह स्वयं से बात कर रहा हो।

हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध आलोचक नामवर सिंह का कथन है- अलका जी 21वीं सदी की लेखिका हैं। इनकी लेखनी का शिल्प आकृष्ट इस तरह से करता है कि अतीत और वर्तमान की आवाजाही होती रहती है। लेखक और मुख्य पात्र के बीच एक मुख्य संवाद चलता रहता है।

लेखिका ने संवाद को छोटे-छोटे, कसा हुआ, चुस्त और गतिशील रखा है। जिससे शैली और बेहतर हो गई है और कथानक को भी गति देने में सहायता मिली है।

एक अच्छी रचना में ‘देश व काल’ संबंधित सूचनाएं मौजूद रहती है। यह सूचनाएं तत्कालीन परिस्थितियों के द्वारा भी दी जाती हैं ताकि रचना उस काल के साथ-साथ वर्तमान काल में भी प्रासंगिक बनी रहे। जानकीदास तेजपाल मेनशन में एक भी तिथि या वर्ष से संबंधित सूचना तो नहीं मिलती लेकिन 1970 के दशक परिस्थितियों की झलक देखने को मिलती है। जब भारत में पहली बार मेट्रो रेल की पटरियां बिछानी शुरू हुई थी। इसके अलावा अमेरिका में जो परिस्थितियां थीं उसका भी बड़ा ही सटीक चित्रण किया गया है। लेकिन देश संबंधित सूचनाओं में कलकत्ता शहर का नाम आता है, बल्कि यह उपन्यास पूरी तरह से कलकत्ता शहर की पृष्ठभूमि पर रचा गया है। इसीलिए जानकीदास तेजपाल मेनशन काल का अतिक्रमण तो कर पाता है लेकिन देश का अतिक्रमण करने में यह उपन्यास सफल नहीं हुआ है क्योंकि इसकी पूरी कथा कलकत्ता की पृष्ठभूमि पर ही आधारित है।

जहां तक वातावरण को देखें। यह उपन्यास अपने समय के वातावरण का पूरा सटीक चित्रण करता है। 1970 के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक वातावरण का चित्रण देखने को मिलता है। उस समय की राजनीति के बीच बिचौलियों का तंत्र सबसे कमजोर को सबसे पहले बेदखल करने में कैसे लगा हुआ है। इसका बड़ा ही मार्मिक चित्रण लेखिका ने तेजपाल मेनशन नामक कोठी के ढह जाने के संकेत से दिया है। लेखिका ने परिवेश को इतना जीवंत बना दिया है कि पाठक स्वयं को उसी वातावरण के भीतर महसूस करने लगता है।

निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि अलका सरावगी जी ने “जानकीदास तेजपाल मेनशन” की रचना बड़े ही मार्मिक तरीके से की है, जिसमें कलकत्ता शहर केंद्र में रहता है। कलकत्ता की अपनी एक खास रूमानियत है। मारवाड़ी और बंगाली इन दोनों संबंधों का अनोखा संगम इस उपन्यास में देखने को मिलता है। इस उपन्यास पर अशोक सेकसरिया की टिप्पणी बड़ी गहरी है। उन्होंने अपनी छोटी सी टिप्पणी में पूरे उपन्यास को समेट दिया है। कहते हैं- “जो सतह पर दिखता है , वह अवास्तविक है। कलकत्ता के सेंट्रल एवेन्यू पर ‘ जानकीदास तेजपाल मैनशन ‘ नाम की अस्सी परिवारों वाली इमारत सतह पर खड़ी दिखती है , पर उसकी वास्तविकता मेट्रो की सुरंग खोदने से ढहने और ढहाए जाने में है। अंग्रेजी में एक शब्द चलता है ‘ अंडरवर्ल्ड ‘ जिसका ठीक प्रतिरूप हिन्दी में नहीं है। अंडरवर्ल्ड गैरकानूनी ढंग से धन कमाने , सौदेबाजी और जुगाड़ की दुनिया है। इस दुनिया के ढ़ेर सारे चरित्र हमारे जाने हुए हैं, पर अक्सर हम नहीं जानते कि वे किस हद तक हमारे जीवन को चलाते हैं और कब हमें अपने में शामिल कर लेते हैं। तब अपने बेदखल किए जाने की पीड़ा दूसरों को बेदखल करने  में आड़े नहीं आती।

हिन्दी दिवस विशेष – हिन्दी पर हिन्दी के कवियों की कुछ पंक्तियां

-भारतेंदु हरिश्चंद्र
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।
अंग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन
पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।
उन्नति पूरी है तबहिं जब घर उन्नति होय
निज शरीर उन्नति किये, रहत मूढ़ सब कोय।
निज भाषा उन्नति बिना, कबहुं न ह्यैहैं सोय
लाख उपाय अनेक यों भले करे किन कोय।
इक भाषा इक जीव इक मति सब घर के लोग
तबै बनत है सबन सों, मिटत मूढ़ता सोग।
और एक अति लाभ यह, या में प्रगट लखात
निज भाषा में कीजिए, जो विद्या की बात।
तेहि सुनि पावै लाभ सब, बात सुनै जो कोय
यह गुन भाषा और महं, कबहूं नाहीं होय।
विविध कला शिक्षा अमित, ज्ञान अनेक प्रकार
सब देसन से लै करहू, भाषा माहि प्रचार।
भारत में सब भिन्न अति, ताहीं सों उत्पात
विविध देस मतहू विविध, भाषा विविध लखात।
सब मिल तासों छांड़ि कै, दूजे और उपाय
उन्नति भाषा की करहु, अहो भ्रातगन आय।
………
~मैथिलीशरण गुप्त
मेरी भाषा में तोते भी राम राम जब कहते हैं,
मेरे रोम रोम में मानो सुधा-स्रोत तब बहते हैं ।
सब कुछ छूट जाय मैं अपनी भाषा कभी न छोड़ूंगा,
वह मेरी माता है उससे नाता कैसे तोड़ूंगा ।।
……………..
– अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’
पड़ने लगती है पियूष की शिर पर धारा
हो जाता है रुचिर ज्योति मय लोचन-तारा
बर बिनोद की लहर हृदय में है लहराती
कुछ बिजली सी दौड़ सब नसों में है जाती
आते ही मुख पर अति सुखद जिसका पावन नाम ही
इक्कीस कोटि-जन-पूजिता हिन्दी भाषा है वही
जिसने जग में जन्म दिया औ पोसा, पाला
जिसने यक यक लहू बूँद में जीवन डाला
उस माता के शुचि मुख से जो भाषा सीखी
उसके उर से लग जिसकी मधुराई चीखी
जिसके तुतला कर कथन से सुधाधार घर में बही
क्या उस भाषा का मोह कुछ हम लोगों को है नहीं
…………………..
– गोपाल सिंह नेपाली
दो वर्तमान का सत्य सरल,
सुंदर भविष्य के सपने दो
हिंदी है भारत की बोली
तो अपने आप पनपने दो
यह दुखड़ों का जंजाल नहीं,
लाखों मुखड़ों की भाषा है
थी अमर शहीदों की आशा,
अब जिंदों की अभिलाषा है
मेवा है इसकी सेवा में,
नयनों को कभी न झंपने दो
हिंदी है भारत की बोली
तो अपने आप पनपने दो
…………..
– गिरिजा कुमार माथुर
उच्चवर्ग की प्रिय अंग्रेजी
हिंदी जन की बोली है
वर्ग भेद को खत्म करेगी
हिंदी वह हमजोली है,
सागर में मिलती धाराएँ
हिंदी सबकी संगम है
शब्द, नाद, लिपि से भी आगे
एक भरोसा अनुपम है
गंगा कावेरी की धारा
साथ मिलाती हिंदी है
……………
– अटल बिहारी वाजपेयी
गूंजी हिंदी विश्व में
गूंजी हिन्दी विश्व में, स्वप्न हुआ साकार
राष्ट्र संघ के मंच से, हिन्दी का जयकार
हिन्दी का जयकार, हिन्दी हिन्दी में बोला
देख स्वभाषा-प्रेम, विश्व अचरज से डोला
कह कैदी कविराय, मेम की माया टूटी
भारत माता धन्य,स्नेह की सरिता फूटी।
…………………
~गिरिजा कुमार माथुर
एक डोर में सबको जो है बाँधती
वह हिंदी है,
हर भाषा को सगी बहन जो मानती
वह हिंदी है।
भरी-पूरी हों सभी बोलियां
यही कामना हिंदी है,
गहरी हो पहचान आपसी
यही साधना हिंदी है
………………..
– केदारनाथ सिंह
जैसे चींटियाँ लौटती हैं
बिलों में
कठफोड़वा लौटता है
काठ के पास
वायुयान लौटते हैं एक के बाद एक
लाल आसमान में डैने पसारे हुए
हवाई-अड्डे की ओर
ओ मेरी भाषा
मैं लौटता हूँ तुम में
जब चुप रहते-रहते
अकड़ जाती है मेरी जीभ
दुखने लगती है
मेरी आत्मा।

हिन्दी दिवस विशेष – सबसे शुद्ध और विज्ञान सम्मत भाषा है हिन्दी

हिन्दी आज भारत में ही नहीं बल्कि विश्व के विराट फलक पर अपने अस्तित्व को आकार दे रही है। आज हिन्दी विश्व भाषा के रूप में मान्यता प्राप्त करने की ओर अग्रसर है। अब तक भारत और भारत के बाहर सात विश्व हिन्दी सम्मेलन आयोजित हो चुके हैं। पिछले सात सम्मेलन क्रमश: नागपुर (1975), मॉरीशस (1976), नई दिल्ली (1983), मॉरीशस (1993),त्रिनिडाड एंड टोबेगो (1996), लंदन (1999), सूरीनाम (2003) में हुए थे। अगला विश्व हिन्दी सम्मेलन 2007 में न्यूयार्क में होगा।

वर्तमान में आर्थिक उदारीकरण के युग में बहुराष्ट्रीय देशों की कंपनियों ने अपने देशों (अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, चीन आदि) के शासकों पर दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया है ताकि वहां हिन्दी भाषा का प्रचार-प्रसार तेजी से बढ़े और हिन्दी जानने वाले एशियाई देशों में वे अपना व्यापार उनकी भाषा में सुगमता से कर सकें। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी की प्रगति यदि इसी प्रकार होती रही तो वह दिन दूर नहीं जब हिन्दी संयुक्त राष्ट्र संघ में एक अधिकारिक भाषा का रूप हासिल कर लेगी। वर्तमान में मातृभाषियों की संख्या के दृष्टिकोण से विश्व की भाषाओं में मंदारिन [चीनी] भाषा के बाद हिन्दी का दूसरा स्थान है। चीनी भाषा के बोलने वालों की संख्या हिन्दी भाषा के बोलने वालों से अधिक है। परन्तु मंदारिन भाषा का प्रयोग क्षेत्र हिन्दी की तुलना में सीमित है और अंग्रेज़ी भाषा का प्रयोग क्षेत्र हिन्दी की अपेक्षा अधिक है किन्तु हिन्दी के मातृभाषियों की संख्या अंग्रेज़ी भाषियों से अधिक है।

अंग्रेजी के मूल क्षेत्र माने जाने वाले देशों की वर्तमान जनसँख्या देखें तो अमेरिका की जनसंख्या 31 करोड़, ग्रेट-ब्रिटेन की जनसंख्या 6.50 करोड़, कनाडा की जनसंख्या 3.6 करोड़, आस्ट्रेलिया की जनसंख्या सवा दो करोड़), आयरलैंड की जनसंख्या 65 लाख और न्यूजीलैंड की जनसंख्या 50 लाख है। इनकी कुल जनसंख्या वर्तमान में 44.25 करोड़ के आस-पास है। जबकि इसी वर्ष भारत की जनसंख्या 131 करोड़ से अधिक है। भारत के लगभाग 70 प्रतिशत लोग राजकाज, जनसंचार, शिक्षा, व्यापार या घर के बाहर संपर्क के लिए हिन्दी का उपयोग करते हैं। इस आधार पर हिन्दी का व्यवहार करने वालों की संख्या 90 करोड़ हो जाती है। जो विश्व भर में अंग्रेजी के गढ़ वाले देशों की देशों की कुल जनसंख्या के लगभग दो गुना से भी अधिक है। यदि भारत में आधे लोगों को भी हिन्दी व्यवहार करने वालों में गिना जाए तब भी अंग्रेजी की तुलना में हिन्दी का ही पलड़ा भारी पड़ता है और हिन्दी विश्व की दूसरी प्रमुख भाषा बन जाती है। किन्तु अगर इसमें मारीशस, फिजी, सूरीनाम, गुयाना, पड़ोसी नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश विश्व के अन्य देशों में बसे हिन्दी बोलने, जानने वालों की संख्या भारतवंशियों जोड़ दें तो हिन्दी मंदारिन को पछाड़कर विश्व की सबसे बड़ी भाषा है।

आज वैश्विक स्तर पर यह सिद्ध हो चुका है कि हिन्दी भाषा अपनी लिपि और ध्वन्यात्मकता (उच्चारण) के लिहाज से सबसे शुद्ध और विज्ञान सम्मत भाषा है। हमारे यहां एक अक्षर से एक ही ध्वनि निकलती है और एक बिंदु (अनुस्वार) का भी अपना महत्व है। दूसरी भाषाओं में यह वैज्ञानिकता नहीं पाई जाती। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ग्राह्य भाषा अंग्रेज़ी को ही देखें, वहां एक ही ध्वनि के लिए कितनी तरह के अक्षर उपयोग में लाए जाते हैं जैसे ई की ध्वनि के लिए ee (see) i (sin) ea (tea) ey (key) eo (people) इतने अक्षर हैं कि एक बच्चे के लिए उन्हें याद रखना मुश्किल हैं, इसी तरह क के उच्चारण के लिए तो कभी c (cat) तो कभी k (king)। ch का उच्चारण किसी शब्द में क होता है तो किसी में च। ऐसे सैंकड़ों उदाहरण आश्चर्य की बात है कि ऐसी अनियमित और अव्यवस्थित, मुश्किल अंग्रेजी हमारे बच्चे चार साल की उम्र में सीख जाते हैं बल्कि अब तो विदेशों में भी हिंदुस्तानी बच्चों ने स्पेलिंग्स में विश्व स्तर पर रिकॉर्ड कायम किए हैं, जबकि इंग्लैंड में स्कूली शिक्षिकाएं भी अंग्रेज़ी की सही स्पेलिंग्स लिख नहीं पातीं।

हमारे यही अंग्रेजी भाषा के धुरंधर बच्चे कॉलेज में पहुंचकर भी हिन्दी में मात्राओं और हिज्जों की गलतियां करते हैं और उन्हें सही हिन्दी नहीं आती जबकि हिन्दी सीखना दूसरी अन्य भाषाओं के मुकाबले कहीं ज्यादा आसान है। ऐसे में हिन्दी की उपेक्षा और उसके राष्ट्रभाषा न बन पाने के कारणों का त्वरित और गम्भीरता पूर्वक अध्ययन कर समाप्त कर हिन्दी को हिन्दुस्तान के मस्तक पर सजाना होगा। वेब, विज्ञापन, सिनेमा और बाजार के क्षेत्र में हिंदी की मांग जिस तेजी से बढ़ी है, वैसी किसी और भाषा में नहीं। विश्व के लगभग 150 विश्वविद्यालयों तथा सैकड़ों छोटे-बड़े केंद्रों में विश्वविद्यालय स्तर से लेकर शोध स्तर तक हिंदी के अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था हुई है। विदेशों में 35 से अधिक पत्र-पत्रिकाएं लगभग नियमित रूप से हिंदी में प्रकाशित हो रही हैं। यूएई में ‘हम एफ-एम’ हिन्दी रेडियो प्रसारण सेवा है, इसी प्रकार बीबीसी, जर्मनी के डायचे वेले, जापान के एनएचके वर्ल्ड और चीन के चाइना रेडियो इंटरनेशनल की हिंदी सेवा विशेष रूप से उल्लेखनीय है। विदेशों में चालीस से अधिक देशों के 600 से अधिक विश्वविद्यालयों और स्कूलों में हिन्दी पढ़ाई जा रही है।

दो हिन्दी अंतर्जाल पत्रिकाएं जो विश्व में प्रतिमाह 6,000 से अधिक लोगों द्वारा 120 देशों में पढ़ी जाती हैं। अभिव्यक्ति व अनुभूति www.abhivykti-hindi.org तथा www.anubhuti-hindi.org के पते पर विश्वजाल (इंटरनेट) पर मुफ्त उपलब्ध हैं। ब्रिटेनवासियों ने हिन्दी के प्रति बहुत पहले से रुचि लेनी आरंभ कर दी थी। गिलक्राइस्ट, फोवर्स-प्लेट्स, मोनियर विलियम्स, केलाग होर्ली, शोलबर्ग ग्राहमवेली तथा ग्रियर्सन जैसे विद्वानों ने हिन्दीकोष व्याकरण और भाषिक विवेचन के ग्रंथ लिखे हैं। लंदन, कैंब्रिज तथा यार्क विश्वविद्यालयों में हिन्दी पठन-पाठन की व्यवस्था है। यहां से प्रवासिनी, अमरदीप तथा भारत भवन जैसी पत्रिकाओं का प्रकाशन होता है। बीबीसी से हिन्दी कार्यक्रम प्रसारित होते हैं। फिज़ी में ‘रेडियो नवरंग’ एकमात्र ऐसा रेडियो स्टेशन है, जो 24 घण्टों तक हिंदी कार्यक्रम पेश कर रहा है। फिज़ी सरकार सूचना मंत्रालय के माध्यम से ‘नव ज्योति’ नामक त्रैमासिक पत्रिका भी निकालती है।

आइये देखते हैं विश्व में हिन्दी के पठन-पाठन से सम्बंधित कुछ महत्वपूर्ण जानकारी-

विश्व के मानचित्र में फ्रांस का एक विशेष स्थान है। फ्रांस के पेरिस शहर में सौरबेन विश्वविद्यालय में 3 वर्ष के पाठ्यक्रम के अलावा पीएचडी के लिए शोध की भी व्यवस्था है। ‘’पेरिस के प्राच्य भाषाओं एवं सभ्यताओं के राष्ट्रीय संस्थान’’ में हिंदी में 2 वर्ष का सर्टिफिकेट कोर्स, 3 साल का डिप्लोमा, 4 साल में उच्च डिप्लोमा, 5 साल और 6 साल के उच्च अध्ययन के शिक्षण की भी व्यवस्था है।

जापान: जापान के टोक्यो और ओसाका विश्वविद्यालयों में हिंदी का छह वर्षीय कोर्स है। इसके अलावा अन्य विश्वविद्यालयों एवं कॉलेजों में हिंदी वैकल्पिक विषय के रूप में द्वितीय एवं तृतीय भाषा के रूप में पढ़ाई जाती है। सन 1992 के करीब जापान का एक हिंदी स्कॉलर काफी समय तक भारत में रहने के उपरांत शिकागो गया और वहां पर हिंदी का एक वृहत् पुस्तकालय देखकर उस जापानी विद्वान ने भारत में अपने एक मित्र प्रोफ़ेसर को पत्र लिखा था कि यहां के हिंदी पुस्तकालय को देखकर दिल्ली विश्वविद्यालय के पुस्तकालय को शर्मिंदा होना पड़ेगा। तो ऐसी है हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी।

कनाडा: कनाडा की यूनिवर्सिटी आफ ब्रिटिश कोलंबिया में हिंदी का 2 वर्ष का पाठ्यक्रम है। मॉन्ट्रियल विश्वविद्यालय में प्रारंभिक स्तर पर और अटावा शहर में बने मुकुल हिंदी हाई स्कूल में 1971 से सभी कक्षाओं में और टोरंटो शहर के कुछ स्कूलों में भी हिंदी पढ़ाई जाती है।

संयुक्त राज्य अमेरिका। संयुक्त राज्य अमेरिका के 30 विश्वविद्यालयों में उच्च, इंटरमीडिएट एवं प्रारंभिक स्तर पर एक विषय के रूप में पढ़ाई जाती है। संयुक्त राज्य अमेरिका में येन विश्वविद्यालय में 1815 से ही हिन्दी की व्यवस्था है। 1875 में कैलाग ने हिन्दी भाषा का व्याकरण तैयार किया था। अमरीका से हिन्दी जगत प्रकाशित होती है। कैलिफोर्निया, कोलंबिया, विस्कॉन्सिन, पेनसिलवेनिया, वर्जीनिया, टेक्सास, वाशिंगटन और शिकागो आदि विश्व विद्यालयों में हिंदी का भाषा केंद्रित अध्यन होता है।

नार्वे: नार्वे के ओसलो विश्वविद्यालय में मास्टर डिग्री के लिए हिंदी का पठन-पाठन किया जाता है तथा कुछ अन्य शहरों में भी प्राथमिक स्तर के स्कूलों में हिंदी पढ़ाई जाती है। स्वीडन के स्काटहोम विश्वविद्यालय में हिंदी का आधारभूत पाठ्यक्रम पढ़ाया जाता है. उप्पसला विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाई जाती है।

दक्षिण अफ्रीका: दक्षिण अफ्रीका के यूनिवर्सिटी आफ डरबन में [डरबन शहर] में स्नातक और स्नातकोत्तर डिग्री के लिए हिन्दी पठान की व्यवस्था है। 50 विद्यालयों में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति वर्धा की परीक्षाओं के लिए हिंदी पढ़ाई जाती है।

चीन: चीन के बीजिंग विश्वविद्यालय में ‘’पूर्वी भाषाएं और साहित्य विभाग’’ में स्नातक डिग्री के लिए हिंदी की पढ़ाई होती है।

ब्रिटेन: ब्रिटेन के लंदन विश्वविद्यालय एवम कैंब्रिज विश्वविद्यालय में बीए एम्ए. के स्तर पर ‘’भाषा विज्ञान’’ विषय के रुप में हिंदी के अध्यापन की व्यवस्था है।

जर्मनी: जर्मनी के हुम्बोल्ट विश्वविद्यालय, बर्लिन स्थित फ्री विश्वविद्यालय, बर्लिन स्थित ही लीपजिंग विश्वविद्यालय, मार्टिनलूथर विश्वविद्यालय, बान विश्वविद्यालय, हाईडेलबर्ग विश्वविद्यालय, और हैम्बर्ग विश्वविद्यालय में नियमित रुप से हिंदी पढ़ाई जाती है। यहां के अन्य कई विश्वविद्यालयों में भी हिंदी पढ़ाई जाती है।

रूस: रूस में मास्को स्थित ‘’प्राच्य अध्ययन संस्थान’’ और पेतेरबर्ग स्थित ‘’प्राच्य भाषा संस्थान’’ में 1920 से हिंदी पढ़ाई जा रही है। व्लादिवोस्तोक स्टेट यूनिवर्सिटी में भी हिंदी पढ़ाई जाती है।

स्विट्ज़रलैंड: स्विट्ज़रलैंड में लवसाने और ज्यूरिख के विश्वविद्यालयों में हिंदी के प्रारंभिक पाठ्यक्रम पढ़ाये जाते हैं।

इटली: इटली के नेपल्स और वेनिस विश्वविद्यालयों में इन्डोलाजी एंड फॉरईस्ट विभागों में हिंदी के उच्च स्तरीय पठन की व्यवस्था है। मिलान इंस्टिट्यूट फॉर मिडिल ईस्ट, मिलानविश्वविद्यालय और ट्यूरिन विश्वविद्यालय के ‘’आधुनिक आर्य परिवार की भाषाओं का विभाग’’ में हिंदी की शिक्षा दी जाती है।

हालैंड: हालैंड के लायडन विश्वविद्यालय में हिंदी का 4 वर्षीय शिक्षण पाठ्यक्रम है। इसके अलावा निजी संगठन भी हिंदी सिखाते हैं।

ऑस्ट्रेलिया: ऑस्ट्रेलिया के कैनबरा स्थित विश्वविद्यालय में स्नातक स्तर पर ऐच्छिक विषय के रूप में हिंदी का अध्ययन होता है। लात्रोवे, मोनाश तथा क्वींसलैंड के विद्यापीठों में भी हिंदी पढ़ाई जाती है, अन्य देशो जैसे डेनमार्क, पोलैंड, चेक गणराज्य, हंगरी, दक्षिण कोरिया, मैक्सिको, क्यूबा, बेल्जियम, ऑस्ट्रिया, फिनलैंड, रोमानिया, क्रोशिया गणराज्य, मंगोलिया, उज्बेकिस्तान, तजाकिस्तान, तुर्की, थाईलैंड, रीयूनियम, अर्जेंटीना, सऊदी अरेबिया, ओमान, बहरीन, मलेशिया, ताइवान, सिंगापुर, केन्या, कुवैत, इराक, ईरान, तंजानिया, जांबिया, बहरीन, बोत्सवाना और इंडोनेशिया के स्कूलों में हिंदी का अध्यापन होता है।

हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान के कराची लाहौर विश्वविद्यालय तथा इस्लामाबाद की स्कूल ऑफ मॉडर्न लैंग्वेजेस में सर्टिफिकेट और डिप्लोमा स्तर पर हिंदी पढ़ाई जाती है। श्रीलंका में डिग्री कोर्स तक हिंदी पढ़ाई जाती है। हमारे पड़ोसी नेपाल के त्रिभुवन विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर और पीएचडी तक की हिंदी सुविधा है। बांग्लादेश में हिंदी का 4 वर्षीय कोर्स है। भूटान के 8 स्कूलों तथा बर्मा के मंदिरों, धर्मशालाओं व गैर सरकारी स्कूलों में हिंदी पढ़ाई जाती है। तो यह है हमारे पड़ोसी देशों में हिंदी की स्थिति। कुछ ऐसे भी देश हैं, जहां बड़ी संख्या में भारतीय रहते हैं और वहां भाषा के साथ साथ भारतीय संस्कृत को भी आगे बढ़ा रहे हैं। वहाँ हिंदी में पत्र पत्रिकाएं भी निकलती हैं। जैसे मारीशस, फिजी, सूरीनाम, गुयाना, त्रिनिदाद और टोबैगो।

मारीशस: मारीशस के लगभग 350 गैर सरकारी स्कूलों में सांध्यकालीन पढ़ाई होती है। माध्यमिक पढ़ाई के करीब 30 सरकारी और 100 गैर सरकारी विद्यालयों में 25000 विद्यार्थी प्रतिवर्ष हिंदी पढ़ते हैं। यह आंकड़ा बढ़ गया है। महात्मा गांधी संस्थान में डिप्लोमा कोर्स, अध्यापकों के लिए पीजी डिप्लोमा कोर्स 3 वर्ष का, हिंदी में बीए ऑनर्स कोर्स, फिजी में पहली व दूसरी कक्षा में हिंदी शिक्षा का माध्यम है तीसरी कक्षा से हिंदी एक विषय के रूप में पढ़ाई जाती है। विश्वविद्यालयों में भी हिंदी पढ़ाई जाती है। सूरीनाम में सबसे ज्यादा विश्व विद्यालयों में हिंदी एक विषय के रूप में पढ़ाई जाती है। सन 1977 से हिंदी परिषद द्वारा आयोजित पाठ्यक्रमों में तकरीबन एक हजार से ज्यादा छात्र हिंदी की परीक्षाएं देते हैं। भारतीय संस्कृति के केंद्र में भी हिंदी पढ़ाई जाती है। त्रिनिदाद एवं टोबैगो यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टइंडीज और नीहस्ट में दो प्रोफेसर हिंदी पढ़ाते हैं। वेस्टइंडीज विश्वविद्यालय में हिंदी पीठ की स्थापना की गई है। यहां के अनेक विद्यालयों में हिंदी का पठन-पाठन होता है तथा हिंदी के अध्यापकों को प्रशिक्षित किया जाता है। गुयाना में ‘’हिंदी प्रचार’’ सभा द्वारा यहां के मंदिरों में लगभग सब पाठशालाएं हिंदी की प्राथमिक और माध्यमिक परीक्षा की व्यवस्था करती हैं। कुछ माध्यमिक स्कूलों में 6:00 से 8:00 तक हिंदी पढ़ाने का बंदोबस्त है।

हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है अगर हिंदी के विकास में कोई बाधा है, तो स्वयं हम भारतीय। जो अंग्रेजी का मोह नहीं छोड़ पाते। हम स्वयं हिंदी की उपेक्षा करते हैं। हमारे घर में हमारी ही मां उपेक्षित है और दूसरे की मां अंग्रेजी को हम माँ-माँ कहकर चिल्लाते हैं। जो हमें मौसी जैसा भी भाव नहीं देती। किसी विद्वान ने कहा था कि– ‘अगर किसी को गुलाम बनाना है तो पहले उसकी भाषा व संस्कृति को नष्ट कर दो’ वह खुद गुलाम हो जाएगा। वही अंग्रेजों ने किया। हमारी भाषा व संस्कृत को विकृत कर दिया। वह जाते-जाते अपना काम कर चुके थे। अंग्रेजी अपना पैर पसार चुकी थी और आज अंग्रेजी की क्या स्थिति है सब जानते हैं। सबसे ज्यादा अप्रवासी भारतीयों का हिंदी के विकास में योगदान है। हमारे देश में मध्यवर्गीय परिवारों के लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाते हैं हिंदी माध्यम से पढ़ाने में खुद को हीन महसूस करते हैं। इसमें भारत सरकार की कमजोरी है। हर सरकारी कार्यालयों में ज्यादातर कार्य अंग्रेजी में ही किए जाते हैं। जहां भी नौकरी के लिए जाइये पहला सवाल यही होता है- अंग्रेजी आती है कि नहीं? अगर नहीं, तो समझो नौकरी नहीं मिलेगी। इसलिए हिंदी वालों के मन में हीन भावना घर कर गई। आज हर गरीब-अमीर आदमी अपने बच्चे को कान्वेंट स्कूल में भेजना चाहता है। यही कारण है कि आजादी के 70 सालों बाद भी हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं बन पाई। इस मामले में हमें चीन से सबक लेने की जरूरत है जो अपनी राष्ट्रभाषा के प्रति कटिबद्ध है। अंग्रेजों ने जैसे अंग्रेजी को अंतराष्ट्रीय भाषा बनाया उसी तरह अगर हम हिंदी का प्रयोग खुलकर हर जगह करें, पढ़े-पढ़ाएं, हिंदी के प्रति समर्पण, प्रेरणा लें और दें। फिर वह दिन दूर नहीं, जब दुनिया वाले हिंदी के पीछे भागेंगे और हिंदी एक स्थापित अंतर्राष्ट्रीय भाषा होगी। जरूरत है तो अपनी राष्ट्रभाषा के प्रति दृढ़निश्चयी होना, प्रेम होना, हिन्दी को लेकर निराश नहीं होना और उत्साही होना।

(स्रोत साभार – प्रभा साक्षी)

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 भारतीय भाषाओं की वर्णमाला विज्ञान से भरी है। वर्णमाला का प्रत्येक अक्षर तार्किक है और सटीक गणना के साथ क्रमिक रूप से रखा गया है। इस तरह का वैज्ञानिक दृष्टिकोण अन्य विदेशी भाषाओं की वर्णमाला में शामिल नहीं है। जैसे देखे
क ख ग घ ड़ – पांच के इस समूह को “कण्ठव्य” कंठवय कहा जाता है क्योंकि इस का उच्चारण करते समय कंठ से ध्वनि निकलती है। उच्चारण का प्रयास करें।
च छ ज झ ञ – इन पाँचों को “तालव्य” तालु कहा जाता है क्योंकि इसका उच्चारण करते समय जीभ तालू महसूस करेगी। उच्चारण का प्रयास करें।
ट ठ ड ढ ण – इन पांचों को “मूर्धन्य” मुर्धन्य कहा जाता है क्योंकि इसका उच्चारण करते समय जीभ मुर्धन्य (ऊपर उठी हुई) महसूस करेगी। उच्चारण का प्रयास करें।
त थ द ध न – पांच के इस समूह को दन्तवय कहा जाता है क्योंकि यह उच्चारण करते समय जीभ दांतों को छूती है। उच्चारण का प्रयास करें।
प फ ब भ म – पांच के इस समूह को कहा जाता है ओष्ठव्य क्योंकि दोनों होठ इस उच्चारण के लिए मिलते हैं। उच्चारण का प्रयास करें।
(स्रोत साभार – फेसबुक)