Saturday, June 20, 2026
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देश की पहली महिला जज थीं अन्ना चांडी, महिलाओं के अधिकारों के लिए उठाई आवाज

नयी दिल्ली : भारत की पहली महिला जज अन्ना चांडी केरल की रहने वाली थीं। अन्ना चांडी को महिलाओं के अधिकारों के लिए आवाज उठाने के लिए भी जाना जाता था। अन्ना चांडी का जन्म चार मई 1905 को केरल (उस समय का त्रावणकोर) के त्रिवेंद्रम के एक ईसाई परिवार में हुआ था। 91 साल की उम्र में उनका निधन हो गया था।

उन्होंने 1926 में कानून में स्नातकोत्तर की डिग्री ली। उस समय कानून की डिग्री लेने वालीं अन्ना अपने राज्य की पहली महिला थीं। इसके बाद उन्होंने बैरिस्टर के तौर पर अदालत में प्रैक्टिस शुरू की। 1937 में केरल के दीवान सर सीपी रामास्वामी अय्यर ने चांडी को मुंसिफ के तौर पर नियुक्त किया।
1959 में बनीं केरल हाईकोर्ट की जज
इसके बाद अन्ना भारत की पहली महिला जज बन गईं। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1948 में चांडी की पदोन्नति हुई और वो जिला जज बन गईं। भारत के किसी भी हाईकोर्ट की पहली महिला जज के तौर पर भी अन्ना चांडी का नाम आता है। 1959 में अन्ना को केरल हाई कोर्ट का जज नियुक्त किया गया।

महिलाओं के अधिकारों के लिए उठाई आवाज
अन्ना चांडी ने 1967 तक हाईकोर्ट के न्यायधीश के पद पर सेवाएं दीं। हाईकोर्ट से सेवानिवृत्ति के बाद चांडी को लॉ कमीशन ऑफ इंडिया में नियुक्त कर दिया गया। उन्हें महिलाओं के विभिन्न अधिकारों के लिए भी आवाज उठाई।

चांडी ने ‘श्रीमती’ नाम से एक पत्रिका भी निकाली जिसमें उन्होंने महिलाओं से जुड़े मुद्दों को जोर-शोर से उठाया। उन्होंने ‘आत्मकथा’ नाम से अपनी ऑटोबायोग्राफी भी लिखी थी। 1996 में केरल में 91 साल की उम्र में जस्टिस चांडी का निधन हो गया था।

‘श्री पुंडालिक’ थी भारत की पहली फीचर फिल्म, 108 साल पहले ऐसे किया गया था निर्देशन

भारतीय सिनेमा दुनिया के लोकप्रिय सिनेमा में से एक हैं। यह सिनेमा अलग-अलग भाषाओं में हर साल 2000 से ज्यादा फिल्में बनाता है। इनमें से कुछ फिल्मों को विदेशों में भी खूब प्यार मिलता है। भारतीय सिनेमा का इतिहास भी काफी पुराना रहा है। भारतीय सिनेमा को 100 साल से ज्यादा हो चुके हैं, लेकिन इसके कुछ तथ्यों को लेकर हमेशा से बहस होती रही है। 18 मई साल 1912 को भारत की पहली फीचर फिल्म ‘श्री पुंडालिक’ रिलीज हुई थी। आज हम आपको इस फीचर फिल्म के बारे में बताने जा रहे हैं जिसका नाम भी बहुत कम लोगों ने सुना होगा।

दो हफ्ते तक चली ये फिल्म
‘श्री पुंडालिक’ भारत की फीचर फिल्म के साथ पहली मूक फिल्म थी। यह एक मराठी फिल्म थी। इस फिल्म की कुल अवधि 22 मिनट थी। फिल्म ‘श्री पुंडालिक’ की शूटिंग बॉम्बे के मंगलदास वादी में हुई थी। जहां प्रोफेशनल थियेटर ग्रुप पुंडालिक नाटक का मंचन कर रहा था। इस फिल्म का निर्देशन दादासाहेब तोरने ने किया था। फिल्म ‘श्री पुंडालिक’ को 18 मई साल 1912 में मुंबई के कोरोनेशन सिनेमैटोग्राफ में रिलीज किया था। सिनेमाघर में यह फिल्म कुल दो हफ्ते तक चली थी।
भारत की पहली फिल्म पर विवाद
फिल्म ‘श्री पुंडालिक’ को भारत की पहली फीचर फिल्म कहे जाने को लेकर विवाद भी रहा है। दरअसल, इस फिल्म को शूट करने वाले कैमरामैन एक ब्रिटिश थे, जिनका नाम जॉन था। एक ब्रिटिश कैमरामैन के हाथों शूट होने की वजह से बहुत से लोग ‘श्री पुंडालिक’ को भारत की पहली फीचर फिल्म नहीं बल्कि दादासाहेब फाल्के द्वारा निर्देशित फिल्म ‘राजा हरीशचंद्र’ को मानते हैं।

फिल्म ‘राजा हरीशचंद्र’ दादासाहेब तोरने की ‘श्री पुंडालिक’ के रिलीज होने ठीक एक साल बाद 3 मई साल 1913 को आई थी। ऐसे में सिनेमा से जुड़े कई बुद्धिजीवियों के बीच इस बात को लेकर हमेशा से बहस रही है कि भारतीय सिनेमा के जन्मदाता कौन हैं ? कुछ लोग दादासाहेब तोरने तो कुछ दादासाहेब फाल्के को भारतीय सिनेमा का जन्मदाता मानते हैं।

भीख के पैसों से राशन और मास्क बांट रहा है दिव्यांग राजू

पठानकोट : दिव्यांग भिखारी राजू महामारी के दौरान भीख से जुटाए पैसे से जरूरतमंद लोगों को राशन बांट रहा है। राजू ने अब तक 100 से अधिक परिवारों को एक महीने का राशन दिया और राहगीरों में 2500 से अधिक मास्क बांट डाले। इसमें राजू ने 80 हजार से अधिक का खर्च कर दिया। यह पैसे उसने भीख मांग कर जुटाए थे। कभी रेंगते हुए तो कभी व्हीलचेयर पर भीख मांगने वाला राजू बचपन से ही चलने-फिरने में असमर्थ है। ऐसा नहीं कि राजू ने समाजसेवा का काम पहली बार किया। रोजाना एकत्रित हुए पैसों में अपनी जरूरत के अनुसार खर्च कर बाकी बचाता है और जरूरतमंदों की सेवा में खर्च करता है।
मैले-कुचैले कपड़ों में लोगों के घरों तक राशन पहुंचाने वाला राजू दिव्यांग ही नहीं स्वस्थ व्यक्ति के लिए भी प्रेरणा स्त्रोत है। वहीं, लोगों को पता है कि उनका पैसा भलाई के कामों में लगना है तो लोग राजू को खुले दिल से पैसे भी देते हैं।
महामारी के दौर में राजू ने 2500 मास्क खरीदे और अपनी व्हील चेयर पर बैठ रोजाना सड़कों पर निकलता है। राजू लोगों को मास्क देकर और साथ ही घर पर रहने और शारीरिक दूरी के लिए प्रेरित करता है।
राजू ने कहा कि लोग उसे बहुत पैसा देते हैं, वह पैसे जोड़ता है और मौका मिलते ही जरूरतमंदों पर खर्च कर देता हूं। राजू ने कहा कि जीते जी उसके अपनों ने उसे दूर रखा, कुछ नेकी कर लूंगा तो शायद आखिरी समय में लोगों के कंधे मिल सकें।
बच्चों की फीस, 22 गरीब कन्याओं की शादी कराई
राजू पिछले 20 साल में 22 गरीब कन्याओं की शादी करवा चुका है। गर्मियों में छबील, भंडारा करवाता है। ढांगू रोड पर एक गली की पुली पर रोजाना हो रहे हादसों से से तंग आकर राजू ने अपने पैसों से पुली का निर्माण करवाया। हर साल 15 अगस्त को महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए सिलाई मशीनें उपलब्ध कराता है। सर्दियों में कंबल बांटना, कुछ बच्चों की फीस का खर्च उठाता है। कॉपी-किताब के लिए मदद करता है। कहता है, यह सब मेरे अपने हैं। इनकी मदद कर मन को शांति मिलती है।

कोयला खनन में कोल इंडिया लिमिटेड का एकाधिकार समाप्त, जानिए कहानी

नयी दिल्ली : देश में कोरोना वायरस को रोकने के लिए लगाए गए लॉकडाउन के चलते देश की अर्थव्यवस्था को बहुत नुकसान पहुंच रहा है। ऐसे में अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 20 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज की घोषणा की है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण इस पैकेज की रोज जानकारी दे रही हैं। शनिवार को वित्त मंत्री ने कहा कि अब कोल इंडिया लिमिटेड की खदानें निजी सेक्टर को भी दी जाएंगी। जानिए अभी तक कोयला खनन के क्षेत्र में एकाधिकार रखने वाली कंपनी कोल इंडिया लिमिटेड के बारे में…
शनिवार को वित्त मंत्री ने इस पैकेज की चौथी किस्त पेश करते हुए एलान किया कि अब कोयला क्षेत्र में कमर्शियल माइनिंग होगी और सरकार का एकाधिकार खत्म होगा। कोयला उत्पादन क्षेत्र में आत्मनिर्भरता कैसे बने और कैसे कम से कम आयात करना पड़े, इसपर काम होगा।
वित्त मंत्री ने कहा कि इस फैसले से ज्यादा से ज्यादा खनन हो सकेगा और देश के उद्योगों को बल मिलेगा। 50 ऐसे नए ब्लॉक नीलामी के लिए उपलब्ध होंगे। पात्रता की बड़ी शर्तें नहीं रहेंगी। सरकार ने निवेश को बढ़ावा देने के लिए फास्ट-ट्रैक इन्वेस्टमेंट प्लान बनाया है।
1975 में हुई थी शुरुआत, आज दुनिया की सबसे बड़ी कोयला उत्पादक कंपनी
कोल इंडिया लिमिटेड नवंबर 1975 में अस्तित्व में आई थी। अपनी शुरुआत के साल में 79 मिलियन टन (एमटी) का मामूली उत्पादन करने वाली सीआईएल आज 83 खान क्षेत्रों में कार्य कर रही है और दुनिया में सबसे बड़ी कोयला उत्पादक कंपनी होने के साथ सबसे बड़े कॉर्पोरेट नियोक्ताओं में से एक है।
यह भारत सरकार के पूर्ण स्वामित्व वाली कंपनी है, जो कोयला मंत्रालय, भारत सरकार के अधीनस्थ है। कोल इंडिया लिमिटेड कोयला खनन और उत्पादन का कार्य करती है। इसका मुख्यालय कोलकाता, पश्चिम बंगाल में स्थित है। देश के आठ राज्यों में इसका कार्य होता है।
कार्यशालाएं, अस्पताल और प्रशिक्षण संस्थान भी संचालित करती है सीआईएल
कोल इंडिया लिमिटेड कार्यशालाओं, अस्पतालों आदि जैसे प्रतिष्ठानों का भी प्रबंधन करता है और 27 प्रशिक्षण संस्थानों और 76 व्यावसायिक प्रशिक्षण संस्थानों केंद्रों का संचालन करता है। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ कोल मैनेजमेंट (IICM) जो कि भारत का सबसे बड़ा कॉरपोरेट प्रशिक्षण संस्थान है, इसके तहत संचालित होता है।
महारत्न कंपनी कोल इंडिया लिमिटेड के प्रमुख उपभोक्ता बिजली और इस्पात क्षेत्र हैं। अन्य क्षेत्रों में सीमेंट, उर्वरक, ईंट भट्टे और विभिन्न लघु उद्योग शामिल हैं। सीआईएल तरह-तरह के अनुप्रयोगों के लिए विभिन्न ग्रेड के कोकिंग और गैर कोकिंग कोयले का उत्पादन करती है।
कोल इंडिया लिमिटेड की उत्पादक भारतीय सहायक कंपनियां
ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड
भारत कोकिंग कोल लिमिटेड
सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड
वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड
साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड
नॉर्दर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड
महानदी कोलफील्ड्स लिमिटेड
इसके अलावा कोल इंडिया लिमिटेड की एक खान योजना और परामर्श कंपनी ‘सेंट्रल माइन प्लानिंग एंड डिजाइन इंस्टिट्यूट लिमिटेड’ है। इसके अलावा, इसकी मोजांबिक में ‘कोल इंडिया अफ्रीकाना लिमिटाडा’ एक विदेशी सहायक कंपनी है। असम में स्थित खदानें यानी नॉर्थ ईस्टर्न कोलफील्ड्स का प्रबंधन सीधे सीआईएल द्वारा किया जाता है।

‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ को गति देगा काष्ठकला उद्योग, नक्काशी के लिए पूरे एशिया में है प्रसिद्ध

बिजनौर : अपनी कला से पूरे एशिया में बिजनौर को पहचान दिलाने वाला नगीना का काष्ठकला उद्योग अब आत्मनिर्भर भारत अभियान को भी गति देगा। काष्ठकला उद्योग के अंतर्गत पहली बार देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाई जाएंगी। इसके लिए दक्षिण भारत से कारीगरों को बुलाकर जिले के कारीगरों को प्रशिक्षण दिलाया जाएगा। बाजार में देवी-देवताओं की मेड इन चाइना नहीं बल्कि मेड इन इंडिया की मूर्तियां दिखाई देंगी। नगीना का काष्ठकला उद्योग लकड़ी पर की गई नक्काशी के लिए पूरे एशिया में प्रसिद्ध है। यहां पर बने लकड़ी के सिगार केस, घड़ी, माला, छड़ी, लकड़ी की टाइल्स व अन्य सजावट के आइटम की देश के अलावा बाहर भी बहुत डिमांड है। देश के साथ- साथ विदेशों के पांच सितारा होटलों में भी यहां के बने काष्ठकला आइटम में खाना सर्व किया जाता है। काष्ठकला उद्योग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आत्मनिर्भर भारत अभियान में सहभागी भी बनेगा।
हिंदुओं के घरों व दुकानों पर देवी-देवताओं की मूर्तियां न हों ऐसा नहीं हो सकता है। काष्ठकला उद्यमी चीन के इस बाजार पर कब्जा कर सकते हैं। लेकिन अब आत्मनिर्भर भारत अभियान से इसे और बल मिलेगा। दक्षिण भारत में लकड़ी से देवी देवताओं की मूर्तियां बनाई जाती हैं। नगीना में भी मशीनों से देवी देवताओं की मूर्तियां बन सकती हैं लेकिन हाथ से बनी मूर्तियां ज्यादा सुंदर होती हैं। दक्षिण भारत के कारीगरों को बुलाकर स्थानीय कारीगरों को प्रशिक्षण दिलाया जाएगा।
देवी-देवताओं की मूर्तियों का बाजार हर हिंदू घर, प्रतिष्ठान में है। विदेश से आने वाली मूर्तियों की तुलना में जिले में बनने वाली लकड़ी की मूर्ति सस्ती पड़ेगी। ये मूर्तियां शीशम, बबूल व आम की लकड़ी से बनाई जाएंगी। ‘एक जिला एक उत्पाद’ में शामिल काष्ठकला उद्योग की जिले में करीब 800 इकाइयां हैं। इनका सालाना टर्नओवर करीब 300 करोड़ रुपये है। काष्ठकला में बनने वाला 80 प्रतिशत से अधिक माल विदेशों को निर्यात होता है। जिलेवासी विदेशों के आइटम बड़े पैमाने पर घरों में सजाते हैं और अपने जिले के काष्ठकला आइटमों के बारे में ज्यादा नहीं जानते हैं।
बिना पैकिंग जाता है माल
जिले के काष्ठकला उद्योग की नक्काशी बेजोड़ है। भले ही इसका विदेशों में नाम है लेकिन यहां के कारीगर गुमनाम हैं। नगीना से जो माल निर्यात होता है उसकी पैकिंग तक नहीं होती है। निर्यातक उद्यमियों से बिना पैकिंग वाला माल ही खरीदते हैं और उस पर अपनी पैकिंग करके निर्यात करते हैं। काष्ठकला उद्यमी इरशाद मुल्तानी का कहना है कि काष्ठकला उद्योग देवी देवताओं की मूर्तियों के साथ- साथ फैंसी आइटम में विदेशी कंपनियों पर कहीं भारी है। इससे उद्यमियों को राहत मिलेगी तो वे भी अपने उत्पादों के दाम कम कर सकेंगे।

इंग्लैंड की  नदी में मिले 60 रहस्यमयी क्यूब्स, उभरे हुए हैं संस्कृत में लिखे शिलालेख

  लन्दन : इंग्लैंड के एक शहर में 60 रहस्यमयी क्यूब्स (घन) मिले हैं, जिनपर एक पवित्र संख्यात्मक शिलालेख उभरे हुए हैं। इंग्लैंड के कोवेंट्री शहर में एक मैग्नेट फिशिंग (नदियों में पड़ी चीजों को निकालने वाला) करने वाले व्यक्ति और उसके दो बेटों ने इसे शहर की एक नदी से निकाला है। इन क्यूब्स को ढूंढ़ने वाले विल रीड को विश्वास है यह किसी रहस्यमय हिंदू प्रार्थना अनुष्ठान से जुड़े हुए हैं। इन क्यूब्स पर तस्वीरें उकेरी गई हैं और यह क्यूब्स इतने छोटे हैं कि इन्हें आसानी से उंगलियों और अंगूठों के बीच रखा जा सकता है। इसके अलावा इन पर संस्कृत में लिखे शिलालेख हैं, जो बेहद ही सफाई से ग्रिड किए हुए हैं।
फिनहम के रहने वाले 38 वर्षीय विल ने पहले सोचा कि ये क्यूब्स दक्षिण कोवेंट्री की सोवे नदी में कूड़े के नीचे पड़े सामान्य टुकड़े थे। लेकिन जैसे ही वह और उनके दोनों बेटे, पांच वर्षीय जैक्सन और सात वर्षीय बेंजामिन ने पास जाकर देखा तो पता चला कि इन क्यूब्स पर कुछ शिलालेख उकरे हुए हैं।
विल ने कहा कि हम लॉकडाउन में हमारे दैनिक गतिविधि के रूप में मैग्नेट फिशिंग करने के लिए बाहर निकले थे और हम अगल-अलग स्थानों पर गए। सबसे पहले हमे कुछ चाबियां और पैनी (सिक्के) मिली। इसके बाद जब हमने गौर से पानी में देखा तो हमें ये क्यूब्स मिले, जिन्हें पहले देखकर लग रहा था कि ये एक टाइल्स का टुकड़ा है।

उन्होंने कहा कि मैं अपने दोस्तों के लिए फेसबुक पर लाइव स्ट्रीमिंग कर रहा था और फिर मैंने झुककर इन क्यूब्स को उठाना शुरू किया। मुझे यह भी लगा कि हो सकता है ये पत्थर के टुकडे हो। मैंने उसे कैमरे पर दिखाया और जैसे ही मैंने एक क्यूब को उठाया ये और अधिक मिलते ही चले गए।

विल ने फेसबुक और सामग्री साझा करने वाली वेबसाइट रेडिट पर क्यूब्स की फोटो को पोस्ट किया और इस असामान्य चीज के बारे में पता लगाना चाहा। इस पर मिली प्रतिक्रियाओं के आधार पर, उन्हें विश्वास है कि यह चीज किसी हिंदू प्रार्थना अनुष्ठान से जुड़ी हुई है।

विल ने कहा कि पहले इसको लेकर कुछ अधपकी कहानियां सामने आ रही थी, इन क्यूब्स ने लोगों का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित किया है। उन्होंने कहा कि इससे यह बात तो पता चल गई है कि वे मूल रूप से भारतीय हैं। साथ ही यह बात भी स्पष्ट हो गई है कि इनका इस्तेमाल प्रार्थनाओं में किया जाता था, और प्रार्थना तभी सफल होती थी, जब इन क्यूब्स को बहते पानी में फेंक दिया जाता था।

पैकेज से परिसंपत्ति जोखिम कम होगा, लेकिन बना रहेगा कोविड-19 का नकारात्मक असर: मूडीज

नयी दिल्ली : मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस ने कहा कि सरकार द्वारा हाल में घोषित 20 लाख रुपये के आर्थिक पैकेज से वित्तीय संस्थानों के लिए परिसंपत्तियों के जोखिम में कमी आएगी, लेकिन इससे कोविड-19 का नकारात्मक असर पूरी तरह खत्म नहीं होगा। सरकार ने पिछले सप्ताह सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों (एमएसएमई) के लिए 3.70 लाख करोड़ रुपये के सहायता पैकेज की घोषणा की थी। इसके अलावा गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) के लिए 75,000 करोड़ रुपये और बिजली वितरण कंपनियों के लिए 90,000 करोड़ रुपये के समर्थन पैकेज की घोषणा की गयी।
मूडीज ने ‘वित्तीय संस्थान- भारत: वित्तीय प्रणाली को राहत मुहैया कराने के लिए सहायता उपाय, लेकिन नहीं हल होंगी सभी समस्याएं’ शीर्षक वाली अपनी टिप्पणी में कहा, ‘‘इन उपायों से वित्तीय क्षेत्र के लिए परिसंपत्तियों के जोखिम को कम करने में मदद मिलेगी, लेकिन वे कोरोना वायरस महांमारी के नकारात्मक प्रभावों को पूरी तरह दूर नहीं कर पाएंगे।’’
एमएसएमई पैकेज के बारे में रेटिंग एजेंसी ने कहा कि कोरोना वायरस के प्रकोप से पहले ही यह क्षेत्र तनाव में था और आर्थिक विकास में मंदी गहराने के साथ ही नकदी की चिंताएं बढ़ जाएंगी। एनबीएफसी के उपायों के संबंध में टिप्पणी में कहा गया कि यह मदद इन कंपनियों की तात्कालिक तरलता आवश्यकताओं की तुलना में बहुत कम है।

टीवी अभिनेता मनमीत ग्रेवाल ने की खुदकुशी

मुम्बई : टीवी अभिनेता मनमीत ग्रेवाल ने लॉकडाउन के बीच आर्थिक तंगी की वजह से कथित रुप से खुदकुशी कर ली है। वह “आदत से मजबूर” और “कुलदीपक” जैसे कार्यक्रमों में काम कर चुके हैं। उनके पारिवारिक दोस्त और निर्माता मनजीत सिंह राजपूत ने बताया कि मूल रूप से पंजाब के रहने वाले ग्रेवाल ने  खारघर के अपने घर में फंदा लगा कर कथित रुप से खुदकुशी कर ली। वह वहां अपनी पत्नी के साथ रहते थे। वह 32 साल के थे। ग्रेवाल को तकरीबन सात साल से जानने वाले राजपूत ने कहा कि अभिनेता आर्थिक तंगी का सामना कर रहा था और लॉकडाउन के कारण उनकी आमदनी नहीं हो रही थी।
राजपूत ने बताया, ” वह काफी आर्थिक मसलों से गुजर रहा था और अवसाद में भी था। उसपर (काम बंदी के दौर में) कर्ज नहीं चुका पाने का दबाव भी था। उसकी पत्नी हैरान है और टूट चुकी है। ” ग्रेवाल वेब सीरीज और कुछ विज्ञापनों में काम कर रहे थे जिन्हें देशव्यापी लॉकडाउन की वजह से स्थगित कर दिया गया है।

भारत को कोविड-19 के सामुदायिक स्तर पर प्रसार के लिए तैयार रहना चाहिए : स्वास्थ्य विशेषज्ञ

बेंगलुरु : भारत को कोविड-19 के सामुदायिक स्तर पर फैलने के जोखिम का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। एक प्रख्यात स्वास्थ्य विशेषज्ञ ने यह बात कही और आगाह किया कि लॉकडाउन में राहत देने के चलते कोरोना वायरस बड़े पैमाने पर फैल सकता है।
कुछ विशेषज्ञों की चेतावनी कि देश में वायरस का सामुदायिक स्तर पर फैलना (चरण तीन) पहले ही शुरू हो चुका है पर पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष, प्रोफेसर के श्रीनाथ रेड्डी ने कहा कि यह परिभाषा पर निर्भर करता है।
उन्होंने कहा कि क्योंकि अगर हम उन लोगों में प्रसार को देखते हैं जिन्होंने कहीं की यात्रा नहीं की या किसी संक्रमित के संपर्क में नहीं आाए, तो निश्चित तौर पर ऐसे कई मामले सामने आए हैं। उन्होंने पीटीआई-भाषा को बताया, “लेकिन ज्यादातर मामले विदेशी यात्रियों के प्रवेश के मूल कारण के इर्द-गिर्द या उनके जानकारों की यात्रा करने से संबंधित हैं। इसलिए जो लोग इसे अब भी दूसरा चरण बता रहे हैं, उनका कहना है कि यह पता लग सकने वाला स्थानीय प्रसार है और ऐसा सामुदायिक प्रसार नहीं है जिसका अनुमान न लगाया जा सके।” उन्होंने कहा कि इसलिए हम सामुदायिक प्रसार जैसे शब्द के इस्तेमाल से बच रहे हैं। यह परिभाषाओं एवं भाषा का विषय है।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में ह्रदयरोग विभाग के पूर्व में प्रमुख रहे रेड्डी ने कहा कि लेकिन यह भी मानना होगा कि सामुदायिक प्रसार हर उस देश में वास्तव में नजर आया है जहां इस वैश्विक महामारी ने भयावह रूप लिया है और भारत को भी इसके लिए तैयार रहना चाहिए । और उसे इस तरह से काम करना चाहिए जैसा कि यह हो रहा है और रोकथाम के सभी जरूरी कदम उठाने चाहिए। रेड्डी ने कहा कि सामुदायिक प्रसार का न सिर्फ जोखिम है बल्कि असल में यह एक खतरा है।
उनके मुताबिक, मलेशिया समेत दक्षिण पूर्वी एशिया के राष्ट्र, खासकर भारत में प्रति लाख लोगों पर उन देशों के मुकाबले मृत्यु दर कम रही जहां वैश्विक महामारी का प्रकोप उसी वक्त नजर आया था। उन्होंने कहा कि भारत में मृत्यु दर कम होने के कई कारक हो सकते हैं जैसे कम आयु वर्ग की आबादी ज्यादा होना, ग्रामीण जनसंख्या अधिक होना और लॉकडाउन जैसे एहतियाती कदम उठाया जाना।
उन्होंने इन्हें दृढ़ रखने की जरूरत पर भी बल दिया है। उन्होंने कहा कि लॉकडाउन खुलने पर कुछ जोखिम उत्पन्न हो सकते हैं क्योंकि लोगों की आवाजाही बढ़ जाएगी और वायरस के बड़े पैमाने पर फैलने की आशंका भी बढ़ जाएगी। रेड्डी ने कहा कि इसलिए हमें ज्यादा से ज्यादा शारीरिक दूरी बनानी होगी और मास्क पहनना एवं हाथ धोने जैसी आदतों का लगातार पालन करना होगा।

आईएससी की परीक्षा में अब अंग्रेजी और गणित की परीक्षा में 20 अंक के प्रोजेक्ट वर्क

कोलकाता : सीआईएससीई द्वारा संचालित आईएससी परीक्षा में एक नया बदलाव आने वाला है। वर्ष 2022 से अंग्रेजी और गणित की परीक्षा में अब 20 अंक का प्रोजेक्ट वर्क शामिल किया जा रहा है। काउंसिल की ओर से इस बात स्कूलों को पत्र भेजा गया है। सीआईएसई यह प्रयोग अगले साल यानी 2021 से ही लाने जा रही है। इस समय इन दोनों विषयों में 100 अंकों की परीक्षा ही ली जाती है मगर अब इसकी जगह 80 अंक के थ्योरी पेपर और 20 अंक के प्रोजेक्ट वर्क होंगे। निर्धारित सूची में से प्रोजेक्ट के लिए विषय विद्यार्थी खुद चुन सकेंगे। मूल्यांकन की यह नयी प्रणाली आईएससी की वर्ष 2022 हेतु निर्धारित नियमों तथा पाठ्यक्रमों के अनुरूप ही होगी जो कि काउंसिल की वेबसाइट पर उपलब्ध है। अंग्रेजी और गणित में का नमूना प्रश्न पत्र भी काउंसिल की वेबसाइट पर उपलब्ध होगा।