हर माह 3 अरब से ज्यादा व्यू, अब नए रिकॉर्ड की ओर
बच्चों का यू-ट्यूब चैनल कोकोमेलन सुर्खियों में है। इसके वीडियो को अब तक 72 अरब से ज्यादा बार देखा गया है। अमेरिका में यह किसी भी कैटेगरी में सबसे ज्यादा देखे जाने वाला यू-ट्यूब चैनल है। पूरी दुनिया में भी यह नंबर-2 पर है। वीडियो व्यूज के हिसाब से केवल भारत का टी-सीरीज इससे आगे है। ‘कोकोमेलन- नर्सरी राइम्स’ को हाल ही में लंदन की मूनबग नाम की कंपनी ने खरीदा है।
ब्लूमबर्ग के अनुसार कोकोमेलन एक अरब डॉलर का यू-ट्यूब बिजनेस (मर्चेंडाइज और दूसरे बिजनेस भी शामिल)बन सकता है। ऐसा करने वाला यह दुनिया का पहला यू-ट्यूब चैनल होगा। सोशल मीडिया डेटा विश्लेषण करने वाली वेबसाइट सोशल ब्लेड के अनुसार पिछले 30 दिनों में ही कोकोमेलन पर 3.31 अरब व्यू आए हैं।
चैनल को 55 वर्षीय जे जियॉन चलाते थे। जियॉन दक्षिण कोरिया के हैं, लेकिन 1990 दशक के मध्य में अमेरिका आए थे। जियॉन और उनकी पत्नी बच्चों की किताबें लिखती थीं। शुरुआत में दोनों ने दो बेटों के लिए वीडियो बनाया। दोस्तों ने देखकर इन्हें यू-ट्यूब पर अपलोड करनेकी सलाह दी।
सिर्फ पत्नी के साथ चलाते रहे चैनल
हर साल करीब 99 लाख डॉलर से लेकर 15.8 करोड़ डॉलर कमाने वाले कोकोमेलन चैनल को जे जियॉन करीब 10 सालों तक सिर्फ अपनी पत्नी के साथ ही चलाते रहे। चैनल का काम बहुत ज्यादा बढ़ जाने के बाद करीब 20 लोगों की टीम रखी।
पड़ोसी भी नहीं जानते ये लोग क्या करते हैं
जे जियॉन के पड़ोसी भी नहीं जानते हैं कि वे कौन सा चैनल चलाते हैं या कोकोमेलन इनका यू-ट्यूब चैनल है। वर्षों तक ये इंवेस्टर, स्पॉन्सर्स और दूसरी भाषा में इनके कार्टून को ट्रांसलेट करने की मांग ठुकराते रहे हैं। इस वर्ष इन्होंने अब मर्चेंडाइज को मंजूरी दी है। हाल ही में जीवन का पहला इंटरव्यू दिया। कोकोमेलन सिर्फ भारतीय चैनल टी-सीरीज से व्यू के मामले में पीछे है, लेकिन टी-सीरीज ने जहां अब तक 14.5 हजार से ज्यादा वीडियो पोस्ट किए हैं वहीं कोकोमेलन ने अब तक मात्र 553 वीडियो पोस्ट किए हैं।
55 वर्षीय दम्पति ने बनाया है बच्चों का सबसे हिट यू-ट्यूब चैनल कोकोमेलन
जादवपुर विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने बनाया इलेक्ट्रॉनिक मास्क
कोलकाता : कोलकाता के जादवपुर विश्वविद्यालय (जेयू) के विद्यार्थियों ने एक इलेक्ट्रॉनिक मास्क बनाया है जो इसे पहनने वाले के आसपास मौजूद किसी भी वायरस को नष्ट कर देता है। परियोजना से जुड़े विश्वविद्यालय के वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि मास्क का डिजाइन इंस्ट्रुमेशन विभाग ने तैयार किया है लेकिन संबंधित सरकारी अधिकारियों की मंजूरी मिलने के बाद ही इसका उत्पादन शुरू हो सकेगा। उन्होंने बताया कि मास्क से बनने वाला विद्युत चुंबकीय क्षेत्र इसको पहनने वाले के पास आने वाले सार्स-2 सहित किसी भी वायरस को नष्ट कर देता है। अधिकारी ने बताया, ‘‘मास्क खुद चार्ज होता है।’’ उन्होंने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक मास्क इस समय बाजार में मौजूद तीन परत वाले सर्जिकल मास्क से अधिक प्रभावी हैं। विश्वविद्यालय के प्रो वाइस चांसलर चिरंजीब भट्टाचार्य ने कहा, ‘‘डिजाइन तैयार है लेकिन हमें इसे आगे ले जाने की जरूरत है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) जैसे संगठनों की सहमति मिलने के बाद हमें इसका नमूना बनाना होगा। इसके बाद हम औपचारिक रूप से चिकित्सा उपकरण के तौर पर इसके उत्पादन के बारे में सोचेंगे।’’ उन्होंने कहा कि कीमत और अन्य पहलुओं पर यह प्रक्रिया पूरी होने के बाद विचार किया जाएगा।
हेल्थ मिशन, कोरोना वैक्सीन से लेकर नयी साइबर सुरक्षा नीति तक: लाल किले से पीएम मोदी के बड़े ऐलान
नयी दिल्ली : आज देश 74वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। स्वतंत्रता दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराया और कई बड़े ऐलान किए। कोरोना वैक्सीन कब आएगी से लेकर नेशनल हेल्थ मिशन जैसी योजना के शुरू होने तक, पीएम मोदी के भाषण में आज बहुत कुछ था। जल से लेकर थल तक कैसे डिजिटली देश सुरक्षित रहेगा, मोदी ने इसका भी एक खाका पेश किया। प्रधानमंत्री ने देसी कोरोना वैक्सीन पर चर्चा करते हुए कहा कि तीन-तीन कोरोना वैक्सीनों का ट्रायल चल रहा है। लाल किले की प्राचीर से सुबह साढ़े सात से नौ बजे तक करीब डेढ़ घंटे लंबे भाषण के दौरान जानिए प्रधानमंत्री मोदी ये दस ऐलान किए –
नयी साइबर सुरक्षा नीति
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि देश में नई राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा रणनीति का मसौदा तैयार कर लिया गया है। भारत इस संदर्भ में सचेत है, सतर्क है और इन खतरों का सामना करने के लिए फैसले ले रहा है और नई-नई व्यवस्थाएं भी लगातार विकसित कर रहा है। आने वाले समय में नई साइबर सिक्योरिटी नीति लाई जाएगी।
कोरोना वैक्सीन
प्रधानमंत्री मोदी ने लाल किले की प्राचीर से देश को बताया कि आज भारत में कोराना की एक नहीं, दो नहीं, तीन-तीन वैक्सीन्स इस समय टेस्टिंग के चरण में हैं। उन्होंने कहा कि जैसे ही वैज्ञानिकों से हरी झंडी मिलेगी, देश में उन वैक्सीन्स की बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन की भी तैयारी है।
नेशनल डिजिटल हेल्थ मिशन
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहला बड़ा एलान नेशनल डिजिटल हेल्थ मिशन को लेकर किया। उन्होंने कहा कि आज से देश में एक और बहुत बड़ा अभियान शुरू होने जा रहा है। ये है नेशनल डिजिटल हेल्थ मिशन। हर भारतीय को एक हेल्थ कार्ड मिलेगा। आपके हर टेस्ट, हर बीमारी, आपको किस डॉक्टर ने कौन सी दवा दी, कब दी, आपकी रिपोर्ट्स क्या थीं, ये सारी जानकारी इसी एक हेल्थ कार्ड में समाहित होगी। भारत के हेल्थ सेक्टर में यह योजना नई क्रांति लेकर आएगी।
लक्षद्वीप की इंटरनेट कनेक्टिविटी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि अगले 1000 दिन में, लक्षद्वीप को भी सबमरीन ऑप्टिकल फाइबर केबल से जोड़ दिया जाएगा। उन्होने कहा कि हमारे देश में 1300 से ज्यादा आइलैंड्स हैं। इनमें से कुछ चुनिंदा आइलैंड्स को, उनकी भौगोलिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए, देश के विकास में उनके महत्व को ध्यान में रखते हुए, नई विकास योजनाएं शुरू करने पर काम चल रहा है।
एनसीसी का विस्तार
प्रधानमंत्री मोदी ने नेशनल कैडेड कोर (एनसीसी) के विस्तार का ऐलान किया। उन्होंने देश को बताया कि अब एनसीसी का विस्तार देश के 173 सीमाओं और तटीय जिलों तक सुनिश्चित किया जाएगा। इस अभियान के तहत करीब 1 लाख नए एनसीसी कैडेट्स को विशेष ट्रेनिंग दी जाएगी। इसमें भी करीब एक तिहाई बेटियों को ये स्पेशल ट्रेनिंग दी जाएगी।
6- ऑप्टिकल फाइबर का जाल: प्रधानमंत्री मोदी ने इंटरनेट सुविधा पहुंचाने के लिए देश के हर गांव को ऑप्टिकल फाइबर से जोड़ने का एलान किया। उन्होंने कहा कि आने वाले एक हजार दिन में इस लक्ष्य को पूरा किया जाएगा। साल 2014 से पहले देश की सिर्फ 5 दर्जन पंचायतें ऑप्टिल फाइबर से जुड़ी थीं। बीते पांच साल में देश में डेढ़ लाख ग्राम पंचायतों को ऑप्टिकल फाइबर से जोड़ा गया है।
मल्टी मॉडल कनेक्टिविटी इंफ्रास्ट्रक्चर
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि पूरे देश को मल्टी मॉडल कनेक्टिविटी इंफ्रास्ट्रक्चर से जोड़ने की एक बहुत बड़ी योजना तैयार की गई है। इस पर देश 100 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। अलग-अलग सेक्टर्स के लगभग 7 हजार प्रोजेक्ट्स को चिन्हित भी किया जा चुका है। ये एक तरह से इंफ्रास्ट्रक्च र में एक नई क्रांति की तरह होगा।
प्रोजेक्ट लॉयन और डॉल्फिन
प्रधानमंत्री मोदी ने प्रोजेक्ट लॉयन और डॉल्फिन का एलान किया। उन्होंने कहा कि अपनी बायोडायवर्सिटी के संरक्षण और संवर्धन के लिए भारत पूरी तरह संवेदनशील है। बीते कुछ समय में देश में शेरों की, टाइगर की आबादी तेज गति से बढ़ी है। अब देश में हमारे एशियाई शेरों के लिए एक प्रोजेक्ट लॉयन की भी शुरूआत होने जा रही है। वहीं डॉल्फिन के संरक्षण के लिए भी प्रोजेक्ट चलाने पर जोर दिए।
प्रदूषण के खिलाफ अभियान
प्रधानमंत्री मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर शहरों से प्रदूषण खत्म करने की योजना की भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि देश के 100 चुने हुये शहरों में प्रदूषण कम करने के लिए एक समग्र दृष्टिकोण के साथ एक विशेष अभियान पर भी काम हो रहा है।
पड़ोसियों के साथ मजबूत रिश्तों पर जोर
प्रधानमंत्री मोदी ने पड़ोसियों के साथ रिश्तों की मजबूती और उसके विस्तार पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि हमारे पड़ोसी देशों के साथए चाहे वो हमसे जमीन से जुड़े हों या समंदर से, अपने संबंधों को हम सुरक्षा, विकास और विश्वास की साझेदारी के साथ जोड़ रहे हैं। आज पड़ोसी सिर्फ वो ही नहीं हैं जिनसे हमारी भौगोलिक सीमाएं मिलती हैं, बल्कि वे भी हैं जिनसे हमारे दिल मिलते हैं। जहां रिश्तों में समरसता होती हैए मेल जोल रहता है। (इनपुट एजेंसी से)
जानिए राष्ट्रगीत और राष्ट्रगान का अन्तर
‘राष्ट्रगीत’ और ‘राष्ट्रगान’ देश के उन धरोहरों में से हैं, जिनसे देश की पहचान जुड़ी होती है। प्रत्येक राष्ट्र के ‘राष्ट्रगीत’ और ‘राष्ट्रगान’ की भावनाएं भले ही अलग हों, लेकिन उनसे राष्ट्रभक्ति की भावना की ही अभिव्यक्ति होती है। स्वतंत्रता दिवस
की 74वीं वर्षगांठ के मौके पर हम आपको बताने जा रहे हैं भारत के ‘राष्ट्रगीत’ और ‘राष्ट्रगान’ के बारे में, जिसको लेकर लोग अक्सर संशय में पड़ जाते हैं। दरअसल, दोनों के प्रति लोगों के मन में सम्मान का भाव रहता है, लेकिन कई बार लोग ठीक से बता नहीं पाते। तो चलिए सबसे पहले जानते हैं भारत के राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के बारे में…
क्या है भारत का राष्ट्रगान?
जन-गण-मन अधिनायक जय हे
भारत भाग्य विधाता।
पंजाब-सिंधु-गुजरात-मराठा
द्राविड़-उत्कल-बंग
विंध्य हिमाचल यमुना गंगा
उच्छल जलधि तरंग
तव शुभ नामे जागे, तव शुभ आशीष मांगे
गाहे तव जय-गाथा।
जन-गण-मंगलदायक जय हे भारत भाग्य विधाता।
जय हे, जय हे, जय हे,
जय जय जय जय हे।
यह भारत का राष्ट्रगान है, जिसे अनेक अवसरों पर बजाया या गाया जाता है। इसकी रचना प्रख्यात कवि रविंद्रनाथ टैगोर ने की थी। यह मूल रूप से बांग्ला भाषा में लिखा गया था, लेकिन बाद में इसका हिंदी और अंग्रेजी में भी अनुवाद कराया गया। रविंद्रनाथ टैगोर ने राष्ट्रगान की रचना वर्ष 1911 में ही कर ली थी। इसे पहली बार 27 दिसंबर, 1911 को कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की बैठक में गाया गया था। 24 जनवरी, 1950 को संविधान सभा द्वारा इसे स्वीकार किया गया। राष्ट्रगान के पूरे संस्करण को गाने में कुल 52 सेकेंड का समय लगता है।
राष्ट्रगान बजते समय ये सावधानी बरतना न भूलें
अधिकतर लोगों को नहीं पता होता कि राष्ट्रगान बजते समय क्या सावधानी बरतनी चाहिए। दरअसल, राष्ट्रगान जब भी कहीं बजाया जाता है तो देश के प्रत्येक नागरिक का ये कर्तव्य होता है कि वो अगर कहीं बैठा हुआ है तो उस जगह पर खड़ा हो जाए और सावधान मुद्रा में रहे। साथ ही नागरिकों से ये भी अपेक्षा की जाती है कि वो भी राष्ट्रगान को दोहराएं।
क्या है राष्ट्रगान ‘जन-गण-मन’ का अर्थ?
राष्ट्रगान वैसे तो मूल रूप से बांग्ला भाषा में लिखा गया था, जिसमें सिंध का भी नाम था। लेकिन बाद में इसमें संशोधन कर सिंध की जगह सिंधु कर दिया गया, क्योंकि देश के विभाजन के बाद सिंध पाकिस्तान का एक अंग हो चुका था।
राष्ट्रगान को अगर हम हिंदी में अनूदित करें तो इसका मतलब होता है…
‘सभी लोगों के मस्तिष्क के शासक, कला तुम हो,
भारत की किस्मत बनाने वाले।
तुम्हारा नाम पंजाब, सिन्धु, गुजरात और मराठों के दिलों के साथ ही बंगाल, ओडिसा, और द्रविड़ों को भी उत्तेजित करता है,
इसकी गूंज विन्ध्य और हिमालय के पहाड़ों में सुनाई देती है।
गंगा और जमुना के संगीत में मिलती है और भारतीय समुद्र की लहरों द्वारा गुणगान किया जाता है।
वो तुम्हारे आशीर्वाद के लिये प्रार्थना करते हैं और तुम्हारी प्रशंसा के गीत गाते हैं।
तुम्हारे हाथों में ही सभी लोगों की सुरक्षा का इंतजार है,
तुम भारत की किस्मत को बनाने वाले।
जय हो जय हो जय हो तुम्हारी।’
भारत का राष्ट्रगीत क्या है?
भारत का राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ है। इसके रचयिता बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय हैं। उन्होंने इसकी रचना साल 1882 में संस्कृत और बांग्ला मिश्रित भाषा में किया था। यह स्वतंत्रता की लड़ाई में लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत था। इसे भी भारत के राष्ट्रगान ‘जन-गण-मन’ के बराबर का ही दर्जा प्राप्त है। इसे पहली बार साल 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सत्र में गाया गया था। राष्ट्रगीत की अवधि लगभग 52 सेकेंड है। राष्ट्रगीत कुछ इस प्रकार है…
वंदे मातरम्, वंदे मातरम्!
सुजलाम्, सुफलाम्, मलयज शीतलाम्,
शस्यश्यामलाम्, मातरम्!
वंदे मातरम्!
शुभ्रज्योत्सनाम् पुलकितयामिनीम्,
फुल्लकुसुमित द्रुमदल शोभिनीम्,
सुहासिनीम् सुमधुर भाषिणीम्,
सुखदाम् वरदाम्, मातरम्!
वंदे मातरम्, वंदे मातरम्॥
राष्ट्रगीत का हिंदी अनुवाद
मैं आपके सामने नतमस्तक होता हूं। ओ माता,
पानी से सींची, फलों से भरी,
दक्षिण की वायु के साथ शांत,
कटाई की फसलों के साथ गहरा,
माता!
उसकी रातें चांदनी की गरिमा में प्रफुल्लित हो रही है,
उसकी जमीन खिलते फूलों वाले वृक्षों से बहुत सुंदर ढकी हुई है,
हंसी की मिठास, वाणी की मिठास,
माता, वरदान देने वाली, आनंद देने वाली।
वंदे मातरम्’ पर विवाद
‘वंदे मातरम्’ पर विवाद बहुत पहले से चला आ रहा है। इसका चयन राष्ट्रगान के तौर पर हो सकता था, लेकिन कुछ मुस्लिमों के विरोध के कारण इसे राष्ट्रगान का दर्जा नहीं मिला। दरअसल, मुस्लिमों का कहना था कि इस गीत में मां दुर्गा की वंदना की गई है और उन्हें राष्ट्र के रूप में देखा गया है, जबकि इस्लाम में किसी व्यक्ति या वस्तु की पूजा करना गलत माना गया है।
(साभार – अमर उजाला)
गदर के फूल : उस जगह की कहानी जहाँ अंग्रेजों ने दो स्वतन्त्रता सेनानियों को फाँसी पर लटकाया था
अयोध्या : राम मंदिर भूमि पूजन के लिए 5 अगस्त को अयोध्या पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सिर जिस हनुमान गढ़ी पर मुकुट सजाया गया, किलेनुमा यही गढ़ी 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की धुरी थी। अयोध्या से पचीस कोस यानी करीब 75 किमी की दूरी पर सुरहुरपुर गांव है, यह गांव पहले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शहीद मंगल पाण्डेय की जन्मस्थली भी है। शायद इसीलिए तब यहां के लोगों में बगावत का जोश और आजादी की चाह कुछ ज्यादा ही थी।
इसी हनुमान गढ़ी के महंत बाबा रामचरण दास ने अपने मुस्लिम दोस्त अमीर अली के साथ मिलकर स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का नेतृत्व किया था। बाबा रामचरण दास ने श्रीराम जन्मभूमि जमीन को मुसलमान भाइयों की आम सहमति से हिंदुओं को सौंप देने की सौगंध बादशाही मस्जिद में खाई थी और समूचे अवध के मुसलमानों को भी ये कसम खिलाई थी।
यहीं श्रीराम जन्मभूमि मंदिर परिसर स्थित जिस जगह पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 5 अगस्त को पारिजात का पौधा लगाया है, ठीक उसी जगह पर 85 साल पहले तक एक इमली का पेड़ था, जिस पर 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में बाबा रामचरण दास और अमीर अली की जोड़ी को अंग्रेजों ने फंसी के फंदे पर लटका दिया था।
इसके पीछे वजह यह थी कि रामचरण दास और अमीर अली श्रीराम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद को आम सहमति से हल करने के करीब थे। इसके अलावा वे आजादी की लड़ाई में भी शरीक थे।
कुबैर टीले पर स्थित जिस इमली के पेड़ पर दोनों वीरों को लटकाया गया था, अयोध्या और आसपास के लोग बहुत दिनों तक उस पेड़ की पूजा करते रहे, लेकिन 28 जनवरी 1935 को फैजाबाद के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर जेपी निकल्सन ने उस इमली के पेड़ को जड़ से कटवा दिया। इसके साथ ही अयोध्या के वीर शहीदों की शांति स्मृति को अंग्रेजों ने मिटा डाला। इस बात का जिक्र साहित्यकार अमृतलाल नागर ने अपनी किताब “गदर के फूल” में जिक्र किया है।
अमृतलाल नगर ने अपनी किताब में लिखा है कि चौबीस तोपों वाली इस किलेनुमा गढ़ी के महंत रामचरण दास की अगुवाई में अवध की सरजमीं पर लड़ा गया 1857 का स्वतंत्रता संग्राम यदि सफल हो गया होता तो अवध के मुसलमानों ने बाबरी मस्जिद का ढांचा अपने हाथों ढहाकर श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के लिए रामकोट मुहल्ले की समस्त विवादित जमीन हिंदुओं को सौंप दी होती। नागर ने लिखा है कि 1857 का नायक फौज का सिपाही था और अवध के हाथ में गदर की कमान थी।
वरिष्ठ पत्रकार डॉ. उपेंद्र बताते हैं कि आज के ही दिन 32 साल पहले (15 अगस्त, 1988 ) जाने माने पुरातत्ववेत्ता और साहित्यकार अमृतलाल नागर ने इसी हनुमानगढ़ी के परिसर में मुझे युनाइटेड प्राविंस आफ अवध एंड आगरा (यूपी) के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की रोमांचकारी कहानी स्वयं सुनाई थी।
उन्होंने यह भी बताया था कि प्रथम स्वतंत्रता सेनानी मंगल पाण्डेय अवध क्षेत्र के सुरहुरपुर गांव के रहने वाले थे। बाद में अमृतलाल नागर के उन सभी दावों को सप्रमाण उत्तर प्रदेश सरकार के सूचना और प्रकाशन विभाग ने “गदर के फूल” शीर्षक से किताब में प्रकाशित भी किया। इस किताब को सन सत्तावन क्रांति के 100 साल होने मौके पर 1957 में प्रकाशित किया गया था।
डॉ. उपेंद्र कहते हैं कि अमृतलाल जी ने ये भी बताया था कि शहीद मंगल पाण्डेय के भतीजे बुझावन पाण्डेय भी भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के शुरुआती दौर में शामिल थे। बुझावन पाण्डेय भी श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति संग्राम हिंदू-मुस्लिम भाईचारे के बलबूते सुलझा लेने वाले सेनानियों में शामिल थे।
बैरकपुर में मंगल पाण्डेय ने विद्रोह की जो चिंगारी जलाई, उसकी सभी योजनाएं अयोध्या (फैजाबाद) में बनाई गई थीं, कानपुर में उन्हें विकसित किया गया और बैरकपुर में उन्हें संचालित किया गया। इस विद्रोह की बिगुल फूंकने की योजना भी अयोध्या से ही थी, लेकिन संयोग-बस इसका सूत्रपात मेरठ से हो गया।

अमृतलाल नागर ने अपने शोध के जरिए यह भी सिद्ध किया है कि मंगल पाण्डेय अयोध्या के अकबरपुर (अब अम्बेडकर नगर जिला मुख्यालय) में ही फौज में भर्ती हुए थे। कर्नल मार्टिन ने फैजाबाद के सैनिक अधिकारी कर्नल हंट को रिपोर्ट भेजी कि फैजाबाद में बागियों का अड्डा कायम हो गया है।
‘गदर के फूल’ किताब में अमृतलाल नागर ने इस बात का भी जिक्र किया है कि 26 जून 1857 को अयोध्या (तत्कालीन फैजाबाद) की सबसे प्रतिष्ठित व मुख्य नवाबी मुस्लिम इबादतगाह बादशाही मस्जिद में एक बड़ी सभा बुलाई गई थी। इस सभा को मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर के हकीकी दामाद ने बुलाई थी।
इसी मस्ंजिदे मजलिस में मौलाना अमीर अली ने मुसलमानों को ऐलानिया तौर पर बाबर की बनवाई मस्जिद पर श्रीराम जन्मभूमि मंदिर बनवाने का मुस्लिम मजलिस से हामीनामा करा लिया था।
किताब में इस बात का भी जिक्र है कि बाबा रामचरण दास और अमीर अली ने अयोध्या की श्रीराम जन्मभूमि को हिन्दुओं को वापस दिलाने के लिए मुसलमानों को राजी कर लिया था, जिसके बाद अंग्रेजों में बुरी तरह घबराहट फैल गई थी। विद्रोहियों को सफल होते देखकर अंग्रेजों के हौसले परस्त हो रहे थे। अंग्रेजों से अधिक वे घबरा गए थे, जो देश के गद्दार थे, जो अंग्रेजी सेना का साथ दे रहे थे।
किताब में जिक्र है कि सभा में उत्तेजित भीड़ को शांत करते हुए अमीर अली ने कहा, “भाइयों, बहादुर हिंदू हमारी सल्तनत को हिंद में मजबूत करने के लिए लड़ रहे हैं। इनके दिल पर काबू पाने और इनके अहसानों का बोझ अपने सर से उतार देने के लिए हमारा फर्ज है कि अयोध्या की श्री राम जन्मभूमि, जिसे हम बाबरी मस्जिद कहते हैं, जो हकीकत में रामचन्द्र जी की जन्मभूमि है, इनके मन्दिर को जमींदोज करके शहंशाहे हिंद बादशाह बाबर ने मस्जिद बनवाई थी, इसे हिन्दुओं को वापस दे दें। इससे हिन्दू-मुस्लिम इत्तिहाद की जड़ इतनी मजबूत हो जाएगी, जिसे अंग्रेजों के बाप भी नहीं उखाड़ सकेंगे।”
डॉ. उपेंद्र बताते हैं कि नागर फिर 1989 में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर शिलान्यास आंदोलन के दौरान भी रामकोट और हनुमान गढ़ी पहुंचे थे। तब मैं यहां कवरेज के लिए मौजूद था। इस दौरान उन्होंने मुझसे श्रीरामजन्म भूमि आंदोलन और प्रथम स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के आपसी कनेक्शन को विस्तार से समझाया था।
अमृतलाल जी का गला रुंध गया था, जब वे बयां कर रहे थे, ”दुष्ट अंग्रेज राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद को सुलझने नहीं देना चाहते थे, इसीलिए पहले उन्होंने रामचरण दास और अमीर अली को फांसी पर लटका दिया, फिर फांसी की गवाह इमली के पेड़ को काट डाला।”
दरअसल, प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के 100 साल होने के मौके पर 1957 में उत्तर प्रदेश सरकार ने स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े स्थलों और जीवित व्यक्तियों से जुड़े इतिहास को संजोने के लिए एक पुस्तक छापने का फैसला किया था। यह जिम्मेदारी मिली साहित्यकार अमृतलाल नागर को, उन्होंने जगह-जगह घूमकर साक्ष्य और तथ्य जुटाए और बाद में रिपोर्ताज शैली में ”गदर के फूल” किताब लिखी।
(साभार – दैनिक भास्कर)
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कोरोना योद्धाओं की मदद करेगी बंगाल सरकार
कोलकाता : अपनी जान की चिंता किये बिना दूसरे के लिए काम में जुटे कोरोना वॉरियर्स योद्धाओं (Corona Warriors) के लिए राज्य सरकार की तरफ से एक और अहम घोषणा की गयी है। जानकारी के मुताबिक अगर कोरोना से लड़ाई के दौरान किसी कोरोना वॉरियर की जान जाती है तो उसके परिवार के किसी एक सदस्य को सरकारी नौकरी दी जायेगी। इस कोरोना काल में डॉक्टर, नर्स एवं स्वास्थ्य कर्मी के अलावा कई लोग ऐसे हैं जो फ्रंटफुट पर काम कर रहे हैं। अपनी जान की चिंता किये बिना ही ये लोग लोगों की सहायता में लगे हैं। ऐसे कोरोना योद्धाओं के लिए सरकार की तरफ से उक्त निर्णय लिया गया है। अगर कोरोना से लड़ाई में कोरोना वॉरियर की जान जाती है या उनकी शारीरिक क्षमता बेहद कमजोर हो जाती है तो उनके परिवार के एक सदस्य को राज्य सरकार नौकरी देगी।
सूत्रों के मुताबिक सरकार की तरफ से जारी विज्ञप्ति में कहा गया है कि सरकारी कार्यालय में कार्यरत अस्थायी कर्मचारी, जो कोरोना युद्ध में शामिल हैं, उनकी मौत या फिर आजीवन उनकी शारीरिक क्षमता कमजोर होने पर सरकार उनके परिवार के सदस्य को नौकरी देगी। नेशनल हेल्थ मिशन के कर्मचारी, आंगनवाड़ी कर्मी एवं सिविक वॉलिंटीयर्स सरकार की इस योजना में शामिल रहेंगे।
9 सितंबर 2005 से पहले पिता की मृत्यु तो भी बेटी को पैतृक संपत्ति में अधिकार : सुप्रीम कोर्ट
नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के हक में एक बड़ा फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा है कि पिता के पैतृक की संपत्ति में बेटी का बेटे के बराबर हक है, थोड़ा सा भी कम नहीं। उसने कहा कि बेटी जन्म के साथ ही पिता की संपत्ति में बराबर का हकददार हो जाती है। देश की सर्वोच्च अदालत की तीन जजों की पीठ ने आज स्पष्ट कर दिया कि भले ही पिता की मृत्यु हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) कानून, 2005 लागू होने से पहले हो गई हो, फिर भी बेटियों को माता-पिता की संपत्ति पर अधिकार होगा।
बेटी की मृत्यु हुई तो उसके बच्चे हकदार
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि पिता की पैतृक संपत्ति में बेटी को अपने भाई से थोड़ा भी कम हक नहीं है। उसने कहा कि अगर बेटी मृत्यु भी 9 सितंबर, 2005 से पहले हो जाए तो भी पिता की पैतृक संपत्ति में उसका हक बना रहता है। इसका मतलब यह है कि अगर बेटी के बच्चे चाहें कि वो अपनी मां के पिता (नाना) की पैतृक संपत्ति में हिस्सेदारी लें तो वो इसका दावा ठोक सकते हैं, उन्हें अपनी मां के अधिकार के तौर पर नाना की पैतृक संपत्ति में हिस्सेदारी मिलेगी।
क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?
देश में 9 सितंबर, 2005 से हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) कानून, 2005 लागू हुआ है। इसका मतलब है कि अगर पिता की मृत्यु 9 सितंबर, 2005 से पहले हो गई हो तो भी बेटियों को पैतृक संपत्ति पर अधिकार होगा। जस्टिस अरुण मिश्री की अगुवाई वाली तीन जजों की बेंच ने यह महत्वपूर्ण फैसला दिया। जस्टिस मिश्रा ने फैसला पढ़ते हुए कहा, ‘बेटियों को बेटों के बराबर अधिकार देना हो होगा क्योंकि बेटी पूरी जिंदगी दिल के करीब रहती है। बेटी आजीवन हमवारिस ही रहेगी, भले ही पिता जिंदा हों या नहीं।’
पहले क्या था नियम?
हिंदू सक्सेशन ऐक्ट, 1956 में साल 2005 में संशोधन कर बेटियों को पैतृक संपत्ति में समान हिस्सा पाने का कानूनी अधिकार दिया गया। इसके तहत, बेटी तभी अपने पिता की संपत्ति में अपनी हिस्सेदारी का दावा कर सकती है जब पिता 9 सितंबर, 2005 को जिंदा रहे हों। अगर पिता की मृत्यु इस तारीख से पहले हो गई हो तो बेटी का पैतृक संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं होगा। अब सुप्रीम कोर्ट ने इसे बदलते हुए कहा कि पिता की मृत्यु से इसका कोई लेन-देन नहीं है। अगर पिता 9 सितंबर, 2005 को जिंदा नहीं थे, तो भी बेटी को उनकी पैतृक संपत्ति में अधिकार मिलेगा। यानी, 9 सितंबर, 2005 से पहले पिता की मृत्यु के बावजूद बेटी का हमवारिस (Coparecenor) होने का अधिकार नहीं छिनेगा।
HUF फैमिली और हमवारिस
हमवारिस या समान उत्तराधिकारी वे होते/होती हैं जिनका अपने से पहले की चार पीढ़ियों की अविभाजित संपत्तियों पर हक होता है। 2005 से पहले हिंदू उत्तराधिकार कानून में बेटियां सिर्फ हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) की सदस्य मानी जाती थीं, हमवारिस यानी समान उत्तराधिकारी नहीं। हालांकि, बेटी का विवाह हो जाने पर उसे हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) का भी हिस्सा नहीं माना जाता है। 2005 के संशोधन के बाद बेटी को हमवारिस यानी समान उत्तराधिकारी माना गया है। अब बेटी के विवाह से पिता की संपत्ति पर उसके अधिकार में कोई बदलाव नहीं आता है। यानी, विवाह के बाद भी बेटी का पिता की संपत्ति पर अधिकार रहता है।
2005 के संशोधन की बड़ी बातें
इसके तहत महिलाओं को पैतृक संपत्ति में बेटे के बराबर अधिकार दे दिया गया और तमाम भेदभाव को खत्म कर दिया गया। बेटी को पैतृक संपत्ति में जन्म से ही साझीदार बना दिया गया। बेटी और बेटे जन्म से पिता और पैतृक संपत्ति में बराबर के अधिकारी बना दिए गए। इसके तहत बेटियों को इस बात का भी अधिकार दिया गया कि वह कृषि भूमि का बंटवारा करवा सकती है। साथ ही शादी टूटने की स्थिति में वह पिता के घर जाकर बेटे के समान बराबरी का दर्जा पाते हुए रह सकती है यानी पिता के घर में भी उसका उतना ही अधिकार होगा जिनता बेटे को है। बेटे और बेटी दोनों को जन्म से ही बराबरी का दर्जा दे दिया गया।
बेटी कब पैदा हुई, कोई फर्क नहीं
हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) कानून, 2005 कहता है कि कोई फर्क नहीं पड़ता है कि बेटी का जन्म 9 सितंबर, 2005 से पहले हुआ है या बाद में, पिता की संपत्ति में उसका हिस्सा भाई के बराबर ही होगा। वह संपत्ति चाहे पैतृक हो या फिर पिता की अपनी कमाई से अर्जित। हिंदू लॉ में संपत्ति को दो श्रेणियों में बांटा गया है- पैतृक और स्वअर्जित। पैतृक संपत्ति में चार पीढ़ी पहले तक पुरुषों की वैसी अर्जित संपत्तियां आती हैं जिनका कभी बंटवारा नहीं हुआ हो। ऐसी संपत्तियों पर संतानों का, वह चाहे बेटा हो या बेटी, जन्मसिद्ध अधिकार होता है। 2005 से पहले ऐसी संपत्तियों पर सिर्फ बेटों को अधिकार होता था, लेकिन संशोधन के बाद पिता ऐसी संपत्तियों का बंटवारा मनमर्जी से नहीं कर सकता। यानी, वह बेटी को हिस्सा देने से इनकार नहीं कर सकता। कानून बेटी के जन्म लेते ही, उसका पैतृक संपत्ति पर अधिकार हो जाता है।
पिता की स्वअर्जित संपत्ति
स्वअर्जित संपत्ति के मामले में बेटी का पक्ष कमजोर होता है। अगर पिता ने अपने पैसे से जमीन खरीदी है, मकान बनवाया है या खरीदा है तो वह जिसे चाहे यह संपत्ति दे सकता है। स्वअर्जित संपत्ति को अपनी मर्जी से किसी को भी देना पिता का कानूनी अधिकार है। यानी, अगर पिता ने बेटी को खुद की संपत्ति में हिस्सा देने से इनकार कर दिया तो बेटी कुछ नहीं कर सकती है।
अगर वसीयत लिखे बिना पिता की मौत हो जाती है
अगर वसीयत लिखने से पहले पिता की मौत हो जाती है तो सभी कानूनी उत्तराधिकारियों को उनकी संपत्ति पर समान अधिकार होगा। हिंदू उत्तराधिकार कानून में पुरुष उत्तराधिकारियों का चार श्रेणियों में वर्गीकरण किया गया है और पिता की संपत्ति पर पहला हक पहली श्रेणी के उत्तराधिकारियों का होता है। इनमें विधवा, बेटियां और बेटों के साथ-साथ अन्य लोग आते हैं। हरेक उत्तराधिकारी का संपत्ति पर समान अधिकार होता है। इसका मतलब है कि बेटी के रूप में आपको अपने पिता की संपत्ति पर पूरा हक है।
अगर बेटी विवाहित हो
2005 से पहले हिंदू उत्तराधिकार कानून में बेटियां सिर्फ हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) की सदस्य मानी जाती थीं, हमवारिस यानी समान उत्तराधिकारी नहीं। हमवारिस या समान उत्तराधिकारी वे होते/होती हैं जिनका अपने से पहले की चार पीढ़ियों की अविभाजित संपत्तियों पर हक होता है। हालांकि, बेटी का विवाह हो जाने पर उसे हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) का भी हिस्सा नहीं माना जाता है। 2005 के संशोधन के बाद बेटी को हमवारिस यानी समान उत्तराधिकारी माना गया है। अब बेटी के विवाह से पिता की संपत्ति पर उसके अधिकार में कोई बदलाव नहीं आता है। यानी, विवाह के बाद भी बेटी का पिता की संपत्ति पर अधिकार रहता है।
आसान भाषा में समझें बेटियों को पैतृक सम्पत्ति में हक पर सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू पैतृक संपत्ति के बंटवारे में पुरुषों की प्राथमिकता को सिरे से खत्म करते हुए मंगलवार को एक बड़ा फैसला दिया। कोर्ट ने कहा कि बेटियों का पिता, दादा और पड़दादा की संपत्तियों में 1956 से ही बेटों जैसा अधिकार होगा। 1956 में ही हिंदू उत्तराधिकार कानून लागू हुआ था।
नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच ने मंगलवार को पैतृक संपत्ति में बेटियों के हक पर बड़ा फैसला दिया। इसके साथ ही पीठ ने कहा कि यह लैंगिक समानता हासिल करने की दिशा में बड़ा कदम है। हालांकि, पीठ ने कहा कि इसमें देरी हो गई। इसने कहा, ‘लैंगिक समानता का संवैधानिक लक्ष्य देर से ही सही, लेकिन पा लिया गया है और विभेदों को 2005 के संशोधन कानून की धारा 6 के जरिए खत्म कर दिया गया है। पारंपरिक शास्त्रीय हिंदू कानून बेटियों को हमवारिस होने से रोकता था जिसे संविधान की भावना के अनुरूप प्रावधानों में संशोधनों के जरिए खत्म कर दिया गया है।’ आइए जानते हैं सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर 10 बड़े सवालों के जवाब…
1. सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पैतृक संपत्ति में बेटियों का बेटों के बराबर अधिकार होता है। उसने पैतृक संपत्ति पर बेटियों को अधिकार को जन्मजात बताया। मतलब, बेटी के जन्म लेते ही उसका अपने पिता की पैतृक संपत्ति पर अधिकार हो जाता है, ठीक वैसे जैसे एक पुत्र जन्म के साथ ही अपने पिता की पैतृक संपत्ति का दावेदार बन जाता है।
2. सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा क्यों कहा?
सुप्रीम कोर्ट के सामने यह सवाल उठा कि क्या हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) कानून, 2005 के प्रावधानों को पिछली तारीख (बैक डेट) से प्रभावी माना जाएगा? इस सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हां, यह बैक डेट से ही लागू है। 121 पन्नों के अपने फैसले में तीन सदस्यीय पीठ के अध्यक्ष जस्टिस अरुण मिश्रा ने कहा, ‘हिंदू उत्तराधिकार कानून, 1956 की संशोधित धारा 6 संशोधन से पहले या बाद जन्मी बेटियों को हमवारिस (Coparcener) बनाती है और उसे बेटों के बराबर अधिकार और दायित्व देती है। बेटियां 9 सितंबर, 2005 के पहले से प्रभाव से पैतृक संपत्ति पर अपने अधिकार का दावा ठोक सकती हैं।’
3. 9 सितंबर, 2005 का मामला क्यों उठा?
इस तारीख को हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) कानून 2005 लागू हुआ था। दरअसल, हिंदू उत्तराधिकार कानून 1956 से अस्तित्व में है जिसे 2005 में संशोधित किया गया था। चूंकि 2005 के संशोधित कानून में कहा गया था कि इसके लागू होने से पहले पिता की मृत्यु हो जाए तो बेटी का संपत्ति में अधिकार खत्म हो जाता है। यानी, अगर पिता संशोधित कानून लागू होने की तारीख 9 सितंबर, 2005 को जिंदा नहीं थे तो बेटी उनकी पैतृक संपत्ति में हिस्सा नहीं मांग सकती है।
4. सुप्रीम कोर्ट के फैसले में वर्ष 1956 का जिक्र क्यों?
जैसा कि ऊपर बताया गया है- हिंदू उत्तराधिकार कानून, 1956 में ही आया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) कानून, 2005 की धारा 6 की व्याख्या करते हुए कहा कि बेटी को उसी वक्त से पिता की पैतृक संपत्ति में अधिकार मिल गया जबसे बेटे को मिला था, यानी साल 1956 से।
5. 20 दिसंबर, 2004 का जिक्र क्यों?
सुप्रीम कोर्ट ने बेटी को पिता की पैतृक संपत्ति में 1956 से हकदार बनाकर 20 दिसंबर, 2004 की समयसीमा इस बात के लिए तय कर दी कि अगर इस तारीख तक पिता की पैतृक संपत्ति का निपटान हो गया तो बेटी उस पर सवाल नहीं उठा सकती है। मतलब, 20 दिसंबर, 2004 के बाद बची पैतृक संपत्ति पर ही बेटी का अधिकार होगा। उससे पहले संपत्ति बेच दी गई, गिरवी रख दी गई या दान में दे दी गई तो बेटी उस पर सवाल नहीं उठा सकती है। दरअसल, हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) कानून, 2005 में ही इसका जिक्र है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इस बात को सिर्फ दोहराया है।
6. क्या बेटों के अधिकार पर ताजा फैसले का कोई असर होगा?
कोर्ट ने संयुक्त हिंदू परिवारों को हमवारिसों को ताजा फैसले से परेशान नहीं होने की भी सलाह दी। सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने कहा, ‘यह सिर्फ बेटियों के अधिकारों को विस्तार देना है। दूसरे रिश्तेदारों के अधिकार पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। उन्हें सेक्शन 6 में मिले अधिकार बरकरार रहेंगे।’
7. क्या बेटी की मृत्यु हो जाए तो उसके बच्चे नाना की संपत्ति में हिस्सा माँग सकते हैं?
इस बात पर गौर करना चाहिए कि कोर्ट ने पैतृक संपत्ति में बेटियों को बेटों के बराबर अधिकार दिया है। अब इस सवाल का जवाब पाने कि लिए एक और सवाल कीजिए कि क्या पुत्र की मृत्यु होने पर उसके बच्चों का दादा की पैतृक संपत्ति पर अधिकार खत्म हो जाता है? इसका जवाब है नहीं। अब जब पैतृक संपत्ति में अधिकार के मामले में बेटे और बेटी में कोई फर्क ही नहीं रह गया है तो फिर बेटे की मृत्यु के बाद उसके बच्चों का अधिकार कायम रहे जबकि बेटी की मृत्यु के बाद उसके बच्चों का अधिकार खत्म हो जाए, ऐसा कैसे हो सकता है? मतलब साफ है कि बेटी जिंदा रहे या नहीं, उसका पिता की पैतृक संपत्ति पर अधिकार कायम रहता है। उसके बच्चे चाहें कि अपने नाना से उनकी पैतृक संपत्ति में हिस्सेदारी ली जाए तो वो ले सकते हैं।
8. पैतृक सम्पत्ति क्या है?
पैतृक संपत्ति में ऊपर की तीन पीढ़ियों की संपत्ति शामिल होती है। यानी, पिता को उनके पिता यानी दादा और दादा को मिले उनके पिता यानी पड़दादा से मिली संपत्ति हमारी पैतृक संपत्ति है। पैतृक संपत्ति में पिता द्वारा अपनी कमाई से अर्जित संपत्ति शामिल नहीं होती है। इसलिए उस पर पिता का पूरा हक रहता कि वो अपनी अर्जित संपत्ति का बंटवारा किस प्रकार करें। पिता चाहे तो अपनी अर्जित संपत्ति में बेटी या बेटे को हिस्सा नहीं दे सकता है, कम-ज्यादा दे सकता है या फिर बराबर दे सकता है। अगर पिता की मृत्यु बिना वसीयतनामा लिखे हो जाए तो फिर बेटी का पिता की अर्जित संपत्ति में भी बराबर की हिस्सेदारी हो जाती है।
9. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में क्या कहा?
केंद्र सरकार ने भी सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के जरिए पैतृक संपत्ति में बेटियों की बराबर की हिस्सेदारी का जोरदार समर्थन किया। केंद्र ने कहा कि पैतृक संपत्ति में बेटियों का जन्मसिद्ध अधिकार है। जस्टिस मिश्रा ने इसकी व्याख्या करते हुए कहा कि बेटियों के जन्मसिद्ध अधिकार का मतलब है कि उसके अधिकार पर यह शर्त थोपना कि पिता का जिंदा होना जरूरी है, बिल्कुल अनुचित होगा। बेंच ने कहा, ‘बेटियों को जन्मजात अधिकार है न कि विरासत के आधार पर तो फिर इसका कोई औचित्य नहीं रह जाता है कि हिस्सेदारी में दावेदार बेटी का पिता जिंदा है या नहीं।’
10. बेटियां ताउम्र प्यारी… जैसी कौन सी टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने की?
सुप्रीम कोर्ट ने अभी अपनी तरफ से इस पर कुछ नहीं कहा। यह बात सुप्रीम कोर्ट ने 1996 में दिए गए फैसले के वक्त ही कही थी। तीन सदस्यीय पीठ के अध्यक्ष जस्टिस अरुण मिश्रा ने इसे दोहराया। उन्होंने कहा, ‘बेटा तब तक बेटा होता है जब तक उसे पत्नी नहीं मिलती है। बेटी जीवनपर्यंत बेटी रहती है।’ तीन सदस्यीय पीठ में जस्टिस एस. अब्दुल नजीर और जस्टिस एमआर शाह भी शामिल थे।
(साभार – नवभारत टाइम्स)
राधा भाटिया की किताब ‘लस्सी’ को मिला इंटरनेशनल कुक बुक अवार्ड
जब राधा भाटिया ने अपनी किताब लस्सी लिखने के बारे में सोचा तो उनके दिमाग में सबसे पहले आज की पीढ़ी के वे युवा आए तो लस्सी के बजाय स्मूदी पीना पसंद करते हैं।
वे लस्सी जैसे भारतीय पेय का स्वाद लेना ही नहीं चाहते। अपनी किताब के जरिये वे आज के युवाओं को पारम्परिक भोजन से परिचित कराना चाहती हैं। गैर मादक पेय यानी नॉन अल्कोहलिक ड्रिंक्स पर आधारित उनकी किताब को ’25 वां गोरमेंड वर्ल्ड कुकबुक अवार्ड 2020′ का सम्मान मिला। भारतीय व्यंजनों को बढ़ावा देने वाली यह किताब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी खास पहचान रखती है।
इस किताब में राधा ने 74 पारम्परिक भारतीय व्यंजन विधियाँ लिखी हैं। इसमें भारत के अलग-अलग राज्यों के पारंपरिक व्यंजनों को जगह मिली है। राधा के लिए यह सिर्फ एक किताब नहीं बल्कि एक दादी मां के द्वारा अपने पोता-पोतियों पर दर्शाया गया प्यार भी है। इसमें पांच पीढ़ियों की कहानियां और किचन के सीक्रेट शेयर किए गए हैं।
इस किताब में विभिन्न रेसिपीज को अलग-अलग कहानियों के साथ मिलाकर पाठकों के लिए प्रस्तुत किया गया है। लस्सी के माध्यम से राधा ने अलग-अलग मौसम में बनने वाली खास डिशेज की रेसिपी भी बताई है। मौसम से भारतीय खानपान के संबंध को जानने के लिए उनकी किताब उपयुक्त है।
उनकी किताब में पंजाब की सदाबहार मानी जाने वाली मीठी लस्सी से लेकर तमिलनाडु के ‘तालिचा मोर’ ड्रिंक को बनाने का तरीका बताया गया है। राधा द्वारा लिखी गई हर डिश का टेस्ट लाजवाब है जिसके कई सेहत से भरे फायदे भी हैं। राधा से जब ये पूछा जाता है कि इस किताब को लिखने का विचार उन्हें कैसे आया तो वे इतवार की उस दोपहर को याद करती हैं जब अपने पोता-पोतियों के साथ बैठ कर बातें कर रहीं थीं।
तब राधा ने अपने पोते से लस्सी के स्वाद के बारे में पूछा तो उसने ज्यादा रुचि नहीं दिखाई। लेकिन जब मैंने उनसे यह कहा कि लस्सी का स्वाद किसी स्मूदी से कम नहीं होता तो वे फौरन इस बारे में जानने के इच्छुक नजर आए। राधा कहती हैं उसी वक्त मैंने सोचा कि भारत के पारंपरिक स्वाद को आज की पीढ़ी तक पहुंचाने का इससे अच्छा माध्यम कोई और नहीं हो सकता।
राधा के अनुसार ये अवार्ड पूरी दुनिया के लोगों को भारत के खानपान के प्रति जागरूक करेगा। वैसे भी भारतीय खानपान यहां की विरासत का अभिन्न हिस्सा है इसलिए भारतीय व्यंजनों को सारी दुनिया के अलग-अलग रेस्टोरेंट में बनाया जाता है। हमारा देसी स्वाद विदेशियों को खूब पसंद आता है। हालांकि वे इंडियन डिशेज से जुड़ी कई सारे बातें नहीं जानते। वे इन व्यंजनों से सेहत को मिलने वाले फायदों से भी अपरिचित हैं। मुझे मिला ये अवार्ड उन सभी विदेशियों को भारतीय खानपान और इससे जुड़ी वो सारी बातें बताने में समर्थ होगा, जो उन्हें जानना चाहिए।
भारतीय व्यंजनों को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने में उनकी किताब लस्सी का अहम योगदान है। उन्हें उम्मीद है कि इस किताब को पढ़कर आज की पीढ़ी स्मूदी के बजाय लस्सी जैसे देसी ड्रिंक्स की ओर रूख करेगी।
(साभार -दैनिक भास्कर)










