कोलकाताः मुंबई की चित्रकार राखी बैद की एकल कला प्रदर्शनी भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) की अवनिंद्रनाथ टैगोर गैलरी में सम्पन्न हुई। प्रदर्शनी का संयोजन सिटी आर्ट फैक्ट्री की ओर से किया गया, जिसके क्यूरेटर शांतनु रॉय हैं। प्रदर्शनी का उद्घाटन करने के बाद मुख्य अतिथि अंतरराष्ट्रीय ख्याति के फ़िल्मकार सुदीप रंजन सरकार ने कहा कि ज़िन्दगी की आपाधापी व तनावपूर्ण कार्यों के बीच इन रंगों का सान्निध्य सुकून देता है और हमें नये सिरे से तरोताज़ा करता है। विशेष अतिथि व प्रख्यात वरिष्ठ मूर्तिकार शंकर घोष ने कहा कि राखी बैद के कुशल कलाकार हैं और वे जानती हैं कि रंगों के ज़रिये कैसे अपनी बात कही जाये। लेखक-चित्रकार डॉ.हृदय नारायण सिंह ने कहा कि श्रीकृष्ण का जीवन सदैव से कलाकारों को आकृष्ट करता रहा है, उनके जीवन में जितने शेड्स हैं वे किसी अन्य पौराणिक पात्र में नहीं। जलरंगों के विशेष तौर पर चर्चित मुंबई के चित्रकार समीर मंडल ने राखी बैद को एक महत्वपूर्ण चित्रकार बताया। प्रदर्शनी का नाम कृष्णांश था जिसमें श्रीकृष्ण व राधा से जुड़े विभिन्न प्रसंगों को चित्रकार राखी बैद ने खूबसूरती से उकेरा है और रंगों से उन्हें और अर्थवान बनाया है। यह राखी बैद की ग्यारहवीं एकल कला प्रदर्शनी थी। उन्होंने साठ से अधिक सामूहिक कला प्रदर्शनी में हिस्सेदारी की है।
शहीद पायलट के अंतिम संस्कार में नवजात बच्ची को लेकर पहुंची पत्नी
देश की रक्षा करने के लिए सेना के जवान कितने त्याग करते हैं, इसका अंदाजा शायद ही आपको हो। घर-परिवार और अपने सगे संबंधियों से हमेशा दूर रहकर अपनी पूरी जिंदगी बिताने वाले जवानों के लिए यह देश हमेशा उनका ऋणी रहेगा। जवानों के साथ ही उनके परिवार को भी त्याग करना पड़ता। अपने सपूत या पति से हमेशा दूर रहकर उनकी मां और पत्नी किस परिस्थिति में रहते होंगे, इसकी सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है। और यही जवान जब देश की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे देते हैं तो परिवार को असहनीय दर्द का सामना करना पड़ता है। इसीलिए उनकी हिम्मत और हौसले की दाद देनी होगी। कुछ ऐसी ही स्थिति असम में जान गंवाने वाले इंडियन एयरफोर्स के विंग कमांडर दुष्यंत वत्स के अंतिम संस्कार में देखने को मिली।
भारतीय वायुसेना में विंग कमांडर दुष्यंत वत्स की जान 15 फरवरी को माजुली जिले में माइक्रोलाइट विमान के दुर्घटनाग्रस्त होने से चली गई थी। उनके साथ विमान में एक और पायलट की भी जान गई थी। वत्स के अंतिम संस्कार की एक तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। इस तस्वीर में दुष्यंत वत्स की पत्नी मेजर कुमुद डोगरा अपने पति के अंतिम संस्कार में जाते हुए दिख रही हैं। इस तस्वीर में मेजर कुमुद की गोद में उनकी पांच दिन की बच्ची भी है। इस दृश्य को देखकर वहां अंतिम संस्कार में मौजूद सभी लोगों की आंखे नम हो गईं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक विंग कमांडर वत्स अपनी बच्चों को भी नहीं देख सके थे।
मेजर कुमुद सेना में नर्सिंग ऑफिसर हैं। इंडियन एयरफोर्स का माइक्रोलाइट वायरस SW-80 बीते 15 फरवरी को दोपहर 1 बजे के करीब क्रैश हो गया था। एयरक्राफ्ट ने जोरहट एयरफोर्स स्टेशन से लगभग 11.30 बजे अपनी उड़ान भरी थी। यह चॉपर दोपहर में रूटीन के अनुसार जोरहाट एयरबेस से उड़ा था। लगभग 12.45 के आसपास विमान ने एयर ट्रैफिक कंट्रोल से अपना संपर्क खो दिया। तेजपुर में रक्षा प्रवक्ता लेफ्टिनेंट कर्नल हर्षवर्धन पांडेय ने इस दुर्घटना में विंग कमांडर जे पॉल जेम्स और दुष्यंत वत्स की मौत की पुष्टि की। उन्होंने बताया कि घटना के जांच के आदेश दे दिए गए हैं।
हादसे के बाद चॉपर का मलबा घटनास्थल के पास देखा गया था, जिसके बाद जांच के आदेश दिए गए। अधिकारियों के अनुसार, एयरक्राफ्ट हादसा तकनीकी खामियों के कारण हुआ था। हादसे के वक्त वहां मौजूद लोगों ने बताया कि क्रैश होने से पहले एयरक्राफ्ट में आग लग गई थी। यह जगह जिला मुख्यालय से 18 किलोमीटर दूर है। इंडियन एयरफोर्स की टीम पुलिस के साथ मौके पर पहुंची और विंग कमांडर के शव को अपने कब्जे में लिया। इसके पहले 6 अक्टूबर 2017 को अरुणाचल प्रदेश के तवांग जिले में एक एयरक्राफ्ट दुर्घटनाग्रस्त हो गया था जिसमें सवार सभी 7 लोगों की मौत हो गई थी।
त्वचा को न लगे होली के रंगों की नजर
बिना रंगों के होली का कोई मजा नहीं होता हैं मगर कई बार होली खेलते समय सिंथेटिक रंगों की वजहों से चेहरे पर रुखापन और रेशेज की समस्या रह जाती है। होली खेलने के कई दिनों तक चेहरे से सिंथेटिक या केमिकलयुक्त कलर जाने में कई दिन लग जाते हैं। लेकिन अगर आप भी अपने चेहरे पर मौजूद होली के रंगों से छुटकारा पाना चाहते है तो उसके लिए घरेलू उपायों से आप चेहरे पर चढ़ा रंग उतार सकते हैं।
होली के पर्व पर रंग न लगे तो त्यौहार का मजा नहीं आता, लेकिन कई बार यह रंग आपके लिए समस्या का कारण बन जाते है। होली खेलते समय कोई भी रंगों के दुष्प्रभावों के बारे में नहीं सोचता। जिसका जहां मन करता है, जैसे मन करता है वहीं रंग लगा देता है।
कपड़ों और अन्य हिस्सों तक तो ठीक है लेकिन जब यह रंग आपकी त्वचा पर लग जाता है तो ये किसी बड़ी परेशानी से कम नहीं होता। होली में इस्तेमाल किये जाने वाले रंगों में केमिकल्स का इस्तेमाल किया जाता है जो त्वचा के लिए हानिकारक होते है।
बेसन का फेसपैक
बेसन हर रसोई में पाया जाने वाला सामान्य घरेलू उत्पाद है जिसकी मदद से त्वचा संबंधी बहुत सी परेशानियों को आसानी से दूर किया जा सकता है। चेहरे से होली के रंग हटाने के लिए बेसन, चोकर, दूध और नींबू के रस की कुछ बूंद को एक साथ मिलाकर मिश्रण बना लें। अब इस पैक का इस्तेमाल अपनी स्किन के हर उस हिस्से पर करें जहां रंग लगा है। लगाने के बाद जब यह पैक हल्का सूखने लगे तो हाथों से हल्का गीला करते हुए पैक को रगड़कर छुड़ाने लगे। जब यह पूरी तरह से हट जाए तो साबुन और पानी से अपना फेस धो लें।
मुल्तानी मिटटी
बालों से रंग निकालने के लिए पानी में मुल्तानी मिटटी मिलाकर गाढ़ा घोल तैयार कर लें। अब इस पेस्ट को बालों में लगायें। सूखने का इंतजार करें। सूख जाने के बाद बालों को अच्छी तरह से धोकर साफ़ कर लें। चेहरे से रंग हटाने के लिए मुलतानी मिट्टी में गुलाबजल और दही मिलाकर भी इस्तेमाल कर सकती है।
दाल का स्क्रब
अलग अलग दालों को मिलाकर इसें थोड़ा पीस लें। अब इसमें थोड़ा चावल का पाउडर मिला लें। अब इस पाउडर में थोडा सा दूध या दही मिला लें और नींबू का रस डालें। अब इसे चेहरे पर 5 से 10 मिनट तक के लिए लगाकर रखें। उसके बाद गीले कपडे़ से हल्के हाथों से स्क्रब करें।
खीरा और गुलाब जल का बना पैक
त्वचा से होली के रंग छुड़ाने के लिए आप खीरे, गुलाबजल और एप्पल साइडर विनेगर से बने पैक का भी इस्तेमाल कर सकते है। खीरें के रस में कुछ बूंदे गुलाबजल और एक चम्मच सेब के सिरके के साथ मिला कर लें। अच्छे से मिलाने के बाद पेस्ट को अपने चेहरे पर लगायें। कुछ मिनट इन्तजार करने के बाद पानी से साफ़ कर लें।
सरसों के दानों का पेस्ट
सरसों के दानों को पीस लें। अब उसमे थोडा सा सरसों का तेल मिला लें और इस पेस्ट को अपने चेहरे और शरीर के अन्य हिस्सों पर 5 से 7 मिनट तक रगड़ें। रगड़ने के बाद पानी से साफ़ कर लें और किसी माइल्ड साबुन से नहा लें। कलर निकल जाएगा।
गेहूं का आटा
गेहूं के आटे में हल्दी, दूध और गुलाबजल डालकर आता गूँथ लें। अब इस आटे का थोड अथोदा हिस्सा लेकर उसे अपने चेहरे और शरीर पर रगड़ें। 2 से 3 बार इसका इस्तेमाल करें और फिर अच्छे से नहा लें। त्वचा से रंग छूट जाएगा।
पपीते का फैसपैक
होली खेलने के बाद पपीते का गूदा निकालकर इसे चेहरे पर मल लें। अब कुछ देर बाद चेहरा धो लें। होली खेलने से पहले ध्यान इन बातों का ध्यान रखें नाखूनों को रंगों से बचाने के लिए उनपर ट्रांसपेरेंट नेल लगा लें। इसे आपको होली खेलने से पहले करना होगा। पैरों के नाखूनों के लिए आप उनपर जैतून का तेल या ट्रांसपेरेंट नेल पेंट किसी भी उपाय का इस्तेमाल कर सकती है।
होली खेलने के लिए ज्यादा गाढे रंगों का इस्तेमाल न करें। स्प्रे आदि के इस्तेमाल से बचें यह त्वचा और बालों दोनों के लिए नुकसानदेह होता है। होली खेलने से पहले पूरे शरीर और बालों में अच्छे से सरसों और नारियल का तेल लगा लें। और पुराने कपडे ही पहनें।
रंगों का है एक धार्मिक और आध्यात्मिक संसार
जरा सोचिए अगर रंग न होते….कैसी होती धरती और कैसा होता संसार…सब फीका। रंग सुन्दर हैं मगर वे सिर्फ सुन्दर नहीं है बल्कि उनका अपना एक अलग संसार है और हर एक रंग का अपना महत्व है और मतलब भी। एक रंग की जगह दूसरा रंग नहीं ले सकता….वैसे ही जैसे सूरज नीला अच्छा नहीं लगेगा और धरती बस लाल। वैसे, इंद्रधनुष के सात रंगों को ही रंगों का जनक माना जाता है। ये सात रंग क्रमशः लाल, नारंगी, पीला, हरा, आसमानी, नीला तथा बैंगनी हैं। रंगों की उत्पत्ति का मुख्य स्त्रोत सूर्य है। सूर्य के प्रकाश में विभिन्न रंग मौजूद हैं। जिनके कारण ही इंद्रधनुष का जन्म होता है।
रंगों का धार्मिक महत्व: रंगों के विज्ञान को समझकर ही हमारे ऋषि-मुनियों ने धर्म में रंगों का समावेश किया है। पूजा के स्थान पर रंगोली बनाना रंगों के मनोविज्ञान को भी प्रदर्शित करता है। कुंकुम, हल्दी, अबीर, गुलाल, मेंहदी के रूप में पांच रंग हर पूजा में शामिल हैं। धर्म ध्वजाओं के रंग, तिलक के रंग, भगवान के वस्त्रों के रंग भी विशिष्ठ रखे जाते हैं। ताकि धर्म-कर्म के समय हम उन रंगों से प्रेरित हो सकें और हमारे अंदर उन रंगों के गुण आ सकें।
आध्यात्मिक महत्त्व: आध्यात्मिक क्षेत्र में रंगों को सर्वाधिक महत्त्व का वर्णन ‘थियोसोफिकल सोसायटी’ ने दिया है। सोसायटी के अनुसार, मानव शरीर के अतिरिक्त एक सूक्ष्म शरीर भी होता है, जो चारों तरफ़ अण्डाकृति चमकीले धुंध से घिरा रहता है। आध्यात्मिक दृष्टि से उत्पन्न होने से इस अण्डाकृति में विभिन्न रंग दृष्टिगोचर होते हैं, जिनके आधार पर किसी शरीर के विषय में विभिन्न प्रकार की जानकारी मिल सकती है।
वास्तु में महत्त्व: शुभ रंग भाग्योदय कारक होते हैं और अशुभ रंग भाग्य में कमी करते हैं। विभिन्न रंगों को वास्तु के विभिन्न तत्त्वों का प्रतीक माना जाता है। नीला रंग जल का, भूरा पृथ्वी का और लाल अग्नि का प्रतीक है।
(साभार – नयी दुनिया )
जानिए होली और होलिका दहन की कुछ बातें…
होली भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है। इसके पीछे पौराणिक कथाएं तो हैं ही लेकिन मुख्यत: यह कृषकों का उत्सव है। रबी की फेसल के आसपास मनाया जाने वाले इस त्योहार के अर्थ बहु आयामी है और वसंत की भावनाओं के अनुरूप है। इसलिए भी होली देश का बहुत लोकप्रिय त्योहार है। यह भारतीय मूल के हिंदुओं द्वारा हर जगह मनाया जाता है, हालांकि यह मुख्य रूप से भारत और नेपाल के लोगों द्वारा मनाया जाता है।
कब मनाई जाती है?
ऐसा माना जाता है कि भद्रा काल में होलिका दहन नहीं करना चाहिए, इससे अशुभ फल की प्राप्ति होती है। 1 मार्च को शाम 7 बजे 37 मिनट पर भद्रा समाप्त हो जाएगा और इसके बाद से होलिका दहन किया जाना शुभ होगा। शास्त्रों में बताए गए नियमों के अनुसार इस साल होलिका दहन के लिए बहुत ही शुभ स्थिति बनी हुई है।
धर्मसिंधु नामक ग्रंथ के अनुसार होलिका दहन के लिए तीन चीजों का एकसाथ होना बहुत शुभ है क्क पूर्णिमा तिथि हो, प्रदोष काल हो और भद्रा न लगा हो। इस साल होलिका दहन पर ये तीनों संयोग बन रहे हैं। इसलिए होली आनंददायक रहेगी।
होली मनाने के कारण
होलिकोत्सव के पीछे पौराणिक कारण तो हैं ही, लेकिन इसका संबंध मौसम और हमारी अर्थव्यवस्था भी है। इसकी कथा हमें बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश देती है। यह ‘फगवाह” के रूप में भी जाना जाता है, क्योंकि यह हिंदू कैलेंडर के अंतिम मास फागुन में मनाया जाता है। होली ‘होला” से उन्पन्ना हुआ है। मूलत: यह ईश्वर से अच्छी फेसल पाने के लिए की जाने वाली पूजा है।
होलिका की कथा
होलिका दहन की कथा बुराई पर अच्छाई की विजय की कथा है। यह कथा प्रल्हाद की कथा है, होलिका और हिरण्यकश्यप की कथा है। प्रल्हाद ईश्वर को समर्पित एक बालक था, परंतु उसके पिता ईश्वर को नहीं मानते थे। वह बहुत दंभी, घमंडी और क्रूर राजा था। कहानी कुछ ऐसी है कि प्रल्हाद के पिता एक नास्तिक राजा थे प्रल्हाद हर समय ईश्वर का नाम जपता रहता था। इस बात से आहत होकर वह अपने पुत्र को सबक सिखाना चाहता था। उसने अपने पुत्र को समझाने के सारे प्रयास किए, किंतु प्रल्हाद में कोई परिवर्तन नहीं आया।
जब वह प्रल्हाद को नहीं बदल पाया तो उसने उसे मारने का विचार किया। इस उद्देश्य से उसने अपनी बहन की मदद ली। उनकी बहन को यह वरदान प्राप्त था कि यदि वह अपनी गोद में किसी को भी लेकर अग्नि में प्रलेश करेगी तो स्वयं उसे कुछ नहीं होगा, परंतु उसकी गोद में बैठा व्यक्ति जलकर भस्म हो जाएगा। राजा की बहन का नाम होलिका था।
होलिका ने प्रल्हाद को जलाने के लिए अपनी गोद में बैठाया था, परंतु प्रल्हाद के स्थान पर वह स्वयं जल गई और ‘हरि ऊं” का जाप करने और ईश्वर को समर्पित होने के कारण प्रहलाद की आग से रक्षा हो गई और वह सुरक्षित बाहर आ गया।
हेमाद्रि ने भविष्योत्तर से उद्धरण देकर एक और कथा कही है। युधिष्टिर ने कृष्ण से पूछा कि फागुन मास में हरेक गांव-नगर और घर में उत्सव क्यों मनाया जाता है और होलाका क्यों जलाया जाता है उसमें किस देवता की पूजा की जाती है?
इकस उत्सव का प्रचार किया जाता है? इसमें क्या होता है और यह ‘अडाडा” क्यों कहीं जाती है। इसके जवाब में कृष्ण ने एक कथा सुनाई। राजा रघु के पास लोग यह कहने गए कि ‘डोण्ढा” नामक एक राक्षसी है, जिसे शिव ने वरदान दिया है कि उसे देव, मानव आदि नहीं मार सकते हैं और न वह अस्त्र-शस्त्र या जाड़ा या गर्मी या वर्सा से मर सकती है।
किंतु शिव ने इतना कह दिया कि वह खेलते-मस्ती करते बच्चों से भयभीत रहेगी। तब पुरोहित ने मुहुर्त निकाला और कहा कि फागुन की पूर्णिमा को जब जाड़ा खन्म होगा और ग्रीष्म का आगमन होगा, तब लगो लोग हंसे और आनंद मनाएं, बच्चे सूखी पत्तियां और टहनियां इकट्ठा करें।
रक्षोघ्न मंत्रों के साथ उसमें आग लगाएं, तालियां बजाएं, अग्नि की तीन बार प्रदक्षिणा करें, आनंद मनाएं, इसी शोरगुल-अट्टहास और होम से वह राक्षसी मरेगी। जब राजा ने यह सब करवाया तो राक्षसी मर गई और वह दिन ‘अडाडा” या ‘होलिका” कहा गया।
आगे पुराण में आया कि ‘जब शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि पर पतझड़ समाप्त हो जाता है और वसंत ऋतु का प्रात: आगमने होता है तो जो व्यक्ति चंदन के लेप के साथ आम्र-मंजरी खाता है वह आनंद से रहता है।
इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि होलिका भूतकाल के बोझ का सूचक है जो प्रल्हाद की निश्छलता को जला देना चाहती थी। परंतु नारायण भक्ति की गहराई तक जुड़े हुए प्रल्हाद ने सभी पुराने संस्कारों को स्वाहा कर दिया और फिर नए रंगों के साथ आनंद का उद्गम हुआ। जीवन एक उन्सव बन जाता है।
भूतकाल को छोड़कर हम एक नई शुरुआत की तरफ बढ़ते हैं। हमारी भावनाएं आग की तरह हमें जला देती हैं, परंतु जब रंगो का फव्वारा फूटता है तब हमारे जीवन में आकर्षण आ जाता है। अज्ञानता में भावनाएं एक बोझ के समान होती है, जबकि ज्ञान में वही भावनाएं जीवन में रंग भर देती है।
सभी भावनाओं का संबंध एक रंग से होता है। जैसे कि – लाल रंग क्रोध से, हरा ईर्ष्या से, पीला पुलकित होने या प्रसन्नाता से, गुलाबी प्रेम से, नीला रंग विशालता से, श्वेत शांति से और केसरिया संतोष/त्याग और बैंगनी ज्ञान से जुड़ा हुआ है।
होली के रंग बिखरे जरा अलग अन्दाज में
अगर हम यह कहें कि होली में लड़कों को बहुत ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है तो शायद यह कहना गलत नहीं होगा। दरअसल, यह जरूरी है कि आपके पहनावे से लेकर आपके बर्ताव का असर पड़ता है। आमतौर पर ये माना जाता है कि ल़ड़कों को अपने गेटअप पर ध्यान देने की जरूरत नहीं है मगर यह जरूरी है कि आप खुद को बहुत ज्यादा नजरअन्दाज न करें और मामला जब होली का हो तो कुछ बातों का ध्यान तो रखना ही होगा –

अच्छी सी टीशर्ट और ट्राउजर आप पहन सकते हैं। होली खेलते समय बरमूडा या पजामा भी चलेगा मगर लुंगी भूलकर भी न पहनें वरना आपका ध्यान उसी पर रहेगा। सफेद या किसी हल्के रंग का कुरता और लाइटवेट डेनिम पहन सकते हैं।

जालीदार बनियान आपकी इमेज का कचरा कर सकती है। जितनी भी शरारत हो मगर कपड़ों में एक गरिमा आपके व्यक्तित्व में चार चाँद लगा सकती है।
बालों और शरीर पर तेल जरूर लगा लें, रंग आसानी से छूटेगा। फेसपैक, मॉश्चराइजर आपके लिए भी इतना ही जरूरी है।
कोल्हापुरी चप्पल या लेदर चप्पलें पहनी जा सकती हैं मगर अपने महँगे जूते पहनकर बाहर न निकलें।
किसी ने पैर पर अबीर रख दिया तो आप मना तो नहीं कर सकेंगे मगर बाद में जूतों को नया बनाना कठिन होगा।
बालों को बचाने के लिए पगड़ी, कैप या टोपी के साथ आँखों को बचाने के लिए गॉगल्स पहन सकते हैं।
चाहे तो कमर पर दुप्पटे की तरह बाँघनी का स्टोल बाँध सकते हैं। खाली बदन रंग खेलना न आपकी सेहत के लिए सही है और न ही ये शिष्टाचार के तहत आता है।

कीचड़ और बलूनमार वाली होली और केमिकल रंग आपकी होली का मजा बिगाड़ सकते हैं।
जबरन किसी को रंग लगाने की गलती न करें। किसी महिला को तो हरगिज नहीं, फिर भले ही वह आप उसे भाभी बुलाते हों। जरूरी नहीं कि वह आपको देवर मानती हो इसलिए होली के बहाने जबरदस्ती की रिश्तेदारी न बनायें।
अगर आप होली पर रंग नहीं खेलना चाहते तो विनम्रता से मना कर दें। अगर घर से नहीं निकलना चाहें तो न निकलें। अगर कोई रंग लगाना ही चाहें तो आप एक हल्का सा टीका लगवा सकते हैं।
आपका मन भी रह जायेगा और सामने वाले की बात भी रह जायेगी। मिस्टर खंडूस बने बगैर भी मना किया जा सकता है।
ससुराल जा रहे हों तो साली आधी घरवाली का फॉर्मूला बिल्कुल न अपनायें। ये नियम सस्ती किताबों में अच्छा लग सकता है मगर लड़कियाँ इसे सही नहीं मानतीं।
होली पार्टी कर रहे हैं तो अश्लील गीतों से बचें। अगर कोई महिला आपकी मित्र हुई और पार्टी में आमंत्रित है तो वह असहज तो होगी ही, आपकी छवि भी हमेशा के लिए खराब हो सकती है।
दफ्तर में होली खेलते समय या रंग लगाते समय विशेष सावधानी की जरूरत है। आप सूखे अबीर से होली खेल सकते हैं मगर एक सीमा में। शराब और भांग को किसी भी पार्टी के मेन्यू से दूर रखें। ठंडाई या शरबत इसकी जगह काफी है।
होली एक ऐसा मौका है जब वास्तव में आपके व्यवहार की परख होती है। महिलाओं को जहाँ – तहाँ और होली के नाम पर अश्लीलता की हद तक जाकर रंग लगाना आपकी नीयत को भी सामने ला देता है। मौके की नजाकत और अपनी शराफत को हमेशा बरकरार रखें…..होली की खूबसूरती आपके अन्दाज में नजर आयेगी।
होली मनाइए रंगीले और सजीले अन्दाज में
रंगों के मौसम में रंगों से भला कोई कैसे बच सकता है मगर रंगों के साथ अपनी खूबसूरती का ख्याल रखना भी बहुत जरूरी है और हमारा पूरा लुक हमारे अन्दाज पर निर्भर करता है। होली की मस्ती का रंग जरूर चढ़ाइए कि मगर थोड़ी तैयारी के साथ और इस तरह कि होली के बाद भी अपना खूबसूरत अंदाज बरकरार रखें।
ये सही है कि होली में सफेद रंग पर हर रंग खिलता है। अगर आप सफेद रंग पहनना चाहती हैं तो जरूर पहनिए मगर कुछ अलग करने का मन है तो थोड़े खिले – खिले रंग पहनकर देखिए। पीला, हरा, गुलाबी, नीले रंग और ढेर सारे पेस्टल शेड्स…और दिखिए थोड़ी सी अलग। सफेद रंग पहनना है तो बाँधनी या रंगे – बिरंगे दुप्पटे,स्टोल या जैकेट के साथ पहन सकती हैं।

होली में धमाल मचाना है तो थोड़ी आजादी और बेफिक्री तो जरूरी है और हर दो मिनट के बाद आप अपना दुप्पटा सम्भालती रहेंगी या स्लीव्स को गिरने से बचाती रहेंगी तो धमाल कैसे मचाएंगी? तो पारदर्शी और तंग कपड़ों को न कह दीजिए…इसके बाद आप पलाजो पहनिए या ट्राउजर या पटियाला आपकी मर्जी। भारी कपड़े न पहनें क्योंकि बाद में तो सम्भालना भी आपको है और धोना भी आपको है…तो भारी – भरकम डेनिम पहनकर होली खेलना अच्छा आइडिया नहीं है क्योंकि भीगने से बचने के लिए भागना भी पड़ता है।
फ्लोरल प्रिंट पहन सकती हैं और हल्के रंगों में फ्लोरल प्रिंट बहुत अच्छे लगते हैं। आजमाकर देख लीजिए।

होली में खुले बाल रखना समझदारी नहीं है…बेहतर है कि बालों में तेल लगा लें और पोनीटेल बना लें। चोटी भी कर सकती हैं….बाल बचे रहेंगे और तेल लगा रहेगा तो बाद में बाल धोने में भी सुविधा होगी। हिल पहनने की गलती न करें….भागने पर पैर टूटने का डर रहेगा। न्यूड कलर के फुटवेयर होली के रंग से जल्दी गंदे हो जाते हैं। गहरे रंग के फ्लैट्स पहनें और यह निश्चित करें कि पानी में चप्पल फिसले नहीं। टाँगें बचाने के लिए चप्पल की सोल पर ध्यान देना जरूरी है।

नेलपॉलिश लगा लें। इससे रंग आपके नाखूनों के अंदर नहीं जायेगा। आप होली नेल आर्ट डिजाइन अपने नाखूनों पर बना सकती हैं। बेस कोट के अलावा आप अलग-अलग रंगों के साथ अपने नाखूनों को सजा सकती हैं। होली खेलते समय मेकअप से परहेज रखें…ये हमारा सुझाव है क्योंकि रंगों से पोते जाने के बाद चेहरे पर कुछ नहीं दिखने वाला। चेहरे पर अच्छी सी क्रीम लगा लें। रंग खेलने के बाद अच्छा फेसपैक लगाना न भूलें। वैसे भी हर दिन तो मेकअप करना ही है….एक दिन ऐसे दिखें जो आप हैं…..। तो मनाइए होली…..जमकर सजीले अन्दाज में।
पति और बेटियों का सहारा बनकर प्रतिमा ने थामी बस की स्टीयरिंग
पेशेवर ड्राइविंग एक ऐसा ही काम है जिसके बारे में समाज सोचता है कि यह तो पुरुषों का काम है। लेकिन कोलकाता में इस बंधन को तोड़कर प्रतिमा पोद्दार इस मानसिकता को करारा जवाब दे रही हैं। 42 वर्षीय प्रतिमा कोलकाता की इकलौती महिला बस ड्राइवर हैं। वह निमता – हावड़ा पर रोजाना दो-तीन चक्कर लगाती हैं। कोलकाता शहर में रोज कई सारी दुर्घटनाएं होती रहती हैं। खासतौर पर बस से तो रोज टक्कर होती है। लेकिन पिछले 6 सालों से बस चला रहीं प्रतिमा से आज तक एक भी एक्सिडेंट नहीं हुआ।
प्रतिमा के पति शिबेश्वर भी पहले ड्राइवर थे लेकिन एक हादसे के बाद वह बस चलाने में असमर्थ हो गए। इसके बाद घर चलाने की जिम्मेदारी प्रतिमा ने ले ली। प्रतिमा पहले एक अस्पताल में एंबुलेंस चलाती थीं। उसके बाद वह बस चलाने लगीं। वह रोजाना सुबह 3.30 बजे घर से निकल जाती हैं ताकि सबसे पहली ट्रिप में देरी न हो। अपने पति के बारे में बताते हुए वह कहती हैं, ‘क्योंकि मेरे पति बस नहीं चला सकते इसलिए मैंने बस चलाने की जिम्मेदारी उठा ली और इस बात पर मुझे गर्व भी है कि आज तक मेरा एक्सिडेंट नहीं हुआ। मैं बाकी पुरुष ड्राइवरों के जैसे ही तेज बस चला सकती हूं, लेकिन मैं हमेशा सुरक्षा का पूरा ख्याल रखती हूं।’
हावड़ा स्टेशन के पुलिस और रोज बस से सफर करने वाले यात्री प्रतिमा को अच्छी तरह जानने लगे हैं और वे प्रतिमा पर पूरा भरोसा भी रखते हैं। हावड़ा स्टेशन पर एक पुलिसवाले ने कहा, ‘मैं शायद ही कभी प्रतिमा को ओवरस्पीड बस चलाते हुए देखा हो। वह कभी भी सवारियों को मोड़ पर भी नहीं उतारती जबकि बाकी बस ड्राइवर अक्सर ऐसा करते हैं।’ हालांकि प्रतिमा स्वीकारती हैं कि कभी कभार छोटी-छोटी भूलें उनसे हो जाती हैं लेकिन कभी दुर्घटना नहीं होती। वह बताती हैं, ‘मेरे पति का 2011 में ऐक्सिडेंट हो गया था जिसके बाद वह बड़े वाहन चलाने लायक नहीं बचे। इसके बाद मैंने बस चलाने की जिम्मेदारी अपने सिर पर ले ली।’
प्रतिमा बताती हैं कि शुरू में ड्राइविंग के पेशे में जाने के बारे में सोचना अजीब लगता था। लेकिन रोजी रोटी चलाने का एकमात्र यही जरिया था। इसी से मैं बस का लोन चुका रही हूं और अपनी बेटियों की फीस भरने के साथ-साथ घर को भी संभाल रही हूं। प्रतिमा ने सिर्फ 12वीं तक की पढ़ाई की है। उन्होंने बीए में दाखिला लिया था, लेकिन एक साल के बाद ही उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ी। वह अपनी बेटियों को खूब पढ़ाना चाहती हैं। उनकी बड़ी बेटी राखी जिम्नास्टिक प्लेयर है और वह राज्य स्तर पर कई मेडल भी जीत चुकी है। अभी वह जादवपुर यूनिवर्सिटी से मैथमैटिक्स ऑनर्स से ग्रैजुएशन कर रही है। वहीं दूसरी बेटी अभी 9वीं में है और वह वह भी पढ़ाई में अच्छा कर रही है।
प्रतिमा बताती हैं कि उन्होंने काफी कम उम्र में ही ड्राइविंग सीख ली थी, लेकिन इसे कभी पेशा बनाने के बारे में नहीं सोचा। उनके पति पहले एक छोटी मिनी बस चलाते थे। उससे इतना गुजारा हो जाता था कि परिवार अच्छे से चल जाता था। बाद में उन्हें लगा कि अगर खुद की बस हो जाए तो अच्छा होगा। इस वजह से उन्होंने एक नई बस खरीद ली। बस में कुछ दिन तक प्रतिमा ने कंडक्टर के तौर पर काम किया था, लेकिन इसके बाद ही हादसा हो गया और शिबेश्वर बिस्तर पर आ गए। घर चलाना मुश्किल हो रहा था इसलिए प्रतिमा ने प्राइवेट नौकरी खोजने की कोशिश की, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। इसके बाद उन्होने एंबुलेंस और टैक्सी चलाया। इसके बाद शिबेश्वर थोड़े ठीक हुए और उन्होंने प्रतिमा को बस चलाना भी सिखाया। इसके बाद उन्हें लाइसेंस भी मिल गया और अब वह भिरती से हावड़ा तक रोज बस चलाती हैं।
होली के रंग और उड़ता गुलाल, बहुरंगी स्वाद की गुझिया के साथ
होली का जिक्र हो और गुझिया की याद न आये तो ऐसा तो हो ही नहीं सकता। ये अलग बात है कि हर बार एक तरह के भरावन से आप से हटकर आप कुछ नया करना चाहती हैं तो गुझिया के कई बहुरंगी इन अन्दाजों पर गौर फरमाइए….मनाइये होली का त्योहार गुझिया के बहुरंगी स्वादों के साथ –
बेक्ड गुझिया
गुझिया सबसे ज्यादा स्वादिष्ट तब लगती है जब वह तली हुई होती है। हालांकि अगर आप इसे पौष्टिक बनाना चाहें तो इसे तलने की जगह बेक कर सकती हैं। आप गुझिया में मनचाहा भरावन भरकर और बिना तेल का इस्तेमाल किए इसे बेक कर सकती हैं। यह खाने में फ्राई गुझिया से बेहतर भी लग सकती है.
सूजी गुझिया
मैदे का ज्यादा इस्तेमाल हानिकारक हो सकता है, इसी वजह से गुझिया की बाहरी परत बनाने के लिए आप ज्यादा सूजी को उपयोग में ला सकती हैं और मनचाहा भरावन भरकर गुझिया बना सकते हैं।
बेक्ड ओट्स गुझिया
अगर आप ज्यादा मीठी गुझिया खाकर बोर हो जाएं तो उसकी जगह आप नमकीन बेक्ड ओट्स गुझिया भी बना सकती हैं। इसे बनाने के लिए सिर्फ आटा, सूखे मेवे और ओट्स की जरूरत पड़ेगी, यह गुझिया आपकी होली को और भी स्पेशल बना देगी।
खजूर और अंजीर गुझिया
खजूर और अंजीर बहुत पोषक हैं इनका इस्तेमाल आप खोए की जगह कर सकती हैं। यह गुझिया उन लोगों के लिए भी अच्छा विकल्प है जिन्हें मधुमेह की बीमारी की शिकायत है। गुझिया को और ज्यादा हेल्दी बनाने के लिए आप इन्हें फ्राई करने की जगह बेक करें।
ड्राई फ्रूट्स गुझिया
इसका भरावन बनाने के लिए बादाम, पिस्ता, किशमिश, खजूर और काजू का इस्तेमाल किया जाता है। राजस्थान में इसे घुघ्रस के नाम से भी जाना जाता है. होली के मौके पर ड्राई फ्रूट्स गुझिया काफी लोकप्रिय मिठाई है।
मिक्स फ्रूट गुझिया
आप बादाम, काजू, किशमिश और नारियल के साथ सेब, नाशपाती और आलूबुखारे का इस्तेमाल कर सकती हैं। तैयार की गई गुझिया को बेक करके अपने दोस्तों और परिवार के साथ इन टेस्टी गुझिया का मजा लें सकती हैं।
गाजर की गुझिया
गाजर लगभग हर मौसम में मिल जाती है, आप ड्राई फ्रूट्स और नारियल के साथ गाजर को मिलाकर स्वादिष्ट गुझिया बना सकती हैं।
93 साल के नक्कू बाबू रखते हैं 200 साल से भी ज्यादा पुरानी चीजों का खजाना
कोलकाता को सिटी ऑफ जॉय के नाम से भी जाना जाता है। यानी ये खुशियों का शहर है। यहां हर एक गली में कोई न कोई कहानी मिल जाती है जो आपके दिल को छू जाएगी। ऐसी ही एक कहानी है 93 वर्षीय सुशील कुमार चटर्जी की। घूमने और चीजों को गहराई से महसूस करने वाले सुशील के पास कई अनमोल चीजों का खजाना है। लोग उन्हें नक्कू बाबू के नाम से जानते हैं। वे उत्तर कोलकाता के नलिन सरकार स्ट्रीट में एक तीन मंजिल के मकान में रहते हैं। उनके घर में एक 10X12 का कमरा है जिसमें काफी पुरानी चीजें सुरक्षित रखी हुई हैं। यह कमरा पुराने सामानों से इतना भरा है कि यहां दो लोग आराम से खड़े भी नहीं हो सकते।
नक्कू बाबू को पुरानी दुर्लभ चीजों को सहेजने का शौक तब से है जब वो सिर्फ 10 साल के थे। वह कहते हैं कि इन चीजों में कोई लौकिक शक्ति है जो उन्हें अपनी ओर खींच लेते हैं। उन्होंने कोलकाता के स्कॉटिश चर्च कॉलेज से अपनी पढ़ाई की है। उनसे बातें करते वक्त आप पुराने दिनों में चले जाएंगे। ले लगातार अपनी बचपन की यादों को साझा करते रहते हैं। उन्होंने कई सारे मशहूर कवियों, कलाकारों और लेखकों के साथ अच्छा समय बिताया है जिसकी याद उनके जेहन में अभी भी ताजा हैं।
हिंदुस्तान टाइम्स से बात करते हुए नक्कू बाबू ने कहा, ‘मैंने सबसे पहले पुराने पत्थरों को इकट्ठा करना शुरू किया था। उनकी अजीबोगरीब बनावट मुझे अपनी ओर आकर्षित करती थी। इसके बाद ऐसी चीजों से मुझे लगाव बढ़ता गया।’ एक वेबसाइट के मुताबिक नक्कू बाबू के पास प्रथम विश्व युद्ध के दौरान सेना द्वारा प्रयोग किए गए रिसीवर से लेकर 18वीं सदी का कॉलिंग बेल भी है जिसे इंग्लैंड में निर्मित किया गया था। उनके पास 1930 में स्विस स्टॉपवॉच भी है। उनके कमरे में 200 साल पुरानी तुरही और लगभग 3,000 म्यूजिक रिकॉर्ड्स हैं। एक कोने में जर्मनी में बना 16mm का साउंड प्रॉजेक्ट है, तो दूसरे कोने में कोलकाता में पहली बार आयात किया गया हेडफोन भी है।
उनके इस कमरे में घुसने के बाद आपको पता ही नहीं चलेगा कि आप किस दुनिया में आ गए हैं। इसी वजह से उनके कमरे से निकलने में घंटो लग जाते हैं फिर भी आपका मन नहीं भरता। उनके पास प्रथम विश्व युद्ध के दौरान इस्तेमाल किए गए कैमरे भी हैं। इसके अलावा इतनी सारी चीजें कमरे में रखी हैं कि अगर एक-एक चीज गिनने लगें तो लिस्ट काफी लंबी हो जाएगी। नक्कू बाबू अपनी पत्नी और तीन बेटों के साथ रहते हैं। उनका ये शौक हमें हर एक पल, हर एक लम्हे को खुशी के साथ जीने की प्रेरणा देता है।
(साभार – योर स्टोरी)




