Thursday, April 9, 2026
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कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन ‘अपवाद’, जल्द समाधान की उम्मीद: तोमर

नयी दिल्लीः केंद्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने बुधवार को राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर तीन कृषि कानूनों के खिलाफ हो रहे प्रदर्शन को ‘‘अपवाद’’ बताया और कहा कि यह ‘‘एक राज्य तक सीमित’’ है. हालांकि उन्होंने इस मामले के जल्द समाधान की उम्मीद भी जताई। तीन कृषि कानूनों का जिक्र करते हुए तोमर ने कहा कि कृषि क्षेत्र में हुए हालिया सुधारों से देश में उत्साह का वातावरण है। वाणिज्य एवं उद्योग मंडल एसोचैम के एक सम्मेलन को डिजीटल माध्यम से संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि जो प्रदर्शन हो रहे हैं वह अपवाद है और वह एक राज्य तक सीमित है. हम वार्ता कर रहे हैं। मुझे जल्द समाधान निकलने की उम्मीद है। उन्होंने कहा कि एक तरफ जहां इन कानूनों का विरोध हो रहा है वहीं दूसरी तरफ लाखों किसान इसके समर्थन में आ रहे हैं। तोमर ने इस अवसर पर पिछले छह सालों में केंद्र सरकार द्वारा किसानों के हित में उठाए गए कदमों की विस्तृत जानकारी दी और दावा किया कि इनसे किसानों की आय में वृद्धि होगी तथा कृषि फायदे का सौदा साबित होगी। केंद्रीय कृषि मंत्री तोमर ने कहा कि कोविड-19 महामारी के दौरान भी सरकार ने कृषि क्षेत्र के विकास के लिए कई कदम उठाए हैं। इनमें एक लाख करोड़ रुपए के कृषि इंफ्रास्ट्रक्चर फंड शामिल है। इसका उपयोग गांवों में कृषि आधारभूत ढांचा तैयार करने में किया जाएगा और 10 हजार किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) तैयार किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि कृषि और सहायक क्षेत्रों में इन प्रावधानों से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा और कृषि फायदे का सौदा बनेगा। तीन नए कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे किसान संगठनों और सरकार के मध्य जारी गतिरोध के बीच  तोमर ने कहा था कि सरकार ‘‘वास्तविक किसान संगठनों’’ के साथ वार्ता जारी रखने और खुले दिमाग से मसले का समाधान खोजने को तैयार है। उन्होंने यह भी कहा था कि जिस न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर सरकार की किसानों से उनकी उपज खरीदने की प्रतिबद्धता होती है, वह एक प्रशासनिक निर्णय होता और यह वर्तमान स्वरूप में इसी तरह जारी रहेगा।

विनिवेश को मिलेगी रफ्तार : निर्मला सीतारमण

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि विनिवेश को अब तेज गति मिलेगी। विनिवेश के लिए पहले ही कैबिनेट की जिसे मंजूरी मिल चुकी है, उन्हें पूरी ईमानदारी के साथ आगे बढ़ाया जाएगा। एसोचैम फाउंडेशन वीक के पहले दिन वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से सीतारमण बोल रही थीं। उन्होंने कहा कि विनिवेश से संबंधित दो प्रमुख गतिविधियों में तेजी आई है। अन्य सार्वजनिक क्षेत्र के कुछ बड़े उपक्रमों में सरकारी हिस्सेदारी को कम करने वाली चीजें एक साथ काम कर आगे बढ़ रही हैं। विनिवेश की गति अब और तेज रफ़्तार से आगे बढ़ेगी। इसके लिए जो मंजूरी पहले दी गई है उस पर फोकस किया जाएगा।

रक्षा सेक्टर में भी होगा विनिवेश

वित्त मंत्री ने कहा कि विनिवेश रक्षा, डीआरडीओ से संबंधित प्रयोगशालाओं का भी होगा। बैंकों या जहां मैं चाहती हूं कि वे कंपनियां बहुत अधिक पेशेवर तरीके से चलाए जाएं, उन सभी को भी बाजार से धन जुटाने में भी सक्षम होना चाहिए। सीतारमण ने कहा कि 2021-22 के केंद्रीय बजट में अर्थव्यवस्था को फिर से जीवित करने के लिए बुनियादी ढांचे पर उच्च सार्वजनिक खर्च (  हाई पब्लिक एक्सपेंडिचर)  को बनाए रखने पर जोर दिया जाएगा। वित्त मंत्री ने कहा कि हम निश्चित रूप से इंफ्रास्ट्रक्चर में सार्वजनिक खर्च पर गति को बनाए रखेंगे। वित्त मंत्री ने कहा कि यह एक असामान्य वर्ष रहा है और उधारी को ऐसे स्तरों पर रखा गया है ताकि सरकारी परियोजनाओं में जल्दी से पैसा वापस लगाया जा सके। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के खर्च को बनाए रखने के लिए इस कदम को पूरी तरह से मान्यता दी गई है। उन्होंने आगे कहा कि राष्ट्रीय निवेश और बुनियादी ढांचा कोष (एनआईआईएफ) विदेशी धन को आकर्षित करने की पूरी कोशिश कर रहा है।

मार्च -अप्रैल तक शुरू हो सकती है सिंगल विंडो प्रणाली : पीयूष गोयल

केन्द्रीय रेलवे मंत्री पीयूष गोयल ने कहा है कि उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (डीपीआईआईटी) केंद्र और राज्य और स्थानीय स्तर पर विभिन्न मंत्रालयों के बीच अनुमोदन के लिए एक एकल खिड़की प्रदान करने के लिए एक वास्तविक प्रयास कर रहा है, ” गोयल ने एसोचैम फाउंडेशन सप्ताह 2020 को सम्बोधित करते हुए यह बात कही। उन्होंने कहा, “हम इसे एकीकृत करने की कोशिश कर रहे हैं और मुझे उम्मीद है कि मार्च या अप्रैल तक, आपको वास्तविक सिंगल विंडो की प्रक्रिया दिखाई देगी जो आपके अनुपालन बोझ को कम कर सकती है, आपको अपने व्यवसायों को बढ़ावा देने और व्यवसायों पर ध्यान केंद्रित करने में मदद करेगी।” गोयल ने कहा कि सरकार की नीतियां उद्योग की अनुपालन आवश्यकताओं को आसान बनाने और सब कुछ डिजिटल और ऑनलाइन बनाने की दिशा में हैं। इनमें लाइसेंस और मंजूरी के लगातार नवीकरण के बोझ को कम करना भी शामिल है। गौरतलब है कि एसोचेम अपना 100वाँ स्थापना दिवस मना रहा है। एसोचेम के अध्यक्ष निरंजन हीरानन्दानी, सीनियर वाइस प्रेसिडेंट विनीत अग्रवाल तथा महासचिव दीपक सूद समेत चेम्बर के अन्य पदाधिकारियों ने भी अपने विचार रखे।

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दरभंगा राज – उल्लेखनीय है दरभंगा महाराजाधिराज रामेश्वर सिंह का योगदान

महाराजा सर रामेश्वर सिंह ठाकुर ( 16 जनवरी 1860 – 03 जुलाई 1929) दरभंगा के सन १८९८ से जीवनपर्यन्त महाराजा थे। अपने बड़े भ्राता लक्ष्मीश्वर सिंह की मृत्यु के उपरान्त वे महाराजा बने। वे भारतीय सिविल सेवा में भर्ती हुए थे और क्रमशः दरभंगा, छपरा तथा भागलपुर में सहायक मजिस्ट्रेट रहे। लेफ्टिनेन्ट गवर्नर की कार्यकारी परिषद में नियुक्त होने वाले वे पहले भारतीय थे।
वह 1899 में भारत के गवर्नर जनरल की भारत परिषद के सदस्य थे और 21 सितंबर 1904 को एक गैर-सरकारी सदस्य नियुक्त किये गए थें जो बंबई प्रांत के गोपाल कृष्ण गोखले के साथ बंगाल प्रांतों का प्रतिनिधित्व कर रहे थें।
वह बिहार लैंडहोल्डर एसोसिएशन के अध्यक्ष, ऑल इंडिया लैंडहोल्डर एसोसिएशन के अध्यक्ष, भारत धर्म महामंडल के अध्यक्ष, राज्य परिषद के सदस्य, कलकत्ता में विक्टोरिया मेमोरियल के ट्रस्टी, हिंदू विश्वविद्यालय सोसायटी के अध्यक्ष, एम.ई.सी. बिहार और उड़ीसा के सदस्य और भारतीय पुलिस आयोग के सदस्य (1902–03) थें। उन्हें 1900 में कैसर-ए-हिंद पदक से सम्मानित किया गया था। वह भारत पुलिस आयोग के एकमात्र सदस्य थें, जिन्होंने पुलिस सेवा के लिए आवश्यकताओं पर एक रिपोर्ट के साथ असंतोष किया, और सुझाव दिया कि भारतीय पुलिस सेवा में भर्ती एक ही परीक्षा के माध्यम से होनी चाहिए। केवल भारत और ब्रिटेन में एक साथ आयोजित किया जाएगा। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि भर्ती रंग या राष्ट्रीयता पर आधारित नहीं होनी चाहिए। इस सुझाव को भारत पुलिस आयोग ने अस्वीकार कर दिया।
उन्हें 26 जून 1902 को नाइट कमांडर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द इंडियन एंपायर (केसीआईई) के नाम से जाना गया, 1915 की बर्थडे ऑनर्स लिस्ट में एक नाइट ग्रैंड कमांडर (जीसीआईई) में पदोन्नत किया गया और उन्हें नाइट ऑफ द ऑर्डर ऑफ द ब्रिटिश एम्पायर का नाइट कमांडर नियुक्त किया गया।

महाराजा रामेश्वर सिंह एक तांत्रिक थें और उन्हें बौद्ध सिद्ध के रूप में जाना जाता था। वह अपने लोगों द्वारा एक राजर्षि माने जाते थें। ब्राह्मणों के महान महाराजा,श्रोत्रिय के वंशानुगत नेता होने के नाते, उन्हें मिथिला में ही नहीं बल्कि पूरे भारत में पूरे ब्राह्मण समुदाय के प्रमुख के रूप में मान्यता प्राप्त थी । उन्होंने लाहौर में हुई प्रथम अखिल भारतीय ब्राह्मण सम्मेलन की अध्यक्षता की और मैयूमेंसिंग में आयोजित बंगाल ब्राह्मण सम्मेलन की अध्यक्षता की। वह पूरे भारत में रूढ़िवादी हिंदुओं के स्वीकृत नेता थे । वे भारत धर्म महामण्डल के आजीवन अध्यक्ष चुने गए , जो एक अखिल भारतीय धार्मिक संगठन था और इसके साथ ही बनारस में अपने मुख्यालय के साथ देशभर में इसकी शाखाएं थी और जिनके साथ कई राजा / महाराज जुड़े थे । उन्होंने भारत के विभिन्न धर्मों और पंथों के बीच एकता को बढ़ावा देने के लिए कलकत्ता और इलाहाबाद में आयोजित धर्म संसद की अध्यक्षता की थी । नेपाल के महाराजा शमशेर जंग बहादुर और ग्वालियर , कश्मीर, जयपुर के महाराज और अन्य उन्हें अपने गुरु या धार्मिक प्रमुख के रूप में देखते थे . पटियाला के सबसे बड़े सिख शासक महाराजा भूपेंद्र सिंह उनके तंत्र मार्ग के अनुनायी थे और सभी उनकी स्थिति के कारण उन्हें सम्मान देते थे । वे एक महान साधक थे उनके सहयोग से जॉन वुडरूफ , पेन नाम आर्थर अवलोन ने तंत्र पर कई मूल ग्रंथो का अंग्रेजी में अनुवाद कर पुस्तकें प्रकाशित की और पश्चिम जगत को तंत्र – मन्त्र के मान्यता को प्रमाणित किया और इसे मानने के लिए विवस कर दिया। श्यामा मंदिर यह बिहार के दरभंगा जिला, मिथिला में अवस्थित है | कहा जाता है कि श्यामा माई का मंदिर श्मशान घाट में महाराजा रामेश्वर सिंह की चिता के ऊपर बना है, महाराजा रामेश्वर सिंह दरभंगा राज परिवार के साधक राजाओं में एक थे। स्थानीय बताते हैं कि राजा के नाम के कारण इस मंदिर का नाम रामेश्वरी श्यामा माई पड़ा। दरभंगा के राजा कामेश्वर सिंह ने 1933 में इस मंदिर की स्थापना की थी।इस मंदिर में मां श्यामा की पूजा तांत्रिक और वैदिक दोनों ही रूपों में की जाती है।
. हिंदू विश्वविद्यालय बनारस की स्थापना और शुरुआती दिनों में इनके बलिदान, नेतृत्व और श्रम के महान बलिदानों का परिणाम है।ये इसके आजीवन संरक्षक थे . वाइसराय ने इन्हे इसका कुलपति बनने की भी पेशकश की थी । रियासत दरभंगा के महाराज रमेश्वर सिंह ने पाँच लाख से अधिक रुपये बी.एच.यू. को दान दिया था, मगर बनारस में भी उनके नाम का कहीं कोई उल्लेख नहीं है।
बहरहाल, ​ऐतिहासिक दस्तावेजों को उद्धृत करते दरभंगा के मनोज झा कहते हैं: ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर यह सर्व-विदित है कि तिरहुत का विमानन इतिहास दरअसल बिहार का विमानन इतिहास है। कुछ अर्थों में यह भारत का विमानन इतिहास है। भारत में कार्गो सेवा प्रदान करने की बात हो या फिर देश का पहला ​लग्जरी विमान का इतिहास हो, यहां तक की आजाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के सरकारी विमान की बात हो, तिरहुत, दरभंगा और उसके विमान के योगदान का उल्‍लेख के बिना इनका इतिहास लिखना संभव नहीं है। तिरहुत के विमानन इतिहास की शुरुआत तिरहुत सरकार महाराजा ​रामेश्वर सिंह के कालखंड में ही होती है। तिरहुत सरकार का पहला विमान एफ-4440 था। जो 1917 में प्रथम विश्‍वयुद्ध के दौरान भारतीय मूल के सैनिकों के लिए खरीदा गया था। यह एक संयोग ही है कि तिरहुत सरकार का पहला विमान जहां भारतीय फौजी के लिए खरीदा गया था, वही दरभंगा एविएशन का आखिरी विमान भी भारतीय वायुसेना को ही उपहार स्‍वरूप दिया गया।
रियासत दरभंगा के महाराज रामेश्वर सिंह जब 9 जून, 1912 को ‘एंग्लो मोहम्मडन ओरियेंटल कॉलेज’ (अब अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय) आए थे, तो इस विश्वविद्यालय के ‘स्ट्रैची हॉल’ (जो आज भी मौज़ूद है) में उन्होंने बहुत नफ़ीस अँगरेज़ी में उपस्थित जनसमहू के बीच एक भाषण दिया था और उसी अवसर पर उन्होंने ‘एंग्लो मोहम्मडन ओरियेंटल कॉलेज’ को बीस हजार रूपये दान दिया था। तब हिंदुस्तान में 18 रूपये, 93 पैसे में एक तोला सोना मिलता था. इस हिसाब से उन्होंने करीब 1053 तोले सोने की कीमत के बराबर रूपये अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को दान दिया था। 1053 ग्राम सोने की क़ीमत आज तकरीबन 52,650,300 (पाँच करोड़, छब्बीस लाख, पचास हजार, तीन सौ रूपये) है। दरभंगा नरेश महाराज रामेश्वर सिंह द्वारा दिया गया यह दान अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय को किसी ग़ैर मुस्लिम द्वारा दिये गये दानों में सबसे बड़ा और सर्वोच्च स्थान रखता है!
इसकी स्थापना मात्र के लिए दरभंगा के महाराज महेश्वर सिंह ने विशाल भूमि दान नहीं दी थी। 1906 में महेश्वर सिंह के पुत्र और तत्कालीन महाराजा रमेश्वर सिंह ने भी इस संस्थान को दरभंगा भवन जैसा उपहार दिया था। जिसकी लागत उस समय करीब 2.5 लाख आंकी गयी थी। अब सबसे बडी बात, 1, अगस्त 1906 को ही दरभंगा भवन के उदघाटन समारोह में दरभंगा के महाराजा रमेश्वर सिंह ने इस संस्थान में मेडिकल स्टडी को बढावा देने के लिए छात्रवृत्ति शुरु की। 9 हजार का फण्ड विश्वविद्यालय में स्थापित किया गया था। उस समय, सर अशुतोष मुखर्जी (श्यादमा प्रसाद मुखर्जी के पिता) कुलपति थे। इसे महाराजा लक्ष्मीश्वर सिंह मेमोरियल फंड कहा जाता था। बैंक आफ बिहार की स्‍थापना जरूर की थी। बाकीपुर में इस बैंक को बिहार की अलग पहचान आर्थिक जगत में हो इसी उद्देश्‍य से स्‍थापित किया गया था। यह अलग बात है कि स्‍टेट बैंक आफ इंडिया मे सबसे पहले इसी बैंक का विलय हुआ,1928 में लॉर्ड इरविन ने स्थापित किया था कैंसर संस्थान
पीएमसीएच का रेडियोथेरेपी विभाग देश में सबसे पहले स्थापित होने वाले कैंसर संस्थानों में से एक है। राज्य में कैंसर मरीजों की सेंकाई को शुरू करने का श्रेय कर्नल वावघन को जाता है। उन्होंने ही 1913 में 10 ग्राम रेडियम रेडियोथेरेपी के लिए रांची में लाये थे। इंस्टीट्यूट की स्थापना पहले रांची में हुई थी लेकिन, कैंसर मरीजों की सहूलियत के लिए 1928 में इसे पटना में शिफ्ट कर दिया गया। पटना मेडिकल कॉलेज व अस्पताल को रेडियम इंस्टीट्यूट के नाम से भी जाना जाता था।
1928 में तत्कालीन वायसराय सर लार्ड इरविन के पटना दौरे के समय इसकी विधिवत स्थापना हुई थी। उस समारोह में रेडियम इंस्टीट्यूट के भवन के लिए दरभंगा के महाराजा कुमार विश्वेश्वर सिंह ने 50 हजार और महाराजाधिराज बहादुर सर रामेश्वर सिंह ने एक लाख रुपये का दान दिया था।

महाराजाधिराज रामेश्‍वर सिंह ने पटना में न केवल मेडिकल कॉलेज खोलने के लिए प्रयाप्‍त राशि दी, बल्कि पटना शहर के लोगों को स्‍वच्‍छ पेयजल उपलब्‍ध हो इसकी भी व्‍यवस्‍था की। कुछ दिन पहले अखबार में यह समाचार पढ़ा की पटना के दो वार्ड पार्षद गंदा पेयजल के खिलाफ उपवास करेंगे तो महाराजा रामेश्‍वर सिंह की उस इच्‍छा का स्‍मरण हो आया। महाराजा कामेश्‍वर सिंह कल्‍याणी फाउंडेशन में रखे दस्‍तावेज से पता चलता है कि पहली बार पटना के लोगों को पीने के लिए स्‍वच्‍छ जल मुहैया कराने की पहल राजनगर सरकार महाराजा रामेश्‍वर सिंह ने की। उन्‍होंने उस जमाने में इसके लिए 50 हजार रुपये पटना नगर निगम को दिये..बेशक नगर निगम और पटना की जनता उस इतिहास को भूल चुकी है, लेकिन दस्‍तावेज हमें पटना के विकास में राजनगर के योगदान को याद दिला देते है.. महाराजाधिराज रामेश्वर सिंह के योगदान का आकलन अब भी बाकी है।

(स्त्रोत साभार – द रॉयल ब्राह्मण फेसबुक पेज, जानकीपुल डॉट कॉम,  कुमद सिंह का फेसबुक पेज, राज पैलेस राजनगर फेसबुक पेज, खंडेलवाल डायनस्टी फेसबुक पेज)

 

अपने काम के पीछे भागें तो सफलता जरूर मिलेगी

मेहन्दी लगाना हम सबको पसन्द है, हर शुभ अवसर मेहन्दी लगायी भी जाती है मगर जब हमारे घरों में जब पेशेवर तरीके से मेहन्दी लगाने आता है तो हम उसके काम को सम्मान नहीं देते। मेहन्दी एक कला है और पेशेवर तरीके से मेहन्दी लगाने वाले भी सम्मान के हकदार हैं, बस यही लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रही हैं सारा खान…सारा खान साराज मेहन्दी की प्रमुख हैं और खुद मेहन्दी बनाती हैं। कोन हाथ से बनाती हैं और यह उनका लक्ष्य है। शी द्वारा आयोजित ‘कोलकाता फेस्टिवल’ में ‘शुभजिता’ की मुलाकात इनसे हुई।ओजस्विनी में आपकी मुलाकात हम युवा उद्यमी सारा खान से करवा रहे हैं –
मेहन्दी लगाने वालों को कमतर समझा जाता है
मेहन्दी कला को ऊँचाई पर ले जाने की ख्वाहिश है। आम तौर पर मेहन्दी लगाने वाली महिलाओं को कमतर समझा जाता है और उनके व्यवसाय को वह सम्मान नहीं मिलता, जो मिलना चाहिए। मेहन्दी लगाने में काफी मेहनत है मगर उस मेहनत को दरकिनार करके लोग मोलभाव करते हैं। वे यह समझते हैं कि मेहन्दी लगाने वाले पेशेवर नहीं हो सकते या बेहद मामूली पृष्टभूमि से आते हैं इसलिए वे उसके काम की उपेक्षा करते हैं। मुझे यह धारणा तोड़नी थी।
मेहन्दी की कला को सम्मान दिलवाना ही मकसद है
ऐसे बहुत से विद्यार्थी हैं जो पॉकेट मनी के लिए यह काम है। लोग समझते हैं कि मेहन्दी लगाने वाली लड़कियाँ अशिक्षित हैं औऱ इसी कारण बहुत से लोग शौक होने पर भी अपनी कला का प्रदर्शन इसलिए नहीं करते कि उनका मजाक उड़ाया जाएगा। मुझे इस धारणा को तोड़ना था।। मैं नौकरी करती हूँ, कई संस्थाओं से भी जुड़ी हूँ मगर मुझे मेहन्दी की कला को सम्मान दिलाना है और इसके लिए मैं पूरी कोशिश कर रही हूँ।
मेहन्दी लगाते सब हैं मगर जिक्र कम होता है
मैं मेहन्दी को बनाना, पैकेट में डालना, मेहन्दी खुशी देती है इसलिए शादी में मेहन्दी लगायी जाती है। लड़कियाँ घर – घर में जाकर मेहन्दी लगाती हैं। जब भी प्रदर्शनी य़ा व्यवसाय का जिक्र होता है तो उसमें कपड़ों, गहनों का जिक्र होता है मगर मेहन्दी का नहीं और होता भी है तो बहुत कम होता है।
खुद ही सीखा है मैंने मेहन्दी लगाना
मैंने एक छोटी सी प्रदर्शनी से शुरू किया था। अपना मेहन्दी कोन और कार्ड लेकर बैठती हूँ और एक दिन मुफ्त में मेहन्दी लगाती हूँ। इस क्षेत्र में मैंने पैसा और सम्मान कमाया। जो मुझसे मेहन्दी लगवाते हैं और वह मुझसे मेहन्दी लगाने के लिए सम्पर्क करते हैं। मेहन्दी का बचपन से शौक था। पहले कॉपी पर बनाती थी, पेंटिंग करती थी, फिर अपने ही हाथ पर लगाने लगी, फिर ऑनलाइन कक्षाएं कीं…जो सीखा…खुद सीखा…यू ट्यूब और टीवी पर देखकर सीखा।
महिलाओं को सशक्त बनाना चाहती हूँ
परिवार ने समर्थन दिया, तारीफ की। काम करती हूँ. ऑफिस का काम भी करती हूँ। मैं सफल होना चाहती हूँ औऱ जरूरतमंद महिलाओं के लिए एक संस्था खोलना चाहती हूँ जिससे उत्पीड़न की शिकार महिलाओं को कला और काम सिखाकर आत्मनिर्भर बनाना चाहती हूँ।
अपने काम के पीछे भागें
खुद और अपने किसी भी हुनर को छोटा न समझें। पैसे के पीछे न भागें, अपने काम के पीछे भागें तो सफलता जरूर मिलेगी।

 

घरेलू महिला उद्यमियों की मदद के लिए शी ने आयोजित किया ‘कोलकाता फेस्टिवल’

कोलकाता : छोटे और मझोले उद्योगों के साथ घरेलू महिला उद्यमियों को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से शी ने दो दिवसीय फैशन तथा लाइफस्टाइल प्रदर्शनी आयोजित की। लॉकडाउन के बाद आयोजित इस प्रदर्शनी का नाम कोलकाता फेस्टिवल था जो 11 तथा 12 नवम्बर को आईसीसीआर में आयोजित किया गया। प्रदर्शनी में कपड़े, एक्सेसरीज, बैग समेत कई अन्य स्टॉल थे और खरीददारों के लिए अच्छा अनुभव भी। प्रदर्शनी में भाग लेने वाले ब्रांड्स में नाश बुटीक, द 999, सेल एक्टिव कलर्स, शाजिया बुटिक,रब्बा कलेक्शन, ग्रेशियस हब, चॉएस फैशन, काल्पी, रेनेसां बुटिक, क्लोदिंग पैलेट, फैब्रिक्स ऑफ इंडिया, इकबाल्स किचेन, बेक अडोर, हिया साड़ीज, फरहास कलेक्शन्स, जुवीस एलिगेन्ट कलेक्शन्स, मिस प्रो. पटियाला हाउस समेत इन्य ब्रांड्स शामिल थे। उद्घाटन समारोह में संकल्प डांस ग्रुप ने सौमित्र चट्टोपाध्याय को समर्पित प्रस्तुति की। इसके बाद महिला सशक्तीकरण पर एक परिचर्चा हुई जिसमें रक्षक फाउंडेशन की चेयर पर्सन चैताली दास, मेकअप आर्टिस्ट गुलशन बानो, लायन्स क्लब की सुजाता अग्रवाल, टेक्नो इंडिया के निदेशक सुजय विश्वास उपस्थित थे। उद्घाटन पद्मश्री पूर्ण दास बाउल, शी की संस्थापक निदेशक शगुफ्ता हनाफी, लायन लेखा शर्मा ने किया। दूसरे दिन 5 से 13 साल के बच्चों ने फैंसी परिधानों में रैम्प वॉक किया। पंडित तरुण भट्टाचार्य़ के शिष्य आयुष लाला ने सन्तूर की प्रस्तुति दी। बेस्ट फ्रेंड्ज सोसायटी की फिलॉनथ्रॉपी क्लब की नयी अध्यक्ष पायल वर्मा की इन्टॉलेशन सेरोमनी हुई। इसके बाद एक परिचर्चा एब्यूज्ड दुर्गा हुई जिसमें महामारी के दौरान महिलाओं की स्थिति पर विचार किया। वक्ताओं में अभिनेत्री पापिया अधिकारी, प्रो. आनन्दिता राय, प्रो, अमर जाकी. फिल्म निर्माता सुप्रतीम रॉय. सम्पादक सोमा लाहिड़ी, और शी की संस्थापक शगुफ्ता हनाफी ने भाग लिया। कोलकातार गानवाला ने भी प्रस्तुति दी। बेस्ट फेंड्ज सोसायटी के लिए फंड उगाहने के उद्देश्य से आयोजित इस प्रदर्शनी में लगभग 500 लोग पहुँचे।

एक ही मण्डप में हुई माँ-बेटी की शादी

गोरखपुर : उत्तर प्रदेश में गोरखपुर जिले के पिपरौली विकास खंड में मुख्‍यमंत्री सामूहिक विवाह योजना के तहत आयोजित सामूहिक विवाह में मां और उसकी बेटी दोनों की शादी हुई। इस दौरान कुल 63 जोड़ों का सामूहिक विवाह हुआ लेकिन मां-बेटी की शादी ने सभी का ध्‍यान आकर्षित किया।
अधिकारियों ने शुक्रवार को बताया कि मुख्‍यमंत्री सामूहिक विवाह योजना में पिपरौली में आयोजित सामूहिक विवाह में 53 वर्षीय एक महिला और उसकी 27 वर्षीय बेटी की शादी हुई। अधि‍कारियों के अनुसार बेला नामक एक महिला की शादी हरिहर से हुई थी जिसकी तीन बेटियां और दो बेटे हैं। उन्होंने बताया, ‘‘बेला के पति हरिहर की मौत करीब 25 वर्ष पहले हो गई थी। बेला की शादी अपने पहले पति के छोटे भाई 55 वर्षीय जगदीश के साथ हुई जो अभी तक अविवाहित थे जबकि उसी सामूहिक समारोह में बेला की छोटी बेटी इंदू की भी शादी हुई।’’ इस समारोह में एक मुस्लिम जोड़े समेत कुल 63 जोड़ों का विवाह पिपरौली विकास खंड के अधिकारियों के अलावा वरिष्‍ठ अधिकारियों की उपस्थिति में हुआ। बेला ने कहा, ‘मेरे दो बेटों और दो बेटियों की शादी पहले ही हो गई है। छोटी बेटी की शादी के बाद मैंने अपने देवर (पति के छोटे भाई) के साथ अपनी शादी का फैसला किया। मेरे सभी बच्‍चे खुश हैं।’ इंदु ने कहा, ‘मेरी मां और चाचा ने हमारी देखभाल की है और मुझे बहुत खुशी है कि अब दोनों एक-दूसरे की देखभाल करेंगे।’

नासा के चंद्र अभियान में 18 अंतरिक्षयात्रियों में भारतवंशी राजा चारी

वाशिंगटन : नासा ने चंद्रमा पर इंसान को भेजने के अपने अभियान के लिए एक भारतवंशी राजा जॉन वुरपुतूर चारी सहित 18 अंतरिक्षयात्रियों का चयन किया है। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने अपने चंद्र अभियान के लिए गत बुधवार को 18 अंतरिक्षयात्रियों के नामों की घोषणा की। इनमें आधी संख्या महिलाओं की है। नासा इन्हें अपने ‘आर्टमिस’ चंद्र अभियान के लिए प्रशिक्षित करेगा।
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ने कहा कि नासा के इस अभियान के तहत 2024 में चांद की सतह पर पहली बार कोई महिला कदम रखेगी और इस दशक के अंत तक चंद्रमा पर इंसानों के रहने के लिए अनुकूल माहौल तैयार किया जाएगा।
चारी (43) ‘यूएस एयर फोर्स एकेडमी, एमआईटी’ और ‘यूएस नवल टेस्ट पायलट स्कूल’ से स्नातक हैं, और इस सूची में वह भारतीय मूल के एकमात्र अंतरिक्षयात्री हैं। नासा ने उन्हें 2017 ‘एस्ट्रोनॉट कैंडिडेट क्लास’ के लिए चुना था। अगस्त 2017 में वह इसमें शामिल हुए थे और अपना शुरुआती प्रशिक्षण पूरा किया। अब वह अभियान के लिए पूरी तरह तैयार हैं।
फ्लोरिडा में नासा के ‘केनेडी स्पेस सेंटर’ में उप राष्ट्रपति माइक पेंस ने कहा, ‘‘ मेरे अमेरिकी साथियों मैं आपको भविष्य के वे नायक दे रहा हूं जो हमें ‘आर्टमिस जेनरेशन’ के जरिए चांद और उससे भी आगे ले जाएंगे।’’पेंस ने राष्ट्रीय अंतरिक्ष परिषद की बैठक में इन अंतरिक्षयात्रियों के नामों की घोषणा करते हुए कहा, ‘‘यह सोचना रोमांचकारी है कि चांद की सतह पर उतरने वाला अगला इंसान और पहली महिला उनमें से होगी जिनके नाम हमने यहां पढ़े हैं….। ‘आर्टमिस जेनरेशन’ भविष्य के अभियान के नायकों का प्रतिनिधित्व करता है।’’चीफ एस्ट्रोनॉट पैट फोरेस्टर ने कहा, ‘‘चांद की सतह पर चलना हमारे लिए किसी सपने के साकार होने जैसा होगा। अभियान में किसी भी तरह की भूमिका निभाना हमारे लिए गौरव की बात होगी।’’‘आर्टमिस’ टीम में अलग-अलग पृष्ठभूमि, विशेषज्ञता और अनुभव वाले अंतरिक्ष यात्री शामिल हैं। समूह में अधिकतर सदस्यों की उम्र 30 से 35 या 40 से 45 के बीच है। सबसे अनुभवी सदस्य 55 साल के और सबसे युवा सदस्य 32 साल के हैं। चुने गए अंतरिक्ष यात्री नासा को आगामी आर्टमिस मिशन में मदद करेंगे। एजेंसी अपने वाणिज्यिक सहयोगियों के साथ अगले साल इसकी शुरुआत करेगी। इसके तहत मानवों के उतरने के लिए लैंडिंग सिस्टम, प्रशिक्षण में मदद, हार्डवेयर संबंधी जरूरतों और प्रौद्योगिकी सहयोग पर काम होगा।

जो बाइडन, कमला हैरिस बने टाइम पत्रिका के ‘2020 पर्सन ऑफ द ईयर’

न्यूयॉर्क : अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन और उप-राष्ट्रपति कमला हैरिस को प्रतिष्ठित टाइम पत्रिका ने अमेरिकी परिदृश्य को बदलने के लिए ‘2020 पर्सन ऑफ द ईयर’ चुना है। पत्रिका ने अपने वार्षिक प्रतिष्ठित सम्मान के लिए इन दोनों डेमोक्रेटिक नेताओं को चुना है। उसने अन्य अंतिम चरण के अन्य दावेदारों- अग्रिम मोर्चे पर काम करने वाले स्वास्थ्यकर्मियों और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इंफेक्शियस डिजीज के निदेशक डॉ. एंथनी फौसी, मूवमेंट फॉर रेसियल जस्टिस और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के ऊपर इन दोनों को तरजीह दी। पत्रिका ने कहा, ‘‘अमेरिकी कहानी को बदलने के लिए, यह दिखाने के लिए कि सहानुभूति की ताकत विभाजन की उग्रता से अधिक है, एक पीड़ित दुनिया को ठीक करने की दृष्टि साझा करने के लिए जो बाइडन और कमला हैरिस को टाइम का 2020 पर्सन ऑफ द ईयर चुना गया है।’’
‘टाइम’ ने फौसी, स्वास्थ्य कर्मियों और मूवमेंट फॉर रेसियल जस्टिस के आयोजकों को ‘2020 गार्जियंस ऑफ द ईयर’ नामित किया हैं, जो लोकतंत्र के पवित्र आदर्शों की रक्षा के लिए खुद आगे डटे रहे। कॉन्फ्रेंसिंग प्लेटफॉर्म जूम के सीईओ एरिक युआन को टाइम के ‘बिजनेसपर्सन ऑफ द ईयर’ के रूप में नामित किया गया है।
दक्षिण कोरियाई बॉय बैंड बीटीएस को ‘एंटरटेनर ऑफ द ईयर’ और अमेरिकी बास्केटबॉल खिलाड़ी लेब्रोन जेम्स को ‘एथलीट ऑफ द ईयर’ नामित किया गया। टाइम ने कहा कि यह “उल्लेखनीय” है कि पिछले साल स्वीडिश जलवायु संरक्षण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग को पर्सन ऑफ द ईयर के रूप में नामित किया गया था जो यह सम्मान पाने वाली सबसे कम उम्र की शख्स थीं। इसके एक साल बाद, इस सम्मान के लिए 78 वर्षीय बाइडन को चुना गया, इस सम्मान के लिए चुने गए सबसे बुजुर्ग व्यक्तियों में से एक हैं। टाइम ने कहा, “बाइडन खुद को नई पीढ़ी के नेताओं के लिए एक पुल बताते हैं। उन्होंने 56 वर्षीय कमला हैरिस को उप राष्ट्रपति की उम्मीदवार के रूप में चुनने में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। हैरिस उप राष्ट्रपति पद के लिए निर्वाचित होने वाली पहली महिला हैं, जो जमैका के रहने वाले पिता और एक भारतीय माँ की बेटी हैं।’टाइम ने कहा कि फ्रेंकलिन डेलानो रूजवेल्ट के बाद से हर निर्वाचित राष्ट्रपति को उनके कार्यकाल के किसी वर्ष में ‘पर्सन ऑफ द ईयर’ चुना जाता रहा है, उनमें से लगभग एक दर्जन को यह सम्मान राष्ट्रपति चुनाव वाले वर्ष में दिया गया है।

प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान गोविंदाचार्य का निधन

बेंगलुरू : कर्नाटक के प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान और कन्नड़ कवि बन्नंजय गोविंदाचार्य का 84 वर्ष की आयु में उडुपी में निधन हो गया। राज्य सूचना विभाग के एक अधिकारी ने आईएएनएस को बताया, “एक लंबी बीमारी के बाद उडुपी के अंबालापडी में अपने आवास पर उनका निधन हो गया है।”
उडुपी, बैंगलुरू से करीब 400किमी की दूरी पर स्थित है। 3 अगस्त, 1936 को जन्मे गोविंदाचार्य वेद भाष्य, उपनिषद भाष्य, महाभारत और रामायण जैसे महाकाव्यों और पुराणों के ज्ञान में पारंगत थे। अपने जीवन काल में गोविंदाचार्य ने वेद सूक्तों, शत रुद्रीय, ब्रह्मसूत्र भाष्य और गीता भाष्य पर कई व्याख्यात्मक निबंध लिखे। बन्नंजय एक महान वक्ता भी थे और उन्होंने संस्कृत के प्राचीन दार्शनिक दक्षिपुत्र पाणिनि द्वारा रचित व्याकरण सूत्र भी नए ढंग से लिखे। उन्होंने अपने नाम से करीब 150 पुस्तकें और संस्कृत व्याकरण के करीब 4,000 पृष्ठ लिखे

 

पेरिस समझौते में फिर से शामिल होगा अमेरिका

अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन ने ये अहम एलान किया कि 39 रोज बाद अमेरिका फिर से पेरिस समझौते में शामिल होगा। उन्होंने ये घोषणा पेरिस समझौता होने की पांचवीं सालगिरह के मौके पर एक ट्वीट कर की। उन्होंने कहा- ‘’आज से पांच साल पहले दुनिया ने इकट्ठा होकर जलवायु परिवर्तन पर पेरिस समझौते को अपनाया था। 39 रोज बाद अमेरिका इसमें फिर से शामिल होगा। हम दुनिया को और आगे बढ़ाने, तेजी से बढ़ाने और जलवायु संकट का सीधे मुकाबला करने के लिए एकजुट करेंगे।’’पेरिस समझौते की पांचवीं सालगिरह पर विश्व नेताओं का वर्चुअल सम्मेलन हुआ। इसमें अमेरिकी राष्ट्रपति शामिल नहीं थे क्योंकि मौजूदा राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सत्ता में आने के बाद अपने देश को इस समझौते से हटा लिया था। जो बाइडन ने पिछले राष्ट्रपति चुनाव में अपने प्रचार अभियान के दौरान अमेरिका को फिर से इस समझौते का हिस्सा बनाने का इरादा जताया था। अब उन्होंने उसका औपचारिक एलान किया है। उनकी घोषणा का मतलब है कि 20 जनवरी को जब वे राष्ट्रपति पद संभालेंगे, तो पहले ही दिन इस बारे में फैसला करेंगे।
उत्सर्जन रोकने की दिशा में नहीं हुई प्रगति 
इस बीच, पेरिस समझौता होने के बाद जलवायु परिवर्तन रोकने की दिशा में कदम उठाने की घोषणाएं तो खूब हुई हैं, लेकिन इस दिशा में कोई खास प्रगति नहीं हुई है। शनिवार को हुए वर्चुअल शिखर सम्मेलन को 70 से ज्यादा देशों के नेताओं ने संबोधित किया। इसमें चीन समेत कई देशों के नेताओं ने अपने देश को कार्बन न्यूट्रल बनाने की समयसीमा बताई। कार्बन न्यूट्रल का मतलब विकास और ऊर्जा की ऐसी नीतियां अपनाना है, जिनसे कार्बन गैस का उत्सर्जन ना हो।
लगातार बढ़ रहा धरती का पारा 
पेरिस समझौते पर 189 देशों ने दस्तखत किए थे। उसमें लक्ष्य तय किया गया था कि इस सदी के आखिर तक धरती का तापमान दो डिग्री से अधिक नहीं बढ़ने दिया जाएगा। तापमान का ये माप औद्योगिक युग शुरू होने के समय को आधार मानकर की जाती है। संधि में शामिल देशों ने कहा था कि उनकी कोशिश होगी कि तापमान में इस वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक ही रोक लिया जाए, लेकिन इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए जिन ठोस कदमों की जरूरत है, वे पिछले पांच साल में नहीं उठाए गए हैं। नतीजा यह है कि धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है और जलवायु परिवर्तन के नतीजे अधिक गंभीर होते जा रहे हैं। इसे देखते हुए पिछले साल संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुतारेस ने चेतावनी दी थी कि इस दशक का अंत आते-आते धरती का तापमान कम से कम तीन डिग्री सेल्सियश बढ़ चुका होगा।
जीरो कार्बन उत्सर्जन पर काम करेंगे ये देश 
प्रगति ना होने की एक बड़ी वजह यह भी रही है कि दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक देश अमेरिका संधि से बाहर हो गया। इससे संधि का भविष्य अनिश्चित हो गया। अब जो बाइडन के राष्ट्रपति निर्वाचित होने से उम्मीद बंधी है कि दुनिया के दूसरे देश भी इस समस्या को लेकर ज्यादा गंभीर होंगे। हाल के महीनों में चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और कई दूसरे देशों ने शून्य कार्बन उत्सर्जन की दिशा में कदम उठाने की घोषणा की है। इस पर अमल हुआ, तो साल 2050 तक दुनिया के ज्यादातर बड़े कार्बन उत्सर्जक देश अपने को कार्बन न्यूट्रल बना चुके होंगे।
शनिवार के शिखर सम्मेलन में दुनिया के सबसे बड़े कार्बन उत्सर्जक देश चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने वर्ष 2030 तक लक्ष्य घोषित किया। उन्होंने कहा कि चीन 2005 के स्तर की तुलना में 2030 तक प्रति जीडीपी यूनिट कार्बन डाइऑक्साइड के अपने उत्सर्जन में 65 फीसदी की कमी लाएगा। वह अपने प्राथमिक ऊर्जा उपभोग में गैर-जीवाश्म (नॉन फॉसिल) ईंधन का इस्तेमाल 25 प्रतिशत तक ले जाएगा। वन आच्छादित क्षेत्र में छह अरब घनमीटर की बढ़ोतरी करेगा। साथ ही पवन और सौर ऊर्जा पैदा करने की क्षमता को बढ़ाकर 1.2 अरब किलोवाट तक ले जाएगा।
ब्रिटेन ने 68 प्रतिशत कटौती का घोषणा की 
ब्रिटेन ने 2030 तक कार्बन उत्सर्जन में 1990 के स्तर की तुलना में 68 प्रतिशत की कटौती का एलान किया है। हाल ही में यूरोपियन यूनियन ने भी इस संबंध में अहम एलान किया था। शनिवार के शिखर सम्मेलन में कई दूसरे देशों ने भी अपने लक्ष्य बताए, लेकिन इस सम्मेलन में ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, रूस और सऊदी अरब को बोलने का मौका नहीं दिया गया क्योंकि उनके नेताओं ने कोई लक्ष्य बताने की सूचना सम्मेलन के आयोजकों को नहीं दी थी।
सामाजिक कार्यकर्ता नहीं हुए संतुष्ट 
सम्मलेन में जो घोषणाएं हुईं, उससे भी ज्यादातर विशेषज्ञ और सामाजिक कार्यकर्ता संतुष्ट नहीं हुए हैं। ऑक्सफेम के जलवायु नीति प्रमुख टिम गोर ने ब्रिटिश अखबार द गार्जियन से कहा कि शनिवार को हुए सम्मेलन में वास्तविक महत्त्वाकांक्षा का अभाव था। जो घोषणाएं हुई हैं, वो धरती के तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्शियस तक सीमित रखने के लिहाज से अपर्याप्त हैं। ऊर्जा संबंधी थिंक टैंक पॉवरशिफ्ट अफ्रीका के निदेशक मोहम्मद अदाव ने कहा कि भविष्य में कार्बन न्यूट्रल बनने की घोषणाएं करना एक बात है और अभी तुरंत नीतियों पर अमल बिल्कुल दूसरी बात। असल मुद्दा यह है कि तमाम देश 2021 में क्या करेंगे।  बेशक ये सवाल अहम हैं। अब जबकि एक बार फिर जलवायु परिवर्तन का मुद्दा दुनिया के एजेंडे पर ऊपर आ रहा है, तब इन पर सभी देशों को जरूर गौर करना चाहिए।