कोलकाता : हिन्दी दिवस के उपलक्ष्य में तारादेवी हरखचंद कांकरिया जैन महाविद्यालय में साहित्यिक कार्यक्रम का ऑनलाइन आयोजन 14.09.2020 दिन सोमवार को सम्पन्न हुआ।परिस्थिति के अनुकूल यह कार्यक्रम इस बार ऑनलाइन आयोजित किया गया ।इस कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि शिवपुर दीनबन्धु कॉलेज के हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ सत्यप्रकाश तिवारी ने अपने वक्तव्य के माध्यम से हम सबको समृद्ध किया ।इस अवसर पर हिन्दी विभाग की छात्रा रिमी कुमारी,नाज़िया खातून,निशा सिंह,गुंजन बैद,अदिति सिंह ने प्रसिद्ध कवियो की कविताओं की प्रभावपूर्ण आवृत्ति की। डॉ किरण सिपानी ने डॉ सत्यप्रकाश का संक्षिप्त परिचय दिया ।इस समारोह में हिन्दी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ बृजेश सिंह ने स्वागत भाषण दिया। कॉलेज की प्रधानाचार्या डॉ.मौसमी सिंह सेनगुप्ता ने विद्यार्थियों के जुनून को सहराते हुए विभाग के सभी प्रोफेसर एवं डॉ सत्यप्रकाश तिवारी जी का धन्यवाद किया।अंग्रेजी विभाग की प्रो.स्वरा ठक्कर ने अपने विचार व्यक्त किये । कार्यक्रम का संचालन रिया सिंह ने एवं धन्यवाद ज्ञापन प्रो.स्वाति शर्मा ने किया ।इस अवसर पर अन्य विभागों के प्राध्यापक – प्राध्यापिका एवं अनेक विद्यार्थि शामिल थे ।
हिन्दी की पहचान
– राधा कुमारी ठाकुर
हिन्दी की पहचान लगती है आसान, समस्त जगत की देवी
हिंदुस्तान की पहचान
भाषाओं में सबसे महान
सकल गुणों में श्रेष्ठ है हिंदी
सूर, कबीर की अतुल्य लेखनी
सिखाया और पढ़ाया है धर्म का पाठ
संस्कृत से हमारी संस्कृति बनी
हिन्दी से हिंदुस्तान खड़ा है
हिन्दी अपनी साहित्य और संस्कृति से,
बांध लिया है जगत को
जगत की ये अतुल्य लेखनी
मंत्रो की पहचान है
आदि से आधुनिक तक
साहित्य ने रचा इतिहास है
हिन्दी की पहचान
लगती है आसान….
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हिन्दी में हस्ताक्षर करने पर पदोन्नति रुकी मगर 11 साल लड़कर जीते ये बैंक अधिकारी
इंदौर : हिन्दी के लिए आज भी कई लोग संघर्ष कर रहे हैं। इन्हीं लोगों में से एक डॉ ओम बिल्लौरे हैं, जिन्होंने हिन्दी के लिए 11 साल तक बैंक प्रबंधन से लड़ाई लड़ी है। इस लड़ाई में उन्हें नुकसान भी काफी हुआ है। डॉ बिल्लौरे की पद्दोन्नति रुक गयी। कई बार तबादले हुए लेकिन उन्होंने अंग्रेजी में हस्ताक्षर नहीं किए। डॉ ओम बिल्लौरे भारतीय स्टेट बैंक में नौकरी करते हैं। प्रबंधन चाहता था कि वह सरकारी कागजातों पर अंग्रेजी में हस्ताक्षर करें। इसके लिए बैंक लोगों ने इनसे कई बार कहा भी लेकिन डॉ बिल्लौरे नहीं माने। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार डॉ ओम बिल्लौरे हरदा नगर स्थित एसबीआई की शाखा में लिपिक के रूप में पदस्थ थे। अपने कार्य के दौरान डॉ ओम बिल्लौरे ने बैंक के अंदरूनी दस्तावेजों पर हिन्दी में हस्ताक्षर किया। बैंक में मौजूद लोगों ने कहा कि आप हस्ताक्षर अंग्रेजी में कीजिए।
डॉ बिल्लौरे नहीं किए हस्ताक्षर
प्रबंधन की बात के आगे वह नहीं झुके और अंग्रेजी में सरकारी दस्तावेजों पर साइन नहीं किए। यह घटना साल 1983 की है। उसके बाद उस पत्रक को भोपाल शाखा में भेजा गया, यहां भी उनके ऊपर अंग्रेजी में हस्ताक्षर के लिए दबाव बनाया गया। लेकिन डॉ ओम बिल्लौरे अपनी बात पर डटे रहे। उन्होंने सीधे तौर अंग्रेजी में हस्ताक्षर से इनकार कर दिया और हिंदी के लिए यहीं से उनकी लड़ाई शुरू हो गई।
माँ के लिए नौकरी कुर्बान
उस सरकारी पत्रक को फिर मुम्बई भेजा गया। वहां भी डॉ ओम बिल्लौरे पर हस्ताक्षर के लिए दबाव बनाया गया। लेकिन डॉ बिल्लौरे वहां भी तैयार नहीं हुए। वहां उन्होंने सीधे शब्दों में कह दिया कि हिन्दी मेरी मां है और मां के लिए नौकरी भी कुर्बान है। अंग्रेजी में हस्ताक्षर नहीं करने की वजह से डॉ ओम बिल्लौरे का प्रमोशन भी रुका रहा है। इसके साथ ही हमेशा उनके तबादले होते रहे। वहीं, पदोन्नति के लिए साक्षात्कार के दौरान भी उन्हें अंग्रेजी में हस्ताक्षर के लिए कहा गया, तो उन्होंने इनकार कर दिया। एक स्थानीय अखबार से उन्होंने बात करते हुए कहा है कि 11 साल की लंबी लड़ाई के बाद 1994 में बैंक प्रबंधन ने हिन्दी में हस्ताक्षर स्वीकार कर लिया। 2009-10 के बाद से बैंकों में अब दोनों तरह के हस्ताक्षर स्वीकार किए जाते हैं। इससे पहले यह नियम था कि बैंक की हर शाखा अपने अधिकारी के हस्ताक्षर एक निर्धारित हस्ताक्षर पत्रक पर करवाकर बैंक मुख्यालय को भेजेगा। डॉ बिल्लौरे ने अपने इस निर्णय को लेकर ‘आधुनिक बैंकिंग में शब्द निर्णय’ नामक एक किताब भी लिखी है।
बंगाल में 500 और डाकघरों में सीएससी होंगे स्थापित
कोलकाता : डाक विभाग का पश्चिम बंगाल सर्किल इस वित्त वर्ष के अंत तक 500 और डाकघरों में सामान्य सेवा केंद्र (सीएससी) स्थापित करने की योजना बना रहा है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि राज्य के 260 डाक घरों में सीएससी हैं। कोलकाता नगर क्षेत्र के पोस्ट मास्टर जनरल (पीएमजी) अमिताभ सिंह ने पीटीआई-भाषा से कहा, “मार्च में लॉकडाउन से पहले पश्चिम बंगाल में सीएससी शुरू की गई थी। इसके बाद लॉकडाउन ने चीजों को धीमा कर दिया। अबतक 260 स्थानों पर हमारे पास सीएससी हैं।” उन्होंने कहा, “हमारी योजना इस वित्त वर्ष के अंत तक 500 और स्थानों पर यह (सीएससी) खोलने की है।” सीएससी ज्यादातर ग्रामीण आबादी की मदद करती है। इसके तहत ऑनलाइन टिकट बुकिंग, आधार नामांकन, प्रिंटिंग, मोबाइल डीटीएच का ई- रिचार्ज, आदि सुविधाएँ प्राप्त होंगी।
‘अगर विमान के भीतर कोई फोटोग्राफी करता पाया, तो लगेगा 2 सप्ताह का प्रतिबंध’
नयी दिल्ली : फिल्म अभिनेत्री कंगना रनौत की चंडीगढ़ से मुंबई की फ्लाइट में नियमों के उल्लंघन के मामले में डीजीसीए ने कड़ा रुख दिखाया है। उसका कहना है कि अगर किसी फ्लाइट में एयरक्राफ्ट रूल्स 1937 के रूल-13 का उल्लंघन किया गया तो उस रूट पर फ्लाइट के शेड्यूल को दो हफ्ते के लिए सस्पेंड कर दिया जाएगा। यह रूल फ्लाइट में वीडियोग्राफी व फोटोग्राफी से जुड़ा हुआ है। फ्लाइट में कंगना रनौत का वीडियो भी वायरल हुआ था। नागर विमानन महानिदेशक (डीजीसीए) ने कहा कि अगर किसी पूर्व निर्धारित उड़ान में किसी को फोटोग्राफी करते हुए पाया गया तो उस मार्ग पर उड़ान को दो सप्ताह के लिए निलंबित कर दिया जाएगा। डीजीसीए को इंडिगो की बुधवार की चंडीगढ़-मुंबई की एक उड़ान में सुरक्षा और सामाजिक दूरी संबंधी प्रोटोकॉल के कथित उल्लंघन का पता चला था जिसमें अभिनेत्री कंगना रनौत ने भी यात्रा की थी। इसके बाद डीजीसीए ने शुक्रवार को इंडिगो से ‘उचित कार्रवाई’ करने को कहा था। गत बुधवार को विमान के भीतर के घटनाक्रम के एक वीडियो के अनुसार संवाददाता और कैमरामैन रनौत की प्रतिक्रिया लेने के लिए आपस में धक्कामुक्की करते और भीड़ लगाते देखे गये। डीजीसीए ने शनिवार को अपने आदेश में कहा, ‘‘फैसला किया गया है कि अब से यदि किसी पूर्व निर्धारित यात्री विमान में इस तरह का कोई उल्लंघन (फोटोग्राफी) होता है तो उस मार्ग पर उड़ान को अगले दिन से दो सप्ताह की अवधि के लिए निलंबित कर दिया जाएगा।’’
डीजीसीए ने कहा कि अब यह फैसला किया गया है कि अगर किसी भी शेड्यूल्ड पैसेंजर एयरक्राफ्ट में सुरक्षा मानदंडों यानी सेफ्टी स्टैंडर्ड्स के साथ इस तरह का उल्लंघन होता है तो उस रूट पर फ्लाइट को अगले दिन से दो हफ्तों के लिए सस्पेंड कर दिया जाएगा। इसे तभी बहाल किया जाएगा जब एयरलाइन इसके लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करेगी। डीजीसीए ने सभी विमानन कंपनियो, एयरपोर्ट अथॉरिटी और दूसरे सभी एयरपोर्ट ऑपरेटर्स को इस आदेश की कॉपी भेजी है।
15 साल से बगैर छुट्टी लिए 10 हजार हाथियों का इलाज करते आ रहे हैं असम के डॉक्टर शर्मा
गुवाहाटी : एलिफेंट डॉक्टर के नाम से मशहूर 59 साल के डॉ. कुशल कोंवर शर्मा जब हाथियों के बारे में बात करते है तो उनके चेहरे पर खुशी और जोश दोनों दिखने लगते है। 35 साल हाथियों की देखभाल और इलाज में गुजार चुके डॉ.शर्मा ने असम की बाढ़ से लेकर इंडोनेशिया के जंगल तक हजारों हाथियों की जान बचाई है।
डॉ. शर्मा कहते है, ‘बाढ़ के दौरान काजीरंगा नेशनल पार्क मे कई बार तो हाथी तक बह जाते हैं। बच्चे मां से बिछड़ जाते है। ऐसे हालात में उनको देखभाल की जरूरत होती है। इसलिए मैं बाढ़ के समय उनकी मदद करने वहां मौजूद रहता हूं।’
हाथियों के बारे में डॉ.शर्मा कहते है, ‘हाथी काफी बुद्धिमान होते हैं। बाढ़ आने का अनुमान इन्हें छह-सात दिन पहले ही हो जाता है। इसलिए ज्यादातर हाथी काजीरंगा से निकल कर ऊंची पहाड़ी की तरफ चले जाते है।
हाथी नगालैंड होते हुए म्यांमार चले जाते थे
कुछ साल पहले तक बाढ़ से पहले काजीरंगा के लगभग सारे हाथी नगालैंड होते हुए म्यांमार चले जाते थे और वापसी के दौरान उनका शिकार हो जाता था। अब हाथियों ने इस बात को समझ लिया है और बाढ़ के दौरान काजीरंगा नहीं छोड़ते हैं।’
पूर्वोत्तर राज्यों के घने जंगलों में हाथियों का इलाज करने के लिए तीन लाख किमी दूरी तय कर चुके डॉ.शर्मा 20 से अधिक बार अपनी जान जोखिम में डाल चुके है। 15 सालों से बिना कोई साप्तहिक छुट्टी लिए 10,000 हाथियों का इलाज कर चुके हैं।
हाथियों की गतिविधि से उनकी भाषा समझ लेते हैं
डॉ. शर्मा कहते है, ‘मैं हाथियों की गतिविधि से उनकी भाषा समझ लेता हूं। उनसे संकेत में बात करता हूं। यहां के अधिकतर हाथी मुझे पहचानते है।’ हाथी प्रेम डॉ.शर्मा को हाथियों से प्रेम बचपन से हैं। उन दिनों को याद करते वह कहते है, ‘हमारे घर में उस दौरान लखी नाम की एक मादा हाथी हुआ करती थी और मेरा अधिकतर समय उसके आसपास खेलने में गुजरा था। वहीं से मेरे मन में हाथियों के लिए प्यार की शुरुआत हुई।’
इंडोनेशिया में डॉ. शर्मा के मॉडल से होती है हाथियों की देखरेख
डॉ.शर्मा ने नेपाल, श्रीलंका और इंडोनेशिया के सैकड़ों हाथियों का इलाज किया है। वे बताते है, ‘इंडोनेशिया में नब्बे के दशक के बाद हाथियों को जंगलों से पकड़कर एलिफेंट ट्रेनिंग कैंप में रखा जाता है। वहां कई हाथी मर रहे थेे। इसलिए उन लोगों ने मुझे बुलाया। आज भी वहां हाथियों की देखरेख मेरे बनाए कैप्टिव एलीफैंट मैनेजमेंट एंड हैल्थकेयर प्लान से हो रही है।
(साभार – दैनिक भास्कर)
कमल के फूलों की डंठल से धागे बनाकर रोजगार दे रही हैं विजयलक्ष्मी
कमल के फूलों के डंठल से धागा बनाने से पहले वे कमल के फूलों की चाय भी बना चुकी हैं। कोरोनावायरस महामारी ने लोगों की आजीविका को बुरी तरह से प्रभावित किया है जिसके चलते दुनिया भर में लाखों युवा बेरोजगार हैं। संकट के इस समय में ऐसे कई युवा हैं जो काम के नए-नए तरीके खोज रहे हैं।
ऐसा ही एक तरीका 27 साल की बिजयलक्ष्मी टोंगब्रम ने भी खोजा है। वे कमल के फूलों के डंठल से धागे बनाकर रोजगार के अवसर तलाश रही हैं।
बिजयशांति टोंगब्रम अपनी छोटी सी टीम के साथ यह काम कर रही हैं। उन्हें इस काम का आइडिया एक बुजुर्ग महिला से मिला। फिर उन्होंने खुद इस बारे में पता लगाया कि कमल के डंठल से आखिर कैसे धागा बनाया जा सकता है।
कमल के फूलों के डंठल से धागा बनाने से पहले वे कमल के फूलों की चाय भी बना चुकी हैं। उनका चाय वाला प्रयोग सफल होने के बाद एक बार फिर वे इन फूलों का उपयोग धागा बनाने के लिए कर रही हैं। वे चाहती हैं सरकार इस स्टार्ट अप आइडिया को आगे बढ़ाने में उनकी मदद करे।
(साभार – दैनिक भास्कर)
कोयम्बटूर में ट्रांसजेंडर के एक समुह ने शुरू किया ‘कोवाई ट्रांस किचन’
कोयम्बटूर : तमिलनाडु के कोयम्बटूर में ट्रांसजेंडर्स के एक समूह ने कोविड -19 लॉकडाउन के कारण उनके जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने के बाद एक बार फिर रोजगार पाने की राह पर अपने कदम बढ़ाए हैं। उन्होंने 32 सीटों वाले रेस्तरां की शुरुआत की है जिसे ‘कोवाई ट्रांस किचन’ नाम दिया है।
पिछले कुछ महीनों में लॉकडाउन की वजह से ट्रांसजेंडर ने कई मुश्किलों का सामना किया है। ऐसे कई ट्रांसजेंडर्स हैं जिनके लिए दो वक्त की रोटी-रोजी चला पाना भी कठिन है। इन हालातों से उबरने के लिए ट्रांसजेंडर द्वारा की गई इस पहल की तारीफ हो रही है।
कोयंबटूर ट्रांसजेंडर एसोसिएशन की हेड संगीता के अनुसार, हम अब दूसरे रेस्तरां को खोलने की योजना बना रहे हैं। हमारे समुदाय के लिए ये बहुत जरूरी है कि वे भीख मांगना बंद करें और आत्मनिर्भरता के रास्ते अपनाएं।
संगीता ने ये भी बताया कि किस तरह तमाम मुश्किलों के बाद वे इस रेस्तरां की शुरुआत कर पाईं। उनकी कहानी समाज में लॉकडाउन की वजह से बेरोजगार हुए सभी लोगों को प्रेरित करेगी।
इस हफ्ते कोयंबटूर के वेंकटस्वामी रोड़ पर इस रेस्तरां की शुरुआत हुई है। इस शहर में रहने वाले राजन एक समाज सेवी हैं। उन्होंने बताया कि ”मैंने पिछले हफ्ते देखा था कि यहां कुछ ट्रांसजेंडर्स मिलकर एक रेस्तराँ शुरू कर रहे हैं। मैं उनके इस काम को देखकर बहुत खुश हुआ। इस रेस्टोरेंट के जरिये वे अपनी ही तरह के अन्य ट्रांसजेंडर्स को रोजगार के अवसर भी उपलब्ध करा रहे हैं”।
कोयंबटूर में रहने वाले मर्सी का कहना है – ”मैं आमतौर पर तमिलनाडु और दक्षिण भारत के अलग-अलग शहरों की यात्रा करता हूं। मुझे खाने का बहुत शौक है। कोवाई ट्रांस किचन का खाना बहुत स्वादिष्ट है। ये बहुत अच्छा व्यवसाय है”।
(साभार – दैनिक भास्कर)
हिन्दी में दवाओं के नाम लिखते हैं ये डॉक्टर
नोएडा : डॉक्टरों की लेखनी की जटिलता अकसर चर्चा का विषय बनी रहती है। दवाई की पर्ची पर डॉक्टरों की लिखावट का पढ़ना और समझ पाना आम आदमी के लिए मुश्किल होता है। दुनिया में हिन्दी के बढ़ते कद के चलते अब कई डॉक्टरों ने हिन्दी में ही दवा के पर्चे बनाने की मुहिम छेड़ दी है। इस मुहिम की शुरुआत उत्तर प्रदेश के नोएडा से शुरू हुई है।
शहर के जिला अस्पताल के एक डॉक्टर ओपीडी में अह हिन्दी में भी दवा के पर्चे बना रहे हैं। डॉक्टर का कहना है कि अगर चीनी डॉक्टर अपनी राष्ट्र भाषा में पर्चा बना सकते हैं तो भारतीय डॉक्टर हिन्दी में क्यों नहीं लिख सकते।कई मरीज करते थे माँग
सेक्टर-30 जिला अस्पताल के फिजिशन डॉ. संतराम वर्मा बताते हैं कि वह ओपीडी में पर्चे पर जांच और दवाएं हिन्दी में ही लिखते हैं ताकि मरीजों को भी समझ आए कि उन्हें क्या दवा और जाँच लिखी है। जब मरीज ओपीडी में आता है तो वह कहता है कि उसे हिंदी में ही दवा लिख दीजिए ताकि कोई परेशानी न हो।
मरीजों के लिए समझना होता है आसान
डॉ. संतराम ने बताया कि उनकी मुहिम में कुछ और डॉक्टर भी शामिल हुए हैं और उन्होंने भी हिन्दी में पर्चे बनाने शुरू कर दिए हैं। जिला अस्पतालों में आने वाले अधिकांश मरीज ग्रामीण इलाकों के होते हैं। हिन्दी में पर्चा होने पर उन्हें भी बार-बार डॉक्टर से कुछ पूछने की जरूरत नहीं पड़ती है।
बेस्ट फ्रेंड्ज सोसायटी ने वितरित की पाठ्यसामग्री
कोलकाता : बेस्ट फ्रेंड्ज सोसायटी ने हाल ही में जरूरतमंदों के बीच पाठ्य सामग्री तथा अन्य आवश्यक सामग्री वितरित की। ये पाठ्य पुस्तकें केजी से दसवीं कक्षा के विद्यार्थियों में वितरित की गयीं। इन किताबों में स्कूल की पाठ्यपुस्तकों से लेकर उपन्यास, भोजन, कपड़े, आर्ट और क्राफ्ट सामग्री, जूते भी वितरित किये गये। लगभग 750 बच्चों को इन प्रदर्शित सामग्रियों में से उनकी पसन्दीदा वस्तुएँ चुनने को कहा गया। बेस्ट फ्रेंड्ज की सह संस्थापक शगुफ्ता हनाफी ने कहा कि संस्था शिक्षित करने और सशक्त, इन दो शब्दों पर अधिक जोर देती है। खुशी की बात है कि अधिकतर बच्चों ने अपने लिए किताबों को चुना जिनमें लड़कियाँ भी शामिल थीं।




