गलतियों से सीखना बहुत जरूरी होता है मगर ऐसा लगता है कि टीआरपी, राजनीति और अपने फायदे के चक्कर में यह बात सब भूलते जा रहे हैं। मानसिक जड़ता ऐसी है कि डिग्री और कलम दोनों पर भारी पड़ रही है। मजहब जब इन्सानियत पर भारी पड़ने लगे तो समझ जाना जानिए कि कहीं न कहीं कुछ गलत हो रहा है। दुर्भाग्य यह है कि नेता तो नेता, साहित्यकार और संवेदनशील माने जाने वाले भी नफरत की आँधी में बहे जा रहे हैं। मुनव्वर साहब ने जिस तरह सिर कलम करने वालों का समर्थन किया है.,..उसे देखकर नाथूराम गोडसे को सही बताने वालों का पक्ष मजबूत हो रहा है जबकि गलत तो दोनों हैं। क्या हो गया है…गंगा – जमुना जैसे जुमले सही मायनों में जुमले ही हैं…मगर दूर – दूर भी इन्सानों की तरह तो रहा ही जा सकता है। लगातार उकसाने वाली हरकतें, चाहें जिधर से भी हों…नुकसान इस देश को ही पहुँचा रही है। ऐसे में अगर आपके आस – पास इस तरह के कट्टरपन्थी हैं तो नागरिक के रूप में आपकी जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। तमाम साजिशों को तोड़ने के लिए उस आम आदमी का उठना बहुत जरूरी है क्योंकि उसे शान्ति चाहिए, विकास चाहिए..एक अच्छा भविष्य चाहिए और युद्ध का उन्माद या नफरत की आँधी यह सब नहीं दे सकती। ये आम आदमी ही है जो कट्टरपंथियों के हाथ से इस देश को छुड़ाएगा…सलमान गलत करे तो रहीम को रोकना होगा…राजन गलत करे तो राम को रोकना होगा…देखिए, अपने आस – पास और कदम उठाइए क्योंकि दाँव पर किसी सियासत, धर्म या मजहब का नहीं, आपका भविष्य लगा है। इतिहास गवाह है कि किसी भी युद्ध में किसी नेता या शासक या विरोधियों का कुछ नहीं गया, दाँव पर आम आदमी के घर लगे हैं….खून उसका बहा, घर उसके जले हैं…तो यह बहुत जरूरी है कि अब आम आदमी हस्तक्षेप करे…और अपने घर से उठने वाले गलत हाथों को नीचे गिरा दे….और मजहब के नाम पर सियासत करने वालों की चालों को नाकाम कर दे। रोटी – बेटी का सम्बन्ध हो तो दिल से हो, किसी को उकसाने के लिए या नीचा दिखाने के लिए न हो…जब तक मानसिक तौर पर हम इसे स्वीकार नहीं कर पाते…कम से कम तब तक एक अच्छे पड़ोसी की तरह तो रह ही सकते हैं क्योंकि हर तकलीफ में काम तो सबसे पहले पड़ोसी ही आता है। क्या जरूरत है कि सीता को सलमा या रुकसाना को रीता बनाकर दिखाया जाए. क्या जरूरत है कि कि रवि को रहीम बनाने पर इज्जत मिले या इकबाल को इशान बनना ही पड़े….कोई जरूरत नहीं है। हम जैसे हैं,….वैसे ही स्नेह से एक दूसरे के साथ रह सकते हैं औऱ यह बात कोई और नहीं, आम आदमी ही समझाएगा। भूल जाइए कि आप किस धर्म या मजहब के हैं…बस एक बात याद रखिए कि हम सब भारतीय हैं…हिन्दुस्तानी हैं और यही एकमात्र समाधान हैं…हमारी समस्याओं का।
वाया ‘मीडिया: एक रोमिंग कॉरस्पॉडेंट की डायरी’
वाया ‘मीडिया: एक रोमिंग कॉरस्पॉडेंट की डायरी’ 1990 से लेकर 2005 तक के कालखंड; लगभग डेढ़ दशक की कथा है। 90 के दशक में प्रिंट मीडिया में महिला पत्रकारों की स्थिति, कार्यस्थल पर पितृसत्तात्मक ढांचे का प्रभाव और इसके बीच महिलाओं का संघर्ष साफ दिखता है। आज भी स्थिति बदली है मगर इतनी नहीं कि महिलाओं का संघर्ष खत्म हो गया हो। हमें यह उपन्यास महिला पत्रकारों की अप्रत्यक्ष आत्मकथा का आरम्भिक अंश लगता है जिसकी कई परतें अभी खुलनी बाकी हैं और वे खुलेंगी जरूर
कैमरे की नजर से कोजागरी लक्खी पूजो
संयोजक – शुभांगी जयसवाल



अमेजन पर करें खरीददारी और पाएं बैंकों के ये ऑफर
कोलकाता : अमेजन ग्रेट इंडियन सेल गिफ्टिंग हैप्पीनेस डेज़ 29 अक्तूबर से शुरू हो गए हैं और जैसा कि हम जानते हैं अमेज़न पिछले कई दिनों से लगातार बढ़िया सेल आयोजित कर रहा है जिसमें कई प्रोडक्टस पर भारी डिस्काउंट और डील्स पेश की जा रही हैं। यह सेल 4 नवम्बर तक चलने वाली है। सेल के दौरान आपको अमेज़न के अलावा, कई बैंक कार्ड्स पर भी अच्छा डिस्काउंट और कैशबैक मिल सकता है। साथ ही अगर आप अपने अकाउंट से पहली दफा कुछ बुक कर रहे हैं तो आपको कुछ प्रोडक्टस पर फ्री डिलिवरी की सुविधा भी मिलेगी। आज हम आपको सेल में मिल रही बेस्ट डील्स के बारे में बता रहे हैं और आप किफ़ायती दाम में स्मार्टफोंस, एयर प्योरिफायर्स, लैपटॉप्स आदि खरीद सकते हैं।
डालते हैं बैंक ऑफर पर नजर
सिटी बैंक: 10% तत्काल छूट प्राप्त करें | क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड पर अधिकतम 3 हजार रुपये की छूट
आईसीआईसीआई बैंक: 10% तत्काल छूट प्राप्त करें | क्रेडिट कार्ड पर अधिकतम 3 हजार रुपये की छूट और डेबिट कार्ड पर 1500 रुपये
कोटक बैंक: 10% तत्काल छूट प्राप्त करें | क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड पर अधिकतम 3 हजार रुपये की छूट
रूपय: 10% तत्काल छूट प्राप्त करें | क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड पर अधिकतम छूट 250 रुपये की
अमेजन पे आईसीआईसीआई क्रेडिट कार्ड: 5% तत्काल छूट (अधिकतम रु। 50) + अमेजन पे आईसीआईसीआई बैंक क्रेडिट कार्ड के साथ गैर-प्रमुख सदस्यों के लिए 3% रिवार्ड पॉइंट
कोरोना के बीच सितम्बर तिमाही में 37 प्रतिशत बढ़ी अमेजन की बिक्री
नयी दिल्ली : कोरोना संकट के बीच दुनियाभर में ग्राहकों ने जमकर ऑनलाइन खरीदारी की। इसका फायदा ई-कॉमर्स कंपनियों को भी हुआ है। अमेरिकी ई-कॉमर्स कंपनी अमेजन की बिक्री सितंबर तिमाही में 37% बढ़कर 96.1 बिलियन डॉलर हो गई। यह पिछले साल की समान तिमाही में 70 बिलियन डॉलर की थी। कंपनी ने उम्मीद जताई है कि चौथी तिमाही में बिक्री का आंकड़ा बढ़कर 112 बिलियन डॉलर और 121 बिलियन डॉलर के बीच हो सकती है।
सितंबर तिमाही में कंपनी का नेट इनकम बढ़कर 6.3 बिलियन डॉलर हो गया है, जो पिछले साल की समान अवधि में 2.1 बिलियन डॉलर रहा था। कंपनी के फाउंडर और सीईओ जेफ बेजोस ने बताया कि क्रिसमस के दौरान ग्राहक गिफ्ट की खरीदारी करेंगे। इससे उम्मीद है कि हॉलिडे सीजन में बिक्री के बढ़ सकती है। इसके अलावा अमेजन नए जॉब के अवसर भी दे रही है। उन्होंने बताया कि हमें गर्व है कि अमेजन ने अकेले इस साल 4 लाख से अधिक नौकरियां दी हैं।
कंपनी की क्लाउड आर्म अमेजन वेब सीरीज सर्विसेज (AWS) की बिक्री भी 29% बढ़कर 11.6 बिलियन डॉलर हो गई। जबकि, ऑपरेटिंग इनकम 3.54 बिलियन रहा। कंपनी के एडवर्टाइजिंग बिजनेस का रेवेन्यू 51% बढ़कर 5.4 बिलियन डॉलर रहा। इसके अलावा सब्सक्रिप्शन सर्विसेस का रेवेन्यू 33% बढ़कर 6.58 बिलियन डॉलर हा गया है। इसमें प्राइम मेंबरशिप का रेवेन्यू भी शामिल है। वर्तमान में अमेजन के साथ दुनियाभर में 11.20 लाख कर्मचारी जुड़े हुए हैं, जो साल दर साल 50% बढ़ रहे हैं।
गुरुवार को अमेरिकी बाजार नैस्डैक में अमेजन डॉट कॉम का शेयर 1.52% की बढ़त के साथ 3,211.01 अमेरिकी डॉलर प्रति शेयर के भाव पर बंद हुआ था।
ऐ सखी सुन – मानसिकता बदलेगी तो समाज अपनेआप ही बदलेगा

ऐ सखी सुन, देवी पर्व अर्थात नवरात्र समाप्त हो गया है लेकिन अभी बहुत सी देवियों की अराधना बाकी है। सखियों यह मौसम ही देवियों की पूजा का है, दुर्गा, लक्ष्मी और काली की पूजा। लेकिन मुश्किल तो इस बात की है कि हमारा समाज पाखंडी है जिसकी कथनी और करनी में उतना ही अंतर है जितना अंतर आसमान और धरती के बीच है। इसीलिए वह पूजा तो करता है देवियों की लेकिन घर की स्त्रियों को उतना भी सम्मान नहीं देता जितना हाड़ मांस के किसी भी जीव को देना चाहिए। शायद इसीलिए जिस देश में नारियों की पूजा होती है वहाँ सबसे ज्यादा प्रताड़ित नारियाँ ही होती हैं। नारीपूजक देश में स्त्रियों को बराबरी का अधिकार देना तो दूर की बात है उन्हें उनका संवैधानिक प्राप्य अधिकार भी नहीं मिलता। अखबार की सुर्खियां अधिकांशतः स्त्री के प्रति होनेवाले अपराधों से भरी होती हैं। हमने तकनीकी विकास की सीढ़ियां चढ़ने में भले ही कामयाबी हासिल कर ली हो लेकिन अपने संस्कारों और मानवीयता को निचले पायदान पर छोड़ आए हैं। हमने बड़ी- बड़ी डिग्रियां भले ही हासिल कर लीं लेकिन शिक्षा के सार को किसी अंधेरे कमरे में कैद कर दिया है। हमने अपनी बेटियों को गृहलक्ष्मी बनने के सारे गुर तो सिखा दिए लेकिन बाहरी मोर्चे पर उन्हें कैसे लड़ना है या घर के शत्रु से कैसे मुकाबला करना है, यह सिखाना हम भूल गए। और यही कारण है कि लड़कियाँ सहना और धीरज धरना तो सीख जाती हैं लेकिन अपने हक और अधिकारों के लिए लड़ना तो दूर की बात है कभी -कभी मुँह खोलना तक भूल जाती हैं। और सहते -सहते जब दर्द हद से गुजर जाता है तब उनकी पीड़ा प्रार्थना में बदल जाती है और वे बरबस कह बैठती हैं, “अगले जन्म मोहे बिटिया ना कीजो”। यह एक ऐसी प्रार्थना है जिस पर एक पल के लिए ठहरकर पूरे समाज को सोचना चाहिए और सोचते- विचारते हुए अपने वैचारिक परिदृश्य को भी बदलने की कोशिश करनी चाहिए।

जब तक तकनीकी विकास के साथ साथ हम अपना मानसिक रूप से विकसित नहीं होंगे, उदार होकर सोचते हुए लड़का- लड़की की समानता के पक्षधर नहीं बनेंगे तब तक समाज भी नहीं बदलेगा। और लड़कियों के प्रति होनेवाले अपराधों में भी कमी नहीं आएगी। इसीलिए सखी हमें एकजुट होकर समाज के मानस को बदलना है। साथ ही अपनी बेटियों को अबला बनने का संस्कार घुट्टी में नहीं पिलाना है बल्कि शारीरिक और मानसिक तौर पर मजबूत बनाना है। उन्हें एक लड़की की तरह नहीं पालना है बल्कि एक सजग और सचेत नागरिक का संस्कार भी देना है जिसके कंधों पर समाज को गढ़ने का दायित्व हो। साथ ही अपनी बेटियों के अलावा बेटों को भी सामाजिक और मानवीय संस्कार घुट्टी में पिलाने की जरूरत है। उन्हें एक पुरुष की तरह नहीं पालना है बल्कि एक सचेत नागरिक बनाना है। उन्हें भी यह समझाने की जरूरत है कि शारीरिक बनावट में भले ही भेद हो लेकिन वे किसी भी मायने में लड़िकयों से श्रेष्ठ नहीं है। और जब हम अपनी बेटियों के साथ बेटों को भी सिखाना, बताना और संस्कारित करना शुरू करेंगे तो निश्चित तौर पर समाज में बदलाव आएगा। जब वे लड़कियों को अपने समान मानना समझना शुरु करेंगे तो उनके मन में उन्हें सजा देने, सबक सिखाने या उनका शोषण करने की बात आएगी ही नहीं। इस संदर्भ में मंजुश्री वात्स्यायन की कविता “चलन” की कुछ पंक्तियां उद्धृत करना चाहूंगी जो हाथरस कांड के बाद लिखी गई हैं और बेहद विचलित करती हैं-
“गुड़िया तो गुड़िया ही थी
हूबहू बार्बी डॉल
सुनहरे,रेशमी घुंघराले बाल,
गुलाबी रंगत लिए
मक्खन से मुलायम गाल,
* * * * *
मां ने उसे समझाया था
अच्छे और बुरे स्पर्श का अर्थ
* * * * * * * * *
बावजूद इसके,एक दिन
घर के पीछे, पार्क में
मिला उसका क्षत-विक्षत शरीर,
* * * * * * *
कोई परिचित ही रहा होगा,
जिसे उसके मां-बाप ने निश्चय ही
नहीं सिखाया होगा
मानवोचित संस्कार
पुरूषोचित व्यवहार
बहन बेटियों की रक्षा करना
स्त्रियों का सम्मान करना
क्योंकि / हमारे यहाँ
बेटों को सिखाने का
चलन नहीं है ….
देखो सखी, हमारे समाज में लिंगभेद की जड़ें बहुत गहरी हैं लेकिन अपने धैर्य और संकल्प से हम समस्या की जड़ तक पहुंचकर इसका समाधान ढूंढने की कोशिश तो कर ही सकते हैं। मानसिकता बदलेगी तो समाज अपने आप बदलेगा। आओ सखी, हम सब एकजुट होकर इस बदलाव के लिए संकल्प लें।
शुभजिता शॉपिंग बैग – त्योहारों वाले खास ऑफर
अमेजन इंडिया (अमेजन ग्रेट इंडियन फेस्टिवल – गिफ्टिंग हैपीनेस डेज सेल), ऑफर अवधि – 4 नवम्बर 2020
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आभासी स्त्री बनाम दुर्गा

हम कितने अंजान
हम कितने नादान
सब कुछ जान
फिर भी अंजान
हम आभासी इस दुनिया के
जीते जागते एक खिलौने
चाबी भी रहस्यमय ताला भी
ऋषि मुनियों ने हमें सिखाया
जीव – जगत क्षणभंगुर है
कान से बहरे बन हम
करते रहे तबाही अपनी
जंगल पेड़ नदी मैदान पहाड़ में
ईंटो की अराजकता आई
सादा जीवन जटिल हो गया
स्त्री-पुरुष में विभेद हो गया
लिंग भाषा और धर्मों में
चलने लगे युद्ध अनवरत
किस दुर्गा की बात करें
लौकिक – अलौकिक के भंवर जाल में
स्त्री को बिठा दिया मंदिर में
सृष्टि का संचालक बन
पुरुष बना सत्ता शासक
स्वयं फंस गयी स्त्री जाति
पूजा-अर्चन के जंगल में
मनुष्यता के मूल मंत्र भूल
आडंबर में हुई लीन
पुरुषों की माया में घिर
भूल गई स्त्रीत्व शक्ति को
भूल गई दुर्गा के अर्थों को
हाथ पैर मन की शक्ति को
शंख चक्र गदा शक्ति त्रिशूल धारिणी
स्त्री के ये अस्त्र-शस्त्र हैं
सृष्टि वाहिनी शक्तिशालिनी
मिट्टी की मूरत में क्यों सिमटी
फेंक सभी बाह्य आवरण
आत्म स्वरूप का ज्ञान कर
सभी रक्त बीज महिषासुर की संहारक बन
हे कल्याण दायिनी!
आभासी दुनिया से निकल
रूप जय यश को पाकर जीवित दुर्गा बन
इस नश्वर संसार को
पुरुष और प्रकृति को जी लो
आभासी इन एहसासों को पल पल भावों में भर लो
स्त्री-पुरुष एक जाति है
पुरुष और प्रकृति के बंधन को
नए अध्याय से जुड़ कर
दुर्गा में स्वयं उतर कर
जीवित जीवन के छिपे रहस्य को पहचानो
हम सब आभासी दुनिया के वरदान।
कोविड – 19 : माइक्रोग्रेन्स के प्रति जागरुकता अभियान चला रहा है यह युवा उद्यमी
इम्यूनिटी मजबूत करता है माइक्रोग्रेन्स, 40 अधिक पोषक होता है
कोलकाता : कोविड -19 जहाँ चुनौतियों से भरा समय है, वहीं सकारात्मकता से भरी ऐसी खबरें भी आ रही हैं जो मानवता के प्रति विश्वास को पुख्ता कर रही हैं। खासकर युवाओं के प्रति यह विश्वास और गहराता जा रहा है। महानगर के ला मार्टिनियर फॉर ब्वायज में दसवीं कक्षा के एक विद्यार्थी से जुड़ी यह खबर कुछ ऐसी ही है। महज 17 साल का स्वराज कोविड -19 के दौरान लोगों को कैंसर से बचाने और उनकी प्रतिरक्षात्मक शक्ति यानी इम्यूनिटी को मजबूत करने के लिए काम कर रहा है। उसने माइक्रो ट्रेजर्स नाम का स्टार्ट अप शुरू किया है। इस सामाजिक उद्यमी का पूरे भारत में माइक्रोग्रेन की आपूर्ति करके माइक्रोग्रेन के बारे में जागरूकता पैदा करना है। माइक्रोग्रेन भोजन में प्रयुक्त होने वाला साग होते हैं और वास्तविक सब्जियों की तुलना में 40 गुना पोषक होते हैं। माइक्रोग्रेन्स कैंसर को ठीक करने और रोकने में भी प्रभावी होते हैं क्योंकि इनमें कैंसर विरोधी गुण होते हैं। स्वराज जन स्वास्थ्य, समाजशास्त्र और स्थायी प्रौद्योगिकी के बारे में काफी उत्साहित हैं, और माइक्रो ट्रेजर्स उसके जुनून से जन्मा है।
उन्होंने माइक्रोग्रेन के बारे में जागरूकता फैलाने और अपने समुदाय की मदद के लिए माइक्रो ट्रेजर्स शुरू किए। वे पूरे भारत में माइक्रोग्रेन, बीज, ट्रे, मिट्टी और हाल ही में विटामिन और सप्लीमेंट्स की आपूर्ति करते हैं – सभी लाभ जरूरतमंदों को दान किए जाते हैं। माइक्रो ट्रेज़र सक्रिय रूप से अन्य गैर सरकारी संगठनों, अस्पतालों, वितरकों, सीएसआर नींव और संभावित सहयोग के लिए स्कूलों से भागीदारी की तलाश कर रहा है, ताकि अधिकतम लोगों तक पहुँच सके और एक साथ इस अभियान को बढ़ाया जा सके। स्वराज चाहते हैं कि हर कोई माइक्रोग्रेन का सेवन करे क्योंकि यह कैंसर से बचाता है। उनका कथन है कि रोकथाम इलाज से बेहतर है जो वास्तव में सही है।

स्वराज अपनी वेबसाइट और ऐप के माध्यम से माइक्रोग्रेन बेचता है, जो आईओएस पर उपलब्ध है, जिसे उसने ही डिजाइन किया है। स्वराज ने एक स्वतंत्र शोध अध्ययन भी किया, जिसमें उन्होंने साबित किया कि रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में माइक्रोग्रेन प्रभावी है और कैंसर कोशिकाओं को बढ़ने से भी रोकता है। यह शोध पत्र इंटरनेशनल जर्नल ऑफ ट्रेंड इन साइंटिफिक रिसर्च एंड डेवलपमेंट ( आईजेटीएसआरडी) में प्रकाशित हुआ है। उसने एक पुस्तक भी प्रकाशित की है जिसका नाम है – माई एंडीवर्स विद माइक्रोग्रेन्स ’जहां वह विभिन्न प्रकार के माइक्रोग्रेन, उनके लाभों और उनके विकास के बारे में बात करते हैं। उन्होंने प्रसिद्ध पोषण विशेषज्ञों और रोगियों का भी साक्षात्कार लिया है और इन साक्षात्कारों को अपनी पुस्तक में शामिल किया है। उनकी किताब ऑनलाइन बिक्री के लिए उपलब्ध है। लोग जैविक उत्पादन का खर्च उठाने में सक्षम नहीं हैं और इसके अलावा कैंसर का उपचार लागत बहुत अधिक है, यही वजह है कि स्वराज ने इन बीजों की कीमत न्यूनतम दर पर रखी है। वह यह सुनिश्चित करना चाहता है कि सभी का स्वस्थ जीवन हो।
इसके अलावा, स्वराज लोगों और जरूरतमंद बच्चों के लिए नि: शुल्क कार्यशालाएं और वेबिनार आयोजित करता है जहाँ वह उन्हें सिखाता है कि उन्हें माइक्रोग्रेन कैसे उगाना है। उन्हें जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली है। हाल ही में, स्वराज ने नयी दिल्ली में एक सामाजिक संगठन कैन्फेम के साथ सहयोग किया, ताकि माइक्रोग्रेन और इसके लाभों के बारे में वेबिनार आयोजित किया जा सके। उन्होंने आगे बढ़कर लोगों को यह भी सिखाया कि उन्हें कैसे विकसित किया जाए। स्वराज ने नारायण सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल, नयी दिल्ली के डॉक्टरों के साथ बात की और वेबिनार को 1500 से अधिक लोगों ने देखा। उन्होंने महसूस किया कि वे माइक्रोग्रेन से परिचित हो गए।
उसका यह भी मानना है कि प्रतिरक्षा यानी इम्यूनिटी सबसे महत्वपूर्ण संसाधन है जो आपके पास हो सकती है और माइक्रोग्रेन इसमें मदद कर सकता है। माइक्रोग्रेन छोटे, खाद्य साग हैं जो सब्जियों और जड़ी बूटियों के बीज से उगाए जाते हैं। यद्यपि वे केवल कुछ इंच लंबे हैं, वे परिपक्व पौधों के पोषण मूल्य का लगभग चालीस गुना पोषण देते हैं।
स्वराज, उन्हें मिलने वाले दान के साथ, कोलकाता की सड़कों पर रहने वाले लोगों के लिए माइक्रोग्रेन वितरण अभियान चला रहा है। कोविड-19 महामारी के बीच में, ये लोग बिना किसी सुरक्षा स्रोत के सड़कों पर रहते हैं और सीधे वायरस के संपर्क में आते हैं। स्वराज ने चावल और दालों के साथ-साथ माइक्रोग्रेन का दान किया, जो उन्हें प्रतिरक्षा बनाने में मदद करता है और इन वायरस से लड़ता है। लॉकडाउन में, स्वराज ने 4 माइक्रोग्रेन वितरण अभियान चलाए जहाँ उसने 500 से अधिक परिवारों को माइक्रोग्रेन, दाल और चावल वितरित किए। कोरोनोवायरस से खुद को बचाने के लिए वे सभी मदद पाने के लिए खुश थे और माइक्रोग्रेन का सेवन कर रहे थे।






