नयी दिल्ली : सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एसआईआई) के सीईओ अदार पूनावाला ने कहा कि जनवरी से देश में वैक्सीनेशन की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। पूनावाला ने उम्मीद जताई कि इस महीने के आखिर तक उनकी कंपनी की ओर से बनाई गयी वैक्सीन को इमरजेंसी यूज के लिए मंजूरी मिल सकती है। हालांकि, बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के लिए लाइसेंस मिलने में अभी देर होगी।
इकोनॉमिक टाइम्स ग्लोबल बिजनेस समिट में बोलते हुए पूनावाला ने कहा कि एक बार देश की 20% आबादी को वैक्सीन लग जाएगी तो अगले साल अक्टूबर तक हालात सामान्य होने लगेंगे। लोगों की जिंदगी पुरानी पटरी पर लौट सकती है।
देश में कोरोना के मरीजों की संख्या में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। 24 घंटे में 3 हजार 138 एक्टिव केस कम हुए हैं। देश में अब कुल 3 लाख 54 हजार 904 (कुल संक्रमितों का 3.62%) एक्टिव केस हैं, यानि इतने मरीजों का इलाज चल रहा है। यह पिछले 148 दिन में सबसे कम है। इससे पहले 17 जुलाई को देश में 3 लाख 59 हजार 679 एक्टिव केस थे।
परीक्षण के मामले में राजस्थान की हालत सबसे खराब है। यहाँ 7.7 करोड़ लोगों में अब तक महज 6.16% लोगों की जाँच ही हो पाई है। आबादी के लिहाज से देश के सबसे बड़े राज्य यानी उत्तर प्रदेश में 9.37% यानी 2.1 करोड़ लोगों की जाँच हो चुकी है। देश में अब तक 98 लाख 57 हजार 380 लोग कोरोना की चपेट में आ चुके हैं। इनमें 3 लाख 54 हजार 904 मरीजों का इलाज चल रहा है, जबकि 93 लाख 56 हजार 879 लोग ठीक हो चुके हैं। 1 लाख 43 हजार 055 लोगों की मौत हो चुकी है।
जनवरी से मिल सकती है कोरोना की वैक्सीन
तो इस तरह कोलकाता की जगह दिल्ली बनी राजधानी
‘हमें भारत की जनता को ये बताते हुए खुशी हो रही है कि सरकार और उसके मंत्रियों की सलाह पर देश को बेहतर ढंग से प्रशासित करने के लिए ब्रिटेन की सरकार भारत की राजधानी को कलकत्ता (अब कोलकाता) से दिल्ली स्थानांतरित करती है।’ ये शब्द थे ब्रिटेन के किंग जॉर्ज-पंचम के, जो उन्होंने 12 दिसंबर 1911 की सुबह 80 हजार से ज्यादा की भीड़ के सामने कहे थे। किंग जॉर्ज-पंचम ब्रिटेन के पहले राजा थे, जो भारत आए थे। उनके साथ क्वीन मैरी भी आई थीं।
किंग जॉर्ज-पंचम और क्वीन मैरी के लिए दिल्ली में दरबार भी सजाया गया था। इस दरबार में देशभर के राजे-रजवाड़े और राजघराने शामिल हुए थे। दरबार लगने से एक दिन पहले पूरी दिल्ली जगमगा उठी थी। कोई विरोध न हो, इसके लिए गिरफ्तारियां भी हो रही थीं। उस दिन छुट्टी भी घोषित हो गई। हर तरफ पुलिस की नाकाबंदी लगा दी गई। दरबार में जब किंग जॉर्ज-पंचम ने दिल्ली को राजधानी घोषित किया, तो उस दिन सभी घरों को ऐसे सजाया गया मानो दिवाली हो। इस दिन को खास बनाने के लिए बिजली का भी खास इंतजाम किया गया था।अंग्रेज दिल्ली पर अपनी छाप छोड़ना चाहते थे और ऐसा उन्होंने किया भी। अंग्रेजों ने यहां वायसराय हाउस और नेशनल वॉर मेमोरियल जैसी इमारतें बनाईं, जिन्हें आज हम राष्ट्रपति भवन और इंडिया गेट के नाम से जानते हैं। दिल्ली को डिजाइन करने का जिम्मा ब्रिटिश आर्किटेक्ट एडवर्ड लुटियंस और सर हर्बट बेकर को मिला। इनको 4 साल में पूरी दिल्ली को डिजाइन करना था, लेकिन इसमें लग गए 20 साल। 13 फरवरी 1931 को दिल्ली का राजधानी के रूप में उद्घाटन किया गया।
दिल्ली को राजधानी बनाने की वजह भी खास थी। हुआ ये था कि 1905 में जब बंगाल का बंटवारा हुआ, तो इससे अंग्रेजों के खिलाफ देश में विद्रोह शुरू हो गया। उस समय कलकत्ता (अब कोलकाता) ही भारत की राजधानी हुआ करती थी, लेकिन बंटवारे की वजह से पैदा हुआ विद्रोह शांत ही नहीं हो रहा था। इसी वजह से अंग्रेजों ने राजधानी दिल्ली को बना दिया। दिल्ली के बारे में उस समय कहा जाता था कि कोई भी इस पर ज्यादा समय तक राज नहीं कर सकता। ऐसा हुआ भी। दिल्ली को राजधानी घोषित करने के 36 साल के भीतर ही अंग्रेजों ने भारत छोड़ दिया और 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हो गया। आजादी के बाद दिल्ली को राजधानी घोषित किया गया।
प्राकृतिक खेती से कम किया खाद और रासायनिक दवाओं का खर्च
अब जीरो बजट खेती का लक्ष्य
सूरत : गांधीजी की स्वराज की कल्पना गाय और ग्राम आधारित थी। क्योंकि, भारत में मानव जीवन के लिए गाय की उपयोगिता का उल्लेख धर्म-शास्त्रों और वेद-पुराणों में भी मिलता है। वहीं, पुरातन काल की खेती गौ आधारित ही थी, जिसका स्वरूप अब बदलता जा रहा है। लेकिन, सूरत जिले के वडिया गांव के एक किसान ने गौ आधारित खेती ही अपनाई। अच्छी फसल के साथ दूसरा सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि इससे उनकी फसल का खर्च 60 हजार रुपए से घटकर 3-4 हजार रुपए तक आ गया है।
रासायनिक खाद और दवाईयों को पूरी तरह से त्याग चुके किसान प्रकाशभाई बताते हैं, ‘मेरे पास चार बीघा जमीन है, जिसमें भिंडी, बैंगन, प्याज, मिर्च और अन्य हरी सब्जियां उगाता हूं। जनवरी महीने में भिंडी के बीज बोए थे। तब मैंने खेत में पेस्टीसाइड का उपयोग नहीं किया। सिर्फ गाय के गोबर और गो-मूत्र का ही उपयोग किया और देखा कि कम समय में भी अच्छी फसल तैयार हो गई। फसल का टेस्ट भी पहले की तुलना में बहुत अच्छा था, जिसकी मुझे अच्छी कीमत भी मिली।
लागत 60 हजार से घटकर 2-3 हजार हुई
प्रकाशभाई बताते हैं कि इस प्रयोग के बाद रासायनिक खाद और दवाइयों का काफी खर्च बच गया है। जहाँ पहले 60 हजार रुपये तक खर्च हो जाते थे, उसकी जगह अब एक फसल में 2 से 3 हजार रुपये ही खर्च हुए। इसी के बाद से उन्होंने प्राकृतिक खेती करनी शुरू कर दी और अब लक्ष्य जीरो बजट पर लाने का है।
घर पर ही जीवामृत, दशपर्णीअंक जैसी दवाएं बनाते हैं
प्रकाशभाई पटेल ने एक साल पहले ही प्राकृतिक यानी की गौ आधारित खेती की शुरुआत की है। उन्होंने इसके लिए सात दिन की ट्रेनिंग भी ली थी। इसके बाद उन्होंने गांव के पास स्थित गौशाला से संपर्क किया और वहां से रोजाना गोबर और गो-मूत्र लाकर उसका उपयोग अपनी फसलों पर किया। फसलों पर इसका अच्छा फायदा होते देख प्रकाशभाई ने गिर नस्ल की दो गाय खरीदीं। घर पर ही जीवामृत, दशपर्णीअंक जैसी दवाएं बनाकर फसलों पर छिड़काव करना शुरू किया। प्रकाशभाई ने इसके लिए दूसरे किसानों को भी प्रोत्साहित किया। जब किसानों ने इसके बारे में जाना, तो वे भी प्रकाशभाई के रास्ते पर चल पड़े।
फसलों के प्रचार के लिए किसानों ने समूह भी बनाया
अब किसानों ने अपना एक समूह बनाया है। यह समूह रासायनिक खाद रहित फसलों को शहरों में ले जाकर लोगों को इसके बारे में बताता है, जिससे फसलों के अच्छे दाम मिल सकें और दूसरे किसान भी प्राकृतिक खेती करने की ओर अग्रसर हों। इतना ही नहीं, इस ग्रुप ने यह भी व्यवस्था कर रखी है कि कोई भी किसान इस देसी दवा और खाद बनाने की ट्रेनिंग लेने के लिए उनसे संपर्क कर सकता है।
गौ आधारित खेती से शरीर से लेकर जमीन तक को फायदा
प्रकाशभाई बताते हैं कि गौ आधारित खेती से रोग-प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है, क्योंकि फसलों पर पेस्टीसाइड का उपयोग नहीं होता। गोबर के प्रयोग से जमीन ठोस नहीं होती और हल भी आसानी से चलते हैं। वहीं, इसके जरिए क्लाइमेट चेंज और ग्लोबल वार्मिंग की समस्या से भी निपटा जा सकता है। क्योंकि, खेतों में पेस्टीसाइड का उपयोग धीरे-धीरे जमीन की उर्वरता को खत्म कर देता है। पेस्टिसाइड वाली फसलों से कैंसर, डायबिटीज जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है। वहीं, हम अगर प्राकृतिक खेती करें तो इन समस्याओं से निपटने के अलावा रासायनिक खाद और महंगी दवाओं का खर्च भी बचा सकते हैं। वहीं, जैविक खाद तैयार करना भी बहुत आसान है। सिर्फ 6-7 दिनों के प्रशिक्षण से ही इसे किसान खुद घर पर तैयार कर सकते हैं।
(साभार – दैनिक भास्कर)
न्यू नॉर्मल : अपनी शादी दिखायी, मेहमानों के घर पहुँयाया खाना
कोरोना काल के चलते आए दिन शादी में तरह-तरह का बदलाव नजर आ रहा है। कोई शादी के लंबे रस्मों-रिवाज को एक ही दिन में पूरा कर रहा है तो कहीं लोग वीडियो कॉल के जरिये मेहमानों से दूल्हा-दुल्हन आशीर्वाद लेते नजर आ रहे हैं। इसी बीच तमिलनाडु के एक दम्पति की शादी का खास तरीका सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।
तमिलनाडु के दम्पति ने अपनी शादी में मेहमानों के लिए न सिर्फ वेबकास्ट का आयोजन किया बल्कि मेहमानों के घर खाना पहुँचाया भी। हाल ही में एक ट्विटर यूजर ने इस शादी का इनविटेशन कार्ड सोशल मीडिया पर पोस्ट किया। उन्होंने शादी के मेन्यू का भी साथ में भेजे। शादी में आमंत्रित मेहमानों के घर चार रंग-बिरंगी और खूबसूरत डलिया भेजी गयी।
सोशल मीडिया पर यह पोस्ट वायरल हो रही है। यूजर्स कोरोना काल में शादी के इस आइडिया से बहुत इम्प्रेस हुए। एक यूजर ने कहा – ‘ये बहुत अच्छा आइडिया है’। किसी ने लिखा ‘अगर शादी-ब्याह के दौरान खाने की बर्बादी रोकना है तो इस आइडिया को कोरोना काल के बाद भी अपनाना चाहिए’। दम्पति ने भेजे गये भोजन के साथ ये भी बताया कि इस खाने के साथ में पैक किए गए केले के पत्ते पर किस जगह कौन सी चीज रखनी चाहिए। एक यूजर ने कहा कि इस बारे में उसे पहले नहीं पता था।
खाना बच गया है तो करें इस तरह इस्तेमाल
रात में बचे हुए खाने का सही इस्तेमाल कैसे करें, ये बात बहुत कम लोग जानते हैं। अगर घर में दाल, चावल या सब्जी बच गई हैं तो इन चीजों से एक नई चीज बनाएं। इन चीजों में यूज होने वाली सामग्री घर में आसानी से मिल जाती है।
बचे हुए चावल से कुरकुरे पकौड़े बनाएं। इसे बनाने के लिए चावल में बेसन, बारीक कटा प्याज, बारीक कटी हरी मिर्च, कटे धनिये की पत्ती, नमक और लाल मिर्च मिलाएं। सबसे पहले चावलों को ग्राइंडर में डालकर अच्छी तरह पीस लें। फिर एक बर्तन में पिसे चावलों सहित सभी सामग्रियों को डालकर अच्छे से मिलाएं। इन पकौड़ों में डीप फ्राई करके सॉस या चटनी के साथ सर्व करें।
अगर रात को बनी दाल बच जाए तो इसका उपयोग परांठा बनाने में करें। इसे बनाने के लिए दो कप आटा लेकर उसमें बची हुई दाल, स्वादानुसार नमक, लाल मिर्च, कटा हुआ धनिया और तेल मिलाकर आटा गूंध लें। इस आटे की लोई बनाकर पराठें बनाएं।
सादी सब्जी या ग्रेवी वाली डिश से भी स्वादिष्ट कटलेट बनाए जा सकते हैं। इसे बनाने के लिए सब्जी का पानी सुखा लें। ग्रेवी वाली सब्जी से कटलेट बना रही हैं तो इसे ड्राई करके इसमें ब्रेड का चूरा मिला लें। इसे मिलाकर करके कटलेट का शेप दें। पैन में तेल गर्म करके ये कटलेट फ्राई करें।
सलमा कुरैशी ने संस्कृत में की पीएचडी, बनना चाहती हैं प्रोफेसर
भावनगर : सलमा कुरैशी गुजरात यूनिवर्सिटी की मुस्लिम छात्रा है। उन्होंने संस्कृत में पीएचडी की है। इस विश्वविद्यालय से पीएचडी करने वाली वे पहली मुस्लिम महिला हैं। उन्हें गीता, पुराण और हिंदी धर्मशास्त्र बचपन से पढ़ना अच्छा लगता था इसलिए स्कूल के दिनों में ही संस्कृत उनका प्रिय विषय था। उन्होंने 2017 में पीएचडी की रिसर्च के लिए दाखिला लिया था। सलमा की बड़ी बहन भी इसी विषय में पीएचडी कर रही हैं। भावनगर यूनिवर्सिटी से एम ए में उन्हें गोल्ड मेडल मिला था। पीएचडी पूरी करने में सलमा को तीन साल लगे।
सलमा कहती हैं -”मेरी दिलचस्पी संस्कृत में देखते हुए घर के लोगों ने कभी इस विषय को लेकर कोई एतराज नहीं किया। उन्होंने हमेशा मेरा साथ दिया। हालांकि हिंदू धर्म के अधिकांश स्कल्पचर संस्कृत में होने की वजह से इसे इसी धर्म से जोड़ा जाता है। लेकिन मेरा मानना है कि भाषा का संबंध किस धर्म से नहीं होता। किसी भी विद्यार्थी को उसकी रुचि के अनुसार भाषा चुनने का हक है”।
सलमा को इस बात का अफसोस है कि आज की शिक्षा प्रणाली में पुराने जमाने की तरह शिक्षकों को वो इज्जत नहीं दी जाती, जिसकी वे हकदार हैं। उनका कहना है कि संस्कृत को एक अनिवार्य भाषा के तौर पर स्कूलों में लागू करना चाहिए।
स्त्री हो या पुरुष दोनों के के कंधों पर बराबर- बराबर होना चाहिए श्रम का भार

ऐ सखी सुन – भाग 8
सभी सखियों को मेरा नमस्कार। उम्मीद है सखियों कि आप सब कुशलतापूर्वक होंगी। सखियों, सर्दी का मौसम आ गया है और इस मौसम में खुद को ही नहीं पूरे परिवार को बचा कर रखने की जिम्मेदारी हम स्त्रियों के कंधों पर ही होती है इसलिए सर्दी के मौसम में बरती जाने वाली तमाम सावधानियों को बरतते हुए आप सब कुशलतापूर्वक अपने परिवार के साथ मौसम का आनंद उठाएँ।
सखियों सर्दी ही नहीं हर मौसम में स्त्रियों की अलग-अलग जिम्मेदारियाँ होती हैं। जिस तरह देश का किसान सर्दी-गर्मी, जाड़ा -बरसात हर मौसम का डटकर मुकाबला करते हुए अपनी खेती किसानी के काम में लगा रहता है ताकि देश भर के लोगों के मुँह तक निवाला और पेट तक पुष्टिकर भोजन पहुँच सके। या हमारे सैनिक देश की सीमा की सुरक्षा में प्राणपण से तैनात रहते हैं तकि देश के नागरिक अपने- अपने घरों में सुख चैन की साँस और नींद ले सकें। सखियों, वही काम घरेलू मोर्चे पर स्त्रियाँ करती हैं। मौसम कोई भी हो और स्त्री किसी भी श्रेणी की क्यों ना हो, संपन्न घर की या फिर हाशिए के उस पार की। कामकाजी हो या घरेलू, तपती गर्मी में जिस तरह पसीने से तरबतर होती हुई भी वह सबके लिए रोटी -पानी के इंतजाम में लगी रहती है, यह निश्चित तौर पर एक महत्वपूर्ण काम है। उसी तरह उन गाँवों में जहाँ अभी तक गैस के चूल्हे सुविधा नहीं पहुँच पाई है, बरसात के मौसम में सीली हुई लकड़ियों को सुलगाने की कोशिश में आँखों से आँसू बहाती हुई भी सब को भोजन मुहैया कराने में दत्तचित्त रहती है। ऐ सखी सुन, मुझे ही नहीं बहुत से लोगों का यह मानना है कि स्त्रियाँ ना हों या फिर वह अपने काम पर मुस्तैद ना हों तो समाज की स्थिति न जाने क्या होगी। राजस्थान के उन तमाम गाँवों में जहाँ घर पर पानी की सुविधा नहीं होती है, जल लाने ने के लिए कड़ी धूप में स्त्रियाँ बहुत दूर तक जाती हैं और सर पर मटके पर मटका धर घर लौट कर आती हैं ताकि घर के लोगों की प्यास बुझ सके तथा उनकी अन्य जरूरतें पूरी हो सकें। उसी तरह भरी बरसात और हाड़ गलानेवाली ठंड में भी उन्हें यही प्रक्रिया दोहरानी पड़ती है। लेकिन इसके बावजूद समाज स्त्रियों के प्रति न जाने क्यों इतना नाशुक्रा या असहिष्णु होता है कि उन्हें उनके इस अनवरत श्रम के लिए अनथक परिश्रम के लिए धन्यवाद ज्ञापन करना तो दूर की बात है उनके काम की जरा कद्र तक नहीं करता। बल्कि कई बार तो घरेलू स्त्रियों को यह भी सुनने को मिलता है कि ‘करती क्या हो, दिन भर ? चावल उबाल कर रख देती हो या रोटियाँ थाप देती हो, इसके अलावा सारे दिन पड़ी-पड़ी सोती रहती हो या सहेलियों से गपशप करती हो।’ आज के संदर्भ में कहना हो तो कहा जाएगा कि ‘दिन भर पड़ी पड़ी टीवी सीरियल देखती हो।’ और अगर स्त्री कामकाजी हो जो घर और बाहर दोनों मोर्चों पर जो जूझती हो उसे यह कहा जाता है ‘सज संवर कर निकल जाती हो, सारा दिन बाहर बिताकर लौट आती हो। कभी क्या परिवार वालों की इच्छा और फरमाइशों का ध्यान करती हो ? हुंह रहने भी दो..अपनी ही दुनिया में मगन रहती हो।’ सखियों, हमारे समाज की यह रवायत है कि उन्हीं पर असहनीय अत्याचार किया जाता है जो इसे सहते हैं। लेकिन सहने की भी एक सीमा होती है। सहते -सहते कभी न कभी जब सहनशीलता का बाँध टूट जाता है और स्त्री प्रतिकार करने की स्थिति में आती है, अपने ही परिवार जनों के अत्याचारों के विरोध में मुखर होती है, आवाज उठाती है तो उसे अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता। उसकी आलोचना की जाती है और ऐसी स्त्रियों को समाज के लिए खतरा माना जाता है क्योंकि मान लिया जाता है कि आज वह अपना घर तोड़ रही है तो कल दूसरी स्त्रियों को भी इसके लिए उत्साहित करेगी या फिर दूसरे शब्दों में कहें तो यह खुद तो बिगड़ी ही है इसके बाद पूरे समाज को बिगाड़ने पर तुल जाएगी।
सुनो सखियों, कई बार मुझे यह भी लगता है यह समाज ऐसा इसलिए कर पाता है क्योंकि स्त्रियाँ आपस में संगठित नहीं होतीं या फिर उनके बीच जो स्नेह और सौहार्द होना चाहिए उसके पनपने के रास्ते में कई बार पुरूषतांत्रिकसमाज बाधक सिद्ध होता है। शायद इसलिए कि जब तक वह एक दूसरे के खिलाफ होंगी या आपस में लड़ती रहेंगी तब तक सामाजिक बेड़ियों को तोड़ने की दिशा में कदम नहीं बढ़ा पाएंगी। तो लब्बोलुआब यह है सखियों कि जब तक स्त्रियां संगठित होकर साहस के साथ अपने दुख तकलीफ को बयान करना नहीं शुरू करेंगी, परिवार के सामने सहयोग की मांग नहीं रखेंगी तब तक परिवार को उनकी अहमियत का अहसास भी नहीं होगा और वह उनकी मांगों को स्वीकार भी नहीं करेगा। जब तक परिवार हो या समाज, श्रम विभाजन के नियमों को स्वीकार नहीं करेगा तब तक हम समाज को स्वस्थ और सुंदर समाज नहीं मान सकते। स्त्री हो या पुरुष श्रम का भार दोनों के के कंधों पर बराबर- बराबर होना चाहिए। ऐसा नहीं हो कि एक व्यक्ति तो मेहनत कर कर के मर जाए और दूसरा आराम से पाँव पर पाँव धरे मेहनत के सुस्वादु फल को ग्रहण करके मेहनत करनेवाले पर अहसान करें। सखियों, कई बार स्त्रियों की अपनी मानसिक बुनावट भी उनकी दशा के लिए जिम्मेदार होती है। उन्हें जन्म के साथ घुट्टी में ही ज्ञान का यह घूँट पिलाया जाता है कि उनका काम है, दूसरों की सेवा करना दूसरों से सेवा लेना नहीं। लेकिन यहाँ सवाल सेवा करने या करवाने का नहीं है, श्रम के विभाजन का है और जब तक स्त्री स्वयं अपने अतिरिक्त भार की शिकायत करते हुए उसे कम करने की मांग को सामने नहीं रखेगी तब तक परिवार के अन्य सदस्य उसकी पीड़ा को बाँटने और उसे कम करने की कोशिश नहीं करेंगे। सखियों, इसकी शुरुआत स्त्री को अपने बच्चों को उचित शिक्षा देकर भी करनी होगी, स्वयं अपने बेटे और बेटी के बीच कोई विभाजन न करके। सभी बच्चों को न केवल समान सुविधाएँ मिलनी चाहिएँ बल्कि उन पर समान जिम्मेदारियाँ भी डालनी चाहिए ताकि ये बच्चे बड़े होकर स्वयं स्वस्थ समाज के निर्माण में सहायक सिद्ध हों। फिलहाल विदा सखियों। अगले हफ्ते फिर मुलाकात होगी।
याद किये गये कवि मंगलेश डबराल और अस्ताद देबू
कोलकाता : महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के क्षेत्रीय केंद्र, कोलकाता में प्रतिष्ठित कवि मंगलेश डबराल और समकालीन नृत्यकार अस्ताद देबू के असमय निधन पर एक शोक सभा की गई। सावित्रीबाई फुले सभा कक्ष में आयोजित इस शोक सभा में केंद्र के प्रभारी डॉ सुनील कुमार ‘सुमन’ ने मंगलेश डबराल के नहीं रहने को हिंदी साहित्य की बड़ी और अपूरणीय क्षति बताया। उन्होंने कहा कि मंगलेश जी जितने प्रतिबद्ध व लोकप्रिय रचनाकर थे, उतने ही सहज-सरल इंसान भी। उन्होंने कविता में ही नहीं, बल्कि पत्रकारिता में भी नए मापदंड स्थापित किए थे। अस्ताद देबू पर केंद्र के सहायक संपादक राकेश श्रीमाल ने कहा कि उन्होंने भारत में समकालीन नृत्य की शुरुआत की थी और उसे ऊंचाइयों पर पहुचाया था। इस शोक सभा में केंद्र के कर्मी डॉ आलोक कुमार सिंह और सुखेन शिकारी भी उपस्थित थे। इसमें अंत में दो मिनट का मौन धारण करके श्रद्धांजलि अर्पित की गयी।
कोविड – 19 पीड़ितों की मदद के लिए आगे आये यूरो स्कूल के विद्यार्थी
हैबिटियट फॉर ह्यूमैनिटी के साथ जुटाएंगे 32 लाख रुपये
कोलकाता : के -12 स्कूलों का अग्रणी नेटवर्क यूरो स्कूल कोविड -19 पीड़ितों की सहायता के लिए आगे आया है। इसके लिए स्कूल ने हैबिटिएट फॉर ह्यूमैनिटी नामक अन्तरराष्ट्रीय गैर सरकारी संगठन से हाथ मिलाया है। इस साल क्रिसमस पर यूरो स्कूल के विद्यार्थी इस संगठन के साथ देश भर में कोविड -19 पीड़ितों की मदद करेंगे। गौरतलब है कि यूरो स्कूल के 6 शहरों में स्कूलों का बड़ा नेटवर्क है। स्कूल के 8 परिसरों से 1500 विद्यार्थी 45 दिन के भीतर 32 लाख रुपये की बड़ी राशि इस परियोजना के तहत एकत्र करेंगे। यह हैबिटियट फॉर ह्यूमैनिटी द्वारा किसी भी स्कूल के नेटवर्क के साथ क्राउड फंडिंग के जरिए एकत्र की गयी सबसे बड़ी रकम होगी। इसके लिए मार्गदर्शन भी हैबिटियट ही देगा। यूरो किड्स ग्रुप के के -20 स्कूल्स के सीईओ राहुल देश देशपांडे ने कहा कि महामारी ने समाज के बड़े तबके को प्रभावित किया है। विद्यार्थियों को संवेदनशील बनाने के लिए यह कदम उठाया गया है ताकि वे वंचित लोगों की पीड़ा को समझ सकें। उम्मीद है कि इस छोटे से प्रयास का प्रभाव बड़ा होगा। इस पहल से विद्यार्थियों को हैबिटियट यंग लीडर्स (एचवाईएलबी) – एशिया पैसिफिक वॉलेंटियर सर्टिफिकेट तथा सबसे अधिक फंड उगाहने वाले बच्चों को विश्व के प्रख्यात विश्वविद्यालयों के लिए अनुशंसा पत्र दिये जाएंगे। हैबिटियट फॉर इंडिया के प्रबन्ध निदेशक राजन सैमुअल ने कहा कि बच्चों को अगर सही परवरिश मिले तो वे जिम्मेदार विश्व नागरिक बनेंगे। यूरो किड्स के साथ हुई साझीदारी पर भी उन्होंने खुशी जतायी।
हिंदी विश्वविद्यालय कोलकाता केंद्र में ऑनलाइन कक्षाएँ शुरू
कोलकाता : महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के साल्ट लेक, सेक्टर-तीन, ईज़ेडसीसी-ऐकतान परिसर में स्थित क्षेत्रीय केंद्र, कोलकाता में एमए हिंदी साहित्य के नए सत्र की ऑनलाइन कक्षाएँ शुरू हो गयी हैं। केंद्र के प्रभारी डॉ. सुनील कुमार ‘सुमन’ ने बताया कि नवंबर के पहले हफ्ते से ये कक्षाएँ मुख्यालय वर्धा से ही संचालित हो रही थीं। अब कोलकाता केंद्र ने अलग से इसका संचालन शुरू कर दिया है। इस बार मुख्यालय वर्धा से सहायक प्रोफेसर डॉ. हरप्रीत कौर भी नयी अध्यापिका के रूप में केंद्र से जुड़ गई हैं। डॉ हरप्रीत कौर हिंदी और पंजाबी की जानी-मानी कवयित्री-लेखिका एवं अनुवादक हैं। आपकी हिंदी एवं पंजाबी में एक-एक काव्य संग्रह, एक अनुदित काव्य संग्रह एवं अनुवाद पर आलोचनात्मक पुस्तक छपी हुई है। आपको साहित्य अकादमी, नयी दिल्ली एवं भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता का युवा पुरस्कार मिल चुका है। डॉ सुनील ने बताया कि केंद्र के विद्यार्थियों के अकादमिक संवर्द्धन के लिए कोरोना काल में भी हम ऑनलाइन संगोष्ठियाँ और दूसरे आयोजन करते रहेंगे।




