Thursday, April 9, 2026
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प्लास्टिक मुक्त बनेगा भारत, रेलवे स्टेशन पर मिलेगी कुल्हड़ वाली चाय

नयी दिल्लीः अगर आप अक्सर ट्रेन में सफर करते हैं तो आपको अब अगले सफर में रेलवे स्टेशन पर कुल्हड़ में चाय पीने का मौका मिलेगा। दरअसल रेलवे मंत्री पीयूष गोयल ने रविवार को कहा कि आने वाले समय में देश के हर रेलवे स्टेशन पर प्लास्टिक मुक्त कुल्हड़ में ही चाय मिलेगी। रेल मंत्री ने कहा कि रेल मंत्रालय की योजना है कि आने वाले दिनों में देश के हर रेलवे स्टेशन पर सिर्फ कुल्हड़ में ही चाय मिले। इससे प्लास्टिक मुक्त भारत बनाने में मदद मिलेगी और पर्यावरण प्रदूषण पर भी रोक लगेगी। इसके अलावा देश में लाखों लोगों को रोजगार भी मिल सकेगा। राजस्थान के अलवर के ढीगवाड़ा स्टेशन पर कुल्हड़ में चाय पीने के बाद रेल मंत्री ने कहा, ‘कुल्हड़ में चाय पीने का स्वाद कुछ अलग ही होता है, पर्यावरण को भी बचाता है।’ अभी देश के लगभग 400 रेलवे स्टेशनों पर कुल्हड़ में चाय दी जा रही है।
बता दें 15 साल पहले भी पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने कुल्हड़ में चाय सर्व कराने की शुरुआत की थी। जिसका यात्रियों ने काफी आनंद उठाया था। लेकिन कुछ समय बाद ही रेलवे स्टेशनों से कुल्हड़ अचानक गायब हो गए और उनकी जगह प्लास्टिक और पेपर के कपों ने ले ली। ऐसे में रेलवे स्टेशन पर बढ़ते कचरे और प्रदूषण को ध्यान में रख कर रेल मंत्री पीयूष गोयल ने एक बार फिर इको फ्रेंडली कुल्हडों में चाय बेचने की शुरुआत की है।

 

इलाहाबाद विश्वविद्यालय की पहली महिला कुलपति बनीं प्रो. संगीता श्रीवास्तव

प्रयागराज :  प्रोफेसर संगीता श्रीवास्तव को इलाहाबाद विश्वविद्यालय का नया कुलपति नियुक्त किया गया है। प्रो. श्रीवास्तव इविवि की पहली महिला कुलपति होंगी। इससे पहले कोई महिला इविवि की स्थाई कुलपति नहीं रहीं। केंद्रीय दर्जा मिलने के बाद कुलपति बनने वाली वह इविवि की पहली प्रोफेसर भी हैं। केंद्रीय दर्जा मिलने के बाद तीन स्थाई कुलपति नियुक्त हुए और तीनों ही बाहरी थे।

इविवि को 2005 में केंद्रीय दर्जा मिला था। उस समय प्रो. आरजी हर्षे को स्थायी कुलपति नियुक्ति किया गया था। प्रो. हर्षे का कार्यकाल पूरा होने के बाद प्रो. एके सिंह की नियुक्ति हुई थी। प्रो. सिंह ने 2013 में इस्तीफा दे दिया था। प्रो. आरएल हांगलू ने दिसंबर 2015 में तीसरे स्थाई कुलपति के तौर पर कार्यभार ग्रहण किया था। प्रो. हर्षे और प्रो. हांगलू हैदराबाद विवि के थे तो प्रो. एके सिंह मुम्बई आईआईटी से आए थे। प्रो. श्रीवास्तव इविवि के गृह विज्ञान विभाग की विभागाध्यक्ष रही हैं। जून 2019 में उन्हें प्रो. राजेंद्र सिंह रज्जू भैया विवि का कुलपति नियुक्त किया गया था। रजिस्ट्रार प्रो. एनके शुक्ला ने शिक्षा मंत्रालय से प्रो. श्रीवास्तव को कुलपति बनाए जाने का पत्र आने की पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि प्रो. श्रीवास्तव सोमवार को दिन में 11 बजे कार्यभार ग्रहण करेंगी। वह इविवि की चौथी स्थाई कुलपति होंगी। 31 दिसंबर 2019 को प्रो. आरएल हांगलू के इस्तीफा देने के बाद से कुलपति का पद खाली था। प्रो. हांगलू के इस्तीफे के बाद पहले प्रो. केएस मिश्र कार्यवाहक कुलपति बने। उनके सेवानिवृत होने के बाद प्रो. पीके साहू एक दिन के लिए कार्यवाहक कुलपति हुए। प्रो. साहू के सेवानिवृत होने के बाद से प्रो. आरआर तिवारी को कार्यवाहक कुलपति का पदभार मिला था।

शल्य चिकित्सा के जनक सुश्रुत , 3500 वर्ष पुरानी है आयुर्वेद में शल्‍य क्रिया

विश्‍व की प्राचीन चिकित्सा पद्धतियों में से एक आयुर्वेद चिकित्सा शास्त्र का गौरवशाली इतिहास रहा है। लगभग पांच हजार वर्षों से चिकित्सा कार्य में सन्नद्ध यह विज्ञान अन्य चिकित्सा शास्त्र को भी आलोकित कर रह रहा है। आयुर्वेद में शल्य (सर्जरी), शालाक्य (आइ एंड ईएनटी), दंत चिकित्सा (डेंटिस्ट्री) का विशिष्ट ज्ञान प्रायोगिक रूप में आचार्य सुश्रुत के कालखंड में लगभग 3500 वर्ष पूर्व अर्थात 1500 बीसी का माना जाता है। पीड़ित मानवता की सेवा में संपूर्ण आयुर्वेद शास्त्र चिकित्सा की मुख्य धारा में सदियों से रहा है। समय के क्रम में भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, तकनीक औषधि निर्माणविज्ञान तथा अन्य विज्ञान की विधाओं का विकास हुआ, जिसका लाभ तत्कालीन अंग्रेजी शासकों द्वारा पोषित एलोपैथी को मिलता रहा। फलस्वरूप उसे विकसित एवं पुष्पित पल्लवित होने का पर्याप्त अवसर प्राप्त होता गया।पूरे विश्व में लगभग 50 प्रतिशत लोगों को ही आवश्यक चिकित्सा प्राप्त हो रही है। भारत में एलोपैथी चिकित्सा जो लगभग 250 वर्ष पुरानी है, केवल चालीस प्रतिशत लोगों को ही प्राप्त हो पा रही है। सरकारों के सभी प्रयास के बाद भी सबको चिकित्सा उपलब्ध कराना एक चुनौतीपूर्ण विषय है। सरकार ने आयुष के लगभग सात लाख प्रशिक्षित चिकित्साकर्मियों के सहयोग से सबको चिकित्सा सुविधा उपलब्ध हो जाए, इस दृष्टिकोण से कार्य करना शुरू किया।आज लगभग 450 आयुष कॉलेजों के द्वारा स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर पर शिक्षण प्रशिक्षण का कार्य चल रहा है। जिनका नियमन संसद द्वारा 1970 में पारित तथा 1971 में स्थापित इंडियन मेडिसिन सेंट्रल काउंसिल के द्वारा किया जाता है। 24 अप्रैल 2020 को इसे नेशनल काउंसिल ऑफ इंडियन मेडिसिन के रूप में स्थापित कर भारत सरकार ने इसे नया स्वरूप दिया है।
लगभग पचास वर्षों से विधि द्वारा स्थापित इस विधा का शिक्षण प्रशिक्षण मानक के अनुरूप चल रहा है। भारतवर्ष में चार आयुर्वेद विश्वविद्यालय, तीन उच्चस्तरीय आयुर्वेद संस्थान, सेंट्रल काउंसिल फॉर रिसर्च इन आयुर्वेदिक साइंस तथा अन्य शोध संस्थान इसमें प्रतिभागी हैं। इसी क्रम में विगत पोस्ट ग्रेजुएट रेगुलेशन को पुनर्भाषित किया, जिसमें शल्य एवं शालाक्य शास्त्रों में की जाने वाली सर्जरी को स्पष्ट किया गया। जिसका विरोध इंडियन मेडिकल एसोसिएशन नामक प्राइवेट संस्था ने प्रारंभ किया है, जो निराधार और अविवेकपूर्ण है। यहां यह भी ज्ञातव्य है कि नियमानुसार प्रत्येक आयुर्वेद कॉलेज में एलोपैथिक विधा के सर्जन, पैथोलॉजिस्ट, रेडियोलॉजिस्ट, आब्सटेटीशियन एवं गाइनकोलॉजिस्ट द्वारा शिक्षण प्रशिक्षणएवं चिकित्सा कार्य में सहयोग किया जाता है। साढ़े पांच वर्षों के बीएएमएस तथा तीन वर्षों के एमडी/एमएस कोर्स में प्रवेश ऑल इंडिया एंट्रेंस टेस्ट द्वारा किया जाता है। पूर्ण प्रशिक्षण के पश्चात ही चिकित्सा कार्य की अनुमति दी जाती है। ऐसी अवस्था में एलोपैथी चिकित्सकों द्वारा आयुर्वेद चिकित्सकों के सर्जरी का विरोध करना इनके भय को दर्शाता है। इनको मालूम है कि बड़े-बड़े नर्सिंग होम में आज भी 80 फीसद से ज्यादा आयुर्वेद चिकित्सक ही सेवा दे रहे हैं। भारत के लगभग 60 फीसद मरीजों की चिकित्सा व्यवस्था भी आयुष चिकित्सकों द्वारा की जा रही है।
इंटरमीडिएट साइंस के पश्चात ही आयुष चिकित्सक में प्रवेश प्राप्त होता है। आयुर्वेद कॉलेज के अस्पतालों में पूर्ण रूप से सर्जरी के ओपीडी एवं आइपीडीचल रहे हैं। जब सरकार सभी चिकित्सा पद्धतियों के इंटीग्रेशन एवं सहयोग से पूरे भारत की स्वास्थ्य समस्याओं का समाधान चाहती है, कतिपय लोग इससे सहमत नहीं प्रतीत होते। इनका विरोध स्वार्थवश एवं एकाधिकार स्थापित करने का प्रयास है। जबकि सभी जानते हैं कि कोई एक विधाया पैथी सबको स्वास्थ्य उपलब्ध कराने में असमर्थ है। सरकार के स्वास्‍‍‍‍थ्‍य चिंतन में कुछ लोगों द्वारा विरोध समझ से परे है। वर्तमान अध्यक्ष, सीसीआइएम वैद्य जयंत देव पुजारी ने यह स्पष्ट किया है कि हमने अपने चिकित्सकों को कानूनी अनुमति दी है। चूंकि मूर्छन क्रिया के विशेषज्ञ द्वारा यह पूछा जाता है कि क्या आयुर्वेदिक सर्जनको सर्जरी का अधिकार है, इसलिए हमने यह लिखित रूप से स्पष्ट किया है कि आयुर्वेदिक सर्जन क्या कर सकता है।

सुश्रुत ने सैंकड़ों प्रकार के सर्जिकल प्रोसीजर, यंत्र, क्षार कर्म, अग्नि कर्म, राइनोप्लास्टी, नासा-दंत-मुख-कर्णरोगों की सर्जरी आदि के बारे में विस्तार से उल्लेख किया है जो हिप्पोक्रेट्स (460-370बीसी) के हजार वर्ष पहले ही पूर्ण विकसित एवं प्रयोग में था। पूरा विश्व सुश्रुत को फादर ऑफ सर्जरी मानता है, जिसका अनुसरण आज भी हो रहा है, फिर इसमें प्रश्न चिह्न कहां?

(साभार – दैनिक जागरण)

सरकार ला रही देसी ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म, अमेजन व फ्लिपकार्ट को मिलेगी जबरदस्त टक्कर

नयी दिल्ली : सरकार की तरफ से एक स्वदेशी ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म विकसित किया जा रहा है। इसे सरकार का डिपार्टमेंट फॉर द प्रमोशन ऑफ इंडस्ट्री एंड इंटरनल ट्रेड (डीपीआईआईटी) विकसित कर रहा है। इसे लेकर सरकार ने एक संचालन कमेटी का गठन किया गया है, जिसे ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स (ओएनडीसी) नाम से जाना जाएगा। इस कमेटी का काम एक ई-कॉमर्स कंपनी को लेकर एक पॉलिसी बनाने से लेकर उसे लागू कराने की जिम्मेदारी होगी। साथ ही ई-कॉमर्स कंपनियों के लिए एक नीति तैयार करना है।

सरकार की इस पहल का मकसद ई-कॉमर्स बिजनेस प्लेटफॉर्म तैयार करना है, जिसे सरकार की तरफ से सहायता प्राप्त होगी। सरकारी ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म की समिति के अध्यक्ष के तौर पर सीनियर डीपीआईआईटी अधिकारी को चुना गया है। साथ ही सरकारी ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म की कमेटी में वाणिज्य विभाग, डिपार्टमेंट ऑफ कॉमर्स, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना तकनीक मंत्रालय, आईटी मंत्रालय, एमएसएमई मंत्रालय और नीति आयोग के प्रतिनिधि को शामिल किया जाएगा। इसके अलावा क्वॉलिटी काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन आदिल जैनुलभाई, एनपीसीआई टेक्नोलॉजी के सीईओ दिलीप अस्बे, एनएसडीएल टेक्नोलॉजी के सीईओ सुरेश सेठ भी इस कमेटी का हिस्सा होंगे। इसके अलावा इंडस्ट्री इनपुट के लिए कैट (सीएआईटी) के प्रतिनिधि को भी शामिल किया जाएगा। आपको बता दें कि कैट लंबे वक्त से विदेशी ई-कॉमर्स कम्पनियों का विरोध करता रहा है।

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नींव की ईंट – उल्लेखनीय है दरभंगा राज का योगदान

दरभंगा राज का भारत के महाराजाओं के युग में महत्वपूर्ण स्थान और योगदान है। दरभंगा राज का स्वर्णिम अध्याय लक्ष्मीश्वर सिंह के साथ आऱम्भ होता है और आगे चलकर महाराजाधिराज रामेश्वर सिंह और कामेश्वर सिंह इसे और सुनहरा बनाते हैं। कई निर्माण करवाए और कई भवन शैक्षणिक संस्थानों को दिये। कई कलाकार इस राज परिवार के संरक्षण में थे। डालते हैं इस अध्याय पर एक नजर –

दरभंगा में कई महल हैं जो दरभंगा राज काल के दौरान बनाए गए थे। इनमें नरगोना पैलेस शामिल है, जिसका निर्माण 1934 के नेपाल-बिहार भूकम्प के बाद किया गया था और तब से इसे ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय और लक्ष्मीविलास पैलेस को दान कर दिया गया है। जो 1934 ई. के भूकंप में गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गया था, बाद में इसका पुनर्निर्माण किया गया और कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय और दरभंगा किले को दान कर दिया गया।

देश का पहला भूकम्परोधी भवन नरगौना पैलेस बिहार में ही है जो 1934 में बना था

भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन

लक्ष्मेश्वर सिंह 1885 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी) के संस्थापकों में से एक थे। राज दरभंगा ब्रिटिश राज के साथ अपनी निकटता बनाए रखने के बावजूद पार्टी के प्रमुख दानदाताओं में से एक थे। ब्रिटिश शासन के दौरान, INCy इलाहाबाद में अपना वार्षिक सम्मेलन आयोजित करना चाहता थें, लेकिन उन्हें इस उद्देश्य के लिए सरकार द्वारा किसी भी सार्वजनिक स्थान का उपयोग करने की अनुमति से इनकार कर दिया गया था। दरभंगा के महाराजा ने एक क्षेत्र खरीदा और काँग्रेस को वहाँ अपना वार्षिक सम्मेलन आयोजित करने की अनुमति दी। 1892ई. के काँग्रेस का वार्षिक सम्मेलन 28 दिसंबर को लोथर कैसल के मैदान में आयोजित किया गया था, जिसे तत्कालीन महाराजा ने खरीदा था।[9] महाराजा द्वारा इस क्षेत्र को ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा पार्टी को ठिकाने लगाने से रोकने के लिए ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा किसी भी प्रयास को विफल करने के लिए पट्टे पर दिया गया था। उनके वार्षिक सम्मेलन 2018 में 57 साल बाद मिथिला स्टूडेंट यूनियन द्वारा दरभंगा किला गेट पर राष्ट्रीय ध्वज की मेजबानी की गई।

संविधान सभा 1946 महाराजा कामेश्वर सिंह बाएं से तीसरे

शिक्षा के क्षेत्र में योगदान

राज दरभंगा शाही परिवार को मिथिला और मैथिली भाषा के अवतार के रूप में देखा जाता था। अवलंबी महाराजा मैथिल महासभा के वंशानुगत प्रमुख थे, जो एक लेखक संगठन थे, और उन्होंने भाषा और उसके साहित्य के पुनरुत्थान में एक प्रमुख भूमिका निभाई। दरभंगा के राज परिवार ने भारत में शिक्षा के प्रसार में भूमिका निभाई। दरभंगा राज बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, कलकत्ता विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, पटना विश्वविद्यालय, कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय, दरभंगा मेडिकल कॉलेज और अस्पताल, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और भारत में कई अन्य शैक्षणिक संस्थानों के प्रमुख दानदाता थे। महाराजा रामेश्वर सिंह बहादुर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय शुरू करने के लिए पंडित मदन मोहन मालवीय के एक प्रमुख दानदाता और समर्थक थे; उन्होंने 5,000,000 रु. स्टार्ट-अप फंड दान किए और धन उगाहने वाले अभियान में सहायता की। महाराजा कामेश्वर सिंह बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्रो-चांसलर भी थे। महाराजा रामेश्वर सिंह ने पटना विश्वविद्यालय में दरभंगा हाउस (नवलखा पैलेस) दान किया। महाराजा ने पटना विश्वविद्यालय में एक विषय के रूप में मैथिली की शुरुआत करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, और 1920 में, उन्होंने पटना मेडिकल कॉलेज अस्पताल को स्थापित करने के 5 लाख रुपये का दान दिया, जो कि सबसे बड़ा योगदान था।महाराजा कामेश्वर सिंह ने 30 मार्च 1960 को अपने पुश्तैनी घर, आनंद बाग पैलेस को दान कर दिया, साथ ही कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए एक समृद्ध पुस्तकालय और महल के चारों ओर की भूमि भी प्रदान की। नरगोना पैलेस और राज प्रमुख कार्यालय 1972 में बिहार सरकार को दान कर दिए गए थें। इमारतें अब ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय का हिस्सा हैं। दरभंगा राज ने अपनी लाइब्रेरी के लिए ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय को 70,935 पुस्तकें दान कीं।

दरभंगा में राज स्कूल की स्थापना महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह बहादुर ने की थी। यह स्कूल शिक्षा के अंग्रेजी माध्यम प्रदान करने और मिथिला में आधुनिक शिक्षण विधियों को प्रस्तुत करने के लिए स्थापित किया गया था। पूरे दरभंगा राज में कई अन्य विद्यालय भी खोले गए। दरभंगा राज कलकत्ता विश्वविद्यालय के एक प्रमुख दानदाता थें, और कलकत्ता विश्वविद्यालय के केंद्रीय प्रशासनिक भवन को दरभंगा भवन कहा जाता है। 1951  में, भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की पहल पर, काबरघाट में स्थित मिथिला स्नातकोत्तर शोध संस्थान (मिथिला पोस्ट-ग्रेजुएट रिसर्च इंस्टीट्यूट) की स्थापना की गई। महाराजा कामेश्वर सिंह ने इस संस्था को दरभंगा में बागमती नदी के किनारे स्थित 60 एकड़ (240,000 वर्ग मीटर) भूमि और आम और लीची के पेड़ों के साथ एक इमारत दान में दी। दरभंगा के महाराजा महिलाओं के लिए शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए 1839 में एमएसटी गंगाबाई द्वारा स्थापित एक विद्यालय, महाकाली पाठशाला के मुख्य संरक्षक, ट्रस्टी और फाइनेंसर थे। इसी तरह बरेली महाविद्यालय, बरेली जैसे कई महाविद्यालयों को दरभंगा के महाराजाओं से पर्याप्त दान मिला। मोहनपुर में महारानी रामेश्वरी भारतीय चिकित्सा विज्ञान संस्थान का नाम महाराजा रामेश्वर सिंह की पत्नी के नाम पर रखा गया है।

दरभंगा राज परिवार के कांग्रेस से अच्छे सम्बन्ध रहे

संगीत

18 वीं शताब्दी के अंत से दरभंगा भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रमुख केंद्रों में से एक बन गया। दरभंगा राज के राजा संगीत, कला और संस्कृति के महान संरक्षक थें। दरभंगा राज से कई प्रसिद्ध संगीतकार जुड़े थे। उनमें प्रमुख थें उस्ताद बिस्मिल्लाह खान, गौहर जान, पंडित राम चतुर मल्लिक, पंडित रामेश्वर पाठक और पंडित सिया राम तिवारी। दरभंगा राज ध्रुपद के मुख्य संरक्षक थे, जो भारतीय शास्त्रीय संगीत में एक मुखर शैली थी। ध्रुपद का एक प्रमुख विद्यालय आज दरभंगा घराना के नाम से जाना जाता है। आज भारत में ध्रुपद के तीन प्रमुख घराने हैं: डागर घराना, बेतिया राज (बेतिया घराना) के मिश्र और दरभंगा (दरभंगा घराना) के मिश्र। एस एम घोष (1896 में उद्धृत) के अनुसार महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह एक अच्छे सितार वादक थें। उस्ताद बिस्मिल्लाह खान कई सालों तक दरभंगा राज के दरबारी संगीतकार रहे। उन्होंने अपना बचपन दरभंगा में बिताया था।

1887 में दरभंगा के महाराजा के समक्ष गौहर जान ने अपना पहला प्रदर्शन किया और उन्हें दरबारी संगीतकार के रूप में नियुक्त किया गया। 20 वीं सदी के शुरुआती दौर के प्रमुख सितार वादकों में से एक पंडित रामेश्वर पाठक दरभंगा राज में दरबारी संगीतकार थें।

दरभंगा राज ने ग्वालियर के नन्हे खान के भाई मुराद अली खान का समर्थन किया। मुराद अली खान अपने समय के सबसे महान सरोद वादकों में से एक थें। मुराद अली खान को अपने सरोद पर धातु के तार और धातु के तख्ती प्लेटों का उपयोग करने वाले पहले व्यक्ति होने का श्रेय दिया जाता है, जो आज मानक बन गया है।

कुंदन लाल सहगल महाराजा कामेश्वर सिंह के छोटे भाई राजा बिशेश्वर सिंह के मित्र थे। जब भी दोनों दरभंगा के बेला पैलेस में मिले, गजल और ठुमरी की बातचीत और गायन के लंबे सत्र देखे गए। कुंदन लाल सहगल ने राजा बहादुर की शादी में भाग लिया, और शादी में अपना हारमोनियम निकाला और “बाबुल मोरा नैहर छुरी में जाए” गाया।

दरभंगा राज का अपना सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा और पुलिस बैंड था। मनोकामना मंदिर के सामने एक गोलाकार संरचना थी, जिसे बैंड स्टैंड के नाम से जाना जाता था। बैंड शाम को वहाँ संगीत बजाता था। आज बैंडस्टैंड का फर्श अभी भी एकमात्र हिस्सा है।

लोक निर्माण कार्य

महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह बहादुर ने स्कूल, डिस्पेंसरी और अन्य सुविधाओं का निर्माण किया और उन्हें जनता के लाभ के लिए अपने स्वयं के धन से बनाए रखा। दरभंगा में औषधालय की कीमत £ 3400 थी, जो उस समय बहुत बड़ी राशि थी।

  • दरभंगा राज महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह बहादुर ने दरभंगा में सभी नदियों पर बनाए गए लोहे के पुलों का निर्माण शुरू किया।
  • मुजफ्फरपुर जजशिप के निर्माण और उपयोग के लिए 52 बीघा भूमि दान किया।
  • दरभंगा राज में किसानों के लिए सिंचाई प्रदान करने के लिए इस क्षेत्र में खोदी गई कई झीलें और तालाब थे और इस प्रकार अकाल को रोकने में मदद मिलती थी।
  • उत्तर बिहार में पहली रेलवे लाइन, दरभंगा और बाजितपुर के बीच, गंगा के विपरीत, जो बरह ​​के सामने 1874 में बनाई गई थी, महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह ने की।
  • दरभंगा राज द्वारा 19वीं सदी के शुरुआती भाग में 1,500 किलोमीटर से अधिक सड़कों का निर्माण किया गया था। इसमें से 300 किमी की मेटल्ड सड़क पर थी। इससे व्यापार के विस्तार के साथ-साथ इस क्षेत्र में कृषि उपज के लिए अधिक से अधिक बाजार बन गए।
  • वाराणसी में राम मंदिर और रानी कोठी जैसे कई धर्मशालाओं (धर्मार्थ आवासों) का निर्माण किया गया था।
  • बेसहारा लोगों के लिए घरों का निर्माण किया गया था।
  • मुंगेर जिले में मान नदी पर एक बड़ा जलाशय कहारपुर झील का निर्माण किया गया था।
  • दरभंगा राज दुग्ध उत्पादन में सुधार के लिए क्रॉस-ब्रीडिंग मवेशियों का अग्रणी था। दरभंगा राज द्वारा हांसी नामक एक बेहतर दूध देने वाली गाय की नस्ल पेश की गई। गाय स्थानीय गायों और जर्सी नस्ल के बीच की क्रॉस ब्रीड थी।

खेल

दरभंगा राज ने विभिन्न खेल गतिविधियों को सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया। लहेरियासराय में पोलो ग्राउंड बिहार में स्वतंत्रता-पूर्व समय में पोलो का एक प्रमुख केंद्र था। कलकत्ता में एक प्रमुख पोलो टूर्नामेंट के विजेता को दरभंगा कप से सम्मानित किया जाता है। राजा बिशेश्वर सिंह अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ के संस्थापक सदस्यों में से एक थे, जो भारत में फुटबॉल के लिए प्रमुख शासी निकाय थे। राजा बहादुर, हरिहरपुर एस्टेट के राय बहादुर ज्योति सिंह के साथ, 1935 में इसकी स्थापना के बाद महासंघ के मानद सचिव थें।] माउंट एवरेस्ट पर पहली चढ़ाई 1933 में हुई थी। इस अभियान का आयोजन सैन्य अधिकारियों द्वारा किया गया था, सार्वजनिक कंपनियों द्वारा समर्थित, और दरभंगा के महाराजा कामेश्वर सिंह बहादुर द्वारा बनैली राज के राजा बहादुर किर्त्यानंद सिन्हा के साथ मेजबानी की गई थी।

(साभार स्त्रोत – विकिपीडिया तथा इंटरनेट पर उपलब्ध अन्य सामग्री)

कोलकाता में खुला किफायती दवाओं वाला जेनेरिक आधार

कोलकाता : जेनेरिक आधार मेडिसिन कम्पनी ने कोलकाता में पहला किफायती दवाओं का पहला स्टोर जेनेरिक आधार शुरू कर दिया है। जेनेरिक आधार 100 शहरों में मौजूद है और फ़ार्मेसी-एग्रीगेटर बिज़नेस मॉडल के तहत कोलकाता में इसने पहला औषधालय यानी दवा स्टोर खोला है। जेनेरिक आधार मेडिसिन कम्पनी की योजना कोलकाता, हावड़ा, उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना, पश्चिम बर्दवान समेत बंगाल के अन्य शहरों में 500 से अधिक स्टोर खोलने की है। ‘मेक इन इंडिया’ और ‘स्टार्ट अप इंडिया’ अभियान को मजबूत करते हुए यह शुरुआत की गयी है। जेनेरिक आधार के संस्थापक तथा सीईओ अर्जुन देशपांडे का मानना है कि फार्मा उद्योग आम आदमी की भलाई के लिए काम कर रहा है और यह क्षेत्र एक नये दौर से गुजर रहा है। जेनेरिक आधार के संस्थापक अर्जुन देशपांडे को वरिष्ठ उद्योगपति रतन टाटा का भी सहयोग मिल रहा है। वे युवाओं को उद्यमी बनने और देश भर में जेनेरिक आधार आउटलेट्स खोलने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। देशपांडे ने कहा कि स्टार्ट अप के जरिए देश के लिए कुछ करना और आम आदमी तक किफायती दवा पहुँचाना एक बेहतरीन अनुभव है।

ऐ सखी सुन – शादी -ब्याह जिन्दगी का निर्णय है, अंतिम विकल्प नहीं

प्रो. गीता दूबे

भाग – 6

सभी सखियों को मेरा नमस्कार। इसी हफ्ते तुलसी विवाह था और उसी दिन से चौमासे में सोए हुए हमारे देवगण अपनी सुख निद्रा से जाग जाते हैं और सारे रूके हुए शुभ कामों की शुरुआत हो जाती है जैसे शादी- ब्याह आदि। अब भला शादी- ब्याह से अधिक शुभ काम कौन सा हो सकता है, सखियों। खासकर स्त्रियों का जीवन तो शादी के बिना अधूरा माना जाता है। बहुत सी स्त्रियों के लिए विवाह जीवन का एकमात्र विकल्प है। जिस जमाने में लड़कियाँ कैरियरिस्ट या महत्वाकाँक्षी नहीं होती थीं, उस समय से लेकर आज भी बड़ी संख्या में लड़कियाँ विवाह को ही कैरियर या जीवन का एकमात्र लक्ष्य मानती हैं। बचपन से ही उन्हें विवाह का सपना दिखाया जाता है और किशोरावस्था की दहलीज़ पर पाँव रखते ही वे विवाह की प्रतीक्षा में जिंदगी काटने लगती हैं। मुझे उस समय की एक घटना याद आती है जब मैं स्नातकोत्तर प्रथम वर्ष की छात्रा थी, वर्ष था 1992। एक दिन कक्षा में प्राध्यापक महोदय ने सब का परिचय पूछते हुए सबसे  यह प्रश्न भी पूछा कि “आप लोग स्नातकोत्तर की पढ़ाई क्यों कर रहे हैं ?” सब के अलग-अलग उत्तर थे लेकिन एक उत्तर ने प्राध्यापक को ही नहीं कक्षा के कुछ एक छात्रों को भी विचलित कर दिया। वह था, मेरी एक सहपाठिनी द्वारा दिया गया उत्तर। उसने कहा- “सर, शादी नहीं हो रही है इसलिए समय काटने के लिए एम. ए. में एडमिशन ले लिया है।” हालाँकि उसने यह बात मुस्कराते हुए मजाकिया लहजे में कही थी लेकिन इसके बावजूद अध्यापक निशब्द थे और हम में से कुछ विद्यार्थी भी जिनके लिए पढ़ना जिंदगी जीने की तरह ही जरूरी था और जो अपने आस- पास के परिवेश और समाज की रूढियों के खिलाफ बगावत करके हुए उच्च शिक्षा के क्षेत्र में पैर जमाने की कोशिश कर रहे थे। एक बात कहूँ सखी, भले ही हम बात- बात में अपने आधुनिक होने की दुहाई देते हुए कहते रहें कि समय बहुत बदल गया है लेकिन गहाई से समाज का अध्ययन करने पर साफ दिखाई देता है कि कुछ बातों, मान्यताओं या स्थितियों में आज भी कोई विशेष परिवर्तन नहीं आया है। अब भी बहुत सारी लड़कियाँ किसी विशेष स्कूल या कॉलेज में इसलिए भेजी जाती हैं ताकि किसी अच्छे परिवार में उनका विवाह हो सके। लेकिन इसका एक अच्छा पहलू यह है इस बहाने वह पढ़ -लिख जरूर जाती हैं। हमारे समाज की बनावट ही ऐसी है कि यह मान्यता हमारे दिमाग में घर बनाकर बैठी है कि विवाह के बिना किसी का भी जीवन अधूरा रहता है। मैं यह नहीं कहती सखियों कि विवाह आवश्यक नहीं है लेकिन इतना जरूर है कि वह जीवन का अंतिम सत्य या विकल्प बिल्कुल नहीं हो सकता। इन्हीं मान्यताओं के कारण हमारे समाज की बहुत सी पढ़ी-लिखी लड़कियाँ, जिनके दिमाग में यह बात कूट -कूटकर भर दी जाती है कि विवाह ही जीवन का अंतिम सत्य है और उन्हें किसी भी हालत में इसे उसने बिखरने से बचाए रखना है, अपनी सारी ऊर्जा इस निरंतर  क्षरणशील संस्था को बचाने में लगा देती हैं, भले ही इस पूरी प्रक्रिया में वह खुद अपनी जान से ही हाथ क्यों ना धो बैठें। पिछले वर्षों में समाज में कई ऐसे उदाहरण दिखाई दिए हैं जब अपने बिखरते हुए वैवाहिक जीवन को बचाने की कोशिश में लड़कियाँ मानसिक अवसाद का शिकार हो जाती हैं और तदुपरांत विभिन्न शारीरिक रोगों का शिकार होकर हताशापूर्ण जीवन जीती हैं या फिर स्थितियों को न सुधार पाने के अवसाद के कारण आत्महत्या करने को विवश होती हैं। 

सखियों, मुझे लगता है कि वह समय बीत गया जब लड़की की हर इच्छा, हर अरमान विवाह तक के लिए डाल दिए जाते थे। याद कीजिए, प्रेमचंद के उपन्यास “गबन” की वह घटना जब जालपा की मां बिसाती वाले से अपने लिए चंद्रहार खरीदती है और बिटिया जालपा के जिद ठान लेने पर उसे यह कहकर बहला देती है कि उसके लिए चंद्रहार तो उसका दूल्हा लाएगा। उसी दिन से जालपा चंद्रहार की प्रतीक्षा में अधीरता से विवाह के दिन गिनती है और चढ़ावे में चंद्रहार न पाकर घोर निराशा में डूब जाती है। हमारे समाज में अक्सर लड़कियां जब भी अपनी माँ या पूरे परिवार के सामने कोई मांग रखती हैं तो उन्हें यह कह कर टाल  दिया जाता है कि “यह सब अपनी शादी के बाद करना या अपने घर में जाकर करना।” लेकिन क्या यह रवैया सही है ? जब जन्म देने वाले माता पिता ही अपनी बेटी की इच्छाओं का सम्मान नहीं कर सकते तो एक पराए परिवार या अपरिचित व्यक्ति पर उसकी इच्छाओं का भार क्यों डाला जाए। सखियों, इस बदलते समय के साथ हमें भी अपनी सोच को बदलने की जरूरत है। अगर मेरी बात ठीक लगे तो मैं इतना जरूर कहना चाहूंगी कि लड़का हो या लड़की, हम सबकी जिम्मेदारी होनी चाहिए कि हम पढ़ा लिखा कर उन्हें इतना सक्षम अवश्य बनाएँ कि वह अपने सपनों का भार खुद उठा सकें, अपनी आकांक्षाएँ खुद पूरी कर सकें। उसके लिए उन्हें किसी पर निर्भर रहने या किसी का मुँह तो ताकने की जरूरत ना पड़े। सखियों, आइए यह शपथ लें कि अपने बच्चों को पढ़ा- लिखा कर एक सजग नागरिक बनाएंगे, विवाह के बाजार में बिकने या खरीदे जाने वाला सामान नहीं। उन्हें यह सीख देंगे कि विवाह जीवन का एक अहम निर्णय अवश्य है लेकिन अंतिम विकल्प कभी नहीं है, उसके बिना भी जिंदगी मुकम्मल हो सकती है। इसलिए अपने सपनों को विवाह की प्रतीक्षा में टालने के बजाय उसे अपने सामर्थ्य के अनुसार पूरा करने और जीने का हौसला रखें। विदा सखियों । आप से अगले हफ्ते फिर मुलाकात होगी।

आरडीआईएफ, हेटेरो भारत में स्पुतनिक वी वैक्सीन की 10 करोड़ खुराक तैयार करने पर सहमत

 कोलकाता : रूस के स्वायत्त वैल्थ फंड रशियन डायरेक्ट इन्वैस्टमेंट फंड (आरडीआईएफ) और भारत की अग्रणी जेनरिक फार्मा कंपनी हेटरो ने भारत में हर साल स्पुतनिक वी की 10 करोड़ से अधिक डोज़ उत्पादित करने के समझौता किया है। स्पुतनिक वी दुनिया की सबसे पहली पंजीकृत वैक्सीन है जिसे नोवल कोरोनावायरस संक्रमण से बचाव के लिए विकसित किया गया है। दोनों पक्षों का इरादा आगामी वर्ष 2021 के प्रारंभिक दिनों से स्पुतनिक वी का उत्पादन शुरु करने का है। गामालेया सेंटर और आरडीआईएफ ने 24 नवंबर को घोषित किया था कि दूसरे अंतरिम डाटा विश्लेषण के सकारात्मक परिणाम प्राप्त हुए हैं। रूस के इतिहास में यह सबसे बड़ा तृतीय चरण का क्लीनिकल ट्रायल था जिसमें 40,000 स्वयंसेवक शामिल हुए। अंतरिम परीक्षण के परिणामों ने एक बार फिर स्पुतनिक वी की उच्च प्रभाशीलता की पुष्टि की है। कोरोनावायरस से बचाव करने वाली स्पुतनिक वी दुनिया की पहली पंजीकृत वैक्सीन है जो ह्यूमन अडेनोवायरल वेक्टर्स के अच्छी प्रकार अध्ययन किए गए प्लैटफॉर्म पर आधारित है। वैक्सीन या प्लैसबो की पहली डोज़ पाने के 28 दिनों के बाद और दूसरी डोज़ के 7 दिनों बाद स्वयंसेवकों (n=18,794) में प्रभावकारिता का मूल्यांकन किया गया। क्लीनिकल ट्रायल प्रोटोकॉल के मुताबिक परीक्षण के दूसरे नियंत्रण बिंदु तक पहुंचने के बाद उपरोक्त मूल्यांकन किया गया। विश्लेषण ने दर्शाया कि स्पुतनिक वी वैक्सीन की प्रभावकारिता दर 91.4 प्रतिशत है। इस रूसी वैक्सीन की विशिष्टता दो भिन्न वेक्टर्स में निहित है जो ह्यूमन अडेनोवायरस पर आधारित हैं। यह वैक्सीन ज्यादा मजबूत और लंबे समय तक इम्यून रिस्पाँस देती है, उन टीकों की तुलना में जिनमें एक और वही वेक्टर दो डोज़ के लिए इस्तेमाल किया जाता है। पहली डोज़ के बाद 42वें दिन (दूसरी डोज़ के बाद 21 दिन) स्वयंसेवकों पर प्रारंभिक आंकड़े -जब उन्होंने एक स्थिर इम्यून रिस्पाँस बना लिया- संकेत करते हैं कि इस वैक्सीन की प्रभावकारिता दर 95 प्रतिशत से ऊपर है।

फिलहाल तीसरे चरण के क्लीनिकल ट्रायल स्वीकृत हैं और बेलारूस, यूएई, वेनेज़ुएला व अन्य देशों में जारी हैं साथ ही भारत में दूसरा व तीसरा चरण चल रहे हैं। 50 से ज्यादा देशों से स्पुतनिक वी वैक्सीन की 1.2 अरब से अधिक डोज़ की मांग आई है। वैश्विक बाजार हेतु वैक्सीन आपूर्ति के लिए आरडीआईएफ के अंतर्राष्ट्रीय साझीदार भारत, ब्राजील, चीन, दक्षिण कोरिया व अन्य देशों में विनिर्माण करेंगे। ह्यूमन अडेनोवायरस पर आधारित वैक्सीनों की सुरक्षा की पुष्टि 75 से ज्यादा प्रकाशनों में हो चुकी है तथा बीते दो दशकों में 250 से अधिक क्लीनिकल ट्रायल किए जा चुके हैं। टीकों के विकास में ह्यूमन अडेनोवायरसों के इस्तेमाल का इतिहास 1953 से शुरु होता है। अडेनोवायरस वेक्टर आम फ्लू के आनुवांशिक रूप से संशोधित वायरस हैं जो मानव शरीर में पुनःउत्पादित किए जा सकते हैं। जब स्पुतनिक वी वैक्सीन इस्तेमाल हुई तब कोरोनावायरस ने शरीर में प्रवेश नहीं किया क्योंकि वैक्सीन में उसके बाहरी प्रोटीन कोट (तथाकथित स्पाइक्स जो इसका ताज बनाते हैं) के हिस्से के बारे में आनुवांशिक जानकारी थी। टीकाकरण के फलस्वरूप संक्रमित होने की संभावना पूरी तरह समाप्त हो जाती है और शरीर का इम्यून रिस्पाँस भी स्थिर होता है।

रशियन डायरेक्ट इन्वैस्टमेंट फंड के सीईओ किरिल दिमित्रीव ने कहा, ’’आरडीआईएफ और हेटरो के बीच हुए अनुबंध की घोषणा करते हुए हम बहुत खुश हैं। इससे सुरक्षित व अत्यंत प्रभावी स्पुतनिक वी वैक्सीन के भारत में उत्पादन का मार्ग प्रशस्त होगा। वैक्सीन के अंतरिम क्लीनिकल ट्रायल के परिणाम पहली डोज़ के बाद 42वें दिन में 95 प्रतिशत प्रभावकारिता दर्शाते हैं। मुझे विश्वास है कि हर वह देश जो अपने लोगों को कोरोनावायरस से बचाना चाहता है वह स्पुतनिक वी को अपने राष्ट्रीय वैक्सीन पोर्टफोलियो का अभिन्न अंग बनाएगा। हेटरो के साथ सहभागिता से हम उत्पादन क्षमता बढ़ा सकेंगे और भारत के लोगों को महामारी के इस चुनौतीपूर्ण दौर में एक सक्षम समाधान दे पाएंगे।’’

हेटरो लैब्स लिमिटेड के डायरेक्टर-इंटरनैशनल मार्केटिंग बी. मुरली कृष्णा रेड्डी ने कहा, ’’कोविड-19 के उपचार हेतु सबसे अधिक प्रत्याशित वैक्सीन स्पुतनिक वी के उत्पादन हेतु आरडीआईएफ के विनिर्माण सहयोगी बनने की हमें बहुत खुशी है। यदि भारत में ही वैक्सीन बनाई जाएगी तो मरीजों तक जल्दी पहुंचेगी। हमारा यह गठबंधन कोविड-19 से लड़ाई में हमारी प्रतिबद्धता को एक कदम और आगे बढ़ाता है और साथ ही हमारे माननीय प्रधानमंत्री के ’मेक इन इंडिया’ के ध्येय की पूर्ति में भी हम योगदान दे रहे हैं।’’

भवानीपुर कॉलेज में दीपावली पर ऑनलाइन प्रतियोगिता

कोलकाता :  भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज ने दीपावली मनाने के लिए विद्यार्थियों के घर में हुई दीपावली की सजावट को ऑनलाइन प्रतियोगिता से जोड़ा। इस तरह से छात्र- छात्राओं ने घर की दीपावली को उमंग और उत्साहपूर्ण ढंग से मनाया साथ ही उनमें प्रतियोगिता का लक्ष्य भी पूरा किया।  वंदनवार, रंगोली, थाली सज्जा और दीप सज्जा इन चार पर हुई प्रतिस्पर्धा में 200 से अधिक विद्यार्थियों ने रजिस्ट्रेशन किए। रंगोली में 136,दीप सज्जा में 109, थाली सज्जा में 76,और वंदनवार में 65 विद्यार्थी रहे। सभी विद्यार्थियों ने अपनी-अपनी सजावट को लिंक पर भेजा। हर सज्जा को अपने में विभिन्नता लिए रही, विद्यार्थियों की प्रवेश संख्या 386 रही। पारंपरिक, आधुनिक और मिश्रित रूप से दीपावली की सजावट प्रकृति और भारतीय संस्कृति के अनुरूप रही।

आम के पत्ते, मिट्टी के दीपक और रोली चावल पूजा-अर्चना की विभिन्न वस्तुओं के साथ लक्ष्मी गणेश की प्रतिमा का सौन्दर्य बहुत ही मनभावन रहा। पर्यावरण संरक्षण पर भी ध्यान दिया गया।
वंदनवार में – प्रथम अदिति सिंह, द्वितीय बाप्रिया बागची, तृतीय राहुल चौधरी, दीप सज्जा में – प्रथम तृप्ति चौधरी ,द्वितीय आस्था अग्रवाल ,तृतीय धृति साबू , रंगोली में – प्रथम नंदिता पांडेय, द्वितीय अनुराग पॉल,तृतीय श्रेया खिरवाल, थाली सज्जा में- प्रथम रितम मंडल , द्वितीय जूही गर्ग, तृतीय भावना चोपड़ा स्थान पर रहे सभी छात्र – छात्राओं को सर्टिफिकेट प्रदान किए गए। डीन प्रो. दिलीप शाह, को-अॉरडिनेटर प्रो. मीनाक्षी चतुर्वेदी,डॉ वसुंधरा मिश्र, दिव्या ओडिशी और गौरव किल्ला ने दीपावली के अवसर पर इस प्रतियोगिता का आयोजन किया। इस कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने।