मुम्बई :आप अगर यह सोच रहे हैं कि 60-65 साल में रिटायर हो जाएं तो आपको उससे पहले यह भी देखना चाहिए। अशोक सूता एक बार फिर चर्चा में हैं। वे 60-65 के नहीं हैं। ना ही वे रिटायर हुए हैं। वे 77 साल के हैं और इस उम्र में उन्होंने दूसरा स्टार्टअप खड़ा कर दिया। सिर्फ खड़ा ही नहीं किया, बल्कि पूरी तरह से स्थापित कर उसका आईपीओ लाया। आईपीओ भी कोई एक दो गुना नहीं भरा, बल्कि 150 गुना भरा। वह भी ऐसे माहौल में लाया जब कोविड का असर पूरी अर्थव्यवस्था पर है।
उनकी हिम्मत देखिए की आईपीओ का बाजार पूरी तरह से सूना है। सेबी से मंजूरी पा कर दर्जनों कंपनियां आईपीओ इसलिए नहीं लाई क्योंकि उन्हें पैसा न मिलने का डर है। पर अशोक सूता ने इसी डर के माहौल में एंट्री की और इस महीने में आईपीओ की लाइन लग गई। 700 करोड़ चाहिए था, मिला 58 हजार करोड़ से ज्यादा
अशोक सूता को हैप्पिएस्ट के आईपीओ से केवल 700 करोड़ रुपए चाहिए था। उन्हें निवेशकों से 58 हजार करोड़ से ज्यादा की राशि मिली। रिटेल निवेशकों ने भी दम लगाया और 70 गुना सब्सक्रिप्शन दिया। इसकी लिस्टिंग बुधवार को है। किसी भी उद्यमी के लिए दूसरी बार सफलता का स्वाद चखना बड़ा मुश्किल होता है। पर 77 साल के अशोक सूता उन असाधारण लोगों में से एक हैं। 13 साल पहले के आईपीओ की याद दिला दी
हैप्पिएस्ट माइंड्स के 700 करोड़ रुपए के इनिशियल पब्लिक ऑफर से करीब 13 साल पहले उन्होंने अपनी पिछली कंपनी माइंडट्री का आईपीओ लाया था और उस इश्यू को 103 बार ओवरसब्सक्राइब किया गया था। सूता ने कहा कि लोगों को लगा कि हम लॉकडाउन के बीच में आईपीओ के लिए फाइल करने के लिए पागल हुए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि उन्हें अपने कारोबार को देखते हुए पूर्ण विश्वास था। 76 प्रतिशत राजस्व पर कोरोना का भी असर नहीं
उनके रेवेन्यू कुल रेवेन्यू के 76 प्रतिशत हिस्से पर लॉकडाउन या कोरोना का कोई असर नहीं हुआ। उस रेवेन्यू का आधे से अधिक शिक्षा और हाईटेक क्षेत्रों से आता है। उन्होंने कहा कि डिजिटल सेवाओं पर कंपनी का फोकस भी इसे पारंपरिक आईटी कंपनियों से बिल्कुल अलग स्तर पर रखता है । तीन सालों में 21 प्रतिशत सीएजीआर की दर से बढ़ा रेवेन्यू
हैप्पिएस्ट माइंड का कारोबार पिछले तीन सालों में लगभग 21% सीएजीआर की दर से बढ़ा है। वह भी ऐसे समय में, जब आईटी उद्योग महज 8-10% तक की ही ग्रोथ हासिल कर पाया। सूता ने आईआईटी-रुड़की से इंजीनियरिंग की और श्रीराम रेफ्रिजरेशन इंडस्ट्रीज में रहे। उन्हें 1985 में अजीम प्रेमजी ने विप्रो के तत्कालीन आईटी बिजनेस बनाने के लिए हायर किया था। इसी के बाद अगले 14 वर्षों में सूता विप्रो का चेहरा बन गये। इसके बाद प्रेमजी की कंपनी में वाईस चेयरमैन भी बने। 10 लोगों के साथ 1999 में माइंडट्री का सूता ने नेतृत्व किया
1999 में सूता ने विप्रो और अन्य कंपनियों के 10 वरिष्ठ अधिकारियों के एक समूह का नेतृत्व किया, जो आगे चलकर माइंडट्री बना। अगले एक साल तक सब कुछ अच्छा ही हुआ। उससे भी अच्छा तब हुआ जब 2007 में इसका आईपीओ आया। यह आईपीओ 100 गुना से ज्यादा सब्सक्राइब हुआ। हालांकि यह खुशी बहुत दिन तक सूता के साथ नहीं रह पाई। कारण कि वहां संस्थापकों के बीच मतभेद उभरने लगे। सूता एक ओर और बाकी सब एक ओर थे माइंडट्री में
ऐसा लग रहा था जैसे एक तरफ सूता थे और दूसरी ओर बाकी सब। यह अभी भी बहुत स्पष्ट नहीं है कि वे मतभेद क्या थे। कुछ इसे मोबाइल हैंडसेट कारोबार में प्रवेश के लिए सूता की जोर आजमाइश को देखते हैं जिससे काफी नुकसान हुआ था। जबकि कुछ का कहना है कि संस्थापकों के बीच जिम्मेदारियों को लेकर मतभेद थे। आखिरकार सूता ने माइंडट्री छोड़ दिया और कम्पनी में अपने सभी शेयरों को बेच दिया। 2011 में 68 की उम्र में धैर्य और दृढ़ता का एक उल्लेखनीय प्रदर्शन कर उन्होंने हैप्पिएस्ट माइंड की स्थापना की। इसलिए हैप्पिएस्ट माइंड का नाम दिया
सूता ने बताया कि उन्होंने कंपनी को हैप्पिएस्ट माइंड्स का नाम इसलिए दिया कि ताकि कम्पनी को यह लगे कि वे अपने खुश कर्मचारियों की बदौलत ग्राहकों की खुशी-खुशी सेवा कर रही है। लेकिन चूंकि हैप्पिएस्ट माइंड ने यह संकेत नहीं दिया कि कंपनी क्या करती है इसलिए सूता ने द माइंडफुल आईटी कंपनी की टैग लाइन बना दी। इसका मतलब यह था कि यह एक आईटी कंपनी है जो अपने लोगों, ग्राहकों और समुदाय के प्रति अपनी तरफ से सजग होगी। डिजिटल के सहारे खेला दांव
सूता ने कहा की कम्पनी ने डिजिटल पर अपना ध्यान केंद्रित किया। आज जबकि बड़ी- बड़ी आईटी कंपनियों के कामकाज का 30 से 50% हिस्सा डिजिटल में होता है तो वही हैप्पिएस्ट माइंड के लिए शत प्रतिशत कामकाज डिजिटल है। सूता का मानना है कि दुनिया में केवल चार फर्में हैं जिन्हें 100% डिजिटल कहा जा सकता है – हैप्पिएस्ट माइंड, ईपैम सिस्टम्स, एंडवा और ग्लोबेंट। हमेशा सार्वजनिक कम्पनियों को चलाना पसंद किया
सूता ने पिछले हफ्ते कहा था कि उन्होंने हमेशा सार्वजनिक कंपनियों को चलाना पसंद किया है। उन्होंने कहा कि जब कोई कंपनी सार्वजनिक हो जाती है तो कॉर्पोरेट गवर्नेंस में सुधार का दबाव होता है। उन्होंने कहा कि निजी पूंजी पर निर्भरता से कोई मदद नहीं मिलती है। वह उबर और लिफ्ट जैसी भारी उधारी लेनेवाली कंपनियों के अनुभव की ओर इशारा करते हैं। निवेशकों को सूता के नाम पर है भरोसा
अशोक सूता के नाम पर निवेशकों को काफी ज्यादा भरोसा है। हैप्पिएस्ट माइंड की शुरुआत उन्होंने बंगलुरू में अप्रैल 2011 में की थी। अशोक सूता भारत की इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (आईटी) सर्विसेज इंडस्ट्री के जाने माने नाम हैं। सूता ने आईआईटी-रुड़की से इंजीनियरिंग की है। इन्होंने तीन बड़ी आउटसोर्सिंग कंपनियों के प्रमुख की भूमिका निभाई है। इसमें प्रमुख कंपनी विप्रो लिमिटेड है। बाकी दो पब्लिक कंपनियां हैं। सामाजिक जिम्मेदारियों को देते हैं प्राथमिकता
अजीम प्रेमजी की तरह अशोक सूता भी सामाजिक जिम्मेदारियों को तवज्जो देते हैं। उनके मुताबिक शोध से पता चलता है कि समाज को कुछ देने के क्षणों में खुशी सबसे अधिक होती है। सूता कहते हैं कि हम अपनी उपलब्धियों की खुशी का इजहार अपनी टीम के सदस्य और कस्टमर के नाम पर स्कूल में गरीब बच्चों को मिड डे मील में भोजन देकर करते हैं। हमने आईपीओ के आने के वक्त तक एक मिलियन बच्चों को खाना देने का लक्ष्य निर्धारित किया था। सूता कहते हैं कि हैप्पिएस्ट माइंड्स के लिए अगर हम पूरे भारत को आउटसोर्सिंग बाजार मानते तो हमें लगता है कि हम 150 अरब डॉलर के बाजार में होते। हालांकि हमने सिर्फ खास तकनीकों और डिजिटल बदलाव पर फोकस किया। उस लिहाज से हमें बाजार की समीक्षा करनी पड़ी और कई ऐसे सेगमेंट से हम पीछे हट गए जिसमें हम कारोबार नहीं करने वाले थे।
लड़का हो या लड़की, बात जब फ्लर्टिंग की आती है तो जरूरी नहीं कि वे एक दूसरे के इशारे को पूरी तरह से समझ ही जाएं। ऐसे में उनके लिए अपने दिन की बात बयां करना कई बार मुश्किल होता है। यूनिवर्सिटी ऑफ कांसास की रिसर्च के अनुसार लड़के लड़कियों के फेशियल एक्सप्रेशन देखकर उनके रोमांटिक होने का अंदाजा लगा लेते हैं।
जर्नल ऑफ सेक्स रिसर्च में प्रकाशित स्टडी की सीरिज के अनुसार कई एक्ट्रेस हों या आम महिलाएं, वे फ्लर्टिंग के लिए अलग-अलग तरह के एक्सप्रेशन देना पसंद करती हैं। टीम ने पाया कि कुछ महिलाएं अपने चेहरे के चुलबुले भावों का इस्तेमाल पुरुषों को आकर्षित करने के लिए करती हैं। वहीं कई पुरुष भी महिलाओं के इन भावों को एकदम पहचान लेते हैं।
ऐसे फेशियल एक्सप्रेशन देने के लिए लड़कियां हो या महिलाएं वे अपने सिर को एक तरफ थोड़ा नीचे झुकाती हैं। इस दौरान उनके चेहरे पर मुस्कान होती है। वे पुरुषों की ओर लगातार देखती हैं। इससे पुरुषों को खुद में महिलाओं की रूचि समझ में आती है। इस तरह के एक्सप्रेशन उनके लिए पॉजिटिव साइन होते हैं।
कांसास यूनिवर्सिटी में साइकोलॉजी के प्रोफेसर और इस स्टडी के को ऑथर ओमरी गिलेथ कहते हैं – ”संभावित रूप से यह एक कॉम्बिनेशन है जिसमें कुछ महिलाओं के एक्सप्रेशन अन्य महिलाओं की तुलना में ज्यादा इफेक्टिव हो सकते हैं”। बॉडी लैंग्वेज एक्सपर्ट ब्लैंका कॉब को महिलाओं द्वारा पुरुषों को दिए गए एक से अधिक एक्सप्रेशन सामान्य लगते हैं। उन्हें यह देखकर अच्छा लगता है कि वे सिर झुका कर, ठोड़ी नीचे करके, आंखें ऊपर और मुस्कुराकर पुरुषों के सामने अपनी रूचि जाहिर करती हैं।
15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ लेकिन यह आजादी विभाजन के कंधे पर चढ़कर आई। अपने नेताओं की बात को भारतवासियों ने स्वीकार कर लिया कि विभाजन के बिना शायद आजादी का सपना पूरा ही नहीं हो सकता और आजादी की खुशी के रंगों के बीच विभाजन का बदनुमा दाग हमेशा अखरता और कसकता रहा। 1947 में विभाजन का जो दुस्वप्न हमने देखा था, वह पहला भले ही था अंतिम बिल्कुल नहीं। उस दिन तो विभाजन की महज शुरुआत हुई थी, तब से देश में लगातार होनेवाले विभाजनों का सिलसिला अब भी जारी है, कभी भाषा, कभी प्रांत, तो अभी जाति के नाम पर। बड़े -बड़े राज्य दो टुकड़ों में बंटकर दो नामों से तो जाने गए लेकिन इससे वह कितना समृद्ध या अशक्त हुए यह एक बहस सापेक्ष प्रश्न है। कुछ बड़े राज्य जिस तरह दो खंडों में बंटे उसी तरह बिहार भी विभाजित हुआ और झारखंड अस्तित्व में आया। उत्साही कार्यकर्ताओं और आंदोलनकारियों ने “धुसका चना, खाएंगे झारखंड बनाएंगे” का जुझारू उद्घोष करते हुए लंबे आंदोलन के बाद झारखंड तो बना ही लिया, साथ ही गर्व से अपने ही बिछड़े भाइयों को चिढ़ाते हुए कहा भी-“रबड़ी मलाई खइलू , कइलू तन बुलंद/ अब खइहा शकरकंद, अलगा भइल झारखंड।” लेकिन खुशी की इस गर्वोक्ति के पीछे आवाज की जो अनुगूंज थी वह आम जनता की नहीं उन ऊंची- ऊंची कुर्सियों पर बैठे हुए नेताओं की थी जिन्हें झारखंड की वन संपदा का दोहन करके अपनी रोटियाँ ही नहीं सेंकनी थी बल्कि उनपर मलाई की गाढ़ी परत भी थोपनी थी जिससे उनके और उनके चहेतों के शरीर और संपत्ति का आयतन बढ़ता जाए और जिस आम जनता के उत्थान के लिए नया प्रदेश बना था वह भूख भर भात को तरसती हुई तड़प -तड़प कर दम तोड़ दे। जिस वनसंपदा पर झारखंडियों का सहज अधिकार था उससे उन्हें बेदखल कर दिया गया। कभी देश और समाजविरोधी होने का आरोप लगाकर तो कभी कोई नई दफा लगाकर उन्हें जेलों में कैद कर दिया गया। भूख की यह आग इतनी भयंकर थी कि इसमें उनकी जमीन ही नहीं खाक हुई बल्कि उनकी अस्मिता भी भस्म हो गई। परिवार बिखर गया। खुले जंगल में कुलांचे भरनेवाली उनकी बेटियाँ दरबदर हो गईं। रोली की तरह बहुत से बच्चे कुपोषण के कारण असमय ही काल कवलित हो गए। बाहरी लुटेरों ने उन्हें इस तरह लूटा कि उनकी कथाएँ, गीत, सपने कुछ भी बाकी न रहे। घर की लाडली बेटियाँ जिनकी चहचहाटों से घर गूंजता ही नहीं संवरता भी था, जो छोटी सी उम्र में खुद को संभालने से ज्यादा परिवार की खुशियों के बारे में और छोटे भाई बहनों की भूख और उनके भविष्य के बारे में सोच- सोचकर अपने सपनों को बिसार देती थीं, कभी मांसलोभी नरपशुओं को बेच दी गईं तो कभी शहर में नौकरी करने के लिए जाकर शोषण के ऐसे अनवरत चक्र का हिस्सा बनीं कि उसे ही अपनी नियति मानकर उस दलदल से निकलने की बात भी भूल गईं। उन्हें और उनके परिवार वालों को भरपेट भात खिलाने का सपना दिखाकर इस कदर लूटा और चींथा गया कि वह अपने देह, मन और सपनों को ही भुला बैठीं।
अपने ही देश, प्रांत और अपने सुख के लिए बने नये प्रदेश के अंदर निरंतर शोषित होते और वहाँ से बेदखल हो दर दर बिखरते इन तमाम पात्रों की दर्दभरी कहानियों के साथ पूरे देश की धमनियों में लाइलाज कैंसर की तरह पसरते भ्रष्टाचार और उससे रिसते जहर के साथ उसके शिकार आमजनों की पीड़ा के दंश के तमाम उदाहरणों के साथ शोषण के चक्र के तमाम कोणों को सुविख्यात कथाकार अल्पना मिश्र ने अपने उपन्यास “अस्थिफूल” में बेहद तल्खी के साथ बयान किया है।
असल जिंदगी की परेशानियों और जिल्लतों को कथा के ताने बाने में कसकर, लेखिका देश की वर्तमान स्थिति पर गहरी और आलोचनात्मक दृष्टि डालती हैं। झारखंड, वहाँ का जन जीवन और चुनौतियां भले ही उपन्यास के केन्द्र में हैं लेकिन कथा को विस्तार देती हुई अल्पना में पूरे देश की स्थिति पर अपनी विहंगम दृष्टि डालते हुए उसके हर कोने की समस्याओं को समेटने की भरसक कोशिश करती हैं। इसी तरह स्त्री भी आलोच्य उपन्यास के केन्द्र में भले है लेकिन लेखिका सिर्फ उस स्त्री का ही नहीं बल्कि देश का भी शोषण करनेवाले सरकारी- गैरसरकारी संस्थाओं और कर्मचारियों पर अपनी कलम से प्रहार करते हुए उनके छद्मवेश को छिन्न भिन्न करते हुए उसके वास्तविक स्वरूप को जनता के सामने उजागार करती हैं। 1978 में महेश कौल निर्देशित और राजकपूर -हेमा मालिनी अभिनीत एक फिल्म आई थी “सपनों का सौदागर” जिसमें फिल्म का नायक अन्य चरित्रों के निराश- हताश जीवन और मन में सपनों की फसल बोते हुए उन्हें जिंदगी जीने का हौसला देता है, उनकी खोई हुई खुशियाँ उन्हें वापस लौटाने की कोशिश करता है। लेकिन फिल्मी सच्चाई दुनियावी सच्चाई से अलग होती है। शायद इसीलिए इस उपन्यास ही नहीं देश में भी सपनों के तमाम सौदागर नेताओं या समाज सुधारकों के वेश में घूमते हैं जो लोगों को जीने का हौसला देने के बजाय उनकी बची -खुची उम्मीदें भी उनसे छीन लेते हैं। देश की आम जनता को बार -बार सपनों की यह झूठी फसल बेची जाती है जो न तो उनकी भूख मिटा सकती है न ही उनका जीवन सुधार सकती है।
यह झूठा छलावा उनकी जिंदगी को बदरंग करते हुए उनकी आंखों और मन का हर सपना उनसे छीन लेता है । इसके बावजूद जनता बार बार तथाकथित जनसेवकों पर भरोसा करती है और आंखों में उम्मीद का एक सपना सजोने की शर्त पर अपनी जिंदगी, अपनी सांसों तक को गिरवी रख देती है। लेकिन धोखाधड़ी की यह साजिश धीरे -धीरे आम लोगों की समझ में आने लगती है और वे इन ‘सपनबेचवा’ लोगों को पहचानकर इनसे दूरी बनाने लगते हैं। सुजन महतो, बिरजू, पलाश, इनारा, चंदा, दीपा आदि तमाम पात्रों की आंखों में सुबह के फूल की तरह उगा यह सपना धीरे -धीरे मुरझाता जाता है। हालांकि इन प्रकृतिप्रेमी झारखंडी लोगों के सपने कोई बहुत बड़े नहीं थे। पेट भर भात और अपनी जमीन और जंगल पर स्वतंत्रता से विचरने और वहाँ की प्राकृतिक संपदा का उपभोग करने के साथ ही उसका संरक्षण करने का सपना ही वह देखते थे। लेकिन आंदोलनकारियों ने झारखंड को अलग राज्य बनाने का सपना तो पूरा किया पर वहाँ के मूल निवासियों अर्थात झारखंडियों को अपनी ही जमीन से बेदखल होना पड़ा। जिस किसी ने इसका विरोध किया उन्हें इस तरह बेदर्दी से कुचल दिया गया कि उनके सहज स्वाभाविक जीवन की लय बाधित होकर बिखर गई। बीजू जैसे तमाम बच्चों का परिवार तिनका तिनका ऐसे बिखरा कि भाई और पिता जब अपनी बिखरी- बिछड़ी, बहन- बेटियों को खोजने निकले तो उनका रास्ता रोकने के लिए तमाम कानूनी अड़चनें खड़ी हो गईं। बहन द्वारा भाई और बेटी द्वारा पिता को पहचान लेना ही काफी नहीं था ,उस पहचान का कानूनी कागज पेश करना भी जरूरी था और भारत जैसे विकासशील देश में साधारण आदमी के लिए ये कानूनी कवायदें कितनी मुश्किल होती हैं यह तो भुक्तभोगी ही जानता है।
उपन्यास झारखंड की वन संस्कृति, आदिवासी संस्कारों और लोककथाओं का वर्णन करता हुआ वहाँ ढोंगी दिकुओं के कब्जे की कहानी भी कहता है। सीधे -सादे वनवासियों के दिलों दिमाग को विकास का सपना दिखाकर तथाकथित उद्धारकर्ता किस तरह फुसलाकर कब्जा लेते हैं यह लेखिका संकेतों और छोटी -छोटी लोककथाओं के माध्यम से बड़ी कुशलता से बयान करती हैं लेकिन लोककथाओं का सहज स्वाभाविक और तयशुदा सुखद अंत वास्तविकता की जमीन पर आकर अपना रूप बदल लेता है। कथा की सोनचंपा न केवल अपने साहस और शक्ति से जंगलवासियों को अभय देती है बल्कि शापग्रस्त राजकुमार की नियति को भी बदल देती है लेकिन वास्तविक कहानियों की वनकन्याओं की नियति बिल्कुल अलग होती है। वह अपनी गरीबी और भुखमरी के शाप से मुक्ति पाने की कोशिश में एक ऐसे यंत्रणा की सुरंग में कैद हो जाती हैं जहाँ से निकलने के सारे रास्ते बंद कर दिए जाते हैं। दुख की नीली नदी में तैरते- तैरते अंततः वह किनारे पर पहुंचने का हौसला भी खो देती हैं। पथराए हुए तन मन के साथ वह अपनी जिंदगी की टूटी फूटी नाव को हवा की मनमर्जी के हवाले कर देती हैं।
पलाश और इनारा या फिर रानी सुंदरी जैसी तमाम किशोरियों का जीवन झारखण्ड की बेबस लड़कियों की जिंदगी की सच्ची तस्वीर पेश करता है। आलोच्य उपन्यास मेँ सिर्फ झारखंड नहीं बल्कि संवासिनी गृह में रहने को बाध्य देश के हर हिस्से की लड़कियों की तकरीबन एक समान नियति को दर्शाया गया है। उत्तर भारत के एक बड़े हिस्से में वह सम्मान रक्षा के नाम पर खाप पंचायत के निर्दय फैसले का शिकार होती हैं। संतोष की सहेली को मारकर पेड़ पर लटका दिया जाता है। संतोष जैसी स्त्रियों को परिवार की कृपा से अगर शिक्षा की थोड़ी रोशनी मुहैय्या होती भी है तो उसके पीछे परिवार का स्वार्थ छिपा होता है। यह रोशनी भी उतनी ही मिलती है जिसमें वह किताब बांचकर, डिग्री हासिल करके पैसे कमाने और परिवार को आर्थिक समृद्धि के रास्ते पर बढ़ाने में सक्षम हों। जैसे ही वह किताब बांचने से आगे बढ़ते हुए किताब लिखने या इतिहास बदलने के साथ अपनी इच्छानुसार फैसले लेने के रास्ते पर आगे बढ़ने का हौसला सहेजती हैं वैसे ही उनके पांव के नीचे से जमीन खींच ली जाती है, उनके पर कतर दिए जाते हैं। लेकिन इसके बावजूद ये औरतें अपने हौसले को टूटने नहीं देतीं। संतोष को अपनी उस सहेली की चीखें चैन से सोने नहीं देतीं जिसकी मदद के लिए वह समय पर नहीं पहुंच पाई थी। इसी कारण वह अपने पास और दूर की हर बेबस और शोषित औरत के साथ बहनापे का तार जोड़ लेती है और भरसक उनकी मदद करने की कोशिश करती है। जब तक उसकी यह परोपकारी सामाजिक छवि परिवार के तथाकथित रूतबे को ऊंचाई तक ले जाती है, परिवार उसकी राह नहीं रोकता। लेकिन जैसे ही वह समाज की तथाकथित मर्यादित छवि को चुनौती देती है, परिवार उसके परों को कतरकर उसकी उड़ान को बाधित कर देता है। स्त्री “मोलकी” हो या “ब्याही” उसकी नियति में कोई विशेष अंतर नहीं होता। दोनों का दोहन और इस्तेमाल परिवार अपनी इच्छानुसार करता है। औरतें इसे अपनी नियति मानकर स्वीकार भी करती हैं और सामंजस्य और बर्दाश्त की हदों तक जाकर परिवार की तथाकथित मर्यादा और झूठे सुख और सम्मान को बचाए रखने की भरसक कोशिश भी करती हैं। लेकिन जब हिम्मत जवाब दे जाती है तो संतोष की तरह बगावत का झंडा हाथ में उठाकर निकल पड़ती हैं, सिर्फ अपनी ही नहीं तमाम औरतों की नियति को बदल देने के लिए। इसी तरह तमाम सताई हुई संवासिनी गृह की औरतें अपने मानस को पाषाण सा मजबूत कर अपने मांस को जला तपा नष्ट कर अपनी हड्डियों को हथियार बना लेती हैं ताकि समाज के अत्याचार का सामना कर पाएं। उनकी अस्थियों को मुर्झाए बासी फूलों की तरह नदी में बहा दिया जाए इसके पहले ही वह अपनी तमाम शक्ति को समेटकर समवेत ढंग से समाज की मान्यताओं और उसके शोषण का मुकाबला करने का संकल्प लेती हैं। लेखिका इन तमाम ब्योरों के माध्यम से समाज की तमाम महिलाओं को यह संदेश देती हैं कि अगर उन्हें अपनी उन्नति का रास्ता प्रशस्त करना है तो अपनी एकजुटता को बनाए रखना है। पुरुषतांत्रिक समाज औरत को औरत की दुश्मन बनाकर उन्हें एक दूसरे के खिलाफ खड़ा करके , लड़ाते हुए बंदर की तरह उनके झगड़ों का फैसला करता है और औरतें उसके फैसले को नतमस्तक होकर स्वीकारती हुई अपनी अस्मिता के सवाल को भूल जाती हैं। जब तक स्त्रियां इन हथकंडों को पहचानकर सतर्क नहीं होंगी उनकी स्थिति और नियति में बदलाव नहीं आएगा। अल्पना अपने उपन्यास की स्त्री पात्रों को एकजुटता का महत्व समझाती हुई संगठित होकर लड़ने और जूझने का मंत्र देती हैं। आलोच्य उपन्यास में झारखंडी संस्कृति और उसकी विशेषताओं को पूरी समग्रता से उभारा गया है और वह सांस्कृतिक पहचान किस तरह तथापि आधुनिकीकरण और छद्म विकास के नाम पर योजनाबद्ध ढंग से धीरे धीरे धूमिल कर दी गई इसे लेखिका ने सूक्ष्मता से अंकित किया है। जिस आदिवासी संस्कृति को सम्मानपूर्वक जीवित रखने के लिए सिधू कानू जैसे लोकनायकों ने अपनी जान की बाजी लगा दी थी वही भूमि अपने सौंदर्य और स्वातंत्र्य को खोकर किस तरह दोहन का शिकार होती है उसके संकेत भी स्थान -स्थान पर मिलते हैं। बाद की पीढ़ी के बहुत से आंदोलनकारी जो अपनी जमीन और अस्मिता की लड़ाई में अपने प्राणों तक की परवाह न करते हुए दर -दर भटकने को मजबूर हुए उन्होंने अपनी आंखों के आगे अपने आंदोलन को लक्ष्यभ्रष्ट होते और जमीन से जुड़े लोगों को बर्बाद होते हुए भी देखा। बीजू जैसे स्थानीय लोगों के सवालों का कोई जवाब इन जननेताओं के पास नहीं था क्योंकि उनके आंदोलन को बड़ी चालकी से ‘हाईजैक’ कर लिया गया था। स्थानीय लोगों को उनकी ही जमीन और प्राकृतिक संसाधनों से इस तरह बेदखल कर दिया गया था कि कभी आत्मसम्मान की लड़ाई लड़नेवाले अपने घर का सम्मान तक बचाने में असमर्थ हो गये थे। जिस तरह आदिवासी लोककथा का पिता हल के फाल के लिए बाघ के साथ अपनी बेटी के मांस का सौदा कर लेता है उसी तरह झारखण्ड जैसे हरे भरे प्राकृतिक परिवेश में रहनेवाले बेबस पिता अपने पेट की भूख के लिए अपनी बेटियों का सौदा झूठे ब्याह के नाम पर करके, यह सोचकर अपने मन को तसल्ली दे लेते थे कि बेटी जहाँ भी रहेगी सुख से रहेगी और कम से कम भूखे पेट तो नहीं सोएगी। भले ही वह बेटी वहाँ तिल तिलकर मरने को अभिशप्त हो। जिसे सिर्फ शारीरिक भूख मिटाने और अपने सम्मान को बढ़ाने का माध्यम मात्र माना जाए। खरीदने में जितना अधिक धन व्यय हुआ खरीददारों का अहम उतना ही ऊंचा हुआ। और इन बहुओं को पुकारने का तरीका भी कितना अमानवीय था, “मोलकी” अर्थात मोल ली गई, खरीदकर लाई गई। और एक “मोलकी” परिवार के तमाम पुरुषों की भूख शांत करने को मजबूर। उसपर तुर्रा यह कि भले ही अपने प्रांत में लड़कियों का अकाल हो, लेकिन अपने घर में बेटी नहीं पैदा होनी चाहिये। सिर्फ बेटे को ही जन्म लेने का अधिकार है भले ही उसके इंतज़ार में असंख्य बेटियों का गला कोख में ही घोंट दिया जाए। इनारा जैसी औरतें गर्भपात कराते कराते मरणासन्न हो जाती है, साथ ही देश के कई हिस्सों में स्त्री- पुरुष के बीच का आंकड़ा लगातार विषम होता जाता है।
इस उपन्यास की एक बड़ी खासियत है कि इसमें सिर्फ झारखंड , वहाँ के बिखरते परिवार, रोजगार विहीन पुरुष और शोषित प्रताड़ित स्त्रियों की कथा ही नहीं है बल्कि देश के वर्तमान परिदृश्य की अस्थिरता, राजनीतिक भटकाव और भारतीय राजनीति की मूल्यहीनता के साथ प्रशासन में अंदर तक पैवस्त भ्रष्टाचार , अमानवीयता और मूल्यहीनता को गहराई से उकेरा गया है। ऐसा नहीं कि सारे लोग बुरे हैं , कुछ लोग इस सिस्टम की सफाई करने की कोशिश भी करते हैं लेकिन या तो उनका स्थानांतरण कर दिया जाता है या फिर हत्या। आंदोलनकारियों को नक्सली बताकर जेल में ठूंस देने से लेकर उनपर अवर्णनीय अत्याचार करने और अंततः उनकी हत्या या एनकाउंटर कर देने की घटनाएं सिर्फ इतिहास में ही नहीं घटती थीं, आज भी घटती हैं और आनेवाले समय में इनमें और बढ़ोत्तरी होगी, इसके संकेत हमें उपन्यास में मिलते हैं। सोनी सोरी की याद दिलाती मणिमाला सोरी या बहनजी का दर्दनाक हश्र स्थानीय निवासियों को ही नहीं पाठकों को भी हतप्रभ कर देता है। पुलिसकर्मियों की दरिंदगी भी सिर्फ चौंकाती नहीं मानस को क्षत विक्षत कर देती है जो रक्षक की पोशाक में भक्षक बनकर रिश्तों और कर्तव्य की भी हत्या करते दिखाई देते हैं। जिन स्कूली बच्चियों ने उनकी कलाई पर बड़े स्नेह और भरोसे से राखी बांधी थी उन्हीं की अस्मिता को तार -तार करते हुए इन नरभक्षकों को जरा भी अपराध बोध नहीं होता। ऐसी घटनाएं असली जिंदगी में भी देखने/ सुनने में आती हैं। शायद यही कारण है कि तमाम कानून बनने के बावजूद अपराध कम होने का नाम ही नहीं लेते।
देश की वर्तमान स्थिति को विश्वसनीयता से पाठकों के सामने उकेरती हुई अल्पना विकास की राह पर तेजी से बढ़ते देश के चमचमाते गौरव चिह्नों के ठीक नीचे पसरते नारकीय बाजार की भयावहता को भी रेखांकित करती हैं जहाँ कुछ लोग खरीददार थे तो कुछ बिचौलिए जिनके बलबूते बाजार लगातार जमता और चमकता जाता है तो कुछ लोगों की नियति महज बिकने को मजबूर सामानों की है। इस बाजार में सब कुछ बिकता है, ईमान भी। भले ही आजाद भारत में गुलामी की प्रथा का अंत हो गया हो और गुलामों की खरीद फरोख्त भी लेकिन भारत की छोटी बड़ी मंडियों में यह सिलसिला खुलेआम जारी है, इसकी झलक आलोच्य उपन्यास में भी मिलती है-
“कितनी टोकरियों में मनुष्य के अंग बिक रहे हैं….
एकदम ताजा किडनी
ताजा लीवर
धड़ धड़ धड़कता दिल
टक टक ताकती आंखें…
टटका दिमाग….
टह टह ताजे सपने
टोकरियों में सपने बिक रहे हैं….!
ताजे फूल – !
शवयात्राओं से उठा कर लाए गए फूल…
लोग उसे सजा रहे हैं
अपने घरों में !!!”
अल्पना अगर इन भयावह स्थितियों का जीवंत वर्णन करती हैं उनसे मुक्ति या स्थितियों के बदलाव की ओर भी संजीदगी से संकेत करती हैं। एक ओर जुझारू वकील और स्त्री अधिकारों के लिए लड़नेवाली संध्या और उसकी दीदी पद्मजा स्थितियों को बदलने की कोशिश में लगी हुई हैं। उनपर हमले होते हैं, शरीर घायल और अपंग हो जाता है लेकिन हिम्मत बनी रहती है और संघर्ष जारी रहता है। दूसरी ओर शोषित स्त्रियों को संगठित होकर अपनी लड़ाई खुद लड़ने का हौसला भी दिया गया है। अस्सी के दशक में स्त्री आंदोलनकारियों के बीच एक नारा बहुत जोर -शोर से गूंजा था- “हम भारत की नारी हैं फूल नहीं चिंगारी हैं।”
ठीक इसी तरह उपन्यास की शोषित और मजलूम औरतें स्थितियों को बदल डालने का संकल्प लेती हैं और अपनी कमजोरी से मुक्ति पाकर शोषण के अनवरत चक्र को समाप्त करने के लिए विद्रोह की मशाल जलाने का साहस करती हैं। वह ठान लेती हैं कि असहाय स्त्रियों को बेचने -खरीदने के सिलसिले को हर हाल में बंद करके रहेंगी और अपनी गुलामी से अपने दम पर मुक्ति पाएंगी-
” टोकरी में बिकने को बैठी पलाश इनारा पिंकी गनेशी…गोल भवन की सीढ़ियों पर अपने जिस्म की खाल को नोंच नोंच कर अलग कर रही हैं… मांस को खुरच खुरच कर फेंक रही हैं। अपनी हड्डियों को नुकीला कर रही हैं….वहाँ बहुत से गिद्ध जो इनके जिस्म को नोंच नोंच कर खाने को आतुर थे, अब वे भयभीत हैं। उनकी आंखों में वासना की लहरें नहीं, बल्कि लड़कियों के अपनी हड्डियों से हथियार बना लेने के इरादे से खौफ छा गया है।
लड़कियों ने अपने जिस्म से खाल और मांस नोंचकर हड्डियों से हथियार बना लिया है । वे इन हथियारों की बदौलत अपने सपनखोरों के साथ जंग को तैयार हैं।।”
रोते हुए शिशुओं और संसद के बीच पल पल दूरी कम होती जा रही है।”
देवासुर संग्राम में ऋषि दधीचि की हड्डियों से बने वज्र से देवराज इन्द्र ने वृत्रासुर नामक राक्षस का वध किया था लेकिन व्यवस्था के खिलाफ एकजुट इन स्त्रियों को किसी देवराज की आवश्यकता नहीं है। अपने हथियारों के साथ वह उस हर तथाकथित देवता, इंसान या राक्षस पर धावा बोलने को तैयार हैं जिसने उनसे और उनके बच्चों से सम्मान सहित जीने का हक छीन लिया है। हर व्यक्ति को अपने अधिकारों की लड़ाई खुद लड़नी पड़ती है और आलोच्य उपन्यास की शोषित और संतप्त औरतें भी अपने बच्चों को उनका प्राप्य दिलाने के लिए, उनके रुदन को मुस्कान में बदलने के लिए उनका हाथ थामकर लंबी पर निर्णायक लड़ाई के लिए सनद्ध हो जाती हैं।
कोलकाता : साहित्यअकादेमी, क्षेत्रीयकार्यालयकोलकातामेंआजहिंदीसप्ताहकासमापनसमारोहमनायागया।स अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित थे हिंदी के चर्चित विचारक और महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कोलकाता स्थित क्षेत्रीय केंद्र के प्रभारी डॉ. सुनील कुमार ‘सुमन’।कार्यक्रम के आरंभ में अकादेमी के क्षेत्रीय सचिव डॉ. देवेंद्र कुमार देवेश ने औपचारिक स्वागत करते हुए यह बताया कि कोलकाता कार्यालय में 14 सितंबर को हिंदी सप्ताह का उद्घाटन समारोह मनाया गया था तथा सप्ताह के दौरान कार्यालय के कर्मचारियों के बीच हिंदी में निबंध प्रतियोगिता, अनुवाद प्रतियोगिता तथा श्रुतिलेख प्रतियोगिता का आयोजन किया गया उन्होंने हिंदी के संदर्भ में अपनी बात रखते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल को यह गौरव है कि यहीं से हिंदी में विश्वविद्यालीय शिक्षण की शुरुआत हुई तथा हिंदी का पहला दैनिक समाचार पत्र प्रकाशित हुआ। डॉ. सुनील ने अपने विचार प्रकट करते हुए हिंदी के प्रचार-प्रसार और विकास में अहिंदीभाषियों की भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि सरकारी कामकाज में हिंदी के व्यवहार को बढ़ावा देने के लिए सरकार और सरकारी कार्यालयों में कार्यरत अधिकारियों की इच्छाशक्ति जरूरी है। उन्होंने समझने में दुष्कर अनुवाद वाली हिंदी भाषा को संदर्भित करते हुए कहा कि जरूरत इस बात की है कि भारतीय भाषाओं वाली हिंदी राजभाषा बने अर्थात् व्यावहारिक हिंदी को इतना सहज और सरल बनाया जाए कि सभी भारतीय भाषाओं के बोलनेवालों को समझ में आ सके, तभी हिंदी में सरकारी कामकाज में आसानी हो सकती है। उन्होंने प्रतियोगिताओं के विजेताओं को बधाई दी और हिंदी को आगे बढ़ाने में सहयोग की अपील की।
कोलकाता : डिजिटल स्वास्थ्यसेवा प्लेटफॉर्म ने अपना पहला टीवी विज्ञापन ‘आपका हेल्थ बडी’ जारी कर दिया है। यह विज्ञापन 15 सितम्बर से दिखाया जाने लगा है औऱ आईपीएल, हॉटस्टार औऱ आईपीएल के दौरान भी दिखाया जाएगा। विज्ञापन में मेडी बडी को आपके स्वास्थ्य साथी के रूप में प्रसारित किया जा रहा है। मेडी बडी डॉक्स ऐप के सह संस्थापक सतीश कन्नन ने इस मौके पर कहा कि इस अभियान के जरिए उनका लक्ष्य जनता तक पहुँचना है। मेडी बडी – डॉक्स ऐप के विपणन प्रमुख (मार्केटिंग हेड) आशीष बजाज ने उम्मीद जाहिर की कि लोग इस अभियान से जुड़ेंगे।
कोलकाता : कमला गोइन्का फाउण्डेशन ने गोइन्का पुरस्कारों के लिए प्रविष्टियाँ आमन्त्रित की हैं। फाउंडेशन के प्रबंध न्यासी श्याम सुन्दर गोइन्का ने एक प्रेस विज्ञप्ति द्वारा बताया कि सम्पूर्ण भारत के हिन्दी व राजस्थानी साहित्यकारों के लिए निम्न पुरस्कारों की प्रविष्टियां मंगायी गयी हैं। निन्नलिखित सभी पुरस्कार द्विवर्षीय कालावधि में वर्ष 1999 से प्रदान करते आ
रहे हैं। सभी पुरस्कार गत पांच वर्षों में लिखित व प्रकाशित हिन्दी तथा राजस्थानी भाषा की पुस्तकों व साहित्यकारों के साहित्य के प्रति किये गये समग्र-योगदान के आधार पर दिये जाते है। एक लाख ग्यारह हजार एक सौ ग्यारह रुपये का “मातुश्री कमला गोइन्का राजस्थानी पुरस्कार” (राजस्थान के साहित्यकारों द्वारा लिखित सर्वश्रेष्ठ प्रकाशित मूल
राजस्थानी पुस्तक के लिए) एक लाख ग्यारह हजार एक सौ ग्यारह रुपये का “स्नेहलता गोइन्का व्यंग्यभूषण पुरस्कार” (सम्पूर्ण भारत के व्यंग्यकार साहित्यकारों द्वारा लिखित सर्वश्रेष्ठ व्यंग्य विधा में प्रकाशित पुस्तक के लिए) एक लाख ग्यारह हजार एक सौ ग्यारह रुपये का “यशश्वी सत्यनारायण गोइन्का हिन्दी साहित्य पुरस्कार” (सम्पूर्ण भारत के हिन्दी साहित्यकारों द्वारा लिखित सर्वश्रेष्ठ हिन्दी के किसी भी विधा में प्रकाशित पुस्तक के लिए) 51 हजार रुपये का “रत्नीदेवी गोइन्का वाग्देवी पुरस्कार” (सम्पूर्ण भारत के महिला साहित्यकारों द्वारा लिखित सर्वश्रेष्ठ हिन्दी के किसी भी विधा में प्रकाशित पुस्तक के लिए) इक्यावन हजार रुपये का “रमादेवी गोइन्का महिला राजस्थानी साहित्य पुरस्कार” (सम्पूर्ण राजस्थान के महिला साहित्यकारों द्वारा लिखित सर्वश्रेष्ठ राजस्थानी के किसी भी विधा में प्रकाशित पुस्तक के लिए)।
उपरोक्त पुरस्कारों के लिए 2016-2020 के बीच की अवधि में प्रकाशित पुस्तक की तीन-तीन प्रतियां प्रविष्टि के संग-संग साहित्यकारों का साहित्य के प्रति अन्य योगदान की भी विस्तृत जानकारी के साथ प्रस्ताव-पत्र एवं पासपोर्ट आकार की दो छायाचित्रों के संस्था के बंगलुरू कार्यालय में 15 नवंबर 2020 तक भेजने का आग्रह किया है। प्रविष्टि-पत्र, नियमावली एवं अधिक जानकारी के लिए बैंगलुरू कार्यालय में न्यास के कार्यकारी सचिव कमलेश यादव से [email protected] या visit us at : www.kgfmumbai.com या साधारण पत्र द्वारा सम्पर्क किया जा सकेगा।
कोविड-19 के इस न्यू नॉर्मल दौर में लोगों की सेवा के लिए एक और डिजिटल कदम यह पूरी तरह ऑनलाइन प्रक्रिया है जो 48 से भी कम घंटों में होम लोन मंजूर करवाती है कोलकाता : कोटक महिन्द्रा बैंक (कोटक) ने कोटक डिजी होम लोन्स के लांच के साथ अपनी डिजिटल क्षमता को जनता के लिए और अधिक सहायक बना दिया है। इस पूरी तरह सेऑनलाइन मंजूरी की यात्रा के तहत ग्राहक ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं, दस्तावेज दाखिल कर सकते हैंऔर 48 घंटों से भी कम वक्त में होम लोन की मंजूरी प्राप्त कर सकते हैं। बैंक के वर्तमान व नए, दोनों प्रकार के ग्राहक कोटक डिजी होम लोन्स सुविधा के ज़रिए होम लोन हेतु आवेदन कर सकते हैं।
कोटक डिजी होम लोन्स सुविधा सभी नए होम लोन्स एवं बैलेंस ट्रांसफर मामलों के साथ-साथ वेतन पाने वाले, स्वरोजगार करने वाले उद्यमी एवं पेशेवरों समेत विभिन्न प्रकार के ग्राहकों के लिए उपलब्ध है।
कोटक डिजी होम लोन्स के लिए आवेदन प्रक्रिया इनट्यूटिव और सरल है। आवेदक को णवजंाण्बवउ पर होम लोन ऐप्लीकेशन पेज पर कुछ निजी व सम्पत्ति विवरण देना होता है। इसके बाद, एक समर्पित रिलेशनशिप मैनेजर आवेदक को आसान ऑनलाइन प्रक्रिया हेतु मार्गदर्शन देता है। डिजिटल ऐप्लीकेशन फॉर्म एवं आवश्यक दस्तावेजऑनलाइन जमा करने के बाद लोन प्रोसैस होता है और 48 घंटों के भीतर मंज़ूर हो जाता है।
अम्बुज चांदना, प्रेसिडेंट-कंज्यूमर असैट्स, कोटक महिन्द्रा बैंक ने कहा, ’’न्यू नॉर्मल के इस दौर में ’बैंकिंग फ्रॉम होम’ में बहुत वृद्धि हुई है। बैंक ग्राहक ऑनलाइन बैंकिंग की सरलता व सुविधा की तारीफ कर रहे हैं; सबसे अहम है कि बैंकिंग का यह तरीका सम्पर्करहित है। हमारा बैंक डिजिटल को प्राथमिकता देता है। इस नाते हमारा लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि हमारे ग्राहक घर बैठे बिना परेशानी, सुरक्षित ढंग से बैंकिंग कर सकें। इसी बात को ध्यान में रखते हुए हम बहुत खुशी के साथ कोटक डिजी होम लोन्स के लांच की घोषणा कर रहे हैं। यह पूरी तरह सेऑनलाइन मंजूरी वाली प्रक्रिया है जिसके जरिए ग्राहक केवल कुछ क्लिक कर के अपने सपनों के घर के मालिक बन सकते हैं और वह भी सुरक्षित व सम्पर्करहित तरीके से।’’