नयी दिल्ली : 15 अगस्त को देश अपना 74वां स्वतंत्रता दिवस मनाएगा. कोविड 19 के चलते इस बार भरे ही बाजारों की रौनक कुछ कम नज़र आ रही है लेकिन लोगों में स्वतंत्रता दिवस को लेकर काफी उत्साह है। हर साल स्वतंत्रता दिवस पर लोग छोटे-छोटे तिरंगे, तिरंगा बैच और तिरंगा थीम वाली कई चीजें खरीदते थे लेकिन इस बार कोरोना काल की वजह से मार्केट में स्वतंत्रता दिवस के मौके पर तिरंगा मास्क की काफी धूम मची हुई है। सड़क के किनारे दुकान लगाने वाले दुकानदार और ऑनलाइन भी ये तिरंगा मास्क मिल रहे हैं। लोग काफी संख्या में इन मास्क की खरीददारी कर रहे हैं।
पिछले साल स्वतंत्रता दिवस पर लोग तिरंगा बैंड, तिरंगा ब्रेसलेट और तिरंगा टोपी जैसी कई चीजें खरीदते थे, लेकिन इस बार इनकी जगह तिरंगा मास्क बड़ी तेजी से बिक रहे हैं। स्वतंत्रता दिवस की थीम से सजे इन तिरंगा मास्क को और भी ज्यादा आकर्षक बनाने के लिए इसपर देशभक्ति को दर्शाने वाली-अलग अलग चीजें लिखी हुई हैं- जैसे किसी मास्क पर- इण्डिया या किसी मास्क पर स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं लिखी हैं और इसके साथ ही देश के लिए बलिदान देने वाले देशभक्तों जैसे भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, महात्मा गांधी, बाल गंगाधर तिलक सहित अन्य स्वतंत्रता सेनानियों की तस्वीरें बनी हुई हैं। स्वतन्त्रता दिवस के मौके पर देशभक्ति के रंग में रहे ये मास्क आपके बजट में हैं। बता दें कि मास्क की कीमत 10 रुपये से लेकर 550 रुपये तक है। ऐसे में ये तिरंगा मास्क आम आदमी की पहुंच में भी है और आप ज्यादा पैसे देकर भी इसे खरीद सकते हैं। बजट में होने की वजह से ही लोग इन मास्क की काफी खरीददारी कर रहे हैं।
नयीदिल्ली : सरकार ने इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री और रजिस्ट्रेशन पहले से फिट बैटरी के बिना के करने को मंजूरी दे दी है। सरकार के इस फैसले से इन वाहनों की अपफ्रंट कीमत कम हो जाएगी। ई-वाहनों की कुल लागत में बैटरी की कीमत 30 से 40 फीसदी होती है। कंपनियां इन्हें अलग से मुहैया करा सकती हैं। बुधवार को सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (एमओआरटीएच)ने यह जानकारी दी।
मंत्रालय ने इस संदर्भ में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के परिवहन सचिवों को पत्र भेजा है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि वाहनों को बिना बैटरी के भी बेचा जा सकता है और टेस्ट एजेंसी द्वारा जारी सर्टिफिकेट के आधार पर इनका रजिस्ट्रेशन किया जा सकता है। परिवहन सचिवों को भेजी गई एडवाइजरी के मुताबिक देश में ई-वाहनों के बढ़ावा देने के प्रयासों के तहत सरकार ऐसा कर रही है।
इसमें कहा गया है वाहनों के प्रदूषण और तेल आयात बिल को कम करने के लिए व्यापक राष्ट्रीय एजेंडा पाने के लिए संयुक्त रूप से काम करने का समय आ गया है। यह पर्यावरण की रक्षा करने के साथ ही तेल आयात बिल को कम करने और इस क्षेत्र को उद्योगों को भी अवसर प्रदान करेगा।
मंत्रालय ने बताया कि ई-वाहनों के बढ़वा देने के लिए बैटरी की लागत को वाहन की लागत से अलग कर दिए जाने के लिए मंत्रालय को सिफारिश मिली थी। इस तरह दोपहिया और तिपहिया इलेक्ट्रिक वाहनों को बाजार में बिना बैटरी के बेचा जा सकता है। इससे इनकी अपफ्रंट कीमत कम हो जाएगी।
नयीदिल्ली : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को ‘ट्रांसपेरेंट टैक्सेशन- ईमानदारों के लिए सम्मान’ प्लेटफॉर्म की शुरुआत की। सरकार ने टैक्स सिस्टम में सुधार और उसे सरल बनाने के लिए इसे लॉन्च किया है। इस अवसर पर पीएम मोदी ने कहा कि नए प्लेटफॉर्म के लॉन्च होने से करदाता भयमुक्त महसूस करेंगे। उन्होंने कहा कि देश में चल रहे स्ट्रक्चरल रिफॉर्म्स का सिलसिला आज एक नए पड़ाव पर पहुंचा है। 21वीं सदी के टैक्स सिस्टम की इस नई व्यवस्था का आज लोकार्पण किया गया है। पीएम मोदी ने कहा कि ईमानदार टैक्सपेयर राष्ट्र निर्माण में बड़ी भूमिका निभाता है।
प्रधानमंत्री ने करदाताओं के लिए चार्टर (अधिकार पत्र) का भी ऐलान किया। उन्होंने देशवासियों से आगे बढ़कर ईमानदारी के साथ कर देने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि 130 करोड़ लोगों के देश में मात्र डेढ़ करोड़ लोग ही कर देते हैं।
वीडियो कांफ्रेन्सिंग के जरिए आयोजित इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने कहा कि अब कर प्रणाली फेसलेस हो रही है, यह करदाता के लिए निष्पक्षता और एक भरोसा देने वाला है। उन्होंने कहा, ‘कर मामलों में बिना आमना सामना के अपील (फेसलेस अपील) की सुविधा 25 सितंबर यानी दीन दयाल उपाध्याय के जन्मदिन से पूरे देशभर में नागरिकों के लिए उपलब्ध होगी।
पीएम मोदी ने कहा, ‘रिटर्न से लेकर रिफंड की व्यवस्था को पूरी तरह ऑनलाइन किया गया है। जो नया स्लैब सिस्टम आया है उसमें बेवजह के कागजों और दस्तावेजों को जुटाने से मुक्ति मिल गई है।’ उन्होंने कहा कि प्रक्रियाओं की जटिलताओं के साथ-साथ देश में टैक्स भी कम किया गया है। पांच लाख रुपये की आय पर अब टैक्स जीरो है। बाकी स्लैब में भी टैक्स कम हुआ है। कॉर्पोरेट टैक्स के मामले में हम दुनिया में सबसे कम टैक्स लेने वाले देशों में से एक हैं।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, ‘आज से शुरू हो रहीं नई व्यवस्थाएं, नई सुविधाएं- मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को और मजबूत करती हैं। ये देशवासियों के जीवन से सरकार को, सरकार के दखल को कम करने की दिशा में भी एक बड़ा कदम है।’
प्रक्रियाओं की जटिलताओं के साथ-साथ देश में कर भी कम किया गया है। 5 लाख रुपये की आय पर अब टैक्स जीरो है। बाकी स्लैब में भी टैक्स कम हुआ है।
उन्होंने कहा कि अब देश में माहौल बनता जा रहा है कि कर्तव्य भाव को सर्वोपरि रखते हुए ही सारे काम करने हैं। सवाल यह कि बदलाव आखिर कैसे आ रहा है? हमारे लिए रिफॉर्म का मतलब है, रिफॉर्म नीति आधारित हो, टुकड़ों में नहीं हो, एक रिफॉर्म, दूसरे रिफॉर्म का आधार बने और नए रिफॉर्म का रास्ता बनाए। ऐसा भी नहीं है कि एक बार रिफॉर्म करके रुक गए। ये निरंतर, सतत चलने वाली प्रक्रिया है। ‘कर प्रणाली में सुधार को देगा और मजबूती’
इससे पहले पीएम मोदी ने बुधवार को ट्वीट किया, ‘बृहस्पतिवार, 13 अगस्त को पूर्वाह्न 11 बजे ‘पारदर्शी कराधान – ईमानदार का सम्मान मंच की शुरुआत की जाएगी। यह हमारी कर प्रणाली में सुधार और उसे सरल बनाने के प्रयासों को और मजबूती देगा। यह कई ईमानदार करदाताओं के लिए फायदेमंद होगा जिनकी कड़ी मेहनत देश को आगे बढ़ने की शक्ति प्रदान करती है।’ वित्त मंत्री ने बताया महत्वपूर्ण कदम
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ट्विटर पर लिखा, ‘वास्तव में, यह भारत के लिए सरल और पारदर्शी कराधान व्यवस्था उपलब्ध कराने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।’ बुधवार को जारी एक आधिकारिक बयान के अनुसार वीडियो कांफ्रेन्सिंग के जरिए आयोजित किए जा रहे इस कार्यक्रम में विभिन्न उद्योग मंडल, व्यापार संगठन, चार्टर्ड एकाउंटेंट संघ और जाने-माने करदाता शामिल हुए हैं।
कोलकाता : श्री शिक्षायतन महाविद्यालय के हिन्दी विभाग द्वारा 6 और 7 अगस्त 2020 को दो दिवसीय राष्ट्रीय ई. संगोष्ठी का आयोजन किया गया। पहले दिन के कार्यक्रम का विषय रहा रेणु द्वारा रचित कहानी ‘तीसरी कसम’ । डॉ. प्रीति सिंघी ने संचालन करते हुए विषय को प्रस्तावित किया। प्रथम वक्ता के रूप में दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर डाॅ. सुधा सिंह ने ‘तीसरी कसम में प्रेम की अवधारणा’ के विभिन्न पहलुओं पर विस्तृत चर्चा करने के क्रम में तीसरी कसम को आलोचकों द्वारा प्लातोनिक प्रेम कहने पर आपत्ति जतायी क्योंकि प्रेम का सम्बन्ध मनोविज्ञान से है और जहाँ यह घटता है, वह समाज है जिससे प्रेम में मनोविज्ञान और समाज दोनों की उपस्थिति रहती है । प्रेम में मनोविज्ञान की विवेचना में उन्होंने बताया कि मनुष्य के अस्तित्व के साथ यानी बच्चे के गर्भ से निकलने के साथ ही अलगाव या एककी भाव का जन्म भी हो जाता है,इसी एकाकीपन के भाव को पार कर लेने का नाम प्रेम है । वे प्रेम को भावनात्मक रूप में स्वत:स्फूर्त मानती हैं जबकि इसके सामाजिक पक्ष को एक सोची समझी गतिविधि कहती हैं । डॉ॰ सुधा यह स्पष्ट किया कि रेणु द्वारा कहानी में हिरामन का हीराबाई के अपूर्व सौन्दर्य देखकर उसके अक्षत कौमार्य की परिकल्पना करना एक प्रयास है स्त्री की कौमार्य को देह जी बजाय उसकी अनुभूति,उसके व्यवहार में स्थापित करने का ।यह रेणु का पितृसत्ता के विरूद्ध बगावत ही है ।
दूसरे वक्ता के रूप में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से प्रोफेसर डाॅ. आशीष त्रिपाठी ने ‘व्यक्ति कथा समाज गाथा’ पर अपनी बात रखते हुए रेणु द्वारा सांस्कृतिक उपनिवेशन का प्रतिरोध कर सांस्कृतिक वि-उपनिवेशन की बात उठायी और कहा कि रेणु ने यथार्थ के सांस्कृतिक पहलू पर जोर दिया है । तीसरी कसम में हीराबाई और हिरामन की कहानी महुआ घटवारिन की कहानी का आधुनिक रूपांतरण है । महुआ घटवारिन में स्त्री शोषण एवं कोमल प्रेम की कहानी को समझे बिना तीसरी कसम कहानी को नहीं समझा जा सकता है । हिरामन का मन इसलिए महुआ घटवारिन को याद करता है और हीराबाई को कंपनी की औरत न समझ कर उसके दिव्य दैव्य छवि की परिकल्पना करता है । ऐसा नहीं है कि इस कहानी में पुरूष मानसिकता से रेणु परिचित न हों ।जमींदार द्वारा हीराबाई के लिए प्रयुक्त शब्दों में पितृसत्तात्म मानसिकता भी कहानी में बखूबी मिलती है और इसीलिए हीराबाई के लिए हिरामन द्वारा दिए गये संबोधन उसे ज्यादा पसंद है पलटदास के सिया सुकुमारी संबोधन के बनिस्बत । स्त्री के विरुद्ध कहे गये वाक्यों के लिए हिरामन लड़ जाता है । कार्यक्रम के समापान के पड़ाव में प्रश्नोत्तरी सत्र रखा गया और अन्त में विभाग की प्रो. अल्पना नायक ने सभी वक्ताओं ,श्रोताओं और कार्यक्रम से जुड़े समस्त सदस्यों के प्रति धन्यवाद व्यक्त किया । दो दिवसीय राष्ट्रीय ई संगोष्ठी के दूसरे दिन का विषय रहा – ‘मानस का हंस’ जिसमें संचालक के रूप में डॉ. रचना पाण्डेय ने पुस्तक के उदाहरण के साथ तुलसीदास के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए अमृतलाल नागर के ‘मानस के हंस’ को पढ़े जाने की महत्ता को बताते हुए संचालन किया। दूसरे दिन के पहले वक्ता लखनऊ विश्वविद्यालय के सेवानिवृत प्रोफेसर डॉ.सूर्य प्रकाश दीक्षित ने रामचरित मानस के तुलसी और नागर के मानस के हंस पर विस्तृत चर्चा की इसके साथ ही तत्कालीन परिस्थितियों को उजागर करते हुए यह बताया कि जब रचनाकार रचता है तो कौन कौन से कारक उसे प्रभावित करते हैं। अपनी रचनाओं में हाशिए के लोगों के विरूद्ध असंवेदनशीलता के आरोपों से तुलसी को बरी करने के लिए इस उपन्यास में नागर जी ने तुलसी के धर्मनिरपेक्ष एवं वर्ग निरपेक्ष तथा स्त्री का सम्मान करने वाले की छवि प्रस्तुत की है । दीक्षित जी ने इस उपन्यास को सामाजिक इतिहास के आधार पर लिखी रचना माना है । उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात यह भी कही कि अमृतलाल नागर की रचना मानस के हंस में काम और राम के बीच का द्वन्द्व ही अन्ततः किस प्रकार तुलसी को महान कवि बनाता है। उन्होंने नागर की रचनाओं में किस्सागोई की विशेषता एंव पूरी रचना को सिनेरियो टाईप कहा और यह भी कहा कि नागर के यहाँ संवाद शैली मे रचनाएँ लिखी गयी जिसकी भाषा खड़ी बोली होती हुए भी एक विशेष प्रकार की नागरी भाषा,नागर जी की अपनी भाषा लगती है ।
दूसरे वक्ता सुरेन्द्रनाथ सान्ध्य कॉलेज,कोलकाता के डाॅ प्रेमशंकर त्रिपाठी ने बहुत ही सुन्दर और तथ्य परक ढंग से मानस के हंस की व्याख्या की । उन्होंने राम के प्रति तुलसी की निष्ठा की बात बताई । साथ ही नागर जी मृत्यु का जो आह्वान करते है उसके रहस्य को नागर जी के साथ के अपने संस्मरणों के माध्यम से व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि मानस के हंस में मोहिनी प्रसंग नारी के प्रति आकर्षण की एक बानगी प्रस्तुत करता है तथा यह बताया कि भक्ति जरूरी है पर अन्धभक्ति की कोई जगह नहीं होनी चाहिए । मनुष्य को हमेशा अपने समाज के प्रति सचेतन होना चाहिए । उन्होनें तुलसी की काम से राम तक की यात्रा को उजागर किया है । प्रेमशंकर त्रिपाठी जी ने यह स्पष्ट किया कि यहाँ तुलसी ने काम, क्रोध, लोभ, मोह इन सारी विकृतियों से लड़ते हुए मानस के हंस को पाया है। महामारी में तुलसी के लोकरक्षक रूप का चित्रण नागर जी द्वारा किए जाने का प्रसंग भी वे उठाते हैं ।इसके बाद डाॅ प्रीति सिन्घी ने प्रश्नोत्तरी सत्र को बहुत अच्छे ढंग से सम्भाला जहाँ लोगों ने बेहद विवेक पूर्ण प्रश्न पूछे । प्रो. सिंधु मेहता ने कार्यक्रम के अन्त में सभी को धन्यवाद देते हुए कार्यक्रम समाप्ति की घोषणा की।
कोलकाता : सामाजिक विज्ञान और मानविकी के त्रैमासिक जर्नल ‘द पर्सपेक्टिव इंटरनेशनल जर्नल ऑफ सोशल साइंस एंड ह्यूमनिटीज़’ (The Perspective International Journal of Social Science and Humanities-TPIJSSH) का प्रकाशन आरंभ हुआ है। इस द्विभाषी (हिन्दी और अँग्रेजी) ऑनलाइन जर्नल में संरक्षक के रूप में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के पूर्व अध्यक्ष प्रो. सुखदेव थोरात और भारत सरकार के आदिवासी मामलों की समिति के पूर्व सदस्य प्रो. वर्जिनियस खाखा जुड़े हुए हैं। इस लिहाज से यह एक महत्वपूर्ण बौद्धिक शुरुआत है। जर्नल के संपादक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय, वर्धा के सहायक प्रोफेसर एवं कोलकाता क्षेत्रीय केंद्र के प्रभारी डॉ सुनील कुमार ‘सुमन’ हैं। उप संपादक के रूप में युवा लेखक-अध्येता अनीश कुमार, नीतिशा खलखो एवं रजनीश कुमार अंबेडकर अपना योगदान दे रहे हैं। संपादक मण्डल एवं सलाहकार मण्डल में देश-विदेश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के प्राध्यापक इस जर्नल से जुड़े हुए हैं।
यह जर्नल पूर्व समीक्षित प्रक्रिया पर आधारित है। इसमें शोध पत्र चयन से उस पर पूर्व विभिन्न विषय विशेषज्ञों की राय एवं टिप्पणी ली जाती है। जर्नल के पहले अंक (फरवरी-अप्रैल 2020) में नौ शोध-पत्र और एक समीक्षा आलेख प्रकाशित किए गए हैं। इसमें दलित साहित्य चिंतन से संबंधित दो शोध-पत्र, आदिवासी विमर्श से जुड़े चार शोध पत्र तथा एक शोध पत्र स्त्री प्रश्नों पर केंद्रित है। मीडिया और किसान जीवन से संबंधित शोध पत्र भी इस अंक में शामिल किया गया है । जर्नल ने अपने पहले अंक से ही शोध के अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन करने के लिए प्रतिबद्ध दिखता है। जर्नल के संपादक डॉ. सुनील कुमार ‘सुमन’ अपने संपादकीय में लिखते हैं- “ हमने अपने सफ़र का पहला क़दम बढ़ा दिया है । यह यात्रा अकादमिक व बौद्धिक ज़मीन को समृद्ध बनाने के संकल्प के साथ शुरू हुई है । वैसे तो इस समय हिंदी-अंग्रेज़ी के अनेक जर्नल प्रकाशित हो रहे हैं, परंतु हम उनके बीच लगातार कुछ नवीनता और बेहतरी के लिए प्रयास करेंगे । चूंकि यह सोशल साइंस और ह्यूमनिटिज का जर्नल है, तो अपनी कोशिश रहेगी कि ज्ञान के इन विविध क्षेत्रों-पक्षों से कुछ उत्कृष्ट शोध आलेख हम यहाँ उपलब्ध करा पाएँ । अभी हम खुद को तैयार करने की प्रक्रिया में हैं इसलिए जर्नल का व्यवस्थित व मजबूत स्वरूप आगामी दिनों में देखने को मिलेगा । लेकिन इस बात के लिए हम जरूर आश्वस्त करना चाहेंगे कि गुणवत्ता के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया जाएगा । शोध के अंतरराष्ट्रीय मानकों का यथासंभव पालन सुनिश्चित कराना हमारी ज़िम्मेदारी रहेगी । इसके लिए शोध पत्रों के चयन की अपनी निष्पक्ष, पारदर्शी और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को हम हमेशा कायम रखने की कोशिश करेंगे ।”
सामाजिक विज्ञान और मानविकी के क्षेत्र में यह जर्नल कुछ अलग और गंभीर अकादमिक प्रयास करता हुआ दिखाई देता है। इसके पहले अंक में विदेशों से भी शोध पत्र प्रकाशित किए गए हैं । जर्नल के संपादक डॉ सुनील कुमार ‘सुमन’ का कहना है कि ‘‘हमारा ध्येय सामाजिक विज्ञान और मानविकी के क्षेत्र में गंभीर शोध अध्ययन व लेखन को सामने लाना है। जर्नल भविष्य में महत्वपूर्ण व ज्वलंत विषयों पर विशेषांक भी प्रकाशित करेगा। अधिक जानकारी के लिए जर्नल के वेबसाइट : www.tpijssh.com पर विजिट किया जा सकता है । इस जर्नल को देश-विदेश के विभिन्न ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर index भी किया गया है ।’’ जर्नल का दूसरा अंक (मई-जुलाई 2020) भी प्रकाशित हो गया है। इस जर्नल का अकादमिक व बौद्धिक जगत में काफी स्वागत किया जा रहा है।
– आकांक्षा कुरील, वर्धा
-दीपा गुप्ता
प्रेमचंद जी ने 1916 में “बाजार-ए-हुस्न” लिखा, जिसका उन्होंने एक साल बाद हिन्दी रुपांतरण कर 1917 में “सेवासदन” नाम से प्रकाशित किया। प्रेमचंद कि यह उपन्यास लोगों को सस्ती शिक्षा देने के लिए नही लिखा गया।कुछ लोग को लगता है सेवासदन की मुख्य समस्या वेश्यावृत्ति है,वास्तव मे ऐसा नही है।सेवासदन की मुख्य समस्या नारी की पराधीनता है।
प्रेमचंद जी ने सुमन की समस्या को व्यक्तिगत न बनाकर सामाजिक बनाया है।उन्होंने ने दिखाया है कि कैसे सामाजिक परिस्थितियां ही सुमन को सुमनबाई बनने. को मजबूर करती है।मध्यवर्गीय नारी के जीवन की विभिन्न समस्याओं के साथ धर्माचार्यो, मठाधीशों, धनपतियों, सुधारकों का आंडम्बर ,दहेज प्रथा,अनमेल विवाह, मनुष्य का दोहरा चरित्र…. इत्यादि समस्याओं का भी मार्मिक वर्णन किया गया है।
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सेवासदन एक सनायिक उपन्यास नहीं है, जिसकी उपादेयता अपने समय और अपने युग के साथ समाप्त हो जाये।इसमे वर्तमान के प्रकाशन की अपूर्व क्षमता है। आज के संदर्भो में इसकी प्रासंगिकता एवं उपयोगियता को नकारा नही जा सकता है।आज जीवन मूल्यों का तेजी से विघटन हो रहा है। ऐसी स्थिति में सेवासदन हमारे सामने एक सार्थक उदाहरण के रुप में प्रस्तुत है।यदी हम इस तत्थ को स्वीकार नही करते तो इसका अर्थ यह होगा कि या तो सेवासदन के साथ हमारी सहानुभूति एक ढोंग है या हम आज भी सेवासदन के युग में ही जी रहे है।सेवासदन में हमारी रुची बनाए रखने में संवेदनात्मक का उतना योग नही जितना उसके नैतिक मुल्यों का है।
प्रेमचंद जी द्वारा सालों पहले लिखा गया यह उपन्यास आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना की अपने समय।उस समय जिस दहेज प्रथा का शिकार सुमन और उसका परिवार हुआ था उसी भांति आज भी ऐसे कितनी सुमन है हमारे समाज में जो रोज दहेज प्रथा की बलि चढ़ जाती है।’ “आज जैसे यह प्रथा सी बन गयी हो कि लड़का जितना ज्यादा पढ़ि लिखा होगा उतना ही दहेज की रकम भी।” इस उपन्यास जरिए प्रेमचंद जी ने उन शिक्षितों की हकीकत जाहिर कर दी जो विवाह और सतीत्व के नाम पर लेन-देन करते है। जो ऊपर से तो दहेज की कुप्रथा की बुराई करते लेकिन उसे कायम रखने के लिए हमेशा बहाने ढूंढ़ लिया करते है।
कहने के लिए तो आज महिला चांद तक पहुंच गयीं हैं।लड़को से कंधा मिला कर चलती है।देश चला सकती है। वास्तव में आज भी उन्हें खुल जीने का हक नही है।रात अकेले बाहर नही जा सकती है। जैसा कि उपन्यास में हमें देखने को मिलता है।सुमन के घर देर लौटने से गंजाधर कितना तमासा करता है।
आज हम अंतरिक्ष मे बस्ती बनाने का सपना देख रहे पर ढोंगी बाबाओं से आज भी समाज घिरा हुआ है।महंत रामदास जैसे अनेकों बाबा आज भी हमारे समाज मे मजूद है।जो धर्म के आड़ में न जाने क्या क्या करते है।
उपन्यास की वास्तविक समस्या ही यह है- लड़कियों को कुए में ढ़केलने और फिर स्टिंग और पतिव्रता धर्म के गीत गाना।इस समूचे व्यापार में लड़की की इच्छा अनिच्छा का सवाल ही नई उठता है।बलिपशु को तरह जिस खूंटे से भी बांध दी जाए, उसे बँधना पड़ता है।
प्रेमचंद ने विस्तार से दिखलाया है कि इस समाज व्यवस्था में संपत्ति के रक्षक सदाचार की आड़ में वेश्यावृत्ति को प्रश्रय ही नही देते ,वेश्याओ को जन्म भी देते हैं ।और जिस समाज में विवाह का मतलब कन्या विक्रय हो,उससे वेश्यावृत्ति कौन उठा सका है।? सेवासदन एक बड़ा प्रश्नचिन्ह है जिसका उत्तर आज भी हमारे समाज के पास नही है।
विधि : सबसे पहले कढाई में घी गरम करेंगे फिर सावधानी से गाय का दूध डालेंगे उसे बराबर चलाते रहेगे, उसके चलाते – चलाते ही उसमे मिल्क पाउडर डालेंगे उसे भी लगातार चलाते रहेगें । फिर चीनी डाल देंगे ,चीनी डालते हुए चलाते रहेंगे जब तक गाढ़ा न हो जाए । उसके बाद एक प्लेट मे पसले हल्का सा घी लगाकर उस पर फैला देंगे । उसके बाद उपर से ड्राइफ्रुट डालेंगे । और एक घंटे के लिए छोड देगे या फ्रिज मे रख सकते हैं । फिर क्या अपने मनपसंद अंदाज का आकार देकर खाईये और खिलाइएं ।
नयीदिल्ली : रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने घरेलू रक्षा उद्योग को बढ़ावा देने की एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए रविवार को ऐलान किया कि 101 हथियारों व सैन्य उपकरणों के आयात पर रोक लगाई जाएगी। इनमें हल्के लड़ाकू हेलीकॉप्टर, मालवाहक विमान, पारंपरिक पनडुब्बियां और क्रूज मिसाइल भी शामिल हैं। यह रोक 2020 से 2024 के बीच चरणबद्ध तरीके से लगाई जाएगी। रक्षा मंत्री ने इसकी घोषणा करते हुए कहा कि रक्षा मंत्रालय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘आत्मनिर्भर भारत’ आह्वान को आगे बढ़ाते हुए बड़े कदम उठाने को तैयार है। उन्होंने अनुमान जताया कि अगले 5 से 7 साल में घरेलू रक्षा उद्योग को करीब 4 लाख करोड़ रुपये के अनुबंध मिलेंगे। उन्हाेंने कहा कि एक अन्य महत्वपूर्ण कदम के तहत रक्षा मंत्रालय ने 2020-21 के पूंजीगत खरीद बजट को घरेलू व विदेशी पूंजीगत खरीद में विभक्त किया है। चालू वित्त वर्ष में घरेलू खरीद के लिए करीब 52 हजार करोड़ रुपये का अलग बजट बनाया गया है।
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अधिकारियों के अनुसार, 101 वस्तुओं की सूची में टोएड आर्टिलरी बंदूकें, सतह से हवा में मार करने वाली कम दूरी की मिसाइलें, क्रूज मिसाइलें, अपतटीय गश्ती जहाज, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली, अगली पीढ़ी के मिसाइल पोत, फ्लोटिंग डॉक, पनडुब्बी रोधी रॉकेट लाॅन्चर और कम दूरी के समुद्री टोही विमान शामिल हैं। बुनियादी प्रशिक्षण विमान, हल्के रॉकेट लाॅन्चर, मल्टी बैरल रॉकेट लाॅन्चर, मिसाइल डेस्ट्रॉयर, जहाजों के लिए सोनार प्रणाली, रॉकेट, दृश्यता की सीमा से परे हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलें अस्त्र-एमके 1, हल्की मशीनगन व आर्टिलरी गोला बारूद (155 एमएम) और जहाजों पर लगने वाली मध्यम श्रेणी की बंदूकें भी सूची में शामिल हैं।
राजनाथ ने कहा, ‘यह रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा कदम है। सूची की घोषणा के पीछे का उद्देश्य सशस्त्र बलों की आवश्यकताओं के बारे में भारतीय रक्षा उद्योग को अवगत कराना है, ताकि वे स्वदेशीकरण का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए बेहतर रूप से तैयार हो सकें।’ रक्षा मंत्री ने कहा कि मंत्रालय ने तीनों सेनाओं, रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन, रक्षा क्षेत्र के सार्वजनिक उपक्रमों, आयुध कारखाना बोर्ड और निजी उद्योगों सहित सभी संबंधित पक्षों के साथ कई दौर की बातचीत के बाद यह सूची तैयार की है।
69 वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध इसी साल
एक सरकारी दस्तावेज के अनुसार, 69 वस्तुओं पर आयात प्रतिबंध दिसंबर 2020 से लागू होगा, जबकि अन्य 11 वस्तुओं पर प्रतिबंध दिसंबर 2021 से लागू होगा। दिसंबर 2022 से आयात प्रतिबंधों के लिए 4 वस्तुओं की एक अलग सूची की पहचान की गयी है, जबकि 8 वस्तुओं के दो अलग-अलग खंडों पर प्रतिबंध दिसंबर 2023 और दिसंबर 2024 से लागू होगा। लंबी दूरी की लैंड अटैक क्रूज मिसाइलों पर आयात प्रतिबंध दिसंबर 2025 से लागू होगा।
इसके बाद बातें स्पष्ट भी कीं
इसके बाद रक्षा मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा है कि एलसीए एमके-1ए, पिनाक रॉकेट सिस्टम, आकाश मिसाइल सिस्टम जैसी प्रणाली रक्षा बलों की जरूरतों के मुताबिक विकसित की जाती हैं। ऐसी प्रणाली अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी उपलब्ध हैं।
मंत्रालय ने कहा, ऐसी हथियार प्रणालियों के नाम को इस सूची में शामिल किया गया है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सेना इस तरह की समान गुणवत्ता वाली प्रणालियों की सामग्री की खरीद के लिए आगे कोई पहल नहीं करे।
साथ ही ऐसे उपकरणों या हथियारों की खरीद पर प्रतिबंध लगाना है जो समान गुण वाली जरूरतों को पूरा करते हैं, लेकिन अक्सर अलग-अलग नामों के तहत इनका करार किया जाता रहा है।
53% ने माना कि उन्हें क्लब-गवर्निंग बाॅडी से फंड नहीं मिलता
21.9% ने कहा कि उन्हें 100 फीसदी फंडिंग होती है।
लन्दन : ब्रिटेन की एलीट महिला खिलाड़ियों ने कहा कि सोशल मीडिया पर उन्हें कई बार अभद्र टिप्पणियों का सामना करना पड़ा। 30% खिलाड़ियों ने माना कि वे सोशल मीडिया पर ट्रोल हुईं। उन्हें सेक्सिज्म का शिकार होना पड़ा है। यह सब निष्कर्ष बीबीसी के महिला खिलाड़ियों पर हुए सर्वे में निकला है।
यह सर्वे 39 खेलों की 1068 खिलाड़ियों के बीच हुआ, जिसमें से 537 ने जवाब दिए। 160 खिलाड़ियों ने कहा कि वे कभी ना कभी ट्रोलिंग का शिकार हुई हैं। यह पिछले सर्वे की तुलना में तीन गुना ज्यादा है।
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पुरुष खिलाड़ियों के समान सपोर्ट नहीं मिलता लेकिन 22% ने माना पुरुषों के बराबर 100% फंडिंग मिलती है
53.3% ने कहा कि उन्हें क्लब या गवर्निंग बाॅडी से फंड नहीं मिलता है। 21.9% ने कहा कि उन्हें 100 फीसदी फंडिंग होती है।
48.5% ने माना कि उन्हें गवर्निंग बाॅडी से पुरुषों के समान सपोर्ट नहीं मिलता। 45.3% ने कहा समान व्यवहार होता है।
84% को लगता है कि उन्हें प्रतिभा के अनुसार पर्याप्त भुगतान नहीं किया जाता और न ही उस हिसाब से प्राइज मनी दी जाती है।
36% महिलाओं ने कहा कि मां बनने के बाद कमबैक करने के लिए उन्हें क्लब या एसोसिएशन से सपोर्ट नहीं मिलेगा।
खिलाड़ियों ने मीडिया कवरेज पर सवाल उठाए
85% ने माना मीडिया महिला स्पोर्ट्स को प्रमोट नहीं करता।
93% ने कहा कि 5 साल में महिला स्पोर्ट्स के 5 कवरेज में सुधार नहीं हुआ है।
86% ने माना कि मीडिया पुरुष-महिला स्पोर्ट्स की अलग-अलग कवरेज रिपोर्ट करता है।
35% खिलाड़ी देरी से फैमिली स्टार्ट करती हैं
60% को लगता है कि पीरियड्स के कारण प्रदर्शन प्रभावित होता है। पीरियड्स के कारण उन्होंने प्रैक्टिस और टूर्नामेंट छोड़ दिए।
40% महिला खिलाड़ी कोच से पीरियड्स को लेकर चर्चा करने में कंफर्टेबल महसूस नहीं करतीं।
65% ने खेल में सेक्सिज्म अनुभव किया है लेकिन सिर्फ 10% ने रिपोर्ट किया
20% को खेल में रेसिज्म का सामना करना पड़ा जबकि 77% को कभी नहीं।
78% अपनी बॉडी इमेज को लेकर कॉन्शियस हैं, 20% काे ऐसा नहीं लगता।
21% को लगता है कि कोरोना के बाद उन्हें खेल छोड़ना पड़ सकता है।