बेंगलुरु : केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी और संचार मंत्री रविशंकर प्रसाद ने गुरुवार को कहा कि सरकार भारत को डाटा अर्थव्यवस्था के बहुत बड़े केंद्र के तौर पर विकसित करना चाहती है और बहुत जल्द डाटा सुरक्षा कानून को अंतिम रूप दिया जाएगा।
उन्होंने कहा, मैं भारत को डाटा अर्थव्यवस्था के बहुत बड़े केंद्र के तौर पर विकसित करना चाहता हूं। डाटा से डिजिटल अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी। यह अंतरराष्ट्रीय वाणिज्य को भी बढ़ाने में उपयोगी होगा।‘बेंगलुरु प्रौद्योगिकी सम्मेलन, 2020’ को डिजिटल माध्यम से संबोधित करते हुए प्रसाद ने कहा कि भारत में बड़े पैमाने पर डाटा का सृजन होता है और मोबाइल फोन और आधार जैसी डिजिटल व्यवस्था से डाटा तैयार होता है।
उन्होंने कहा, हम जल्द ही डाटा सुरक्षा कानून को अंतिम रूप देंगे।भारत डाटा अर्थव्यवस्था, डाटा नवाचार, डाटा परिशोधन के लिए क्रांति का इंतजार कर रहा है। प्रसाद ने कहा, मैं (कर्नाटक के) मुख्यमंत्री से यह सुनिश्चित करने का आग्रह करता हूं कि राज्य को भारत की डाटा अर्थव्यवस्था का बड़ा केंद्र बनाएं।
कर्नाटक सरकार के साथ कर्नाटक नवाचार और प्रौद्योगिकी सोसाइटी, सूचना प्रौद्योगिकी पर राज्य सरकार के दृष्टिकोण समूह, जैव-प्रौद्योगिकी और स्टार्टअप तथा सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क ऑफ इंडिया द्वारा आयोजित यह सम्मेलन आज 19 नवंबर से 21 नवंबर तक चलेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस सम्मेलन का उद्घाटन किया।
प्रसाद ने कहा कि महामारी के दौरान भी संचार क्षेत्र में सात प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि हुई और बड़ी वैश्विक कंपनियों ने निवेश किया। उन्होंने कहा, यह चुनौतीपूर्ण समय है और हमने इसे एक अवसर में बदलने का फैसला किया है।उन्होंने कहा कि विश्व स्तर की कंपनियां वैकल्पिक स्थान की तलाश कर रही हैं।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि मोबाइल निर्माण में भारत की बड़ी कामयाबी के मद्देनजर हम प्रोत्साहन देने के साथ उत्पादन को बढ़ावा दे रहे हैं। प्रसाद ने कहा कि भारत समेत दुनिया की बड़ी कंपनियों ने अगले पांच साल में 11 लाख करोड़ रुपए का निवेश करने की प्रतिबद्धता जताई है और मोबाइल तथा कल-पुर्जे के निर्माण की पेशकश की है। इसमें से सात लाख करोड़ रुपए केवल निर्यात के लिए होंगे।
डाटा सुरक्षा कानून को जल्द ही अंतिम रूप दिया जाएगा : रविशंकर प्रसाद
पाकिस्तान के स्वात में मिला 1300 साल पुराना हिन्दू मंदिर
स्वात : पश्चिमी पाकिस्तान के स्वात जिले के एक पहाड़ में पाकिस्तानी और इतालवी पुरातात्विक विशेषज्ञों ने 1,300 साल पुराने एक हिंदू मंदिर को खोज निकाला है। बारिकोट घुंडई में खुदाई के दौरान इस मंदिर का पता लगा।
खैबर पख्तूनख्वा के पुरातत्व विभाग के फजले खलीक ने गुरुवार को इसकी घोषणा करते हुए कहा कि यह मंदिर भगवान विष्णु का है। उन्होंने कहा कि यह मंदिर 1,300 साल पहले हिंदू शाही काल के दौरान बनाया गया था।
हिंदू शाही या काबुल शाही (850-1026 ई) एक हिंदू राजवंश था जिसने काबुल घाटी (पूर्वी अफगानिस्तान), गंधार (आधुनिक पाकिस्तान) और वर्तमान उत्तर पश्चिम भारत में शासन किया था। खुदाई के दौरान मंदिर स्थल के पास छावनी और पहरे के लिए मीनारें आदि भी मिले हैं। विशेषज्ञों को मंदिर के पास पानी का कुंड भी मिला है। संभवत: श्रद्धालु पूजा से पहले वहां स्नान करते थे। इलाके में पहली बार हिंदू शाही काल के निशान मिले हैं।
इटली के पुरातत्व मिशन के प्रमुख डॉ लुका ने कहा कि स्वात जिले में मिला गंधार सभ्यता का यह पहला मंदिर है। स्वात जिले में बौद्ध धर्म के भी कई पूजा स्थल स्थित हैं। खलीक ने कहा कि स्वात जिला हजार साल पुराने पुरातत्व स्थलों का घर है और इलाके में पहली बार हिंदू शाही काल के निशान पाए गए हैं। इटली के पुरातत्व मिशन के प्रमुख डॉ लुका ने कहा कि स्वात जिले में मिला गंधार सभ्यता का यह पहला मंदिर है। स्वात जिला पाकिस्तान के शीर्ष 20 स्थलों में से है जो प्राकृतिक सुंदरता, धार्मिक पर्यटन, सांस्कृतिक पर्यटन और पुरातात्विक स्थलों जैसे हर तरह के पर्यटन का घर है। स्वात जिले में बौद्ध धर्म के भी कई पूजा स्थल स्थित हैं।
ऐ सखी सुन – परिवेश हो या पर्यावरण, सुन्दर बनाना होगा

ऐ सखी सुन 5
सभी सखियों का मेरा नमस्कार। सखियों, त्यौहारों का सिलसिला अभी तक जारी है और दीपावली, भाई दूज के बाद अब छठ की तैयारी है जो बिहार का महापर्व माना जाता है। और अब तो यह पर्व बिहार की सीमा का अतिक्रमण कर पूरे देश ही नहीं दुनिया के कई हिस्सों में जोर शोर से मनाया जाता है। जहाँ- जहाँ बिहारी लोगों की बस्तियां आबाद हुईं वहाँ वहाँ उनके रीति रिवाज, खान -पान और पर्व -संस्कृति ने भी अपनी पहचान कायम की। और इस तरह छठ की महिमा फैलती गई। तमाम भारतीय त्यौहारों की तरह यह भी परिवार केन्द्रित त्यौहार है जिसमें निसंदेह स्त्रियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। हालांकि कहनेवाले कह ही सकते हैं कि इसमें पूरे परिवार की भूमिका रहती है लेकिन तमाम और पर्व त्यौई की ही भांति स्त्रियों के कंधे पर हमेशा की तरह कुछ अतिरिक्त भार पड़ता है जिसे वह खुशी -खुशी उठाती भी हैं वह चाहे घर की साफ सफाई करना हो, नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना हो या फिर कठिन उपवास करते हुए भी मीठे ठेकुए का प्रसाद बनाना हो। यह स्त्री की शक्ति ही है कि वह भूखे रहकर भी तमाम लोगों के लिए सुस्वादु भोजन या प्रसाद बनाना नहीं भूलती। और मेरी प्यारी सखियों, आश्चर्य की बात कहें या चिंता की कि स्त्री की जिस शक्ति और वैशिष्ट्य के लिए उसकी सराहना होनी चाहिए वही उसके शोषण का कारण बन जाती है। समाज सदियों से स्त्री पूजा का छद्म रचते हुए उसकी सहनशक्ति की परीक्षा लेता रहता है। जब तक वह सहती है तब तक देवी और जैसे ही अपनी जुबान खोलकर किसी बात का विरोध करने का निर्णय लेती है रातों-रात कुलटा साबित कर दी जाती है। लेकिन इससे देवी पूजा की परंपरा कभी बाधित नहीं होती। वह ज्यों की त्यों वर्तमान है और उसका स्वरूप समय के साथ बदलता या नये रूप में ढलता संवरता रहता है। शायद यही कारण है कि भारतीय परंपरा में कोई भी त्यौहार देवताओं के साथ साथ देवियों को उसी अविभाज्य रूप में शामिल करता है जैसे किसी भी सहज स्वाभाविक परिवार में स्त्री पुरुष की समान भूमिका होती है। तकरीबन सभी देव अपनी- अपनी देवियों के साथ ही पूजित होते हैं, जैसे शिव पार्वती, राम सीता, विष्णु लक्ष्मी आदि। और कुछ देवियों यथा काली, दुर्गा, सरस्वती, लक्ष्मी आदि की अलग से पूजा का विधान भी है अर्थात देवियों का पलड़ा पूजा के आसन पर किसी भी रूप में देवों से कम नहीं है। शायद इसी कारण लोक पर्वों में बहुत से देवताओं की पूजा भी प्रकारांतर से देवी पूजा का रूप ले लेती है।
हाँ सखियों, बिल्कुल सही समझा आपने। मैं यहाँ छठ पर्व की बात कर रही हूँ। है तो यह सूर्य की उपासना का पर्व जिसमें पहले ढलते हुए सूर्य की पूजा की जाती है और उसके बाद उगते हुए सूर्य की उपासना कर, व्रत का पारण अर्थात अन्नग्रहण किया जाता है। लेकिन लोक आस्था इस देव पूजा को किस तरह देवी पूजा में बदल देती है, इसका सुंदर उदाहरण यह पर्व है। व्रती या उपासक सूर्य की जय-जयकार करने के साथ साथ छठी मैया से वरदान भी माँगते हैं। दरअसल सूर्य अर्थात प्रकृति पूजा का यह सिलसिला मानव सभ्यता के आदिम काल से आरंभ हुआ और आज भी बदलते परिवेश और आधुनिकता की बयार के बावजूद जारी है। चूंकि हमारे समाज में बहुत सी देवियों का प्रभाव है, सकारात्मक और नकारू दोनों ही रूपों में, अर्थात सामान्य मनुष्य उनसे डरता भी है और उनकी पूजा भी करता है शायद इसी वजह से सूर्योपासना का यह पर्व देवी पूजा के रूप में सहजता से ढल गया होगा। इसके पीछे के कारणों या मान्यताओं पर कभी और विस्तार से बात करूंगी।
प्रकृति पूजा, देवी पूजा या लोक आस्था के इस व्रत की एक बड़ी विशेषता है कि इस में शारीरिक और मानसिक स्वच्छता को इतना अधिक महत्व दिया जाता है कि यह भय लोगों के मन में बना रहता है कि नियम भंग होने से छठी मैया नाराज हो जाएंगी और उनका क्रोध परिवार को नष्ट कर देगा। इसीलिए तमाम नियमों का पालन एक भयमिश्रित आस्था के साथ किया जाता है। समसामयिक परिस्थितियों में जहां करोना नामक वायरस ने हमारे देश ही नहीं पूरी दुनिया के शारीरिक मानसिक और आर्थिक स्वास्थ्य को संकट में डाल दिया है , तब हमें स्वच्छता का महत्व अनायास ही समझ में आ रहा है और दीपावली तथा छठ जैसे लोक पर्वों का महत्व भी जिसमें साफ सफाई पर अत्याधिक महत्व दिया जाता है। लेकिन समस्या यह है कि हम अपने घरों का कचरा तो साफ करते हैं लेकिन सार्वजनिक स्थानों पर बेझिझक गंदगी बिखेरते हैं। छठ के पहले जिन घाटों को साफ सुथरा कर चमका दिया जाता है वही घाट पूजा के समापन के बाद गंदगी के ढेरों से ढँक जाते हैं।
एक सवाल पूछना चाहती हूँ सखियों, क्या साफ सफाई की इस व्यवस्था को हम अपने रोजमर्रा के जीवन का अविभाज्य और स्वाभाविक हिस्सा नहीं बना सकते ? क्यों हम पर्व त्यौहारों पर ही साफ सफाई करें, क्यों न साफ सफाई को जीवन का मूलमंत्र बना लें। क्यों सिर्फ अपने घर की सफाई को ही महत्त्व न दें बल्कि सार्वजनिक स्थलों को भी साफ रखने की कोशिश करें। अब यह मत पूछना सखी कि मैं यह बात आप सखियों से ही क्यों कह रही हूं, तो आप ही बताइए का मैं किस से कहूं ? जिस तरह हर पर्व त्यौहार में हम औरतें कमर कस कर सफाई अभियान में लग जाती हैं, बच्चों को बात -बात पर साफ सुथरा रहने की हिदायत देती हैं, उसी तरह हमें परिवेश की स्वच्छता की जिम्मेदारी भी अपने मजबूत कंधों पर उठानी होगी। कब तक हम इस प्रतीक्षा में रहेंगे कि कोई दूसरा मसीहा, नेता या समाज सुधारक आएगा और समाज उसके पीछे-पीछे चल पड़ेगा। वह दौर समाप्त हो गया। अब हमें यह काम अपने हाथों में लेना होगा और परिवार और समाज को एक दिशा देनी होगी। तो आइए, आज साथ मिलकर यह शपथ लें कि परिवेश हो या पर्यावरण, घर हो या समाज, उसे स्वच्छ और सुंदर बनाने की जिम्मेदारी न केवल हम स्वयं उठाएंगे बल्कि औरों को भी इस राह पर चलना सिखाएंगे। फिलहाल विदा, अगली मुलाकात तक के लिए।
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बच्चा पार्टी जब छठ मनाएला …काँच ही बाँस के बहंगिया
जब मिथिला से मैथिली में गूँजे छठ के गीत
जब बांग्ला में गाया जाए छठ पूजा का लोकप्रिय गीत
छठ पूजा पर चावल से बनाएं बिहार के 2 स्वादिष्ट व्यंजन
लोक आस्था का पर्व छठ को बिहार सहित झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में बड़ी धूमधाम के साथ मनाया जाता है। चार दिनों तक चलने वाले इस महापर्व पर हर एक दिन प्रसाद में कुछ खास बनने का चलन है। वहीं, छठ के दूसरे दिन को ‘खरना’ कहा जाता है और इस दिन घरों में प्रसाद में रसिया बनाया जाता है। इस खीर को आम की लड़की और मिट्टी के चूल्हे पर बनाया जाता है। छठ के दूसरे दिन इस प्रसाद को बनाकर सूर्य देवता को चढ़ाया जाता है। खरना का प्रसाद ‘रसियाव’ बनाने के लिए चावल, दूध और गुड़ का इस्तेमाल किया जाता है। चावल और दूध चंद्रमा का प्रतीक है और गुड़ सूर्य का प्रतीक है। तीनों के मिश्रण से बनी खीर को रसियाव कहते हैं। ऐसा माना जाता है कि इसको खाने से स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ता है और मानसिक रोग से भी छुटकारा मिलता है। ऐसी मान्यता है कि खरना का प्रसाद खाने वाले को चर्मरोग नहीं होता है। इसे रोटी साथ खाया जाता है। तो आइए जानें इसे बनाने का सही तरीका –
रसियाव
सामग्री : 80 ग्राम चावल,150 ग्राम गुड़, – 1 लीटर फुल क्रीम दूध, 7-10 बादाम, 7-10 काजू,2 टेबल स्पून किशमिश, 5-6 इलायची

विधि : गुड़ का खीर या रसियाव बनाने के लिए सबसे पहले गुड़ को बारीक तोड़ लें। सूखे मेवों को बारीक-बारीक टुकड़ों में काट लें। इसके साथ ही चावल को पानी से धोकर साफ करके 2 घंटे के लिए भिगोकर रख दें। अब गैस पर मध्यम आंच पर एक बड़ा सा बर्तन चढ़ाए और उसमें दूध डालें और उबालने दें। वैसे तो छठ के लिए बनने वाली खीर को चूल्हे पर आम की लकड़ी के आंच पर बनाया जाता है और यही वजह है कि इसका स्वाद बिल्कुल अलग होता है और इसमें एक सौंधी सी खुसबू आती है। जब दूध में उबाल आ जाए तो इसमें चावल डालें। दूध को चम्मच से चलाएं और खीर में उबाल आने के बाद गैस की आंच को धीमा कर दें। खीर को हर दो मिनट में चलाते रहें, ताकि वो बर्तन के तले पर ना लगें। गैस पर मध्यम आंच पर दूसरे एक बर्तन में ½ कप पानी और गुड़ डालें और गर्म होने को रखें। जब गुड़ पानी में पूरी तरह से घुल जाए तो गैस बंद कर दें। जब चावल गल जाएं तो खीर में कटे हुए काजू, किशमिश और बादाम डाल दें। जब दूध में चावल अच्छे से मिल जाए तो उसमें इलायची पाउडर डाल दें। अब खीर के ठंडा होने दें और फिर गुड़ का घोल छलनी से छान कर खीर में मिला दें। छठ की शाम के लिए खीर तैयार है, इसे घी लगी रोटी के साथ परोसा जाता है।
अनरसा
ये मिठाई चावल के आटे से बनाई जाती है,तिल डालने से इसका नटी टेस्ट उभर कर आता है।
सामग्री : 2 कटोरी चावल का आटा, 2 इलायची का पाउडर, 150 ग्राम ग्रटेड गुड़, 3-4 बड़े चम्मच दूध, 1 चम्मच तिल

विधि : चावल को रात भर भिगो कर रखे सुबह इसका पानी निकालकर इसे सूखे कपड़े पर पंखे के नीचे एक घंटे के लिए सुखा दे और मिक्सी में इसका पाउडर बना ले।इस पाउडर में कसा हुआ गुड़ और इलायची पाउडर डालकर मिला लें। अब इस मिश्रण में दूध डालकर नर्म आटा गूथ ले,अगर आटा गीला लगे तो थोड़ा मैदा भी डाल सकते है।इस आटे को घी लगाकर पंद्रह मिनट के लिए ढककर छोड़ दे। अब इसे फिर से मसल लें और इसकी टिक्की का आकार बनाकर इसे सफेद तिल से लपेट लें और गर्म रिफाइंड में बिल्कुल धीमी आंच पर दोनों ओर से सुनहरा होने तक तल लें।
आयातित नहीं है, भारत की परम्परा में है आतिशबाजी
भारतीय परम्परा में आतिशबाजी कोई नयी बात नहीं है। हमारी संस्कृति हर उत्सव पर आतिशबाजी होती रही है, इसके उल्लेख भी मिलते हैं। इंटरनेट पर जब इस बारे में हमने जानकारी प्राप्त करनी चाही तो फेसबुक पर मिथिलेश जी की वॉल पर ये दो लेख मिले। इसके बाद हमने इसे आधार बनाकर आगे की पड़ताल की। हम ये दोनों आलेख आपके सामने रख रहे हैं। यह दोनों लेख और इसमें उपलब्ध चित्र भी मिले।
आलेख – 1
मेकिंग इंडिया ऑनलाइन से हमने यह लेख लिया है जिसे यशार्क पांडेय ने लिखा है। चूँकि हमारा उद्देश्य इतिहास को आपके सामने रखना है इसलिए हम इस लेख के कुछ अंश ही ले रहे हैं। इसके साथ ही हम सभी लिंक आपको दे रहे हैं ताकि आप खुद यह सामग्री पढ़ सकें और उपयोगी जानकारी प्राप्त कर सकें। लेख के कुछ अंश इस प्रकार हैं –


उपरोक्त ऐतिहासिक प्रमाणों से स्पष्ट है कि भारत में दीवाली पर पटाखे छुड़ाना कोई नयी परम्परा नहीं है. दीवाली पर पटाखे छुड़ाना कोई ‘धार्मिक कर्मकांड’ भी नहीं है बल्कि यह तो उत्सव मनाने का एक तरीका मात्र है. उत्सव हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग इसलिए हैं क्योंकि वे हमारी जीवनशैली में रंग भरते हैं. भारत का हिन्दू अपने पर्व, उत्सव कैसे मनाये अथवा न मनाये इसपर प्रश्न करना न्यायालय के कार्यक्षेत्र में कैसे आता है यह समझना कठिन है. उच्चतम न्यायालय ने यह कहकर कि पटाखे छुड़ाने का उल्लेख किसी हिन्दू धार्मिक ग्रन्थ में नहीं लिखा है और उसके पश्चात उपजे जनमानस के आक्रोश से व्यथित होकर अपनी ही बात काट दी है. दरअसल न्यायालय ने ही हिंदुत्व को जीवनशैली कहकर परिभाषित किया था और आज जब इनके तुगलकी निर्णय पर जनता ने आक्रोश व्यक्त किया तो माननीयों को हिन्दू एक ‘रिलिजन’ समझ में आया. यक्ष प्रश्न यह है कि माननीय पटाखे छुड़ाने की परम्परा को धार्मिक ग्रंथों में खोज ही क्यों रहे थे? उन्हें तो इसके लिए ऐतिहासिक प्रमाणों में जाना चाहिए था.

आलेख – 2
देसी सीएनएन डॉट कॉम पर 2017 में प्रकाशित यह लेख जरूर पढ़ना चाहिए। हमने इस लेख के साथ लिंक भी दिया है जिससे आप खुद इस वेबसाइट पर जाकर इसे तथा अन्य उपयोगी सामग्री को पढ़ें। यह आलेख मकरध्वज तिवारी द्वारा लिखा गया है, शुभजिता इसे सिर्फ आगे बढ़ा रही है और यह आलेख आपको पढ़वा रही है क्योंकि इस तरह के शोधपरक आलेख ही हमें सत्य से अवगत करवा सकते हैं और मिथ्यावादियों की साजिशों को खत्म कर सकते हैं। लेख और चित्र साभार शुभजिता आपके लिए प्रस्तुत कर रही है –
भारतीय संस्कृति में आतिशबाजी का इतिहास (तथ्य और चित्र)

भारतीय संस्कृति में प्रत्येक आनन्द के उत्सव, त्योहार आदि में लगभग 3000 वर्षों से आतिशबाजी की परंपरा रही है. पटाखें मुख्यतः बारूद के चूर्ण से बनतें है, जिसका ज्ञान भारतीयों को बहुत पहले था, रसायन शास्त्र से संबंधित सर्वाधिक पुरानी पुस्तकें संस्कृत में ही मिलती हैं. इसी बारूद से गनपाउडर बनाया जाता है, महाभारत, रामायण कालीन अग्निबाण इसी का उदाहरण है. लगभग 2300 वर्ष पुरानें कौटिल्य के अर्थशास्त्र में अग्निचूर्ण के प्रयोग का वर्णन प्राप्त होता है, चीनी विद्वानों की पुस्तकों से यह ज्ञात होता है कि भारत में इस अग्निचूर्ण का प्रयोग सैन्य उद्देश्यों के अलावा उत्सवों में रंगीन रोशनी निकालने के लिए भी किया जाता था.भारत से प्राप्त इस विधा का उपयोग चीनियों ने कई प्रकार से किया उन्होंने इससे धीमी आवाज के पटाखे, शॉवर तथा रॉकेट आदि को बनाना सीखा तथा 16 वीं शताब्दी तक भारत एवं यूरोप को आतिशबाजी का निर्यात करने लगा. मध्यकालीन भारत में 1609 में आदिलशाह की शादी में 80 हजार रुपये की आतिशबाजी की गई थी, जबकि उसी समय 1687 में रोम के साथ अपने व्यापारी सम्बन्ध रखने वाले बैंगलोर को चिक्कादेवराय वाडियार ने 3 लाख रुपयों में खरीदा था, आप आदिलशाह द्वारा आतिशबाजी पर खर्च की गई रकम की कीमत का अंदाज लगा सकतें है. 1633 का दाराशिकोह की शादी का एक चित्र प्राप्त होता है जिसमें समारोह में की गई आतिशबाजी को दर्शाया गया है. 16-17 वीं शताब्दी के कई ऐसे चित्र मिलते है जिसमें दीवाली में की जा रही आतिशबाजी को दिखाया गया है. (सभी चित्र पोस्ट के साथ संलग्न हैं). औरंगजेब के शासनकाल में 1665 में दिवाली पर आतिशबाजी करने पर रोक लगाई गई, जिस आशय का पत्र बीकानेर संग्रहालय में सुरक्षित है

17-18वीं शताब्दी में भारत में आतिशबाजी का चलन तेजी से बढ़ा तथा यह उत्सव की शान बढ़ाने का एक साधन बन गया. 1815 में फतेहगढ़ को लॉर्ड मॉरिया के स्वागत में कुछ इस तरह की सजाए गए थे और जमकर आतिशबाजी की गई थी. 1815 में ही लखनऊ के नबाब के सम्मान में रंगबिरंगी आतिशबाजी की गई थी. आतिशबाजी की इस कला ने समाज में कई आतिशबाजों को स्थापित किया. लार्ड वारेन हेस्टिंग्स के कृपापात्र चित्रकार सीताराम ने अपने चित्रों में आतिशबाजी तथा विभिन उत्सवों और की जा रही चित्रकारी को दिखाया है. 19वीं सदी की शुरुआत में आतिशबाजी की बढ़ती मांग को देखते हुए दासगुप्ता ने कलकत्ता में भारत की पहली पटाखा फेक्ट्री डाली, जहां धीमी आवाज के पटाखें, लाइट फाउन्टेन, फुलझड़ी बनाई जाती थी, बाद में यह व्यवसाय तमिलनाडु के शिवकाशी में स्थापित हो गया. इस प्रकार यह प्रमाणित होता है कि भारत में आतिशबाजी की परम्परा आधुनिकता की देन नहीं है, बल्कि वर्षों पुरानी है.
कभी ऐसे सोचिए…क्या यह जरूरी है कि आतिशबाजी चीन से आयी होगी…चीन के बहुत से यात्री प्राचीन काल में भारत आते रहे हैं। क्या यह सम्भव नहीं है कि ह्वेनसांग और फाहियान ने या फिर उनकी तरह कोई यात्री भारत से आतिशबाजी की कला लेकर चीन गया और इसे बाद में अपना बताकर चीन ने सारी दुनिया में फैला दिया…आखिर गौतम बुद्ध भी तो भारत के ही हैं मगर आज उनकी पूजा चीन, जापान, बर्मा, जैसे देशों में होती है, अफगानिस्तान में उनकी प्रतिमाएं मिलती हैं तो क्या इसका मतलब यह है कि वह चीनी या जापानी हो गये…रही बात नेपाल की तो एक समय ऐसा था जब यह देश भारत से अलग नहीं था…सारी भौगोलिक सीमाएं आज की हैं जो पहले नहीं रही होंगी तो क्या यही बात हमारी धरोहरों पर लागू नहीं होती…सोचिएगा एक बार
(साभार – पहला आलेख अंश – मेकिंग इंडिया ऑनलाइन
सभी चित्र तथा आलेख – 2- देसी सीएनएनएन डॉट कॉम से)
ग्रीन पटाखों में है भविष्य, यह परम्परा और पर्यावरण दोनों बचा सकते हैं
ग्रीन पटाखे क्या होते है?
ग्रीन पटाखे, इनका नाम सुनने से ही आपको अंदाज़ा हो गया होगा की यह पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम करने के लिए बनाये गए है। दरसल जब सरकार ने गत वर्ष पटाखों से होने वाले वायु और ध्वनि प्रदूषण को कम करने के लिए के लिए एक ठोस कदम उठाया, तो बाजार में इन हानिकारक आतिशबाजियों की बिक्री और खरीद पर रोक लगा दी गयी परन्तु पटाखा कारोबार को नुकसान न हो, और इससे जुड़े लाखों मजदूरों का रोजगार न छीने इसलिए कोर्ट द्वारा ग्रीन पटाखों को बनाने की बात कही गयी थी। इस पहल को नीरी के वैज्ञानिकों ने सफलतापूर्वक पूरा किया। राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान (NEERI) नीरी, भारत सरकार के अंतर्गत काम करने वाले “वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद” (CSIR) सीएसआईआर की पर्यावरण शाखा की एक विशेष प्रयोगशाला है क्योंकि यह ग्रीन पटाखे जलने पर कम हानिकारक धुआं और कम जहगरीली गैसें उत्पन्न करते है। इसलिए पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचाते है। हालाँकि ऐसा भी नहीं है की ग्रीन पटाखों से प्रदुषण बिलकुल नहीं होगा? पर इन पटाखों से प्रदूषण के स्तर में 30% तक की कमी जरूर आएगी।
ग्रीन पटाखे दिखते कैसे है?
नीरी द्वारा उपलब्ध कराये जाने वाले यह ग्रीन (हरित) पटाखे दिखने में बिलकुल सामान्य या हमारे परंपरागत पटाखों की तरह ही होते है। इसलिए आपको इस बात की चिंता करने के कोई जरुरत नहीं है की यह देखने में कैसे होंगे? आपको इन्हे देखकर या चलाकर कोई विशेष अंतर महसूस नहीं होगा। सिवाय इसके की यह आपके स्वास्थ्य व कानो को कम हानि पहुंचाएंगे। क्योंकि हर साल पटाखों से बहरापन, फेफड़ों की समस्या, आँखों में परेशानी, श्वास, रक्तचाप, व दिल के रोग होने के मामले जरूर देखने को मिलते है। इसलिए इन ग्रीन क्रैकर्स से यह उम्मीद भी लगायी जा रही है की इनके इस्तेमाल से ऐसे सभी मामलों में कमी आएगी। आतिशबाजी ऐसी हो जो प्रदूषण को कम करते हुए ईको फ्रेंडली (पर्यावरण सुरक्षित) भी हो, और लोगों को पसंद भी आये। तो बहुत कड़ी मेहनत और कई जाँच परीक्षणों के बाद नीरी ने अभी तक कुल चार अलग श्रेणी (प्रकार) के ग्रीन क्रैकर्स बाजार में उतराने के लिए तैयार किये है।
ग्रीन पटाखे के यह सभी प्रकार निम्नलिखित है –
1. पानी उत्पन्न करने वाले ग्रीन पटाखे
जैसा की आपने पहले भी देखा या सुना होगा? की वातावरण से प्रदुषण को कम करने के लिए पानी का छिड़काव किया गया था? जिससे की हानिकारक तत्व इनमें घुलकर नष्ट हो जाएँ। ठीक इसी तर्ज पर नीरी ने ऐसे पटाखे बनाने का फैसला लिया, जो खुद पानी उत्पन्न करते है और यही बात इन्हे सामान्य आतिशबाजी से खास और बेहतर बनती है।
नीरी के मुताबिक इस प्रकार के पटाखों को सेफ वॉटर रिलीज़र नाम दिया गया है। इनके जलने पर पानी के कणो का निर्माण होता है। और सभी हानिकारक गैसें, जैसे नाइट्रोजन, सल्फर, कार्बन मोनो ऑक्साइड, आदि इस पानी में घुलकर नष्ट हो जाएँगी।
2. कम नाइट्रोजन व सल्फर वाले ग्रीन पटाखे
इन गैसों के पानी में घुलकर नष्ट होने की बात जितनी सकारात्मक है। उतनी ही अच्छी बात यह भी है, की यदि यह हानिकारक गैसें ही कम मात्रा में उत्सर्जित हो? इसलिए नीरी द्वारा ऐसे पटाखे भी बनाये गए है। जिनमें कुछ खास रसायनों के प्रयोग से ऑक्सिडाइजिंग (आक्सीकरण) की प्रक्रिया को अंजाम दिया जाता है।
जिससे की नाइट्रोजन और सल्फर जैसी हानिकारक गैसों का बनना कम किया जा सके। इन प्रकार के ग्रीन पटाखों को सेफ थर्माइट क्रैकर्स या STAR (स्टार) क्रैकर के नाम से जाना जायेगा।
3. कम एलुमिनियम से बने ग्रीन पटाखे
पारम्परिक पटाखों के निर्माण में प्रयोग किया जाने वाला एलुमिनियम भी कुछ कम नुक्शानदायक नहीं है। इसलिए एक कोशिश यह भी थी आतिशबाजियों को बनाने में इनका कम इस्तेमाल कैसे किया जाये? इसका हल भी नीरी के वैज्ञानिकों ने निकाल लिया है।
उन्होंने लगभग 50 से 60 प्रतिशत कम एलुनिनियुम का इस्तेमाल करके बढ़िया गुणवत्ता, और सामान्य पटाखों की तरह चलने वाले क्रैकर्स तैयार कर लिए है। चूँकि यह दूसरों से अधिक सुरक्षित है, इसलिए इनका नाम भी सेफ मिनिमल एलुमिनियम या SAFAL (सफल) रखा गया है।
4. खुशबू वाले ग्रीन पटाखे (अरोमा क्रैकर्स)
अक्सर आपने देखा होगा की पटाखे के जलने के बाद बहुत सारा धुआं और गैस के साथ ही बारूद के जलने की बुरी महक या बदबू आती है। पर अब ऐसा नहीं होगा, जी हाँ, क्योंकि ऐसे पटाखे भी बनाये गए है, जो जलने पर बारूद की गन्दी दुर्गन्ध न फैलाकर बढ़िया खुशबू फैलाएंगे।
इनसे विभिन्न प्रकार की और अलग अलग सुगंध वातावरण में बिखरेगी। साथ ही इनसे निकलने वाली हानिकारक गैसें भी बहुत कम मात्रा में उत्सर्जित होंगी। इन पटाखों को संस्थान के वैज्ञानिकों द्वारा अरोमा क्रैकर्स नाम दिया है।
हरित पटाखों व सामान्य पटाखों में अंतर
जैसा की हम आपको बता चुके है की बाजार में मिलने वाले सामान्य पटाखों से हर साल वातावरण पर होने वाले हानिकारक असर को कम करने के लिए ही यह नए किस्म के पटाखे भारतीय बाजारों में लाये जा रहे है। ऐसे में आपके मन में भी यह जानने की इच्छा होगी? की यह हरित आतिशबाजी (ग्रीन क्रैकर) कैसे उन सामान्य बम गोले व अन्य पटाखों से अलग है? तो चलिए आपको जरा विस्तार से बताते है, इन दोनों में पाए जाने वाले मुख्य अंतरों को जो की इन नए और अनोखे पटाखों को पहले इस्तेमाल किये जाने वाली आतिशबाजियों से अलग बनाते है।
पारम्परिक पटाखे
- यह सामान्य रूप से कई प्रकार की हानिकारक धातुओं के मिश्रण से बनाये जाते है।
- इन पटाखों से बहुत अधिक मात्रा में गहरा धुआं व जहरीली गैसों का उत्सर्जन होता है।
- इन सभी आतिशबाजियों मे जलने पर प्रदूषण को बढ़ाने वाले तत्व निकलते है।
- इनमें से नाइट्रोजन और सल्फर जैसी गैसें अधिक मात्रा में उत्पादित होती है।
- इनमे एलुमिनियम जैसी हानिकारक धातु का बहुत अधिक प्रयोग किया जाता है।
- इनसे पर्यावरण में ध्वनि प्रदुषण और वायु प्रदुषण अधिक मात्रा में फैलता है।
- इनसे दुर्गन्ध और गहरा धुआं निकलता है जो सेहत को बहुत नुक्सान पहुँचता है।
2. नए ग्रीन पटाखे
- यह नए किस्म के रसायनों व कम हानिकारक तत्वों का इस्तेमाल करके बनाये जाते है।
- इन सभी पटाखों में 50 प्रतिशत तक कम धुआं और जहरीली गैसों का उत्पादन होता है।
- इन ग्रीन पटाखों के जलने से पानी बनता है जो प्रदुषण को घोल कर फैलने से रोकता है।
- इन सभी में सल्फर और नाइट्रोजन का उत्पादन 50 प्रतिशत तक कम होता है।
- नए प्रकार के ग्रीन क्रैकर में 50 प्रतिशत तक कम एलुमिनियम का इस्तेमाल होता है।
- इनसे फैलने वाला प्रदुषण 40 से 50 प्रतिशत तक कम नुकसानदायक होता है।
- इन नए ग्रीन पटाखों से कई तरह की सुगंध (खुशबू) और कम धुआं निकलता है।
ग्रीन पटाखों से लाभ क्या है?
चूँकि यह पटाखे सरकार द्वारा निर्धारित सभी ग्रीन नॉर्म्स का बखूबी पालन करते है। इसलिए इनसे नुकसान कम है। जिस वजह से इनके इस्तेमाल से होने वाले फायदे आपको जरूर नजर आएंगे। सबसे बड़ा फायदा तो है, हर साल पर्यावरण को पहुंचने वाली हानि में कमी होना। जिसे ध्यान में रखकर ही इन पटाखों का निर्माण किया गया है। साथ ही इसके अन्य लाभ भी है जिनके बारे में अब हम चर्चा कर रहे है।
ग्रीन पटाखों से होने वाले यह सभी फायदे निम्नलिखित है –
- हानिकारक गैसों का कम उत्सर्जन होना
- नाइट्रोजन व सल्फर की मात्रा में कमी
- जलने पर कम गहरा धुआं प्रदान करना
- वायुमंडल की हवा को कम प्रदूषित करना
- जलने पर पानी के कणो को उत्पन्न करना
- प्रदुषण व धुआं पानी में घुलकर नष्ट होना
- जलाये जाने पर अलग अलग खुशबू देना
- विभिन्न स्वास्थ्य समस्याओं में कमी आना
- सांस व फेफड़ों से जुडी समस्याएं कम होना
- रक्तचाप व ह्रदय से जुडी समस्याएं कम होना
- ज्यादा हानिकारक तत्वों का इस्तेमाल कम होना
- इन्हे बनाने में एल्युमियम का प्रयोग कम होना
- कम नुक्सानदायक रसायनों का इस्तेमाल होना
- इनसे निकलने वाला ध्वनि प्रदूषण नियंत्रित होना
- कान से जुडी समस्याओं में भी कमी आना
ग्रीन पटाखे कैसे जलाएं?
ग्रीन पटाखे कितने भी सुरक्षित क्यों न हों? पर चूँकि इन्हे जलाने में भी अन्य सामान्य पटाखों की तरह ही आग का इस्तेमाल होता है। इसलिए यह बेहद जरुरी है की इन आतिशबाजियों को जलाने में भी उतनी ही सावधानी बरती जाये। क्योंकि अन्य प्रकार की समस्याओं में कमी आने पर भी आग से जलने के मामलों में कुछ नहीं कहा जा सकता है।
अतः ग्रीन पटाखों को भी सुरक्षापूर्वक चलाना और सावधानी रखना बेहद जरूरी है। ऐसी ही कुछ सामान्य पर बेहद जरुरी सावधानियों के बारे में हम आपको बताने जा रहे है –
- पटाखों को जलाने के लिए किसी मोमबत्ती / दीपक का प्रयोग नहीं करें।
- सभी प्रकार की आतिशबाजियों को अपने कपडों से दूर रखकर चलाएं।
- पटाखों से भरे थैले या ढेर के पास कोई दीया, माचिस, मोमबत्ती न रखें।
- पटाखों को खुले में न रखें अन्यथा चिंगारी से आग लगने का खतरा होगा।
- छोटे बच्चों को हाथ में रखकर पटाखे या बम बिलकुल भी न चलाने दें।
- ऐसे कपड़ों को पहनने की गलती न करें जो जल्दी आग पकड़ लेते हों।
- आसमान की तरफ चलने वाले पटाखों (रॉकेट, अनार) को सीधा ही रखें।
- अनार, रॉकेट, या चकरी आदि को चलाते समय उचित दूरी बना कर रखें।
- किसी भी असावधान व्यक्ति के पीछे अचानक से कोई पटाखा मत फोड़ें।
- पटाखों को सावधानी पूर्वक जलाने के लिए पहले उनकी बत्ती छील लें।
- बम, पटाखा, राकेट आदि को जलाने के लिए अगरबत्ती का प्रयोग करें।
ग्रीन पटाखे वातावरण में फैलने वाले प्रदुषण को कम करने के लिए नीरी के वैज्ञानिकों द्वारा की गयी एक महत्वपूर्ण पहल है। जिससे आगे आने वाले भविष्य में ईको फ्रेंडली (पर्यावरण सुरक्षित) दिवाली को मानाने का सपना भी पूरा हो सकेगा। जिससे लोगों की भावनाओं को आहात किये बिना ही उनकी सेहत को क्षति पहुंचने से भी रोका जा सकेगा। साथ ही निम्न वर्ग के लोगों का रोजगार भी सलामत रहेगा। जिससे विश्व के कोने कोने में एक सकारात्मक सोच को दिशा प्रदान की जा सकेगी। इसलिए इस दिवाली अपने परिवार और दोस्तों के साथ पटाखों का आनद लें और सुरक्षित रहें।
प्रतिबन्ध समाधान नहीं है, रोजी का सवाल है, हरित पटाखों का प्रसार ही विकल्प है
शुभजिता फीचर डेस्क
भारतीय त्योहार और पर्वों को लेकर इन दिनों काफी कुछ कहा जा रहा है। कोई भी त्योहार लीजिए, बुद्धिजीवियों और उदारवादी आधुनिक जमात उसके पीछे पड़ रहे हैं। ये अलग बात है कि अपने निजी जीवन में इनको न तो पर्यावरण की परवाह है और न प्रदूषण की फिक्र मगर बेरंग होली और बगैर आतिशबाजी के दिवाली मनाने की अपील करने में यह सबसे आगे हैं। पटाखों के पीछे हाथ धोकर पड़ना इनकी पुरानी आदत है मगर इस बार कोरोना ने इस बहाने को धार दे दी और दुःख की बात यह है कि हमारी न्यायिक प्रक्रियाओं में भी एकतरफा रवैया हावी है। जाहिर है कि इस बार की पड़ताल दिवाली बीत जाने के बाद भी आतिशबाजी को लेकर करने की जरूरत पड़ी।

प्राइवेट जेट से उड़ने वाले, सिगरेट – शराब की लत को फैशन समझने वाले जब पब में हुक्का उड़ाते हैं और वह धुआँ सीधे उनके फेफड़ों में जाता है…तब इनको प्रदूषण की चिन्ता नहीं होती। बॉलीवुड के पुरस्कार समारोहों में जो धुआँ उत्पन्न किया जाता है या 31 दिसम्बर की रात को जो पटाखे फूटते हैं, उनको लेकर कभी किसी सितारे को चिन्ता करते नहीं देखा…प्रियंका चोपड़ा जब अपनी शाही शादी में आतिशबाजी का आनन्द लेती हैं या सिगरेट पीती हैं तब उनको अस्थमा की चिन्ता नहीं होती…। सबसे पहली बात यह है कि हमें यह समझने की जरूरत है कि हमारे पर्व और त्योहार बेरोजगारों के लिए रोजी – रोटी हैं और न्यायालयों के एकतरफा फैसले से जिन लाखों गरीबों की रोजी गयी…जिनकी दिवाली पर अन्धेरा छाया रहा…उनकी क्षतिपूर्ति के लिए किसी भी राज्य या न्यायपालिका ने क्या किया…यह सवाल अब उठना चाहिए। हमें यह देश की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने का ष़डयन्त्र अधिक लग रहा है और हमें इस बात की हैरत नहीं है।
ऐसा भी नहीं है कि पटाखों को लेकर अनुसन्धान नहीं हो रहे हैं…पटाखों पर पूर्ण प्रतिबन्ध एक गलत फैसला है। जो पशु प्रेमी अपने पशुओं को लेकर परेशान हैं. उनके कानफोड़ू संगीत से क्या उनके जानवर परेशान नहीं होते? जरूरत पड़ने पर हथियारों के प्रयोग, आंसू गैस के गोले, वाहनों और कारखानों का धुआँ क्या कम प्रदूषण फैलाता है? घूमने की धुन में जब आप पर्यटन स्थलों पर खाली प्लास्टिक फेंक आते हैं तो उनसे कौन सी हवा साफ होती है…यह भी बताने की जरूरत है।

विदेशी नहीं हैं पटाखे
पटाखे विदेशी नहीं हैं…हमारे ग्रन्थों में जिस अग्निचूर्ण का उल्लेख मिलता है,वह कुछ और नहीं बारुद ही है। मुगल काल में भी आतिशबाजी की परम्परा का उल्लेख मिलता है। भारत में पटाखों का इतिहास बहुत पुराना है. पुणे स्थित भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टिट्यूट के प्रो० परशुराम कृष्ण गोडे ने इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ कल्चर (बेंगलुरु) के ट्रांज़ेक्शन सं० 17 (1953) में एक लेख प्रकाशित किया था जिसमें उन्होंने प्राचीन भारत में आतिशबाजी के इतिहास का विवरण दिया है. प्रो० गोडे लिखते हैं कि सन 1443 में देवराय द्वितीय के शासनकाल में सुल्तान शाहरुख़ का एक दूत विजयनगर के दरबार में रहता था. इसने लिखा है कि रामनवमी के उत्सव पर उसने वहाँ आतिशबाजी देखी थी. ऐसे ही बहुत से उल्लेख मिलते हैं जो बताते हैं कि चौदहवीं, पंद्रहवीं शताब्दी में कश्मीर, उड़ीसा और गुजरात में न केवल उत्सव बल्कि विवाह समारोह आदि में भी आतिशबाजी होती थी. डॉ सत्यप्रकाश (डी०एस०सी०) अपनी पुस्तक ‘प्राचीन भारत में रसायन’ में उड़ीसा के गजपति प्रताप रुद्रदेव की पुस्तक कौतुक चिंतामणि को उद्धृत करते हुए लिखते हैं कि पन्द्रहवीं शताब्दी में राजा के दरबार में विभिन्न प्रकार के अग्निक्रीड़ायें की जाती थीं: कल्पवृक्ष बाण, चामर बाण, चन्द्रज्योति, चम्पा बाण, पुष्पवर्त्ति, छुछंदरी रस बाण, तीक्ष्ण नाल और रस बाण. ऐसे ही उल्लेख आकाशभैरवकल्प नामक पुस्तक में है जिसमें यह बताया गया है कि बांस के बने पिंजरों से अग्निबाण (राकेट कह सकते हैं) छोड़े जाते थे जो आकाश में फूटने के बाद मोरपंख का बना हुआ चँवर या आजकल के ‘अनार-पटाखा’ जैसी रंग-बिरंगी आतिशबाजी करते थे. प्रो० गोडे के अनुसार भारत में आतिशबाजी की कला चौदहवीं शताब्दी में चीन से आई किन्तु इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि रसायनों के प्रयोग से विस्फोट करने का ज्ञान भारतीयों को चौदहवीं शताब्दी के पहले से था क्योंकि प्रो० गोडे ने अपने लेख में तेरहवीं शताब्दी के फ़ारसी इतिहासकार शेख मुसलिदुद्दीन सादी का उल्लेख किया है जिसने अपनी रचना गुलिस्तान में एक स्थान पर लिखा था कि एक हिन्दू (अर्थात् तत्कालीन ‘गुलाम’) किसी से ‘नाफ्था’ फेंकना सीख रहा है. यह नाफ्था एक प्रकार का ज्वलनशील तरल पदार्थ है जिसे आज नाफ्थालीन कहा जाता है. इसे बोतल में भरकर चिंगारी लगाकर शत्रु पर फेंकने से शत्रु जल जाता है. शुक्रनीति में भी अग्निचूर्ण का उल्लेख है किन्तु शुक्रनीति का रचनाकाल निश्चित नहीं है. महत्वपूर्ण यह है कि प्रो० गोडे अपने लेख में आकाशभैरवकल्प पुस्तक को उद्धृत करते हुए दीपावली पर्व का उल्लेख भी करते हैं जिसमें राजा को रात्रि में बाणविद्या (अर्थात् आज के समय का राकेट) देखने के लिए आमंत्रित किया गया है.
9 हजार करोड़ का कारोबार, लाखों को रोजगार, प्रतिबन्ध से सब लाचार
दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट में ऑल इंडिया फायरवर्क्स एसोसिएशन के आँकड़ों के हवाले से कहा गया है कि पटाखों का कारोबार लाखों लोगों की रोजी है। 1070 कंपनियां अकेले शिवाकाशी में रजिस्टर्ड हैं। यहां देश aमें बिकने वाले कुल पटाखों को 80 प्रतिशत पटाखा बनता है। अकेले शिवाकाशी में ही गतवर्ष में 6000 करोड़ का कारोबार हुआ था। देश में पटाखे का लगभग 9 करोड़ का कारोबार है। शिवाकाशी में पटाखा कारोबार से लगभग 3 लाख लोग प्रत्यक्ष रूप से जुड़े है। जब लगभग कुल 5 लाख लोगों को इससे रोजगार मिलता है। पटाखों का मूल कारोबार कोलकाता में ही था मगर सुविधाओं के अभाव में यह धीरे – धीरे पिछड़ता चला गया। क्या कोई भी अदालत इन गरीबों के रोजगार को लेकर गम्भीर है…हमें तो नहीं लगा।

विकल्प हैं मगर इनको सामने नहीं आने दिया गया
पड़ताल के लिए सामग्री तलाशते हुए हमें पता चला कि बाजार में 10 रुपए से लेकर 10 हजार तक आतिशबाजी उपलब्ध रही हैं। लोग बजट के अनुसार आतिशबाजी खरीद सकते हैं। पुरानी आतिशबाजी के अतिरिक्त कई नई प्रकार की आतिशबाजियां भी इस दिवाली पर उपलब्ध हैं। लोग अपनी पसंद के अनुसार इको फ्रेंडली और सामान्य आतिशबाजी का मजा ले सकते हैं। आतिशबाजी के शौकीनों के लिए बाजार में इको फ्रेंडली सिलेंडर बम उपलब्ध हैं। बम से किसी प्रकार का प्रदूषण नहीं होता। इसकी खास बात यह है कि इसे कमरे के अंदर भी चलाया जा सकता है। इस बम को चलाने के लिए आग की जगह इसमें लगी रस्सी को खींचा जाता है। इस पर बम से हल्की पटाखे जैसी आवाज के साथ कागज निकलकर बिखर जाएंगे।। इसी प्रकार इको फ्रेंडली क्रिस्टल अनार भी बाजार में उपलब्ध हैं। इससे अनार चलाने का शौक भी पूरा किया जा सकता है और प्रदूषण से भी बचा जा सकता है। यह अनार 50 रुपए में बाजार में उपलब्ध है। इसका बाहरी कवर चाइनीज मिट्टी का बना है। बच्चों का आकर्षण चाईनीज बॉल बाजार में आ चुका है। बॉल को बार—बार बजाया जा सकता है। इसे हाथ में भी बजाया जाए तो कोई नुकसान नहीं होता। इसके अतिरिक्त इस बार बच्चों के लिए एक नया तिली बम उपलब्ध है। बम की विशेषता यह है कि इसे चलाकर पानी में भी फेंका जाए तो बम फ्यूज नहीं होगा।
फिरकी और अनार दोनों का एक साथ आनंद लेने के इच्छुक फ्लोरा फाउंटेन चलाकर इसे पूरा कर सकते हैं। पांच फ्लोरा फाउंटेन का बंडल 105 रुपए में उपलब्ध है। ये जानकारी हम दैनिक भास्कर के हरियाणा संस्करण में 4 नवम्बर 2010 को छपी एक रिपोर्ट को आधार बनाकर दे रहे हैं। जब 2010 में इको फ्रेंडली पटाखों की मौजूदगी थी तो इन 10 सालों में क्या हो गया कि दिवाली पर आतिशबाजी को पूर्ण रूप से प्रतिबन्धित कर देना पड़ा…हमारी समझ में यह एक प्रोपेगेंडा का नतीजा है। चीजें अगर बिगड़ने लगें तो उसके बेहतर विकल्प तलाशे जाते हैं, उसे पूरी तरह खत्म नहीं किया जाता।
रिपोर्ट का लिंक –
विकल्प हैं ग्रीन पटाखे
पटाखा कारोबार को नुकसान न हो, और इससे जुड़े लाखों मजदूरों का रोजगार न छीने इसलिए कोर्ट द्वारा ग्रीन पटाखों को बनाने की बात कही गयी थी। इस पहल को नीरी के वैज्ञानिकों ने सफलतापूर्वक पूरा किया। राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान (NEERI) नीरी, भारत सरकार के अंतर्गत काम करने वाले “वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद” (CSIR) सीएसआईआर की पर्यावरण शाखा की एक विशेष प्रयोगशाला है।
पटाखा कारोबार को नुकसान न हो, और इससे जुड़े लाखों मजदूरों का रोजगार न छीने इसलिए कोर्ट द्वारा ग्रीन पटाखों को बनाने की बात कही गयी थी। इस पहल को नीरी के वैज्ञानिकों ने सफलतापूर्वक पूरा किया। राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान (NEERI) नीरी, भारत सरकार के अंतर्गत काम करने वाले “वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद” (CSIR) सीएसआईआर की पर्यावरण शाखा की एक विशेष प्रयोगशाला है। नीरी ने ऐसे पटाखे बनाने का फैसला लिया, जो खुद पानी उत्पन्न करते है और यही बात इन्हे सामान्य आतिशबाजी से खास और बेहतर बनती है।
नीरी के मुताबिक इस प्रकार के पटाखों को सेफ वॉटर रिलीज़र नाम दिया गया है। इनके जलने पर पानी के कणो का निर्माण होता है। और सभी हानिकारक गैसें, जैसे नाइट्रोजन, सल्फर, कार्बन मोनो ऑक्साइड, आदि इस पानी में घुलकर नष्ट हो जाएँगी। ऐसे पटाखे भी बनाये गए है। जिनमें कुछ खास रसायनों के प्रयोग से ऑक्सिडाइजिंग (आक्सीकरण) की प्रक्रिया को अंजाम दिया जाता है।
उन्होंने लगभग 50 से 60 प्रतिशत कम एलुनिनियुम का इस्तेमाल करके बढ़िया गुणवत्ता, और सामान्य पटाखों की तरह चलने वाले क्रैकर्स तैयार कर लिए है। चूँकि यह दूसरों से अधिक सुरक्षित है, इसलिए इनका नाम भी सेफ मिनिमल एलुमिनियम या SAFAL (सफल) रखा गया है।

सरकारें काम कर रही हैं
आपने नीरी के बारे में जाना, बंगाल में भी इनको लेकर काम हो रहा है। बंगाल में एक प्रमुख उद्योग के रूप में आतिशबाजी के निर्माण को विकसित करने के लिए, राज्य सरकार 24 परगना दक्षिण के बरूईपुर में आतिशबाजी कारखानों का एक समूह स्थापित करने हेतु, एक विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार करने के लिए तमिलनाडु के शिवकाशी के आतिशबाजी अनुसंधान और विकास केंद्र (एफआरडीसी) को जोड़ेगी। । एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, पूरे उद्योग के लिए गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों को सुनिश्चित करने में एक विशेषज्ञ संगठन होने के नाते, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम और वस्त्र विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी डीपीआर तैयार करने के लिए एफआरडीसी को लिखने का निर्णय लिया गया है। । डीपीआर 24 परगना दक्षिण में बारूईपुर में आम सुविधा केंद्र के साथ क्लस्टर स्थापित करने के लिए तैयार होगा। बाद में, डीपीआर के अनुसार एक ही मॉडल को राज्य के अन्य हिस्सों में ऐसे क्लस्टर स्थापित करने के लिए दोहराया जाएगा।
बंगाल के कई गाँव, मुख्य रूप से 24 परगना दक्षिण पटाखा विनिर्माण कई लोगों के लिए आजीविका का स्रोत है और इस प्रकार उनके लिए एक बेहतर, सुरक्षित और खतरा मुक्त वातावरण पैदा करना है, राज्य सरकार ने डीपीआर तैयार करने के लिए एफआरडीसी जैसे विशेषज्ञ संगठन को जोड़ने का फैसला किया है। इस दिशा में 24 परगना दक्षिण में बरूईपुर में 50 एकड़ भूमि की पहचान पहले से ही की जा चुकी है और क्लस्टर स्थापित करने के लिए अन्य सभी प्रक्रियाएं भी प्रगति पर हैं।
क्लस्टर को सभी मानदंडों का पालन करते हुए स्थापित किया जाएगा और तकनीकी उन्नयन सुनिश्चित करेगा जो गुणवत्ता के काम में सुधार सुनिश्चित करेगा। गुणवत्ता नियंत्रण के लिए कच्चे माल के परीक्षण के लिए एक केंद्र भी होगा और साथ ही, काम का मानकीकरण भी होगा।
इसके अलावा, अधिकारी ने आगे बताया कि अत्यधिक ज्वलनशील सामग्रियों को संग्रहित करने के लिए गोदामों की उचित तरीके से योजना बनाने की आवश्यकता है और इस प्रकार कार्य शुरू करने से पहले संपूर्ण योजना की आवश्यकता है।
जरूरत है कि नकली दुनिया के मायावियों की मायावी बातों को भूलकर हम हरित पटाखों का विकल्प तैयार करें और न्यायालय जब फैसला दे तो एक बार उन लाखों लोगों की रोजी और उस हँसी के बारे में सोचकर संवेदनशीलता से निर्णय दे। सरकारें हरित पटाखों के विकल्प को लेकर गम्भीर हों, इसका प्रसार करें तो हम पटाखा उद्योग में भी आगे बढ़ सकते हैं।
(साभार – स्त्रोत और सन्दर्भ – मेकिंग इंडिया ऑनलाइन
दैनिक भास्कर
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