Tuesday, June 30, 2026
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नहीं रहे दिशोम गुरू शिबू सोरेन

-ममता बनर्जी ने जताया शोक
नयी दिल्ली । झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन का सोमवार सुबह सर गंगा राम अस्पताल में निधन हो गया। वे 81 वर्ष के थे। शिबू सोरेन किडनी से जुड़ी बीमारी के चलते पिछले एक महीने से अस्पताल में भर्ती थे। सर गंगा राम अस्पताल की ओर से जारी एक बयान में कहा गया कि शिबू सोरेन को आज सुबह 8:56 बजे मृत घोषित कर दिया गया। लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया। वे किडनी की बीमारी से पीड़ित थे और डेढ़ महीने पहले उन्हें स्ट्रोक भी हुआ था। पिछले एक महीने से वे लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर थे। शिबू सोरेन के पुत्र और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन खुद दिल्ली में मौजूद हैं। हेमंत सोरेन ने अपने पिता के निधन की जानकारी साझा करते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, ”आदरणीय दिशोम गुरुजी हम सभी को छोड़कर चले गए हैं। आज मैं शून्य हो गया हूं। सोशल मीडिया एक्स पर शोक संदेश साझा करते हुए सोमवार को ममता बनर्जी ने लिखा, “झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री, पूर्व केंद्रीय मंत्री, झारखंड मुक्ति मोर्चा के संस्थापक और मेरे आदिवासी भाइयों और बहनों के गुरु दिशोम (महान नेता) शिबू सोरेन के निधन से अत्यंत दुःखी हूं। मेरे भाई हेमंत सोरेन, उनके पुत्र और झारखंड के मुख्यमंत्री, साथ ही उनके पूरे परिवार, बिरादरी और सभी अनुयायियों के प्रति मेरी हार्दिक संवेदना। मैं उन्हें अच्छी तरह जानती थी और उनका सच्चा सम्मान करती हूं। आज झारखंड के इतिहास का एक अध्याय समाप्त हो रहा है।”

लोक को आलोक देता है तुलसी साहित्य: प्रो हरिशंकर मिश्र

कोलकाता । रामकथा को लोकोन्मुखी बनाकर गोस्वामी तुलसीदास ने संस्कृति को संवारने और समाज को बचाने का अभूतपूर्व कार्य किया। उनके साहित्य में भारतीय संस्कृति का संपूर्ण परिचय तो है ही, लोक जागरण के सूत्र भी हैं। अपने संग्रह त्याग, विवेक का परिचय देते हुए उन्होंने रामकथा को परिमार्जित कर उसका विमल रूप प्रस्तुत किया है।’ ये उद्गार हैं लखनऊ विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष प्रो० हरिशंकर मिश्र के, जो सेठ सूरजमल जालान पुस्तकालय के तत्वावधान में आयोजित तुलसी जयंती समारोह में बतौर प्रधान वक्ता बोल रहे थे। समारोह के अध्यक्ष प्रसिद्ध उद्योगपति, समाजसेवी एवं प्रखर वक्ता डॉ विट्ठलदास मूंधड़ा ने सनातन मूल्यों पर हो रहे चौतरफा प्रहार पर चिंता व्यक्त करते हुए अस्मिता की रक्षा और संस्कृति के संरक्षण हेतु तुलसी साहित्य के प्रसार की आवश्यकता पर बल दिया। समारोह का शुभारंभ जालान बालिका विद्यालय की छात्राओं द्वारा प्रस्तुत रुद्राष्टकम से हुआ। स्वागत भाषण देते हुए पुस्तकालय के उपाध्यक्ष डॉ. प्रेमशंकर त्रिपाठी ने तुलसी जयंती के साथ प्रेमचंद के जन्मदिवस के संयोग की चर्चा करते हुए कहा कि एक रामकथा के गायक हैं और दूसरे ग्रामकथा के रचनाकार। दोनों ने समाज को नई दिशा प्रदान की। इस अवसर पर जालान बालिका विद्यालय की छात्राओं द्वारा रामलला नहछू की संगीतमय प्रस्तुति ने सबको मंत्रमुग्ध कर दिया। अतिथियों का स्वागत महावीर प्रसाद बजाज, अरुण प्रकाश मल्लावत, विश्वंभर नेवर, सागरमल गुप्त, विधुशेखर शास्त्री ने किया। कार्यक्रम का संचालन पुस्तकालय की मंत्री दुर्गा व्यास ने एवं धन्यवाद ज्ञापन पुस्तकालयाध्यक्ष भरत कुमार जालान ने किया। इस अवसर पर शंकर लाल सोमानी, डॉ सत्या उपाध्याय, डॉ वसुमति डागा, डॉ तारा दूगड़, कमलेश मिश्र, विजय पाण्डेय, नंदलाल सिंघानिया, वंशीधर शर्मा, प्रियंकर पालीवाल के साथ साथ अन्य गणमान्य लोगों की गरिमामयी उपस्थिति रही। समारोह की सफलता में भगीरथ सारस्वत, श्रीमोहन तिवारी, पलक सिंह तथा सैकत मन्ना की सक्रिय भूमिका रही।

वर्तमान समय में प्रेमचंद कितने प्रासंगिक ..सेवासदन और निर्मला उपन्यास के संदर्भ में

डॉ. वसुंधरा मिश्र, भवानीपुर एडुकेशन सोसाइटी कॉलेज, कोलकाता

प्रेमचंद को हिंदी उपन्यास का प्रवर्तक माना जाता है । उनके पूर्व हिंदी उपन्यास की कोई मौलिक स्थिति नहीं थी। प्रेमचंद के पूर्व के उपन्यास साहित्य जासूसी तिलस्मी ऐय्आरी और काल्पनिक रोमांस से युक्त होने के कारण मानव के यथार्थ जीवन से बहुत दूर थे। आचार्य नंददुलारे वाजपेयी ने कहा था कि जब हिंदी में नवीन सामाजिक चेतना का विकास नहीं हुआ था प्रेमचंद उपन्यास के इस निर्माण और अनुवाद के प्रांरंभिक युग को पार करते हुए हिंदी उपन्यासों के उस युग में पहुंचने वाले पहले साहित्यकार थे जिन्होंने उसका शिलान्यास किया और हिंदी उपन्यास एक सुनिश्चत कलास्वरूप को प्राप्त कर अपनी आत्मा को पहचान सका तथा अपने उद्देश्य से परिचित होकर उसकी पूर्ति में लग सका।
प्रेमचंद जी उपन्यास साहित्य में युगांतर लेकर अवतरित हुए। प्रेमचंद के परवर्ती उपन्यासकारों ने किसी न किसी रूप में प्रेमचंद जी का अनुकरण किया। आज हिंदी उपन्यास साहित्य विकसित होकर पुष्ट हो चुका है। उसमें शैली – शिल्प और विषयवस्तु की दृष्टि से नए- नए प्रयोग हुए हैं और असंख्य उपन्यास लिखे गए लेकिन प्रेमचंद जैसा युगदृष्टा उपन्यासकार उत्पन्न नहीं हुआ ।
सेवासदन 1911 में लाहौर से उर्दू में जश्ने बाजार नाम से दो भागों में प्रकाशित हुआ था बाद में 1913 में महावीर प्रसाद पोद्दार जी की प्रेरणा से हिंदी में सेवासदन का प्रकाशन हुआ।
सेवासदन समाज का यथार्थ रूप से चित्रण करने वाला सामाजिक उपन्यास है। इसमें समाज की विभिन्न जातियों विचार पद्धतियों मान्यताओं एवं मर्यादाओं का पूर्ण रूप से चित्रण मिलता है। इसमें पारिवारिक एवं सामाजिक समस्याओं का बड़ा ही स्वाभाविक वर्णन है। समाज में व्याप्त विपन्नता रिश्वतखोरी दहेज प्रथा अनमेल विवाह नारी जीवन की समस्याएं और समाज के तथाकथित सम्मनित लोगों की यथार्थ मानसिकता को दर्शाया गया है।
सेवासदन उपन्यास की नारी पात्री सुमन है जिसके इर्द गिर्द उपन्यास कई घटनाओं को बुनता हुआ बढ़ता है और तत्कालीन समाज के सभी पहलुओं को एक एक करके सामने रखा गया है। सुमन शक्तिशाली चरित्र है जिसमें सौन्दर्य और सेवाभाव दोनों का समन्वय है। चंचल और युवा नायिका सुमन जिसमें एक ओर जहां मांसल सौन्दर्य है तो दूसरी ओर उसमें अत्यधिक अन्तर्दृष्टि भी है। वह अपने चित्त की निर्बलता को दूर करने में भी सक्षम है।
वेश्या बनी सुमन के प्रति समाजसेवी विट्ठलदास कहते हैं कि स्त्रियों को अगर ईश्वर सुंदरता दे तो धन भी दे ।

निर्मला, मुंशी प्रेमचन्द द्वारा रचित प्रसिद्ध हिन्दी उपन्यास है। इसका प्रकाशन सन १९२७ में हुआ था। सन १९२६ में दहेज प्रथा और अनमेल विवाह को आधार बना कर इस उपन्यास का लेखन प्रारम्भ हुआ। इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाली महिलाओं की पत्रिका ‘चाँद’ में नवम्बर १९२५ से दिसम्बर १९२६ तक यह उपन्यास विभिन्न किस्तों में प्रकाशित है।
निर्मला में अनमेल विवाह और दहेज प्रथा की दुखान्त व मार्मिक कहानी है। उपन्यास का लक्ष्य अनमेल-विवाह तथा दहेज़ प्रथा के बुरे प्रभाव को अंकित करता है। निर्मला के माध्यम से भारत की मध्यवर्गीय युवतियों की दयनीय हालत का चित्रण हुआ है। उपन्यास के अन्त में निर्मला की मृत्यृ इस कुत्सित सामाजिक प्रथा को मिटा डालने के लिए एक भारी चुनौती है। प्रेमचन्द ने भालचन्द और मोटेराम शास्त्री के प्रसंग द्वारा उपन्यास में हास्य की सृष्टि की है।
निर्मला उपन्यास पूर्व शिल्प से मुक्त नहीं है ।स्वपन संवाद और लेखकीय टिप्पणी का प्रयोग है – – निर्मला स्वप्न में देखती है कि विवाह अधिक आयु के व्यक्ति के साथ होगा।
मुंशी तोताराम के स्वप्न में मंसाराम की मृत्यु होना ।
रुक्मिणी का कहना कि वह लौटकर फिर न आएगा।
निर्मला, मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित एक प्रसिद्ध उपन्यास है, जो दहेज प्रथा और अनमेल विवाह के दुष्परिणामों पर केंद्रित है। उपन्यास में, निर्मला नाम की एक युवती का विवाह उसके पिता की उम्र के एक अधेड़ व्यक्ति से हो जाता है, जिसके पहले से ही तीन बेटे हैं। दहेज की मांग और सामाजिक दबाव के कारण निर्मला का जीवन नारकीय हो जाता है। उपन्यास में, प्रेमचंद ने निर्मला के माध्यम से भारतीय समाज में महिलाओं की दयनीय स्थिति, दहेज प्रथा के अभिशाप और अनमेल विवाहों के कारण होने वाली पीड़ा को उजागर किया है। लेखक का मुख्य उद्देश्य इन सामाजिक कुरीतियों पर प्रकाश डालना और पाठकों को इनके प्रति जागरूक करना है।
कथा-सारांश: निर्मला, एक सुंदर और सुशील युवती है, जिसका विवाह एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति, तोताराम से होता है। तोताराम पहले से ही तीन बेटों का पिता है। निर्मला का जीवन ससुराल में कठिन हो जाता है। उसे दहेज की वजह से अपमान और अनादर का सामना करना पड़ता है। उसे अपने पति के बेटों से भी उपेक्षा मिलती है। निर्मला, अपने पति के प्रति समर्पित रहती है, लेकिन समाज उसे शक की नजर से देखता है। वह अपने कर्तव्यों का पालन करती है, लेकिन उसका जीवन पीड़ा और संघर्षों से भरा रहता है। अंततः, निर्मला बीमारी और मानसिक तनाव के कारण मृत्यु को प्राप्त होती है।
लेखक का प्रतिपाद्य: प्रेमचंद इस उपन्यास के माध्यम से दहेज प्रथा और अनमेल विवाह के खिलाफ आवाज उठाते हैं। वे दिखाते हैं कि कैसे ये सामाजिक बुराइयां महिलाओं के जीवन को नष्ट कर देती हैं। निर्मला के माध्यम से, प्रेमचंद ने भारतीय समाज में महिलाओं की दयनीय स्थिति, उनकी पीड़ा और संघर्षों को उजागर किया है। वह पाठकों को यह संदेश देना चाहते हैं कि इन कुरीतियों को खत्म करना आवश्यक है। उपन्यास में, प्रेमचंद ने समाज में व्याप्त रूढ़िवादी सोच और पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर भी प्रहार किया है। वह एक ऐसे समाज की कल्पना करते हैं जहां महिलाओं को सम्मान मिले और वे बिना किसी भेदभाव के जी सकें।
संक्षेप में, “निर्मला” एक सामाजिक उपन्यास है जो दहेज प्रथा और अनमेल विवाह जैसी सामाजिक बुराइयों पर प्रकाश डालता है और महिलाओं के प्रति सहानुभूति और सम्मान की भावना जगाता है। प्रेमचंद ने इस उपन्यास के माध्यम से पाठकों को इन सामाजिक बुराइयों के खिलाफ संघर्ष करने और एक बेहतर समाज के निर्माण के लिए प्रेरित किया है।

मेरी माँ ने मुझे प्रेमचंद का भक्त बनाया : मुक्तिबोध

रचनाकार: गजानन माधव मुक्तिबोध | संस्मरण
जयशंकर प्रसाद और मुंशी प्रेमचंद

एक छाया-चित्र है। प्रेमचन्द और प्रसाद दोनों खड़े हैं। प्रसाद गम्भीर सस्मित। प्रेमचन्द के होंठों पर अस्फुट हास्य। विभिन्न विचित्र प्रकृति के दो धुरन्धर हिन्दी कलाकारों के उस चित्र पर नजर ठहरने का एक और कारण भी है ।
प्रेमचन्द का जूता कैनवैस का है, और वह अँगुलियों की ओर से फटा हुआ है। जूते की कैद से बाहर निकलकर अँगुलियाँ बड़े मजे से मैदान की हवा खा रही है। फोटो खिंचवाते वक्त प्रेमचन्द अपने विन्यास से बेखबर हैं। उन्हें तो इस बात की खुशी है कि वे प्रसाद के साथ खड़े हैं, और फोटो निकलवा रहे हैं।

इस फोटो का मेरे जीवन में काफी महत्व रहा है। मैने उसे अपनी माँ को दिखाया था। प्रेमचन्द की सूरत देख मेरी माँ बहुत प्रसन्न मालूम हुई। वह प्रेमचन्द को एक कहानीकार के रूप में बहुत-बहुत चाहती थी। उसकी दृष्टि से, यानी उसके जीवन में महत्व रखने वाले, सिर्फ दो ही कादम्बरीकार (उपन्यास लेखक) हुए हैं – एक हरिनारायण आप्टे, दूसरे प्रेमचन्द। आप्टे की सर्वोच्च मराठी कृति, “उनके लेखे, पण लक्षान्त कोण देती है”, जिसमें भारतीय परिवार में स्त्री के उत्पीड़न की करूण कथा कही गयी है। वह क्रान्तिकारी करूणा है। उस करूणा ने महाराष्ट्रीय परिवारों को समाज-सुधार की ओर अग्रसर कर दिया।
मेरी माँ जब प्रेमचन्द की कृति पढ़ती, तो उसकी आँखों में बार-बार आँसू छल छलाते से मालूम होते। और तब–उन दिनों मैं साहित्य का एक जड़मति विद्यार्थी मात्र मैट्रिक का एक छोकरा था – प्रेमचन्द की कहानियों का दर्द भरा मर्म माँ मुझे बताने बैठती ।
प्रेमचन्द के पात्रों को देख, तदनुसारी-तदनरूप चरित्र माँ हमारे पहचानवालों में से खोज-खोजकर निकालती। इतना मुझे मालूम है कि माँ ने प्रेमचन्द का “नमक का दारोगा” आलमारी में से खोजकर निकाला था। प्रेमचन्द पढ़ते वक्त माँ को खूब हँसी भी आती, और तब वह मेरे मूड की परवाह किये बगैर मुझे प्रेमचन्द कथा प्रसूत उसके हास्य का मर्म बताने की सफल-असफल चेष्टा करती।
प्रेमचन्द के प्रति मेरी श्रद्धा व ममता को अमर करने का श्रेय मेरी माँ को ही है। मैं अपनी भावना में प्रेमचन्द को माँ से अलग नहीं कर सकता। मेरी माँ सामाजिक उत्पीड़नों के विरूद्ध क्षोभ और विद्रोह से भरी हुई थी। यद्यपि वह आचरण में परम्परावादी थी, किन्तु धन और वैभवजन्य संस्कृति के आधार पर ऊँच-नीच के भेद का तिरस्कार करती थी। वह स्वयं उत्पीड़ित थी। और भावना द्वारा, स्वयं की जीवन-अनुभूति के द्वारा, माँ स्वयं प्रेमचन्द के पात्रों में अपनी गणना कर लिया करती थी। मेरी ताई (माँ) अब बूढ़ी हो गयी है। उसने वस्तुत: भावना और सम्भावना के आधार पर मुझे प्रेमचन्द पढ़ाया। इस बात को वह नहीं जानती है कि प्रेमचन्द के पात्रों के मर्म का वर्णन-विवेचन करके वह अपने पुत्र के ह्रदय में किस बात का बीज बो रही है। पिताजी देवता हैं, माँ मेरी गुरू है। सामाजिक दम्भ, स्वाँग, ऊँच-नीच की भावना, अन्याय और उत्पीड़नों से कभी भी समझौता न करते हुए घृणा करना उसी ने मुझे सिखाया।
लेकिन मेरी प्यारी श्रद्धास्पदा माँ यह कभी न जान सकी कि वह किशोर-ह्रदय में किस भीषण क्रान्ति का बीज बो रही है, कि वह भावात्मक क्रान्ति अपने पुत्र को किस उचित-अनुचित मार्ग पर ले जायेगी, कि वह किस प्रकार अवसरवादी दुनिया के गणित से पुत्र को वंचित रखकर, उसके परिस्थिति-सामंजस्य को असम्भव बना देगी।
आज जब मैं इन बातों पर सोचता हूँ तो लगता है कि यदि मैं, माँ और प्रेमचन्द की केवल वेदना ही ग्रहण न कर, उनके चारित्रिक गुण भी सीखता, उनकी दृढ़ता, आत्म-संयम और अटलता को प्राप्त करता, आत्मकेन्द्रित प्रवृत्ति नष्ट कर देता, और उन्हीं के मनोजगत् की विशेषताओं को आत्मसात करता, तो शायद, शायद मैं अधिक योग्य पात्र होता। माँ मेरी गुरू भी अवश्य, किन्तु, मैं उनका शायद योग्य शिष्य ना था। अगर होता तो कदाचित् अधिक श्रेष्ठ साहित्यिक होता, केवल प्रयोगवादी कवि बनकर न रह जाता।
मतलब यह कि जब कभी भी प्रेमचन्द के बारे में सोचता हूँ, मुझे अपने जीवन का ख्याल आ जाता है। मुझे महान चरित्रों से साक्षात्कार होता है, और मैं आत्म-विश्लेषण में डूब जाता हूँ। आत्म-विश्लेषण की मन:स्थिति बहुत बुरी चीज है।
जब मैं कॉलेज में पढ़ने लगा तो मेरे कुछ लेखक-मित्रों के पास प्रेमचन्दजी के पत्र आये। मैं उन मित्रों के प्रति ईर्ष्यालु हो उठा। उन दिनों मैं उन लोगों को जीनियस समझता था, और प्रेमचन्द को देवर्षि। अब सोचता हूँ कि दोनों बातें गलत है। मेरे लेखक-मित्र जीनियस थे ही नहीं, बहुत प्रसिद्ध अवश्य थे और अभी भी है। किन्तु वे प्रेमचन्द के लायक न तब थे, न अब हैं। और यहाँ हम हिन्दी साहित्य के इतिहास के एक मनोरंजक और महत्वपूर्ण मोड़ तक पहुँच जाते है। प्रेमचन्द जी भारतीय सामाजिक क्रान्ति के एक पक्ष का चित्रण करते थे। वे उस क्रान्ति के एक अंग थे। किन्तु अन्य साहित्यिक उस क्रान्ति का एक अंग होते हुए भी उसके सामाजिक पक्ष की संवेदना के प्रति उन्मुख नहीं थे। वह क्रान्ति हिन्दी साहित्य में छायावादी व्यक्तिवाद के रूप में विकसित हो चुकी थी। जिस फोटो का मैंने शुरू में जिक्र किया, उसमें के प्रसादजी इस व्यक्तिवादी भाव-धारा के प्रमुख प्रवर्तक थे।
यह व्यक्तिवाद एक वेदना के रूप में सामाजिक गर्भितार्थों को लिये हुए भी, प्रत्यक्षत: किसी प्रत्यक्ष सामाजिक लक्ष्य से प्रेरित नहीं था । जैनेन्द्र में तो फिर भी मुक्तिकामी सामाजिक ध्वन्यर्थ थे, किन्तु आगे चलकर अज्ञेय में वे भी लुप्त हो गये। कहने का तात्पर्य यह है कि प्रेमचन्द उत्थानशील भारतीय सामाजिक क्रान्ति के प्रथम और अन्तिम महान कलाकार थे। प्रेमचन्द की भाव-धारा वस्तुत: अग्रसर होती रही, किन्तु उसके शक्तिशाली आविर्भाव के रूप में कोई लेखक सामने नहीं आया। यह सम्भव भी नहीं था, क्योंकि इस क्रान्ति का नेतृत्व पढ़े-लिखे मध्यम-वर्ग के हाथ में था, और वह शहरों में रहता था। बाद में वह वर्ग अधिक आत्म-केन्द्रित और अधिक बुद्धि-छन्दी हो गया तथा उसने काव्य में प्रयोगवाद को जन्म दिया।
किन्तु, क्या यह वर्ग कम उत्पीड़ित है? आज तो सामाजिक विषमताएँ और भी बढ़ गयी हैं। प्रेमचन्द का महत्व पहले से भी अधिक बढ़ गया है। उनकी लोकप्रियता अब हिन्दी तक ही सीमित नहीं रह गयी है। अन्य भाषाओं में उनके अनुवादकर्ताओं के बीच होड़ लगी रहती है। प्रेमचन्द द्वारा सूचित सामाजिक सन्देश अभी भी अपूर्ण है। किन्तु हम जो हिन्दी के साहित्यिक है, उसकी तरफ विशेष ध्यान नहीं दे पाते। एक तरह से यह यथार्थ से भागना हुआ। उदाहरणत: आज का कथा-साहित्य पढ़कर पात्रों की प्रतिच्छाया देखने के लिए हमारी आँखे आस-पास के लोगों की तरफ नहीं खिंचतीं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है, जैसे पात्रों की छाया ही नहीं गिरती, कि वे लगभग देहहीन है। लगता है कि हमारे यहाँ प्रेमचन्द के बाद एक भी ऐसे चरित्र का चित्रण नहीं हुआ, जिसे हम भारतीय विवेक-चेतना का प्रतीक कह सकें। शायद, अज्ञान के कारण मेरी ऐसी धारणा होगी। कोई मुझे प्रकाश-दान दें।
किन्तु, कुल मिलाकर मुझे ऐसा लगता है कि प्रेमचन्द की जरूरत आज पहले से भी ज्यादा बढ़ी हुई है। प्रेमचन्द के पात्र आज भी हमारे समाज में जीवित हैं। किन्तु वे अब भिन्न स्थिति में रह रहे हैं। किसी के चरित्र का कदाचित् अध:पतन हो गया है। किसी का शायद पुनर्जन्म हो गया है। बहुतेरे पात्र अपने सृजनकर्त्ता लेखक की खोज में भटक रहे है। उन्हें अवश्य ऐसा कोई-न-कोई लेखक शीघ्र ही प्राप्त होगा।
प्रेमचन्द की विशाल छाया में बैठकर आत्म-विश्लेषण की मन:स्थिति मुझे अजीब ख्यालों में डूबो देती है। माना कि आज व्यक्ति पहले जैसा ही जीवन-संघर्ष में तत्पर है, किन्तु अब वह अधिक आत्म केन्द्रित और आत्म-ग्रस्त हो गया है, माना कि इन दिनों वह समाज-परिवर्तन की, समाजवाद की, वैज्ञानिक विकास की, योजनाबद्ध कार्य की, अधिक बात करता है। किन्तु एक चरित्र के रूप में, एक पात्र के रूप में, वह सघन और निबिड़ आत्म-केन्द्रित होता जा रहा है। माना कि आज वह अधिक सुशिक्षित-प्रशिक्षित है, और अनेक पुराणपंथी विचारों को त्याग चुका है, तथा जीवन जगत से अधिक सचेत और सचेष्ट है किन्तु मानो ये सब बातें, ये सारी योग्यताएँ, ये सारी स्पृहणीय विशेषताएँ, उसे अधिकाधिक स्वयं-ग्रस्त बनाती गयी हैं। कदाचित् मेरा यह मन्तव्य अतिशयोक्तिपूर्ण है, किन्तु यह भी सही है कि वह एक तथ्य की ही अतिशयोक्ति है।
आश्चर्य मुझे इस बात का होता है कि आखिर आदमी को हो क्या गया है। उसकी अन्तरात्मा, एक जमाने में समाजोन्मुख सेवाभावी थी, आज आदर्शवाद की बात करते हुए भी इतनी अजीब क्यों हो गयी? एक बार बातचीत के सिलसिले में, एक सम्मानीय पुरूष ने मुझे कहा कि व्यक्ति जितना सुशिक्षित-प्रशिक्षित होता जायेगा, उतना ही बौद्धिक होता जायेगा, और उसी अनुपात में उसकी आत्मकेन्द्रिता बढ़ती जायेगी, उतने ही उसके मानवोचित गुण कम होते जायेंगे, जैसे करूणा, क्षमा, दया, शील, उदारता आदि। मेरे ख्याल से उसने जो कहा है, गलत है। किन्तु यह मैं निश्चय नहीं कर पाता कि उसका मन्तव्य निराधार है। शायद, मैं गलती कर रहा हूँगा। जीवन के सिर्फ एक पक्ष को (अधूरे ढ़ंग से और अपर्याप्त निरीक्षण द्वारा) आंकलित कर मैं इस निराशात्मक मन्तव्य की ओर आकर्षित हूँ।
किन्तु, कभी-कभी निराशा भी आवश्यक होती है। विशेषकर प्रेमचन्द की छाया में बैठे, आज के अपने आस-पास के जीवन के दृश्य देख, वह कुछ तो स्वाभाविक ही है। सारांश यह, कि प्रेमचन्दजी की कथा-साहित्य पढ़कर आज हम एक उदार और उदात्त नैतिकता की तलाश करने लगते है, चाहने लगते हैं कि प्रेमचन्दजी के पात्रों के मानवीय गुण हममें समा जायें, हम उतने ही मानवीय हो जायें जितना कि प्रेमचन्द चाहते हैं। प्रेमचन्दजी का कथा-साहित्य हम पर एक बहुत बड़ा नैतिक प्रभाव डालता है। उनका कथा-साहित्य पढ़ते हुए उनके विशिष्ट उँचे पात्रों द्वारा हमारे अन्त:करण में विकसित की गयी भावधाराएँ हमें न केवल समाजोन्मुख करती है, वरन् वे आत्मोन्मुख भी कर देती है। और अब प्रेमचन्द हमें आत्मोन्मुख कर देते हैं, तब वे हमारी आत्म-केन्द्रिता के दुर्ग को तोड़कर हमें एक अच्छा मानव बनाने में लग जाते हैं। प्रेमचन्द समाज के चित्रणकर्त्ता ही नहीं, वरन् वे हमारी आत्मा के शिल्पी भी है।
माना कि हमारे साहित्य का टेकनीक बढ़ता चला जायेगा, माना कि हम अधिकाधिक सचेत और अधिकाधिक सूक्ष्म-बुद्धि होते जायेंगे, माना कि हमारा बुद्धिगत ज्ञान संवेदनाओं और भावनाओं को न केवल एक विशेष दिशा में मोड़ देगा, वरन् उनका अनुशासन-प्रशासन भी करेगा। किन्तु क्या यह सच नहीं है कि मानवीय सत्यों और तथ्यों को देखने की सहज भोली और निर्मल दृष्टि, ह्रदय का सहज सुकुमार आदर्शवाद, दिल को भीतर से हिला देने वाली कर्त्तव्योन्मुख प्रेरणा भी हमारे लिए उतनी ही कठिन और दुष्प्राप्त होती जायेगी?
ओह! काश, हम भी भोली कली से खिल सकते! पराये दु:ख में रोकर उसे दूर करने की भोली सक्रियता पा सकते! शायद मैं विशेष मन:स्थिति में ही यह सब कह रहा हूँ। फिर भी मेरी यह कहने की इच्छा होती है कि समाज का विकास अनिवार्यत: मानवोचित नैतिक-हार्दिक विकास के साथ चलता जाता है, यह आवश्यक नहीं है। सभ्यता का विकास नैतिक विकास भी करता है, यह जरूरी नहीं है।
यह समस्या प्रस्तुत लेख के विषय से सम्बन्धित होते हुए भी उसके बाहर है। मैं केवल इतना ही कहना चाहूंगा कि प्रेमचन्द का कथा-साहित्य पढ़कर हमारे मन पर जो प्रभाव होते हैं, वे धीरे-धीरे हमारी चिन्तना को इस सभ्यता-समस्या तक ले आते हैं। क्या यह हमें प्रेमचन्द की ही देन नहीं है?

 

जयंती पर विशेष : प्रेमचंद मुंशी कैसे बने

डॉ. जगदीश व्योम
सुप्रसिद्ध साहित्यकारों के मूल नाम के साथ कभी-कभी कुछ उपनाम या विशेषण ऐसे घुल-मिल जाते हैं कि साहित्यकार का मूल नाम तो पीछे रह जाता है और यह उपनाम या विशेषण इतने प्रसिद्ध हो जाते हैं कि उनके बिना कवि या रचनाकार का नाम अधूरा लगने लगता है। साथ ही मूल नाम अपनी पहचान ही खोने लगता है। भारतीय जनमानस की संवेदना में बसे उपन्यास सम्राट ‘प्रेमचंद’ जी भी इस पारंपरिक तथ्य से अछूते नहीं रह सके।उनका नाम यदि मात्र प्रेमचंद लिया जाय तो अधूरा सा प्रतीत होता है।
उपनाम या तख़ल्लुस से तो बहुत से कवि और लेखक जाने जाते हैं किन्तु ‘मुंशी’ प्रेमचंद का उपनाम या तखल्लुस नहीं था। ऐसी स्थिति में प्रश्न यह उठता है कि ‘प्रेमचंद’ के नाम के साथ ‘मुंशी’ का क्या संबंध था। यह शब्द आखिर जुड़ा कैसे? क्या प्रेमचंद ने कभी मुंशी का काम किया या यह उपाधि उनके परिवार में पिता या पितामह से उनके पास विरासत में हस्तांतरित हुई। साथ ही प्रेमचंद का मूल नाम क्या था और वह बदल कर प्रेमचंद कैसे हो गया? प्रेमचंद के नाम के साथ ‘उपन्यास सम्राट’ का एक और विशेषण भी जुड़ा हुआ है। यह सब नाम और उपाधियाँ प्रेमचंद के साथ कैसे जुड़ गए- इसके पीछे कुछ रोचक घटनाएँ हैं।
‘प्रेमचंद’ का वास्तविक नाम ‘धनपत राय’ था। ‘नबावराय’ नाम से वे उर्दू में लिखते थे। उनकी ‘सोज़े वतन’ (१९०९, ज़माना प्रेस, कानपुर) कहानी-संग्रह की सभी प्रतियाँ तत्कालीन अंग्रेजी सरकार ने ज़ब्त कर ली थीं। सरकारी कोप से बचने के लिए उर्दू अखबार “ज़माना” के संपादक मुंशी दया नारायण निगम ने नबाव राय के स्थान पर ‘प्रेमचंद’ उपनाम सुझाया। यह नाम उन्हें इतना पसंद आया कि ‘नबाव राय’ के स्थान पर वे ‘प्रेमचंद’ हो गए।
हिन्दी पुस्तक एजेन्सी का एक प्रेस कलकत्ता में था, जिसका नाम ‘वणिक प्रेस’ था। इसके मुद्रक थे ‘महाबीर प्रसाद पोद्दार’। वे प्रेमचंद की रचनाएँ बँगला के सुप्रसिद्ध उपन्यासकार शरत बाबू को पढ़ने के लिए दिया करते थे। एक दिन शरत बाबू से मिलने के लिए पोद्दार जी उनके घर पर गए। उन्होंने देखा कि शरत बाबू, प्रेमचंद का कोई उपन्यास पढ़ रहे थे। जो बीच में खुला हुआ था। कौतूहलवश पोद्दार जी ने उसे उठा कर देखा कि उपन्यास के एक पृष्ठ पर शरत् बाबू ने ‘उपन्यास सम्राट” लिख रखा है। बस, यहीं से पोद्दार जी ने प्रेमचंद को ‘उपन्यास सम्राट प्रेमचंद’ लिखना प्रारम्भ कर दिया। इस प्रकार धनपत राय से ‘प्रेमचंद’ तथा ‘उपन्यास सम्राट प्रेमचंद’ हुए।
प्रेमचंद जी के नाम के साथ ‘मुंशी’ कब और कैसे जुड़ गया? इस विषय में अधिकांश लोग यही मान लेते हैं कि प्रारम्भ में प्रेमचंद अध्यापक रहे। अध्यापकों को प्राय: उस समय मुंशी जी कहा जाता था। इसके अतिरिक्त कायस्थों के नाम के पहले सम्मान स्वरूप ‘मुंशी’ शब्द लगाने की परम्परा रही है। संभवत: प्रेमचंद जी के नाम के साथ मुंशी शब्द जुड़कर रूढ़ हो गया। इस जिज्ञासा की पूर्ति हेतु मैंने प्रेमचंद जी के सुपुत्र एवं सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री अमृत राय जी को एक पत्र लिखकर इस विषय में उनकी राय जाननी चाही। अमृतराय जी ने कृपा कर मेरे पत्र का उत्तर दिया। जो इस प्रकार है-
अमृत राय जी के अनुसार प्रेमचंद जी ने अपने नाम के आगे ‘मुंशी’ शब्द का प्रयोग स्वयं कभी नहीं किया। उनका यह भी मानना है कि मुंशी शब्द सम्मान सूचक है, जिसे प्रेमचंद के प्रशंसकों ने कभी लगा दिया होगा। यह तथ्य अनुमान पर आधारित है। यह बात सही है कि मुंशी शब्द सम्मान सूचक है। यह भी सच है कि कायस्थों के नाम के आगे मुंशी लगाने की परम्परा रही है तथा अध्यापकों को भी ‘मुंशी जी’ कहा जाता था। इसका साक्षी है प्रेमचंद से संबंधित साहित्य।
इस सम्बन्ध में प्रेमचंद की धर्म पत्नी ‘शिवरानी देवी’ की पुस्तक ‘प्रेमचंद घर में’ में प्रेमचंद से संबंधित सभी घरेलू बातों की चर्चा शिवरानी देवी ने की है। पूरी पुस्तक में कहीं भी प्रेमचंद के लिए ‘मुंशी’ शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है। इससे स्पष्ट है कि उस समय तक प्रेमचंद के नाम के साथ ‘मुंशी’ का प्रयोग नहीं होता था, और न ही सम्मान स्वरूप लोग उन्हें ‘मुंशी’ ही कहते थे, अन्यथा शिवरानी देवी प्रेमचंद के लिए कहीं न कहीं ‘मुंशी’ विशेषण का प्रयोग अवश्य करतीं। क्यों कि इसी पुस्तक में उन्होंने दया नारायण जी के लिए मुंशी जी शब्द का प्रयोग कई बार किया है परन्तु प्रेमचंद के लिए कहीं भी नहीं।
एक उदाहरण देखें-
“आप बीमार पड़े। मुझसे बोले-
हंस की जमानत तुम जमा करवा दो। मैं अच्छा हो जाने पर उसे सँभाल लूँगा।
उनकी बीमारी से मैं खुद परेशान थी उस पर ‘हंस’ की उनको इतनी फिक्र। मैं बोली, अच्छे हो जाइये, तब सब कुछ ठीक हो जाएगा।”
आप बोले, “नहीं दाखिल करा दो। रहूँ या न रहूँ “हंस” चलेगा ही। यह मेरा स्मारक होगा।”
मेरा गला भर आया। हृदय थर्रा गया। मैंने जमानत के रुपये जमा करवा दिए।
आपने समझा शायद धुन्नू, (अमृत राय घरेलू नाम) जमानत न करा पाए। दयानारायण जी निगम को तार दिया। वे आये। पहले बड़ी देर तक उन्हें पकड़ कर वे (प्रेमचंद) रोते रहे। वे भी रोते थे, मैं भी रोती थी, और मुंशी जी भी रोते थे। मुंशी जी ने कई बार रोकने की चेष्टा की पर आप बोले, ‘भाई शायद अब भेंट न हो।अब तुमसे सब बातें कह देना चाहता हूँ। तुमको बुलवाया है, हंस की जमानत करवा दो।”
(प्रेमचंद घर में – शिवरानी देवी, पृष्ठ-७०)
उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि प्रेमचंद के लिए ‘मुंशी’ शब्द का प्रयोग सम्मान सूचक के अर्थ में कदापि नहीं हुआ है और न ही उनके जीवन काल में उनके नाम के साथ लगाया जाता था। तो फिर यह ‘मुंशी’ शब्द कब से प्रेमचंद का सान्निध्य पा गया और किस लिए? प्रेमचंद के नाम, जो प्रकाशकों ने उनकी कृतियों पर छापे हैं उनमें क्रमश: ‘श्री प्रेमचंद जी’ (मानसरोवर प्रथम भाग), ‘श्रीयुत प्रेमचंद (सप्त सरोज), ‘उपन्यास सम्राट प्रेमचंद धनपतराय (शिलालेख), प्रेमचंद (रंगभूमि), श्रीमान प्रेमचंद जी (निर्मला)आदि कृतियों पर कहीं भी ‘मुंशी’ का प्रयोग नहीं हुआ है। जब कि श्री, श्रीयुत, उपन्यास सम्राट आदि विशेषणों का प्रयोग हुआ है। यदि प्रेमचंद के नाम के साथ ‘मुंशी” विशेषण का प्रचलन उस समय हो रहा होता तो कहीं न कहीं अवश्य प्रयुक्त होता। मगर मुंशी शब्द का प्रयोग प्रेमचंद जी के साथ कहीं नहीं हुआ है। प्रेमचंद के नाम के साथ मुंशी विशेषण जुड़ने का एकमात्र कारण यही है कि ‘हंस’ नामक पत्र प्रेमचंद एवं ‘कन्हैयालाल मुंशी’ के सह संपादन मे निकलता था। जिसकी कुछ प्रतियों पर ‘कन्हैयालाल मुंशी’ का पूरा नाम न छपकर मात्र ‘मुंशी’ छपा रहता था साथ ही प्रेमचंद का नाम इस प्रकार छपा होता था। (हंस की प्रतियों पर देखा जा सकता है)।
संपादक -मुंशी, प्रेमचंद
‘हंस के संपादक प्रेमचंद तथा कन्हैयालाल मुंशी थे। परन्तु कालांतर में पाठकों ने ‘मुंशी’ तथा ‘प्रेमचंद’ को एक समझ लिया और ‘प्रेमचंद’- ‘मुंशी प्रेमचंद’ बन गए।
यह स्वाभाविक भी है। सामान्य पाठक प्राय: लेखक की कृतियों को पढ़ता है, नाम की सूक्ष्मता को नहीं देखा करता। उसे ‘प्रेमचंद’ और ‘मुंशी’ के पचड़े में पड़ने की क्या आवश्यकता थी। फिर कुछ संयोग ऐसा बना कि भ्रम का पक्ष सबल हो गया, वह ऐसे कि एक तो प्रेमचंद कायस्थ थे, दूसरे अध्यापक भी रहे। कायस्थों और अध्यापकों के लिए ‘मुंशी’ लगाने की परम्परा भी रही है। यह सब मिला कर जन सामान्य में वे ‘मुंशी प्रेमचंद’ के नाम से जाने जाने लगे। धीरे-धीरे मुंशी शब्द प्रेमचंद के साथ अच्छी तरह जुड़ गया। आज प्रेमचंद का मुंशी अलंकरण इतना रूढ़ हो गया है कि मात्र मुंशी से ही प्रेमचंद का बोध हो जाता है तथा ‘मुंशी’ न कहने से प्रेमचंद का नाम अधूरा-अधूरा सा लगता है।

सोफ़िया तोल्स्ताया: वो औरत जिसने तोल्स्तॉय की प्रतिभा को सहा, सँवारा और सँभाला

इतिहास ने लियो तोल्स्तॉय को याद रखा है।
लेकिन उस आदमी के पीछे, जिसने ‘वॉर एंड पीस’ और ‘अन्ना कारेनिना’ जैसी अमर रचनाएँ लिखीं, एक औरत खड़ी थी — जिसकी बात अक्सर सिर्फ एक फुटनोट बनकर रह जाती है।
सोफ़िया तोल्स्ताया सिर्फ तोल्स्तॉय की पत्नी नहीं थीं।
वो उनकी संपादक थीं, उनकी प्रबंधक थीं, उनकी टाइपिस्ट, उनकी कॉपी करने वाली, उनकी प्रकाशक — और उनके 13 बच्चों की माँ। वो उस भावनात्मक तूफ़ान को झेलने वाली थीं, जो एक बेहद प्रतिभाशाली लेकिन बेचैन आत्मा के भीतर लगातार मचलता रहता था।
जब तोल्स्तॉय ने उन्हें ‘वॉर एंड पीस’ की पांडुलिपि थमाई, तो वह कोई साफ-सुथरा ड्राफ्ट नहीं था — वो तो बिखरे हुए पन्नों का एक पहाड़ था, जीनियस की उलझी हुई परतें।
सोफ़िया हर रात जाग-जाग कर उसे हाथ से साफ़-साफ़ सात बार कॉपी करती रहीं — उनके रेखाचित्रों को पढ़तीं, उनकी उलझी सोच को क्रम में लातीं, और जो कोई और नहीं कर सकता था वो करतीं — उनकी प्रतिभा को पढ़ने लायक बनातीं।
पर कहानी यहीं खत्म नहीं होती।
सोफ़िया ने प्रकाशकों से बात की, उनके लेखन की रक्षा की, उनकी अनुपस्थिति में भी उनके काम को जीवित रखा — जबकि तोल्स्तॉय कभी आध्यात्मिक संकट में खो जाते, कभी वैराग्य के भ्रम में।
लेकिन सोफ़िया सिर्फ एक ‘सहायक’ नहीं थीं।
उनका खुद का मन था, खुद की कलम थी, खुद का दुःख।
वो खुद भी लेखिका थीं — संवेदनशील, गहरी और ईमानदार।
उनकी डायरी में जो दर्द है, जो स्पष्टता है, वो एक ऐसी औरत की झलक देती है जो प्रेम, थकान, गुस्से और समर्पण के बीच हर दिन संघर्ष कर रही थी।
वो तोल्स्तॉय से बेहद प्यार करती थीं।
पर उस प्यार की कीमत बहुत भारी थी।
तोल्स्तॉय ने गरीबी को गले लगाया — सोफ़िया ने जायदाद चलाई।
वो आत्मिक शुद्धता की तलाश में थे — वो बच्चों को पाल रही थीं।
वो कह रहे थे कि मोह छोड़ दो — और वो उनके जीवन का बोझ उठा रही थीं।
और फिर भी वो रहीं।
जब तोल्स्तॉय ने अपने अंतिम वर्षों में उन्हें खुद से दूर कर दिया, तब भी।
जब वो आध्यात्मिक विचारों में डूबकर रिश्तों को भुला बैठे, तब भी।
वो रहीं — घर के लिए, बच्चों के लिए, उनकी विरासत के लिए… और उनके लिए भी।
जब तोल्स्तॉय की मौत एक ठंडे रेलवे स्टेशन पर हुई, तो वो वहाँ पहुँचीं — लेकिन देर से।
उन्हें कमरे में घुसने तक नहीं दिया गया।
वो दृश्य हृदय विदारक है — वो औरत, जिसने उन्हें सब कुछ दिया, दरवाज़े के बाहर खड़ी रही, जबकि उनके जीवन का अंत हो गया।
लेकिन शायद असली त्रासदी ये नहीं है।
असली त्रासदी ये है कि दशकों तक हमने इस महिला को भी उनके जीवन की कहानी से बाहर ही रखा।
सोफ़िया सिर्फ एक महान लेखक की पत्नी नहीं थीं — वो खुद भी उस महानता का हिस्सा थीं।
वो उस जीनियस के पीछे का स्थिर हाथ थीं।
वो एक ऐसी सहलेखिका थीं, जिनका नाम कभी किताब के कवर पर नहीं आया।
तोल्स्तॉय को याद करना अगर जरूरी है,
तो सोफ़िया को याद करना उससे भी जरूरी है।
क्योंकि जब तोल्स्तॉय इतिहास लिख रहे थे —
सोफ़िया वो ज़मीन थी, जिस पर वो इतिहास उग सका।
ये भी एक तरह की प्रतिभा है —
शांत, छुपी हुई, लेकिन गहराई में डूबी हुई… और बिल्कुल वैसी ही असाधारण।
(साभार – कसम रंगदार की फेसबुक पोस्ट)

जब आशा भोसले से नाराज हुए किशोर कुमार

आशा भोंसले ने किशोर दा के साथ जाने कितने ही गीत गाए हैं। यूं तो किशोर दा संग आशा जी की बढ़िया ट्यूनिंग थी। लेकिन एक दफा एक वाक्या ऐसा हुआ था जब कुछ देर के लिए किशोर दा आशा भोंसले से नाराज़ हो गए थे। हुआ कुछ यूं था कि किशोर दा के साथ आशा जी एक सॉन्ग रिकॉर्ड कर रही थी। आशा जी को लगा कि किशोर दा ने सही से नहीं गाया है।
उन्होंने किशोर दा से कह दिया कि आपको दोबारा से रिकॉर्डिंग करनी चाहिए क्योंकि आपने बेसुरा गाया है। किशोर दा को ये बात बुरी लगी। उन्होंने आशा जी से कहा कि तुम बहुत बोलती हो। और फिर किशोर दा म्यूज़िक डायरेक्टर पंचम दा के पास जाकर बोले कि अब वो आशा के साथ रिकॉर्डिंग नहीं करेंगे। पंचम दा ने किसी तरह किशोर दा को उस गाने की रिकॉर्डिंग कंप्लीट करने के लिए मना लिया।
फिर स्टूडियो में जब सॉन्ग रिहर्सल शुरू हुई तो किशोर दा और आशा जी के बीच में बिल्कुल भी बात नहीं हुई। लेकिन जब गाने की फाइनल टेक रिकॉर्ड किया जाना शुरु हुआ और किशोर दा ने अपना वर्स गाया तो उन्हें अहसास हो गया कि वो बेसुरा गा रहे हैं। किशोर दा ने आशा जी की तरफ देखा। आशा जी उस वक्त गुस्से में थी और दूसरी तरफ देख रही थी।
और चूंकि किशोर कुमार आशा भोंसले को छोटी बहन मानते थे तो उन्होंने डांटते हुए आशा जी से कहा, वहां क्या देख रही है। मुझे बता कि मैं खराब गा रहा हूं। आशा जी उनसे बोली, मैं खराब बताऊं तो आप चिढ़ जाते हो। ना बताऊं तो डांटते हो। किशोर दा प्यार से बोले, कोई बात नहीं आशा। मैं ऐसा ही हूं पागल सा। और फिर फाइनली वो सॉन्ग रिकॉर्ड हो ही गया। आज आशा भोंसले जी का जन्मदिन है। आज ही के दिन यानि 8 सितंबर को सन 1933 में आशा भोँसले जी का जन्म हुआ था।

भारतीय चिकित्सा शास्त्र व शल्य चिकित्सा के जनक ऋषि सुश्रुत

ऋषि सुश्रुत भारतीय चिकित्सा शास्त्र और शल्य चिकित्सा के जनक माने जाते हैं। वे विश्व के पहले ऐसे चिकित्सक थे जिन्होंने विज्ञान, औषधि और सर्जरी को शास्त्रीय रूप में प्रस्तुत किया। उनका ग्रंथ “सुश्रुत संहिता” आज भी आयुर्वेद और चिकित्सा के क्षेत्र में एक महान ग्रंथ माना जाता है। नीचे आपको ऋषि सुश्रुत की सम्पूर्ण ऐतिहासिक जानकारी, शोध, योगदान, ग्रंथ, और आधुनिक मान्यता दी गई है।
ऋषि सुश्रुत का इतिहास
समयकाल: ऋषि सुश्रुत का काल लगभग 700 ईसा पूर्व या उससे भी पहले माना जाता है। कुछ विद्वान उन्हें वेदकालीन मानते हैं, जबकि कई आधुनिक विद्वान उन्हें तक्षशिला विश्वविद्यालय से जोड़ते हैं, जहाँ वे चिकित्सा पढ़ाते थे।
वंश/गुरु: ऋषि सुश्रुत को दिवोदास धन्वंतरि का शिष्य माना जाता है, जो स्वयं भगवान धन्वंतरि (आयुर्वेद के देवता) के अवतार माने जाते हैं। वे काशी (वाराणसी) के निवासी बताए जाते हैं, जो उस समय चिकित्सा का बड़ा केंद्र था।
सुश्रुत संहिता – ग्रंथ का विवरण
“सुश्रुत संहिता” आयुर्वेद का एक प्रमुख ग्रंथ है। यह विशेष रूप से शल्य (surgery) और काय चिकित्सा (general medicine) पर केंद्रित है।
ग्रंथ की प्रमुख विशेषताएँ:
1. 120 अध्यायों में विभाजित
2. 1120 रोगों का वर्णन
3. 700 से अधिक औषधियों का उपयोग
4. 300 से अधिक शल्य क्रियाएं
5. 125 से अधिक शल्य उपकरण (Surgical Instruments)
6. सर्जरी के सिद्धांत, जैसे:
Rhinoplasty (नाक की प्लास्टिक सर्जरी)
Cataract surgery
Bone setting (हड्डियों की सर्जरी)
Wound healing (घाव भरने के उपाय)
शोध व आधुनिक मान्यता
वैश्विक स्तर पर योगदान:
सुश्रुत को विश्व चिकित्सा इतिहास में “Father of Surgery” कहा गया है।
पश्चिमी चिकित्सा विश्वविद्यालयों में आज भी उनकी “Sushruta Samhita” का अध्ययन किया जाता है।
British Journal of Surgery और WHO ने भी सुश्रुत के योगदान को मान्यता दी है।
प्लास्टिक सर्जरी की शुरुआत: सुश्रुत द्वारा वर्णित नाक की सर्जरी (Rhinoplasty) आज की आधुनिक प्लास्टिक सर्जरी की नींव मानी जाती है। यूरोप में प्लास्टिक सर्जरी की विधियाँ 18वीं सदी में विकसित हुईं, लेकिन भारत में यह सुश्रुत के समय में ही प्रचलित थी।
चिकित्सा प्रणाली
कैडावर (मृत शरीर) पर अभ्यास:
सुश्रुत अपने शिष्यों को मृत शरीर पर अभ्यास कराते थे।
यह आधुनिक “Dissection” (शव विच्छेदन) प्रक्रिया का प्रारंभिक रूप था।
शल्य उपकरणों का उपयोग: वे चाकू, कैंची, अग्निकर्म (cauterization), सूत (सिलाई) आदि औजारों का विस्तृत वर्णन करते हैं।
 स्वच्छता और रोग निवारण: सुश्रुत ने संक्रमण से बचने, स्वच्छता रखने, और औषधियों की शुद्धता पर जोर दिया।
यह आधुनिक “Aseptic Surgery” का प्रारंभिक रूप है।
सुश्रुत की प्रमुख शिक्षाएँ
क्षेत्र योगदान / ज्ञान
आयुर्वेद कायचिकित्सा, औषधीय वनस्पति
सर्जरी Rhinoplasty, शल्य उपकरण, शव विच्छेदन
प्रसूति विज्ञान गर्भावस्था, शिशु जन्म
त्वचा रोग कुष्ठ रोग, चर्म रोग
नेत्र रोग मोतियाबिंद सर्जरी का वर्णन
आधुनिक शोध और प्रमाण
1. UNESCO और WHO जैसे संस्थानों ने सुश्रुत संहिता को एक ऐतिहासिक चिकित्सा ग्रंथ माना है।
2. आधुनिक चिकित्सा शोधकर्ताओं ने उनकी विधियों की वैज्ञानिकता को स्वीकार किया है।
3. Surgery in Ancient India नामक कई शोधपत्रों में सुश्रुत के काम की तुलना आधुनिक सर्जरी से की गई है।
ऋषि सुश्रुत केवल एक आयुर्वेदाचार्य नहीं बल्कि विश्व के पहले वैज्ञानिक सर्जन थे। उनके द्वारा रचित “सुश्रुत संहिता” चिकित्सा का अद्वितीय ग्रंथ है जो आज भी प्रासंगिक है। उनकी सोच, पद्धति और सिद्धांत आज के चिकित्सा विज्ञान की नींव हैं।

दावा : वास्को डी गामा ने नहीं की भारत की खोज

भारतवर्ष को अंग्रेजों ने नहीं खोजा था, यह सनातन है और इसके साक्ष्य भी हैं। इतिहास हमेशा विजित द्वारा लिखा जाता है और वह इतिहास नहीं विजित की गाथा होती है। भारत के साथ भी यही हुआ है पहले इस्लामिक आक्रमण और ८०० वर्षों शासन और फिर अंग्रेज़ो के २०० वर्ष तक के शासन ने इस देश के इतिहास लेखन को इस तरह से प्रभावित किया कि आज भी लोगों को यही लगता है कि India को ब्रिटिश ने बनाया। लोगों के मन में यह हीन भावना बैठी हुई है कि ब्रिटिश के आने से पहले भारत या India था ही नहीं। हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान अभिनेता और अपने आप को ‘History_Buff’ कहने वाले सैफ अली खान ने ये कह दिया कि मुझे नहीं लगता है India जैसा कोई कान्सैप्ट ब्रिटिश के आने से पहले था के नहीं। यह कोई हैरानी की बात नहीं है। पिछले ७० वर्षों में जिस तरह से इतिहास को उसी इस्लामिक और ब्रिटिश को केंद्र में रख कर पढ़ाया गया है ये उसी का परिणाम है। ब्रिटिश काल के इतिहासकारों ने अपने हिसाब से ही इतिहास लिखा जैसा एक विजित लिखता है यानि अपने ही गुणगान में। उनके द्वारा किताबों में यह जानबूझकर लिखा गया जिससे पढ़ने वालों को यह लगे कि उनके आने से पहले भारत नाम का कोई देश ही नहीं था और जो भी बनाया गया वह सिर्फ और सिर्फ ब्रिटिशर्स की देन है। उनके बाद हमारे देश के चाटुकार इतिहासकारों ने भी उसी को आधार बनाकर उनका गुणगान किया। इस वजह से आज हमारे देश में जो भी इतिहास पढ़ाया जाता है उसे पढ़ कर यही भावना आती है कि ब्रिटिश के आने से पहले भारत या India था ही नहीं।
●भारत कोई ७० वर्ष पुराना देश नहीं है। यह हजारों वर्षों पुरानी एक सभ्यता है जिसकी पहचान भौगोलिक अवस्थिति से होती है। भारत के रहने वाले इतने पुराने है कि इसे सनातन यानि जो सदा से यानि अविरल समय से चला आ रहा है।
विष्णु पुराण में स्पष्ट लिखा है:
“उत्तरं यत समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणं।
वर्ष तद भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः।।”
●इसका अर्थ यह है कि “समुद्र के उत्तर से ले कर हिमालय के दक्षिण में जो देश है वही भारत है और यहाँ के लोग भारतीय हैं”
●सबसे पहले बात करते हैं पृथ्वी के भूगोल यानि ज्योग्राफी की। आज हमे वर्तमान की ज्योग्राफी में यह पढ़ाया जाता है कि पैंजिया पृथ्वी का पहला महाद्वीप या यूं कहे सुपर महाद्वीप था। अन्य सभी नवीन महाद्वीप (एशिया, अफ्रीका, उत्तरी अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका, यूरोप, अंटार्कटिका एवं ऑस्ट्रेलिया) का जन्मदाता भी यही महाद्वीप है। टेकटोनिक प्लेट्स के movement के कारण पैंजिया महाद्वीप में खंडन हुआ और यह टूटकर इन ७ महाद्वीपों में बंट गया।
●गोंडवाना पैंजिया के दक्षिणी भाग को कहते हैं। गोंडवाना भूमि में प्रायद्वीप भारत, दक्षिणी अमेरिका, दक्षिणी अफ्रीका और अंटार्कटिका समाहित है। अंगारा पैंजिया के उत्तरी भाग को कहते हैं। अंगारा भूमि में एशिया (प्रायद्वीपीय भारत को छोड़कर), उत्तरी अमेरिका एवं यूरोप समाहित है।
●अब देखते है कि हमारे वेद-पुराणों में क्या लिखा है।
●मत्स्यमहापुराण में सभी सात प्रधान महाद्वीपों के बारे में बताया गया है। सात द्वीपों में जम्बूद्वीप, प्लक्षद्वीप,शाल्मलद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंच द्वीप, शाकद्वीप तथा पुष्करद्वीप का वर्णन है। जम्बूद्वीप का विस्तार से भौगोलिक वर्णन है। आज जिसे एशिया कहा जाता है वही जम्बूद्वीप के नाम से जाना जाता था।
●जम्बूद्वीप को बाहर से लाख योजन वाले खारे पानी के वलयाकार समुद्र ने चारों ओर से घेरा हुआ है। जम्बू द्वीप का विस्तार एक लाख योजन है। जम्बू (जामुन) नामक वृक्ष की इस द्वीप पर अधिकता के कारण इस द्वीप का नाम जम्बू द्वीप रखा गया था।
“जम्बूद्वीप: समस्तानामेतेषां मध्य संस्थित:,
भारतं प्रथमं वर्षं तत: किंपुरुषं स्मृतम्‌,
हरिवर्षं तथैवान्यन्‌मेरोर्दक्षिणतो द्विज।
रम्यकं चोत्तरं वर्षं तस्यैवानुहिरण्यम्‌,
उत्तरा: कुरवश्चैव यथा वै भारतं तथा।
नव साहस्त्रमेकैकमेतेषां द्विजसत्तम्‌,
इलावृतं च तन्मध्ये सौवर्णो मेरुरुच्छित:।
भद्राश्चं पूर्वतो मेरो: केतुमालं च पश्चिमे।
एकादश शतायामा: पादपागिरिकेतव: जंबूद्वीपस्य सांजबूर्नाम हेतुर्महामुने।”
(विष्णु पुराण)
●भारतवर्ष का अर्थ है राजा भरत का क्षेत्र और इन्ही राजा भरत के पुत्र का नाम सुमति था ! इस विषय में वायु पुराण कहता है—
“सप्तद्वीपपरिक्रान्तं जम्बूदीपं निबोधत।
अग्नीध्रं ज्येष्ठदायादं कन्यापुत्रं महाबलम।।
प्रियव्रतोअभ्यषिञ्चतं जम्बूद्वीपेश्वरंनृपम्।।
तस्य पुत्रा बभूवुर्हि प्रजापतिसमौजस:।
ज्येष्ठो नाभिरिति ख्यातस्तस्य किम्पुरूषोअनुज:।।
नाभेर्हि सर्गं वक्ष्यामि हिमाह्व तन्निबोधत।”
●ऋग्वेद में आर्यों के निवास स्थान को ‘सप्तसिंधु’ प्रदेश कहा गया है। ऋग्वेद के नदी सूक्त (१०.७५) में आर्य निवास में प्रवाहित होने वाली नदियों का वर्णन मिलता है, जो मुख्य हैं:- कुभा (काबुल नदी), क्रुगु (कुर्रम), गोमती (गोमल), सिंधु, परुष्णी (रावी), शुतुद्री (सतलज), वितस्ता (झेलम), सरस्वती, यमुना तथा गंगा। उक्त संपूर्ण नदियों के आसपास और इसके विस्तार क्षेत्र तक आर्य रहते थे। इसके अलावा महाभारत में पृथ्वी का वर्णन आता है।
“सुदर्शनं प्रवक्ष्यामि द्वीपं तु कुरुनन्दन।
परिमण्डलो महाराज द्वीपोऽसौ चक्रसंस्थितः॥
यथा हि पुरुषः पश्येदादर्शे मुखमात्मनः।
एवं सुदर्शनद्वीपो दृश्यते चन्द्रमण्डले॥
द्विरंशे पिप्पलस्तत्र द्विरंशे च शशो महान्।।”
(वेदव्यास, भीष्म पर्व, महाभारत)
●हिन्दी अर्थ : हे कुरुनन्दन! सुदर्शन नामक यह द्वीप चक्र की भांति गोलाकार स्थित है, जैसे पुरुष दर्पण में अपना मुख देखता है, उसी प्रकार यह द्वीप चन्द्रमण्डल में दिखाई देता है। इसके दो अंशों में पिप्पल और दो अंशों में महान शश (खरगोश) दिखाई देता है।
●अर्थात : दो अंशों में पिप्पल का अर्थ पीपल के दो पत्तों और दो अंशों में शश अर्थात खरगोश की आकृति के समान दिखाई देता है। आप कागज पर पीपल के दो पत्तों और दो खरगोश की आकृति बनाइए और फिर उसे उल्टा करके देखिए, आपको धरती का मानचित्र दिखाई देखा।
●ब्रह्म पुराण, अध्याय १८ में जम्बूद्वीप के महान होने का प्रतिपादन है-
“तपस्तप्यन्ति यताये जुह्वते चात्र याज्विन।।
दानाभि चात्र दीयन्ते परलोकार्थ मादरात्॥ २१॥
पुरुषैयज्ञ पुरुषो जम्बूद्वीपे सदेज्यते।।
यज्ञोर्यज्ञमयोविष्णु रम्य द्वीपेसु चान्यथा॥ २२॥
अत्रापि भारतश्रेष्ठ जम्बूद्वीपे महामुने।।
यतो कर्म भूरेषा यधाऽन्या भोग भूमयः॥२३॥”
●अर्थात भारत भूमि में लोग तपश्चर्या करते हैं, यज्ञ करने वाले हवन करते हैं तथा परलोक के लिए आदरपूर्वक दान भी देते हैं। जम्बूद्वीप में सत्पुरुषों के द्वारा यज्ञ भगवान् का यजन हुआ करता है। यज्ञों के कारण यज्ञ पुरुष भगवान् जम्बूद्वीप में ही निवास करते हैं। इस जम्बूद्वीप में भारतवर्ष श्रेष्ठ है। यज्ञों की प्रधानता के कारण इसे (भारत को) को कर्मभूमि तथा और अन्य द्वीपों को भोग- भूमि कहते हैं।
●इसी तरह अगर शक्तिपीठों का भौगोलिक स्थिति देखे तो वे बलूचिस्तान से लेकर त्रिपुरा, कश्मीर से कन्याकुमारी / जाफना तक फैले हुए हैं। यह एक बनावटी स्थिति नहीं है।
●इतना ही नहीं जब हम अपने घरों में पुजा अर्चना के दौरान संकल्प लेते है तो उस दौरान प्रयोग में लाया जाने वाला मंत्र भी यही कहता है, जम्बू द्वीपे भारतखंडे आर्याव्रत देशांतर्गते। इस पंक्ति में मनुष्य के रहने के स्थान तथा उसके बारे में जानकारी दी जाती है जो पूजा करा रहा है।
√●इससे स्पष्ट होता है कि भारत भूमि ७० वर्ष पहले नहीं बल्कि हजारों वर्ष पुरानी है। अंग्रेजों ने १९४७ में इसी भूमि को ३ टुकड़ों में बाँट दिया था जिससे सभी को यह लगता है कि अंग्रेजों ने भारत को बनाया। आधिकारिक तौर भारत का नाम “भारत गणराज्य” या “रिपब्लिक ऑफ इंडिया” के नाम से जाना जाता है। संविधान के अनुच्छेद १(१) में स्पष्ट लिखा है कि India, that is Bharat, shall be a Union of States. यह एक मात्र ऐसा अनुच्छेद है जो भारत के नाम के बारे में उल्लेख करता है। इसी तरह १३ वीं शताब्दी के बाद, “हिंदुस्तान” शब्द का प्रयोग भारत के लिए एक लोकप्रिय वैकल्पिक नाम के रूप में किया जाने लगा, जिसका अर्थ है “हिंदुओं की भूमि”। लेकिन जितने भी आक्रमणकारी भारत आए सभी एक अलग संस्कृति से थे इसलिए उन्होंने हमारी सनातन संस्कृति को “हिन्दू धर्म” कहने लगे। तब से इस सनातन धर्म को हिन्दू धर्म के रूप में प्रचारित किया जाने लगा। वास्तविकता देखें तो पता चलता है कि जो भी सिंधु नदी के पार रहते हैं वे सभी हिन्दू हैं और ये कोई संप्रदाय नहीं है। अंगेज़ों ने जो लिखा वही लगातार पढ़ाये जाने आए यह बात भारत के लोगों के मन में कि भारत को अंग्रेजों ने बानया है। अब लोगों को इन कपोलकल्पित इतिहास से ऊपर उठ कर वास्तविकता को जानना चाहिए और अपने महान मातृभूमि पे गर्व करना चाहिए।
●शास्त्रीय विद्वान आदरणीय अरुण उपाध्याय जी द्वारा की गई टिप्पणी से विषय वस्तु स्पष्ट हो जाती है, उनकी टिप्पणी के माध्यम से प्राप्त जानकारी निम्नानुसार प्रस्तुत है:
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●आकाश में सृष्टि के ५ पर्व हैं-१०० अरब ब्रह्माण्डों का स्वयम्भू मण्डल, १०० अरब तारों का हमारा ब्रह्माण्ड, सौरमण्डल, चन्द्रमण्डल (चन्द्रकक्षा का गोल) तथा पृथ्वी। किन्तु लोक ७ हैं-भू (पृथ्वी), भुवः (नेपचून तक के ग्रह) स्वः (सौरमण्डल १५७ कोटि व्यास, अर्थात् पृथ्वी व्यास को ३० बार २ गुणा करने पर), महः (आकाशगंगा की सर्पिल भुजा में सूर्य के चतुर्दिक् भुजा की मोटाई के बराबर गोला जिसके १००० तारों को शेषनाग का १००० सिर कहते हैं), जनः (ब्रह्माण्ड), तपः लोक (दृश्य जगत्) तथा अनन्त सत्य लोक।
●इसी के अनुरूप पृथ्वी पर भी ७ तल तथा ७ लोक हैं। उत्तरी गोलार्द्ध का नक्शा (नक्षत्र देख कर बनता है, अतः नक्शा) ४ भागों में बनता था। इसके ४ रंगों को मेरु के ४ पार्श्वों का रंग कहा गया है। ९०°-९०° अंश देशान्तर के विषुव वृत्त से ध्रुव तक के ४ खण्डों में मुख्य है भारत, पश्चिम में केतुमाल, पूर्व में भद्राश्व, तथा विपरीत दिशा में उत्तर कुरु। इनको पुराणों में भूपद्म के ४ पटल कहा गया है।
●ब्रह्मा के काल (२९१०२ ई.पू.) में इनके ४ नगर परस्पर ९०° अंश देशान्तर दूरी पर थे-पूर्व भारत में इन्द्र की अमरावती, पश्चिम में यम की संयमनी (यमन, अम्मान, सना), पूर्व में वरुण की सुखा तथा विपरीत में चन्द्र की विभावरी। वैवस्वत मनु काल के सन्दर्भ नगर थे, शून्य अंश पर लंका (लंका नष्ट होने पर उसी देशान्तर रेखा पर उज्जैन), पश्चिम में रोमकपत्तन, पूर्व में यमकोटिपत्तन तथा विपरीत दिशा में सिद्धपुर।
●दक्षिणी गोलार्द्ध में भी इन खण्डों के ठीक दक्षिण ४ भाग थे। अतः पृथ्वी अष्ट-दल कमल थी, अर्थात् ८ समतल नक्शे में पूरी पृथ्वी का मानचित्र होता था। गोल पृथ्वी का समतल नक्शा बनाने पर ध्रुव दिशा में आकार बढ़ता जाता है और ठीक ध्रुव पर अनन्त हो जायेगा। उत्तरी ध्रुव जल भाग में है (आर्यभट आदि) अतः वहां कोई समस्या नहीं है। पर दक्षिणी ध्रुव में २ भूखण्ड हैं-जोड़ा होने के कारण इसे यमल या यम भूमि भी कहते हैं और यम को दक्षिण दिशा का स्वामी कहा गया है। इसका ८ भाग के नक्शे में अनन्त आकार हो जायेगा अतः इसे अनन्त द्वीप (अण्टार्कटिका) कहते थे। ८ नक्शों से बचे भाग के कारण यह शेष है।
●विष्णु पुराण (२/८)-
“मानसोत्तर शैलस्य पूर्वतो वासवी पुरी।
दक्षिणे तु यमस्यान्या प्रतीच्यां वारुणस्य च। उत्तरेण च सोमस्य तासां नामानि मे शृणु॥८॥
वस्वौकसारा शक्रस्य याम्या संयमनी तथा। पुरी सुखा जलेशस्य सोमस्य च विभावरी।९।
शक्रादीनां पुरे तिष्ठन्स्पृशत्येष पुर त्रयम्। विकोणौ द्वौ विकोणस्थस्त्रीन् कोणान् द्वे पुरे तथा।॥१६॥
उदितो वर्द्धमानाभिरामध्याह्नात्तपन् रविः। ततः परं ह्रसन्ती भिर्गोभिरस्तं नियच्छति॥१७॥
एवं पुष्कर मध्येन यदा याति दिवाकरः। त्रिंशद्भागं तु मेदिन्याः तदा मौहूर्तिकी गतिः।२६॥
सूर्यो द्वादशभिः शैघ्र्यान् मुहूर्तैर्दक्षिणायने। त्रयोदशार्द्धमृक्षाणामह्ना तु चरति द्विज।
मुहूर्तैस्तावद् ऋक्षाणि नक्तमष्टादशैश्चरन्॥३४॥’
●सूर्य सिद्धान्त (१२/३८-४२)-
“भू-वृत्त-पादे पूर्वस्यां यमकोटीति विश्रुता। भद्राश्व वर्षे नगरी स्वर्ण प्राकार तोरणा॥३८॥
याम्यायां भारते वर्षे लङ्का तद्वन् महापुरी। पश्चिमे केतुमालाख्ये रोमकाख्या प्रकीर्तिता॥३९॥
उदक् सिद्धपुरी नाम कुरुवर्षे प्रकीर्तिता (४०) भू-वृत्त-पाद विवरास्ताश्चान्योऽन्यं प्रतिष्ठिता (४१)
तासामुपरिगो याति विषुवस्थो दिवाकरः। नतासु विषुवच्छाया नाक्षस्योन्नतिरिष्यते॥४२॥”
●भारत भाग में आकाश के ७ लोकों की तरह ७ लोक थे। बाकी ७ खण्ड ७ तल थे-अतल, सुतल, वितल, तलातल, महातल, पाताल, रसातल। अतल = भारत के पश्चिम उत्तर गोल। तलातल = अतल के तल या दक्षिण में।
●सुतल = भारत के पूर्व, उत्तर में। वितल = सुतल के दक्षिण।
●पाताल = सुतल के पूर्व, भारत के विपरीत, उत्तर गोल। रसातल = पाताल के दक्षिण (उत्तर और दक्षिण अमेरिका मुख्यतः)
●महातल = भारत के दक्षिण, कुमारिका खण्ड समुद्र।
●विष्णु पुराण (२/५)-
“दशसाहस्रमेकैकं पातालं मुनिसत्तम।
अतलं वितलं चैव नितलं च गभस्तिमत्। महाख्यं सुतलं चाग्र्यं पातालं चापि सप्तमम्॥२॥
शुक्लकृष्णाख्याः पीताः शर्कराः शैल काञ्चनाः। भूमयो यत्र मैत्रेय वरप्रासादमण्डिताः॥३॥
पातालानामधश्चास्ते विष्णोर्या तामसी तनुः। शेषाख्या यद्गुणान्वक्तुं न शक्ता दैत्यदानवाः॥१३॥
योऽनन्तः पठ्यते सिद्धैर्देवो देवर्षि पूजितः। स सहस्रशिरा व्यक्तस्वस्तिकामलभूषणः॥१४॥
नीलवासा मदोत्सिक्तः श्वेतहारोपशोभितः। साभ्रगङ्गाप्रवाहोऽसौ कैलासाद्रिरिवापरः॥१७॥
कल्पान्ते यस्य वक्त्रेभ्यो विषानलशिखोज्ज्वलः। सङ्कर्षणात्मको रुद्रो निष्क्रामयात्ति जगत्त्रयम्॥१९॥
यस्यैषा सकला पृथ्वी फणामणिशिखारुणा। आस्ते कुसुममालेव कस्तद्वीर्यं वदिष्यति॥२२॥”
●ब्रह्माण्ड पुराण (१/२/२०)-
“परस्परैः सोपचिता भूमिश्चैव निबोधत॥९॥
स्थितिरेषा तु विख्याता सप्तमेऽस्मिन् रसातले। दशयोजन साहस्रमेकं भौमं रसातलम्॥१०॥
प्रथमः तत्वलं नाम सुतलं तु ततः परम्॥११॥
ततस्तलातलं विद्यादतलं बहुविस्तृतम्। ततोऽर्वाक् च तलं नाम परतश्च रसातलम्॥१२॥
एतेषमप्यधो भागे पातालं सप्तमं स्मृतम्।”
●भागवत पुराण (५/२४/७)-
“उपवर्णितं भूमेर्यथा संनिवेशावस्थानं अवनेरत्यधस्तात् सप्त भूविवरा एकैकशो योजनायुतान्तरेणायामं विस्तारेणोपक्लृप्ता-अतलं वितलं सुतलं तलातलं महातलं रसातलं पातालमिति॥७॥”
√●भागवत पुराण (५/२५)-
“अस्य मूलदेशे त्रिंशद् योजन सहस्रान्तर आस्ते या वै कला भगवतस्तामसी
समाख्यातानन्त इति सात्वतीया द्रष्टृ दृश्ययोःसङ्कर्षणमहमित्यभिमान लक्षणं यं सङ्कर्षणमित्याचक्ष्यते॥१॥
यस्येदं क्षितिमण्डलं भगवतोऽनन्तमूर्तेः सहस्रशिरस एकस्मिन्नेव शीर्षाणि ध्रियमाणं सिद्धार्थ इव लक्ष्यते॥२॥”
●वास्तविक भूखण्डों के हिसाब से ७ द्वीप थे-जम्बू (एसिया), शक (अंग द्वीप, आस्ट्रेलिया), कुश (उत्तर अफ्रीका), शाल्मलि (विषुव के दक्षिण अफ्रीका), प्लक्ष (यूरोप), क्रौञ्च (उत्तर अमेरिका), पुष्कर (दक्षिण अमेरिका)। इनके विभाजक ७ समुद्र हैं।
●यह ऐतिहासिक पौराणिक लेख तीन विद्वानों द्वारा प्राचीन वाग्मय के आधार पर लिखा गया है संशोधित किया गया है जो प्राचीन ऐतिहासिक संदर्भों को प्रदर्शित करता है
साभार अज्ञात…ॉ
(सोशल मीडिया से प्रो. अनिल खिगवान की पोस्ट)

बंधन बैंक का कुल कारोबार 11 प्रतिशत बढ़कर 2.88 लाख करोड़ रुपये हुआ

कोलकाता । बंधन बैंक ने वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही के अपने वित्तीय परिणाम घोषित कर दिए हैं। बैंक का कुल कारोबार 11% बढ़कर 2.88 लाख करोड़ रुपये हो गया है। बैंक की कुल जमा राशि में खुदरा जमा की हिस्सेदारी अब लगभग 68% हो गई है। पहली तिमाही में यह वृद्धि बैंक के विस्तारित वितरण नेटवर्क, बेहतर परिचालन दक्षता और अनुकूल व्यावसायिक वातावरण के कारण हुई है। वित्त वर्ष 2025-26 की पहली तिमाही में बैंक का शुद्ध लाभ 372 करोड़ रुपये रहा है। बैंक अब भारत के 36 में से 35 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 6,350 से अधिक बैंकिंग आउटलेट के माध्यम से 3.14 करोड़ से अधिक ग्राहकों को सेवा प्रदान करता है। बंधन बैंक में कार्यरत कर्मचारियों की कुल संख्या लगभग 72,000 है। वित्त वर्ष 2026 की पहली तिमाही के दौरान, बैंक ने अपनी जमा राशि में 16% की साल-दर-साल वृद्धि दर्ज की और कुल जमा राशि अब 1.55 लाख करोड़ रुपये हो गई है। इसी अवधि के लिए कुल अग्रिम 1.34 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गए हैं। कुल जमा राशि में चालू खाता और बचत खाता (सीएएसए)  का अनुपात 27.1% है। बैंक का पूंजी पर्याप्तता अनुपात (सीएआर), जो वित्तीय स्थिरता का एक प्रमुख संकेतक है, 19.4% पर मजबूत है, जो नियामक सीमा से काफी ऊपर है। बैंक के तिमाही वित्तीय प्रदर्शन पर बोलते हुए, एमडी और सीईओ पार्था प्रतिम सेनगुप्ता ने कहा, “बंधन बैंक ने वित्त वर्ष 26 की Q1 में पिछली तिमाही से क्रमिक रूप से बेहतर प्रदर्शन किया है, जो जमा राशि में मजबूत वृद्धि और खुदरा एवं थोक बैंकिंग में निरंतर गति द्वारा चिह्नित है। हालाँकि परिचालन परिवेश कुछ चुनौतियाँ प्रस्तुत करता है, हमारा प्रदर्शन हमारे व्यवसाय की अंतर्निहित समुत्थान शक्ति और हमारी रणनीतिक दिशा की मज़बूती को दर्शाता है। हम विवेकपूर्ण जोखिम प्रबंधन, परिचालन दक्षता और अपने ग्राहकों एवं हितधारकों के लिए दीर्घकालिक मूल्य प्रदान करने पर केंद्रित हैं।”