Saturday, April 11, 2026
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मॉनसून में खूबसूरत रहें आपके पैर

बारिश का मौसम सभी को पसंद होता है लेकिन यह मौसम अपने साथ कई तरह की परेशानियां भी लाता है। इन दिनों पैरों की समस्या आम देखने को मिलती है। गीलेपन और नमी की वजह से पैरों के तलवे खराब हो जाते हैं और कई लोगों के तो उंगलियों में छाले पड़ जाते हैं। जिस वजह से काफी परेशानी होती है और पैर भी बदसूरत लगने लगते हैं। ऐसे में कुछ आसान तरीके अपनाकर इस मानसून सीजन पैरों की खूबसूरती बरकरार रख सकते हैं।

नमक वाला पानी
बरसात के मौसम में पैरों की खास देखभाल रखना जरूरी होता है। ऐसे में दिन में कम से कम 2-3 बार पानी से पैर जरूर धोएं और तौलिए से अच्छे से पौंछ कर रखें।

फिटकरी
अधिक देर तक पानी में रहने की वजह से पैरों के तलवों में मोटे-मोटे दाने निकल जाते हैं और जमीन पर पैर रखने से ही काफी दर्द महसूस होती है। इसके लिए पानी में फिटकरी डालकर उसे गर्म करें और इस पानी में 15-20 मिनट तक पैरों को डुबोकर रखें।

नारियल तेल
पैरों को खूबसूरत और मुलायम बनाए रखने के लिए हर रोज रात को सोने से पहले गुनगुने नारियल तेल से पैरों की मसाज करें।

नींबू
इस मौसम में कई महिलाओं की एड़ियां फट जाती हैं जिससे पैरों की खूबसूरती खराब हो जाती है। ऐसे में रोजाना आधे नींबू को एड़ियों पर रगड़ें। इसके अलावा गुनगुने पानी में 1 नींबू का रस निचोड़ कर उसमें 20 मिनट के लिए पैरों को डूबो कर रखें और फिर तौलिए से अच्छे से पौंछ लें।

 

विरासत ए फैशन : बिहार की कलात्मक विरासत है मधुबनी

मधुबनी लोक कला बिहार के मधुबनी स्थान से संबन्धित है। मधुबन का अर्थ है ‘शहद का वन’ और यह स्थान राधा कृष्ण की मधुर लीलाओं के लिये प्रसिद्ध है। मधुबनी की लोक कला में भी कृष्ण की लीलाओं को चित्रित किया गया है तो रामायण और पुराणों की कई कहानियाँ इस कला के माध्ययम से अभिव्यक्ति पाती है। कला आम और केलों के झुरमुट में कच्ची झोपड़ियों से घिरे हरे भरे तालाब वाले इस ग्राम में पुश्तों पुरानी है और मधुबन के आसपास पूरे मिथिला इलाके में फैली हुई है। विद्यापति की मैथिली कविताओं के रचनास्थल इस इलाके में आज मुज़फ्फपुर, मधुबनी, दरभंगा और सहरसा ज़िले आते हैं।

मधुबनी की कलाकृतियों तैयार करने के लिये हाथ से बने कागज़ को गोबर से लीप कर उसके ऊपर वनस्पति रंगों से पौराणिक गाथाओं को चित्रों के रूप में उतारा जाता है। कलाकार अपने चित्रों के लिये रंग स्वयं तैयार करते हैं और बाँस की तीलियों में रूई लपेट कर अनेक आकारों की तूलिकाओं को भी स्वयं तैयार करते हैं ।

इन कलाकृतियों में गुलाबी, पीला, नीला, सिदूरा (लाल) और सुगापाखी (हरा) रंगों का प्रयोग होता है। काला रंग ज्वार को जला कर प्राप्त किया जाता है या फिर दिये की कालिख को गोबर के साथ मिला कर तैयार किया जाता है, पीला रंग हल्दी और चूने को बरगद की पत्तियों के दूध में मिला कर तैयार किया जाता है पलाश या टेसू के फूल से नारंगी, कुसुंभ के फूलों से लाल और बेल की पत्तियों से हरा रंग बनाया जाता है। रंगों को स्थायी और चमकदार बनाने के लिये उन्हें बकरी के दूध में घोला जाता है।

मानव और देवी देवताओं के चित्रण के साथ साथ पशुपक्षी, पेड़ पौधे और ज्यामितीय आकारों को भी मधुबनी की कला में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। ये आकार भी पारंपरिक तरीको से बनाए जाते हैं ।

तोते, कछुए, मछलियाँ, सूरज और चांद मधुबनी के लोकप्रिय विषय हैं। हाथी, घोड़े, शेर, बाँस, कमल, फूल, लताएँ और स्वास्तिक धन धान्य की समृद्धि के लिये शुभ मानकर चित्रित किये जाते हैं।

 

कागज़ पर बनी कलाकृतियों के पीछे महीन कपड़ा लगा कर इन्हें पारिवारिक धरोहर के रूप में सहेज कर रखा जाता है। यही कारण है कि हर परिवार में मधुबनी कलाकृतियों के आकार, रंग संयोजन और विषय वस्तु में भिन्नता के दर्शन होते हैं। यह भिन्नता ही उस परिवार की विशेषता समझी जाती है।

पारंपरिक रूप से विशेष अवसरों पर घर में बनाई जाने वाली यह कला आज विश्व के बाज़ारों में लोकप्रिय हो चली है। हालाँकि इसके कलाकार आज भी अत्यंत सादगीपूर्ण जीवन बिता रहे हैं।

दीवार और कागज़ के साथ यह कला मिट्टी के पात्रों, पंखों और विवाह के अवसर पर प्रयुक्त होने वाले थाल और थालियों पर भी की जाती है।

आज मधुबनी कलाकृतियाँ कला दीर्घाओं, संग्रहालयों और हस्तकला की दूकानों के साथ विश्वजाल पर भी खरीदी जा सकती हैं।

(साभार – अभिव्यक्ति डॉट कॉम)

जब करनी हो मॉनसून शॉपिंग

मॉनसून यानि झमाझम बारिश के दिन। आम तौर पर होता है कि आप अपने तमाम पुराने कपड़े बारिश के दिनों में पहन जाती हैं जो बुरा नहीं है मगर हर जगह पुराने कपड़े तो नहीं पहने जा सकते इसलिए जरूरी है कि खरीददारी की जाए मगर ऐसे कि उसे बारिश की नजर न लगे।
जल्दी सूखने वाले फैब्रिक लें
इस मौसम में टाइस जीन्स तो न ही पहनें तो बेहतर होगा। आप पटियाला. पलाजो और नीचे से ढीले पैंट पहन सकती हैं जिससे आपको जलजमाव के बीच चलना पड़े तो इनको जरा सा ऊपर उठा सकें। दफ्तर में नहीं हैं तो कैपरी पहनें और दफ्तर में हल्की स्कर्ट के नीचे घुटनों तक कैपरी पहन सकती हैं जिससे आपको अपने कपड़ों पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत नहीं पड़ेगी। आप शिफॉन, मिक्स्ड कॉटन जैसे फैब्रिक पहन सकती हैं जो जल्दी सूखते हैं।
स्मार्ट लुक के लिए ट्रेंचकोट
ट्रेंचकोट एक अच्छा विकल्प हो सकता है। बारिश के मौसम कॉटन, लाइक्रा आदि टेक्सचर के ट्रेंचकोट बेहतर रहेंगे। बेंज, लाल, नारंगी, पर्पल जैसे रंग इस मॉनसून के परफेक्ट रंग हैं। इस सीजन में आप फ्लावरी प्रिंट या पोल्का डॉट प्रिंट वाले ट्रेंचकोट भी पहन सकती हैं। ब्रिक रेड कलर पहनें।
फुटवेयर हो खास
वैसे तो मॉनसून में स्लीपर्स का ट्रेंड बढ़ जाता है पर आप अगर कुछ खास करना चाहते हैं तो गमबूट और मैकक्वीन हील्स ट्राई करें। ये सुविधानजन तो हैं ही, साथ ही शॉर्ट ड्रेसेज के साथ स्टाइलिश भी लगते हैं। हां, मॉनसून में काले या भूरे लेदर बूट्स को न ही पहनें तो बेहतर होगा। जहां तक रंगों का सवाल है, कलरफुल फुटवेयर के लिए यह मौसम ही सबसे फिट है। आप फॉर्मल पोशाकों के साथ भी चटकीले रंगों के फुटवेयर पहन सकती हैं।
सतरंगी हो छतरी
बारिश के दिनों में बाहर निकलते वक्त छतरी या रेनकोट तो हमारी जरूरत का ही एक हिस्सा है। क्यों न इस जरूरत को ही हम चलन में बदल दें। आजकल फ्लोरल प्रिंट की ट्रांस्पेरेंट छतरी काफी चलन में हैं। इसके अलावा, आप ऑरेंज, ऑलिव ग्रीन जैसे रंगों को कंट्रास्ट रंग की ड्रेसेज के साथ ट्राई कर सकते हैं।
मॉनसून की एक्सेसरीज
चाहे बैग हो या बेल्ट, मॉनसून के फैशन की बात आती है तो इनमें फंकी लुक ही सबसे फिट लगता है। बैग्स के लिए इस मौसम में लेदर हैंडबैग्स की जगह कपड़े, जूट, कॉर्डराय और रैक्सीन जैसे विकल्पों का चयन बेहतर है। फ्लावर प्रिंट वाले बैग्स इस सीजन में चलन में हैं। बेल्ट के लिए पीले और रेड जैसे बोल्ड रंग अच्छे लगेंगे।

कविता को और जीवंत बना गयी कविता की एक साँझ -4

 कोलकाता :  10 जून की शाम कोलकाता की साहित्यिक संस्था नीलांबर के द्वारा कला कुंज सभागार में ‘एक साँझ कविता की -4’ का शानदार आयोजन किया गया।पिछले कुछ वर्षों के दौरान नीलांबर ने अपने आयोजनों के द्वारा पूरे देश के साहित्य प्रेमियों का ध्यान खींचा है।संस्था ने आधुनिक तकनीक का प्रयोग करके साहित्य को आम लोगों के बीच पहुँचाने के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किया है।इसी कड़ी में यह आयोजन था।सबसे पहले दिवंगत कवि केदारनाथ सिंह को श्रद्धांजलि स्वरूप कविता कोलाज की प्रस्तुति की गई, जिसमें ममता पाण्डेय, स्मिता गोयल,ऋतु तिवारी एवं विशाल पाण्डेय ने हिस्सा लिया।इसके बाद घनश्याम कुमार देवांश की कविता ‘नौकरी चुड़ैल है’ पर दीपक कुमार ठाकुर द्वारा मूक अभिनय प्रस्तुत किया गया। तुषार धवल सिंह की कविता ‘अधूरे में’ पर विजय शर्मा द्वारा निर्देशित लघु फिल्म दिखाई गई जिसमें विशाल पाण्डेय, अन्नु राय एवं शाश्वत झा ने अभिनय किया था।’नृत्यंगनाज’ संस्था की रश्मि बंदोपाध्याय एवं समूह ने अनामिका की कविता ‘सृष्टि’ पर भाव नृत्य प्रस्तुत किया।इस कविता में आज के समय में स्त्रियों की दशा का मार्मिक चित्र मौजूद है।राजेश जोशी की कविताओं पर बाशा शिक्षण संस्थान एवं नीलांबर संस्था के बच्चों के द्वारा युग्म रूप से कविता कोलाज की प्रस्तुति की गई।

लिटरेरिया के पोस्टर का अनावरण भी किया गया

इसके अतिरिक्त नरेश सक्सेना की कविता ‘गिरना’ पर स्मिता गोयल के द्वारा  तैयार वीडियो मोंताज दिखाया गया।कविता की इस साँझ में देश के प्रतिष्ठित कवि राजेश जोशी की अध्यक्षता में कविता पाठ में शामिल होने वाले कवियों में शामिल थे अनामिका, तुषार धवल और घनश्याम कुमार देवांश। सारी प्रस्तुतियाँ एवं कवियों का पाठ मंत्रमुग्ध करने वाला रहा एवं  श्रोताओं ने इसकी बहुत प्रशंसा की। इस मौके पर अतिथि के रूप में मौजूद थे वागर्थ पत्रिका के संपादक एवं आलोचक डॉ शंभुनाथ और कुसुम खेमानी।आगत अतिथियों ने कविता कोलज में हिस्सा लेने वाले बच्चों को उपहार प्रदान किया ।साथ में संस्था के अगले बड़े कार्यक्रम ‘लिटरेरिया 2018’ की विधिवत घोषणा करते हुए पोस्टर जारी किए। कार्यक्रम का संचालन अभिनेत्री एवं नाट्यकर्मी कल्पना झा ने किया। नीलांबर संस्था के अध्यक्ष विमलेश त्रिपाठी ने आगत सभी अतिथियों एवं स्रोताओं का स्वागत अपने वक्तव्य से किया। पूरे कार्यक्रम के संयोजन में शामिल थे,  आशा पांडेय, मनोज झा, आनंद गुप्ता,ऋतु तिवारी,स्मिता गोयल, अभिषेक पांडेय, मंटू कुमार साव, पूनम सिंह,रेवा टिबरेवाल,विजय शर्मा, भरत साव, प्रियंका सिंह,निधि पाण्डेय एवं विनोद कुमार।संस्था के उपाध्यक्ष यतीश कुमार ने नीलांबर संस्था एवं उसके आने वाले कार्यक्रमों एवं योजनाओं की संक्षिप्त जानकारी दी। संस्था के सचिव ऋतेश पाण्डेय ने धन्यवाद ज्ञापन किया।कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी  एवं शिक्षक उपस्थित रहें।

तो क्या रघुकुल  के मान सम्मान के लिए कैकेयी ने भेजा था श्री राम को वनवास?

हिंदू धर्म के पवित्र ग्रन्थ रामायण के अनुसार श्री राम को उनकी सौतेली माँ कैकेयी ने चौदह वर्षों के वनवास पर भेज दिया था ताकि श्री राम के स्थान पर उनके अपने पुत्र भरत को अयोध्या का राजा बना दिया जाए। लेकिन क्या आप यह जानते हैं कि कैकेयी के ऐसा करने के पीछे असली वजह कुछ और ही थी जिसे जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे। तो आइए जानते हैं अपने सगे पुत्र से भी ज़्यादा श्री राम से स्नेह रखने वाली माता कैकेयी ने आखिर ऐसा क्यों किया।
राजा दशरथ और बाली का युद्ध जैसा कि हम सब जानते हैं कि राजा दशरथ की तीन रानियां थी कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी। कहते हैं इन तीनों रानियों में रानी कैकेयी अस्त्र-शस्त्र और रथ संचालन में पारंगत थी इसलिए वह अकसर युद्ध में राजा दशरथ के साथ होती थीं। राजा को भी अपनी इस रानी पर बेहद गर्व था।
एक बार राजा दशरथ और बाली के बीच युद्ध हो रहा था क्योंकि बाली को यह वरदान प्राप्त था कि वह जिस पर भी अपनी नजर डालेगा, उसकी सारी शक्तियाँ स्वयं उसके पास आ जाएंगी इसलिए दशरथ की भी सारी शक्तियां बाली में समा गयीं और युद्ध में उनकी पराजय हुई। उस युद्ध में दशरथ के साथ कैकेयी भी मौजूद थीं।
युद्ध में दशरथ को हराने के बाद बाली ने उनसे कहा कि या तो वे अपने रघुकुल की शान का प्रतीक अपना मुकुट उसे दे जाएं या फिर अपनी रानी कैकेयी को उसे सौंप दे। तब दशरथ ने कैकेयी की जगह अपना मुकुट बाली को दे दिया और अपनी रानी को लेकर वापस अयोध्या लौट गए।
कैकेयी ने भेजा श्री राम को वनवास राजा दशरथ के युद्ध में हारने के बाद रानी कैकेयी मुकुट को लेकर हमेशा चिंतित रहती। वे हर पल सोचती कि आखिर रघुकुल की इज़्ज़त को वापस कैसे लाया जाए इसलिए उन्हें याद आया कि राजा दशरथ ने उन्हें वचन दिया था कि वे जब चाहे उनसे कुछ भी मांग सकती है।
कैकेयी इस बात को भलीभांती जानती थी कि रघुकुल की मान सम्मान की रक्षा उनके पुत्र श्री राम से बेहतर और कोई नहीं कर सकता है इसलिए उन्होंने राजा दशरथ से अपने वचन को पूरा करने के लिए कहा, जिसमें उन्होंने दशरथ से श्री राम के लिए चौदह वर्षों का वनवास मांग लिया और साथ ही अपने पुत्र भरत का राजतिलक।
यह सुनकर सभी हैरान रह गए और कैकेयी माता से कुमाता बन गयीं। जब श्री राम को अपने पिता के दिए हुए वचन के बारे में पता चला तब बिना सोचे समझे उन्होंने फ़ौरन वनवास के लिए हाँ कर दी ताकि राजा दशरथ का दिया हुआ वचन खाली न जाए। जब श्री राम बाली से मिले कहा जाता है कि वनवास पर जाने से पहले रानी कैकेयी ने श्री राम को उस मुकुट के बारे में बताया था जो युद्ध में हार के बाद राजा दशरथ ने बाली को सौंप दिया था। साथ ही उन्होंने श्री राम को यह भी आज्ञा दी थी कि वे बाली के साथ युद्ध कर उसे पराजित करें और अपने पिता का दिया हुआ मुकुट उससे वापस लेकर आएं।
वनवास के दौरान श्री राम ने बाली के छोटे भाई सुग्रीव को न्याय दिलाने के लिए बाली से युद्ध किया जिसमें उसकी हार हुई। तब श्री राम ने उससे अपने पिता के मुकुट के विषय में पूछा बाली ने उन्हें बताया कि वह मुकुट छल से रावण अपने साथ ले गया है। साथ ही उसने श्री राम को आश्वासन दिया कि उसका पुत्र अंगद अपनी जान की बाज़ी लगाकर भी रावण से वह मुकुट वापस लेकर आएगा लेकिन इसके लिए वह अंगद को अपनी शरण में ले लें। जब अंगद ने रावण से वापस लिया राजा दशरथ का मुकुट अपने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए अंगद ने राजा दशरथ का मुकुट वापस लाने की ज़िम्मेदारी ले ली इसलिए वह श्री राम का दूत बनकर लंका पहुंचा।
वहां पहुंचकर उसने सभा में उपस्थित सभी वीरों को चुनौती दे डाली कि उसके पैर को हिला कर दिखाएं। जब सभी ने हार मान ली तब अंत में रावण आगे आया और जैसे ही वह अंगद के पैर को हिलाने के लिए नीचे झुका उसके सिर का मुकुट ज़मीन पर गिर पड़ा। यह देख अंगद ने फ़ौरन वह मुकुट उठाया और सीधे श्री राम के पास पहुंचा ताकि उन्हें उनकी अमानत वापस लौटा सके।

(साभार – द बोल्ड स्काई)

विस्फोट में गंवा दिए दोनों पैर, फिर भी ड्यूटी पर लौटा है सीआरपीएफ का यह जांबाज़ सिपाही!

नयी दिल्ली :   सीमा पर हमारी रक्षा करता हर जवान हमारे आदर का पात्र है, पर इनमें से भी कुछ की कहानी इतनी प्रेरणा भरी होती है कि हम जीवन भर उसे भुला नहीं पाते। ऐसी ही एक कहानी है सीआरपीएफ जवान बी. रामदास के जीवन की, जो इनके शौर्य और अदम्य साहस से भरी हुई है।
नवम्बर, 2017 में छत्तीसगढ़ के सुकुमा जिले में नक्सलियों द्वारा लगाए गए आईईडी ब्लास्ट में वह बुरी तरह से घायल हो गए थे। इस हादसे में उन्होंने अपने दोनों पैर खो दिए।
ज़ी न्यूज़ की रिपोर्ट के मुताबिक, 208 बटालियन कोबरा जवान और जिला पुलिस की एक संयुक्त टीम उप-कमांडेंट अम्बुज कुमार श्रीवास्तव के नेतृत्व में किस्ताराम ज़िले में एक ऑपरेशन पर थी। जब टीम पुलिस स्टेशन से 2 किलोमीटर दूर एक जंगल में निरीक्षण कर रही थी तब रामदास का पैर दबाव संचालित विस्फोटक उपकरण पर पड़ गया और जिसके चलते हुए विस्फोट में वो घायल हो गए।
रामदास को डॉ अनिल द्वारा शुरुआती उपचार दिया गया था, उस वक्त वह अपनी टीम के साथ किस्ताराम में मौजूद थे। रामदास के दोनों पैर गंभीर रूप से चोटिल हुए थे। इसके बाद उन्हें बेहतर इलाज के लिए हेलिकॉप्टर से रायपुर भेज दिया गया।
ऑपरेशन के दौरान उनका जीवन बचाने के लिए उनके दोनों पैरों को घुटने के नीचे से काटना पड़ा।
पर रामदास ने हार स्वीकार नहीं की और हाल ही में ठीक होने के बाद उन्होंने 208 कोबरा टीम में वापसी की है। रामदास और उनकी पत्नी की फोटो साँझा करते हुए मेजर सुरेंद्र पुनिया ने लिखा कि सैनिक घायल होते हैं पर हारते कभी नहीं। इनके लिए देश सबसे बढ़कर है।

( साभार – द बेटर इंडिया)

इक्वाडोर की विदेश मंत्री बनेंगी संयुक्त राष्ट्र महासभा की अगली अध्यक्ष

संयुक्त राष्ट्र : संयुक्त राष्ट्र महासभा ने अपनी अगली अध्यक्ष के तौर पर इक्वाडोर की विदेश मंत्री मारिया फर्नांडा इस्पिनोसा को आज चुना। वह 73 वर्षों के इतिहास में 193 सदस्यीय इस विश्व निकाय की अगुवाई करने वाली चौथी महिला हैं। इस्पिनोसा अपनी महिला प्रतिद्वंद्वी संयुक्त राष्ट्र में होंडुरास की दूत मैरी एलिजाबेथ फ्लोर्स फ्लैक को हराकर इस पद निर्वाचित हुईं। फ्लैक को मिले 62 मतों के मुकाबले उन्हें 128 वोट मिले।
परिषद के अध्यक्ष स्लोवाकिया के मिरोस्लाव लजकाक ने तालियों की गड़गड़ाहट के बीच नतीजों की घोषणा की।संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुतारेस ने कहा , ‘‘ हम कर सकते हैं और हमें बेहतर करना चाहिए। ’’ इस मौके पर इस्पिनोसा ने उम्मीद जताई कि लैंगिक समानता की दिशा में सकारात्मक प्रगति होती रहेगी और उन्होंने अपने निर्वाचन को ‘‘ दुनिया की उन सभी महिलाओं को समर्पित किया जो मौजूदा राजनीति में भाग लेती हैं और जिन्होंने पुरुषवादी तथा भेदभावपूर्ण राजनीतिक तथा मीडिया हमलों का सामना किया है। ’’ इस्पिनोसा ने अपनी जीत के बाद कहा कि वह इस पद पर निर्वाचित होने वाली लातिन अमेरिका और कैरिबिया की पहली महिला हैं। उन्होंने बाद में संवाददातओं से कहा कि उनकी प्राथमिकताएं प्रवास पर वैश्विक असर के लिए वार्ता को अंतिम रूप देना , जलवायु परिवर्तन पर कदमों को बढ़ावा देना , संयुक्त राष्ट्र में सुधारों को लागू करना और वित्तीय आर्थिक विकास के नए रास्ते तलाशना होंगी।

नहीं रहे वरिष्ठ पत्रकार राजकिशोर

नयी दिल्ली : जाने-माने चिंतक, पत्रकार और लेखक राजकिशोर का आज यहां अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में निधन हो गया। वह 72 वर्ष के थे और पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे। उनके परिवार में पत्नी, बेटी, बहू और एक पौत्र तथा एक पौत्री हैं। उनके पुत्र विवेक का गत 22 अप्रैल को ही मस्तिष्काघात से आकस्मिक निधन हो गया था। राजकिशोर ने अपने पत्रकारीय जीवन की शुरुआत सत्तर के दशक में कोलकाता से प्रकाशित साप्ताहिक पत्रिका ‘रविवार’ से की थी। वहां लंबे समय तक काम करने के बाद वह दिल्ली आ गए, जहां उन्होंने राजेंद्र माथुर और सुरेंद्र प्रताप सिंह के साथ नवभारत टाइम्स में लंबे समय तक काम किया।
कुछ समय पहले तक वह इंदौर से प्रकाशित पत्रिका ‘रविवार डाइजेस्ट’ का भी संपादन कर रहे थे। उनके द्वारा संपादित पुस्तक श्रृंखला ‘आज के प्रश्न’ हिंदी जगत में काफी चर्चित रही और सराही गई। इस श्रृंखला के तहत 22 पुस्तकें प्रकाशित हुईं। इसके अलावा भी उनके दो उपन्यास और एक व्यंग्य संग्रह सहित कई पुस्तकें प्रकाशित हुईं।

बोतल क्रशर मशीन में बेकार बोतल डालकर कमायें 5 रुपये प्रति बोतल

बंगलुरू : बंगलुरु रेलवे डिवीजन ने पर्यावरण और स्वच्छता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। रेलवे विभाग ने अपनी इस पर्यावरण अनुकूल पहल के चलते अपने मुख्य रेलवे स्टेशनों पर बोतल क्रशर लगवाए हैं। यह बोतल क्रशर केएसआर सिटी, यशवंतपुर, कंटोनमेंट और कृष्णराजपुरम स्टेशनों पर लगाए गये हैं। द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, इन सभी बोतल क्रशरों को लगवाने का खर्च पारले एग्रो नमक निजी कंपनी ने अपने सीएसआर प्रोजेक्ट के तहत उठाया है। यह मशीनें बिजली द्वारा चलेंगीं, जिसका खर्च रेलवे उठाएगी। रेलवे ने घोषणा की है कि जो भी व्यक्ति इन मशीनों में बेकार बोतल डालेगा, उसे 5 रुपये प्रति बोतल दिए जाएंगे। जी हाँ, आपको बस बोतल मशीन में डालने के बाद मशीन में अपना मोबाइल नंबर डालना होगा और आपको आपके पेटीएम पर 5 रुपये क्रेडिट कर दिए जाएंगे। डिविजनल रेलवे मैनेजर, आर. एस सक्सेना ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया को बताया कि इस पहल पर यात्रियों की प्रतिक्रिया के आधार पर बाकी स्टेशनों पर भी मशीनें लगायीं जाएँगी। उन्होंने कहा कि “इससे यह भी सुनिश्चित होगा कि प्लास्टिक की बोतलों को रेलवे ट्रैक या स्टेशन परिसर में नहीं डाला जाये। यह प्लास्टिक की बोतलों का निपटान करने के लिए एक पर्यावरण अनुकूल विकल्प भी है।”
स्टेशनों पर लगाई गयी प्रत्येक मशीन की लागत 4.5 लाख रुपये है। एक बार मशीन में बोतल गिरा दी जाती है, तो मशीन इन बोतलों को प्लास्टिक के टुकड़ों के रूप में बदल देती है, जिसे फिर से उपयोग में लाया जा सकता है। इससे पहले बोतल क्रशर मैसूर, पुने, अहमदाबाद और मुंबई स्टेशनों पर भी लगाए गए हैं।

क्या आप पिता बनने जा रहे हैं?

माता-पिता बनने की खुशी के एहसास को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। गर्भ में पल रहे बच्चे को गोद में खिलाने के लिए माता पिता दोनों बेसब्री से इंतजार करते हैं। ये तो हम सभी जानते हैं कि गर्भावस्था के समय महिलाओं के दिमाग में अलग-अलग विचार आने लगते हैं। उन्हें बहुत चीजों का तनाव रहने लगता है, पर आप यह नहीं जानते होंगे कि पिता बनने के ख्याल से पुरुष के दिमाग में भी तरह-तरह के ख्याल आने लगते हैं व उन्हें भी कई बातें डराती हैं मगर हर समस्या के साथ समाधान भी होता है…कुछ इस तरह –
पिता बनने की खबर एक तरफ आपको खुशी देती है तो दूसरी तरफ अच्छा पिता बन सकने की चुनौती भी आपके सामने होती है।
आप अपनी बढ़ती जिम्मेदारियों को लेकर परेशान हो जाते हैं। अगर आपके मन में भी ऐसे ख्याल आ रहे हैं तो आप चाइल्ड केयरिंग क्लास ले सकते हैं और इन पर भरोसा नहीं हैं तो आप अपने पिता, चाचा, भाई या किसी दोस्त से बात करें। इससे आपके मन में पैदा हो रहे नकारात्मक विचार दूर हो जाएंगे।
बच्चे के आने के बाद यह सही है कि जिन्दगी एक जैसी नहीं रहती। अब आप हो सकता है कि दोस्तों को पहले की तरह वक्त न दे सकें मगर इसका एक बेहतर तरीका यह है कि अपनी पत्नी और बच्चों को दोस्तों से मिलवायें। आप दोनों के दोस्त एक होंगे तो आपका तनाव कम होगा और आप अकेलापन भी महसूस नहीं करेंगे। वह दफ्तर के बाद पार्टी कम होगी मगर बिलकुल नहीं हो सकती, ऐसा नहीं है।
अधिकतर भारतीय पुरुषों को शिकायत रहती है कि बच्चे आने के बाद उनकी पत्नी उन पर ध्यान नहीं देती। बच्चा जगता है तो आपको भी उसके साथ जागना पड़ता है। इसका एकमात्र कारण यह है कि आपने खुद को घर से और घर की जिम्मेदारियों से काट रखा है। जाहिर कि आपकी पत्नी पर सारा बोझ पड़ेगा तो उसके लिए वक्त निकालना मुश्किल होगा। इसका एक समाधान यह है कि बच्चे की परवरिश और घर के कामों में आप उसका साथ दें। उसे अच्छा लगेगा और काम के साथ रोमांस के पल भी आपको मिल सकेंगे। बच्चे की छोटी – छोटी शरारतें आपका बचपन लौटा देंगी और पत्नी का साथ देकर आप अपना रिश्ता और मजबूत कर सकेंगे। वैसे भी 5-6 महीने में आपका बच्चा आपको परेशान करना कम कर देगा और आपनी पत्नी के साथ पहले जैसा समय बिता सकते हैं।
सच है कि महिलाओं से ज्यादा पुरुषों को डिलवरी के प्रोसेस से डर लगता हैं। पत्नी को लेबर पेन को देखकर उनकी हालत खराब हो जाती है। डिलवरी के प्रोसेस के बारे में सोचकर वह पहले ही तनाव में रहने लगते हैं। अपने दोस्तों, मम्मी, परिवार और पड़ोसियों से रिश्ते अच्छे रखें। आपका डर और खुशी दोनों, बाँटना आसान होगा।