Friday, April 10, 2026
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16 अक्टूबर से फ्लिपकार्ट बिग बिलियन डे सेल

नयी दिल्ली : फ्लिपकार्ट ने अपनी बिग बिलियन डे सेल की घोषणा कर दी है। यह सेल 16 अक्टूबर को शुरू होकर 21 अक्टूबर तक चलेगी। अगर आप नया स्मार्टफोन खरीदने की सोच रहे हैं तो यह आपके लिए एक मौका हो सकता है। इस सेल में आपको कई स्मार्टफोन पर शानदार डिस्काउंट और आकर्षक डील्स का लाभ उठाया जा सकता है। कंपनी की वेबसाइट पर सेल की डेट के साथ ऑफर्स व स्मार्टफोन पर मिलने वाली डील्स का खुलासा कर दिया है।
फ्लिपकार्ट बिग बिलियन डे सेल में आपको कई शानदार ऑफर्स का लाभ मिलेगा। इस सेल के तहत एसबीआई क्रेडिट कार्ड पर भी 10 प्रतिशत तक का डिस्काउंट प्राप्त होगा। इसके अलावा सेल में नो कोस्ट ईएमआई विकल्प भी दिया जा रहा है। यानि अब अपने पसंदीदा स्मार्टफोन को नो कोस्ट ईएमआई पर खरीद सकते हें। नो कोस्ट ईएमआई की सुविधा बजाज फिनसर्व कार्ड पर भी उपलब्ध है। इतना ही नहीं पेटीएम वॉलेट और पेटीएम यूपीआई से भुगतान करने पर कैशबैक की भी सुविधा प्राप्त होगी।
फ्लिपकार्ट बिग बिलियन डे सेल में बेस्ट डील्स में मिलने वाले स्मार्टफोन की बात करें तो इस सेल में आप पीओसीओ एम 2 प्रो को 12,999 रुपये में खरीद सकते हैं जबकि इसकी मूल कीमत 16,999 रुपये है। वहीं अगर आप इन्फिनिक्स हॉट 9 प्रो को खरीदने की प्लानिंग कर रहे हैं तो इस सेल में आपको यह स्मार्टफोन 9,499 रुपये में मिल जाएगा। वहीं रियल मी सी 12 C12 के 3GB + 32GB स्टोरेज मॉडल को 10,999 रुपये के बजाय 7,999 रुपये में खरीद सकते हैं।

दशकों तक पुरुषों के वेश में खेतों में काम किया..भाई का परिवार सम्भाला..ऐसी हैं कमला

मुजफ्फरनगर :   वो जिन खेतों में काम कर रवो हीं थी वो उनके भाई की संपत्ति हैं, कमला कहती हैं- मेरे खेत और ये कहते-कहते उनकी जबान रुक जाती है, फिर कहती हैं, अब तो ये भाई के बच्चों के खेत हैं

सफेद कुर्ता पाजामा, सर पर बंधा सफेद साफा, कंधे पर रखा फावड़ा। कमला को कोई दूर से क्या, पास से भी देखे तो धोखा खा जाए कि कोई पुरुष खेत में काम कर रहा है। दिल्ली से करीब 120 किलोमीटर दूर मुजफ्फरनगर के मीरापुर दलपत गांव की रहने वाली 63 साल की कमला ने अपनी जिंदगी के चार दशक मर्द बनकर खेतों में काम करते हुए गुजार दिए। एक महिला के लिए मर्द बनकर काम करना आसान नहीं था। लेकिन, जिंदगी के सामने ऐसे मुश्किल हालात थे कि उन्होंने घूंघट उतारकर सर के बाल काट लिए और पगड़ी बांध ली।

किसान परिवार में पैदा हुई कमला होश संभालते ही खेतों में काम करने लगी थीं। शादी हुई तो 17 महीने बाद ही पति की दुखद मौत हो गई। बाद में देवर के साथ उन्हें ‘बिठा दिया’ गया। इस रिश्ते से उन्हें एक बेटी हुई लेकिन, ये रिश्ता ज्यादा नहीं चल सका और वो अपने भाइयों के घर लौट आईं। कमला के छोटे भाई को कैंसर हो गया। दम तोड़न से पहले उन्होंने कमला से वादा लिया कि वो उनके बच्चों को पालेंगी और पत्नी का ध्यान रखेंगी।

कमला कहती हैं, भाई के दोनों बच्चे छोटे थे। कोई सहारा नहीं था। मैंने उनकी जिम्मेदारी संभाल ली और खेती का काम अपने हाथ में ले लिया। लेकिन, महिला के लिए अकेले खेत में जाकर काम करना आसान नहीं था। लोगों की नजरों से बचने के लिए मैंने मर्द का रूप धर लिया। बाल काटे और पगड़ी बांध ली।

भारत के खेतों में महिलाएं सदियों से काम करती रहीं हैं। लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इस समाज में आज भी मर्दवादी नजरिया हावी है। महिलाएं खेतों पर काम करने जाती तो हैं लेकिन, अकेले नहीं, बल्कि समूहों में या परिवार के दूसरे लोगों के साथ।लेकिन, कमला के अकेले कंधों पर जमीन जोतने-बोने और फसल की देखभाल करने की जिम्मेदारी थी। रात-बेरात खेतों को पानी देने के लिए जाना पड़ता था। मर्दवादी समाज की नजर और तानों से बचने के लिए वो मर्द ही बन गईं। कमला कहती हैं, ‘मैं बेधड़क खेतों में काम करती थी। फसल को पानी देना होता था तो रात को आती थी, सुबह तक काम करके जाती थी। कभी डर महसूस नहीं हुआ। मर्दों की पोशाक ने मुझे सबकी नजरों से बचा लिया।

वो कहती हैं, ‘खेत में काम कर रही एक अकेली औरत के साथ कुछ भी हो सकता था, औरत अकेली हो तो हर आंख उस पर ठहरती है। लेकिन खेत में काम कर रहे अकेले मर्द पर किसी का ध्यान नहीं जाता। कमला ने मर्द बनकर लगभग चार दशकों तक खेतों में काम किया। उन्होंने उम्र के छह दशक पार करने के बाद भी न अपना ये रूप छोड़ा है और ना ही काम करना। कमला कहती हैं कि उन्हें भाग्य ने एक के बाद एक झटके दिए, लेकिन वो कभी डगमगाई और डरीं नहीं।

वो अपने पति की मौत, ससुराल में हुए शोषण को अब याद करना नहीं चाहतीं। इस बारे में सवाल करते ही उनके आंखें पथरा जाती हैं। वो कहती हैं, मैं अब उन सब बातों को याद करना नहीं चाहती। ना ही उसका कोई फायदा है।

कमला ने अपनी पूरी जिंदगी खेतों में काम करते बिता दी। वो कहती हैं, मैं हमेशा काम में लगी रहती थी। दिन में एक वक्त खाकर काम किया। सारा दिन ईख छोलती थी। भाभी से कह देती थी कि खाना देने मत आना, घर आकर ही खाऊंगी। इन खेतों ने हमारा परिवार पाला है। कमला ने सिर्फ खेत में ही काम नहीं किया, बल्कि वो गन्ना डालने मिल भी जाती थीं और मंडी भी। वो कहती हैं, ‘मैं मर्दों के बीच अकेली औरत होती थी। लेकिन लोग पहचान ही नहीं पाते थे कि मैं औरत हूं।’

कमला के इस बात की खुशी है कि उनके एक भतीजे का घर बस गया है और दूसरे की भी जल्द शादी होने वाली है। वो कहती हैं, ‘मेरी जिंदगी का मकसद पूरा हो गया। भाई से जो वादा किया था, निभा दिया।’ हमेशा संघर्ष करती रहीं कमला को उम्र के इस पड़ाव पर पहुंचने के बाद भी सुकून नहीं है। वो जिन खेतों में काम कर रहीं थी, वो उनके भाई की संपत्ति हैं। खेतों की ओर देखते हुए बात कर रही कमला कहती हैं, ‘मेरे खेत…और ये कहते-कहते उनकी जबान रुक जाती है, खुद को संभालते हुए वो कहती हैं, अब तो ये भाई के बच्चों के खेत हैं।

मुजफ्फरनगर के मीरापुर दलपत गांव की रहने वाली 63 साल की कमला पिछले चार दशकों से अपने खेतों में मर्द बनकर काम कर रही हैं। भारत में पारंपरिक तौर पर पिता की संपत्ति, जमीन-जायदाद भाइयों के हिस्से आती है और बहनों के हिस्से आती है ससुराल, जहां वो बाकी जिंदगी रहती हैं। लेकिन, भारत का कानून बेटियों को भी संपत्ति पर बराबर का हक देता है। कमला ने कभी अपना ये हक लेने के बारे में सोचा तक नहीं है। अब जब उनका शरीर ढल रहा है, उन्हें अपनी आगे की जिंदगी की चिंता हैं। वो कहती हैं, ‘मैं अपने लिए एक कमरा तक नहीं बना सकी। अपना सिर छुपाने के लिए मेरे पास अपनी कोई जगह नहीं है। कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मुझे घर दिलाने की कोशिश की थी। लेकिन, वो काम भी कोरोना में अटक गया है। बात करते-करते कमला के चेहरे के भाव कई बार बदलते हैं। उनके चेहरे पर भाई के परिवार को पालने का सुकून दिखाई देता है तो अकेलेपन का अफसोस भी और बुढ़ापे को लेकर चिंता भी।

(साभार – दैनिक भास्कर)

गाड़ियों की किश्त नहीं चुकाई, डिफॉल्टर हुए तो गाड़ी उठा सकता है फाइनेंसर : सुप्रीम कोर्ट

नयी दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले कहा है कि कर्ज की किस्तें पूरी होने तक वाहन का मालिक फाइनेंसर ही रहेगा। किस्तों में डिफॉल्ट होने पर यह फाइनेंसर वाहन का कब्जा ले भी सकता है। इसमें कोई अपराध नहीं है।
जस्टिस डीवाई चन्द्रचूड की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने यह व्यवस्था देते हुए फाइनेंसर की अपील स्वीकार कर ली और उस पर राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग द्वारा लगाया गया जुर्माना रद्द कर दिया। उपभोक्ता अदालतों ने खरीददार से वाहन बिना उचित नोटिस के उठाने पर तथा उसे किस्ते देने का समय न देने पर दो लाख 23 हजार रुपये का हर्जाना अदा करने का आदेश दिया था।
पीठ ने कहा कि इसमें कोई शक नहीं है खरीददार डिफॉल्ट पर था। उसने खुद माना है कि वह सात किश्तें ही चुका पाया था। वहीं फाइनेंसर ने गाड़ी को एक साल बाद यानी 12 महीने के बाद कब्जे में लिया। यह सही है कि फाइनेंसर परचेजर एग्रीमेंट में वाहन जब्त करने से पहले नोटिस देने का प्रावधान था। फाइनेंसर इसी प्रावधान को तोड़ने का दोषी है इसलिए पर 15,000 रुपये का जुर्माना देने का आदेश दिया जाता है।
अम्बेडकर नगर के रहने वाले राजेश तिवारी ने वर्ष 2003 में महिंद्रा मार्शल गाड़ी फाइनेंस करवाई थी। इसके लिए उसने एक लाख रुपये का भुगतान किया और लगभग शेष तीन किश्त के रुपये फाइनेंस करवाए। उसकी 12531 रुपये की मासिक किस्तें बनाई गई। तिवारी ने सात किश्तें दीं, लेकिन उसके बाद वह किस्त नहीं दे पाया। कंपनी ने पांच माह इंतजार कर उसकी गाड़ी उठवा ली। भुगतान नहीं करने पर कंपनी ने गाड़ी बेच दी।
इसके खिलाफ तिवारी ने जिला उपभोक्ता अदालत में उपभोक्ता संरक्षण कानून, 1986 की धारा 12 के तहत केस दर्ज किया। अदालत ने कंपनी को दोषी पाया और उस पर दो लाख रुपये से ज्यादा का जुर्माना लगा दिया। यूपी राज्य आयोग ने भी इसे सही माना और जिला उपभोक्ता अदालत के आदेश की पुष्टि कर दी। इसके बाद कंपनी राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग में गई। वहां से भी उसे कोई राहत नहीं मिली। इसके बाद वह सुप्रीम कोर्ट अपील में की गयी।

सुरीले तरीके से गाँवों में विज्ञान की मशाल जला रही हैं सारिका

होशंगाबाद :  मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम संभाग के सुदूर आदिवासी अंचल में जहां इंटरनेट, मोबाइल व कंप्यूटर नहीं हैं, वहां शिक्षि‍का सारिका घारू गीत गाकर विज्ञान की अलख जगा रही हैं। आधुनिक संसाधनों से वंचित विद्यार्थियों को विज्ञान के प्रति जागृत करने शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय सांडिया पिपरिया की शिक्षक सारिका ने यह नवाचार किया है। इंटरनेट की पहुंच से दूर इन गांवों में कोरोना संक्रमण के चलते विद्यार्थियों को शिक्षा खासकर विज्ञान जैसे जटिल विषय की शिक्षा देना मुश्किल काम था, लेकिन सारिका ने विज्ञान के गीत गाकर इसे आसान बना दिया। ये गीत विद्यार्थियों को पसंद भी आ रहे हैं।
बनाया गीतों का पाठ्यक्रम आधारित वीडियो एल्बम
सारिका ने स्वयं की आवाज में ‘गुनगुनाए विज्ञान, बढ़ाए ज्ञान’ नाम से 25 विज्ञान गीतों का पाठयक्रम आधारित वीडियो एल्बम बनाया है। केंद्रीय विज्ञान सचिव आशुतोष शर्मा ने हाल ही में इन गीतों का आनलाइन विमोचन किया। एक गीत के बोल कुछ इस प्रकार हैं-
धातु में होती है चमक, अधातु में नहीं।
धातु ऊष्मा की सुचालक, अधातु तो नहीं।
धातु को ठोको तो बनती है चादर, अधातु से नहीं।
सोना, चांदी, तांबा, जस्ता धातु है।
कागज, रस्सी, कपड़ा हैं अधातु।
सारिका ने स्वयं के खर्च से वाहन, चटाई, स्टूल, होर्डिग्स, माइक आदि की व्यवस्था की है। वे प्रतिदिन अंचल के किसी गांव में दो से तीन घंटे गीतों, पोस्टर व व्याख्यान के माध्यम से विद्यार्थियों को पढ़ाती हैं। इसमें विज्ञान के नए-नए आविष्कार, उपयोगिता और रोजगार की सम्भावना से अवगत कराती हैं।
सारिका ने इसे टोला (बहुत कम आबादी वाले गांव ) टीचिंग नाम दिया है। इसकी शुरआत किए करीब दो हफ्ते हुए हैं। हर दिन एक या दो टोले में जाकर पांच से 25 विद्यार्थियों को सुरक्षित शारीरिक दूरी का पालन करवाते हुए पढ़ा रही हैं।

(साभार – दैनिक जागरण)

देश को मिली दुनिया की सबसे लंबी राजमार्ग सुरंग ‘अटल सुरंग’

रोहतांग : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गत शनिवार को हिमाचल प्रदेश के रोहतांग में 10 हजार फीट की ऊंचाई पर निर्मित ‘अटल सुरंग’ का उद्घाटन किया। प्रधानमंत्री कार्यालय के मुताबिक अटल सुरंग दुनिया की सबसे लंबी राजमार्ग सुरंग है। इसकी लंबाई 9.02 किलोमीटर है जो मनाली को लाहौल-स्पीति घाटी से जोड़ेगी। इससे पहले यह घाटी भारी बर्फबारी के कारण लगभग छह महीने तक संपर्क से कटी रहती थी। इस अवसर पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर और केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर सहित सहित कई अन्य गणमान्य लोग उपस्थित थे। सामरिक रूप से महत्वपूर्ण यह सुरंग हिमालय की पीर पंजाल श्रृंखला में औसत समुद्र तल से 10,000 फीट की ऊंचाई पर अति-आधुनिक विशिष्टताओं के साथ बनाई गई है।
इस सुरंग से मनाली और लेह के बीच की दूरी 46 किलोमीटर कम हो जाएगी और यात्रा का समय भी चार से पांच घंटे कम हो जाएगा। अटल सुरंग को अधिकतम 80 किलोमीटर प्रति घंटे की गति के साथ प्रतिदिन 3000 कारों और 1500 ट्रकों के यातायात घनत्‍व के लिए डिजाइन किया गया है।
अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने रोहतांग दर्रे के नीचे सामरिक रूप से महत्वपूर्ण इस सुरंग का निर्माण कराने का निर्णय किया था और सुरंग के दक्षिणी पोर्टल पर संपर्क मार्ग की आधारशिला 26 मई 2002 को रखी गई थी। मोदी सरकार ने दिसम्बर 2019 में पूर्व प्रधानमंत्री के सम्मान में सुरंग का नाम अटल सुरंग रखने का निर्णय किया था।

नहीं मालूम मैंने जन्म क्यों लिया

वसुन्धरा मिश्र

मुझे नहीं मालूम मैने जन्म क्यों लिया
मुझे नहीं मालूम स्त्री जन्म क्यों लिया
मुझसे ही पुरुष ने जन्म क्यों लिया
मैं प्रकृति की कामना ही क्यों बनी
आकाश की विराट बांहों में भी सुरक्षित नहीं
पुरुष स्त्री की सहयात्री क्यों नहीं बनी
उस रेत की धरती में न जाने कितनों को दबाया गया
कितनों की श्वास को दबोचा गया
चीखना चिल्लाना भी मना था
मुंह को कपड़े से बंद कर दिया
कैसे-कहूं भावनाओं के कुचलने का कोई प्रमाण न मिला
आंसुओं की कोई नदी नहीं मिली
दबी-कुचली चीख का कोई गीत न मिला
सब कुछ सहने के निशान किसी मोहनजोदडो़ की खुदाई में नहीं मिले
कोई कुछ कहता है कोई कुछ
दस मुंह बीस बातें
मेरा अस्तित्व मिटा, मेरी पहचान गई
कुछ बच गया था पर वह मेरी अस्मिता का फैला हुआ खून था
मुझे नहीं मालूम जीवित होकर भी कौन-सा पहाड़ बनाना है
सदियों से वस्तु बनी
सृष्टि की सबसे सुंदर कृति बनी
दुर्गा तो लगता है एक ही बनी थी
दूसरी-तीसरी हम जैसी थीं
मुझे नहीं मालूम कि मैं कैसे बनी
पुरुष की स्त्री लगता है मर चुकी है
स्त्री सिर्फ पृथ्वी पर भटक रही है
कभी मरती है तो कभी पुरुष के भीतर के शैतानों को जगाती है
वह खूंखार पशु की तरह नोच खसोट कर फेंक दिया करता है
मुझे नहीं पता वह दूसरी-तीसरी की तलाश क्यों करता रहता है
मुझे नहीं मालूम – -मुझे सच में नहीं मालूम मुझे नहीं मालूम

पत्रकारिता स्ट्रांग कॉमन सेंस है -विश्वंभर नेवर

भवानीपुर कॉलेज में हिंदी पत्रकारिता और जनसंचार माध्यम की कार्यशाला
कोलकाता : भवानीपुर एडुकेशन सोसाइटी कालेज में पत्रकारिता और जनसंचार माध्यम विषय पर दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला के आरंभ में दैनिक समाचार पत्र छपते छपते के प्रधान संपादक विश्वंभर नेवर ने अपने अनुभवों को विद्यार्थियों के साथ साझा किया। सात दशकों से अपने परिश्रम और लगन से विश्वंभर नेवर आज हिंदी मीडिया में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। ताजा टीवी हिंदी के निदेशक और संस्थापक नेवर ने बताया कि पत्रकारिता के क्षेत्र में एक पत्रकार को रिपोर्टिंग करने के लिए पढ़ना और लिखना बहुत जरूरी है। जब तक भाषा में धार नहीं होगी तब तक वह अच्छा पत्रकार नहीं बन सकता। वर्तमान समय में पत्रकारिता किसी भी विधा में चाहे विज्ञान, रासायनिक या फिर फिल्म क्षेत्र में की जा सकती है। हिंदी या क्षेत्रीय भाषा के अखबार अधिक पढ़े जाते हैं वनस्पत अंग्रेजी भाषा के। पत्रकारिता व्यक्ति के स्ट्रांग कॉमन सेंस का प्रतिफलन है।
भवानीपुर कॉलेज के डीन प्रो दिलीप शाह ने विश्वंभर नेवर का स्वागत करते हुए कहा कि हिंदी की पत्रकारिता का आज विस्तार हुआ है। आज का युवा स्वयं अपना ब्लॉग, यू-ट्यूब चैनल, फेसबुक आदि पर अपना व्यक्तिगत व्यवसाय कर सकता। हिंदी पत्रकारिता पर पहली बार हो रही कार्यशाला का उद्देश्य है कि प्रिंट, इलेक्ट्रानिक और वेब मीडिया में विद्यार्थी अपनी प्रतिभा को किस प्रकार काम में चैनेलाइज कर सकते हैं।
कार्यशाला की संयोजक डॉ वसुंधरा मिश्र ने कोरोना महामारी के इस संकटकालीन स्थितियों में पत्रकारिता और जनसंचार माध्यम में अपनी रचनात्मक कार्यों को सही दिशा में लगाने का सबसे अच्छा जरिया बताया। पूरे विश्व में हिंदी भाषा की एक महत्वपूर्ण पहचान बनी है। कलकत्ता से ही पहला हिंदी अखबार 30 मई, सन् 1826 में निकला। आजादी के पहले निकलने वाले पत्रों में संपादकों को अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता थी परंतु अब पत्रकारिता पूर्ण व्यवसाय है। पत्रकारों की तनख्वाह भी लाखों तक पहुंची है और इसी कारण नाम और पद के आकर्षण का केंद्र है।
पीत पत्रकारिता, फेक पत्रकारिता, पेड न्यूज और सेलेब्रिटी पत्रकारिता आदि क्षेत्रों में आज जिस तरह से नकारात्मक प्रभाव पड़ा है, डॉ मिश्र ने बहुत सी जानकारी दी। अच्छे-बुरे सभी प्रोफेशन में मिलते हैं। पत्रकारिता का क्षेत्र कठिन डगर है। भाषा की दक्षता और शैली के साथ-साथ पत्रकार यदि ईमानदार, संयमी, सच्चा और साहसी है तो इस क्षेत्र में जा सकते हैं। अपराध, खोजी, खेल, कृषि, आर्थिक आदि पत्रकारिता के विभिन्न क्षेत्र हैं। प्रभात खबर की वरिष्ठ पत्रकार भारती जैनानी ने भी अपने विचार रखे।
ताजा टीवी और भारतीय भाषा परिषद के संयुक्त तत्वावधान में भवानीपुर कॉलेज की कार्यशाला में 200 लोगों ने रजिस्ट्रेशन कराया और 80 लोगों ने गूगल मीट पर भाग लिया। अंत में, एक रिपोर्टिंग प्रतियोगिता का विषय भी दिया गया जिसका परिणाम आना बाकी है। धन्यवाद ज्ञापन भारतीय भाषा परिषद की ओर से वरिष्ठ अधिकारी विमला पोद्दार ने विश्वंभर नेवर, प्रो दिलीप शाह प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी, दिव्या ऊडीशी और कार्यक्रम संयोजक डॉ वसुंधरा मिश्र को दिया। वहीं कार्यशाला की तकनीकी सहयोगी गौरव किल्ला, अदिति, साक्षी को धन्यवाद दिया। कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने।

जनजातीय कार्य मंत्रालय के साथ आदिवासी युवाओं को उद्यमी बनाने में सहयोग करेगा एसोचेम

कोलकाता : एसोचैम आदिवासी युवाओं की उद्यमशीलता को प्रोत्साहित करने के लिए आगे आया है। इस संगठन ने आदिवासी उद्यमशीलता विकास (ट्राइबल एंटरप्रेन्योरशिप डेवलपमेंट) के लिए सेंटर ऑफ एक्सीलेंस (सीओई) की स्थापना की है और यह जनजातीय मामलों के मंत्रालय, भारत सरकार के साथ साझेदारी में काम करेगा।
आदिवासी उद्यमिता विकास केंद्र का वर्चुअल उद्घाटन लगभग भारत सरकार के आदिवासी मामलों के केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा ने किया । इस कार्यक्रम में केंद्र और राज्य सरकारों के कई गणमान्य लोगों ने भाग लिया। अर्जुन मुण्डा ने कहा कि विभिन्न कारणों से आदिवासी समुदाय की व्यावसायिक क्षमता सामने नहीं आ सकी है। उन्होंने इस सन्दर्भ में आदिवासी धरोहरों के प्रति लापरवाही और जागरुकता के अभाव का उल्लेख करते हुए एसोचेम के प्रयासों की सराहना की। केन्द्रीय मंत्री ने उद्योग जगत से आदिवासी समुदाय की सहायता के लिए आगे आने का आह्वान भी किया।
एसोचेम खादी को स्वतन्त्र व आत्मनिर्भर भारत का प्रतीक बताते हुए इस बाबत एक वेबिनार भी आयोजित किया। यह चर्चा देश में आदिवासी समुदायों की उद्यमशीलता को बढ़ावा देने और समर्थन करने के आग्रह पर केंद्रित थी।
अपने विचार साझा करते हुए, एसोचेम के अध्यक्ष, डॉ। निरंजन हीरानंदानी ने कहा, “अक्सर सुदूर स्थानों को देखते हुए जहां ये आदिवासी आबादी रहती है, आवश्यक सेवाओं को पहुंचाना और सुनिश्चित करना कि वे आर्थिक विकास से लाभान्वित हो सकें, देश के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती बनी हुई है। यह मानते हुए कि अनुसूचित जनजातियाँ अपने विकास के मामले में औसत भारतीय जनसंख्या से लगभग 20 वर्ष पीछे हैं, हमारी जनसंख्या के लगभग 8 प्रतिशत की संभावनाओं को पूरी तरह से विकसित और लाभान्वित किया जाना चाहिए। विश्व ट्राइबल एंटरप्रेन्योरशिप डेवलपमेंट प्रोग्राम ’हमारे देश की बढ़ती अर्थव्यवस्था में उनके योगदान का अनुकूलन करेगा और भारत के आत्मानबीर बनने के दृष्टिकोण का समर्थन करेगा।”
इसी तरह की भावना की गूंज, एसोचैम के महासचिव, दीपक सूद ने कहा कि सेंटर ऑफ एक्सीलेंस ’इन मुद्दों को हल करने का प्रयास करेगा, एक मजबूत आदिवासी ब्रांड पहचान बनाने और इस प्रक्रिया में पदोन्नति के रास्ते तलाशने – आदिवासी कारीगरों की उद्यमशीलता क्षमताओं का निर्माण और वृद्धि करेगा।”
सूद ने कहा कि ‘आदिवासी उद्यमिता विकास कार्यक्रम’ का उद्देश्य लाइन में अंतिम व्यक्ति को जीवन की गुणवत्ता सुनिश्चित करना और आदिवासी उद्यमिता को मजबूत करना है।
आदिवासी विकास पर अपने विचार साझा करने वाले अन्य लोगों में दीपक खांडेकर, सचिव, जनजातीय मामलों के मंत्रालय, भारत सरकार; डॉ. नवलजीत कपूर, संयुक्त सचिव और विनीत अग्रवाल, वरिष्ठ उपाध्यक्ष, एसोचैम।
डॉ.अतुलचोखर, सीईओ, नेशनल एक्रेडिटेशन बोर्ड फॉर हॉस्पिटल्स एंड हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स (एनएबीएच). डॉ मनीष पांडे, निदेशक और प्रमुख, परियोजना विश्लेषण और प्रलेखन (पैड) प्रभाग, गुणवत्ता परिषद भारत; डॉ। मनु गुप्ता, सह-संस्थापक पर्यावरण और पारिस्थितिक विकास सोसायटी (एसईईडीएस) अन्य वरिष्ठ उद्योगपति शामिल थे।

एस्परेगस ने अलग अन्दाज में मनायी अपनी दसवीं वर्षगाँठ

कोलकाता : वेडिंग प्लानर कम्पनी एस्पेरेगस ने हाल ही में अपनी 10वीं वर्षगाँठ मनायी। इस मौके को खास बनाते हुए कम्पनी ने 200 पैकेट पका हुआ भोजन एनजीओ और होम्स में वितरित किया। सुजाता चाइल्ड केयर, पैलान ओल्डेज, मलिकबाजार चिल्ड्रेन कम्यूनिटी, कैनल रोड एसोसिएशन समेत कई जरूरतमंदों को इसका लाभ मिला। एस्पेरेगस के संस्थापक तथा निदेशक प्रीतम दत्त ने बताया कि बतौर वेडिंग प्रोफेशनल उनकी कम्पनी शादियों की तैयारी को युगल के लिए आसान बनाती ही है और उनकी मदद करती है।

कवि ऋतुराज की कविता ‘कन्यादान’

शिक्षिका – नीलम सिंह, वाराणसी

कन्यादान कविता में मां द्वारा बेटी को दी जा रही सीख का उल्लेख है। उसकी यह सीख परंपरागत सीख से हटकर है ।मां बेटी को जीवन पथ पर चलने के लिए प्रेरित करती है। बेटी की विदाई के समय मां का दुखी होना स्वभाविक ही है । वह ऐसा महसूस कर रही थी जैसे अपने जीवन की सारी जमा पूंजी दान में दे रही हो। सयानी ना होने के कारण उसकी बेटी अत्यंत भोली है । वह जीवन के सुख को मन में संजोए हुए है, पर दुख की अभिव्यक्ति करने उसे नहीं आता। वह छल कपट के जीवन से पूर्णतया अनजान है। बेटी को भावी जीवन के लिए तैयार करते हुए मां उसको सीख देती है पानी में झांक कर अपने रूप सौंदर्य पर सम्मोहित न होना।वह आगे बताती है कि ससुराल में वह आग का प्रयोग रोटियां सेंकने के लिए करें, दुखों से घबराकर अपनी जान देने के लिए नहीं।इसके अतिरिक्त वह बेटी को समझाती है कि वस्त्र एवं आभूषण शाब्दिक भ्रमजाल हैं, इसमें उलझकर अपने अस्तित्व को न भूलें।अंत में वह अपनी बेटी से कहती है कि लड़की के सारे उचित गुण बनाए रखना,पर अपनी कमज़ोरी मत प्रकट करना,कहने का तात्पर्य है कि जीवन में आने वाली परिस्थितियों से न घबराते हुए उसका सामना करने के लिए तैयार रहना।

(वीडियो सौजन्य – हिन्दी का आँगन)