Monday, April 13, 2026
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शिव सिखाते हैं,सच्चे प्रेम का मतलब क्‍या है

जब बात अच्छे जीवनसाथी को पाने की होती है तो व्रत का जिक्र खुद ही आ जाता है। आप कहीं भी देखिए, अच्छी पत्नी और अच्छा परिवार पाने के लिए तमाम उपदेश भरे आलेख मिल जाते हैं। अधिकतर व्रत स्त्रियाँ ही करती हैं तो ऐसे में यह सवाल तो बनता है कि क्या पार्वती को ही शिव चाहिए? क्या शिव को पार्वती की जरूरत नहीं? अगर ऐसा है तो सिर्फ पार्वती ने ही व्रत क्यों किया? नियम और जब परम्परायें जब अपनी सुविधा में ढले हों तो उनको बदलने की जरूरत कोई महसूस नहीं करता मगर अधकचरा और अपूर्ण ज्ञान कई बार जानबूझकर रखा जाता है क्योंकि इस पुरुष प्रधान व पितृसत्तात्मक समाज की सुविधा इसी में थी कि स्त्रियाँ सज -धजकर परिवार और पति के लिए व्रत रखें। मैंने सुना है कि शिव ने भी पार्वती के लिए व्रत रखा था, बहुत कुछ सम्भव है मगर आज इसका उल्लेख न के बराबर होता है। यह कहने में संकोच नहीं है कि प्राचीन भारत में स्त्रियों को समानता का अधिकार था मगर यह विवाद अपनी जगह है। तीज या शिवरात्रि के मौके होते हैं कि शिव जैसे पति की कामना का जिक्र खूब होता है। आप एक पति के रूप में उनके जैसा आदर चाहते हैं, पार्वती सा भक्ति भाव चाहते हैं मगर सवाल तो यह है कि क्या आपके अन्दर शिव बनने की सामर्थ्य है या उनका एक भी गुण हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि सामाजिक परम्पराओं के बहाने पत्नी का व्रत रखना आपके इगो को संतुष्ट करने के लिए जरूरी हो गया है? बहुत से पुरुष आज बदल रहे हैं और समानता की बातें भी करते हैं मगर बदलाव तो आपके हाथ में हैं और चयन का अधिकार भी। स्त्रियों की दुनिया रातों रात तब तक नहीं बदलेगी जब तक कि पुरुष उसका साथ न दें। परम्परायें आसान हो जाती हैं जब उनमें समानता और सहयोगिता की भावना हो और ऐसा करना आपके हाथ में है। पुरानी पीढ़ी न सही मगर आज के युवाओं से तो उम्मीद की ही जानी चाहिए कि वे आसमान के चाँद न सही सहयोग और सहकारिता का चाँद अपनी पत्नी के हाथ में रख दें। एक बार अपनी पत्नी के लिए भूखा रहकर देखिए और इन परम्पराओं में भागेदारी कीजिए। मैं पढ़ रही। द क्विन्ट पर प्रकााशित शिल्पी झा का आलेख शिव के उन महत्वपूर्ण पहलुओं पर बात करता है जिस पर बात कम की गयी है। अपराजिता का प्रयास रहता है कि नयी सोच की बातें आपके साथ साझा करे तो हम आपको यह आलेख पढ़वा रहे हैं। इसे पढ़िए और तय कीजिए कि क्या आप इन मानकों पर खरे उतरते हैं –

शिव सिखाते हैं,सच्चे प्रेम का मतलब क्‍या है

शिल्‍पी झा
शिवरात्रि दिन कुंवारी लड़कियों के लिए शिव सा पति मांगने का है, तो शादीशुदा औरतों के लिए पार्वती सा अखंड अहिबात मांगने का. समय चाहे कितना भी बदल जाए, पति या प्रेमी के तौर पर शिव की प्रासंगिकता कभी खत्म नहीं होगी। चूंकि शिव सच्चे अर्थों में आधुनिक, मेट्रोसेक्सुअल पुरुषत्व के प्रतीक हैं, इसलिए हर युग में स्त्रियों के लिए काम्य रहे हैं।
शिव जैसा सरल और सहज कोई नहीं
शिव का प्रेम सरल है, सहज है, उसमें समर्पण के साथ सम्मान भी है। शिव प्रथम पुरुष हैं, फिर भी उनके किसी स्वरूप में पुरुषोचित अहंकार यानी मेल ईगो नहीं झलकता। सती के पिता दक्ष से अपमानित होने के बाद भी उनका मेल ईगो उनके दाम्पत्य में कड़वाहट नहीं जगाता। अपने लिए न्‍योता नहीं आने पर भी सती के मायके जाने की जिद का शिव ने सहजता से सम्मान किया।
आज के समय में भी कितने ऐसे मर्द हैं, जो पत्नी के घरवालों के हाथों अपमानित होने के बाद उसका उनके पास वापस जाना सहन कर पाएंगे? शिव का पत्नी के लिए प्यार किसी तीसरे के सोचने-समझने की परवाह नहीं करता लेकिन जब पत्नी को कोई चोट पहुँचती है, तब उनके क्रोध में सृष्टि को खत्म कर देने का ताप आ जाता है।
शिवरात्रि दिन कुंवारी लड़कियों के लिए शिव सा पति मांगने का है तो शादी-शुदा औरतों के लिए पार्वती सा अखंड अहिबात मांगने का दिन है। हिन्दू मान्यताएं कहती हैं कि बेटा राम सा हो, प्रेमी कृष्ण सा, लेकिन पति शिव सा होना चाहिए। पार्वती के अहिबात सा दूसरा कोई सुख नहीं विवाहिता के लिए. क्यों? क्योंकि शिव सा पति पाने के लिए केवल पार्वती ने ही तप नहीं किया, शिव ने भी शक्ति को हासिल करने लिए खुद को उतना ही तपाया।
शक्ति के प्रति अपने प्रेम में शिव खुद को खाली कर देते हैं। कहते हैं, पार्वती का हाथ माँगने शिव, उनके पिता हिमालय के दरबार में सुनट नर्तक का रूप धरकर पहुंच गए थे. हाथों में डमरू लिए, अपने नृत्य से हिमालय को प्रसन्न कर जब शिव को कुछ माँगने को कहा गया, तब उन्होंने पार्वती का हाथ उनसे माँगा।
शिव न अपने प्रेम का हर्ष छिपाना जानते हैं, न अपने विरह का शोक। उनका प्रेम निर्बाध और नि:संकोच है, वह मर्यादा और अमर्यादा की सामयिक और सामाजिक परिभाषा की कोई परवाह नहीं करता। अपने ही विवाह भोज में जब शिव को खाना परोसा गया, तो श्वसुर हिमालय का सारा भंडार खाली करवा देने के बाद भी उनका पेट नहीं भरा. आखिरकार उनकी क्षुधा शांत करने पार्वती को ही संकोच त्याग उन्हें अपने हाथों से खिलाने बाहर आना पड़ता है। फिर पार्वती के हाथों से तीन कौर खाने के बाद ही शिव को संतुष्टि मिल गयी।
यूं व्यावहारिकता के मानकों पर देखा जाए, तो शिव के पास ऐसा कुछ भी नहीं, जिसे देख-सुनकर ब्याह पक्का कराने वाले मां-बाप अपने बेटी के लिए ढूंढते हैं। औघड़, फक्कड़, शिव, कैलाश पर पत्नी की इच्छा पूरी करने के लिए एक घर तक नहीं बनवा पाए, तप के लिए परिवार छोड़ वर्षों दूर रहने वाले शिव। साथ के जो सेवक वो भी मित्रवत, जिनके भरण की सारी जिम्मेदारी माता पार्वती पर पार्वती के पास अपनी भाभी, लक्ष्मी की तरह एश्वर्य और समृद्धि का भी कोई अंश नहीं।

फिर भी शिव के संसर्ग में पार्वती के पास कुछ ऐसा है, जिसे हासिल कर पाना आधुनिक समाज की औरतों के लिए आज भी बड़ी चुनौती है। पार्वती के पास अपने फैसले स्वयं लेने की आजादी है. वो अधिकार, जिसके सामने दुनिया की तमाम दौलत फीकी पड़ जाए।
पार्वती के हर निर्णय में शिव उनके साथ है। पुत्र के रूप में गणेश के सृजन का फैसला पार्वती के अकेले का था, वो भी तब, जब शिव तपस्या में लीन थे लेकिन घर लौटने पर गणेश को स्वीकार कर पाना शिव के लिए उतना ही सहज रहा, बिना कोई प्रश्न किए, बिना किसी संदेह के। पार्वती का हर निश्चय शिव को मान्य है।
शिव अपनी पत्नी के संरक्षक नहीं, पूरक हैं। वह अपना स्वरूप पत्नी की तत्कालिक जरूरतों के हिसाब से निर्धारित करते हैं। पार्वती के मातृत्व रूप को शिव के पौरुष का संरक्षण है, तो रौद्र रूप धर विनाश के पथ पर चली काली के चरणों तले लेट जाने में भी शिव को कोई संकोच नहीं।
शिव के पौरुष में अहंकार की ज्वाला नहीं, क्षमा की शीतलता है। किसी पर विजय पाने के लिए शिव ने कभी अपने पौरुष को हथियार नहीं बनाया, कभी किसी के स्त्रीत्व का फायदा उठाकर उसका शोषण नहीं किया। शिव ने छल से कोई जीत हासिल नहीं की. शिव का जो भी निर्णय है, प्रत्यक्ष है।

वहीं दूसरी ओर शक्ति अपने आप में संपूर्ण है, अपने साथ पूरे संसार की सुरक्षा कर सकने में सक्षम। उन्हें पति का साथ अपने सम्मान और रक्षा के लिए नहीं चाहिए, प्रेम और साहचर्य के लिए चाहिए. इसलिए शिव और शक्ति का साथ बराबरी का है। पार्वती, शिव की अनुगामिनी नहीं, अर्धांगिनी हैं।
कथाओं की मानें, तो चौसर खेलने की शुरुआत शिव और पार्वती ने ही की। इससे इस बात की पुष्टि होती है कि गृहस्थ जीवन में केवल कर्तव्य ही नहीं होते, स्वस्थ रिश्ते के लिए साथ बैठकर मनोरंजन और आराम के पल बिताना भी उतना ही जरूरी है। शिव और पार्वती का साथ सुखद गृहस्थ जीवन का अप्रतिम उदाहरण है।
अलग-अलग लोक कथाओं में शिव और शक्ति कई बार एक-दूसरे से दूर हुए, लेकिन हर बार उन्‍होंने एक-दूसरे को ढूंढकर अपनी संपूर्णता को पा लिया. इसलिए शिव और पार्वती का प्रेम हमेशा सामयिक रहेगा, स्थापित मान्यताओं को चुनौती देता हुआ, क्योंकि शिव होने के मतलब प्रेम में बंधकर भी निर्मोही हो जाना है, शिव होने के मतलब प्रेम में आधा बंटकर भी संपूर्ण हो जाना है।

ये हैं भारत के प्रसिद्ध गणेश मंदिर

गणेश चतुर्थी का त्योहार भारत में बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है इस बार गणेश उत्सव 13 सितंबर को पड़ रहा है। भारत में कई गणेश मंदिर है लेकिन कुछ मंदिर ऐसे हैं जिनकी काफी मान्यता है और हमेशा यहां भक्तों का तांता लगा रहता है। गणेश चतुर्थी के दिन इन मंदिरों की भव्यता और माहौल अलग ही होता है। अगर आप इस बार गणेशोत्सव को कुछ अलग तरीके से मनाना चाहते हैं तो देश के इन प्रसिद्ध गणेश मंदिरों में जरूर जाएं –
श्री सिद्धिविनायक मंदिर, मुम्बई

तस्वीर -साभार

यह मंदिर न केवल मुंबई बल्कि पूरे भारत में प्रसिद्ध है। यहां गणेश चतुर्थी के दिन त्योहार जैसा माहौल होता है। गणेश चतुर्थी से कुछ दिन पहले ही मंदिर सजने लगता है। महानगर मुंबई में होने के कारण इस मंदिर में बड़े-बड़े सेलिब्रिटी भी आते हैं। इस मंदिर का निर्माण 1801 में लक्ष्मण विथू और देऊभाई पाटिल ने करवाया था।

मोती डूँगरी गणेश मंदिर, जयपुर


यह जयपुर का सबसे प्रसिद्ध गणेश मंदिर है जो शहर में मोती डूंगरी पहाड़ी के ऊपर स्थित है। इसका निर्माण 1761 में किया गया था। जबकि इसमें स्थित मूर्ति करीब 500 साल पुरानी बताई जाती है। इस मंदिर के प्रागण में शिवलिंग भी है जो केवल महाशिवरात्रि के दिन ही श्रद्धालुओं के लिए खुलता है। इस मंदिर का निर्माण नागरा शैली में किया गया है।
कनिपकम विनायक मंदिर, चित्तूर


यह एक प्राचीन मंदिर है जिसका निर्माण 11वीं सदी में चोल राजा कुलोथुंगा चोला ने करवाया था। यहां रखी भगवान गणेश की मूर्ति सफेद, पीली और लाल रंग की है। इस मंदिर का ऐतिहासिक महत्व है। ऐसा माना जाता है कि मंदिर के पवित्र जल में स्नान करने से सभी पाप और परेशानियों से छुटकारा मिल जाता है।
दगडूशेठ हलवाई गणपति मंदिर, पुणे


इस मंदिर में भगवान गणेश की 7.5 फीट ऊंची और 4 फीट चौड़ी मूर्ति लगी है जिसपर करीब 8 किलो सोना लगा है। यह मंदिर का निर्माण 1800 वीं सदी में दगडूशेठ नाम के हलवाई ने करवाया था। 1893 में इसका निर्माण खत्म हुआ था। यहां गणेश चतुर्थी काफी धूमधाम से मनाई जाती है।

अन्तरराष्ट्रीय बाल फिल्म महोत्सव कर ‘बाल आयोजकों’ ने भरी उड़ान

मालदा : बच्चों की बात कहना ही नहीं बल्कि सुनना भी उतना ही जरूरी है। इससे भी ज्यादा जरूरी है कि उनमें नेतृत्व का गुण विकसित किया जाये जिससे वे खुद बड़ी जिम्मेदारी निभा सकें। आपने बच्चों के लिए फिल्म महोत्सव सुना होगा मगर एक बाल फिल्म महोत्सव ऐसा है जो सिर्फ बच्चों के लिए है और बच्चों द्वारा ही आयोजित किया जाता है। आयोजन की सफलता निरन्तरता में है और दूसरी बार यूनिसेफ तथा मालदा जिला प्रशासन के सहयोग से यह अन्तरराष्ट्रीय बाल फिल्म महोत्सव आयोजित कर किशोरों ने अपने हौसले का परिचय दे दिया है। मालदा के एडीएम पद्म सुनाम ने इस अन्तरराष्ट्रीय बाल फिल्म महोत्सव का उद्घाटन करते हुए किशोरों के हौसलों की जमकर तारीफ की। ये बाल आयोजक तलाश सोसायटी के नेतृत्व में काम कर रहे बच्चों और किशोरों की 30 सदस्यों वाली कमेटी के सदस्य थे। इस फिल्म महोत्सव की शुरुआत लोकप्रिय बाल फिल्म ‘रेन्बो जेली’ से हुई। इस फिल्म के निर्देशक सौकर्य बसु तथा बाल कलाकार महाब्रत बसु इस अवसर पर उपस्थित थे। फिल्म महोत्सव के अन्तर्गत ‘अरण्यदेब’ फिल्म का भी प्रदर्शन किया गया। ‘अरण्यदेब’ के निर्देशक देवाशीष सेन शर्मा भी इस मौके पर मौजूद थे। यूनिसेफ की चाइल्ड ऑफिसर स्वप्नदीपा विश्‍वास ने बताया कि यह बाल फिल्म महोत्सव का दूसरा संस्करण है जिसमें संचालक, प्रदर्शन करने वाले कलाकार, इवेन्ट मैनेजर, डिजाइनर्स, वॉलेन्टियर्स और मीडिया प्रवक्ता की भूमिका में भी बच्चे और किशोर ही थे। इस साल यूनिसेफ की थीम ‘वैल्यू ऑफ गर्ल्स’ यानि ‘लड़कियों का सम्मान’ है। इस बाल फिल्म महोत्सव के माध्यम से उन विषमताओं और भेदभाव को सामने लाने का प्रयास किया जा रहा है जिससे विभिन्न क्षेत्रों में लड़कियाँ जूझ रही हैं। यूनिसेफ का उद्देश्य सभी लड़कियों तक विभिन्न कार्यशालाओं, परिचर्चाओं और फिल्मों के प्रदर्शन के माध्यम से समानता के अधिकारों को प्रोत्साहित करना है।
तलाश सोसायटी की सदस्य सागरिका बांजुरिया ने बताया कि इस फिल्म महोत्सव की तैयारी जुलाई से ही की जा रही थी। यह बाल फिल्म महोत्सव ग्रामीण अँचल को उन वंचित बच्चों तक सिनेमा को पहुँचाने की कोशिश है जो इस तरह के महोत्सवों तक नहीं पहुँच पाते। उसने बताया कि इस वर्ष मालदा के अन्तरराष्ट्रीय बाल फिल्म महोत्सव को सफल बनाने में तलाश सोसायटी यूनिसेफ को मालदा जिला प्रशासन, यूनिसेफ और सिने सेन्ट्रल का महत्वपूर्ण सहयोग मिला। इस बाल फिल्म महोत्सव के तहत मालदा के 8 ब्लॉकों में फिल्में प्रदर्शित की गयीं। इन ब्लॉकों में कालियाचक 3, हरीशचन्द्रपुर 1, चांचल 1, रतुआ1, रतुआ 2, हबीबपुर, गाजोल और ओल्ड मालदा शामिल हैं। फिल्म महोत्सव 7 सितम्बर तक चला।

कुलपी ने हासिल की 99 फीसदी संस्थागत शिशु प्रसव दर

कुलपी : पश्‍चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के कुलपी ब्लॉक ने अत्याधुनिक सुविधाओं द्वारा 99 फीसदी संस्थागत शिशु प्रसव दर हासिल कर ली है। एक अधिकारी ने इस बात की जानकारी दी। डायमंड हार्बर स्वास्थ्य जिले के उप मुख्य चिकित्सा अधिकारी त्रिदिब दास ने कहा, ‘भारत सरकार की स्वास्थ्य प्रबन्धन रिपोर्ट के मुताबिक, हमने 2017-18 में 99 फीसदी संस्थागत प्रसव दर हासिल की है।’ इस प्रयास के बारे में विस्तार से बताते हुए कुलपी ग्रामीण अस्पताल के स्वास्थ्य, ब्लॉक चिकित्सा अधिकारी ए.एस. मोहम्मद महफूज उल करीम ने कहा, ‘हमें ग्रामीण समुदाय के लोगों और महिलाओं का विश्‍वास जीतना था, जो कि घरों में अपने बच्चों को जन्म देने में सहज महसूस करती थीं। सरकार और यूनीसेफ की मदद के साथ हमने बुनियादी सुविधाओं की कमी, प्रशिक्षिण की कमी और महिलाओं की सुरक्षा जैसी समस्याओं को हल किया व आशा कार्यकर्ताओं की मदद से जागरूकता फैलाई।’ कुलपी कोलकाता से 62 किलोमीटर दूर है। करीम के मुताबिक एक ग्रामीण अस्पताल का बेहतर माहौल लोगों का विश्‍वास जीतने में जादुई काम कर सकता है। लिहाजा, बदले हुए प्रसव कक्षों, प्रसव के बाद वाले वार्ड ने इसमें अहम भूमिका निभाई। करीम ने कहा कि हमने सुनिश्‍चित किया कि एक सरकारी अस्पताल होने के कारण यहाँ एक मरीज को फर्श पर नहीं लेटना पड़े और स्वच्छता को नजरअंदाज न किया जाए। दक्षिण 24 परगना में संस्थागत प्रसव और रूटीन बचाव के उपायों को बढ़ावा देने वाली एक पहल ‘आनंदी’ की शुरुआत 20 अगस्त 2015 को हुई थी। यूनीसेफ ने परियोजना के लिए अवधारणा, योजना, समर्थन, निगरानी, सहायक पर्यवेक्षण में तकनीकी सहायता और समग्र मार्गदर्शन मुहैया कराया था। पूरे दक्षिण 24 परगना जिले में संस्थागत प्रसव दर में 20 फीसदी से ज्यादा का सुधार देखा गया। यहां 2014-15 में यह दर 65 फीसदी थी, जो 2017-18 में 90 फीसदी से ज्यादा दर्ज की गयी। कुलपी उन ब्लॉकों में से एक है, जहां बीएमओएच, चिकित्सा अधिकारियों, स्टाफ नर्स और अन्य की सक्रिय भागीदारी से उल्लेखनीय सुधार देखा गया।

बच्चों ने उठाया पिज्जा पार्टी का आनन्द

कोलकाता : कई बार चेहरों पर मुस्कान लाने के लिए छोटी – छोटी खुशियाँ बहुत मायने रखती हैं। लायन्स क्लब ऑफ कलकत्ता, सियालदह, डिस्ट्रिक्ट 322बी वन ने ऐसी ही पहल करते हुए बच्चों को पिट्जा खिलाया। हो सकता है कि यह हम सबके लिए आम बात हो मगर जो बच्चे तमाम सुविधाओं से वंचित हैं, उनके लिए यह मौका बहुत यादगार था। प्रेमचन्द शिशु शिक्षा केन्द्र के बच्चों को इस क्लब ने पिट्जा पार्टी दी। स्कूल की शिक्षिका काकुली साधुखां ने बताया कि स्कूल में बच्चे जरूरतमन्द वर्ग से हैं और इन बच्चों के लिए इस तरह का पहला अनुभव था। किसी भी क्लब के साथ स्कूल ने पहली बार इस तरह की पहल की। सबसे अच्छी बात यह रही कि डोमेनोज पिट्जा के इस आउटलेट में बच्चों ने भी पिज्जा बनाने में हाथ बँटा दिया। खाने वाले और खिलाने वाले, दोनों ने इस मौके का लुत्फ उठाया। इस पिज्जा पार्टी में बच्चों को पिज्जा खिला रही डीपीएस, न्यू टाउन की छात्रा तन्वी गुप्ता ने कहा कि वह स्कूल के इन्ट्रैक्ट क्लब से जुड़ी है मगर यहाँ बच्चों को यह खुशी देकर बहुत अच्छा लगा। प्रेमचन्द शिशु शिक्षा केन्द्र की छात्रा नेहा राय ने कहा कि वह भी आगे चलकर ऐसी ही खुशी दूसरे बच्चों को देना चाहती है। स्कूल के संचालक नन्द किशोर जायसवाल ने स्कूल की अन्य गतिविधियों की जानकारी दी। कार्यक्रम को सफल बनाने में क्लब के अध्यक्ष अशोक जायसवाल, सचिव आशीष गुप्ता तथा कार्यक्रम की संयोजक ऋतु गुप्ता का योगदान रहा।

भारतीय भाषा परिषद और नीलांबर द्वारा साहित्यम का आयोजन

कोलकाता : शहर एक और शानदार साहित्यिक आयोजन का साक्षी बना। मौका था भारतीय भाषा परिषद और नीलांबर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यक्रम “साहित्यम्” की शानदार प्रस्तुति। नीलांबर सर्वदा ही हिंदी साहित्य में नए प्रयोग करने के लिए प्रयासरत रहता है जिसमें आधुनिक तकनीक के समावेश से आम लोगों के बीच में हिंदी साहित्य को पहुंचाने में इनकी शानदार कोशिश देखी जा रही है। इस कार्यक्रम में आमंत्रित अतिथि थे वागर्थ पत्रिका के संपादक,आलोचक एवं भारतीय भाषा परिषद के निदेशक डॉ शंभुनाथ और भारतीय भाषा परिषद की अध्यक्ष श्रीमती कुसुम खेमानी साथ ही नीलांबर समूह के अध्यक्ष,युवा साहित्यकार और कवि विमलेश त्रिपाठी। मुख्य अतिथि थे ब्रेथवेट एंड कंपनी के चेयरमैन एवं मैनेजिंग डायरेक्टर और सशक्त युवा कवि यतीश कुमार। कार्यक्रम के आरंभ में डॉ कुसुम खेमानी ने नीलांबर द्वारा साहित्य के क्षेत्र में योगदान की सराहना की। डॉ शंभुनाथ ने कहा कि नीलांबर ने साहित्य के लोकप्रियकरण के लिए सार्थक प्रयास किया है।विमलेश त्रिपाठी ने नीलांबर को एक परिवार की तरह बताया जो साहित्य और संस्कृति के लिए समर्पित है।यतीश कुमार ने इस साझा आयोजन को नदी और समंदर का मेल कहा।वक्तव्य के बाद कार्यक्रम का मंचन आरंभ हुआ जिसमें हिंदी साहित्य की विविध विधाओं का संगम देखने को मिला।शुरुआत में नीलांबर द्वारा निर्मित कवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता “कभी मत करो माफ” और कवि मुक्तिबोध की कविता “भूल गलती” पर मोंताज वीडियो की प्रस्तुति हुई जिनकी आवृत्तिकार हैं ममता पांडेय।दोनों कविताओं के मोंताज वीडियो की परिकल्पना और तकनीक पर ऋतेश पांडेय,मनोज झा और विशाल पांडेय ने काम किया है। कविता कोलाज “बदलते दृश्य” इस कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण रहा जिसमें नीलांबर टीम के कलाकार ऋतेश, पूनम,स्मिता,ममता, दीपक, विशाल, अभिषेक और प्रदीप ने कवि राकेश श्रीमाल,अभिज्ञात, निर्मला तोदी और अदनान कफ़ील दरवेश की कविताओं के अंश पर प्रस्तुति दी।इसके बाद लेखिका वंदना राग की कहानी “क्रिसमस कैरोल” पर फिल्म प्रदर्शित की गई।आशा पांडे की आवाज में कहानी पाठ के साथ-साथ कहानी के दृश्यों को स्क्रीन पर दिखाया गया जो अपने आप में एक नया अनुभव रहा। फिल्म में मुख्य भूमिका निभाई है-प्रख्यात रंगकर्मी और अभिनेत्री कल्पना झा,आशा पांडेय और विशाल पांडेय ने। नीलांबर टीम के अन्य कलाकारों का भी मुख्य कलाकारों के साथ अभिनय में समन्वय अद्भुत था।इस पूरे कार्यक्रम के सत्र का संचालन नीलांबर टीम की सदस्य एवं युवा शायरा रौनक अफरोज ने किया। आनंद गुप्ता ने सभी दर्शकों, श्रोताओं और अतिथियों का आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापन दिया ।

अलग-अलग युगों में श्री गणेश ने लिए 32 अवतार

अलग -अलग युगों में गणपति ने अलग – अलग अवतार लिए। जानिए इन अवतारों के नाम –

श्री ढुण्डि गणपति – चार भुजाधारी रक्तवर्णी शरीर
श्री क्षिप्र प्रसाद गणपति – छ: भुजाधारी रक्ववर्णी, त्रिनेत्र धारी
श्री ऋण मोचन गणपति – चार भुजाधारी लालवस्त्र धारी
श्री एकदंत गणपति – छ: भुजाधारी श्याम वर्ण शरीरधारी
श्री सृष्टि गणपति – चार भुजाधारी, मूषक पर सवार रक्तवर्णी शरीरधारी
श्री द्विमुख गणपति – पीले वर्ण के चार भुजाधारी और दो मुख वाले
श्री उद्दण्ड गणपति – बारह भुजाधारी रक्तवर्णी शरीर वाले, हाथ में कुमुदनी और अमृत का पात्र होता है।
श्री दुर्गा गणपति – आठ भुजाधारी रक्तवर्णी और लाल वस्त्र पहने हुए।
श्री त्रिमुख गणपति – तीन मुख वाले, छ: भुजाधारी, रक्तवर्ण शरीरधारी
श्री योग गणपति – योगमुद्रा में विराजित, नीले वस्त्र पहने, चार भुजाधारी
श्री सिंह गणपति – श्वेत वर्णी आठ भुजाधारी, सिंह के मुख और हाथी की सूंड वाले
श्री संकष्ट हरण गणपति – चार भुजाधारी, रक्तवर्णी शरीर, हीरा जडि़त मुकूट पहने।

दूसरों की हत्या करने वाले लोग राष्ट्रवादी नहीं हो सकते : वेंकैया नायडू

नयी दिल्ली : उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू का कहना है कि घृणा और भीड़ हत्या जैसे मामलों में शामिल लोग खुद को राष्ट्रवादी नहीं कह सकते हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों को रोकने के लिये सिर्फ कानून पर्याप्त नहीं है बल्कि सामाजिक व्यवहार में बदलाव लाना भी बहुत जरूरी है। उपराष्ट्रपति ने भीड़ हत्या जैसी घटनाओं के राजनीतिकरण पर नाराजगी जताते हुए कहा कि ऐसी घटनाओं को राजनीतिक दलों से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।
उन्होंने कहा, सामाजिक बदलाव की जरूरत है)। यह इस पार्टी या उस पार्टी की वजह से नहीं है। जैसे ही आप इन्हें दलों से जोड़ते हैं, मुद्दा खत्म हो जाता है। बेहद स्पष्ट तरीके से बता दूं कि यही हो रहा है। घृणा और भीड़ हत्या की घटनाओं के बारे में सवाल करने पर उपराष्ट्रपति ने कहा कि यह कोई नया चलन नहीं है, पहले भी ऐसी घटनाएं हुई हैं।
पीटीआई को दिये गए एक इंटरव्यू में नायडू ने कहा, इसके लिए सामाजिक व्यवहार को बदलना होगा…जब आप किसी दूसरे की हत्या कर रहे हैं, तो खुद को राष्ट्रवादी कैसे कह सकते हैं। धर्म, जाति, रंग और लिंग के आधार पर आप भेदभाव करते हैं। राष्ट्रवाद, भारत माता की जय का अर्थ बहुत व्यापक है। उन्होंने कहा कि इनमें से कुछ चीजों से सिर्फ कानून के माध्यम से नहीं निपटा जा सकता। इनपर लगाम लगाने के लिए सामाजिक बदलाव जरूरी है।
पिछले कुछ सालों में देश के विभिन्न भागों में हुई भीड़ हत्या की घटनाओं को लेकर सरकार कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दलों के निशाने पर है। केन्द्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक साल में नौ राज्यों में भीड़ हत्या की घटनाओं में 40 लोगों की जान गई है। नायडू ने कहा, जब निर्भया मामला आया, चारों ओर निर्भया कानून की मांग को लेकर कोलाहल था। निर्भया कानून बन गया, लेकिन क्या वे रूके। मैं राजनीति में नहीं पड़ रहा, इन घटनाओं को सबके सामने लाने का राजनीतिक दलों का अपना तरीका है। मेरा कहना है कि इसके लिए सिर्फ एक विधेयक/कानून की जरूरत नहीं है, इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक कौशल की जरूरत है। तब सामाजिक बुराई को खत्म किया जा सकता है। मैंने संसद में यह कहा था।

देश में राष्ट्रवाद को लेकर बहस चल रहे होने की बात करते हुए नायडू ने कहा कि इसकी सही परिभाषा होनी चाहिए और इसे स्पष्ट रूप से व्यक्त किया जाना चाहिये। उपराष्ट्रपति ने कहा, मेरे अनुसार राष्ट्रवाद या भारत माता की जय का अर्थ 130 करोड़ लोगों की जय है। जाति, पंथ, लिंग, धर्म या क्षेत्र के आधार पर कोई भी भेदभाव राष्ट्रवाद के खिलाफ है।

स्वच्छता एप पर मिली सवा करोड़ शिकायतों में से 90 फीसदी का निपटारा : पुरी

नयी दिल्ली : आवास एवं शहरी विकास मामलों के मंत्रालय के स्वच्छ भारत अभियान के तहत गंदगी की शिकायत करने के लिये शुरु किये गये स्वच्छता एप पर एक साल में लगभग 1.25 करोड़ शिकायतें मिली। आवास एवं शहरी विकास मामलों के राज्यमंत्री हरदीप सिंह पुरी ने दावा किया है कि इनमें से लगभग 1.12 करोड़ शिकायतों का निपटारा किया जा चुका है।
पुरी ने बतौर मंत्री, एक साल का अपना कार्यकाल पूरा होने पर इस अवधि में हुये कामों का रिपोर्ट कार्ड पेश करते हुये यह जानकारी दी। ब्लॉग के माध्यम से उन्होंने कहा कि स्वच्छता एप को देश भर में 68 लाख से अधिक लोग इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि शहरी क्षेत्रों में गंदगी की शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई करने के लिये केन्द्रीकृत निगरानी प्रणाली पर आधारित इस एप से मिली शिकायतों के निपटान की दर 90 प्रतिशत से अधिक है। इसकी वजह से शहरी क्षेत्रों में स्वच्छता अभियान का प्रभावी असर दिखने लगा है।
पुरी ने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 2014 में नियोजित शहरी विकास के लिये शुरु की गयी अब तक की सबसे बड़ी कार्ययोजना ‘शहरी मिशन’ का असर शहरों में व्यवस्थित विकास के रूप में दिखने लगा है। पुरी ने कहा कि उन्होंने पिछले साल तीन सितंबर को कार्यभार संभाला था। उन्होंने बताया कि इससे पहले 2014 में शहरों का कायाकल्प करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी के महत्वाकांक्षी ‘शहरी मिशन’ अभियान की शुरुआत हुयी थी। पुरी ने कहा कि तत्कालीन शहरी विकास मंत्री और वर्तमान उपराष्ट्रपति एम वैंकेया नायडू से एक साल पहले इस अभियान की कमान संभालने के बाद समावेशी और सतत शहरी विकास के कई अहम कार्य पूरे कर लिये गये।

इसमें उन्होंने शहरी मिशन के तहत शुरु किये गये स्वच्छ भारत अभियान, स्मार्ट सिटी मिशन, सभी के लिये आवास और शहरों में परिवहन, पानी एवं सड़क सहित अन्य मूलभूत सुविधाओं के विकास से जुड़े अमृत मिशन के कामों का ब्यौरा दिया। पुरी ने बताया कि अब तक 18 राज्य और 3258 शहर खुले में शौच की समस्या से मुक्त हो चुके हैं। इनमें से 2806 शहरों को इस दावे की पुष्टि का तीसरे पक्षकार से प्रमाणपत्र भी मिल गया है। इस अभियान के तहत देश भर में 4.30 लाख सार्वजनिक शौचालय और 58.30 लाख घरों में निजी शौचालयों का निर्माण हो गया है।

पुरी ने बताया कि सभी को आवास सुविधा मुहैया कराने के लिये प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 8.55 लाख घरों का निर्माण कर लाभार्थियों को सौंप दिये गये हैं। इनमें से सात लाख घर पिछले एक साल में बनाये गये। पिछले एक साल में 6225 आवास योजनाओं के तहत 55 लाख घरों के निर्माण की मंजूरी दी गयी, जबकि इस अवधि में 17 लाख नये घरों का निर्माणकार्य शुरु किया गया।

पुरी ने स्मार्ट सिटी मिशन के तहत पहले तीन दौर की प्रक्रिया के समयबद्ध संचालन को अहम उपलब्धि बताते हुये कहा कि चौथे चरण की योजना का भी काम शुरु कर दिया गया है। सौ स्मार्ट शहरों की सूची में शिलांग को शामिल करने के अलावा चौथे चरण में दस अन्य शहरों का चयन किया जा चुका है।

अजा/अजजा संशोधित कानून के प्रावधान पर रोक नहीं लगा सकते: सुप्रीम कोर्ट

नयी दिल्ली :उच्चतम न्यायलय ने कहा कि संसद द्वारा पारित अजा/अजजा संशोधन कानून पर इस समय रोक नहीं लगायी जा सकती परंतु उसने इसे चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केन्द्र सरकार को नोटिस जारी किया। न्यायमूर्ति ए के सीकरी और न्यायमूर्ति अशोक भूषण की पीठ ने संसद द्वारा नौ अगस्त को पारित अजा/अजजा (अत्याचारों की रोकथाम) संशोधन कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सरकार से छह सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है।
संसद द्वारा पारित इस विधेयक में अजा/अजजा कानून के तहत गिरफ्तारी के मामले में चुनिंदा सुरक्षा उपाये करने संबंधी शीर्ष अदालत के फैसले को निष्प्रभावी कर दिया गया है।
शीर्ष अदालत ने 20 मार्च को अपने फैसले में कहा था कि इस कानून के तहत शिकायत दर्ज होने पर तत्काल गिरफ्तारी नहीं होगी। न्यायालय ने इस मामले में अनेक निर्देश दिये थे और कहा था कि इस कानून के तहत दर्ज मामले में सरकारी कर्मचारी को सक्षम अधिकारी की पूर्व अनुमति से ही गिरफ्तार किया जा सकता है।
इस मामले में याचिकाकर्ता पृथ्वी राज चौहान के वकील ने पीठ से कहा कि न्यायालय को याचिका पर सुनवाई होने तक अजा/अजजा कानून के नये प्रावधानों पर क्रियान्वयन पर रोक लगानी चाहिए। इस पर पीठ ने कहा, ‘‘कैसी रोक? यह अब कानून है और इस समय रोक नहीं लगायी जा सकती।’’ इस पर वकील ने कहा कि सरकार ने खामियों को दूर किये बगैर ही शीर्ष अदालत के फैसले को निष्प्रभावी करने के लिये नये प्रावधान जोड़ दिये हैं।

पीठ ने कहा, ‘‘हमे मालूम है कि सरकार नये संशोधन ले आयी है और वे भी त्रुटियों को दूर किये बगैर ही।’’
याचिकाओं में कहा गया है कि संसद ने मनमाने तरीके से कानून में संशोधन करने और इसके पहले के प्रावधानों को इस तरह से बहाल करने का फैसला किया कि जिससे निर्दोष व्यक्ति अग्रिम जमानत के अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सके।

याचिका में कहा गया है कि इस संदर्भ में अजा/अजजा (अत्याचारों की रोकथाम) कानूनी की धारा 18-ए, जो दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 438 को इसके दायरे से बाहर रखती है, संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का हनन करती है।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि संशोधन के बाद कानून की संरचना से स्वतंत्रता और जवाबदेही के बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन होता है।

याचिका में कहा गया है कि कानून का दुरूपयोग होने पर न्यायालय ‘‘मूक दर्शक’’ नहीं बना रह सकता क्योंकि हम सभ्य समाज में रहते हैं और इस कानून के दुरूपयोग की अनेक घटनायें हो चुकी हैं। याचिका में कहा गया है कि इस बात की आशंका है कि संशोधित कानून जल्द ही लोगों को परेशान करने और प्रारंभिक जांच के बगैर की सिर्फ आरोप के आधार पर लोगों को गिरफ्तार करने का एक नया हथियार बन जायेगा और इससे मौलिक अधिकारों का हनन होगा।
इन संशोधनों से अजा/अजजा के खिलाफ अत्याचार के आरोपी व्यक्ति के लिये अग्रिम जमानत की कोई संभावना नहीं रहेगी। इसमें आपराधिक मामला दर्ज करने के लिये किसी भी तरह की प्रारंभिक जांच की आवश्यकता नहीं है और इस कानून के तहत गिरफ्तारी के लिये किसी भी तरह की मंजूरी जरूरी नहीं होगी।