Sunday, June 28, 2026
खबर एवं विज्ञापन हेतु सम्पर्क करें - [email protected]
Home Blog Page 414

प्लास्टिक रहित बाँस के टूथब्रश व अन्य उत्पाद बनाकर पर्यावरण को सुन्दर बना रहे हैं योगेश

पुणे : पुणे के रहने वाले योगेश शिंदे एक आईटी बेस्ड मल्टीनेशनल कंपनी में एसोसिएट वाइस प्रेसिडेंट थे। 14 साल के करियर में 5 साल लंदन-जर्मनी समेत तमाम देशों में पोस्टिंग रही। एक दिन उन्होंने सोचा कि आखिर वो अपने देश के लिए क्या कर रहे हैं? इसके बाद उन्होंने नौकरी छोड़ अपने देश में ही कारोबार करने का निर्णय लिया।
साल 2016 में उन्होंने बैंबू इंडिया की शुरुआत की, आज उनकी कम्पनी बांस से ऐसे तमाम प्रोडक्ट बनाती है जो प्लास्टिक के इस्तेमाल को कम करने में सहयोग देते हैं। योगेश कहते हैं ‘साल 2016 में जब हमने कम्पनी शुरू की थी तो पहले साल हमारा टर्नओवर 52 लाख रुपए का था। वहीं पिछले फाइनेंशियल ईयर में हमारा टर्नओवर 3.8 करोड़ रुपये रहा।’
वो कहते हैं ‘मैं जानता हूं कि 3.8 करोड़ रुपए टर्नओवर होना कोई बड़ी बात नहीं है लेकिन हमारा विजन अलग है। हमने अपने बैंबू प्रोडक्ट के जरिए 13 दिसम्बर तक 13.5 लाख किलोग्राम प्लास्टिक वेस्ट होने से बचाया है। हमारे पास देश के 2500 किसानों की टीम है और 200 से ज्यादा सपोर्ट स्टाफ है। सही मायने में यही हमारा टर्नओवर है।’ योगेश कहते हैं कि मेरी कहानी बिल्कुल एक मध्यमवर्गीय युवाओं जैसी ही है। मैंने सरकारी स्कूल से पढ़ाई की, फिर पुणे यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया और जिस तरह एक आईटी इंजीनियर की जर्नी होती है, वैसी ही रही।
मैंने 14 साल की आईटी सेक्टर की नौकरी की। अपने 14 साल के उस करियर में योगेश ने कभी भी भारतीय कंपनी में नौकरी नहीं की। इसके चलते उनके दिल में एक मलाल भी था कि वो अपने देश के लिए कुछ नहीं कर पा रहे हैं। साल 2013 में जब वो भारत वापस आए तो तमाम विषयों पर रिसर्च करना शुरू कर दिया।
इसमें जीरो वेस्ट फार्मिंग, मेडिसिनल प्लांट की खेती के बारे में भी पता किया। लेकिन इन सेक्टर्स में कोई न कोई काम कर रहा था। इसके बाद योगेश ने बांस के बारे में रिसर्च करना और पढ़ना शुरू किया, तो पता चला कि भारत बांस उत्पादन में दूसरा सबसे बड़ा देश है। बांस ट्री नहीं ग्रास है और ये विश्व में सबसे तेजी से बढ़ने वाला ग्रास है। फिर पता चला कि बांस उत्पादन में दूसरा सबसे बड़ा देश होने के बाद भी हम सिर्फ चार प्रतिशत ही एक्सपोर्ट कर रहे हैं। इससे योगेश को बैंबू फॉर प्लास्टिक का आइडिया आया। और उन्होंने तय किया कि वो बांस से ऐसे प्रोडक्ट बनाएंगे जो प्लास्टिक को रिप्लेस कर सकेंगे। धीरे-धीरे उन्होंने गिफ्टिंग आइटम, बैंबू स्पीकर, डेस्क आर्गनाइजर तैयार किया। योगेश कहते हैं ‘मैं जानता था कि लोगों की प्लास्टिक की आदत बदलने और ज्यादा लोगों तक पहुंचने के लिए दैनिक जीवन में इस्तेमाल होने वाली चीजों का विकल्प तैयार करना होगा। इसके बाद हमने बैंबू टूथब्रश पर काम शुरू किया। इस दौरान पता चला कि ये पॉलीथीन के बाद टूथब्रश विश्व का दूसरा सबसे बड़ा प्लास्टिक पोल्यूटेड कंटेंट है और इसकी रिसाइकलिंग आसान नहीं है। भारत में ही हर महीने 20 करोड़ टूथब्रश का इस्तेमाल होता है। तब मुझे समझ में आया कि इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता है। इसके बाद हमने इस पर रिसर्च की और बैंबू से एक टूथब्रश बनाकर मार्केट में उतारा।’
योगेश कहते हैं ‘हमने ‘बैंबू फॉर प्लास्टिक’ थीम पर काम किया। हमारी टैगलाइन भी ‘टू मेक इनोवेटिव प्रोडक्ट्स, टू रिप्लेस प्लास्टिक प्रोडक्ट’ थी। अप्रैल 2016 में जब हम कम्पनी का नाम रखने, उसे मार्केट में लाने के बारे में प्लानिंग कर रहे थे तो हमने सोचा कि देश को 15 अगस्त 1947 में आजादी मिली थी और अब उसे प्लास्टिक से आजादी दिलानी थी। इसलिए हमने साल 2016 में 15 अगस्त के दिन को ही चुना। वहीं 18 सितम्बर को इंटरनेशनल बैंबू डे के दिन हम कई जागरुकता कार्यक्रम करते हैं।’
योगेश का मानना है कि प्लास्टिक हमारी आदत बन चुका है इसलिए अपनी आदत बदलना लोगों के लिए काफी मुश्किल है। वो कहते हैं ‘प्लास्टिक खराब नहीं, वो हमारे लिए वरदान है लेकिन ये शुगर की तरह है। अगर सही मात्रा में लेंगे तो उर्जा देगा लेकिन ज्यादा मात्रा में लेने पर डायबिटीज हो जाती है। हमें प्लास्टिक का ऐसी जगहों पर ही इस्तेमाल करना है, जहाँ कोई और विकल्प नहीं हो सकता।’ योगेश के मुताबिक दीया मिर्जा, जूही चावला, श्रद्धा कपूर और रणदीप हुड्‌डा… ये ऐसे नाम हैं, जो खुद उनकी कम्पनी के बनाए बैंबू उत्पाद ऑर्डर करके इस्तेमाल कर रहे हैं और अपने दोस्तों को भी बांट रहे हैं। योगेश कहते हैं ‘इन सेलेब्स ने आज तक हमसे एक पैसा नहीं लिया और ना ही कभी फ्री में प्रोडक्ट मंगाया और अपने सोशल मीडिया हैंडल्स पर हमारे प्रोडक्ट के बारे में पोस्ट किया। इन सेलेब्स ने ‘वोकल फॉर लोकल’ को सही साबित किया।
योगेश बताते हैं ‘मेरे परिवार में अभी मेरे अभिभावक हैं, दोनों रिटायर्ड टीचर हैं, अब अपनी रिटायरमेंट लाइफ एंज्वाय कर रहे हैं। मेरी वाइफ मेरी कंपनी के सभी ई-कॉमर्स और फाइनेंस सेक्शन को हैंडल करती हैं। मेरे दो बच्चे हैं। बेटा कॉलेज में है बेटी स्कूल में है। मेरी बेटी कम्पनी के लिए मॉडलिंग का काम करती है। हमारे सभी पोस्टर्स में मेरी बेटी ही दिखेगी। क्योंकि हमें कम बजट में ही सब चीजें करनी होती हैं तो कभी कर्मचारियों के बच्चे, कभी अपने बच्चों को ही हम बतौर मॉडल इस्तेमाल करते हैं।’वो बताते हैं ‘जब मैंने नौकरी छोड़ने का निर्णय लिया तब बच्चों की पढ़ाई चल रही थी, घर की ईएमआई भी चल रही थी। लेकिन परिवार को मुझ पर भरोसा था, हमने तय किया था कि एक साल काम करेंगे और अगर कुछ अच्छा नहीं हुआ तो वापस अपनी जॉब में लौट जाऊंगा। हमें अपने काम के लिए बैंक से लोन नहीं मिला तो हमने अपना घर गिरवी रखकर काम शुरू किया।
जब व्यवसाय शुरू किया तो बैंबू स्पीकर बनाने वाली पहली मशीन साढ़े 8 हजार रुपए की ली थी। इसके बाद जैसे-जैसे आमदनी हुई तो वही पैसा कारोबार में लगाया, आज हमारी कम्पनी की नेटवर्थ 2.5 करोड़ रुपये है। अभी हमारी कम्पनी में 32 लोगों को सीधे रोजगार मिला है और 100 से ज्यादा लोग हमारे लिए कॉन्ट्रैक्ट पर काम करते हैं।’ योगेश के मुताबिक, बैंबू इंडस्ट्री में चार स्टेज हाेती हैं। पहली स्टेज बैंबू नर्सरी और प्लांटेशन है, इसमें किसान अपने खेत में नर्सरी या बांस लगाकर उसकी खेती करते हैं। दूसरी स्टेज प्री-प्रोसेसिंग यूनिट होती है, इसमें मार्केट की डिमांड के मुताबिक रॉ मटीरियल उपलब्ध कराया जाता है।
तीसरी स्टेज प्रोडक्ट डिजायन, डेवलपमेंट एंड प्रोडक्शन है, इसमें रॉ मटीरियल से लेकर हाईएंड प्रोडक्ट तब बनाए जाते हैं। वहीं चौथी स्टेज अवेयरनेस, सेल्स एंड मार्केटिंग है, इसमें बैंबू प्रोडक्ट्स के अवेयरनेस से लेकर उसकी मार्केटिंग तक पर काम किया जाता है।
योगेश कहते हैं कि मौजूदा सरकार ने बैंबू को ट्री कैटेगरी से हटाकर ग्रास कैटेगरी में रखा है, जिससे अब इसे काटने और इसके ट्रांसपोर्टेशन के लिए किसी भी तरह की अनुमति नहीं लेनी होती है। यह बैंबू इंडस्ट्री के लिए काफी फायदेमंद है। लेकिन बैंबू इंडस्ट्री में आते समय इन चार स्टेज में से आपको तय करना है कि आप क्या करना चाहते हैं। इसमें चारों काम एक साथ करना काफी मुश्किल होता है।
(साभार – दैनिक भास्कर)

भारतीय मूल की गीतांजलि राव बनीं टाइम मैग्जीन की ‘किड ऑफ द ईयर’

टाइम मैग्जीन ने पहली बार वर्ष के प्रतिभाशाली और संभावनाओं से भरे पांच बच्चों का चयन किया है। भारतीय मूल की 15 वर्षीय गीतांजलि राव को ‘किड ऑफ द ईयर’ घोषित किया है। उनका चयन 8 से 16 साल की आयु के पांच हजार अमेरिकी बच्चों के बीच किया गया है। उन्हें पत्रिका के कवर पर जगह मिली है। चार अन्य बच्चे हैं-14 साल के आर्टिस्ट टाइलर गोर्डन, 14 वर्ष की डिजाइनर जोर्डन रीव्स,10 साल की अश्वेत बेलेन वुडवर्ड। वे रंगों के सहारे रंगभेद से लड़ती हैं। 16 साल के इयान मेकेना फूड बैंक बना रहे हैं।
वैज्ञानिक और आविष्कारक गीतांजलि बताती हैं, वे रिसर्च, सृजन, संवाद पर यकीन करती हैं। उन्होंने इतनी कम आयु में दूषित पेयजल, अफीम की लत और इंंटरनेट पर ट्रोलिंग जैसे मसलों का हल खोजने के लिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया है। दुनिया की समस्याओं को सुलझाने के लिए युवा आविष्कारकों का ग्रुप तैयार करने के मिशन में भी जुटी हैं।

नहीं रहे आजो बा, 84 साल के रवि पटवर्धन का निधन

मुम्बई :  मराठी और हिंदी सिनेमा-टीवी जगत के अभिनेता रवि पटवर्धन का निधन हो गया। वे 84 साल के थे औऱ दिल का दौरा पड़ा था। रवि को सांस लेने में तकलीफ हो रही थी इसके बाद उन्हें निजी हॉस्पिटल में दाखिल करवाया गया, लेकिन उनकी हालत में सुधार नहीं हुआ। इसके पहले मार्च 2020 में भी रवि को दिल का दौरा पड़ा था।
200 से ज्यादा फिल्मों में कर चुके थे काम
1937 में जन्मे रवि लॉकडाउन से पहले मराठी शो अगाबाई सासुबाई में आजो बा के किरदार में देखा गया था। उन्होंने 200 से ज्यादा फिल्मों और 150 से ज्यादा टीवी शो में काम किया। रवि को अंकुश, तेजाब जैसी हिंदी फिल्मों में भी देखा गया था। उनकी शख्सियत के कारण उन्हें गांव के प्रधान, पुलिस कमिश्नर, जज और विलेन के रोल ज्यादा मिलते थे। रवि के परिवार में पत्नी, दो बच्चे, बहू और पोते-पोतियां हैं।

मोदी सरकार ने सरकारी कम्पनियों की हिस्सेदारी बेचकर जुटायी सबसे ज्यादा रकम

नयी दिल्ली :   नरेंद्र मोदी की सरकार है और उन्हीं की सरकार में सबसे ज्यादा सरकारी कंपनियों की हिस्सेदारी बेची गई। मोदी सरकार अब देश की दूसरी सबसे बड़ी फ्यूल रिटेलर कंपनी भारत पेट्रोलियम  में 53.3% हिस्सेदारी बेचने की तैयारी में है। इसके जरिए सरकार को 40 हजार करोड़ रुपये मिलने का अनुमान है।
मोदी सरकार के अब तक के कार्यकाल में सरकारी कंपनियों की हिस्सेदारी या शेयर बेचकर जितनी रकम जुटाई गई है, उतनी रकम 23 सालों में भी नहीं जुटी। इस पूरी प्रक्रिया को कहते हैं डिसइन्वेस्टमेंट या विनिवेश।
क्या होता है डिसइन्वेस्टमेंट?
इन्वेस्टमेंट या निवेश क्या होता है, जब किसी कंपनी या संस्था में पैसा लगाया जाता है। इसका उल्टा होता है डिस-इन्वेस्टमेंट या विनिवेश, यानी किसी कंपनी या संस्था से अपना पैसा निकालना। जब सरकार किसी सरकारी कंपनी से अपनी कुछ हिस्सेदारी बेचकर उससे रकम जुटाती है, तो इस प्रक्रिया को कहते हैं डिस-इन्वेस्टमेंट।
अक्सर विनिवेश और निजीकरण को एक ही मान लिया जाता है। लेकिन दोनों में काफी अंतर होता है। निजीकरण में सरकार अपनी 51% से ज्यादा की हिस्सेदारी किसी निजी कंपनी को बेच देती है, जबकि विनिवेश में सिर्फ कुछ हिस्सा ही बेचा जाता है। विनिवेश की प्रक्रिया में सरकार का कंपनी पर मालिकाना हक बना रहता है। लेकिन निजीकरण में सरकार का कोई मालिकाना हक नहीं रह जाता।
हालांकि, कई बार विनिवेश का फायदा भी होता है। कई सरकारी कंपनियां ऐसी होती हैं, जिन पर करोड़ों खर्च होने के बाद भी कोई मुनाफा नहीं होता। इस वजह से सरकार ऐसी कंपनियों से अपनी हिस्सेदारी या शेयर बेच देती है। ताकि सरकार का पैसा न लगे। सरकार का पैसा यानी हमारा और आपका पैसा।
सरकार को विनिवेश की जरूरत क्यों पड़ती है?
होता ये है कि सरकार देश चलाती है और देश चलाने की लिए जरूरत होती है पैसों की। ये पैसा सरकार टैक्स के जरिए वसूलती है, लेकिन इतनी रकम से डेवलपमेंट वर्क नहीं हो पाता। इसके लिए सरकार पैसा जुटाने के लिए सरकारी कंपनी में अपनी हिस्सेदारी बेचती और रकम जुटाती है। इसको ऐसे भी समझ सकते हैं कि जब किसी घर में खर्च चलाना मुश्किल होता है, तो लोग घर का सामान बेचते हैं। ऐसा ही सरकार भी करती है।
बीपीसीएल की हिस्सेदारी क्यों बेच रही है सरकार?
अब सवाल उठता है कि आखिर सरकार बीपीसीएल की हिस्सेदारी क्यों बेच रही है। दरअसल, 2020-21 के लिए सरकार ने विनिवेश के जरिए 2.10 लाख करोड़ रुपए जुटाने का टारगेट रखा था। लेकिन कोरोना की वजह से अभी तक सरकार सिर्फ 6,311 करोड़ रुपए ही जुटा सकी है। बीपीसीएल के जरिए सरकार को 40 हजार करोड़ रुपए मिलने की उम्मीद है।
इसके अलावा पिछले 4 साल से बीपीसीएल  का प्रॉफिट कम होता ही जा रहा था। 2018-19 में कंपनी को 7,132 करोड़ रुपए का फायदा हुआ था, जो 2019-20 में घटकर 2,683 करोड़ रुपये हो गया। मई 2014 में केंद्र में पहली बार मोदी सरकार आई। तब से लेकर अब तक मोदी सरकार में 121 कंपनियों की हिस्सेदारी बिक चुकी है। इससे सरकार ने 3.36 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा कमाई की है। ये आंकड़ा किसी सरकार में विनिवेश के जरिए जुटाई गई रकम का सबसे ज्यादा हिस्सा है।
1991 में जब देश आर्थिक संकट से जूझ रहा था, तब सरकार ने सरकारी कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बेचकर रकम जुटाने के लिए डिस-इन्वेस्टमेंट करने का फैसला लिया था। उसके बाद से अब तक के करीब 30 सालों में सरकार डिसइन्वेस्टमेंट के जरिए 4.89 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा जुटा चुकी है। सबसे ज्यादा रकम मोदी सरकार में ही जुटाई गई है।
(साभार – दैनिक भास्कर)

रद्द उड़ानों के यात्रियों को टिकट का पैसा लौटाएगी इंडिगो

नयी दिल्ली :  भारत ने कोरोना वायरस महामारी के कारण दो महीने के अंतराल के बाद 25 मई को घरेलू यात्री उड़ानों को फिर से शुरू किया गया था। इस दौरान कई उड़ानें रद्द हुई थी और यात्रियों ने टिकट रिफंड के लिए आवाज उठाई। कोरोना काल में विमानन कंपनियां बुरी तरह प्रभावित हुई हैं इसलिए उन्होंने रद्द टिकटों पर ‘क्रेडिट शेल’ बनाया था। अब इंडिगो ने अपनी रद्द उड़ानों के सभी यात्रियों को टिकट का पैसा 31 जनवरी 2021 तक लौटाने की घोषणा की है। ये उड़ानें इस साल कोरोना वायरस के प्रसार पर अंकुश के लिए लगाए गए लॉकडाउन के चलते रद्द हुई थीं। एयरलाइन ने रद्द टिकटों पर ‘क्रेडिट शेल’ बनाया था।

1,000 करोड़ के रिफंड से संबंधित कामकाज पूरा
क्रेडिट शेल का इस्तेमाल उसी यात्री द्वारा भविष्य में यात्रा की बुकिंग के लिए किया जा सकता है। एयरलाइन ने सोमवार को बयान में कहा कि उसने करीब 1,000 करोड़ रुपये के रिफंड से संबंधित कामकाज को पूरा कर लिया है। यह यात्रियों को रिफंड की जाने वाली राशि का करीब 90 फीसदी है।
100 फीसदी क्रेडिट शेल का होगा भुगतान
इंडिगो के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) रोनोजॉय दत्ता ने कहा कि लॉकडाउन की वजह से मार्च के अंत में एयरलाइन का परिचालन पूरी तरह ठप हो गया था। चूंकि हमारे पास नकदी का प्रवाह रुक गया था, इसलिए हम यात्रियों का पैसा लौटा नहीं पा रहे थे। दत्ता ने कहा कि अब परिचालन शुरू होने तथा हवाई यात्रा की मांग में धीरे-धीरे सुधार के बाद हमारी प्राथमिकता रद्द उड़ानों के यात्रियों का पैसा लौटाने की है। दत्ता ने कहा, ‘हम 100 फीसदी क्रेडिट शेल का भुगतान 31 जनवरी 2021 तक कर देंगे।’

31 दिसंबर तक अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर प्रतिबंध
विदेश में फंसे यात्रियों को वापस लाने के लिए वंदे भारत मिशन चलाया गया और कई देशों के साथ एयर बबल करार भी किया गया। कोरोना वायरस महामारी के चलते नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) ने भारत में शेड्यूल अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक उड़ानों की आवाजाही पर प्रतिबंध 31 दिसंबर तक बढ़ाया है। लेकिन इस दौरान वंदे भारत मिशन के तहत जाने वाली उड़ानें जारी रहेंगी। इससे पहले अंतरराष्ट्रीय उड़ानों पर 30 नवंबर तक प्रतिबंध था। डीजीसीए के आदेश के अनुसार, केवल चयनित उड़ानों को ही संचालन की अनुमति होगी।

हवाई यात्रा में 2024 तक बन पाएगी 2019 जैसी स्थिति
विमानन कंपनियों के वैश्विक संगठन अंतरराष्ट्रीय हवाई यातायात संघ (आईएटीए) के सीईओ एलेक्जेंडर डि जुनियाक ने कहा था कि वैश्विक महामारी कोविड-19 के चलते रेवेन्यू पैसेंजर किलोमीटर (राजस्व यात्री किलोमीटर) अपनी 2019 की स्थिति में साल 2024 तक लौट सकेगा। उन्होंने कहा कि अगर वायरस पर नियंत्रण पाने में या वैक्सीन विकसित करने में हम सफल नहीं हुए तो यह समय सीमा और आगे भी बढ़ सकती है।

 

 

दृढ़ संकल्प और परिश्रम से शिखर तक पहुँचे थे मसाला किंग महाशय धर्मपाल गुलाटी

छोटा व्यवसाय शुरू कर उसे शिखर तक पहुँचाने वाले और 98 वर्ष की उम्र में भी अपनी जिंदादिली, अपनी सक्रियता से सबको चौंका देने वाले एमडीएच ग्रुप के मालिक महाशय धर्मपाल गुलाटी का गत 3 दिसम्बर को निधन हो गया। उन्होंने दिल्ली के माता चानन देवी अस्पताल में अंतिम सांस ली। 98 वर्षीय महाशय धर्मपाल गुलाटी बीमारी के चलते पिछले कई दिनों से माता चानन देवी अस्पताल में भर्ती थे। इससे पहले महाशय गुलाटी कोरोना से संक्रमित हो गए थे। हालांकि बाद में वह ठीक हो गए थे। भारत सरकार ने पिछले साल उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।

एमडीएच के सभी विज्ञापनों में मॉडलिंग की

शुरू से लेकर 98 वर्ष की उम्र में भी अपने ब्रांड के सभी विज्ञापनों में खुद मॉडलिंग करने वाले महाशय धरमपाल गुलाटी को ‘दादजी’, ‘मसाला किंग’, ‘किंग ऑफ स्पाइसेज’ और ‘महाशयजी’ के नाम से भी जाना जाता था। मशहूर धरमपाल गुलाटी का जन्म 1923 में पाकिस्तान के सियालकोट में हुआ था। स्कूल की पढ़ाई बीच में ही छोड़ने वाले धर्मपाल गुलाटी शुरुआती दिनों में विभिन्न व्यवसायों में हाथ आजमाने के बाद अपने पिता के मसाले के व्यवसाय में शामिल हो गए थे। 1947 में देश के विभाजन के बाद महाशय धर्मपाल गुलाटी भारत आ गए और अमृतसर में एक शरणार्थी शिविर में कुछ दिन रहे। इसके बाद मन में कुछ बड़े निश्चय लेकर वह दिल्ली आ गए थे। दिल्ली आने के समय 27 सितंबर 1947 को उनके पास केवल 1500 रुपये थे। महाशय धर्मपाल गुलाटी ने एक साक्षात्कार में स्वयं बताया था कि इन 1500 रुपए में से 650 रुपये में उन्होंने एक तांगा खरीदा और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से कुतुब रोड के बीच चलाया लेकिन कुछ दिनों बाद उन्होंने तांगा भाई को दे दिया और करोल बाग की अजमल खां रोड पर ही एक छोटी-सी दुकान लगाकर मसाले बेचना शुरू किया। धीरे-धीरे मसाले का कारोबार चल निकला और एमडीएच ब्रांड की नींव पड़ गई। महाशय धर्मपाल गुलाटी ने 1959 में आधिकारिक तौर पर एमडीएच कंपनी की स्थापना की थी। शुरुआती संघर्ष के बाद धीरे-धीरे उनका मसालों का व्यवसाय केवल भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया भर में फैल गया। इससे गुलाटी भारतीय मसालों के बड़े वितरक और निर्यातक बन गए।

महाशय धर्मपाल गुलाटी की कंपनी ब्रिटेन, यूरोप, यूएई, कनाडा आदि सहित दुनिया के विभिन्न हिस्सों में भारतीय मसालों का निर्यात करती है और भारत की तो यह शीर्ष मसाला कंपनी है ही। अपनी गुणवत्ता के लिए एमडीएच ब्रांड के मसाले खूब मशहूर हैं। महाशियां दी हट्टी’ (एमडीएच) की स्थापना उनके दिवंगत पिता महाशय चुन्नी लाल गुलाटी ने की थी। उद्योग जगत को नई दिशा देने के लिए वर्ष 2019 में भारत सरकार ने महाशय धर्मपाल गुलाटी को देश के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म भूषण से सम्मानित किया था। एमडीएच मसाला के अनुसार, धर्मपाल गुलाटी अपने वेतन की लगभग 90 प्रतिशत राशि दान करते थे। व्यापार के साथ ही महाशय धर्मपाल गुलाटी ने विभिन्न सामाजिक कार्य भी किये। इनमें अस्पताल और स्कूल आदि बनवाना आदि शामिल है।

अयोध्या में 1500 वर्ग फीट में बनेगी धन्नीपुर मस्जिद

अयोध्या : उत्तर प्रदेश के अयोध्या में एक तरफ जहां राम मंदिर निर्माण का काम जोरों पर चल रहा है, वहीं दूसरी ओर कुछ किलोमीटर की दूरी पर धन्नीपुर गाँव में बनने वाली मस्जिद का खाका भी तैयार हो गया है। जानकारी के मुताबिक, इंडो-इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन ट्रस्ट ने मस्जिद का आकार तय कर लिया है।
यह मस्जिद 1400 गज यानी कि 15 हजार स्क्वायर फीट में बनेगी। मस्जिद का डिजाइन इको फ्रेंडली रखा गया है। मस्जिद का आकार वैसा ही होगा, जैसा बाबरी मस्जिद का आखिरी समय में था। नई मस्जिद में एक बार में 2000 हजार लोग नमाज पढ़ सकेंगे।
जामिया मिलिया इस्लामिया के प्रोफेसर ने तैयार करवाई डिजाइन
यह डिजाइन प्रोफेसर एसएम अख्तर के नेतृत्व में तैयार किया गया है। वे जामिया मिलिया इस्लामिया में वास्तुकला विभाग के प्रमुख हैं। मस्जिद निर्माण के लिए गठित ट्रस्ट ने इस जमीन पर मस्जिद, एक अस्पताल, एक इंडो-इस्लामिक रिसर्च सेंटर और एक सामुदायिक रसोईघर का डिजाइन तैयार किया है।
मस्जिद का आकार वही होगा, जो आखिरी समय में बाबरी का था
इंडो-इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन ट्रस्ट के प्रवक्ता अतहर हुसैन ने बताया कि मस्जिद का आकार अंडाकार होगा। मुझे ऐसी जानकारी मिली है। बाबरी मस्जिद जो आखिरी समय मौजूद थी, उसी आकार की यह मस्जिद बनेगी। डिजाइन का ऐलान एक सप्ताह में होगा। डिजाइन में क्या स्पष्ट है, फिलहाल यह पूरा बता पाना मुश्किल है।
इको फ्रेंडली, बिजली की जगह सौर ऊर्जा का होगा इस्तेमाल
मस्जिद पूरी तरह से इको फ्रेंडली होगी। बिजली का इस्तेमाल मस्जिद में नहीं होगा। पूरी तरह से सौर ऊर्जा का इस्तेमाल होगा। मस्जिद को पुराने स्वरूप से हटकर मॉडर्न लुक दिया गया है। इमारत का आकार अंडाकार रखा गया है, जबकि छत गुंबदनुमा और पारदर्शी होगी। इसकी दो मीनारें आधुनिक शैली में डिजाइन की गई हैं। ये मीनारें बिल्कुल सीधी न होकर हल्की गोलाकार नजर आएंगी।

कोलकाता के पहले म्यूनिसिपल कमिश्नर राय कृष्टो दास पाल बहादुर

कॉलेज स्ट्रीट बाजार यानी वर्ण परिचय के सामने यानी कॉलेज स्ट्रीट – महात्मा गाँधी रेड क्रासिंग पर लोहे के घेरे में एक प्रतिमा स्थापित है। आस – पास बैग की दुकानें हैं और किताबों की भी। आपकी भी नजर पड़ी होगी…बहुत से लोग मानते हैं कि बंगाल में नवजागरण के पुरोधा प्रख्यात समाज सुधारक राजा राममोहन राय की प्रतिमा है। प्रतिमा की वेश भूषा और पगड़ी देखकर एकबारगी लोग ऐसा ही मान लेते हैं तो दूसरी ओर स्थानीय दुकानदार बताते हैं कि यह कोलकाता के प्रथम मेयर की प्रतिमा है…यह भी आधा ही सच है। अक्सर आते – जाते प्रतिमा को देखकर कौतुहल जगता और हमने इस बार अपनी यह जिज्ञासा मिटाने की ठान ली…अगर आपमें से बहुत से लोगों की यह जिज्ञासा है तो हम आपको बताते हैं कि इस प्रतिमा के बारे में।
दरअसल, यह प्रतिमा कृष्टदास पाल की है जिनको कृष्ण दास पाल के नाम से भी जाना जाता है। यह अपने समय के प्रख्यात पत्रकार, अच्छे वक्ता, लेखक और राजनेता थे, साथ ही कोलकाता के पहले म्यूनिसिपल कमिश्नर भी। कृष्टो दास पाल का जन्म 1838 में बंगाल के काँसारिपाड़ा में हुआ था। पिता थे ईश्वर चन्द्र पाल जो कोलकाता में एक दुकान में ही काम करते थे। कृष्टो दास की प्रारम्भिक शिक्षा गाँव के स्कूल से हुई। इसके बाद इन्होंने ओरियेंटल सेमिनरी तथा हिन्दू मेट्रोपॉलिटन कॉलेज से आगे की पढ़ाई की। कॉलेज की पढ़ाई के दौरान ही इन्होंने ‘कोलकाता लिटरेरी फ्री डिबेटिंग क्लब’ की स्थापना की। 1856 में डेविड हेयर की स्मृति सभा में इनके लेख ‘दि यंग बंगाल विन्डिक्टेड’ ने सभी को आकर्षित किया।

कृष्णदास की कर्म यात्रा आरम्भ हुई अलीपुर जिला जज कोर्ट में एक अनुवादक के रूप में। 1861 में वे ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन में बतौर सहकारी सचिव जुड़े। यह बंगाल के भू स्वामियों का बोर्ड था। 1879 में इनकी पदोन्नति सचिव के रूप में हुई। कार्य दक्षता के कारण ये सरकारी और सार्वजनिक दोनों ही रूप में काफी लोकप्रिय हुए।
इस बीच 1863 में ‘कृष्टोदास जस्टिस ऑफ द पीस’ निर्वाचित हुए। इसी साल वे कलकत्ता म्यूनिसिपल काउंसिल के कमिश्नर भी मनोनीत हुए। 1872 में वे बंगीय आईन परिषद यानी बंगाल लेजिस्लेटिव काउंसिल के सदस्य बने। 1883 में बंगाल टेनेन्सी बिल को लेकर समस्या होने पर उन्होंने भू स्वामियों का ही साथ दिया। लॉर्ड रिपन ने कृष्टोदास को भारतवर्षीय व्यवस्थापक सभा यानी वायसराय लेजिसलेटिव काउंसिल का का सदस्य नियुक्त किया। 1877 में उनको रायबहादुर और 1878 में सीएलई की उपाधि मिली।
विद्यार्थी जीवन से ही कृष्टोदास मॉर्निंग क्रॉनिकल, सिटिजन, फोनिक्स, पैट्रियट प्रभृति, इंग्लिशमैन, हरकारू से जुड़े थे। 1861 में जब काली प्रसाद सिंह ने हिन्दू पैट्रियट को खरीदा तो उन्होंने कृष्टदास को सम्पादक नियुक्त किया और इस दायित्व को उन्होंने आजीवन निभाया। हिन्दू पैट्रियट में रहते हुए कृष्ट दास ने कलकत्ता मन्थली मैगजीन प्रकाशित किया जो 6 माह तक चली। इस काम में शम्भू चन्द्र मुखोपाध्याय उनकी मदद किया करते थे। जब कानपुर में सेन्ट्रल स्टार शुरू हुआ तो ये कोलकाता संवाददाता भी बने।
ब्रिटिश सरकार का अनुगामी होने पर भी कृष्टदास देश में स्वायत्त शासन का महत्व समझते थे। इलबर्ट बिल के प्रबल समर्थक थे और समाचार पत्रों की स्वाधीनता में विश्वास रखते थे। चाय श्रमिकों के पक्ष में उन्होंने विभिन्न पत्रिकाओं में लेख लिखे और इमिग्रेशन बिल को ‘द स्लेव लॉ ऑफ इंडिया’ बताया। उच्च शिक्षा की संकुचित नीतियों का इन्होंने विरोध किया। 24 जुलाई 1884 को इनका निधन हो गया। इनकी मृत्य पर तब लॉर्ड रिपन ने कहा था कि कृष्ट दास पाल ने जो पाया. अपने परिश्रम से पाया, उनकी बौद्धिक क्षमता उच्च कोटि की थी, और इनके निधन से उन्होंने एक सहयोगी खो दिया है।

उस दौर में जिन भारतीयों के काम को हर तरफ से स्वीकृति मिली, उस सूची में एक अन्यतम भारतीय या बंगाली कृष्णदास पाल (1838-184) थे। आज आप जो भव्य प्रतिमा देख रहे हैं, उसका अनावरण लॉर्ड एल्गिन ने 7 मार्च, 1894 को किया था। यह सफेद पत्थर की प्रतिमा इंग्लैंड में नेल्सन मैकलीन द्वारा बनाई गई थी, जो एक ब्रिटिश मूर्तिकार थे। मूर्ति को बनाने में उस समय चौदह हजार रुपये का खर्च आया, जिसमें एक स्कॉटिश ग्रेनाइट पेडस्टल है। पूरा पैसा कृष्णदास के भारतीय और ब्रिटिश प्रशंसकों को दान से आया था। पाल पहले पत्रकार हैं जिनकी प्रतिमा इस तरह सम्मान के साथ स्थापित की गयी।।

(साभार – बांग्लापीडिया तथा एई समय  )

बोई पाड़ा को भी है शिक्षण संस्थानों के खुलने का इन्तजार

कोलकाता : कोविड -19 महामारी के कारण जीवन काफी बदल गया है। खासकर लॉकडाउन के बाद व्यवसायियों को काफी धक्का पहुँचा मगर अब लोग चाहते हैं कि सुरक्षा नियमों का पालन करते हुए अब संस्थान खोले जाएं। सीआईएससीई ने तो बाकायदा मुख्यमंत्रियों को चिट्ठी लिखकर स्कूलों को दोबारा अगले साल खोलने की इजाजत माँगी है मगर बंगाल में राज्य सरकार शिक्षण संस्थानों को फिलहाल खोलने के मूड में नहीं है। वैसे स्कूल खुलने या न खुलने का असर सिर्फ विद्यार्थियों, शिक्षकों या अभिभावकों पर नहीं पड़ रहा बल्कि ऐसा एक और वर्ग है जो शिक्षण संस्थानों के खुलने का इन्तजार बेसब्री से कर रहे हैं। नहीं समझे…हम बात कर रहे हैं किताबों के मोहल्ले यानी कॉलेज स्ट्रीट बोई पाड़ा की। इस समय जहाँ यहाँ दुकानदारों के पास किसी से बात करने की फुरसत नहीं रहती मगर अब ये दुकानदार शिक्षण संस्थानों के खुलने के इन्तजार में हैं। लॉकडाउन के कारण किताबों के कारोबार तो असर पड़ा ही था, उस पर से अम्फान के कारण स्थिति काफी बिगड़ गयी है। एशिया के सबसे बड़े पुस्तक बाजार को इन दोनों स्थितियों के कारण काफी नुकसान उठाना पड़ा। अम्फान के कारण 60 लाख रुपये से अधिक कीमत की पुस्तकें भीगकर नष्ट हो गयीं और व्यवसायी इन भीगी हुई किताबों को बटोरते दिखे।

पब्लिशर्स एंड बुक सेलर्स गिल्ड ने खुद माना कि नुकसान करोड़ों का हुआ है और पुस्तक बाजार की मदद के लिए गिल्ड आगे आया। सोशल मीडिया पर कॉलेज स्ट्रीट बोई पाड़ा को बचाने की मुहिम चली। गिल्ड की ओर से प्रधानमंत्री और सीएम को पत्र लिखा गया और अनुदान भी एकत्रित किया गया मगर पुस्तक विक्रेताओं को बहुत ज्यादा राहत मिली हो, ऐसा लग नहीं रहा। बोई पाड़ा पुस्तक विक्रेताओं के संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारी अचिन्त्य दासगुप्ता की मानें तो लॉक डाउन और अम्फान से जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई आसान नहीं है। पुस्तक बाजार अभी भी नुकसान में है मगर नये स्टॉल की बात हुई, लोग आ रहे हैं मगर स्कूल – कॉलेज खुलने का इन्तजार अभी भी है।
वहीं एक अन्य पुस्तक विक्रेता तपन पालित ने कहा कि अब स्कूल – कॉलेज खुले तब ही स्थिति सामान्य हो सकती है। राज्य सरकार ने आर्थिक सहायता तो दी है मगर अभी भी हालात सही नहीं हैं। पुस्तक विक्रेताओं को बोई पाड़ा के गुलजार होने का इन्तजार है और यही इन्तजार हमें भी है और उम्मीद है कि यह इन्तजार जल्द खत्म होगा।

कॉलेज स्ट्रीट बोईपाड़ा : कभी बरगद तले सजती थी दुकानें, घर -घर किताबें बेचते थे फेरीवाले

कोलकाता को शिक्षा और संस्कृति का गढ़ माना जाता है और कई लोग तो इसे देश की बौद्धिक राजधानी भी कहते हैं मगर क्या आप जानते हैं कि एक समय ऐसा था जब यहाँ किताबें आम जनता के लिए आसानी से उपलब्ध नहीं होती थीं और किताबों की कमी से परेशान होकर पादरी रेवरेंड जेम्स लॉन्ग ने हताश होकर  1857 में वे लिखा था ,’कोलकाता में किताब की दुकान नहीं है, हैं तो सिर्फ फेरीवाले। वे सिर पर बोझ लेकर मोहल्लों में फिरते हैं।’ हालांकि बोझ लिए फिरने वाले फेरीवाले तो शहर में अब भी हैं मगर अब कोलकाता में किताबें मिलती हैं और एक जगह तो ऐसी है जहाँ नजर उठाकर जिधर भी देखिए…सिर्फ किताबें हैं…नयी – पुरानी किताबें। ये वही हैं जिन्होंने दीन बन्धु नाटक का अनुवाद करने के जुर्म में माइकल मधुसूदन दत्त को सजा दिलवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। हालाँकि यूरोप में किताबों का मुद्रण यानी छपाई शुरू तो हुई मगर किताबें इतनी महँगी थी कि आम आदमी के लिए खरीदकर पढ़ पाना सम्भव नहीं था, उनके लिए थीं सस्ते कागज पर छपी हुई कुछ किताबें। इनको चैप बुक कहा जाता था और चैपरॉय नाम से लड़के कुछ पेनी के बदले मोहल्लों में घूम – घूमकर किताबें बेचते थे।

तब कोलकाता के लाल दीघी के पास सेंट एन्ड्रूज नाम से किताबें वितरित करने के लिए दुकान थी। लन्दन से जहाज पर किताबें आतीं तब अंग्रेज इसी दुकान से किताबें खरीदते थे। 1778 में बांग्ला की पहली किताब ‘हलहेडेर व्याकरण’ जब छपी तो इसी दुकान से बेची गयी थी। इधर, प्रशासनिक कार्यों के लिए ब्रिटिश अधिकारियों के लिए स्थानीय भाषा सीखना जरूरी था तो श्रीरामपुर छापाखाने से भी इनके लिए बांग्ला में किताबें छापी जाने लगीं। फोर्ट विलियम कॉलेज में स्वाभाविक रूप से पुस्तकालय स्थापित किया गया। अब समस्या हुई कि खुले बाजार में ये किताबें उपलब्ध नहीं थीं इसलिए किताबें चोरी होने लगीं और उनकी कालाबाजारी भी शुरू हो गयी। काले बाजार में ये किताबें दस गुना अधिक कीमतों पर बिक रही थीं। ऐसी स्थिति में कॉलेज काउंसिल के अधिकारियों ने तय किया कि वे खुद पुस्तकें प्रकाशित करके वाजिब कीमतों पर आम जनता को उपलब्ध करवाएंगे और बस यही से शुरू हुआ एक नया व्यवसाय – किताबों का व्यवसाय।


कोलकाता के पहले पुस्तक विक्रेता के रूप में गंगाकिशोर भट्टाचार्य का नाम सामने आता था। हालांकि शुरुआत उन्होंने पुस्तक विक्रेता के रूप में की थी मगर इसके बाद उन्होंने प्रेस कर्मी, लेखक, प्रकाशक, पत्रकार, और पुस्तक विक्रेता के रूप में योगदान किया। यूरोपीय तरीके से पुस्तक प्रकाशन के क्षेत्र में उतरने वाले वे प्रथम भारतीय थे। श्रीरामपुर प्रेस में कम्पोजिटर के रूप में उन्होंने काम शुरू किया था। इसके बाद 1816 में कोलकाता में प्रथम बांग्ला सचित्र ग्रन्थ ‘अन्नदामंगल’ उन्होंने प्रकाशित किया। उन्होंने पुस्तक सिर्फ प्रकाशित नहीं की बल्कि घर – घर में लोगों को समझाकर पुस्तक बेची भी और उनकी मार्केटिंग रणनीति भी असाधारण थी।
1817 में स्थापित हुई स्कूल बुक सोसायटी और इन्होंने हिन्दू कॉलेज के पास ही विद्यार्थियों के लिए किताबों की दुकान खोली। विद्यार्थी ही नहीं, आम लोग भी यहाँ से किताबें खरीदते थे। लगभग इसी समय में शोभाबाजार राजबाड़ी के विश्वनाथ देव ने अलग तरीके से सस्ती किताबें प्रकाशित करनी शुरू की और बटतला बई के सृष्टा यही हैं। शोभाबाजार – चितपुर इलाके में एक विशाल वट वृक्ष को केन्द्र कर इस नाम की उत्पत्ति हुई। बहुत से लोग कहते हैं कि इसी वट वृक्ष के नीचे जॉब चारनाक काफी समय गुजारा करते थे। इस वट वृक्ष और उसके आस -पास के इलाके में मुद्रण और प्रकाशन उद्योग पनप रहा था जो मुख्य रूप से साधारण और अर्द्धशिक्षित पाठकों की जरूरतें पूरी करने के लिए था। यहाँ पर हिन्दू और मुसलमान, दोनों ही व्यवसायी थे। हालांकि मुस्लिम व्यवसायियों ने कलिंगा बाजार यानी आज के न्यू मार्केट में दुकानें खोली थीं यानी सामने दुकान और पीछे प्रेस। इसके अतिरिक्त लल्लू लाल नामक एक प्रकाशक का भी नाम सामने आता है, पर उनके बारे में जानकारी नहीं मिलती। हालांकि हिन्दी की दृष्टि से देखा जाए तो ये उस दौर के लेखक लल्लू लाल भी हो सकते हैं..जो फोर्ट विलियम कॉलेज से ही जुड़े थे।


सब कुछ इसी प्रकार चलता अगर 1847 में खुद ईश्वर चन्द्र विद्यासागर इस व्यवसाय में नहीं उतरते। उस साल 600 रुपये में अर्महस्ट स्ट्रीट इलाके में उन्होंने संस्कृत यंत्रालय नामक लकड़ी का छापाखाना खरीदा। विद्यासागर ने आरपुलि लेन में एक किताब की दुकान खोल ली और नाम रखा संस्कृत प्रेस डिपॉजिटरी। यह एक ऐतिहासिक घटना थी। आज के कॉलेज स्ट्रीट में गम्भीरता पूर्वक शुरू किया गया व्यवसाय यही था। ‘डिपॉजिटरी’ नाम होने के कारण विद्यासागर द्वारा रचित पुस्तकों के अतिरिक्त अन्य लोगों की भी पुस्तकें छापी जाती थीं औऱ उनकी दुकान पर दूसरे लेखक अपनी किताबें बिक्री के लिए रखते भी थे। किताब बिकने पर कमिशन काटकर रुपये दिए जाते थे। आज भी कॉलेज स्ट्रीट का व्यवसाय विद्यासागर की दिखायी राह पर चल रहा है। ईश्वर चन्द्र विद्यासागर का नाम सही समय पर सही कार्य प्रणाली समझाने के लिए उल्लेखनीय है औऱ तत्कालीन समय में इसी वजह से विख्यात थी ‘विद्यासागरेर बईएर दोकान’ । सस्ती पुस्तकों के विक्रेता के रूप में उन्होंने एक आदर्श स्थापित किया।
1881 में कोलुटोला में स्थापित हुआ बंगवासी कार्यालय। यह मुख्य रूप से सस्ती धार्मिक पुस्तकें ही बेचता था मगर इसने टेडेर राजस्थान, मेडोस टेलरेर ठगीर आत्मजीवनी जैसी किताबों को फिर से मुद्रित किया था। इस दौरान कोलूटोला में हितवादी कार्यालय स्थापित हुआ जिसने कई उल्लेखनीय किताबें छापीं। इन किताबों में ‘बत्तीस सिंहासन’ आर त्रैलोक्यनाथ की ‘कंकावती’ भी शामिल थी।


पहले 50 -60 सालों में तो फेरीवालों के जरिए ही घर – घर जाकर ही किताबें बेची जाती थीं। वट वृक्ष के नीचे बैठने वाले पुस्तक व्यवसायी तो इन पर ही निर्भर थे। घरों के भीतर महिलाओं के लिए आती थी बई – मालिनी यानी किताबें बेचने वाली। तब पैसे देकर किताबों का विज्ञापन नहीं होता था बल्कि किताबें इतनी कम होती थीं कि नयी किताबें आने पर अखबारों में खबर छपती थी। समाचार दर्पण के पन्ने देखने पर ऐसी किताबों के छपने की खबर दिखती है। लिखने के लिए तब आज की तरह रॉयल्टी नहीं थी बस कुछ रुपये अग्रिम देकर प्रकाशक पांडुलिपि खरीद लिया करते थे। जिनके पास यह सुविधा नहीं थी, वे संरक्षकों पर निर्भर थे। माइकल की शर्मिष्ठा या एकई कि बले सभ्यता पाइकपाड़ा के राजा के दिये रुपये से छपी थी।


कॉलेज स्ट्रीट में किताबों की पहली दुकान गुरुदास चट्टोपाध्याय ने खोली। पहले वे हिन्दू हॉस्टल की सीढ़ियों पर ‘मेटेरिया मेडिका’ बेचा करते थे। बाद में कॉलेज स्ट्रीट में इन्होंने अपनी दुकान स्थापित की और ‘बंगाल मेडिकल लाइब्रेरी’ नाम देकर डॉक्टरी की पुस्तकें बेचना शुरू किया। 1885 में गुरुदास बाबू अपनी दुकान और प्रकाशन व्यवसाय को कॉर्नवालिस स्ट्रीट ले आये। 19वीं सदी में उस दौरान के कॉलेज स्ट्रीट में किताबों की कई दुकानों का नाम मिलता है, इनमें शामिल हैं ‘बी बनर्जी एंड कम्पनी’, ‘दासगुप्त एंड कम्पनी’, ‘सोमप्रकाश डिपॉजिटरी’ और इनके साथ आशुतोष देव का नाम भी आता है जो ए.टी. देव के नाम से विख्यात हैं। 1860 में अभिधान के व्यवसाय यानी डिक्शनरी व्यवसाय में इनका नाम था और अन्त में इनको एकमात्र टक्कर सुबल चन्द्र मित्र संकलित अभिधान से मिली थी। इसी समय योगेश बंद्योपाध्याय ने कैनिंग लाइब्रेरी के नाम से कहानियाँ और उपन्यास छापना शुरू कर दिया। नये लेखक तारकनाथ गंगोपाध्याय ने दोस्तों के साथ शर्त लगाकर ‘स्वर्णलता’ (1873) लिख ली थी मगर इसे छापने के लिए कोई आगे नहीं आ रहा था, तब योगेश बाबू ने साहस दिखाया और पुस्तक काफी लोकप्रिय हुई औऱ कॉलेज स्ट्रीट का पुस्तक व्यवसाय जम गया। इस बीच अलबर्ट हॉल तोड़कर नयी इमारत बनी, आज वह इमारत कॉफी हाउस के नाम से मशहूर है।

नयी इमारत के नीचे जितने कमरे थे, सभी पुस्तक व्यवसायियों ने किराये पर ले लिए। सबसे पहले आया चटर्जी एंड कम्पनी। इसके बाद उसके पास बना विवेकानन्द्र स्ट्रीट का कमला बुक डिपो। आयी ‘सेन राय एंड कम्पनी’, यू. एन. धर और सेन ब्रदर्स। बस इसी तरह दुकानें खड़ी हो गयीं, आस – पास की गलियों में भी सजने लगें और 40 के दशक में समूचा कॉलेज स्ट्रीट किताबों का मोहल्ला बन गया। तो ऐसे विकसित हुआ कॉलेज स्ट्रीट में पुस्तक व्यवसाय।
आज कॉलेज स्ट्रीट इलाके में हजारों स्टॉल हैं और न जाने कितने परिवारों की रोजी – रोटी है, एशिया का सबसे बड़ा पुस्तक बाजार है, कोलकाता का आकर्षण है और हृदय भी। यही कारण है कि हर परिस्थिति में लोग बोई पाड़ा के साथ खड़े होते हैं। यही एकता कोविड -19 के समय दिखी जब बोई -पाड़ा बिखर रहा था, लॉकडाउन में कारोबार ठप पड़ा था और इस पर अम्फान ने तबाही मचायी तब समूचा कोलकाता बोई – पाड़ा की मदद के लिए आ गया। आस – पास शिक्षण संस्थानों और संगठनों की बहुलता के कारण बोई पाड़ा की रौनक हमेशा बनी रहती है और लॉकडाउन के बाद स्कूल – कॉलेज खुलने के इन्तजार में हैं बोई – पाड़ा के व्यवसायी।

साभार – प्रहर डॉट इन