कोलकाता : पूरे देश भर में नवरात्री की धूम है पर बंगाल की दुर्गा पूजा की बात ही अलग है। कोलकाता में लगे हर एक पंडाल को अलग-अलग तरीके से सजाया जाता है। दूर-दूर से लोग इन पंडालों की सजावट और ख़ासकर, दुर्गा माँ की प्रतिमा को देखने आते हैं। पर क्या आपने कभी सोचा है कि जो लोग देख नहीं पाते, उनका भी तो मन करता होगा माँ की इस ममतामयी मूर्ती को देखने का!
ऐसे ही ख़ास लोगों के लिए इस साल, बालीगंज में समाज सेवी संघ ने अनोखी पहल शुरू की है। दृष्टिहीनों के लिए ख़ास तौर पर व्यवस्था की गयी है कि वे इस दुर्गा पूजा में माँ की प्रतिमा से लेकर पंडाल की सजावट तक, सभी कुछ छू कर महसूस कर सकते हैं।
पंडाल में एक कलाकृति
पूजा के प्रवेश द्वार पर ही दुर्गा माँ के चेहरे की एक विशाल प्रतिमा है, जिसमें तीसरी आंख भी है, और इसे 12,000 लोहे की कीलों से बनाया गया है। इस कलाकृति को छूकर कोई भी दृष्टिहीन व्यक्ति मिट्टी से बने पारंपरिक दुर्गा मूर्तियों के चेहरे की कल्पना कर सकता है।
पंडाल की भीतरी दीवारें भी लोहे के कील व नट-बोल्ट से सजाई गयी हैं ताकि इन्हें छूकर महसूस किया जा सके। इस 73 वर्ष पुरानी दुर्गा पूजा के पूर्व अध्यक्ष दिलीप बनर्जी ने बताया, “हमारे कार्यकर्तायों को यह विचार एक स्कूल में दृष्टिहीन बच्चों के साथ समय बिताने पर आया। जैसे ही लोग मूर्तियाँ और पंडाल बनते देखते हैं, तो दुर्गा पूजा के लिए उत्साहित हो जाते हैं। ऐसे ही दृष्टिहीन लोगों को लकड़ी के तख्तों पर हथोड़े और लोहे की कील आदि की आवाज से पता चलता है कि दुर्गा पूजा की तैयारियां हो रही हैं।”
ब्रेल भाषा में एक दुर्गा मन्त्र पंडाल की दीवारों पर ‘माँ’ और ‘जय माँ दुर्गा’ जैसे शब्द ब्रेल भाषा (वह भाषा जिसे दृष्टिहीन व्यक्ति पढ़ सकते हैं) में लिखे गये हैं। प्रत्येक दृष्टिहीन व्यक्ति को पूजा का विवरण, दुर्गा माँ के मन्त्र आदि की एक शीट भी ब्रेल में दी जाएगी। इसके अलावा पंडाल के बाहर एक आँखों के अस्पताल से भी कुछ कर्मचारी मौजूद होंगे, जहाँ पर पंडाल घुमने के लिए आने वाले लोग चाहे, तो नेत्रदान करने के लिए भी फॉर्म भर सकते हैं।
पंडाल की दीवारों को कील और धागे से सजाया गया है
इस पंडाल को जितना हो सके उतना इस तरीके से सजाया गया है कि दृष्टिहीन व्यक्ति एकदम घर जैसा महसूस करें और साथ ही अन्य लोगों को इन लोगों के प्रति सम्वेदनशील होने की प्रेरणा मिले और साथ ही अपनी आँखें दान करने का हौंसला भी मिले।
12, 000 कीलों से बनी प्रतिमा, नेत्रहीन भी कर सकते हैं माँ दुर्गा के दर्शन
पायलट बना तो अपने गाँव के बुजुर्गों को करवाई मुफ्त में हवाई यात्रा!
पंजाब के आदमपुर के सारंगपुर गाँव से ताल्लुक रखने वाले विकास ज्याणी ने पायलट बनने के बाद जो किया है, उस बात ने सबका दिल जीत लिया है। दरअसल, विकास ने अपने गाँव के 22 बुजुर्ग दादा व दादियों को हवाई जहाज की सैर करवाई। इन सभी बुजुर्गों की उम्र 72 साल से उपर है। इन में से बहुत से लोगों ने कभी अपनी ज़िन्दगी में हवाई जहाज की यात्रा तो दूर बल्कि हवाई जहाज को शायद ही देखा हो लेकिन विकास ने उनके इस सपने को पूरा किया। विकास ने नई दिल्ली से अमृतसर तक उनकी यात्रा का प्रबंध किया। जहाँ उन्होंने स्वर्ण मंदिर, जलियांवाला बाग और वागा बॉर्डर घुमा। इस यात्रा के बाद इन बुजुर्गों की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। विकास के पिता ने बताया कि विकास ने जो किया वह किसी तीर्थयात्रा से कम नहीं। यह हमेशा से उसका सपना था कि पायलट बने और अपने गाँव के बुजुर्गों को हवाई यात्रा करवाए।
इन यात्रियों में से एक, 90 वर्षीय बिमला ने कहा, “बहुत से लोग हम बूढ़ों से ऐसे वादे करते हैं, लेकिन उसने अपने वादे को निभाया।” विकास ने यह साबित कर दिया कि यदि मन में लगन हो तो आप कुछ भी कर सकते हैं। और विकास की इस कोशिश ने हमें सिखाया कि हम कैसे अपने बुजुर्गों की हमारे प्रति मेहनत और समर्पण का शुक्रिया अदा कर सकते हैं।
विजय दशमी

बोलकर जो जय उठाते हाथ,
उनकी जाति है नत-शीश,
उनका देश है नत-माथ,
अचरज की नहीं क्या बात?
इष्ट जिनके देवता हैं राम
उनकी जाति आज अशक्त,
उनका देश आज गुलाम,
विधि की गति नहीं क्या वाम?
मुक्ति जिनके जन्म का आदर्श
बंधन में पड़े वे आज,
बंधन की तजे वे लाज
क्यों हैं? बोल, भारतवर्ष!
विश यू हैप्पी बर्थ डे रेखा

रेखा। फिल्म अभिनेत्री रेखा। सिर्फ नाम ही काफी है। नाम लेते ही खूबसूरत चेहरा आँखों के सामने आ जाता है। वो रेखा, जिन्हें किस्मत से कुछ भी नहीं मिला। सब मिला मेहनत और लगन से। अपने अविवाहित माँ-पिता की संतान होने के दर्द के साथ ही 10 अक्टूबर यानी आज ही के दिन 1954 को इस धरती पर जन्म लीं। माँ –पिता दोनों ही तमिल फिल्मी दुनिया के थे। इन्होंने भी कई तमिल फिल्में भी कीं। उससे कुछ आगे बढ़ने का ख्वाब लेकर चलने वालीं रेखा ने 1970 में हिंदी फिल्म में कदम रखा। सावन भादो फिल्म से। जहाँ एक मोटी, बदसूरत लड़की दिखी। अगर वही रूप-रंग रह जाता तो रेखा वो रेखा नहीं बन पातीं। लेकिन इस बात को उन्होंने न केवल समझा, महसूस किया बल्कि कारगर साबित किया। योगा और खानपान से जहाँ खुद को इतना खूबसूरत बना लीं, मेकअप कर ऐसा जादू दिखाया जो आज तक बरकरार है। जहाँ भी अगर किसी समारोह में पहुँचतीं हैं तो साड़ी में खूबसूरत सा चेहरा दमकता रहता है। कम उम्र की हीरोइनों में भी इतनी चमक नहीं जितनी 64 उम्र में रेखा के चेहरे पर। और वो भी ऐसा चेहरा जो उन्हें जन्म से नहीं मिला, बल्कि कर्म से मिला। यह इंडस्ट्री किसी भी लड़की को लड़के और प्रेम से बिना जोड़े रह ही नहीं सकता, तो रेखा उससे कैसे छूट सकती थीं। इसलिए जितनी वो खूबसूरत हैं, उतनी ही उनकी प्रेम गाथाएँ हैं। प्रेम गाथाएँ तो भरी पड़ी है, पर सब अधूरी है। हाँ, एक व्यवसायी से शादी जरूर की थीं, पर उस व्यवसायी ने न जाने क्यों आत्महत्या कर लीं। इसलिए यह प्रेम भी उनसे छिन गया। लेकिन वो अपनी चमक और अपनी साज-सज्जा में कोई कमी नहीं की।

ना ही रोनी सूरत बनाकर किस्मत को कोसने लगी। बल्कि अपना कर्म यानी अभिनय करती रहीं, खूबसूरत, दो अंजानें, सिलसिला, उमराव जान, घर-संसार में जहाँ उनकी अदा लोगों को लुभाती हैं, वहीं एक समय बाद कोई मिल गया, क्रिश जैसे फिल्मों में भी उनका अभिनय लोहा मनवा लेता है। अमिताभ बच्चन से अलगाव होने के बावजूद भी टूटन उनके चेहरे पर नहीं दिखी, और वो अपने काम को पूजा मानकर करती रहीं। निगेटिव रोल में भी खिलाड़ियों के खिलाड़ी फिल्म में दिखीं, और वहाँ भी उन्होंने अपना काम बेहतर ढंग से किया। काम के प्रति लगन, मेहनत और समर्पण की वजह से कई पुरस्कार, लाइफ टाइम एचिवमेंट, नेशनल एवार्ड उनकी झोली में है। उन्होंने अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए केवल काम का ही सहारा लिया। आज अपने 64वें जन्मदिन पर भी इतनी खूबसूरत दिख रही हैं कि लग रहा है मानों सिलसिला की रेखा ही आजकल बरकरार है। वैसी ही खूबसूरती, वैसा ही प्यार, वैसा ही जादू उनके चेहरे पर आज भी दिखता है। मानों किसी प्यार की रंगत उनके चेहरे पर चढ़ी हुई है और वह खिलखिलाती रहती है ।ना जाने क्यों। नाम एक होने से। या कोई कारण है। मुझे पता नहीं। मेरे मन में उनके प्रति खास आकर्षण रहा है। उनकी खूबसूरत, सिलसिला, दो अंजानें, घर एक मंदिर, घर-संसार, मुकद्दर का सिकंदर, खून भरी मांग, खिलाड़ियों का खिलाड़ी, कोई मिल गया फिल्म कितनी बार देखने के बाद भी आज तक मन नहीं भरा। मन करता है उनकी फिल्मों को देखते ही जाऊँ। एक समय था जब मुझे उनकी फोटो और कलेक्शन को इकट्ठा करने का जुनून था। बांग्ला पत्रिका आनन्दलोक में छपने वाली उनकी जीवनी के लिए पत्रिका खरीदती थी और पढ़ा करती थी। मैं उनकी आत्मकथा को पढते-पढते ही बांग्ला भाषा भी सीख ली। इसकी कुछ प्रतियाँ आज भी पड़ी हो। उनके जीवन के बारे में जितना पढती, जितना जानती, उनको उनका ही पढने, जानने की इच्छा प्रबल हो जाती। उनकी तरह मेहनत करने की इच्छा होती। खूबसूरत दिखने की इच्छा होती। कितने संघर्ष करने के बाद उन्हें कामयाबी मिली। वैसी कामयाबी चाहती। पर उतनी मेहनत नहीं कर पाती। उनकी तरह लक्ष्य निर्धारित नहीं कर पाती हूँ। इसलिए शायद उतनी कामयाबी भी नहीं मिल पा रही है, पर इच्छा जरूर है। मन करता है कि उनकी तरह सुंदर लगूँ, मुस्कुराऊँ, और सारे गिलवे-शिकवे भूलकर जिंदगी को जी लूँ। खुश होकर जी लूँ। सोचती हूँ कि यह जिंदगी तो केवल एक बार ही मिली है, उसे इतने वर्षों तक जैसे-तैसे बिता ली। अब मन करता है कि सदाबहार अभिनेत्री रेखा की तरह रेखा बनूँ। और चेहरे पर मुस्कुराहट, आँखों में प्यार भर कर आगे की काम करते हुए आगे बढ़ती रहूँ। पता नहीं, यह इच्छा पूरी होगी कि नहीं पर इच्छा है कि कुछ ऐसा ही हो और बाकी भरी जिंदगी अच्छे से जी लूँ। मुस्कुराते हुए जी लूँ। वैसे विश यू हैप्पी बर्थ डे रेखा जी।
गांधी देश के लिए पहले से ज्यादा प्रासंगिक हैं
कोलकाता : गांधी की बातें सुनी जाएंगी तो संभव है मानवजाति कुछ समय तक और जी सके। गांधी के अपने दौर में ही जब अपने ही पराए हो गए थे तो आज के दौर में गांधी को कौन सुनेगा। हमें नए सिरे से सोचना होगा कि गांधी की अहिंसा आज की हिंसा की राजनीतिक के बीच कितनी अधिक प्रासंगिक है। आज के माहौल में असहमति का साहस घटता जा रहा है जबकि एक लोकतांत्रिक समाज में असहमति की आजादी होनी चाहिए। सांसार को अपने पूरे इतिहास में गांधी की कभी इतनी जरूरत नहीं थी जितनी आज है, और संसार के पूरे इतिहास में गांधी की इतनी अवहेलना कभी नहीं थी जितनी आज है। भारतीय भाषा परिषद द्वारा आयोजित राष्ट्रीय परिसंवाद में यह बात प्रसिद्ध गांधी अध्येता प्रो.सुधीर चंद्र ने की।
वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने कहा कि गांधी ने जिस हिंदी की तरफदारी की थी वह सांप्रदायिक सौहार्द पैदा करनेवाली भाषा थी। आज भारतीय भाषाओं में अंग्रेजी घुस रही है जिसका गांधी जरूर विरोध करते। मीडिया ने आज झूठी खबरों का ऐसा जाल फैला रखा है कि हमें सोचने के लिए ये मजबूर होना पड़ता है कि क्या सत्य है और क्या झूठ है। उन्होंने मीडिया को निष्पक्ष हो कर देश और दुनिया की खबरें देने के लिए कहा क्योंकि वह एक बड़ा जनमत निर्माता है।
वरिष्ठ समाजविज्ञानी अभय कुमार दुबे का कहना था कि गांधी ने स्पष्ट कहा था कि धर्म और राजनीतिक दो भिन्न मामले हैं और उनके सपनों के भारत को सेक्युलर और लोकतांत्रिक होना है। गांधी के चिंतन को ‘हिंद स्वाराज’ पुस्तक तक सीमित करके नहीं देखना चाहिए। बल्कि उनका एक उत्तर-हिंद स्वराज पाठ तैया करना चाहिए ताकि गांधी के विचारों में आए परिवर्तनों को समझा जा सके। गांधी ने यह भी लिखा है कि ‘मेरे ताजे लेखन को सही मान कर पुराने को खारिज कर देना चाहिए।’ विशिष्ट अतिथि गांधीवादी शंकर कुमार सान्याल ने कहा कि गांधी आज पूरे विश्व में सबसे अधिक प्रासंगिक हैं। वे भले हिंदू सनातन धर्म के प्रति अति श्रद्धा रखते थे पर सर्वधर्म के पैरोकार थे। विश्व फलक पर ऐसा शायद ही कोई व्यक्तित्व हो जिनके नाम से पूरे विश्व के 150 देशों की मुख्य सड़कों का नाम गांधी के नाम पर हो। 105 देशों में गांधी की मूर्ति स्थापित है। अध्यक्षीय भाषण देते हुए डॉ.शंभुनाथ ने कहा कि आज गांधी को चश्मे में सीमित करके देखा जा रहा है या उन्हें देवता बना दिया गया है। नई पीढ़ी के लिए जरूरी है कि वह गांधी से अपना संबंध जोड़े क्योंकि गांधी ने खुदगर्जी से भरी ऐसी सभ्यता के प्रति हमें सावधान किया था जिसमें आज हम घिरे हैं। गांधी के युग में आदर्श तक यथार्थ को लाने की बात थी जबकि आज सांप्रदायिकता और भ्रष्टाचार जैसे यथार्थ को ही आदर्श बनाकर समाज में स्थापित किया जा रहा है। गांधी ने भारत के स्वभाव को पहचाना था जो अहिंसा, मैत्री और सत्याग्रह पर आधारित है। यदि भारत अपना स्वभाव छोड़ देगा तो वह विपत्ति में पड़ेगा।
स्वागत भाषण देते हुए परिषद की अध्यक्ष डॉ.कुसुम खेमानी ने दक्षिण अफ्रीका का अपना अनुभव साझा करते हुए कहा कि गांधी विश्व में शांति के दूत के रूप में देखे जाते हैं। परिषद के मंत्री नंदलाल शाह ने संचालन करते हुए कहा कि गांधी आज भी प्रासंगिक हैं। धन्यवाद ज्ञापन परिषद की मंत्री श्रीमती बिमला पोद्दार ने किया।
प्रलेस बेगूसराय और नीलांबर कोलकाता द्वारा कार्यक्रम ‘समाद’ का आयोजन
प्रलेस बेगूसराय एवं नीलांबर कोलकाता के संयुक्त तत्वावधान में हाल ही में चर्चित विप्लवी पुस्तकालय गोदरगावां,बेगूसराय में ‘गांधी की परिकल्पना का भारत’ विषय पर परिचर्चा एवं कविता पाठ का शानदार आयोजन किया गया।राजेंद्र राजन की अध्यक्षता में आयोजित परिचर्चा सत्र में प्रो. मणीन्द्र नाथ ठाकुर, प्रो. मनोज झा, प्रो. हितेंद्र पटेल और श्री अखिलेश प्रसाद सिंह ने वर्तमान समय की गांधी की विचारधारा के महत्व को रेखांकित किया। परिचर्चा सत्र का संचालन अनीश अंकुर ने किया। दूसरे सत्र में वरिष्ठ कवि आलोक धन्वा की अध्यक्षता में कविता पाठ का आयोजन किया गया।इसमें पूनम सिंह, यतीश कुमार, आनंद गुप्ता,रश्मि भारद्वाज, ऋतेश पांडेय, अरमान आनंद सिंह ,परितोष कुमार पीयूष ,विजय शर्मा और प्रभा देवी ने अपनी कविताओं का पाठ किया। संचालन रश्मि भारद्वाज ने किया।अंतिम सत्र में ममता पांडेय द्वारा निर्देशित नाटक ‘धुआँ-धुआँ रूह’ नाटक का मंचन किया गया। इसमें विशाल पांडेय और ऋतेश पांडेय ने अभिनय किया।इसके अलावा नीलांबर द्वारा तैयार कविता कोलाज की प्रस्तुति की गई, जिसमें ऋतेश पांडेय,स्मिता गोयल, ममता पांडेय,विजय शर्मा, पूनम सिंह,दीपक कुमार ठाकुर,विशाल पांडेय ने अष्टभुजा शुक्ल की कविताओं का कोलाज प्रस्तुत किया। इसके बाद नीलांबर द्वारा निर्मित नरेश सक्सेना की कविता ‘गिरना’ एवं मुक्तिबोध की कविता ‘भूल गलती’ पर वीडियो मोंताज दिखाया गया जिसमें क्रमशः स्मिता गोयल और ममता पांडेय ने कविताओं की आवृत्ति की है। कार्यक्रम के अंत में चंदन पांडेय की कहानी ‘जमीन अपनी तो थी’ का दृश्य श्रव्य माध्यम से पाठ किया गया, जिस पर आधारित दिखाई गई लघु फिल्म का निर्देशन ऋतेश पांडेय ने किया। कार्यक्रम के संयोजन में मनोज झा की महत्वपूर्ण भूमिका रही। कार्यक्रम में भारी संख्या में दर्शक और स्रोता कार्यक्रम स्थल पर मौजूद थे। यहाँ बता दें कि विप्लवी पुस्तकालय ने विगत वर्षों में अपने महत्वपूर्ण कार्यों के द्वारा देश भर में विशिष्ट पहचान बनाई है एवं अब इसने एक जन आन्दोलन का रूप ले लिया है।
प्लस साइज हैं, फैशनिस्ता बनिए बिन्दास
छरहरे शरीर वाली लड़कियों के लिए परिधान का चयन मुश्किल नहीं है। मुश्किल होती है प्लस साइज कही जाने वाली लड़कियों और महिलाओं के लिए। तो आइए जानते हैं कि प्लस साइज की महिलाएँ ऐसा क्या पहनें कि उन पर कपड़े अच्छे लगें और वे अलग दिखें –
जीन्स : अगर आपकी कमर मोटी और हिप्स हैवी हैं, तो आपके लिए लो टु मिड-वेस्ट जीन्स बेस्ट साबित होगी. इसमें आपकी कमर और हिप्स दोनों कम चौड़े नज़र आएंगे। अपने वॉर्डरोब में बूट-कट जीन्स और लो-वेस्ट जीन्स रखें। हैवी बॉडी के कारण यदि आप स्किनी जीन्स नहीं पहनना चाहतीं, तो स्ट्रेट लेग जीन्स ट्राई कर सकती हैं। स्किनी या स्लाउची जीन्स न पहनें। ये ख़ासकर स्लिम महिलाओं पर जंचती है.
टी-शर्ट : स्कूप नेक टी-शर्ट आपके लिए बेस्ट साबित होगी। इससे आपकी टमी (पेट) आसानी से छिप जाएगी। अगर आपका हिप पोर्शन हैवी है, तो आप रोल स्लीव टी-शर्ट भी ट्राई कर सकती हैं. इससे आपकी बॉडी बैलेंस्ड नज़र आएगी। प्लेन राउंड नेक टी-शर्ट न पहनें. ऐसी टी-शर्ट हैवी बॉडी वाली महिलाओं पर सूट नहीं करती।
बेल्ट : प्लस साइज़ महिलाओं के लिए स्किनी बेल्ट पहनें। इस तरह की बेल्ट आप शर्ट, जैकेट, टी-शर्ट आदि के साथ पहन सकती हैं। आप चौड़ी बेल्ट पहनने की भूल न करें। ये स़िर्फ पतली महिलाओं पर फबती है।

गाउन : प्लस साइज़ महिलाओं को डार्क सिंगल कलर का गाउन पहनना चाहिए। इसमें आप स्लिम नज़र आएंगी। जब भी आप गाउन पहनें, उसके साथ एम्बेलिश्ड क्लच या पर्स लें। गाउन और क्लच का कॉम्बिनेशन बहुत ख़ूबसूरत नज़र आता है। टाइट फिटिंग वाला गाउन न ख़रीदें. ये आप पर सूट नहीं होगा।

कुरती : एम्ब्रॉयडर्ड कुरती खरीदें, लेकिन पतली बॉर्डर वाली. ये आप पर ज़्यादा सूट होगी। प्रिंटेड कुरती भी आपके लिए एक अच्छा विकल्प है। प्रिंटेड कुरती का क्रेज़ कभी कम नहीं होता। शॉर्ट कुरती न पहनें. इसमें आप मोटी और हाइट में छोटी नज़र आ सकती हैं।

साड़ी : लाइट वेट या हल्की साड़ी पहनें, जैसे- जॉर्जेट, शिफॉन, क्रेप आदि. इसमें आप स्लिम नज़र आएंगी। गहरे रंग की साड़ी पहनें। गहरे रंग मोटापा छुपाने में मदद करते हैं। भारी काम वाली साड़ी न पहनें, इसमें आप ज़्यादा मोटी दिखेंगी।

लहंगा-चोली : कलीदार या फिश कट लहंगा ख़रीदें। लहंगे के लिए शिफॉन, जॉर्जेट या नेट फैब्रिक चुनें। ये आपको स्लिम लुक देगा। पारम्परिक चोली पहनें। नेक लाइन चौकोर रखें> ग्लैमरस लुक के लिए बैक नेक खुला रख सकती हैं। भारी दुपट्टा पहनने से बचें, वरना आप और भी मोटी नज़र आ सकती हैं। आपके लिए शिफॉन या नेट का दुपट्टा सही रहेगा।

ज़्यादातर प्लस साइज़ महिलाएं अपना मोटापा छुपाने के लिए या तो बहुत ढीले कपड़े पहनती हैं या बहुत टाइट। इससे मोटापा छुपता नहीं, बल्कि शरीर पर ध्यान ज़्यादा जाता है। अतः ऐसी महिलाओं को अच्छी फिटिंग वाले कपड़े पहनने चाहिए, जो उनके शरीर की कमियों को छुपा सकें। कफ्तान, एसिमेट्रिकल ड्रेस, अच्छी फिटिंग वाले कुर्ता-चूड़ीदार, एंपायर लाइन अनारकली, शिफॉन साड़ी आदि आपके लिए सबसे सही चुनाव हैं। ज़्यादातर प्लस साइज़ महिलाओं को लगता है कि काले या गहरे रंग के कपड़ों में वो दुबली नज़र आएंगी इसलिए वो हमेशा इसी तरह के कपड़े पहनती हैं, जबकि ऐसा करने की कोई ज़रूरत नहीं है। आप लाल, बरगंडी, इलेक्ट्रिक ब्लू जैसे ब्राइट कलर्स पहनकर आकर्षक बन सकती हैं. हां, बड़े प्रिंट वाले कपड़े न पहनें। आप पर छोटे प्रिंट वाले कपड़े ज़्यादा अच्छे लगेंगे।

बिना सोचे-समझे जो फैशन में है, उसे पहनने की ग़लती न करें। आप पर जो फबता यानि अच्छा लगता है और जो परिधान आरामदायक लगे, वही पहनें। मिनिमाइज़र, कॉर्सेट, वेस्ट बैंड, लो लेग निकर्स, हाई वेस्ट निकर्स जैसे स्मार्ट इनर वेयर्स मोटापा छुपाने में आपकी मदद कर सकते हैं, इसलिए इनका प्रयोग ज़रूर करें।
बैग, शूज़, ज्वेलरी आदि एक्सेसरीज़ भी आपके अच्छे साथी हो सकते हैं. यदि आप स्मार्ट एक्सेसरीज़ पहनती हैं, तो लोगों का ध्यान उन पर ज़्यादा और आपके मोटापे पर कम जाएगा। इसी तरह मेकअप व हेयरकट के साथ एक्सपेरिमेंट करके आप अलग दिख सकती हैं।
(साभार – मेरी सहेली)
‘अभी मेरे अंदर काफी ऊर्जा बची है, कुछ अलग करने की इच्छा’ : इंद्रा नूयी
न्यूयार्क : भारतीय मूल की पेप्सीको की मुख्य कार्यपालक अधिकारी इंद्रा नूयी ने कहा है कि उनके भीतर अभी काफी ‘ऊर्जा’ है और आने वाले समय में वह कुछ अलग करना तथा परिवार के साथ अधिक समय बिताना चाहती हैं। अमेरिका की पेय पदार्थ बनाने वाली इस कंपनी की बागडोर 12 साल संभाली। चेन्नई में जन्मीं नूयी जब 2006 में पेप्सीको की सीईओ बनी, उन्होंने कारपोरेट अमेरिका के लंबे समय से चल रहे बंधन को तोड़ा और लाखों युवा भारतीयों को अपने सपने को पूरा करने के लिये प्रेरित किया। पेप्सीको की 2018 की तीसरी तिमाही के वित्तीय परिणाम को लेकर आयोजित कान्फ्रेन्स काल में अपने समापन संबोधन में उन्होंने कहा, ‘‘आपको पता है सीईओ के रूप में 12 साल लंबा समय है और आज भी मेरे भीतर काफी ऊर्जा है। मैं अपने जीवन में कुछ अलग करना चाहती हूं। अपने परिवार के साथ अधिक समय व्यतीय करना चाहती हूं और पेप्सीको में अगली पीढ़ी को एक महान कंपनी की अगुवाई का मौका देना चाहती हूं।’ नूयी ने कहा कि पेप्सीको की अगुवाई करने का मौका और मौजूदा निदेशक मंडल, कार्यकारी और सहयोगी, शेयरधारकों एवं अन्य संबंधित पक्षों समेत बेहतरीन लोगों के साथ काम करना उनके लिये गर्व की बात रही है। वह 24 साल से कंपनी में काम करने के बाद पद से हट रही हैं। इस 24 साल के सेवा काल में वह 12 साल सीईओ रही। वह 2019 की शुरूआत तक कंपनी की चेयरपर्सन रहेंगी ताकि जिम्मेदारी का बिना किसी समस्या के हस्तांतरण हो सके। उल्लेखनीय है कि पेप्सीको के निदेशक मंडल ने इस साल अगस्त में नूयी के उत्तराधिकारी के रूप में रामोन लागुआर्ता का चयन किया। वह 62 साल की नूयी का स्थान लेंगे।
भारत की कीर्तना ने जीता आईबीएसएफ विश्व अंडर-16 स्नूकर खिताब
मुम्बई : भारत की कीर्तना पांडियन ने सेंट पीटर्सबर्ग में आईबीएसएफ विश्व अंडर-16 स्नूकर चैंपियनशिप में लड़कियों के वर्ग का खिताब जीता जो उनका पहला अंतरराष्ट्रीय खिताब है। अंतरराष्ट्रीय बिलियर्ड्स एवं स्नूकर महासंघ (आईबीएसएफ) के अनुसार कीर्तना ने फाइनल में बेलारूस की अलबिना लेसचुक को 3-1 से पराजित किया। कीर्तना ने नाकआउट में जगह बनाने के बाद हमवतन मनस्विनी शेखर और रूस की एलिना कैरलिना को सीधे फ्रेम में 3-0 से शिकस्त दी और फिर सेमीफाइनल में मौजूदा चैंपियन और हमवतन अनुपमा रामचंद्रन को 3-1 हराया। लड़कों के वर्ग का खिताब बेल्जियम के बेन मार्टन्स ने जीता।
भारतीय मूल की गीता गोपीनाथ अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की प्रमुख अर्थशास्त्री नियुक्त
नयी दिल्ली : भारतीय मूल की गीता गोपीनाथ अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) की प्रमुख अर्थशास्त्री नियुक्त की गईं। आईएमएफ की प्रबन्ध निदेशक क्रिस्टीन लगार्द ने इसका ऐलान किया। लगार्द ने कहा कि लीडरशिप में गोपीनाथ का रिकॉर्ड सर्वश्रेष्ठ है, उनका अकादमिक प्रदर्शन काफी अच्छा है। वे दुनिया की बेहतरीन अर्थशास्त्रियों में से एक हैं। गीता का जन्म भारत के मैसूर में हुआ। उन्होंने अपनी बैचलर ऑफ की डिग्री दिल्ली यूनिवर्सिटी, जबकि मास्टर ऑफ आर्ट्स की डिग्री दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और यूनिवर्सिटी और वॉशिंगटन से हासिल की। 2001 में प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी से पीएचडी करने के बाद उन्होंने शिकागो यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर काम शुरू किया। 2005 से वे हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय और आर्थिक मामलों की प्रोफेसर हैं।




