Monday, April 13, 2026
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देश को स्वस्थ रखने आया आयुष्मान भारत, 50 करोड़ गरीबों को मिलेगा लाभ

नयी दिल्ली : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने झारखंड से आयुष्मान भारत बीमा योजना- प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना का शुभारम्भ किया। प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के तहत सरकार का देश के 10 करोड़ से अधिक गरीब परिवारों को पांच लाख रुपए प्रति परिवार स्वास्थ्य बीमा सुरक्षा मुहैया कराने का लक्ष्य है। सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना के मुताबिक, ग्रामीण इलाके के 8.03 करोड़ और शहरी इलाके के 2.33 करोड़ गरीब परिवारों को इससे लाभ होगा। लगभग 50 करोड़ लोग इस योजना के दायरे में आएंगे। इसके लिए नेशनल हेल्थ एजेंसी ने नेशनल हेल्थ इंसोरेंस के तहत आयुष्मान भारत स्वास्थ्य योजना की वेबसाइट और हेल्पलाइन को लांच कर दिया है। ऐसे में आप आयुष्मान योजना के लाभार्थी है या नहीं। यह आप इस एनएचए द्वारा शुरू की वेबसाइट पर देख सकते है। साथ ही इससे सम्बन्धित मदद के हेल्पलाइन पर भी बात कर सकते है। साथ ही अस्पतालों में आयुष्मान मित्र से भी मदद ले सकते है।
लाभार्थियों की सूची में नाम ऐसे जानें
आयुष्मान भारत- नेशनल हेल्थ प्रोटेक्शन मिशन (एबी-एनएचपीएम) को लागू करने वाली नेशनल हेल्थ एजेंसी (एनएचए) ने एक वेबसाइट तथा हेल्पलाइन नम्बर भी जारी किया है, जिसके जरिए यह पता किया जा सकता है कि लाभार्थियों की अंतिम सूची में किसी व्यक्ति नाम है या नहीं। इसके लिए कोई व्यक्ति आयुष्मान भारत की वेबसाइट mera.pmjay.gov.in पर अपना नाम चेक कर सकता है या फिर हेल्पलाइन नंबर 14555 पर कॉल भी कर सकता है। लाभार्थी को अपना मोबाइल नम्बर दर्ज कराना होगा, जिस पर ओटीपी के जरिए सत्यापन होगा और उसके बाद बिना किसी दस्तावेज के केवाईसी (अपने कस्टर को जानिए) की ऑनलाइन प्रक्रिया पूरी की जाएगी।
आयुष्मान भारत योजना की देश के कर्इ राज्यों और जिलों में पायलट परियोजना की शुरुआत हो चुकी है। लाभार्थियों की मदद करने के लिए आयुष्मान मित्र भी तैनात किये गये है।ये आयुष्मान मित्र आयुष्मान स्वास्थ्य योजना के तहत अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीजों की मदद करेंगे। वह लाभार्थी व अस्पताल के बीच समन्वय स्थापित करेंगे।

इन अस्पतालों में होगा इलाज
आयुष्मान भारत योजना का लाभ देश भर में दस करोड़ परिवारों को लोगों को मिलेगा।साथ ही इस योजना के लाभार्थी देश भर में सरकारी या निजी अस्पतालों में कैशलेस इलाज करा सकेंगे। इतना ही नहीं सभी राज्यों के सरकारी अस्पतालों को इस योजना में शामिल माना जाएगा। इसके साथ ही प्राइवेट और र्इएसआर्इ अस्पताल में भी शामिल रहेंगे। यहाँ मरीज को भर्ती कराने से लेकर उनका बीमा कम्पनी से भुगतान कराने का सारा काम आयुष्मान मित्र सम्भालेंगे।
आयुष्मान भारत योजना के लाभ
आयुष्मान भारत योजना के तहत प्रत्येक परिवार को प्रतिवर्ष इलाज के लिए 5 लाख रुपये तक का बीमा कवर मिलेगा।
देश में 1.5 लाख गाँवों में स्वास्थ्य व जागरुकता केन्द्र खुलेंगे। यहाँ सिर्फ बीमारी का इलाज ही नही होगा बल्कि यहाँ पर स्वास्थ्य परीक्षण की सुविधा भी मिलेगी।
आयुष्मान भारत योजना के तहत प्रत्येक परिवार को प्रतिवर्ष इलाज के लिए 5 लाख रुपए तक का बीमा कवर मिलेगा। इस योजना से देश के 10 करोड़ परिवारों और 50 करोड़ लोगों को फायदा होने की सम्भावना है।
यह योजना राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना और वरिष्ठ नागरिक बीमा योजना का स्थान लेगी।
बीमा कवर के लिए उम्र की भी बाध्यता नहीं रहेगी। इसमें पहले से मौजूद बीमारियाँ भी कवर होंगी।
ये योजना कैशलेस होगी और इसमे परिवार के सदस्यों और उम्र का बन्धन नहीं होगा। योजना में रजिस्टर्ड किसी भी निजी या सरकारी अस्पताल में इलाज हो सकेगा। पिछले 10 साल में मेडिकल का खर्च 300 फीसदी बढ़ गया है। देश में मेडिकल का 80 फीसदी खर्च लोग अपनी जेब से उठाते हैं। इस खर्च का बोझ आम आदमी पर न पड़े इसलिए मोदी सरकार ने आयुष्मान भारत योजना बनाई है।

नहीं रहीं देश की पहली महिला आइएएस, जेएनपीटी की चेयरपर्सन अन्‍ना मल्‍होत्रा

मुम्बई : आजादी के बाद पहली महिला आइएएस और कर्इ् प्रमुख पदों पर जिम्‍मेदारी सम्भालने वालीं अन्‍ना राजम मल्‍होत्रा का निधन मुम्बई के अन्धेरी स्थित उनके निवास पर हो गया। परिवार के सूत्रों ने यह जानकारी दी। वह 91 वर्ष की थीं। मुंबई में उनका अंतिम संस्‍कार किया जाएगा।
अन्‍ना राजम जार्ज का जन्‍म केरल के एर्नाकुलम जिले में जुलाई 1927 को हुआ था। कोझिकोड में प्रारंभिक शिक्षा के बाद मद्रास विश्‍वविद्यालय में उच्‍च शिक्षा के लिए वह चेन्‍नर्इ में शिफ्ट हो गईं। मल्‍होत्रा ने 1951 में सिविल सर्विसेज को ज्‍वाइन किया और उन्‍होंने मद्रास कैडर का विकल्‍प चुना। उन्‍होंने तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री सी राजगोपालाचारी के नेतृत्‍व में मद्रास राज्‍य की सेवा की। उन्‍होंने आरएन मल्‍होत्रा से शादी की जो 1985 से 1990 तक भारत के रिजर्व बैंक के गर्वनर रहे। मुम्बई के पास देश के आधुनिक बंदरगाह जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट (जेएनपीटी) की स्थापना में उनका प्रमुख योगदान रहा। जेएनपीटी के कार्यान्‍वयन के दौरान वह इसकी अध्यक्ष थीं। केन्द्र सरकार में प्रतिनियुक्ति के दौरान उन्‍हें जेएनपीटी का चार्ज मिला। 1989 में उन्‍हें पदम भूषण अवार्ड से सम्‍मानित किया गया। 1982 में दिल्‍ली में एशियन खेलों के दौरान उन्‍होंने तत्‍कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ मिलकर काम किया। उन्होंने केन्द्रीय सेवा में नियुक्ति के दौरान केंद्रीय गृह मंत्रालय में सेवा की थी। रिटायर होने के बाद होटल लीला वेंचर लिमिटेड के डायरेक्‍टर पद पर काम किया।

अमेरिका में ग्रीन कार्ड के लिए छोड़ना होगा सरकारी सहायता का लाभ

सैन डिएगो : ट्रंप प्रशासन ने शनिवार को ऐसे नियम सुझाए हैं जिसके तहत यदि प्रवासी नागरिक चिकित्सा सहायता, फूड स्टाम्प, आवास वाउचर्स तथा अन्य प्रकार की सरकारी सहायता का लाभ उठाते हैं तो उन्हें ग्रीन कार्ड देने से इनकार किया जा सकता है। संघीय कानून में पहले ही यह शर्त थी कि ग्रीन कार्ड पाने की चाह रखने वालों को साबित करना होगा कि वे बोझ नहीं बनेंगे अथवा सरकारी सहायता का लाभ नहीं उठाएंगे लेकिन नए नियमों में शर्तों की लम्बी फेहरिस्त है। गृह सुरक्षा मंत्रालय ने बताया कि वर्तमान में और अतीत में एक सीमा से अधिक कुछ खास सरकारी लाभ पाने को ग्रीन कार्ड अथवा अस्थायी प्रवास की मंजूरी देने के लिए भारी नकारात्मक तथ्य माना जाएगा। मंत्रालय ने कहा कि इस प्रस्ताव में यह स्पष्ट है कि जो भी अमेरिका स्थायी या अस्थायी रूप से आना और यहां रहना चाहते हैं उन्हें अपना खर्च खुद उठाना होगा और वे सरकारी लाभ पर निर्भर नहीं रहेंगे। मंत्रालय की वेबसाइट पर 447 पन्नों वाला यह प्रस्ताव जारी किया गया है। आने वाले वक्त में इसे संघीय रजिस्टर में डाला जाएगा और प्रभाव में आने से पहले 60 दिन तक इस पर लोगों की राय ली जाएगी। वहीं, राष्ट्रीय आप्रवासी विधि केन्द्र की कार्यकारी निदेशक मारीलेना हिनकैपी ने कहा कि यह प्रस्ताव देश के अनेक परिवारों और समुदायों के स्वास्थ्य और उनकी भलाई पर हमला है।

आधुनिक भारत के निर्माता एम. विश्वेश्वरैया

एम. विश्वेश्वरैया को कौन नहीं जानता। कर्नाटक में कृष्णसागर बांध के वास्तुकार, बांधों में पानी का व्यर्थ प्रवाह रोकने के लिए इस्पात के दरवाजे तैयार कर एक चमत्कारिक कार्य कर दिखाया। वह एक प्रख्यात इंजीनियर और कुशल राजनेता थे। उन्होंने आधुनिक भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सर एम. विश्वेश्वरैया का जन्म मैसूर के पूर्व रियासत कोलार जिले (कर्नाटक) के मुड्डेनहल्ली गांव में 15 सितम्बर 1860 को हुआ था। उनके पिता श्रीनिवास शास्त्री संस्कृत के विद्वान और आयुर्वैदिक चिकित्सक थे। उनकी माता का नाम वेंकट चेम्मा था। वह एक धार्मिक महिला थीं।
सर एम. विश्वेश्वरैया केवल 15 साल के ही थे जब उनके पिता का देहांत हो गया। विश्वेश्वरैया ने चक्कबालापुर में अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी की। तत्पश्चात उच्च शिक्षा के लिए बेंगलूर आ गए। 1881 में बी.ए. की परीक्षा पास की। उन्हें मैसूर की सरकार से आर्थिक मदद मिल गई और उन्होंने इंजीनियरिंग का अध्ययन करने के लिए पूना के साइंस कालेज में दाखिला ले लिया। 1883 में एल.सी.ई. एवं एफ.सी.ई. की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया।

गूगल ने भी इनको याद किया

इंजीनियरिंग की परीक्षा पास करते ही उन्हें बंबई सरकार ने नौकरी की पेशकश की और वह नासिक में सहायक अभियंता के पद पर नियुक्त हुए। एक इंजीनियर के रूप में उनके कुछ अद्भुत कारनामों ने अपनी पहचान बनाई। उन्होंने सक्खर नामक शहर को सिंधु नदी से पानी की आपूर्ति के लिए एक तरह योजना बनाई। उन्होंने ब्लॉक सिस्टम नामक एक नई सिंचाई प्रणाली तैयार की जिससे पानी के व्यर्थ प्रवाह को रोकने के लिए इस्पात का दरवाजा तैयार किया। कर्नाटक में कृष्णाराज सागर बांध उनके वास्तुकार का एक बेजोड़ नमूना है। उनकी योजनाओं को देख कर सभी इंजीनियर हैरान हो जाते थे। उनकी प्रखर बुद्धि का सब ने लौहा माना।
विश्वेश्वरैया का जीवन बहुत ही सादा एवं साधारण था। उनकी ईमानदारी एवं निष्ठा से ही 1912 में मैसूर के महाराजा ने अपने दीवान के रूप में नियुक्त किया। मैसूर में दीवान के रूप में आपने राज्य में शैक्षणिक और औद्योगिक विकास के लिए अथक प्रयास किया। भद्रावती आयरन एंड स्टील वर्क उनके औद्योगिक विकास का मुंह बोलता उदाहरण है।
उस समय मैसूर राज्य में लगभग 4500 स्कूल थे। उन्होंने इनकी संख्या 6500 मात्र 6 वर्षों में ही पहुंचा दी। महिलाओं के लिए शिक्षा पर उन्होंने काफी जोर दिया। यही कारण था कि उन्होंने न सिर्फ स्कूल खोला बल्कि लड़कियों के लिए छात्रावास का निर्माण भी करवाया। विदेश अध्ययन हेतु जाने वालों के लिए छात्रों का सरकार की ओर से छात्रवृत्ति भी दिलाने में अहम भूमिका निभाई।
वह एक निडर देशभक्त थे। उन दिनों मैसूर महाराजा द्वारा प्रति वर्ष दशहरा उत्सव के दौरान एक दरबार के आयोजन की परम्परा थी। दरबार के दिन अंग्रेजों को बैठने के लिए आराम कुर्सियाँ दी जाती थीं एवं भारतीयों को फर्श पर बैठने के लिए कहा जाता था। उनके विरोध से ही अगले वर्ष से दोनों कुर्सियाँ उपलब्ध करवाई गईं। ब्रिटिश अधिकारियों के विरोध के बावजूद उन पर इसका कोई प्रभाव न पड़ा।
सर एम. विश्वेश्वरैया स्वेच्छा से 1918 में मैसूर के दीवान पद से सेवानिवृत्त हुए। अपनी सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्होंने सक्रिय रूप से काम किया। उन्होंने अपने राष्ट्र के लिए अमूल्य योगदान दिया। 1955 में उन्हें भारत सरकार द्वारा ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया। उनके 100 वर्ष पूर्ण करने के उपलक्ष्य में भारत सरकार ने उनके सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया। 101 की उम्र में 14 अप्रैल 1962 को विश्वेश्वरैया का निधन हो गया।

देवताओं के इंजीनियर हैं विश्वकर्मा

महादेव ने ब्रह्मा,विष्णु को अवतरित कर सृष्टि के सृजन,पालन की जिम्मेदारी सौंपी। इस जिम्मेदारी के निर्वाहन हेतु ब्रह्मा ने अपने वंशज देव शिल्पी श्री विश्वकर्मा जी को आदेश किया। जिन्होंने तीनो लोकों का निर्माण किया। भगवान विश्वकर्मा की महत्ता इस बात से समझी जा सकती है कि उनके महत्व का वर्णन ऋग्वेद में 11 ऋचाएं लिख कर किया गया है। उनकी अनंत व अनुपमेय कृतियों में सतयुग में स्वर्गलोक, त्रेतायुग मे लंका, द्वापर में द्वारका, कलयुग में जगगन्नाथ मंदिर की विशाल मूर्ति आदि हैं।
विश्वकर्मा पूजा का आध्यात्मिक महत्व
जिसकी सम्पूर्ण सृष्टि और कर्म व्यापार है वह विश्वकर्मा है। सहज भाषा मे यह कहा जा सकता है कि सम्पूर्ण सृष्टि में जो भी कर्म सृजनात्मक है, जिन कर्मो से जीव का जीवन संचालित होता है। उन सभी के मूल में विश्वकर्मा है। अतः उनका पूजन जहां प्रत्येक व्यक्ति को प्राकृतिक ऊर्जा देता है वहीं कार्य में आने वाली सभी अड़चनों को खत्म करता है।
17 सितम्बर को ही क्यों होता है पूजन
वर्ष 2018 में भाद्रपद मास के अंतिम तिथि अर्थात 17 सितम्बर को पड़ी है। भारत के कुछ भाग में यह मान्यता है कि अश्विन मास के प्रतिपदा को विश्वकर्मा जी का जन्म हुआ था, लेकिन आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि लगभग सभी मान्यताओं के अनुसार यही एक ऐसा पूजन है जो सूर्य के पारगमन के आधार पर तय होता है। इस लिए प्रत्येक वर्ष यह 17 सितम्बर को मनाया जाता है।

स्वतंत्रता सेनानी गौड़ चंद्र महापात्र का निधन

भुवनेश्वर : ओड़िशा के भद्रक जिले के एक सरकारी अस्पताल में मंगलवार को वयोवृद्ध स्वतंत्रता सेनानी गौड़ चंद्र महापात्र का 104 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। महापात्र के परिजन ने यह जानकारी दी।
साल 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जेल की सजा काट चुके महापात्र वृद्धावस्था संबंधी बीमारियों से जूझ रहे थे। महापात्र के परिवार में उनकी पत्नी मीरा देवी, चार बेटियां और नौ बेटे हैं। मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने महापात्र के निधन पर शोक व्यक्त किया और उन्हें ‘‘सच्चा गांधीवादी’’ करार दिया।

136 साल पहले उदयपुर में लिखा गया था आधुनिक हिन्दी का पहला ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’

उदयपुर : आधुनिक हिंदी के मानक गद्य की सबसे पहली पुस्तक उदयपुर में 136 साल पहले वर्ष 1882 में लिखी गई थी। यह पुस्तक है- सत्यार्थ प्रकाश। इसे लिखा था स्वामी दयानन्द सरस्वती ने। उदयपुर में इस पुस्तक के लेखन स्थल पर आज सत्यार्थ प्रकाश भवन बना हुआ है। दुनियाभर से आने वाले पर्यटक इसे देखते हैं। वे इसे आर्य समाज के संस्थापक और धर्म सुधार आंदोलन के प्रमुख व्यक्ति दयानन्द सरस्वती के ग्रंथ के रूप में देखते हैं। लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि हिन्दी साहित्य के इतिहासकारों ने अपने ग्रंथों में सत्यार्थ प्रकाश को हिन्दी के उन प्रारम्भिक ग्रंथों में माना है, जिनके गद्य को बाद में सभी ने परम्परा के रूप में ग्रहण किया।
सत्यार्थ प्रकाश के प्रकाशन से पहले हिन्दी गद्य की भाषा ब्रज और अवधी से बहुत अधिक प्रभावित थी। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य का इतिहास में माना है कि 1868 से 1893 का कालखंड हिन्दी गद्य के विकास का समय था। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने वैसे 1873 के आसपास सत्यार्थ प्रकाश का लेखन शुरू किया था, लेकिन इसे पूरा उदयपुर आकर किया।


उनसे पहले आमतौर पर ब्रजभाषा को ही गद्य के रूप में लिखा जा रहा था। उस समय हिन्दी में हों को हूजिए, हो को होय, आता है को आवता है, आए को आवे, जगह को जाघा, इसलिए को इस करके या भाषा को भाखा लिखा जाता था। उस समय हिन्दी साहित्य में ‘सांसें आती जाती हैं’को ‘आतियां जातियां जो सांसें हैं’ लिखा जाता था। तब कहानी या लेख की भाषा गद्य तो होती थी, लेकिन हर पंक्ति के आखिर में तुक मिलाकर लिखा जाता था।
स्वामी दयानन्द सरस्वती को महाराणा सज्जन सिंह ने बुलवाया था : सत्यार्थ प्रकाश भवन के अध्यक्ष अशोक आर्य बताते हैं कि स्वामी दयानन्द सरस्वती को महाराणा सज्जन सिंह ने उदयपुर आमंत्रित किया था। उन्हें एक अलग भवन में ठहराया था। स्वामी जी ने यहीं सत्यार्थ प्रकाश लिखा।
वे यहां 10 अगस्त 1882 से 27 फरवरी 1883 तक ठहरे थे। इसके बाद वह जोधपुर होते हुए पुष्कर चले गए थे। डॉ. चंद्रभानु सीताराम सोनवणे ने हिन्दी गद्य साहित्य में लिखा है कि सत्यार्थ प्रकाश आधुनिक हिंदी का सर्वाधिक लोकप्रिय ग्रंथ है। हिन्दी को नई चाल में ढालने में स्वामी दयानन्द सरस्वती का स्थान भारतेंदु हरिश्चंद्र से कम नहीं है।
दयानन्द की प्रेरणा से निकला था पहला हिन्दी दैनिक : 1856 में जन्मे मनीषी समर्थदान चारण ने स्वामी दयानन्द सरस्वती की प्रेरणा से 1886 में अजमेर में राजस्थान प्रेस यंत्रालय की स्थापना कर राजस्थान समाचार साप्ताहिक प्रारंभ किया था। 1904 में यह पत्र दैनिक हो गया, जिसने राजस्थान में दैनिक समाचार पत्रों की आधार भूमि तैयार की। नागरी लिपि में छपने वाला यह दैनिक 12 पेज का था। चंद्रगुप्त वार्ष्णेय ने भी राजस्थान समाचार को प्रदेश का पहला दैनिक पत्र माना था।

(साभार – दैनिक भास्कर)

पूर्व पेट्रोलियम मंत्री सत्यप्रकाश मालवीय का निधन

इलाहाबाद : पूर्व पेट्रोलियम मंत्री सत्यप्रकाश मालवीय का शनिवार देर रात दिल्ली के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। मालवीय (84) प्रोस्टेट कैंसर से पीड़ित थे। सत्यप्रकाश मालवीय के पीआरओ डाक्टर वीके दीक्षित ने पीटीआई भाषा को बताया कि सत्यप्रकाश मालवीय का कल रात एक बजे निधन हो गया। उनके परिवार में एक बेटी है। उनकी पत्नी का निधन चार साल पहले हो गया था। इलाहाबाद के मालवीय नगर में जन्मे सत्यप्रकाश मालवीय आपातकाल के दौरान 18 महीने नैनी जेल में बंद रहे। उन्होंने बताया कि मालवीय इलाहाबाद के नगर प्रमुख और उत्तर प्रदेश सरकार में परिवहन मंत्री रहे। उन्होंने अपनी राजनीति, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से शुरू की और बाद में सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस में शामिल हुए थे।

इन्होंने 89 साल की उम्र में शुरू किया नया व्यवसाय

गुवाहाटी :  वैसे तो अक्सर लोग 60 की उम्र के बाद अपने काम से थककर अवकाश ग्रहण कर लेते हैं। लेकिन बहुत से ऐसे लोग हैं जो उम्र को मात देकर अवकाश ग्रहण करने के बाद ही अपनी दूसरी पारी शुरू करते हैं। इन लोगों के लिए उम्र महज़ एक आँकड़ा है। लतिका जी ने ऐसा ही किया और ऐसी ही कहानी है 89 साल की लतिका चक्रवर्ती की। असम के धुबरी में पैदा हुई लतिका की शादी कृष्ण लाल चक्रवर्ती से हुई, जो सर्वे ऑफ़ इंडिया में एक सर्वेक्षक थे। और उनका बेटा कप्तान राज चक्रवर्ती भारतीय नेवी में अफ़सर हैं।
अपने पति की मृत्यु के बाद लतिका अपने बेटे के साथ रह रहीं हैं। उनके पति व बेटे, दोनों की ही नौकरी ऐसी रही कि उन्हें देश के ज्यादातर शहरों को देखने का मौका मिला। भारत के अधिकतर कोनों को जानने-समझने की यात्रा उनके जीवन का हिस्सा रही। अपने जीवन की इसी यात्रा में उन्होंने हर जगह से खूबसूरत साड़ियाँ, कुर्ते, और अलग-अलग तरह के कपड़ों के रूप में यादें संजोयी हैं। और हर एक याद की बहुत ही अलग सी कहानियां हैं उनके पास।
उम्र के इस पड़ाव पर उन्होंने अपनी इन यादों को कला के जरिये बांटने की सोची। लतिका को हमेशा से ही सिलाई करने का शौक रहा। वे हमेशा पुरानी चीज़ों पर क्रियात्मक डिज़ाइन करके उन्हें नया रूप दे देतीं। और आज उन्होंने अपनी इसी प्रतिभा को फिर से सहेजने की सोची।
अपनी 64 साल पुरानी सिलाई मशीन से लतिका पुरानी साड़ियों और कपड़ों से हैंडबैग या पोटली बनाकर नई कहानियां गढ़ रही हैं। ये वो कपड़े हैं जिनमें सालों की विरासत है।
इतना ही नहीं उन्होंने अपनी एक ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट भी शुरू की है जहाँ कोई भी उनके द्वारा बनाये गए बैग देख व खरीद सकता है। आज देश के अलग-अलग भागों से लोग उनके काम को सराह रहे हैं और उनके बनाये पोटली बैग खरीद रहे हैं। आप इस लिंक पर जाकर इनके बैग्स देख सकते हैं और खरीद सकते हैं। लतिका जी को हमारा सलाम….ये सचमुच प्रेरणा हैं।

https://www.latikasbags.com/

(साभार – द बेटर इंडिया)

भारतीय सबसे अधिक मेहनती, पांच दिन के कार्य सप्ताह से खुश : अध्ययन

मुम्बई : भारत में 69 प्रतिशत पूर्णकालिक कर्मचारी सप्ताह में पांच दिन काम करके खुश हैं और एक सर्वेक्षण के मुताबिक भारत दुनिया का सबसे अधिक मेहनती देश है। देश के करीब 70 प्रतिशत कर्मियों का मानना है कि उन्हें समान वेतन में कुछ दिन कम काम करने का विकल्प दिया जाए तो भी वह पांच दिन के कार्य सप्ताह को ही चुनेंगे। कार्यबल प्रबंधन से जुड़ी अमेरिका की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी क्रोनोस इन्कॉर्पोरेटेड के सर्वेक्षण के मुताबिक इस सूची में 43 प्रतिशत कर्मियों के समान मत के साथ मैक्सिको दूसरे और 27 फीसदी के साथ अमेरिका तीसरे स्थान पर है। सर्वेक्षण के मुताबिक ब्रिटेन (16 फीसदी), फ्रांस (17 फीसदी) और ऑस्ट्रेलिया (19 प्रतिशत) 5 दिन के मानक कार्य सप्ताह से बहुत अधिक खुश नहीं हैं। उसके मुताबिक वेतन समान रहने पर दुनिया भर के एक तिहाई से अधिक (34 प्रतिशत) कर्मी सप्ताह में चार दिन और 20 फीसदी कर्मचारी सप्ताह में तीन दिन काम करने की इच्छा रखते हैं। वहीं दुनिया भर के करीब एक चौथाई से अधिक (28 प्रतिशत) कर्मचारी पांच दिन के कार्य सप्ताह से संतुष्ट हैं। इस साल 31 जुलाई से नौ अगस्त के बीच 2,772 कर्मियों में किये गए सर्वेक्षण से पता चलता है कि एक तिहाई से अधिक (35 प्रतिशत) कर्मी हर सप्ताह एक दिन कम करने बदले 20 प्रतिशत कम वेतन लेने को तैयार हैं।