Wednesday, April 1, 2026
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मैरी कॉम का ‘गोल्डन पंच’, जीतीं एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप

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स्टार महिला मुक्केबाज मैरी कॉम को करियर में एक और बड़ी कामयाबी हासिल हुई है। मैरी कॉम ने 48 किलोग्राम भार वर्ग में एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप में बुधवार को गोल्ड मेडल जीता। खिताबी मुकाबले में मैरी कॉम ने उत्तरी कोरिया की किम हयांग-मी को हराया। मैरी कॉम को स्वर्णिम सफलता पर पीएम नरेंद्र मोदी ने बधाई दी। पीएम मोदी ने बधाई देते हुए मैरी कॉम से कहा कि देश तुम्हारी सफलता से गौरवान्वित हुआ है।

पूरे टूर्नामेंट में मैरी कॉम सभी बॉक्सरों पर पड़ी भारी

पांच बार की विश्व चैंपियन और वर्तमान राज्यसभा सांसद बॉक्सर एमसी मैरी कॉम ने एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप टूर्नामेंट में जापानी बॉक्सर को हराकर फाइनल में जगह बनाई थी। मैरी कॉम ने 48 किलो लाइट फ्लाइवेट वर्ग के सेमीफाइनल में जापान की सुबासा कोमुरा को 5-0 से करारी मात दी। पूरे टूर्नामेंट में मैरी कॉम जापानी बॉक्सर कोमुरा पर भारी दिखीं।

फाइनल जीतने के बाद लंदन ओलिंपिक ब्रॉन्ज मेडल विजेता मैरी कॉम ने टूर्नामेंट में अपना छठा पदक हासिल कर लिया है। उन्होंने क्वॉर्टरफाइनल में चीनी ताइपे की मेंग चिए पिन को हराकर अंतिम चार में जगह बनाई थी। 35 वर्षीय मैरी कॉम ने इस प्रतियोगिता के पिछले चरणों में चार स्वर्ण और एक रजत पदक जीता है।

एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप में यह 5 वां स्वर्ण पदक है

एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप में मैरी कॉम का यह 5 वां स्वर्ण पदक है। इससे पहले मैरी कॉम ने इस टूर्नामेंट में चार बार स्वर्ण पदक जीता है। मैरी ने साल 2003, 2005, 2010 और 2012 में स्वर्ण पदक हासिल किया। मगर साल 2008 में उन्हें सिल्वर मेडल से ही संतोष करना पड़ा था। मैरी कॉम यहां पिछले 5 साल से 51 किलो भार वर्ग में भाग लेती रही है, लेकिन इस बार उन्होंने 48 किलो भार वर्ग में भाग लिया।

 

जब डॉक्टर भूले अपना फर्ज तो खुद मरीजों का इलाज करने बैठ गये आईएएस

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राजस्थान में डॉक्टरों की हड़ताल से हालात इस कदर बिगड़ गए है कि अब कुछ गैर-पेशेवर लोगों को मरीजों का इलाज करना पड़ रहा है। ऐसा ही एक वाकया बांसवाड़ा शहर में देखने को मिला जब शहर के एडीएम और भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी डॉ. भंवरलाल शहर के हाउसिंग बोर्ड चिकित्सालय में रोगियों को इलाज करते देखे गए।

डॉ. भंवरलाल एक सर्टिफाइड एमबीबीएस डिग्रीधारी डॉक्टर रह चुके हैं और फिलहाल बांसवाड़ा शहर के एडीएम पद पर कार्यरत है। अपने शहर में बिगड़ रहे हालातों को डॉ. भंवरलाल देख नहीं पाए जिसके बाद उन्होंने विभिन्न चिकित्सालयों में जाकर सेवा देने का फैसला किया।

हड़ताल पर भारी पड़ा सराहनीय कदम

डॉ. भंवरलाल ने  कमान संभालते हुए कई मरीजों का इलाज किया । उनके इस कदम की जिला कलेक्टर भगवतीप्रसाद ने भी सराहना की है। इसके साथ ही बांसवाड़ा एडीएम की अच्छी पहल को स्थानीय जनता भी सराहना कर रही है। पीड़ित मानवता की सेवा को आगे आए  एसडीएम का यह प्रयास सेवारत चिकित्सकों की हड़ताल पर भारी पड़ा है।

 

एक हजार बच्चों का पेट भरेंगी ऐश्वर्या 

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फिल्मों में सक्रिय रहने के साथ ही ऐश्वर्या राय बच्चन अब और बड़ा काम करने जा रही है। वे करीब एक हजार बच्चों का पेट भरेंगी और वो भी एक साल तक।  गरीब बच्चों को भोजन उपलब्‍ध करवाने वाली संस्था अन्नमित्र फाउंडेशन मिड डे मील में ऐश्वर्या राय बच्चन भी अपना सहयोग देने वाली हैं। ऐश्वर्या ने अपने 44वें जन्मदिन पर इसका निर्णय लिया था। अन्नमित्र मिड डे मील स्कीम  इंटरनेशनल सोसाइटी के तहत ऐश्वर्या एक साल तक  एक हजार बच्चों के भोजन का खर्च उठाएंगी।  कृष्‍णा कांनशसेनस (इस्कॉन) ने सोमवार को इसकी अधिकारिक जानकारी दी। इस्कॉन के मुख्य राधानाथ स्वामी महाराज ने बताया कि अन्नमित्र फाउंडेशन मिड डे मील योजना 2004 में एक छोटे से कमरे से शुरू की गई थी। उस समय करीब 900 बच्चों के लिए भोजन बनाया जाता था और अब 7 राज्यों में करीब 10 लाख बच्चों को इसके जरिए भोजन उपलब्‍ध करवाया जाता है।

आईएएस अशोक खेमका का 51वीं बार तबादला

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हरियाणा के चर्चित आईएएस अधिकारी डॉ. अशोक खेमका को एक बार फिर तबादले की मार झेलनी पड़ी है। सरकार ने इस बार उन्हें सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग से हटाकर खेल एवं युवा मामले विभाग का प्रधान सचिव लगाया है। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग में खेमका की सक्रियता सरकार को रास नहीं आई। खेमका विभाग में लंबे समय से चले आ रहे भ्रष्टाचार की परतें खोलना शुरू कर चुके थे, अगर और कुछ समय विभाग में रहते तो बड़ी मछलियां बेनकाब हो सकती थीं। खेमका के खुलासों की आंच सीधे सरकार पर आने की भी संभावना थी। विभाग की सरकारी गाड़ी का दुरुपयोग होने का मामला खेमका पहले ही सार्वजिनक कर चुके हैं।
खेमका सहित सरकार ने रविवार देर शाम 13 आईएएस अधिकारियों के नियुक्ति एवं तबादला आदेश जारी किए हैं। खेमका अब खेल मंत्री अनिल विज के विभाग का जिम्मा संभालने जा रहे हैं। विज पहले ही खेमका के मुरीद हैं और अनेक बार उनकी ईमानदारी की तारीफ कर चुके हैं। अब दोनों का एक साथ काम करने का अनुभव कैसा रहेगा, यह भविष्य के गर्भ में है। आईएएस अशोक खेमका ने 51वां तबादला होने के बाद ट्वीट के जरिए मन की टीस उजागर की है। खेमका ने तबादला आदेश जारी होने के बाद आठ बजकर 13 मिनट पर ट्वीट किया। उसमें खेमका ने लिखा कि अनेक काम प्लान किए थे। एक और तबादले की खबर आ गई।
अवतरण एक बार फिर धमाकेदार रहा। निहित स्वार्थ जीत गए। पूर्वानुभव, लेकिन यह अस्थायी है। नए जोश और ऊर्जा के साथ नई शुरूआत करूंगा। सूत्रों के अनुसार खेमका सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के नशा मुक्ति केंद्रों में चल रहे भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने वाले थे, साथ ही बिना पद के हैल्परों की नियुक्तियों का कच्चा चिट्ठा भी उनके हाथ लग गया था। इससे पहले कि वह बड़ा खुलासा करता, उन्हें विभाग से ही चलता कर दिया गया।

 

 

अब दिल खोल कर 280 शब्दों में करें ट्वीट

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अगर आप भी अभी तक ट्विटर पर 140 कैरेक्टर सीमा होने के कारण अपनी पूरी बात नहीं कह पा रहे थे तो आपके लिए बड़ी खबर है। ट्विटर ने अब ट्वीट के 140 कैरेक्टर की सीमा को खत्म कर दिया है। अब आप दिल खोल कर 280 कैरेक्टर में ट्वीट कर सकते हैं। बता दें कि सितंबर से ही ट्वि्टर इस फीचर की टेस्टिंग कुछ यूजर्स के साथ कर रहा था, लेकिन अब इसे आम यूजर्स के लिए भी जारी कर दिया गया है। इसकी जानकारी देते हुए ट्विटर ने अपने ब्लॉग पोस्ट में कहा, ‘हमने सितंबर महीने में 140 कैरेक्टर वाली सीमा को बढ़ाने की प्लानिंग की, ताकि दुनिया के तमाम यूजर्स ट्वीट के जरिए अपनी पूरी बात अपने दुनिया के सामने रख सकें। करीब 45 दिन तक इस फीचर की टेस्टिंग के बाद हमें खुशी हो रही है कि हमने इस अब आम यूजर्स के लिए लॉन्च कर दिया है। अब आपलोग 280 कैरेक्टर में ट्वीट कर सकते हैं।’
बता दें कि ट्विटर के इस फीचर के आने से ठीक एक दिन पहले जर्मनी के दो युवकों ने 35 जार कैरेक्टरमें ट्वीट किया था जिसके बाद उनके अकाउंट्स को कुछ देर के लिए सस्पेंड कर दिया गया था। साथ ही ट्विटर ने इस बग को अब फिक्स कर लिया है।

 

बच्चों को जरूर सिखाएं ‘गुड टच’ और ‘बैड टच’ का फर्क

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आप चाहें कितने पढ़े लिखे क्यों न हों लेकिन जैसे ही अपनों के साथ कुछ बुरा होता है हम कमजोर पड़ जाते हैं। अगर बात अपने बच्चों की हो तो मां-बाप समझ ही नहीं पाते की क्या करें और क्या नहीं। आए दिन बच्चों के यौन शोषण की आती खबरों के बीच हर दिन मां बाप नई-नई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। आज पैरेंट्स को अपने बच्चों के पोषण से ज्यादा उनके साथ होने वाले शोषण की चिंता लगी रहती है।  घर और बाहर बच्चों के साथ बढ़ते सेक्सुअल एब्यूज यानि यौन उत्पीड़न को देखते हुए  जरूरी हो गया है कि माता -पिता, घर के बड़े और टीचर नौनिहालों को सुरक्षित/अच्छे/ सेफ और असुरक्षित/ बुरे /अनसेफ टच /स्पर्श के बारे में बताएं। जब -जब हम इस तरह की घटनाओं के बारे में सुनते हैं, तो हमारी अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर बेचैनी बढ़ जाती है,लेकिन इस तरह की परिस्थिति से लड़ने का बस एक ही तरीका रह जाता है कि हम बातों-बातों में या फिर साफतौर पर अपने बच्चे को सेफ और अनसेफ टच के बारे में बताएं।

बैड टच
बच्चों को अच्छे और बुरे स्पर्श के बीच अंतर बताने के लिए हमें उन्हें पहले ये समझाना होगा कि वो टच जिनके होने से आप सहज (comfertable) रहते हैं और दूसरा वो टच जिसके
होते ही आप असहज, परेशान और उदास हो जाते हैं।

बैड टच ऐसा टच जिसके छुए जाने का अहसास बुरा लगे
-हिटिंग, किकिंग, शेकिंग, बाइटिंग, कस कर पकड़ना, वो टच जिसके होने पर अच्छा न लगे। कोई बिना पूछे आपको छूने की कोशिश करे, छूने के लिए जबरदस्ती करे
-शरीर के प्राइवेट पार्ट्स क्या हैं और उन्हें कोई भी बिल्कुल नहीं छू सकता है।
– प्राइवेट पार्ट्स लिप्स, छाती, पेट के नीचे और कमर के नीचे के अंगों को डॉक्टर और मां के अलावा कोई नहीं छू सकता है।
– किसी अनजान व्यक्ति को अपने प्राइवेट पार्ट्स न दिखाएँ और न ही उन्हें छूने, देखने या रगड़ने दें
बच्चों को सिखाएं कि जब उन्हें कोई परेशान करे या वो अनसेफ महसूस करें तो वो क्या क्या करें-वो सीधेतौर पर
-ना कह दें
-चिल्लाएं
-वहां से भाग जाएँ
-इस बारे में घर पर और बड़ों से बात करें
-कोई आपसे बिना पूछे आपको गले लगाने के लिए जबरदस्ती करे, किस करे

सेफ टच
-आप जिसे प्यार करते हैं जो आपको अच्छा लगता है यदि वो आपको आलिंगन करे और किस करे जो आपको अच्छा लगे वो सेफ टच है।
-अगर आपकी मां आपके सो कर उठने के बाद प्यार और हग करें तो वो सेफ टच है।
-जब आप सोने जा रहे हों और आपके पिता आपको गुड नाइट किस करें
-जब आपके दादा दादी-नाना नानी घर आएं और हग करें

– सिर पर कोई प्यार से हाथ फेरे जिसके फेरे जाने से आपको अच्छा लगे
-अगर कोई शाबाशी देने के लिए प्यार से पीठ थपथपाए
-आपसे पूछ कर आपके माथे पर चुंबन करे, हाथ मिलाना

 

अंधविश्वास से लड़कर डॉक्टर ने बचाई गर्भवती महिला की जान

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तमाम अंधविश्वास, पुराने रीति रिवाज और संसाधनों की कमी की समस्या से लड़ते हुए ओडिशा के एक डॉक्टर ने एक गर्भवती महिला की जान बचाई। ओंकार होटा ने महिला को स्ट्रेचर पर 12 किलोमीटर दूर स्थित प्राइमरी हेल्थ सेटर तक पहुंचाया जिससे उनकी जान बच सकी। ओंकार ओडिशा के पाप्पूलुरु के एक सरकारी प्राइमरी हेल्थ सेंटर में काम करते हैं। अब उनकी सोशल मीडिया की न्यूज़ फीड बधाइयों के मैसेज से भर गई है। घटना को समझने के लिए बीबीसी के प्रवीण कसम ने ओंकार से बात की। उन्होंने कहा, “एक स्थानीय पत्रकार डेबी मैती ने मुझे बताया कि एक गर्भवती महिला की जान खतरे में है और मुझे मदद करने को कहा।”
ओंकार ने बताया , “30 साल की शुभामा मार्सी चित्रकोंडा ब्लॉक के सारीगट्टा गांव में रहती हैं। पब्लिक ट्रांस्पोर्ट से ये गांव पूरी तरह से कटा हुआ है। यहां से पास के गांव में पहुंचने के लिए नदी-नालों और तंग रास्तों से होते हुए 12 किलोमीटर की दूरी तय करनी होती है।”


गांव की मान्यता

डॉक्टर ओंकार कहते हैं, “गांव में कोई मेडिकल सुविधा नहीं होने के कारण डिलीवरी एक झोपड़ी में ही करनी पड़ी। महिला ने एक लड़के को जन्म दिया लेकिन अधिक खून बह जाने के कारण उसकी हालत खराब होने लगी। उसे पास के हेल्थ सेंटर में ले जाना ज़रूरी था” लेकिन इस काम के लिए कोई भी गांव वाला सामने नहीं आया। गांव वालों की मान्यता है कि डिलीवरी के बाद किसी को भी महिला के आसपास नहीं जाना चाहिए। महिला कोंडारेड्डी जाति की है और उस जाति के कई लोग ऐसा ही मानते हैं। उन्होंने बताया, “आखिर में हमें एक आदमी को स्ट्रेचर लेकर साथ चलने के लिए पैसे देने पड़े। महिला का पति, वो पत्रकार जिसने जानकारी दी, और इस हेल्पर ने हेल्थ केयर सेंटर तक चलने में मदद की। मैंने मरीज़ को तुरंत ग्लूको़ज़ की ड्रिप लगाई और अपने सीनियर अधिकारियों को इसकी जानकारी दी। उसकी हालत में सुधार हुआ है और वो खतरे से बाहर है।”
माओवादियों का गढ़

ओंकार के मुताबिक शुभामा की ये तीसरी डिलीवरी थी। इसके पहले डिलीवरी के समय उसके एक बच्चे की मौत हो गई थी। उन्होंने बताया, “ये माओवादियों का गढ़ है। मदद के लिए यहां ना ऐम्बुलेंस है, ना नर्स। मुझे अक्सर ऐसे हालात से गुज़रना पड़ता है, ये मेरे लिए कोई नई घटना नहीं थी। ऐसे हालात में मैं खुद को पहले इंसान और बाद में एक डॉक्टर की तरह देखता हूं।” पूरे घटनाक्रम को याद करते हुए स्थानीय पत्रकार डेबी मैती ने बीबीसी को बताया कि वो अपनी बाइक पहले डॉक्टर के घर पहुंचे और फिर उन्हें लेकर वहां गए जहां डिलीवरी हो रही थी। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने भी सोशल मीडिया पर डॉक्टर की तारीफ की। डॉक्टर की तारीफ करते हुए उन्होंने लिखा कि ओंकार पर ओडिशा को गर्व है।

(साभार – बीबीसी हिन्दी)

राजस्थान के गांवों की सूरत बदल रही है 25 साल की तन्वी

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तन्वी जदवानी 25 साल की हैं। राजस्थान के कम विकसित गांवों में जाकर कमाल का काम कर रही हैं। शिक्षा का अधिकार, सबका अधिकार। तन्वी इस नारे को अपने जीवन का मूलमंत्र समझती हैं। उन्होंने शिक्षा के लिए उदासीन और बाल श्रम के दंश में जकड़े गांव के बच्चों को उनका पढ़ाई-लिखाई का हक दिलाने के लिए बीड़ा उठाया है।

योरस्टोरी से बातचीत में तन्वी ने बताया कि एक पत्रकार के रूप में प्रशिक्षित होने के नाते मुझे समस्याओं की तलाश करना सिखाया गया था। जो कि वास्तव में मैंने तब करना शुरू किया जब मैंने चुरु, राजस्थान के दूर गांवों में स्थित स्कूलों में काम करना शुरू कर दिया। यहां मैंने बच्चों की मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक वृद्धि से संबंधित मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया। वहां सभी पंद्रह कक्षाओं में बच्चे अपनी क्षमता से कम प्रदर्शन कर पा रहे थे। वे बड़े उदासीन से रहते थे, क्लास में बहुत कम ध्यान देते थे और पढ़ाई के दौरान उन्होंने कभी भी कोई सवाल नहीं पूछते थे। लेकिन फिर भी वो रचनात्मक थे और प्रकृति के बारे में उत्सुक रहते थे। मैं उनको नए-नए क्राफ्ट सिखाती थी, उसके लिए वो बड़े उत्साह से हमेशा तत्पर रहते थे। उनकी इस रुचि को देखकर मैंने अपने कक्षाओं में औपचारिक पढ़ाई पर थोड़ा ब्रेक लगा दिया और खेल-खेल में कलात्मक कृतियां तैयार करने पर ज्यादा जोर देने लगी।

तन्वी ने कक्षाओं में बच्चों के साथ ड्राइंग बनाना शुरू कर दिया। उन्हें न सिर्फ दृश्यावली को चित्रित करना सिखाया जाता, बल्कि उनके घरों, परिवार के सदस्यों, मित्रों और पालतू जानवरों को चित्रित करने के लिए भी प्रेरित किया गया। तन्वी ने बच्चों से उनके परिवार के सदस्यों के साथ संबंधों के बारे में बात करना शुरू कर दिया। वो बच्चों के साथ फिल्में देखती हैं और खिलौने बनवाती हैं। बच्चे उन जानवरों के मुखौटे भी बनाते हैं जो वो उस दिन के लिए बनना चाहते हैं। तन्वी ने एक बहुत ही प्यारी रणनीति अपनाई। उन्होंने बच्चों के घरों और परिवार के बारे में एक दूसरे की कहानियों को बताया और इस तरह की गतिविधियों से वो इस बात को समझने के करीब पहुंच गईं कि बच्चे कैसे सोचते हैं, उन्हें किस प्रकार प्रभावित किया जा सकता है और वे क्या पसंद करते हैं और नापसंद करते हैं आदि। तन्वी ने योरस्टोरी से बातचीत में बताया, जल्द ही बच्चे मेरे साथ खुलने लगे और मुझसे प्रश्न पूछे और कक्षा में काफी अधिक ध्यान देने लगे ।

लेकिन हमारी मुलाकात के दौरान मैंने बच्चों के बारे में जाना, उन सब बातों ने मुझे हिलाकर रख दिया। मुझे पता चला कि मेरी कक्षा में सात साल के बच्चों ने खेतों में अपने माता-पिता के साथ कड़ी मेहनत की है, स्कूल के बाद कई किलोमीटर चलकर मवेशी चराने जाते थे। दस साल की छोटी सी उम्र की बच्चियों ने अपने परिवार के लिए पूरा भोजन पकाया करती हैं। उस समय के आसपास, मेरे तीन छात्रों की तेरह साल में ही शादी कर दी गई थी। इस वजह से उन्होंने स्कूल में आना बंद कर दिया था। कुछ बच्चों के माता-पिता शराबी थे, जो घर में नशे में आते थे और नशे में उनको पीटते भी थे। कुछ बच्चों के माता-पिता ऐसे भी थे, जिन्होंने अपनी लड़कियों को घर के बाहर खेलने की इजाजत नहीं दी थी।

तन्वी घंटों इस बात को समझने में लगा देती थीं कि स्कूल के बाद बच्चे कहां समय बिताते हैं को और स्कूल के पर्यावरण पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है। उन्हें पता चला कि इन सभी अनुभवों में एक बात कॉमन थी कि बच्चों पर घर में बहुत कम ध्यान दिया जाता था और उन्हें अक्सर कठिन परिश्रम, शारीरिक और मानसिक हिंसा का सामना करना पड़ता था। और जिन सरकारी स्कूलों में वे पढ़ते थे, वे बेहतर नहीं थे। यहां उन्हें अपने शैक्षणिक प्रदर्शन के लिए दंडित किया गया। इसमें कोई आश्चर्य नहीं था कि उनके पास इतना कम आत्मविश्वास था और उनके लिए पढ़ाई को गंभीरता से लेना बहुत कठिन था। तन्वी को जल्द ही ये एहसास हुआ कि इस तरह का बचपन उनके मानस पर गहरा असर छोड़ सकता है।

इन सबने तन्वी को सरकारी स्कूलों में सहायता प्रणाली शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया। तन्वी बताती हैं कि मुझे पता था कि मैं उन समस्याओं की हल नहीं कर सकती, जो इन बच्चों को घर पर झेलनी पड़ती है लेकिन अगर मैं स्कूल को उस जगह में बदलने की दिशा में काम कर सकती हूं जहां बच्चों के मन को समझने वाला कोई हो। इससे उन्हें भावनात्मक और मानसिक रूप से बढ़ने में मदद मिल सकती है। ताकि उनको अपनी बाधाओं से लड़ने और सफल होने के लिए उचित मौका मिले। मैंने ऐसा करने के लिए तन्वी ने कला का इस्तेमाल किया। वो बच्चों को अपने विचारों और भावनाओं को व्यक्त करने के लिए इन कलाकृतियों को माध्यम बनाने के लिए प्रेरित करने लगीं। तन्वी ने इस प्रयोग में अपने अद्भुत कलाकारों दोस्तों से मदद ली जिन्होंने बच्चों के साथ कला कार्यशालाएं कीं, जहां उन्होंने उन्हें सिखाया कि कैसे एक दूसरे के प्रति संवेदनशील होना है, टीम में कैसे काम करना है, पढ़ाई पर लगातार कैसे केन्द्रित रहना हैऔर खुद को और बेहतर कैसे समझना है। तन्वी ने पाया कि इसके बाद स्कूल के वातावरण में सकारात्मकता आ गई थी। यहां तक कि स्टाफ के सदस्य भी अधिक हंसमुख नजर आने लगे थे। और बच्चों में भी सकारात्मक बदलाव दिखने लगे थे। वे विद्यालय की गतिविधियों में ज्यादा से ज्यादा भाग लेने लगे और अब वो अधिक चौकस और कम हिंसक थे। अब उनमें आत्मविश्वास भी बढ़ गया था।

इन सकारात्मक बदलावों ने मुझे राजस्थान के सभी स्कूलों के लिए कला के माध्यम से सामाजिक और भावनात्मक सीखने की दिशा में काम करने के लिए प्रेरित किया। यह देखते हुए कि कला अभ्यास से मानसिक और भावनात्मक विकास होता है, जिनसे लाभ पाकर बच्चे कक्षा में ज्यादा अच्छा परफॉर्म करते हैं। मैंने इसे एक समस्या का समाधान के रूप में देखा। और इसलिए मेरी फेलोशिप के बाद, मैं उदयपुर में स्थानांतरित हो गई। ये स्थानीय कलाओं से समृद्ध जगह थी और मैंने यहां चार स्कूलों में काम करना शुरू कर दिया। हमारी परियोजना का विचार विभिन्न कला रूपों के माध्यम से सामाजिक और भावनात्मक कौशल सीखना था। हमारी परियोजना के माध्यम से, हम विभिन्न कला रूपों के साथ प्रयोग करते हैं, प्रतिभाशाली कलाकारों के साथ सहयोग करते हैं और बाद में एक पाठ्यक्रम बनाते हैं, जिससे शिक्षकों को बच्चों को सिखाना आसान हो जाता है।

तन्वी कलाकारों के लिए एक सामाजिक मंच बनाकर उदयपुर के अधिक से अधिक सरकारी स्कूलों में अपने कामों का विस्तार करना चाहती हैं। तन्वी के प्रोजेक्ट में चार लोगों की एक टीम हैं जो इस परियोजना पर पूर्ण समय काम करती है। ये लोग वर्तमान में अपनी परियोजना के लिए वित्तीय सहायता की तलाश कर रहे हैं और समर्थन हासिल करने के लिए एक क्राउड फंडिंग अभियान चला रहे हैं।

(साभार – योर स्टोरी)

 

फिर बदला जीएसटी, अब सिर्फ 50 वस्तुओं पर लगेगा 28 प्रतिशत कर

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जीएसटी काउंसिल तय किया है कि अब सिर्फ 50 वस्पतुओं र ही 28 प्रतिशत का अधिकतम टैक्स देना होगा। इस बात की जानकारी देते हुए काउंसिल के अहम सदस्य औऱ बिहार के डिप्टी सीएम सुशील मोदी ने कहा कि जीएसटी परिषद ने 28 प्रतिशत कर दायरे में ज्यादातर लग्जरी, गैर-जरूरी और अहितकर आइटम सहित केवल 50 वस्तुओं को ही रखने का फैसला किया है। इस बैठक में असम के वित्त मंत्री हेमंत बिस्वा शर्मा की अगुआई में गठित मंत्री समूह (GoM) द्वारा कंपोजीशन स्कीम के तहत 1 फीसदी छूट और नॉन एसी रेस्ट्रॉन्ट पर टैक्स घटाने की सिफारिश पर भी विचार किया गया। राज्यों के वित्त मंत्रियों वाला समूह जीएसटी रिटर्न फाइलिंग की प्रक्रिया पर भी विचार हुआ और इसे टैक्सपेयर फ्रैंडली बनाने की बात हुई। GST लागू होने के वक्त कहा गया था कि 4 महीने बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली की अगुआई में पैनल समग्र रूप से टैक्स दरों की समीक्षा करेगा। इसके अलावा रिटर्न फाइलिंग को आसान बनाने और छोटे व मध्यम उद्योगों के लिए राहत की घोषणा की जा सकती है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक रोजमर्रा के इस्तेमाल की वस्तुओं जैसे, शैंपू पर टैक्स में कटौती संभव है। इसे अब 18 फीसदी टैक्स स्लैब में लाया जाएगा। फर्नीचर, इलेक्ट्रिक स्वीच और प्लास्टिक पाइप पर भी राहत मिलेगी। पहले 227 सामान ऐसे थे जिनपर जीएसटी देना होता था। सुशील मोदी ने बताया कि पहले 62 आइटमों को सबसे उच्च कर वाले दायरे में रखा जाना था, लेकिन मीटिंग में काफी चर्चा के बाद कुछ और आइटम उस कैटिगरी में से कम किए गए। अब सिर्फ 50 आइटमों पर ही 28 प्रतिशत टैक्स लगेगा। उन्होंने बताया कि आफ्टर शेव, डिओड्रेंट, वॉशिंग पाउडर, ग्रेनाइट और मार्बल जैसे आइटमों पर अब 18 पर्सेंट टैक्स लगेगा।इसके साथ ही एयरकंडीशन्ड रेस्तरांओं में परोसे जाने वाले भोजन पर भी जीएसटी को 18 फीसदी से घटाकर 12 फीसदी करने पर फैसला इसी बैठक में किया जा सकता है। काउंसिल उन सेक्टर्स में रेट कटौती कर सकती है, जिनमें पुराने टैक्स सिस्टम के तहत वस्तुओं पर एक्साइज से छूट मिली हुई थी या कम वैट लगता था और अब इनपर टैक्स अधिक हो गया है। काउंसिल टैक्स दरों पर उद्योगों की चिंताओं को दूर करना चाहती है इसलिए राजस्व पर असर का अनुमान लगाने के बाद 28 फीसदी टैक्स स्लैब की वस्तुओं पर टैक्स कटौती की जा सकती है। जीएसटी लागू होने के बाद जीएसटी में टैक्स के पांच स्लैब के चलते बड़े कारोबारी परेशान तो हो ही रहे हैं, छोटे कारोबारी भी काफी मुसीबत झेल रहे हैं। कारोबारियों ने तीन स्लैब की वकालत की है। व्यापारियों का यह भी कहना है कि कमोडिटी के नाम को लेकर जो कोड दिए गए हैं, वे भी समस्याएं पैदा कर रहे हैं। कारोबारी चाहते हैं कि एक प्रकार के कारोबार का कोड एक ही कर दिया जाए, इससे ऑनलाइन समस्याएं काफी हद तक दूर हो जाएंगी। इससे शैम्पू, डियोडरेंट, टूथपेस्ट, शेविंग क्रीम, आफ्टरशेव लोशन, जूतों की पॉलिश, चॉकलेट, च्यूइंग गम तथा पोषक पेय पदार्थ जैसी वस्तुएं अब सस्ती हो जाएंगी।

 

बच्चों ने आयोजित किया बच्चों का बाल फिल्मोत्सव

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हाल ही में मालदा में बच्चों ने पहली बार बाल फिल्मोत्सव आयोजित किया। यह 17वां फिल्मोत्सव यूनिसेफ, तलाश और सिने सेंट्रल कोलकाता द्वारा आयोजित किया गया और 12 दिन तक चला। इस बाल फिल्मोत्सव का उद्घाटन मालदा के अतिरिक्त जिलाशासक देवतोष मंडल ने किया। इस आयोजन में ओल्ड मालदा, गाजोल, हबीबपुर और रतुआ ब्लॉक के बच्चों ने भागेदारी की। इस बाल फिल्मोत्सव का उद्देश्य वंचित बच्चों तक पहुँचना था। इस आयोजन की परिकल्पना, प्रबंधन, वॉलेंटियर और मीडिया तक की जिम्मेदारी बच्चों ने उठायी। फिल्मोत्सव की शुरुआत फिल्म चैप्लिन से हुई। समारोह में यूनिसेफ की सम्पर्क विशेषज्ञ मोमिता दस्तिदार, तलाश की एक्जिक्यूटिव डायरेक्टर आयशा सिन्हा और सिने सेंट्रल के संयुक्त सचिव प्रणव दासगुप्त भी उपस्थित थे।