Sunday, June 28, 2026
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बीएचएस ने बाल दिवस पर शिक्षकों ने बच्चों के लिए कार्यक्रम

कोलकाता :  महामारी के बीच, बिड़ला हाई स्कूल (सीनियर सेक्शन) के शिक्षकों ने गत 18 नवंबर 2020 को एक आभासी माध्यम पर बाल दिवस मनाया। कार्यक्रम का विषय ‘खुशी’ था। बिड़ला हाई स्कूल की निदेशक मुक्ता नैन, प्रिंसिपल लवलीन सैगल और विभागाध्यक्षों ने ‘खुशी’ पर ’पर अपने विचार व्यक्त किए, जिसने शब्द को आयामों के असंख्य योगदान दिए। कार्यक्रम का भव्य उद्घाटन संगीत शिक्षकों द्वारा किया गया संगीत की प्रस्तुति ऑर्केस्ट्रा ’के माध्यम से की गयी था, जिसकी अध्यक्षता संगीत शिक्षक अनिंदो साहा ने की। इसके बाद राजश्री चौधरी ने एक “कुकरी शो” पेश किया, जिसमें एक इतालवी डेजर्ट- “लेचे फ्रिटा” प्रदर्शित किया गया। गायन संगीत काकली बनर्जी और रिया खेतान द्वारा प्रस्तुत किया गया था। अरुण सेन द्वारा एक पावर प्वाइंट प्रेजेंटेशन रखा गया। बच्चों को डांस परफॉर्मेंस, ‘उत्तान’, मिस्टर प्रलय सरकार,  रश्मि तिवारी, शुभ्रा भौमिक, मलंचा मजूमदार, ललिता अग्रवाल, मधुमिता मित्र मंडल, अंकिता चक्रवर्ती और देबांजलि गुप्ता ने मंत्रमुग्ध कर दिया। इसके बाद एक लघु नाटक जो अर्कियोस्वामी, रोहन सेनगुप्ता, लॉरेंस छेत्री, स्पंदन बनर्जी, अनिर्बान भट्टाचार्य, लवलीन सैगल, पियाली सान्याल, सदाफ सिद्दीकी और तृषा नाथ द्वारा प्रस्तुत किया गया। फैशन शो, दिन का सबसे प्रतीक्षित आयोजन, एक अनोखे मिश्रण में रखा गया था, जहाँ शिक्षकों ने दशक की प्रसिद्ध हस्तियों का प्रतिनिधित्व किया और छात्रों को उन्हें पहचानना पड़ा। फैशन शो में भाग लेने वालों प्रियांशा भट्टाचार्य, रेणु बुबना, कस्तूरी बनर्जी, रेणुका चोटानी, सुदेषना सेनगुप्ता, मधुमिता चौधरी, गौतम घोष, एन.एन. मिश्रा, और अर्नब दत्ता।

 

सजावट, पैकेजिंग और संस्कृति का हिस्सा है बांस हस्तशिल्प

बांस एक ऐसा पेड़ है जो भारत के हर प्रांत में पाया जाता है। ये लगभग 25 से 30 मीटर तक ऊंचा होता है और इसके पत्ते लंबे होते हैं। लेकिन शायद आप ये जानकर आश्चर्य में पड़ जायेंगे कि बांस के भी स्वास्थ्यवर्द्धक गुण होते हैं। इसके अलावा बांस के गुण रोगों के उपचार के भी काम आते हैं।

रायगढ़, जशपुर और सरगुजा जिलों में बहु उपयोगी और बहुतायत के साथ पाया जाने वाला हस्तशिल्प है – बाँस-शिल्प. बांस का काम करने वाले प्रायः तुरी या बंसोड जाति के लोग होते हैं। बाँस की अधिकांश वस्तुएं ग्रामीण दैनिक ज़रूरतों में काम आने वाली होती हैं. इसलिए ये बहुत बड़ी संख्या में बनती हैं और बिकती भी हैं। यह बंसोड़ो की आजीविका का प्रमुख साधन है. बाँस की वस्तुएं बनाने के लिए वैसे तो हरे बाँस की आवश्यकता होती है।

वन विभाग द्वारा जंगल से बांस-कटाई पर रोक है। ये किसानों से महंगे दामों में खरीदते हैं या फिर सूखा बाँस खरीद कर उसे पानी में डुबाकर रखते हैं। सबसे पहले एक विशेष प्रकार की छुरी ‘कर्री’ से बाँस की लम्बी पट्टियाँ छिली जाती हैं. यह काम प्रायः घर के बूढ़े लोग बैठे-बैठे करते हैं। उसके बाद इन पट्टियों को पुनः छीलकर और पतला किया जाता है।

यद्यपि आधुनिक प्रौद्योगिकी के उपयोग द्वारा बनांये गए उत्पादों, लकड़ी उत्पादों, विशेष रूप से सख्त, लकड़ी उत्पाद की तरह इस्तेमाल किये जाने के लिए तरह उपयुक्त है। सख्त लकड़ी की प्रजातियाँ जैसे टीक, साल, बांजु (ओक), मैफिल, माइकेला डी पटी रोकारपस आदि को परिपक्व होने में 80 वर्ष से भी ज्यादा समय लगता है जबकि बांस को परिपक्व होने में 4 वर्ष का समय लगता है। इस प्रकार जब हम बांस उत्पादों का उपयोग करते हैं उस समय हम कुछ हद तक लकड़ी का प्रतिस्थापन करते हैं जिसमें हम अपने वनों की सुरक्षा करते हैं जो हमारी धरती को अगली पीढ़ी के लिए हरा-भरा और स्वच्छ बनाते हैं।

छोटी छोटी टहनियों तथा पत्तियों को डालकर उबाला गया पानी, बच्चा होने के बाद पेट की सफाई के लिए जानवरों को दिया जाता है। जहाँ पर चिकित्सकीय उपकरण उपलब्ध नहीं होते, बाँस के तनों एवं पत्तियों को काट छाँटकर सफाई करके खपच्चियों का उपयोग किया जाता है। बाँस का खोखला तना अपंग लोगों का सहारा है। इसके खुले भाग में पैर टिका दिया जाता है। बाँस की खपच्चियों को तरह तरह की चटाइयाँ, कुर्सी, टेबुल, चारपाई एवं अन्य वस्तुएँ बिनन के काम में लाया जाता है। मछली पकड़ने का काँटा, डलिया आदि बाँस से ही बनाए जाते हैं। मकान बनाने तथा पुल बाँधने के लिए यह अत्यंत उपयोगी है। इससे तरह तरह की वस्तुएँ बनाई जाती हैं, जैसे चम्मच, चाकू, चावल पकाने का बरतन। नागा लोगों में पूजा के अवसर पर इसी का बरतन काम में लाया जाता है। इससे खेती के औजार, ऊन तथा सूत कातने की तकली बनाई जाती है। छोटी छोटी तख्तियाँ पानी में बहाकर, उनसे मछली पकड़ने का काम लिया जाता है। बाँस से तीर, धनुष, भाले आदि लड़ाई के सामान तैयार किए जाते थे। पुराने समय में बाँस की काँटेदार झाड़ियों से किलों की रक्षा की जाती थी। पैनगिस नामक एक तेज धारवाली छोटी वस्तु से दुश्मनों के प्राण लिए जा सकते हैं। इससे तरह तरह के बाजे, जैसे बाँसुरी, वॉयलिन, नागा लोगों का ज्यूर्स हार्प एवं मलाया का ऑकलांग बनाया जाता है। एशिया में इसकी लकड़ी बहुत उपयोगी मानी जाती है और छोटी छोटी घरेलू वस्तुओं से लेकर मकान बनाने तक के काम आती है। बाँस का प्ररोह (young shoot) खाया जाता और इसका अचार तथा मुरब्बा भी बनता है।

पिछले कुछ महीनों में केवीआईसी ने भारत के विभिन्न हिस्सों में, बम्बुसा तुलदा के लगभग 2,500 पेड़ लगाए हैं। अगरबत्ती निर्माताओं के लिए सही कीमत पर कच्चे माल की स्थानीय उपलब्धता को सुनिश्चित करने के लिए नासिक में नवीनतम वृक्षारोपण के अलावा दिल्ली, वाराणसी और कन्नौज जैसे शहरों में बम्बुसा तुलदा के 500 पौधे लगाए गए हैं।

पूर्वोत्तर भारत के साथ ही बिहार भी बांस हस्तशिल्प का प्रमुख केन्द्र है। खासकर छठ पूजा और शादियों के दौरान सूप, टोकरी, दउरा की माँग हमेशा बनी रहती है। होम डेकोर में फर्नीचर से लेकर सजावट और क्रॉकरी तक में बांस का इस्तेमाल हो रहा है। यह इको फ्रेंडली है इसलिए आज उपहार के लिए कॉरपोरेट की पसन्द तो है, साथ ही आज बांस गिफ्ट पैकेजिंग उद्योग का एक प्रमुख हिस्सा है क्योंकि पैकेजिंग में ट्रे से लेकर टोकरी तक के निर्माण के लिए बांस का इस्तेमाल हो रहा है तो बांस की बोतलें भी बढ़ रही हैं।

कोलकाता में मछुआ फलपट्टी और रवीन्द्र सरणी इलाके में कुछ दुकाने हैं जहाँ आप बांस का सामान देख सकते हैं। कुछ दुकानें तो 150 साल पुरानी हैं…देखिए हमारी वीडियो रिपोेर्ट –

असम के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तरूण गोगोई का निधन

गुवाहाटी : असम के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता तरुण गोगोई का सोमवार दोपहर निधन हो गया। 86 साल के तरुण गोगोई पिछले महीने ही कोविड-19 संक्रमण के बाद ठीक हुए थे लेकिन उसके बाद उन्हें इस बीमारी के बाद होने वाली जटिलताओं ने घेर लिया। असम के स्वास्थ्य मंत्री हेमंता बिस्वा सर्मा ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि तरुण गोगोई ने जीएमसीएच में शाम 5:34 बजे आख़िरी सांस ली। तरुण गोगोई का पार्थिव शरीर लोगों के अंतिम दर्शन के लिए मंगलवार को शंकरदेव कलाक्षेत्र में रखा जाएगा। उनका पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया जाएगा।”वे गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज ऐंड हॉस्पिटल (जीएमसीएच) में भर्ती थे और पिछले दो दिन से उनकी हालत नाज़ुक होने के कारण उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया था। सोमवार सुबह उनकी हालत बेहद बिगड़ जाने की ख़बर के बाद असम के मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल दिबरूगढ़ में अपने सब कार्यक्रम स्थगित कर गुवाहाटी पहुंचे। तरूण गोगोई के बेटे और सांसद गौरव गोगोई ने 21 नवंबर को ही ये ख़बर ट्विटर के ज़रिए दी थी कि उनके पिता के सभी अंगों ने काम करना बंद कर दिया है। असम के स्वास्थ्य मंत्री हेमांता बिस्वा सरमा अस्पताल में तरूण गोगोई के बेटे गौरव गोगोई के साथ मौजूद थे। तरूण गोगोई तीन बार असम के मुख्यमंत्री रहे।

देश की सबसे प्रदूषित जगहों में शामिल है कोलकाता और हावड़ा

कोलकाता : देश की राजधानी दिल्ली नहीं, बंगाल की राजधानी कोलकाता से सटा हावड़ा देश का सबसे प्रदूषित शहर है। हावड़ा का एयर क्वालिटी इंडेक्स दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में शामिल अन्य शहरों से ज्यादा खराब है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने एक रिपोर्ट जारी कर यह जानकारी दी। रिपोर्ट में कहा गया कि दिल्ली-एनसीआर में पिछले कुछ दिनों में हुई बारिश एवं हवाओं के चलते वहां एक्यूआइ में सुधार आया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि हावड़ा के बाद एयर क्वालिटी इंडेक्स के आधार पर राजस्थान का भिवंडी शहर दूसरा सबसे ज्यादा प्रदूषित शहर रहा, जबकि कोलकाता तीसरे स्थान पर।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने कहा है कि डेली रिपोर्ट में बताया गया है कि कोरोना वायरस के संक्रमण की वजह से जब देश भर में लॉकडाउन लगाया गया था, उस वक्त 1 मई, 2020 को कोलकाता और हावड़ा का औसत एक्यूआइ 50 से कम दर्ज किया गया था। इसे बेहतरीन हवा माना जाता है। एक्यूआइ स्केल की बात करें, तो 50 तक के वायु को स्वास्थ्य के लिए बेहतर माना जाता है। यदि एक्यूआइ 51 से 100 के बीच रहता है, तो इसे संतोषप्रद कहा जाता है, जबकि 101-200 को सामान्य माना जाता है। इससे अधिक यानी 201-300 को खराब और 301-400 को बहुत खराब माना गया है। एक्यूआइ यदि 400 से अधिक हो जाये, तो यह गंभीर खतरा उत्पन्न कर देता है। खासकर उन लोगों के लिए जिन्हें सांस की तकलीफ होती है। इधर, पश्चिम बंगाल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (डब्ल्यूपीसीबी) के आंकड़ों पर गौर करें, तो हावड़ा के घुसुड़ी में बुधवार की सुबह 6 बजे पीएम10 का स्तर 852 माइक्रोग्राम प्रति मीटर क्यूब तक पहुंच गया था, जबकि सुबह 10 बजे इसका स्तर 915 माइक्रोग्राम प्रति मीटर क्यूब हो गया था।

बंगाल में ठंड बढ़ी, कोलकाता में 2 दिन में पारा 7 डिग्री लुढ़का

कोलकाता : बंगाल में पारा तेजी से उतर रहा है। कोलकाता की बात करें तो पिछले दो दिनों में तापमान में सात डिग्री की गौर करने लायक गिरावट दर्ज हुई है। सोमवार कोलकाता में न्यूनतम तापमान 15.5 डिग्री सेल्सियस रहा, जो सामान्य से तीन डिग्री कम है। वहीं रविवार को महानगर में न्यूनतम तापमान 19.5 डिग्री सेल्सियस दर्ज हुआ था। पिछले शनिवार को यह 22 डिग्री सेल्सियस था। जिलों में भी मौसम ठंडा रहेगा।

जिलों में भी मौसम ठंडा रहेगा –अलीपुर मौसम कार्यालय से मिली जानकारी के मुताबिक अगले 48 घंटे भी तापमान मौजूदा स्तर के आसपास रहेगा। कोलकाता में शनिवार सुबह तेज बारिश हुई थी, तापमान में काफी गिरावट देखने को मिली थी।

तेजी से ठंड पड़ने की उम्मीद –बारिश का दौर खत्म होने के बाद तेजी से ठंड पड़ने की उम्मीद की जा रही थी और ऐसा ही हुआ। मौसम विभाग पहले ही कह चुका है कि इस बार बंगाल में कड़ाके की ठंड पड़ेगी और ज्यादा समय तक ठहरेगी भी।

निजी अस्पतालों ने ‘कोविड इलाज’ के नाम पर बढ़ा-चढ़ाकर पैसे लिए : रिपोर्ट

नयी दिल्ली :  एक संसदीय समिति ने शनिवार को कहा कि कोविड-19 के बढ़ते मामलों के बीच सरकारी अस्पतालों में बेड की कमी और इस महामारी के इलाज के लिए विशिष्ट दिशानिर्देशों के अभाव में निजी अस्पतालों ने काफी बढ़ा-चढ़ाकर पैसे लिए। इसके साथ ही समिति ने जोर दिया कि स्थायी मूल्य निर्धारण प्रक्रिया से कई मौतों को टाला जा सकता था।
स्वास्थ्य संबंधी स्थायी संसदीय समिति के अध्यक्ष राम गोपाल यादव ने राज्यसभा के सभापति एम वेंकैया नायडू को ‘कोविड-19 महामारी का प्रकोप और इसका प्रबंधन’ की रिपोर्ट सौंपी। सरकार द्वारा कोविड-19 महामारी से निपटने के संबंध में यह किसी भी संसदीय समिति की पहली रिपोर्ट है। समिति ने कहा कि 1.3 अरब की आबादी वाले देश में स्वास्थ्य पर खर्च ‘बेहद कम है’ और भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था की नाजुकता के कारण महामारी से प्रभावी तरीके से मुकाबला करने में एक बड़ी बाधा आयी।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इसलिए समिति सरकार से सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में अपने निवेश को बढ़ाने की अनुशंसा करती है। समिति ने सरकार से कहा कि दो साल के भीतर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 2.5 प्रतिशत तक के खर्च के राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयास करें क्योंकि वर्ष 2025 के निर्धारित समय अभी दूर हैं और उस समय तक सार्वजनिक स्वास्थ्य को जोखिम में नहीं रखा जा सकता है।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 में 2025 तक जीडीपी का 2.5 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवा पर सरकारी खर्च का लक्ष्य रखा गया है जो 2017 में 1.15 प्रतिशत था। समिति ने कहा कि यह महसूस किया गया कि देश के सरकारी अस्पतालों में बेड की संख्या कोविड और गैर-कोविड मरीजों की बढ़ती संख्या के लिहाज से पर्याप्त नहीं थी।
रिपोर्ट में कहा गया है कि निजी अस्पतालों में कोविड के इलाज के लिए विशिष्ट दिशानिर्देशों के अभाव के कारण मरीजों को अत्यधिक शुल्क देना पड़ा। समिति ने जोर दिया कि सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और महामारी के मद्देनजर सरकारी और निजी अस्पतालों के बीच बेहतर साझेदारी की जरूरत है। समिति ने कहा कि जिन डॉक्टरों ने महामारी के खिलाफ लड़ाई में अपनी जान दे दी, उन्हें शहीद के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए और उनके परिवार को पर्याप्त मुआवजा दिया जाना चाहिए।

भारतवंशी डॉक्टर ने की कोरोना के संभावित इलाज की पहचान

वाशिंगटन : कोरोना मरीजों के फेफड़ों को होने वाले नुकसान और अंगों को बेकार होने से बचाने के लिए भारतीय मूल की अमेरिकी डॉक्टर ने एक इलाज की खोज की है। भारत में जन्मीं और टेनेसी की सेंट ज्यूड चिल्ड्रेन रिसर्च हॉस्पिटल में कार्यरत डॉ. तिरुमला देवी कन्नेगांती का इससे संबंधित अध्ययन जर्नल सेल के ऑनलाइन संस्करण में प्रकाशित हुआ है।
उन्होंने चूहों पर शोध के दौरान पाया कि कोरोना होने पर कोशिकाओं में सूजन की वजह से अंगों के बेकार होने का संबंध ‘हाइपरइनफ्लेमेटरी’ प्रतिरोध है जिससे अंतत: मौत हो जाती है। इस स्थिति से बचाने वाली संभावित दवाओं की उन्होंने पहचान की है।
सूजन वाली कोशिकाओं के मृत होने के संदेश प्रसारित होते हैं
शोधकर्ता ने विस्तार से अध्ययन कर यह पता लगाया है कि कैसे सूजन वाली कोशिकाओं के मृत होने के संदेश प्रसारित होते हैं जिसके आधार पर उन्होंने इसे रोकने की पद्धति का अध्ययन किया। सेंट ज्यूड अस्पताल के इम्यूनोलॉजी विभाग से जुड़ीं डॉ. कन्नेगांती ने कहा, ‘काम करने के तरीके और सूजन पैदा करने के कारणों की जानकारी बेहतर इलाज पद्धति विकसित करने में अहम है।’
डॉ. कन्नेगांती सेंट ज्यूड चिल्ड्रेन रिसर्च हॉस्पिटल से जुड़ी हैं
बता दें कि कन्नेगांती का जन्म और पालन-पोषण तेलंगाना में हुआ है। उन्होंने वारंगल के काकतिय विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र, जंतु विज्ञान और वनस्पति विज्ञान से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने परास्नातक और पीएचडी की उपाधि भारत के उस्मानिया विश्वविद्यालय से प्राप्त की। वर्ष 2007 में डॉ. कन्नेगांती टेनेसी राज्य की मेमफिस स्थित सेंट ज्यूड अस्पताल से जुड़ी हैं।
कोशिका में सूजन पैदा करने वाला साइटोकींस की पहचान की
उन्होंने कहा, ‘इस शोध से हमारी समझ बढ़ेगी। हमने उस खास साइटोकींस (कोशिका में मौजूद छोटा प्रोटीन जिससे संप्रेषण होता है) की पहचान की है जो कोशिका में सूजन पैदा करता है और व्यक्ति को मौत के रास्ते पर ले जाता है। इस शोध में श्रद्धा तुलाधर, पीरामल समीर, मिन झेंगे, बालामुरुगन सुंदरम, बालाजी भनोठ, आरके सुब्बाराव मलिरेड्डी आदि भी शामिल हैं।
डब्ल्यूएचओ ने दी रेमडेसिविर का इस्तेमाल नहीं करने की सलाह
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने शुक्रवार को सलाह दी कि अस्पताल में भर्ती मरीजों पर कोरोना वायरस के इलाज में रेमडेसिविर का इस्तेमाल नहीं किया जाए। एक बयान के मुताबिक, डब्ल्यूएचओ ने अस्पताल में भर्ती मरीजों में रेमडेसिविर के इस्तेमाल के खिलाफ सशर्त सिफारिश जारी की है, भले ही बीमारी कितनी भी गंभीर हो। इसकी वजह यह है कि वर्तमान में इस बात के कोई सुबूत नहीं हैं कि रेमडेसिविर इन मरीजों में जीवन या अन्य परिणामों में कोई सुधार करती है।

 

100 साल के हुए पूर्व प्रथम श्रेणी क्रिकेटर रघुनाथ चंदोरकर

मुम्बई : पूर्व प्रथम श्रेणी क्रिकेटर रघुनाथ चंदोरकर ने शनिवार 21 नवम्बर को जीवन के 100 बसंत पूरे कर लिए। अपने जीवन का शतक पूरे करने वाले वह तीसरे क्रिकेटर हैं। जीवन के 100 साल पूरे करने वाले दो अन्य भारतीय क्रिकेटर डीबी देवधर और वसंत रायजी हैं। चंदोरकर का प्रथम श्रेणी करियर 1943/44 से 1950/51 तक चला जिसमें वह महाराष्ट्र और मुंबई की तरफ से खेले। चंदोरकर ने अपने करियर के दौरान सात प्रथम श्रेणी मैच खेले। उन्होंने अपना पदार्पण महाराष्ट्र के लिए बॉम्बे के खिलाफ किया और उनका आखिरी मैच बॉम्बे के लिए महाराष्ट्र के खिलाफ था। चंदोरकर एक विकेटकीपर बल्लेबाज थे और अपनी शानदार बल्लेबाजी के लिए जाने जाते थे। उन्होंने अपने सात मैचों में 155 रन बनाए और इसके साथ ही उन्होंने विकेटकींिपग में तीन कैच और दो स्टंप भी किए थे। चंदोरकर से पहले प्रो.डीबी देवधर (1892-1993) और वसंत रायजी (1920-2020) दो भारतीय क्रिकेटर हैं, जिन्होंने अपना 100वां जन्मदिन मनाया है।

कनाडा लौटाएगा भारत की एक खास मूर्ति, 100 साल से भी पहले हुई थी चोरी

टोरंटो : कनाडा का एक विश्वविद्यालय ‘ऐतिहासिक गलतियों को सही करने’ और ‘उपनिवेशवाद की अप्रिय विरासत’ से उबरने की कोशिश के तहत हिंदू देवी अन्नपूर्णा की अनोखी मूर्ति भारत को लौटाएगा, जिसे एक सदी से अधिक समय पहले भारत से चुराकर लाया गया था। यह मूर्ति मैकेंजी आर्ट गैलरी में रेजिना विश्वविद्यालय के संग्रह का हिस्सा है। यह मूर्ति नोर्मान मैकेंजी के 1936 के मूल वसीयत का हिस्सा है। विश्वविद्यालय ने एक बयान में बताया कि कलाकार दिव्या मेहरा ने इस तथ्य को ओर ध्यान आकृष्ट किया कि इस मूर्ति को एक सदी से भी पहले गलत तरीके से लाया गया। जब वह मैकेंजी के स्थायी संग्रह को खंगाल रही थीं और अपनी प्रदर्शनी की तैयारी कर रही थीं तब उनका ध्यान इस ओर गया। बयान के अनुसार, 19 नवंबर को इस मूर्ति का डिजिटल तरीके से लौटाने का कार्यक्रम हुआ और अब उसे शीघ्र ही वापस भेजा जाएगा। विश्वविद्यालय के अंतरिम अध्यक्ष और कुलपति डॉ. थॉमस चेज ने इस मूर्ति को आधिकारिक रूप से भारत भेजने के लिए कनाडा में भारतीय उच्चायुक्त अजय बिसारिया से डिजिटल तरीके से मुलाकात की। बिसारिया ने कहा, ”हम खुश हैं कि अन्नपूर्णा की यह अनोखी मूर्ति अपनी गृह वापसी की राह पर है। मैं भारत को इस सांस्कृतिक विरासत को लौटाने को लेकर सक्रिय कदम उठाने को लेकर रेजिना विश्वविद्यालय के प्रति आभारी हूँ।”विश्वविद्यालय ने कहा कि अपनी गहन छानबीन के आधार पर मेहरा इस निष्कर्ष पर पहुँचीं कि 1913 में अपनी भारत यात्रा के दौरान मैकेंजी की नजर इस प्रतिमा पर पड़ी और जब एक अजनबी को मैकेंजी की इस मूर्ति को पाने की इच्छा का पता चला तो उसने वाराणसी में गंगा के घाट पर उसके मूल स्थान से उसे चुरा लिया।

कोलकाता : सर्दियों में जल कमान से नियंत्रित किया जायेगा वायु प्रदूषण

कोलकाता : कोलकाता नगर निगम (केएमसी) सर्दियों के समय वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए अभिनव पहल करते हुए जल कमान का इस्तेमाल करेगा। गौरतलब है कि सर्दियां शुरू होते ही हवा में कार्बन की मात्रा बढ़ जाती है इसलिए विशेषज्ञों की सलाह पर, केएमसी ने जल कमान का इस्तेमाल करने का फैसला किया है। पर्यावरणविदों के मुताबिक दैनिक ऑक्सीजन की कमी से निपटने का सबसे अच्छा तरीका अत्याधुनिक ‘मिस्ट कैनन’ का इस्तेमाल है। जल कमान से निकलने वाला हजारों लीटर पानी हवा में तैरते कार्बन कणों की संख्या को कम करता है, जिससे प्रदूषण का स्तर भी नियंत्रित होता है। मिस्ट कैनन का इस्तेमाल कोलकाता में कोरोना महामारी की शुरुआत के समय सड़कों को सैनिटाइज करने में किया गया था। जल कमान को महानगर की घनी आबादी वाले इलाकों में प्रतिदिन दोपहर बाद इस्तेमाल किया जाएगा। जानकारों के मुताबिक यह प्रदूषण की दर (पीएम 2.5) को कम कर सकता है।केएमसी के मुख्य प्रशासक व राज्य के शहरी विकास मंत्री फिरहाद हकीम ने कहा-‘चक्रवाती तूफान ‘एम्फन’ में कोलकाता में 18,000 बड़े पेड़ गिर गए थे, जिससे इस बार सर्दियों में प्रदूषण की मात्रा आर बढ़ने की आशंका है इसलिए मिस्ट कैनन का घनी आबादी वाले इलाकों में इस्तेमाल किया जाएगा।’
केएमसी सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक जल कमान को चरणबद्ध तरीके से 12 इलाकों में उपयोग में लाया जाएगा। यह भी तय किया गया है कि विक्टोरिया के आसपास जहां पेड़ों की कतारें हैं, उनकी पत्तियों को एक स्प्रिंकलर से धोया जाएगा। पर्यावरणविद् सौमेंद्रमोहन घोष ने केएमसी की इस पहल का स्वागत करते हुए कहा कि पत्तियों को धोने से बहुत अधिक ऑक्सीजन मिलेगी क्योंकि पेड़ों के पत्ररंध्र पूरी तरह से मुक्त हो जाएंगे।