Thursday, April 9, 2026
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कॉलेज स्ट्रीट बोईपाड़ा : कभी बरगद तले सजती थी दुकानें, घर -घर किताबें बेचते थे फेरीवाले

कोलकाता को शिक्षा और संस्कृति का गढ़ माना जाता है और कई लोग तो इसे देश की बौद्धिक राजधानी भी कहते हैं मगर क्या आप जानते हैं कि एक समय ऐसा था जब यहाँ किताबें आम जनता के लिए आसानी से उपलब्ध नहीं होती थीं और किताबों की कमी से परेशान होकर पादरी रेवरेंड जेम्स लॉन्ग ने हताश होकर  1857 में वे लिखा था ,’कोलकाता में किताब की दुकान नहीं है, हैं तो सिर्फ फेरीवाले। वे सिर पर बोझ लेकर मोहल्लों में फिरते हैं।’ हालांकि बोझ लिए फिरने वाले फेरीवाले तो शहर में अब भी हैं मगर अब कोलकाता में किताबें मिलती हैं और एक जगह तो ऐसी है जहाँ नजर उठाकर जिधर भी देखिए…सिर्फ किताबें हैं…नयी – पुरानी किताबें। ये वही हैं जिन्होंने दीन बन्धु नाटक का अनुवाद करने के जुर्म में माइकल मधुसूदन दत्त को सजा दिलवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। हालाँकि यूरोप में किताबों का मुद्रण यानी छपाई शुरू तो हुई मगर किताबें इतनी महँगी थी कि आम आदमी के लिए खरीदकर पढ़ पाना सम्भव नहीं था, उनके लिए थीं सस्ते कागज पर छपी हुई कुछ किताबें। इनको चैप बुक कहा जाता था और चैपरॉय नाम से लड़के कुछ पेनी के बदले मोहल्लों में घूम – घूमकर किताबें बेचते थे।

तब कोलकाता के लाल दीघी के पास सेंट एन्ड्रूज नाम से किताबें वितरित करने के लिए दुकान थी। लन्दन से जहाज पर किताबें आतीं तब अंग्रेज इसी दुकान से किताबें खरीदते थे। 1778 में बांग्ला की पहली किताब ‘हलहेडेर व्याकरण’ जब छपी तो इसी दुकान से बेची गयी थी। इधर, प्रशासनिक कार्यों के लिए ब्रिटिश अधिकारियों के लिए स्थानीय भाषा सीखना जरूरी था तो श्रीरामपुर छापाखाने से भी इनके लिए बांग्ला में किताबें छापी जाने लगीं। फोर्ट विलियम कॉलेज में स्वाभाविक रूप से पुस्तकालय स्थापित किया गया। अब समस्या हुई कि खुले बाजार में ये किताबें उपलब्ध नहीं थीं इसलिए किताबें चोरी होने लगीं और उनकी कालाबाजारी भी शुरू हो गयी। काले बाजार में ये किताबें दस गुना अधिक कीमतों पर बिक रही थीं। ऐसी स्थिति में कॉलेज काउंसिल के अधिकारियों ने तय किया कि वे खुद पुस्तकें प्रकाशित करके वाजिब कीमतों पर आम जनता को उपलब्ध करवाएंगे और बस यही से शुरू हुआ एक नया व्यवसाय – किताबों का व्यवसाय।


कोलकाता के पहले पुस्तक विक्रेता के रूप में गंगाकिशोर भट्टाचार्य का नाम सामने आता था। हालांकि शुरुआत उन्होंने पुस्तक विक्रेता के रूप में की थी मगर इसके बाद उन्होंने प्रेस कर्मी, लेखक, प्रकाशक, पत्रकार, और पुस्तक विक्रेता के रूप में योगदान किया। यूरोपीय तरीके से पुस्तक प्रकाशन के क्षेत्र में उतरने वाले वे प्रथम भारतीय थे। श्रीरामपुर प्रेस में कम्पोजिटर के रूप में उन्होंने काम शुरू किया था। इसके बाद 1816 में कोलकाता में प्रथम बांग्ला सचित्र ग्रन्थ ‘अन्नदामंगल’ उन्होंने प्रकाशित किया। उन्होंने पुस्तक सिर्फ प्रकाशित नहीं की बल्कि घर – घर में लोगों को समझाकर पुस्तक बेची भी और उनकी मार्केटिंग रणनीति भी असाधारण थी।
1817 में स्थापित हुई स्कूल बुक सोसायटी और इन्होंने हिन्दू कॉलेज के पास ही विद्यार्थियों के लिए किताबों की दुकान खोली। विद्यार्थी ही नहीं, आम लोग भी यहाँ से किताबें खरीदते थे। लगभग इसी समय में शोभाबाजार राजबाड़ी के विश्वनाथ देव ने अलग तरीके से सस्ती किताबें प्रकाशित करनी शुरू की और बटतला बई के सृष्टा यही हैं। शोभाबाजार – चितपुर इलाके में एक विशाल वट वृक्ष को केन्द्र कर इस नाम की उत्पत्ति हुई। बहुत से लोग कहते हैं कि इसी वट वृक्ष के नीचे जॉब चारनाक काफी समय गुजारा करते थे। इस वट वृक्ष और उसके आस -पास के इलाके में मुद्रण और प्रकाशन उद्योग पनप रहा था जो मुख्य रूप से साधारण और अर्द्धशिक्षित पाठकों की जरूरतें पूरी करने के लिए था। यहाँ पर हिन्दू और मुसलमान, दोनों ही व्यवसायी थे। हालांकि मुस्लिम व्यवसायियों ने कलिंगा बाजार यानी आज के न्यू मार्केट में दुकानें खोली थीं यानी सामने दुकान और पीछे प्रेस। इसके अतिरिक्त लल्लू लाल नामक एक प्रकाशक का भी नाम सामने आता है, पर उनके बारे में जानकारी नहीं मिलती। हालांकि हिन्दी की दृष्टि से देखा जाए तो ये उस दौर के लेखक लल्लू लाल भी हो सकते हैं..जो फोर्ट विलियम कॉलेज से ही जुड़े थे।


सब कुछ इसी प्रकार चलता अगर 1847 में खुद ईश्वर चन्द्र विद्यासागर इस व्यवसाय में नहीं उतरते। उस साल 600 रुपये में अर्महस्ट स्ट्रीट इलाके में उन्होंने संस्कृत यंत्रालय नामक लकड़ी का छापाखाना खरीदा। विद्यासागर ने आरपुलि लेन में एक किताब की दुकान खोल ली और नाम रखा संस्कृत प्रेस डिपॉजिटरी। यह एक ऐतिहासिक घटना थी। आज के कॉलेज स्ट्रीट में गम्भीरता पूर्वक शुरू किया गया व्यवसाय यही था। ‘डिपॉजिटरी’ नाम होने के कारण विद्यासागर द्वारा रचित पुस्तकों के अतिरिक्त अन्य लोगों की भी पुस्तकें छापी जाती थीं औऱ उनकी दुकान पर दूसरे लेखक अपनी किताबें बिक्री के लिए रखते भी थे। किताब बिकने पर कमिशन काटकर रुपये दिए जाते थे। आज भी कॉलेज स्ट्रीट का व्यवसाय विद्यासागर की दिखायी राह पर चल रहा है। ईश्वर चन्द्र विद्यासागर का नाम सही समय पर सही कार्य प्रणाली समझाने के लिए उल्लेखनीय है औऱ तत्कालीन समय में इसी वजह से विख्यात थी ‘विद्यासागरेर बईएर दोकान’ । सस्ती पुस्तकों के विक्रेता के रूप में उन्होंने एक आदर्श स्थापित किया।
1881 में कोलुटोला में स्थापित हुआ बंगवासी कार्यालय। यह मुख्य रूप से सस्ती धार्मिक पुस्तकें ही बेचता था मगर इसने टेडेर राजस्थान, मेडोस टेलरेर ठगीर आत्मजीवनी जैसी किताबों को फिर से मुद्रित किया था। इस दौरान कोलूटोला में हितवादी कार्यालय स्थापित हुआ जिसने कई उल्लेखनीय किताबें छापीं। इन किताबों में ‘बत्तीस सिंहासन’ आर त्रैलोक्यनाथ की ‘कंकावती’ भी शामिल थी।


पहले 50 -60 सालों में तो फेरीवालों के जरिए ही घर – घर जाकर ही किताबें बेची जाती थीं। वट वृक्ष के नीचे बैठने वाले पुस्तक व्यवसायी तो इन पर ही निर्भर थे। घरों के भीतर महिलाओं के लिए आती थी बई – मालिनी यानी किताबें बेचने वाली। तब पैसे देकर किताबों का विज्ञापन नहीं होता था बल्कि किताबें इतनी कम होती थीं कि नयी किताबें आने पर अखबारों में खबर छपती थी। समाचार दर्पण के पन्ने देखने पर ऐसी किताबों के छपने की खबर दिखती है। लिखने के लिए तब आज की तरह रॉयल्टी नहीं थी बस कुछ रुपये अग्रिम देकर प्रकाशक पांडुलिपि खरीद लिया करते थे। जिनके पास यह सुविधा नहीं थी, वे संरक्षकों पर निर्भर थे। माइकल की शर्मिष्ठा या एकई कि बले सभ्यता पाइकपाड़ा के राजा के दिये रुपये से छपी थी।


कॉलेज स्ट्रीट में किताबों की पहली दुकान गुरुदास चट्टोपाध्याय ने खोली। पहले वे हिन्दू हॉस्टल की सीढ़ियों पर ‘मेटेरिया मेडिका’ बेचा करते थे। बाद में कॉलेज स्ट्रीट में इन्होंने अपनी दुकान स्थापित की और ‘बंगाल मेडिकल लाइब्रेरी’ नाम देकर डॉक्टरी की पुस्तकें बेचना शुरू किया। 1885 में गुरुदास बाबू अपनी दुकान और प्रकाशन व्यवसाय को कॉर्नवालिस स्ट्रीट ले आये। 19वीं सदी में उस दौरान के कॉलेज स्ट्रीट में किताबों की कई दुकानों का नाम मिलता है, इनमें शामिल हैं ‘बी बनर्जी एंड कम्पनी’, ‘दासगुप्त एंड कम्पनी’, ‘सोमप्रकाश डिपॉजिटरी’ और इनके साथ आशुतोष देव का नाम भी आता है जो ए.टी. देव के नाम से विख्यात हैं। 1860 में अभिधान के व्यवसाय यानी डिक्शनरी व्यवसाय में इनका नाम था और अन्त में इनको एकमात्र टक्कर सुबल चन्द्र मित्र संकलित अभिधान से मिली थी। इसी समय योगेश बंद्योपाध्याय ने कैनिंग लाइब्रेरी के नाम से कहानियाँ और उपन्यास छापना शुरू कर दिया। नये लेखक तारकनाथ गंगोपाध्याय ने दोस्तों के साथ शर्त लगाकर ‘स्वर्णलता’ (1873) लिख ली थी मगर इसे छापने के लिए कोई आगे नहीं आ रहा था, तब योगेश बाबू ने साहस दिखाया और पुस्तक काफी लोकप्रिय हुई औऱ कॉलेज स्ट्रीट का पुस्तक व्यवसाय जम गया। इस बीच अलबर्ट हॉल तोड़कर नयी इमारत बनी, आज वह इमारत कॉफी हाउस के नाम से मशहूर है।

नयी इमारत के नीचे जितने कमरे थे, सभी पुस्तक व्यवसायियों ने किराये पर ले लिए। सबसे पहले आया चटर्जी एंड कम्पनी। इसके बाद उसके पास बना विवेकानन्द्र स्ट्रीट का कमला बुक डिपो। आयी ‘सेन राय एंड कम्पनी’, यू. एन. धर और सेन ब्रदर्स। बस इसी तरह दुकानें खड़ी हो गयीं, आस – पास की गलियों में भी सजने लगें और 40 के दशक में समूचा कॉलेज स्ट्रीट किताबों का मोहल्ला बन गया। तो ऐसे विकसित हुआ कॉलेज स्ट्रीट में पुस्तक व्यवसाय।
आज कॉलेज स्ट्रीट इलाके में हजारों स्टॉल हैं और न जाने कितने परिवारों की रोजी – रोटी है, एशिया का सबसे बड़ा पुस्तक बाजार है, कोलकाता का आकर्षण है और हृदय भी। यही कारण है कि हर परिस्थिति में लोग बोई पाड़ा के साथ खड़े होते हैं। यही एकता कोविड -19 के समय दिखी जब बोई -पाड़ा बिखर रहा था, लॉकडाउन में कारोबार ठप पड़ा था और इस पर अम्फान ने तबाही मचायी तब समूचा कोलकाता बोई – पाड़ा की मदद के लिए आ गया। आस – पास शिक्षण संस्थानों और संगठनों की बहुलता के कारण बोई पाड़ा की रौनक हमेशा बनी रहती है और लॉकडाउन के बाद स्कूल – कॉलेज खुलने के इन्तजार में हैं बोई – पाड़ा के व्यवसायी।

साभार – प्रहर डॉट इन

कांग्रेस के संस्थापकों में से एक भारत के पहले जन प्रतिनिधि महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह

कोलकाता के बीबीडीबाग इलाके में टेलिफोन भवन के पास एक प्रतिमा है। हालांकि सफेद पत्थरों से बनी यह भव्य प्रतिमा संरक्षण में तो है मगर इसके आस – पास इसके बारे में बताने के लिए कोई बोर्ड नहीं है…अगर आप इस प्रतिमा को नहीं पहचान सके तो हम बताते हैं आपको..यह प्रतिमा बिहार के भव्य दरभंगा राज के महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह बहादुर की है।
राजाओं को लेकर एक नकारात्मक छवि बना दी गयी है और नतीजा यह है कि जिन राजाओं ने कुछ अच्छे काम किये हैं, हम उनको भी नहीं जानना चाहते। बिहार या हिन्दी भाषी प्रदेशों में अपने इतिहास को लेकर उदासीनता है और वे बिहार से अधिक महत्व अपने जिले को देते हैं। शायद यही कारण है कि अपने इतिहास को वे गम्भीरता से नहीं लेते। बहरहाल हम आपको बताते हैं…लक्ष्मीश्वर सिंह बहादुर के बारे में।
महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह – 1880-1898 तक इनका शासन रहा। ये काफी उदार, लोक-हितैषी, विद्या एवं कलाओं के प्रेमी एवं प्रश्रय दाता थे। रामेश्वर सिंह इनके अनुज थे। उनके परोपकारी कार्यों, प्रशासनिक क्षमताओं और उनकी संपत्ति (दरभंगा राज) के प्रबंधन की बहुत सराहना की गई है और उनकी संपत्ति का विकास हुआ। बंगाल विधानपरिषद के सदस्य रहे.
दरभंगा महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह 1885 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी) के संस्थापकों में से एक थे। राज दरभंगा ब्रिटिश राज के साथ अपनी निकटता बनाए रखने के बावजूद पार्टी के प्रमुख दानदाताओं में से एक थे। ब्रिटिश शासन के दौरान, कांग्रेस इलाहाबाद में अपना वार्षिक सम्मेलन आयोजित करना चाहते थे, लेकिन उन्हें इस उद्देश्य के लिए सरकार द्वारा किसी भी सार्वजनिक स्थान का उपयोग करने की अनुमति से इनकार कर दिया गया था। दरभंगा के महाराजा ने एक क्षेत्र खरीदा और काँग्रेस को वहाँ अपना वार्षिक सम्मेलन आयोजित करने की अनुमति दी। 1892ई. के कांग्रेस का वार्षिक सम्मेलन 28 दिसंबर को लोथर कैसल के मैदान में आयोजित किया गया था, जिसे तत्कालीन महाराजा ने खरीदा था। महाराजा द्वारा इस क्षेत्र को ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा पार्टी को ठिकाने लगाने से रोकने के लिए ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा किसी भी प्रयास को विफल करने के लिए पट्टे पर दिया गया था।
तत्‍कालीन वायसराय किसी भी कीमत पर दरभंगा के महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह को स्टेट काउंसिल के चुनाव (1893) में हराना चाहते थे। पहले तो लक्ष्मीश्वर सिंह के खिलाफ पटना क्षेत्र से एक मुस्लिम वकील को चुनाव के मैदान में खडा कर दिया। जब उससे भी बात नहीं बनी तो वायसराय के लोग लक्ष्मीश्वर सिंह को आम लोगों के प्रतिनिधि के बदले एक महाराजा के रूप में प्रचारित कर रहे थे। इस बात को लेकर दरभंगा महाराज ने वासराय को सबक सिखाने का फैसला किया।
लक्ष्मीश्वर सिंह को रुलिंग किंग का दर्जा नहीं मिला था। उन्हें महाराजाधिराज की उपाधि नहीं मिल सकी। उन्‍हें दो बार मौका मिला इस उपाधि को पाने का, लेकिन पहली बार उन्‍हें मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर के पोते जुबैरुद्दीन गोरगन को पनाह देने और राज्‍य अतिथि का दर्जा देने के कारण यह उपाधि नहीं दी गई, तो दूसरी बार कांग्रेस के लिए जमीन मुहैया कराने के कारण उन्‍हें इस उपाधि से वंचित रहना पडा।
दूसरी बार जब उन्‍हें यह उपधि नहि मिली तो उन्‍होंने इस उपाधि की मांग छोड दी और खुद को जनप्रतिनिधि के तौर पर स्थापित कर लिया। जनता के मुद्दे उठाने लगे। तत्‍कालीन वायसराय इस कारण इतने परेशान हो गये कि इन्हें सदन में आने से रोकने के लिए हर प्रयास शुरु कर दिया।
वायसराय के लोगों ने जब लक्ष्मीश्वर सिंह को महाराजा कह कर चुनावी मैदान में हराने की कोशिश की, तो उन्होंने कलकत्ता में ऐसा रोड शो किया कि वायसराय भी भौंचक रह गये। महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह वो चुनाव भारी मतों से जीत कर भारत के पहले जनप्रतिनिधि बने, लेकिन यह दुखद रहा कि 1898 में लक्ष्मीश्वर सिंह का निधन हो गया और दरभंगा के अगले राजा रामेश्‍वर सिंह को महाराजाधिराज की उपाधि मिली।

एस एम घोष (1896 में उद्धृत) के अनुसार महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह एक अच्छे सितार वादक थें। महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह बहादुर ने स्कूल, डिस्पेंसरी और अन्य सुविधाओं का निर्माण किया और उन्हें जनता के लाभ के लिए अपने स्वयं के धन से बनाए रखा। दरभंगा में औषधालय की कीमत £ 3400 थी, जो उस समय बहुत बड़ी राशि थी।
दरभंगा राज महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह बहादुर ने दरभंगा में सभी नदियों पर बनाए गए लोहे के पुलों का निर्माण शुरू किया।
महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह ने 146 साल पहले शुरू की निजी ट्रेन। दरअसल, 1874 में दरभंगा के महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह ने तिरहुत रेलवे की शुरूआत की थी. उस वक्त उत्तर बिहार में भीषण अकाल पड़ा था. तब राहत कार्य के लिए समस्तीपुर के बाजितपुर से दरभंगा तक के लिए पहली ट्रेन मालगाड़ी चली थी.रेलवे का जाल बिछाने में महाराज का बड़ा योगदान
महाराजा लक्ष्मेश्वर सिंह ने ही उत्तर बिहार में रेल लाइन बिछाने के लिए अपनी कंपनी बनाई और अंग्रेजों के साथ एक समझौता किया. इसके लिए अपनी जमीन तक उन्होंने तत्कालीन रेलवे कंपनी को मुफ्त में दे दी और एक हज़ार मज़दूरों ने रिकॉर्ड समय में मोकामा से लेकर दरभंगा तक की रेल लाइन बिछाई. उत्तर बिहार और नेपाल सीमा तक रेलवे का जाल बिछाने में महाराज का बड़ा योगदान है. उनकी कंपनी तिरहुत रेलवे ने 1875 से लेकर 1912 तक बिहार में कई रेल लाइनों की शुरुआत की इनमें प्रमुख दरभंगा-सीतामढ़ी, सकरी-जयनगर, समस्तीपुर-खगड़िया, समस्तीपुर-दलसिंहसराय, समस्तीपुर-मुजफ्फरपुर, मुजफ्फरपुर-मोतिहारी, मोतिहारी-बेतिया, हाजीपुर-बछवाड़ा, नरकटियागंज-बगहा लाइनें प्रमुख हैं इसके अलावे भी विभिन्न जगहों से अनेक ट्रेने चलाई गई.
भले ही आज राजशाही नहीं है, लेकिन दरभंगा महाराज की संपत्ति से चलने वाले इस अस्पताल में प्रतिदिन दर्जनों मरीजों का मुफ्त में इलाज कर दवा देने की व्यवस्था जारी है। याद रहे कि 12 बीघे में फैले इस अस्पताल की स्थापना 1878 में महाराज लक्ष्मेश्वर सिंह ने द राज हॉस्पीटल एंड द लेडी डेफरीन फिमेल नाम से गरीबों के लिए की। गरीबों की सेवा के लिए खोला गया दो सौ बेड का यह अस्पताल तत्कालीन बंगाल राज्य का दूसरा सबसे बड़ा चिकित्सालय था। जहां आफगानिस्तान, नेपाल आदि कई देशों से मरीज मुफ्त में इलाज कराने आते थे। डॉ. भवनाथ झा, डॉ. अमूल्या चटर्जी, डॉ. मटरा, डॉ. गोयल, डॉ. होल्द जैसे देश-विदेश के कई नामचीन चिकित्सकों ने यहां योगदान दिया है।
बहु विवाह पर रोक लगाने के लिए इन्होंने अपने कार्यकाल में दंड का प्रावधान किया। गौ रक्षा संघ के संस्थापक बने। अंग्रेजी शिक्षा व एलोपैथी चिकित्सा को बढावा दिया। इनके कार्यकाल में ही अंग्रेजी स्कूल व मेडिकल डिसपेंसरी की स्थापना हुई। भारत में जैविक क्रांति के अगुआ रहे और जर्सी गाय की नस्ल इनके कार्यकाल की सबसे बडी देन है। तिरहुत स्टेट रेलवे की स्थापना कर इन्होंने तिरहुत में विकास की एक नयी लकीर खींच दी। तिरहुत सरकार लक्ष्‍मीश्‍वर सिंह ने ही तिरहुत में औद्योगिक क्रांति का सबसे पहले सपना देखा। दरभंगा सूत कारखाने की स्थापना और नील की खेती खत्म करने का सैद्धांतिक फैसला उनके विकास मॉडल को रेखांकित करता है। इंपिरियल कॉउंसिल के पहले भारतीय सदस्य रहे तिरहुत सरकार लक्ष्‍मीश्‍वर सिंह बहादुर साह जफर के बडे पोते को राजनीतिक संरक्षण देकर राष्ट्रीय स्‍तर पर स्‍वतंत्रता आंदोलन को जिंदा रखने का एलान किया। अफ्रीका में गांधी को मदद करनेवाले पहले भारतीय बने। कांग्रेस के पालनहार बन कर उसकी नींव मजबूत की। पूणा सार्वजनिक सभा के संरक्षक बने। रूलिंग किंग का दर्जा नहीं मिलने के बावजूद कोलकाता में गवर्नर से सलामी लेनेवाले तिरहुत सरकार हिंदू-मुस्लिम एकता के भी प्रतीक माने जाते हैं।

बहुविवाह पर लगाम लगाकर भी सामाजिक आंदोलन के ब्रांड नहीं बन पाये तिरहुत सरकार

बहुविवाह पर लगाम लगाने के बावजूद राजा राम मोहन राय की तरह महाराजा लक्ष्‍मीश्‍वर सिंह सामाजिक सुधार के लिए याद नहीं किये गये। जबकि खुद राजा राम मोहन राय ने अपने एक भाषण में तिरहुत सरकार के समाज सुधार को प्रेरणादायक बताया है। इस बात को बिहार के सामाजिक आंदोलनों पर काम करनेवालों ने कभी उल्‍लेखित नहीं किया, भारतीय परिदृश्‍य में वो रेखांकित ही नहीं हुए। कारण जो कुछ भी हो, लेकिन तिरहुत में बहुविवाह के खत्‍मे के लिए इन्‍होंने न केवल सामाजिक जागरुकता फैलाया, बल्कि दुल्‍हा, पंजीकार और परोहितों पर दंड का भी प्रावधान किया। दस्‍तावेज के अनुसार 19वीं शताब्‍दी तक तिरहुत में एक व्‍यक्ति 35 से 45 शादियां करते थे। पहली पत्‍नी तो ससुराल आती थी, लेकिन बाकी पूरी जिंदगी मायके में ही गुजार देती थी। इसे बिकौआ विवाह कहा जाता है, जिसमें गरीब अपनी बेटी का बिवाह कुलीन(एलीट) परिवार के व्‍यक्तियों से कराने के लिए बिक जाता था। इस घिनौनी प्रथा का सबसे दुखद पक्ष यह था कि एक कुलीन व्‍यक्ति की मौत पर कई महिलाएं विधवा हो जाती थी। 1876 में महाराजा लक्ष्‍मीश्‍वर सिंह ने इस प्रथा काे बंद करने का प्रयास शुरु किया। सबसे पहले उन्‍होंने इस संबंध में सर्वे कराने का फैसला किया। सर्वे रिपोर्ट के अनुसार उस वर्ष 54 ऐसे कूलीन व्‍यक्ति की मौत हुई जिनके कारण कुल 665 महिलाएं विधवा हुई। कोइलख गांव में एक 50 वर्षीय कूलीन व्‍यक्ति की मौत से 35 महिलाएं विधवा हुई, जबकि रामनगर में एक 40 वर्षीय कूलीन व्‍यक्ति की मौत से 14 महिलाएं विधवा हुई, महाराजा लक्ष्‍मीश्‍वर सिंह इन आंकडों को देखकर तत्‍काल अपने चाचा गुणेश्‍वर सिंह व गोपेश्‍वर सिंह के साथ मंत्रणा की और बिकौआ विवाह पर प्रतिबंध लगाने का फैसला किया। साथ ही इसे सामाजिक आंदोलन बनाने के लिए 1000 रुपये का फंड भी आवंटित किया। सौराठ सभा में एक निगरानी ब्‍यूरो की स्‍थापना की गयी और ऐसे लोगों पर दंडात्‍मक कार्रवाई शुरु हुई। 1878 में सौराठ सभा में कुल 2289 विवाह का निबंधन हुआ। इनमें 107 विवाह पंजीयन बिकौआ बिवाह माना गया। 96 लोगों (पंजीकार, दूल्‍हा, पुरोहित) को सजा सुनाई गयी, जिनसे कुल 298 रुपये का दंड वसूला गया। 10 युवाओं को रिहा किया गया, जबकि 26 दूल्‍हे को महाराजा कोर्ट में भेज दिया गया। 23 नवंबर 1878 को तिरहुत में पहली बार बिकौआ विवाह करने के कारण किसी व्‍यक्ति को कारावास हुआ। क्‍या आप इसे सामाजिक आंदोलन नहीं कहेंगे।

साभार – विकिपीडिया, मैथिली ब्राह्मण महासभा, दैनिक जागरण, मुज्जफरपुर,  एबीपी लाइव, बीबीसी हिन्दी
और  इंटरनेट तथा फेसबुक पर उपलब्ध ई समाद की सम्पादक कुमुद सिंह के कई आलेख

ऐ सखी सुन – कोरोना से परेशान हैं,’बे कोरोना आइसोलेशन’ झेलती हैं स्त्रियाँ

प्रो, गीता दूबे

भाग -7

सभी सखियों को राम राम। सखियों इस मुए करोना ने अभी भी हमारा जीना हराम कर रखा है। न जाने कब इस जंजाल से हमारा पिंड छूटेगा। इस रोग की सबसे बड़ी समस्या यह है कि आम रोगों में तो लोग आपसे मिलने -जुलने, आप का हाल पूछने आप के घर आते हैं और इस तरह आपका मन बहला रहता है। लेकिन करोना के रोगियों को सबसे अलग-थलग रखा जाता है ताकि इस संक्रामक रोग के खतरनाक कीटाणु  दूसरों तक पहुँचकर उन्हें भी अपनी गिरफ्त में ना ले लें। और सखियों यह तो आपको पता ही होगा कि इस पूरी प्रक्रिया को नाम दिया जाता है, आइसोलेशन। तो इस महामारी ने हमें एक और शब्द सिखा दिया, वह है क्वारंटाइन और आइसोलेशन। हालांकि जब प्लेग की बीमारी फैली थी, उस समय भी क्वारंटाइन के लिए लोगों को क्वारांटाइन कैंप में जाना पड़ता था। लेकिन इस बार तकरीबन तमाम संपन्न लोगों को यह सुविधा मिली है कि अगर उन्हें घर पर सभी सुविधाएँ उपलब्ध हो सकें तो वह अपने घर में ही आइसोलेशन में रह कर बीमारी का इलाज करवा सकते हैं।

 सखियों, यह आइसोलेशन कई बार लोगों को बहुत भारी गुजरता है और वे शिकायत करते हैं कि उन्हें इस तरह अछूतों की तरह अलग-थलग रहने को विवश होना पड़ता है। लेकिन इस परिप्रेक्ष्य में मुझे एक बात याद आ रही है जिसे मैं  आपके साथ साझा करना चाहती हूँ। आज जो बात लोगों को बेहद यंत्रणादायक लग रही है और वे इसकी शिकायत करते नजर आ रहे हैं इस आइसोलेशन को तो हम महिलाएँ न जाने कब से झेल रही हैं। स्त्री देह की प्राकृतिक बनावट और मानव संतति के विकास हेतु जो प्राकृतिक वरदान महिलाओं को मिला है उसके कारण तकरीबन हर परिवार में उन विशेष दिनों में, सदियों से उन्हें आइसोलेशन में रहने को विवश किया जाता रहा है ।मेरा संकेत तो आप समझ ही गई होंगी, सखियों। हमारे भारतीय समाज में स्त्रियों के रजस्वला होने को इस तरह से देखा जाता है मानो वे अशुद्ध हो गईं हों और इस कारण तीन से लेकर के पाँच या साय दिनों की अवधि तक उन्हें बहुत सारे कामों से अलग रखा जाता है। कुछ वर्षों पहले तक ग्रामीण भारत के अधिकांश हिस्सों में इस सामाजिक नियम का पालन किया जाता था कि इस स्थिति विशेष में महिलाओं के निवास के लिए घर के बाहर एक झोपड़ी बनाई जाती थी जिसमें उन्हें अपना ऋतुकाल गुजारना पड़ता था और एक तय समय के बाद वे नहा धो कर, स्वच्छ होकर पुनः सामान्य जीवन में प्रवेश कर सकती थीं। हालांकि शहरी परिवेश में इस नियम में थोड़ा सा बदलाव जरूर आया है। स्थानाभाव के कारण वे रहती तो अपने घर में ही हैं लेकिन बहुत से कामों या स्थानों से उन्हें अलग -थलग रखा जाता है। मसलन, वे रसोईघर या पूजा घर में प्रवेश नहीं कर सकतीं, खानपान की बहुत सारी चीजों का स्पर्श भी नहीं कर सकती। अचार, बड़ी, पापड़ आदि नहीं छू सकती, पीने का पानी खुद नहीं ले सकतीं। और इन सब के पीछे यह वजह बताई जाती थी कि वे पदार्थों उनके छूने से अपवित्र हो जाएंगे और अन्य लोगों के खाने- पीने के काबिल नहीं रह जाएंगे। अभी भी बहुत से घरों में यह माना जाता है कि रजस्वला स्त्री अगर अचार आदि छू लेगी तो खराब हो जाएगा और ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाएगा। जहाँ तक स्त्री को घर के काम काज से अलग रखने की बात थी, तो इसके पीछे शायद किसी जमाने में यह कारण जरूर रहा होगा कि उसे आराम मिल पाए लेकिन आराम देने के नाम पर उसे इस तरह सामान्य परिवेश से काट दिया जाना कहाँ तक न्याय संगत है ? गाँवों में तो अब भी यह नियम है कि रजस्वला स्त्रियों को स्नान नहीं करना चाहिए और शायद इसीलिए मंदिर या रसोई में जाने की मनाही थी। स्नानादि न करने के पीछे एक बड़ा कारण यह था उस जमाने में किसी घर में व्यक्तिगत नहानघर या शौचालय नहीं होते थे। नदी यख तालाबों आदि में ही स्नान संपन्न किया जाता था। अगर इस समय वे वहाँ नहाने  धोने के लिए जाती पूरा जलाशय दूषित हो जाता। लेकिन वर्तमान दौर में भी क ई परिवारों इस दौरान स्नान न करने के नियम का पालन किया जाता है। 

हम लोगों की समस्या यह है कि हम बहुत सारे नियमों का पालन बिना सोचे समझे या तर्क किए करते हैं भले ही उनकी जरूरत या उपयोगिता बदलते दौर में हो या न हो। एक ओर तो हम आधुनिकता का परचम लहराते हैं तो दूसरी ओर रूढ़ियों का पालन भी श्रद्धा से करते हैं।  समय के साथ बहुत कुछ बदलता है लेकिन स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन की गति बहुत धीमी है। भारतीय समाज में एक बड़े तबके की स्त्रियों को सामाजिक नियमों की इन सांकलों में कैद होकर चंद दिनों के लिए ही सही अपने ही परिवार में अछूत की जिंदगी जीनी पड़ती है। जब छूआछूत को कानूनन अपराध माना जाता है तो भला स्त्रियों के साथ यह निर्दय व्यवहार क्यों। एक बात समझ में नहीं आती सखी कि जिस स्थिति के कारण उन्हें अस्पृश्य समझ जाता है उसके बिना तो मानव जाति का विकास ही संभव नहीं है। तो सखियों, क्या आपको नहीं लगता कि यह स्थिति जो कहीं -कहीं परिवर्तित हो रही है उसे पूरी तरह से बदलना चाहिए। सिर्फ स्त्रियों को ही नहीं,  आज करोना के कारण आइसोलेशन झेलने वाले तमाम लोगों को इस सदियों पुरानी आइसोलेशन की परंपरा का बहिष्कार करने के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए। विदा सखियों, आप से अगले हफ्ते फिर मुलाकात होगी।

 

विलुप्त हेबाक कगार पर अछि पंजी प्रथा आजुक भोजपत्र आओर कागज

प्रभाकर झा

नरसिंह देव क द्वारा शुरू कैल गैल पंजी प्रथा आजुक भोजपत्र आओर कागज क रूप मे धूल खा रहल अछि । कि‍छु एतेक पुरान भए गेल अछि जे ओकरा पढ़ल नहि‍ जा सकैत अछि, जे बचल छल ओ या त धुरा फाँकि‍ रहल अछि वा कोनो सरकारी दफ्तर क अलमारी मे बन्न भए विलुप्त हेबाक कगार पर अछि । जरूरत अछि एकर डिजिटलाइजेशन क ताकि एकर आम लोगक पहूँच तक होए आ आसानी स सबकए उपलब्ध भए सकय । उक्त गप पिछला दिन पंजीकार दिवाकर झा कहलथि‍ ।

ओ बतौलथि‍ जे हुनकर परिवार 1558 ई स पंजीकार होएत आबि रहल अछि । हुनकर घर मे ओ 11म पुस्त छथि‍ जे पंजीकार बनल । अखैन धरि जे पंजीकार बनल ओहि मे क्रमश: स्व० पुराई झा, हरि झा, पोषण झा, महामहोभजन झा, दुल्ला झा, कृष्णा झा, जगधर झा, उमाकांत झा, पंडित पंजीकार श्री देवनारायण झा आ तकर बाद दिवाकर झा छथि‍ ।

एहि गप क आँँगा बढ़ाबैत श्री दिनकर झा बतौलथि‍ जे ओ पंजिकारी मे करीब 40 से लागल छथि‍ आ अखैन धरि करीब 3000 से बेसी पंजीयण कए चुकल छथि‍ । हरेक साल ओ 50-60 टा पंजियण त करते टा छथि‍ । ओ इहो बतौलथि‍ जे सभटा पंजियण ओ तिरहुता लिपी मे करैत अछि । संगे ओ बतेलथि‍ि‍ जे एहि कुलक नवीण पंजीकार दिवाकर जी छथि‍ जे सबसे कम बयस मे पंजीकार बनल । दिवाकर झाजी एकटा बी-टेक इंजिनीयर छथि‍ संगे संग अपन पुश्तैनी कलाक बचेबा मे लागल छथि‍ । ओ एकटा कुशल पंजीकार, कुशल चित्रकार आ कुशल अभि‍यंता सेहो छथि‍ । पंजिकरण क एहि काज कए ओ अपन दादा श्री देवनाराण झा स सिखने छथि‍ । श्री झा चाहैत छथि‍ जे सभटा चिज जे पोथी मे बन्न अछि ओकरा पुरा दुनिया जानय । ओ चाहैत छथि‍ जे आभासी दुनिया क लोग सेहो पंजी व्यवस्था स परिचित भए सकय । एहि क लेल ओ एकटा एप्प बनाबय चाहैत छथि‍ जाहि स पंजीयण व्यवस्था प्रस्तुत भए सकय आ आसान भए सकय आ सहजहि लोकसभ कए उपलब्ध भए सकय ।

कि अछि पंजी व्यवस्था –

पंजी व्यवस्था क शुरूआत मिथि‍ला नरेश हरिसिंह देव (1310-1324) सर्वप्रथम शुरू केने छथि‍ । आ इ खाली ब्राह्मण आ कायस्थ समाज लेल छल । दरअसल पंजी प्रथा एक प्रकारक जिनोलॉजिकल रिकॉर्ड अछि जेकरा हम पंजी कहैत छी, अर्थात ओ पोथी जाहि मे हमर पूर्वज क जिनोलॉजिकल रिकॉर्ड होए । एहि प्रथा क लागु करबाक पाछाँ एतबे टा उद्देश्य छल शादी बियाह एहन परिवार मे होए जेकर वर आ वधु पक्ष मे कोनो संबध नहि होए । जाहि स हुनकर परिवार मे सुख शांति होए आ वंश मे सुयोग्य आ कुलीन संतान उत्पन्न होए । मिथि‍ला नरेश सबसे पहिने एहि विचार कए 14टा गाम मे लागू करने छलथि‍ जाहि मे सौराष्ट्र, परतापुर, शि‍वहर, गोविंदपुर,गोविंदपुर, फतेहपुर, सजौल, सुखसनिया, अखयारी हेमनगर, बलुआ, बरौली, समसौल, सहसलुका इत्यादि । एहि व्यवस्था कए सुचारू रूप से लागू करबाक लेल पंजीकार क नियुक्ती कैल गेल जे वर वधु क मूल गोत्र क ध्यान मे राखि‍ कए पंजी व्यवस्था कए सुचारू रूप स लागू करैत छलाह ।

वर वधू पक्ष मे सर्वप्रथम संबंध स्थापित करबाक काज पंजीकारे क होएत छल । ओ दूनू पक्षक गोत्र, मूल, आ वंशज कए मिलाकए देखैत छल जे दूनू पक्ष कए पूर्वज मे कोनो संबंध त नहि छल । जो वर पक्ष आ वधु पक्ष क प्र‍पितामह, अतिवृध प्रपितामह तक मे कोनो संबंध नहि होएत छल तखने दुनू गोटेक विवाह क प्रस्ताव स्वीकार होएत छल । ओकर बाद अपन पंजी मे उत्तेर ( एक प्रकार क डाक्यूमेंटेशन ) बनाबैत छल आओर ओ हुनकर नाम, ग्राम आ मूल गोत्र क हिसाब से पंजी पुस्तक मे राखैत छल । ओकर बाद बधु पक्ष लेल एकटा परामर्श पत्र बनाबैत छल आओर ओहि परामर्श पत्र कए वर द्वारा पढ़ाकए हुनका संग संबंध स्थापित करल जाएत छल । ई एकटा वैज्ञानिक प्रणाली छल जेकार जीनोम फ्यूजन कहल जाएत छल । विपरित जीन मे विवाह केला स संतान कुलीन आ स्वस्थ पैदा लैत अछि । एकरा वैज्ञानिक सेहो प्रमाणि‍त केने अछि । ज्ञात होए कि पंजीकारी प्रथा क लेल मिथि‍ला मे सौराष्ट्र सभा गाछी बड्ड बेसी प्रसिद्ध छल । ओतय हरेक साल सभाक आयोजन होएत छल । ओतय हरेक साल एकटा सभा क आयोजन होएत छल जे आब विलुप्त भए गेल अछि । मिथि‍ला क लेल इ दुखद गप अछि ।

(लेखक मधुबनी चित्र शैली के चित्रकार हैं)

भवानीपुर कॉलेज में जसलीन रॉयल के संगीत ने मन मोहा

कोलकाता : भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज का ऑनलाइन प्रोग्राम का आयोजन डीन प्रो दिलीप शाह और क्रिसेंडो टीम संगीत विशेषज्ञ सौरभ गोस्वामी की उपस्थिति में आयोजित किया गया। छात्रा अंजली दूबे ने, संगीत शिक्षक सौरभ गोस्वामी, और अन्य विद्यार्थियों ने अपनी गीत प्रस्तुति भी दी। जसलिन रॉयल युवाओं में लोकप्रिय गायिका के रूप में प्रसिद्ध हैं। स्वतंत्र भारतीय गायिका गीतकार संगीतकार 29 वर्षीय जसलिन रॉयल ने  के कई संगीत एलबम और फिल्मों के गीत लोकप्रिय हुए हैं। एम टीवी वीडियो म्युजिक अवार्ड और बेस्ट इंडी सॉन्ग अवार्ड प्राप्त युवा गायिका के प्रमुख एलबम में शिवाय, हिचकी, फिल्लौरी, खूबसूरत आदि फिल्मों में गीत काफी मशहूर हैं। दिन शगना दा (फिल्म फिल्लौरी, 2017), नच दे ने सारे – बार बार देखो – 2016, लव यू जिंदगी (डियर जिन्दगी) आदि बहुत लोकप्रिय गीत रहे। जैसलिन रॉयल ने इन सभी गीतों को भवानीपुर कॉलेज के विद्यार्थियों के साथ साझा किया।लव यू जिंदगी गीत के साथ साथ तीन गीतों बार बार देखो, खो गए हम कहाँ, जाने दो जाने दो आदि गीतों की प्रस्तुति दी। विद्यार्थियों ने जैसलिन से उनके जीवन और संगीत से जुड़े बॉलीवुड दुनिया से संबंधित प्रश्नों के उत्तर भी सुने। 300 से अधिक छात्र – छात्राओं इस कार्यक्रम का आनंद लिया। सुयश अग्रवाल, गौरव किल्ला, शिक्षिका दिव्या उदेशी का विशेष सहयोग रहा। पूर्व छात्र नवनीत दूगड ने सोशल नेशन के सौजन्य से इस कार्यक्रम को आयोजित किया। कॉलेज के डीन प्रो दिलीप शाह ने जैसलीन का स्वागत किया और कॉलेज का स्मृति चिह्न भेजा। को-आर्डिनेटर प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी इस अवसर पर उपस्थित थीं। डॉ वसुंधरा मिश्र ने इस कार्यक्रम की जानकारी दी।

होम लेन ने कोलकाता में खोला पहला एक्सपेरियेंस सेंटर

कोलकाता :  होमलेन ने बंगाल में अपने कारोबार के दायरे को बढ़ाने का निर्णय लिया है। कम्पनी ने उत्तरी कोलकाता के चिनार पार्क में अपने पहले एक्सपीरियंस सेंटर को लॉन्च किया है। 2500 वर्ग-फीट में फैला होमलेन का यह एक्सपीरियंस सेंटर, संभावित ग्राहकों और आगंतुकों को किचन, बेडरूम, लिविंग रूम और डाइनिंग स्पेस के लिए आठ अलग-अलग कॉन्सेप्ट्स और डिजाइनों के नमूनों की झलक दिखाता है, जो हर वर्ग के ग्राहकों की जरूरत एवं उनकी इच्छाओं के अनुरूप है। होमलेन एक्सपीरियंस सेंटर में आने वाले ग्राहक उन वास्तविक उत्पादों को भी देख सकते हैं जिनका उपयोग उनके घर को डिजाइन करने में किया जाएगा, जिसके अंतर्गत फर्निशिंग, कमरे के साजो-सामान इत्यादि में इस्तेमाल की जाने वाली सामग्रियों का संग्रह भी शामिल है। कंपनी कोलकाता सेवाओं के प्रस्ताव के एक हिस्से के रूप में डिज़ाइनिंग के लिए नि:शुल्क परामर्श भी प्रदान करती है।

होमलेन द्वारा की गई मार्केट स्टडी से यह संकेत मिलता है कि, नयी पीढ़ी के युवाओं के बीच अपना घर खरीदना सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक है, क्योंकि 25 से 35 वर्ष की आयु के बीच के लगभग 55% व्यक्ति नई प्रॉपर्टी खरीदने की इच्छा रखते हैं। होम लोन की ब्याज दरें इन दिनों अपने निम्नतम स्तर पर हैं जिसकी वजह से 45 लाख रुपये से 1.5 करोड़ रुपये के बीच निवेश करने वाले ग्राहक बड़ी तेजी से नया घर खरीद रहे हैं। नया घर खरीदने वालों में से ज्यादातर लोग पूरी तरह बने-बनाए एवं रहने के लिए तैयार घरों को ज्यादा पसंद करते हैं। इस साल, कोलकाता में 18,000 से ज्यादा नए घर खरीदे गए, जो वर्ष 2019 में किए गए रिकॉर्ड खरीद से दोगुना है। दरअसल पिछले 5 सालों में पहली बार ऐसा हुआ है जब कोलकाता में बिक्री आपूर्ति से ज्यादा हो गई है, जिसके परिणामस्वरूप पिछले आधे दशक में नहीं बिकने वाले घरों की संख्या अपने न्यूनतम स्तर तक पहुंच चुकी है। होमलेन के सह संस्थापक तथा सीईओ श्रीकांत अय्यर ने कहा, होमलेन ने अगले एक साल के दौरान पश्चिम बंगाल में 4 एक्सपीरियंस सेंटर और 4 डिज़ाइन स्टूडियो के नेटवर्क स्थापित करने की योजना बनाई है। ये एक्सपीरियंस सेंटर और डिज़ाइन स्टूडियो स्थानीय ग्राहकों को एक व्यक्तिगत इंटरफ़ेस प्रदान करेंगे, जिसके जरिए वे अपने घर की इंटीरियर डिजाइनिंग से जुड़ी जरूरतों के लिए कंपनी के साथ बातचीत कर पाएंगे। एक्सपीरियंस सेंटर्स और डिज़ाइन स्टूडियो के इस नेटवर्क को तैयार करने के लिए 30 लाख से 1 करोड़ रुपये के पूंजीगत निवेश की आवश्यकता होगी। कंपनी ने पश्चिम बंगाल से 5,000 से अधिक ऑर्डर प्राप्त करने का लक्ष्य बनाया है, और उम्मीद है कि अगले तीन वर्षों के दौरान कुल व्यापार में स्थानीय बाजार के कारोबार का योगदान 10% से अधिक होगा। होमलेन ने अपने ग्राहकों के लिए फाइनेंसिंग की सुविधाओं को आसान बनाने के लिए कई बैंकों के साथ समझौता किया है।

एक्सएलआरआई सामर्थ्य ने आयोजित किया ‘रिफलेक्शन्स- 2020’

जमशेदपुर : एक्सएलआरआई के विद्यार्थियों द्वारा संचालित छात्र संस्था सामर्थ्य ने ऑनलाइन वार्षिक सम्मेलन ‘रिफलेक्शन्स 2020’ आयोजित किया। आयोजन “मानसिक स्वास्थ्य और महामारी: इसके निहितार्थ और सामना करने के तरीके पर केंद्रित था।”
‘रिफलेक्शन्स 2020’ ने मानसिक स्वास्थ्य के महत्व पर जोर दिया, विशेष रूप से इन चुनौतीपूर्ण समय में विद्यार्थियों, शिक्षकों और अभिभावकों के बीच को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर चर्चा की। इन मुद्दों में सामाजिक सम्पर्क, स्वास्थ्य और पढ़ाई में प्रदर्शन जैसे मुद्दे शामिल थे।
इस आयोजन में जमशेदपुर के तीन अलग-अलग स्कूलों. दयानन्द पब्लिक स्कूल, डीएवी पब्लिक स्कूल और तारापोर स्कूल के 150 से अधिक विद्यार्थियों ने भाग लिया। स्कूल के छात्रों ने भावनाओं को बेहतर ढंग से समझने और इस महामारी के नकारात्मक प्रभावों से लड़ने और मानसिक कल्याण सुनिश्चित करने के लिए अच्छे मानसिक स्वास्थ्य की आदतों को प्रोत्साहित करने के लिए परिचयात्मक गतिविधियों ने भाग लिया।
सत्र के दौरान स्कूली बच्चों से पूछे जाने वाले कुछ सामान्य प्रश्न थे, “मैं हमेशा स्कूल में अच्छा करने के बारे में चिंतित हूं? मैं शैक्षणिक दबाव का सामना कैसे करूं? मैं अपनी भावनाओं और भावनाओं को कैसे पहचानूं और काम करूं?”
मानसिक स्वास्थ्य के बारे में मिथकों को समाप्त करने के लिए, एक परिचर्चामूलक प्रश्नोत्तरी सत्र आयोजित किया गया था।
बच्चों को विषय के बारे में अपने विचार साझा करने में सहज बनाने के लिए कई आकर्षक गतिविधियाँ आयोजित की गईं। एक्सएलआरआई- जेवियर इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट की एक मनोचिकित्सक डॉ। पूजा मोहंती ने सम्मेलन बतौर अतिथि वक्ता विचार रखे और मानसिक स्वास्थ्य के महत्व पर प्रकाश डाला।

सीआईएससीई ने सभी राज्यों से स्कूलों को खोलने का किया अनुरोध

सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों तथा निर्वाचन आयोग को लिखा पत्र
कोलकाता : कोविड -19 के कारण सभी शिक्षण संस्थान बंद पड़े हैं। गत मार्च से अब स्कूलों के बंद रहने के कारण ऑनलाइन पढ़ाई ही हो रही है मगर अब स्कूल चाहते हैं कि कोविड -19 से जुड़ी सभी सावधानियों का पालन करते हुए अब स्कूलों को खोला जाए। काउंसिल फॉर द इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट एक्जामिनेशन (सीआईएससीई) द्वारा इसे लेकर सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र भी लिखा गया है। सीआईएससीई के चीफ एक्जिक्यूटिव तथा सचिव गेरी आराथून द्वारा लिखे गये इस पत्र में सभी राज्य़ों से अगले साल 4 जनवरी 2021 से स्कूलों को खोलने का अनुरोध किया गया है। खासकर दसवीं और बारहवीं के विद्यार्थियों की कक्षाओं को आरम्भ करने का अनुरोध भी पत्र में किया गया है। विद्यार्थियों के स्कूल आने पर यगह समय प्रैक्टिकल वर्क, प्रोजेक्ट वर्क, एसयूपीडब्ल्यू वर्क और संशय दूर करने के लिए उपयोग में लाया जाएगा। इससे विद्यार्थियों को शिक्षक से मिलकर अपनी समस्याओं को दूर करने की सुविधा मिलेगी। अगर स्कूलों को खोलने की अनुमति मिलती है तो स्कूलों को राज्य सरकार द्वारा कोविड -19 से जुड़े निर्देशों को लेकर सूचना दी जाएगी जिससे वे सभी सुरक्षा नियमों तथा आवश्यक मापदंडों का पालन कर सकें जो कि राज्य के स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी किये गये हैं। सीआईएससीई ने देश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पत्र लिखकर विभिन्न राज्यों में अप्रैल – मई 2021 में होने वाले चुनावों की तारीखें भी साझा करने को कहा है। इससे सीआईएससीई को 2021 की आईसीएसई (दसवीं) और आईएससी (बारहवीं) परीक्षाओं की समय – सारिणी तय करने में मदद मिलेगी जिससे तारीखें चुनावों से न टकराएं। इससे परीक्षा के दौरान किसी भी असुविधा को दूर करने में मदद मिलेगी।

ऑनलाइन आयोजित हुआ वीएमएस का मेधावी विद्यार्थी सम्मान समारोह

कोलकाता : विद्या मंदिर सोसायटी द्वारा इस साल का मेधावी विद्यार्थी सम्मान समारोह ऑनलाइन माध्यम पर आयोजित किया गया। जूम पर आयोजित इस सम्मान समारोह में बिड़ला हाई स्कूल तथा सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल के सीनियर सेकेंडरी विद्यार्थियों के लिए एआईएसएससीई 2019 -20 के रैंक धारकों को सम्मानित किया गया। गत 28 नवम्बर को आयोजित इस समारोह में अकादमिक स्तर पर सफलता प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को सम्मानित किया गया। इस समारोह में बिड़ला दम्पति, सिद्धार्थ बिड़ला तथा मीनाक्षी बिड़ला, विद्यामंदिर के महासचिव वी.एन. चतुर्वेदी, उप महासचिव मिस्टर बनर्जी के अतिरिक्त बीएचएस की निदेशक, प्रिंसिपल लवलीन सैगल तथा कोएली दे तथा सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल ने भाग लिया। समारोह में बोर्ड परीक्षाओं में दोनों शिक्षण संथानों के साइंस, कॉमर्स और ह्यूमैमनिटीज संकाय के अव्वल रहने वाले मेधावी विद्यार्थियों को सम्मानित किया गया। सभी पुरस्कार विजेताओं को 30 ग्राम शुद्ध चांदी के पदक और बीएचएस अल्यूमनी की तरफ से 500 रुपये का गिफ्ट कूपन प्रदान किया गया। बीएचएस के ह्यूमैनिटीज संकाय के टॉपर रायन चक्रवर्ती, साइंस की टॉपर किन्ज्वल भट्टाचार्य, संयुक्त कॉमर्स टॉपर ऋषभ अग्रवाल तथा नमन भूतोड़िया के अतिरिक्त इकोनॉमिक्स में शत – प्रतिशत अंक पाने वाले अमन कुमार शाह तथा कॉमर्स के सेकेंड टॉपर जतिन पोद्दार को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत गणेश वन्दना से की गयी। विद्या मंदिर सोसायटी के महासचिव ब्रिगेडियर वी.एन. चतुर्वेदी ने भी विचार रखे।

रोशनी नादर बनीं देश की सबसे धनी महिला, मुम्बई की महिलाएं सबसे धनी

कोटक वैल्थ और हुरुन इंडिया ने जारी की ’कोटक वेल्थ हुरुन-लीडिंग वेल्दी वुमन’ रिपोर्ट का दूसरा संस्करण

इस सूची में आठ महिलाएं पद्म पुरस्कारों से सम्मानित हैं 

कोलकाता : रोशनी नादर मल्होत्रा, एचसीएल टेक्नोलॉजीस देश की सबसे धनी महिला हैं। कोटक वेल्थ हुरुन – लीडिंग वेल्दी वुमन में यह बात सामने आयी है। उनके बाद किरण मजुमदार-शॉ, बायोकॉन और लीना गाँधी तिवारी, यूएसवी का नाम आता है। किरण मजुमदार-शॉ, बायोकॉन इस सूची में स्वयं अपने प्रयासों से अमीर बनने वाली सबसे धनी महिला हैं।
इस सूची में आठ अरबपति महिलाएं शामिल हैं, 38 महिलाओं की सम्पत्ति रु. 1,000 करोड़ व उससे अधिक हैं।
इस सूची की 19 महिलाओं के नाम हुरुन इंडिया रिच लिस्ट 2020 में भी शामिल हैं तथा 6 महिलाओं ने हुरुन ग्लोबल रिच लिस्ट 2020 में भी जगह बनाई है। इस सूची में आठ महिलाएं पद्म पुरस्कारों से सम्मानित हैं ।
इस सूची में 31 महिलाएं अपनी खुद की कोशिशों से अमीर बनी हैं -इनमें से 6 महिलाएं प्रोफेशनल मैनेजर और 25 उद्यमी हैं। 6 महिला उद्यमी ऐसी भी हैं जो स्टार्टअप ईको सिस्टम से नाता रखती हैं और इनमें से दो महिलाओं ने तो यूनिकॉर्न कम्पनियां खड़ी की हैं। उनके नाम हैं – नायका की फाल्गुनी नायर और बायजूज़ के थिंक एंडलर्न की दिव्या गोकुल नाथ। 19 महिलाएं 40 वर्ष से कम आयु की हैं।


कनिका टेकरीवाल, जैट सैट गो; अंजना रेड्डी, यूनिवर्सल स्पोर्ट्स बिज़ और विधि शांघवी, सनफार्मा इस सूची में सबसे युवा महिलाएं हैं । फार्मास्यूटिकल्स और टेक्सटाइल्स, अपैरल और ऐक्सैसरीज़ का 25 प्रतिशत आंकड़े के साथ इस सूची में प्रभुत्व है । इनके बाद हेल्थकेयर व फाइनेंशियल सर्विसिस का नंबर आता हैजो क्रमशः 9 प्रतिशतऔर 8 प्रतिशत है ।
मुम्बई से सबसे ज़्यादा महिलाएं (32) इस सूची में हैं। इसके बाद नयी दिल्ली (20) और हैदराबाद (10) का नम्बर आता है । सूची की 15 प्रतिशत महिलाएं ऐसी हैं जो महानगरों से नहीं हैं। लोकोपकार के लिए ज़्यादातर महिलाएं शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र को पसंद करती हैं। इनमें से चार महिलाओं का शुमार हुरुन इंडिया फिलानथ्रोपीलिस्ट 2020 में भी हुआ है।
ऑवसांजं में कोटक महिन्द्रा बैंक (कोटक) के प्रभाग कोटक वेल्थ मैनेजमेंट और हुरुन इंडिया द्वारा जारी कोटक वैल्थ हुरुन-लीडिंग वैल्दी वुमन की रिपोर्ट भारत की सबसे अमीर महिलाओं के बारे में सूचनाओं का संकलन है। यह सूची 30 सितम्बर 2020 को इन महिलाओं की कुल सम्पत्ति के आधार पर तैयार की गयी है । 2020 संस्करण की रिपोर्ट खासतौर पर उन महिलाओं पर केन्द्रित है जो उद्यमी हैं, पेशेवर हैं और अपने पारिवारिक व्यापार में सक्रिय भूमिका निभाती हैं।आँकड़ों के विश्लेषण से तैयार की गयी यह रिपोर्ट भारतीय महिलाओं के बीच सम्पत्ति निर्माण को समझने का प्रयास है। इसके द्वारा भारत की 100 शीर्ष उद्यमी, पेशेवर व कारोबारी महिलाओं की सफलता का उत्सव मनाया गया है। इस सूची में मौजूद महिलाओं की औसत सम्पत्ति रु. 2,725 करोड़ के लगभग है। इस रैंकिंग के लिए रु. 100 करोड़ की सम्पत्ति को न्यूनतम पैमाना रखा गया है।
कोटक महिन्द्रा बैंक की सीईओ (वैल्थ मैनेजमेंट) ओइशर्या दास, ने कहा, ’’बीते दो दशकों में एक निर्णायक विकास यह हुआ है कि महिलाएं सम्पत्ति निर्माता के रूप में बड़े पैमाने पर आगे आई हैं । कोटक वेल्थ हुरुन-लीडिंग वेल्दी वुमन 2020 रिपोर्ट एक दिलचस्प और प्रेरक रुझान का खुलासा करती है-अब पहले से ज़्यादा तादाद में महिलाएं आगे आकर सफलता की कहानियां  लिख रही हैं, ये कामयाब महिलाएं पूरे भारत के विभिन्न शहरों में और विविध उद्योगों में सक्रिय हैं । भारत की आकांक्षा है 2025 तक 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनना और इस लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में महिलाएं सम्पत्ति निर्माता के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।’’
हुरुन इंडिया के एमडी और प्रधान शोधकर्ता अनस रहमान ने कहा, ’’कोटक वेल्थ हुरुन-लीडिंग वेल्दी वुमन 2020 में भारत की सबसे सफल महिला लीडर शामिल हैं। उनकी कहानियां पढ़ी और साझी की जानी चाहिए। वह क्या है जो उन्हें कामयाब बनाता है? वे ऐसा कैसे कर पाती हैं? मुझे उम्मीद है कि यह सूची और अधिक महिलाओं को उद्यमी बनने, कारोबार चलाने और कम्पनियों की अगुआई करने के लिए प्रेरित करेगी।’’