तुलसी, लौंग, दालचीनी केक
अगले दो साल में 250 स्टोर खोलेगी अजंता शूज
500 करोड़ रुपये के राजस्व की प्राप्ति का लक्ष्य
कोलकाता : अजंता शूज का लक्ष्य चालू वित्त वर्ष 2020-21 में 500 करोड़ रुपये का राजस्व हासिल करना है। कंपनी ने पिछले वित्त वर्ष 2019-20 में 400 करोड़ रुपये का राजस्व कमाया। इसके अलावा, 64 वर्ष पुरानी यह फुटवियर कम्पनी की अगले 2 साल में 250 स्टोर खोलेगी। फिलहाल कम्पनी के105 स्टोर्स मौजूद हैं। इसके अलावा, अजंता शूज़ के स्पोर्ट्स शू ब्रांड इम्पाकटो ने युवाओं के लिए दर्जी निर्मित ब्रांड को लॉन्च किया। “हम अजंता शूज़ को एक घरेलू नाम बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं और इसलिए, हम अपने परिचालन को और विस्तारित करने और मौजूदा 105 स्टोर्स से अगले दो वर्षों में स्टोर्स की संख्या को 250 तक ले जाने की योजना बना रहे हैं। अगले दो साल में हम पैन इंडिया ब्रांड बनने जा रहे हैं। हम उम्मीद करते हैं कि वित्त वर्ष 2020-21 में 500 करोड़ रुपये के राजस्व, रिपोर्ट करेंगे”, कोलकाता में स्पोर्ट्स शू ब्रांड इम्पाकटो की अगली-पीढी की रेंज की लॉन्चिंग के मौके पर, अजंता शूज़ (आई) प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक सागनिक बणिक ने कहा।
कोविड -19 के दौरान बिक्री पर टिप्पणी करते हुए, बानिक ने कहा कि इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा क्योंकि मांग उतनी ही थी। “ऑनलाइन बिक्री बहुत मजबूत है। हमारे थोक भाग ने कोविड के दौरान बेहतर किया, ”उन्होंने कहा। हावड़ा के अवनी रिवरसाइड मॉल में रंगारंग कार्यक्रम हुआ शाम को, गायक राघवेन्द्र द्विवेदी; गीत के लेखक ने वीडियो में कुछ कलाकारों के साथ प्रस्तुति दी। बानिक ने कहा कि गुणवत्ता के मामले में दुनिया के सर्वश्रेष्ठ स्पोर्ट्स शू ब्रांड का सबसे अच्छा मिलान कर सकते हैं और यह भी कि वह किस संस्कृति को प्रेरित करता है। इम्पाकटो आज केवल एक फुटवियर ब्रांड नहीं है। यह आज के युवाओं के प्रतीक के रूप में विकसित हो गया है जो अपरिवर्तनीय और साहसी हैं। वे रूढ़िवादिता को चुनौती देने का साहस करते हैं। वे नए का पता लगाते हैं, ” बानिक कहते हैं । ब्रांड को लॉन्च करने वाले गायक राघवेंद्र ने कहा, “मेरे लिए, इम्पाकटो एक ऐसा ब्रांड है जिसके साथ आज भारत में युवाओं की पहचान बढ़ रही है।
लोकप्रिय अध्यापक व जागरूक नागरिक थे कृष्णानंद पांडेय

कुछ शिक्षक पाठ्यक्रम पूरा करते हैं और कुछ विद्यार्थियों को गढ़ते हैं और ऐसा करते हुए वे उनके मन में रह जाते हैं, कहीं नहीं जाते। निधन के बाद भी लोकप्रिय शिक्षक कृष्णानंद पांडेय भी कहीं नहीं गये। कहते हैं कि शिक्षक का वंश दो तरीके से चलता है इसलिए वह विस्तृत होता है। वह संतान परम्परा के अतिरिक्त शिष्य परम्परा के माध्यम से विस्तार पाता है इसलिए तो स्वामी विवेकान्द के साथ रामकृष्ण परमहंस याद आ जाते हैं। कृष्णानंद पांडेय के बारे में यही बात कही जा सकती है। वह अपने विद्यार्थियों की सफलता के रूप में हमारे बीच हैं।
हालांकि उनका जाना हम सबके लिए एक झटका तो है ही। उनकी विनम्रता रह – रह कर आँखों को नम कर दे रही है। परिचितों में पांडेय जी के रूप में प्रसिद्ध कृष्णा नंद पांडेय मेरे लिए तो भइया ही थे। रिसड़ा विद्यापीठ के कॉमर्स विभाग के विनम्र और लोकप्रिय शिक्षक के रूप में उनकी पहचान थी मगर वह सिर्फ पाठ्यक्रम पूरा करने वाले शिक्षक नहीं थे। विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए भइया हमेशा सक्रिय रहे। उनकी प्रतिभा को निखारते रहे। उन्होंने बच्चों को सामंजस्य बनाकर चलना सिखाया और उनके व्यक्तित्व के विकास हेतु सदैव तत्पर रहे।
किसी भी विषय का अध्ययन करना उनके स्वभाव में था। इतिहास, साहित्य और दर्शन जैसे जटिल विषय को उन्होंने स्वाध्याय से साधा था। वे अपने विषय में पारंगत तो थे ही, साथ ही समसामायिक विषयों पर भी उनकी दूरदर्शिता अतुलनीय रही। समाज, सामान्य जनता, किसान और मजदूरों के प्रति उनके अंदर सद्भावना थी।
भैया के असमायिक निधन से हम सभी मर्माहत और व्यथित हैं। उनका अचानक चले जाना हम जैसे कई लोगों के लिए अपूरणीय क्षति है।वे सभी के प्रिय हैं. उनका आत्मीय एवं सौम्य व्यक्तित्व प्रथम परिचय में ही सबको प्रभावित कर लेता था। पुस्तकालय से उनका गहरा लगाव था।
अपने अभिन्न मित्र सर्वेश्वर तिवारी से मिलने बहुबाजार के फिरंगी काली टावर प्रायः आते रहते थे। इसी क्रम में वे पुस्तकालय भी आते रहते थे औऱ फिर शुरू होती थी साहित्यिक व राजनीतिक चर्चा। भैया की उस समय भावाभिव्यक्ति गजब की होती थी। वह हमेशा कहा करते थे कि श्रीमोहन तुम भी लेखक हो, जरा इन मुद्दों पर सोचकर देखो, देश कहाँ जा रहा है। अध्यापक होने के साथ-साथ ही वे एक जागरूक नागरिक भी थे। उनकी जो सामाजिक सोच और राजनीतिक सोच हमेशा हाशिए पर रहने वाले जन के लिए रहती थी। वह उनके प्रति चिंतित रहते थे। अब उनके बगैर चर्चा अधूरी सी रह जाएगी।
(लेखक सेठ सूरजमल जालान पुस्तकालय के पुस्तकाध्यक्ष हैं)
कोटक महिंद्रा बैंक लाया ख़ुशी का सीज़न 2.0
कोलकाता: कोटक महिंद्रा बैंक (कोटक) ने ख़ुशी का सीज़न 2.0 ऑफर पेश किया है। कोटक के डेबिट और क्रेडिट कार्डधारकों के लिए यह नये साल का जश्न होगा। कोटक ने प्रमुख ब्रांडों जैसे कि फैशन, फर्नीचर, खिलौने और आवश्यक श्रेणियों में प्रमुख ब्रांडों जैसे कि अपने अवकाश सीजन की खरीदारी पर ग्राहकों को विशेष ऑफ़र और छूट प्रदान करने के लिए प्रमुख ब्रांडों से हाथ मिलाया है। इन ब्रांड्स में मिन्त्रा, पेपर फ्राई और बिग बास्केट जैसे ब्रांड्स शामिल हैं। कोटक महिंद्रा बैंक के अध्यक्ष (उत्पाद, वैकल्पिक चैनल और ग्राहक अनुभव वितरण) पुनीत कपूर ने कहा, “छुट्टियों का मौसम कोने के आसपास है और यह वर्ष का वह समय है जब लोग परिवार और दोस्तों के साथ उपहारों का आदान-प्रदान करते हैं। हम ख़ुशी का सीज़न 2.0 को लॉन्च करके खुश हैं। ग्राहकों को अधिक बचत करने और अपनी उत्सव की खरीदारी में कुछ अतिरिक्त आनंद जोड़ने में मदद करने के लिए, हमने कुछ लोकप्रिय ब्रांडों के साथ श्रेणियों में भागीदारी की है जो इस वर्ष की मांग है। ”
शहर कोलकाता की इन सड़कों से रोज गुजरते हैं…नाम कैसे पड़े…क्या जानते हैं आप
हर शहर की अपनी कहानी है। सड़कों और गलियों का अपना इतिहास है। जिन सड़कों से होकर हम गुजरते हैं…कभी सोचा है क्या आपने उनके बारे में…आखिर कैसे पड़ा उनका नाम…सूतानाटी, गोविन्दपुर और कलिकाता की कहानी तो अपनी जगह है मगर आज के इस शहर में जब हम सड़कों से गुजरते हैं तो इन सड़कों के इतिहास पर ध्यान नहीं जाता…भागम – भाग में हाथों से बहुत कुछ फिसला जा रहा है। शोध करते – करते, खोजते – खोजते जो भी जानकारी मिलती है, हम आपसे साझा करते हैं और इस बार की यह दिलचस्प जानकारी जुड़ी है कोलकाता की सड़कों के नाम से –
बड़तल्ला
बड़ाबाजार में बड़तल्ला या वटतल्ला का नाम तो आपने सुना है पर क्या आपने शायद ही कभी सोचा होगा कि एक वट वृक्ष के नाम पर किसी इलाके का नाम हो सकता है मगर इस इलाके के साथ ऐसा ही है। कभी यहाँ एक विशाल वट वृक्ष हुआ करता था और इसके तले चलता था किताबों का व्यवसाय।। पनप रहा था प्रकाशन उद्योग। हालाँकि वट तला साहित्य के स्तर को लेकर आलोचना खूब होती थी क्योंकि धार्मिक और श्रृंगारमूलक किताबें, पोथी ही यहाँ से छपती थीं…बाद में स्वयं बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने इसका महत्व समझा मगर वटतला बई अपने आप में इतिहास है और बड़तल्ला आज के बड़ाबाजार की बेहद व्यस्त गली।
बागबाजार
बागबाजार जगह तो बहुत पुरानी है मगर इसका नाम सुनकर आपको क्या बाग याद आता है…बाघ…? दिलचस्प बात यह है कि बाघ का बागबाजार से कोई लेना-देना नहीं है। बाग के अर्थ में उद्यान, जहां से नाम की उत्पत्ति हुई है। प्लासी के युद्ध से पहले पेरिनर्स गार्डन था, जो अंग्रेजों के लिए एक प्रमुख पर्यटन स्थल था। इस क्षेत्र की पहचान 1852 में हॉलवेल के विवरण 1874 के मिस्टर वुड के नक्शे में इस इलाके की पहचान बागबाजार के रूप में की गई है। आज जहाँ बागबाजार सार्वजनिन दुर्गोत्सव की दुर्गापूजा होती है…कभी वहाँ एक विशाल उद्यान या बाग ही हुआ करता था। यह बाग कैप्टन पेरिन का था और ‘पेरिन साहबेर बागान’ के नाम से मशहूर था और हुगली नदी के तट तक फैला था और नदी के तट पर बाजार रहा हो। इस बारे में पक्का कुछ भी कहना कठिन है मगर चारर्नाक के पहले यह पूरा इलाका सूतानाटी कहलाता था..यहाँ कई बाजार थे..अप्पजन के नक्शे (1794) में ओल्ड पाउडर मिल बाज़ार नामक बाज़ार का उल्लेख है। सम्भव है कि यही बाग और बाजार मिलकर आज के बागबाजार बन गये।
श्यामबाजार
श्यामबाजार कभी मशहूर बाजार हुआ करता था। जॉन जेफोनिया हॉलवेल ने इस बाजार का उल्लेख चार्ल्स बाजार के रूप में किया है। कहते हैं कि तत्कालीन प्रख्यात व्यवसायी शोभाराम बसाक ने अपने गृहदेवता श्यामराय (कृष्ण) के नाम पर इस बाजार का नाम रखा।
ग्रे स्ट्रीट
ग्रे स्ट्रीट कोलकाता की पहली पक्की सड़क है। इंग्लैंड के पूर्व प्रधानमंत्री चार्ल्स ग्रे के नाम पर सड़क का नाम पड़ा मगर इसका सम्बन्ध स्वाधीनता संग्राम से भी है। 8 मई 1908 को ऋषि अरविन्द जिस मकान से गिरफ्तार किये गये थे, ग्रे स्ट्रीट में आज भी वह घर है और अब यह अरविन्द सरणी कहलाता है।
हाथीबागान
1756 में नवाब सिराजुद्दौला ने कोलकाता पर आक्रमण किया और तब नवाब के हाथियों को जहाँ पर रखा गया था, आज वह जगह हाथीबागान के नाम से जानी जाती है।
चितपुर
काशीपुर इलाके में गंगा के तट पर चितपुर में है आदि चित्तेश्वरी दुर्गा मंदिर। आज जहाँ स्टैंड रोड है, कभी यहीं से बहती थी हुगली नदी…जंगल ही थे और थे डकैत, कहते हैं कि भागीरथी -हुगली नदी नदी में तैरते विशाल नीम के के पेड़ के तने से चित डकैत ने इस जयचंडी चित्तेश्वरी दुर्गा की प्रतिमा बनायी थी। बाद में मनोहर घोष नामक व्यक्ति ने चित्तेश्वरी दुर्गा का मंदिर स्थापित किया और माँ चित्तेश्वरी के नाम पर इस इलाके का नाम चितपुर पड़ा।
सोनागाछी
सोनागाछी इलाका अच्छी नजर से नहीं देखा जाता पर क्या आप जानते हैं कि इसका नाम सोनाउल्लाह गाजी नाम के पीरबाबा के नाम पर पड़ा है और कहते हैं कि इस इलाके में उनकी मजार भी है।
गारेनहाटा
गरानहाटा अब वह स्थान है जहाँ गरन लकड़ियों की नावों पर सामान लाद कर बेची और संग्रहीत की जाती थीं यानी यहाँ गोदाम हुआ करते थे…ये अनुमान है…सच पता चले तो हमें भी बताइएगा।
कुम्हारटोली
शोभाबाजार राजबाड़ी में दुर्गापूजा होती थी और तब यहाँ कुम्हारों को माँ की प्रतिमा बनाने के लिए कृष्णनगर से ले आया गया था। राजबाड़ी के पास उनके रहने की व्यवस्था की गयी थी और आज वही जगह कोलकाता की जान है….मतलब कुम्हारटोली।
ठनठनिया
कहते हैं कि इस इलाके में लोहे का काम होता था। दिन भर की ठन – ठन की आवाज से प्रेरित होकर इस जगह का नाम ही ठनठनिया पड़ गया। वहीं कुछ लोग कहते हैं कि बहुत पहले यहाँ डकैतों का उत्पात था, जब भी उनकी आहट मिलती, लोगों को सजग करने के लिए ठन -ठन करके मंदिर का घंटा बजाया जाता था…ठनठनिया काली बाड़ी यहाँ है। वहीं सुकुमार सेन लिखते हैं कि यहाँ की जमीन बंजर थी और कुदाल से मिट्टी खोदने पर ठन – ठन की आवाज आती थी इसलिए यह जगह बन गयी ठनठनिया।
बैठकखाना रोड
लालबाजार से पूर्व की ओर मराठा खात (बाद में सर्कुलर रोड और आज का ए जे सी बोस रोड) तक का इलाका कहलाता था बॉयटोकोना स्ट्रीट और इस नाम की उत्पत्ति बैठकखाना नाम से हुई है। तब इस इलाके में एक प्राचीन वट वृक्ष हुआ करता था जिसके नीचे व्यवसायी अपना माल – पत्तर लेकर बैठते थे। कहा जाता है, जॉब चार्नाक ने जब कलकत्ते को वाणिज्य केन्द्र के रूप में चुना, तब वे यहाँ आया करते थे। वुड के नक्शे में बैठकखाना के वटवृक्ष का उल्लेख है। इसके पूर्व की ओर जलाभूमि थी। 1794 में एरन एपजन के नक्शे में भी बैठकखाना का उल्लेख है मगर जो जगह दिखायी गयी है, वह आज का सियालदह स्टेशन है। आज बऊबाजार यानी विपिन बिहारी गांगुली स्ट्रीट से महात्मा गाँधी रोड तक का इलाका आज भी बैठकखाना रोड ही है। इस सड़क के दक्षिण की ओर जो राजबाड़ी है, वह भी बैठकखाना बाजार ही है।
बऊबाजार
आज का बीबीडी बाग (विनय – बादल – दिनेश बाग) से सियालदह तक यह इलाका फैला था। बाद में इसे बऊबाजार स्ट्रीट कहा जाने लगा। एक मान्यता के अनुसार विश्वनाथ मतिलाल ने अपनी पुत्रवधू के नाम पर एक बाजार लिख दिया था जो निर्मल चन्द्र स्ट्रीट में था। बाद में विकृत होकर बऊबाजार कहलाया लेकिन इतिहासकार इस व्यवसायी की पहचान नहीं कर सके हैं। एक और मान्यता के अनुसार इस इलाके में बहुत से बाजार होने के कारण यह इलाका बऊबाजार कहलाने लगा और बाद में विपिन बिहारी गांगुली स्ट्रीट नाम रखा गया।
लाल बाजार और बो बैरक
अमृतलाल बसु की आत्म स्मृति के अनुसार आज के लाल बाजार के सामने सेना की छावनी थी। सेना की छावनी के कारण ही इसे बो बैरक कहा गया।
लाल दीघी
जॉब चार्नाक के आगमन के पहले डिहि कलिकाता गाँव में लाल दीघी के अस्तित्व का उल्लेख मिलता है। लाल दीघी के पास सवर्ण रायचौधरी परिवार की कछारी के पास गृहदेवता श्याम राय मंदिर था। अनुमान है कि दोलजात्रा के उपलक्ष्य में रंग खेलने के बाद इस दीघी यानी जलाशय का रंग लाल हो उठता था इसलिए इसे लाल दीघी कहा जाने लगा। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी ने यह काछारिबाड़ी पहले किराये पर ली और बाद में खरीद ली। वहीं कुछ लोग इस नाम के पीछे की वजह बताते हैं कि पास स्थित ओल्ड मिशन चर्च के लाल रंग की छाया इस जलाशय में पड़ने पर वह प्रतिबिम्बित होता था। यह भी कहा जाता है कि लाल चांद बसाक ने इस जलाशय का निर्माण करवाया था।
चौरंगी
आज जहाँ चौरंगी है, कभी घने जंगल हुआ करते थे। यहाँ तब तीन छोटे गाँव चौरंगी, बिरजी और कोलिम्बा थे। कहते हैं कि चौरंगी नाथ नाम के नाथ सम्प्रदाय के एक संन्यासी इस इलाके में रहते थे और उनके नाम पर ही इस जगह को चौरंगी कहा जाने लगा।
मलंगा लेन
इस इलाके में नमक के गोले बनते थे। नमक के कारोबारियों को मालंगी कहा जाता था और इसी से इस इलाके का नाम मलंगा पड़ गया।
शांखारिटोला
शंख बनाने के कारीगर यहाँ रहते थे तो इसे शांखारिटोला कहा जाने लगा।
सन्तोष मित्रा स्क्वायर
यह था नींबूतला माठ यानी मैदान। तब भुवन पाल ने यहाँ एक बाजार बसाया जो भुवन पालेर बाजार या नैड़ो गिरजा बाजार व नेबूतला बाजार के नाम से मशहूर हुआ। तब यहाँ पर नींबू के बहुत से पेड़ थे। कैरानी बागान के नाम का सम्बन्ध भी बहुत से लोग नींबू के पेड़ से जोड़ते हैं। इसके पहले इस इलाके को सेंट जेम्स स्क्वायर कहा जाने लगा और इसके बहुत पहले इस जगह का नाम था हजूरीमल टैंक। ये एक पंजाबी कारोबारी थी जिन्होंने 55 बीघा घहरा जलाशय खुदवाया इसलिए लोग इसे पद्मपुकुर या हजूरीमल टैंक कहते थे। बाद में तालाब भर दिया गया और बन गया मूचिपाड़ा थाना और कैरानी बागान क्योंकि तब इस बागान में कम्पनी के पुर्तगीज कैरानी रहा रहा करते थे। बाद में यही कैरानीबागान नींबूतला या लेबूतला माठ कहा जाने लगा। आज शहीद सन्तोष मित्र के नाम पर इसे सन्तोष मित्र स्क्वायर कहा जाता है।
टालीगंज
मेजर विलियम टेली ने 1775 -1776 में कोलकाता के साथ असम और पूर्व बंगाल को जोड़ने के लिए नाला खुदवाने और ड्रेजिंग का काम शुरू करवाया। तब ईस्ट इंडिया कम्पनी ने टेली को यह नाला देकर यातायात के लिए नौकाएं देकर टोल अदा और नाले के किनारे एक गंज या बाजार स्थापित करने की अनुमति दी थी। 1776 में यह काम पूरा हुआ और आम जनता के लिए इसे खोला गया। यह टाली नाला टेली के नाम पर टॉलीर नाला (अंग्रेजी में टेलिज कैनल ) कहा जाने लगा औऱ इनके द्वारा स्थापित बाजार टालीगंज कहा जाने लगा। नाले के पूर्व की ओर आज के टाली गंज रोड के पास कहीं यह बाजार हुआ करता था और बाद में इसके दोनों किनारों पर स्थित अंचल टालीगंज कहलाने लगा।
बालीगंज
1758 में अंग्रेजों ने मीरजाफर से डिहि पनच्चान्न यानी 55 गाँव खरीदे थे और उसी में से एक था बालीगंज। अनुमान है कि यहाँ बालू बिकती थी। 1800 से यह इलाका बालीगंज के नाम से ही मशहूर है।
पोस्ता
हुगली नदी पर पोस्ता घाट के नाम पर पोस्ता क्षेत्र का नाम रखा गया है। पुराने दिनों में, इस क्षेत्र में बंगाली व्यापारियों और बैंकरों का निवास था। उनके ऐश्वर्य और उनकी सम्पत्ति को लेकर बंगाल के इतिहास में किंवदंतियां हैं। उनमें से एक लक्ष्मीकांत धर उर्फ नुकु धर थे। वह हुगली के पतन के बाद सूतानाटी आये और वहीं बस गये। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने मराठों के खिलाफ लड़ने के लिए अंग्रेजी शासकों को नौ लाख रुपये उधार दिए थे। उन्होंने नियमित रूप से रॉबर्ट क्लाइव को पैसे दिए। यह ज्ञात है कि जब नवकृष्ण देव उनके पास एक नौकरी की तलाश में आये थे, तो उन्होंने अंग्रेजी से नवकृष्ण देव को मिलवाया और उन्होंने उन्हें नौकरी दिलवायी। नुकु धर के पोते सुखमय राय को अपने दादा की संपत्ति विरासत में मिली। क्योंकि, उनकी माँ नुकु धर की एकमात्र संतान थीं और वह अपने दादा के एकमात्र पोते थे। जब अंग्रेज नुक्कड़ धर को ‘राजा’ की उपाधि देना चाहते थे तो नुकू धर ने अपने पोते को य़ह उपाधि को देने का अनुरोध किया। उनके अनुरोध पर, सुखमय रॉय ने राजा की उपाधि प्राप्त की और पोस्ता राजबाड़ी की स्थापना की। हालांकि, शहरी विकास और सड़क निर्माण के लिए महल के कुछ हिस्सों को अब ध्वस्त कर दिया गया है। तीन प्राचीन घर अब भी यहां हैं। ये हैं: राजबाड़ी, लालबाड़ी और ठाकुरबारी।
दमदम
बहुत से लोग दमदम नाम का सम्बन्ध फारसी और अरबी शब्द से जोड़ते हैं जहाँ इसे दमदमा कहा गया है, जिसका अर्थ ऊँचा टीला है। क्लाइव के आने से पहले ही क्लाइव हाउस था और उसके पास ऊँचा टीला भी है। यहाँ एएसआई खनन कार्य कर रही है। दमदम ऑर्डनेंस फैक्र्ट्री बाद में बनी।
तिरहट्टी
पहले यह आमड़ातला था। 1782 -83 में एडवर्ड टिरटो ने इस इलाके में बाजार बनाया औऱ इनके नाम ही तिरहट्टी बाजार नाम पड़ा।
स्त्रोत साभार – कोलकाता मेगा सिटी फेसबुक पेज
प्रदर्शनी में दिखी आगे बढ़ने की चाहत

कोलकाता : हाल ही में शी के द्वारा आयोजित कलकता फेस्टिवल में कई सारी महिला उद्यमियों ने बढ़ चढ़ कर भाग लिया। उन्होंने अपने स्टॉल लगाए। फैशन से लेकर जेवर और हैंडबैग्स का शानदार संग्रह यहाँ दिखा और साथ ही दिखी इन उद्यमियों की मेहनत और आगे बढ़ने की चाहत। प्रदर्शनी आईसीसीआर में लगी थी और 2 दिन चली।
इस प्रदर्शनी में घूमते हुए मैंने कुछ ऐसी महिलाओं से बात की जो कि अपनी नौकरी के साथ साथ अपना व्यवसाय भी बखूबी सम्भाल रही हैं।
इसमें से सबसे पहला नाम आवां ब्रांड से ऑक्सीडाइज्ड व अफगान ज्वेलरी व्यवसायी शिल्पी सिन्हा का लूँगी। शिल्पी मीडियाकर्मी है, क्राइम बीट देखती हैं और साथ ही अपना व्यवसाय भी सम्भाल रही हैं। शिल्पी अपने जेवर खुद बनाती हैं और ये कस्टमाइज्ड जेवर हैं।
ऐसी ही लगन मैंने देखी मेहन्दी को लोकप्रिय बनाने के लिए काम कर रही मेहन्दी कलाकार, सारा खान में। किसी प्रकार का प्रमाणपत्र वाला कोर्स सारा ने नहीं किया। मेहन्दी की कला उन्होंने बचपन में खेल खेल में ड्राइंग करते करते खुद ही सीखी है और आज एक मेंहदी आर्टिस्ट के रुप में हमारे सामने है उनका कहना है कि कोई भी काम छोटा बड़ा नहीं होता बस उसमे आपकी रुचि होनी चाहिए।
इन उद्यमियों को देखकर यह तो स्पष्ट हो जाता है कि आज स्त्री के कार्य क्षेत्र का दायरा बढ़ रहा है। वह परिवार, जिम्मेदारियाँ और सपने, सब साथ लेकर चल रही है और यह प्रदर्शनी मेरी नजर में उसका प्रमाण है।
(शुभांगी शुभजिता की प्रशिक्षु पत्रकार हैं)
इस बार ऑनलाइन आयोजित होगा हिन्दी मेला
स्त्रियों को उनका उचित प्राप्य कब देना सीखेगा, हमारा समाज

ऐ सखी सुन -9
सभी सखियों को नमस्कार। उम्मीद है सखियों कि आप सभी मजे में होंगी और अपनी जिंदगी को अपने- अपने तरीके से बदलने की पुरजोर कोशिश में लगी होंगी। थोड़ा- थोड़ा ही सही, अगर बदलाव आयेगा तो जिंदगी खुद ब खुद पुरसुकून हो जाएगी।
प्यारी सखियों, बहुत दिनों से एक बात मन को मथ रही है और आज उस घुटन को आपसे साझा कर रही हूँ। दुख इस बात का है कि जिस स्त्री के लिए यह कहा जाता है कि उसके बिना घर- आँगन सूना -सूना लगता है। जिस घर में स्त्री ना हो वह घर घर नहीं कहलाता। ऐसे घर के लिए कहा जाता है, “बिन घरनी घर भूत का डेरा”। ब्याह करके जब बहू घर आती है तो उल्लास के साथ उत्सव, प्रीतिभोज आदि का आयोजन किया जाता है। लेकिन मुश्किल तो यह है कि बहू का तो हम स्वागत करते हैं, बेटी का नहीं। स्वागत तो दूर की बात है कई बार तो हम उनके जन्म का पथ ही अवरूद्ध कर देते हैं जरा सोचो तो सखी कि जब बेटियाँ जन्मेंगी ही नहीं तो किसी के घर में बहू बनकर भला कैसे जाएंगी और उस घर को सही मायनों में घर कैसे बनाएंगी। देश के एक बड़े हिस्से में इस कदर बेटियों का अकाल पड़ गया है कि उन्हें अपने बेटों के लिए पत्नियाँ और घर के लिए बहुएँ खरीद कर लानी पड़ती हैं। सखियों, जब तक हम इस दोहरी मानसिकता के घेरे में कैद रहेंगे जिसके तहत नवरात्र के अवसर पर कन्याओं को जिमाएंगे, उनके पैर पूजेंगे लेकिन अगर हमारे घर में कन्याएँ पैदा होंगी तो शोक के सागर में गोते लगाने लगेंगे तब तक देश में लड़की और लड़के के बीच का आंकड़ा असमान ही रहेगा।
सखियों, हमारे समाज में कन्या और पुत्र के बीच में हमेशा एक विभाजन रेखा खिंची रहती है और इसकी शुरुआत उनके जन्म के अवसर से ही हो जाती हे। जहाँ पुत्र जन्म के अवसर पर उत्सव मनाया जाता है और उल्लास से भरकर घर और मोहल्ले की स्त्रियाँ सोहर गाती हैं, धूमधाम से उनकी छठी और बरही की जाती है वहीं कन्या के जन्म लेने पर मुँह फीका करके लोग कहते हैं कि लक्ष्मी आई है। और पीठ पीछे यह भी कहा जाता है कि डिग्री आई है। उत्सव आयोजन की बात तो छोड़ ही दीजिए और उनके स्वागत में भला सोहर की धुन भी कैसे मुखरित हो। एक बात समझ में नहीं आती सखी कि संतान कन्या हो या पुत्र, जन्मदात्री माँ को तो दोनों को अपनी कोख में वहन करने में, जन्म देने में समान आनंद या वेदना का अहसास होता है लेकिन बच्चे के लिंग का पता चलते ही क्यों कभी स्वयं माता या घरवालों का मुँह सूख जाता है तो कभी खुशियों के कमल खिल जाते हैं।
सखियों, यह भेदभाव बच्चों के जन्म से शुरू होकर जीवनभर जारी रहता है। लड़के का जन्मदिन धूमधाम से मनाया जाता है लेकिन लड़की के लिए हाथ ही नहीं उठता। और इसी सोच का परिणाम है कि हमारे समाज में प्रसिद्ध पुरूषों की जयंती जिस जोर -शोर और धूमधाम से मनती है, स्त्रियों की नहीं। वे चाहे समाज सेविका हों, राजनीतिज्ञ हों या साहित्यकार। और सखियों, इस तथ्य को पूरा समाज भले ही नकारने की कोशिश करें लेकिन इससे सच्चाई बदल नहीं जाती। इस बात का सबसे बड़ा और ज्वलंत उदाहरण है कि पूरा हिंदी साहित्य इस वर्ष प्रख्यात साहित्यकार फणीश्वरनाथ रेणु की जन्मशती उल्लासपूर्ण ढंग से मना रहा है। उन पर केंद्रित न जाने कितने आयोजन हो रहे हैं, पत्रिकाओं के विशेषांक प्रकाशित हो रहे हैं लेकिन हिंदी साहित्य की एक प्रखर लेखिका का भी यह जन्मशताब्दी वर्ष है, यह तथ्य हमारी स्मृति से तकरीबन खारिज ही हो चुका है। अपनी आत्मकथा “पिंजड़े की मैना” के माध्यम से स्त्रियों की पारंपरिक नियति को रेखांकित करनेवाली, उसकी छटपटाहट को शब्दबद्ध करनेवाली और उसे मुक्ति का प्रकाश दिखानेवाली एक सशक्त और प्रभावशाली लेखिका चंद्रकिरण सोनरेक्सा की स्मृति बहुत कम लोगों के मन में बची है। स्त्री दर्पण जैसे मंचों को छोड़ दें तो 19 अक्टूबर 1920 में पेशावर.छावनी में जन्म लेनेवाली और हिंदी साहित्य को अपने महत्वपूर्ण रचनात्मक अवदान से समृद्ध करनेवाली, चंद्रकिरण सौनरेक्सा की जन्मशती न तो किसी को याद है और ना ही उसे लेकर किसी आयोजन की सुगबुगाहट ही सुनाई दे रही है।
और मेरी प्यारी सखियों, इसके पीछे है हमारे रूढ़िग्रस्त समाज की वही पुरातन सोच कि पुरूष का स्थान स्त्री से ऊपर है और इसीलिए आयोजन के केन्द्र में अधिकांशतः पुरूष ही रहता है स्त्री नहीं। भले ही उस स्त्री का अवदान कितन भी अधिक महत्वपूर्ण क्यों ना हो या कद कितना भी ऊंचा क्यों ना हो, पुरूष के पौरूष की आभा के आगे वह अनायास ही निष्प्रभ हो जाती है। जिस पिछड़े हुए समाज में स्त्री के जन्म पर कोई उल्लास नहीं प्रकट किया जाता, कोई उत्सव आयोजित नहीं होता, उसी समाज के तथाकथित प्रगतिशील और सुशिक्षित लोग भला उसकी जन्मशती पर कोई आयोजन क्यों करेंगे। और आश्चर्य इस बात का है कि इस तरह की घटनाएँ उस दौर या वर्ष में भी घटती हैं जब साहित्य के क्षेत्र में वर्ष 2020 का नोबल पुरस्कार एक महिला अर्थात अमेरिकन कवयित्री लुईस ग्लक को मिलता है।
सखियों, समय आ गया है कि माताओं को स्वयं पुत्री के जन्म पर भी सोहर गाने की परंपरा का सूत्रपात करना होगा और उसे भी आयोजन के केन्द्र में बैठाना होगा, तभी समाज बदलेगा और सोच भी। प्रसिद्ध लेखकों की तर्ज पर लेखिकाओं के लिए भी शताब्दी उत्सवों का आयोजन जोर -शोर से होगा। फिलहाल विदा, सखियों। अगले हफ्ते फिर मुलाकात होगी।
कोविड – 19 : रामकृष्ण मिशन ने वितरित की डिजिटल नोट बुक
नयी दिल्ली : कोविड काल में समाजिक रूप से पिछड़े छात्रों को मुख्य धारा से जोड़ने के लिए राम कृष्ण मिशन , दिल्ली ने उन्हें नोट बुक उपलब्ध करवाये। अभी 26 विद्यार्थियों को इसका लाभ मिला है। कोविद -19 महामारी राहत के तहत हमारे निरंतर प्रयासों के एक हिस्से के रूप में, मिशन ने गरीब और मेधावी छात्रों को एक वर्ष के लिए वैध एक प्रीपेड एयरटेल सिम कार्ड के साथ 26 डिजिटल नोटबुक वितरित की, जिसमें कुल राशि रु 2,60,000 रुपये खर्च हुई। मिशन अपने फ्री टी.बी के माध्यम से गरीबों और जरूरतमंदों को कंबल भी वितरित कर रहा है। करोल बाग में क्लिनिक और चिकित्सा केंद्र भी है। यह जानकारी मिशन के सचिव स्वामी शान्तमनानंद द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति से मिली।
स्वदेशी व स्थानीय ग्रामीण उत्पादों को वैश्विक बनाने हेतु आगे आए कॉरपोरेट जगत : पीएम
नयी दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि आत्मनिर्भर भारत की मुहिम को मजबूत बनाने में व्यापार मण्डलों तथा कॉरपोरेट जगत की महत्वपूर्ण भूमिका है। नया भारत अपने सामर्थ्य और संसाधनों पर विश्वास करता है। पीएम ने शनिवार को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए एसोचैम फाउंडेशन वीक 2020 को संबोधित किया। इसमें उन्होंने कहा कि जो बदलाव हम देखना चाहते हैं, वे हमें संस्थानों में भी करने होंगे। हमें दुनिया की बेस्ट प्रैक्टिस को अपनाना होगा, जो समाज के साथ ज्यादा तालमेल से संभव होगा। उन्होंने कहा कि पहले कहा जाता था कि ‘वाई इंडिया, अब कहा जाता है वाई नॉट इंडिया’। उन्होंने एसोचेम को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में सहयोग देने, स्टार्टअप और युवाओं को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया।
पी एम ने कहा कि कई बार लोग कहते हैं कि ये सेक्टर बढ़िया है, ये शेयर बढ़िया है, इसमें इन्वेस्ट कर दो। हम ये देखते हैं कि सलाह देने वाला भी इसमें निवेश कर रहा है या नहीं। महामारी के दौरान दुनिया निवेश के लिए परेशान है और भारत में निवेश करने के लिए बहुत से देश आगे आ रहे हैं। आज आपके पास निवेश के लिए संभावनाएं और नए अवसर भी हैं।
मोदी के भाषण की खास बातें
1. रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर जोर दिया जाए
निवेश के लिए रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर चर्चा जरूरी है। अमेरिका में इस पर 70% निवेश निजी क्षेत्र करता है। हमारे यहां इतना निवेश सार्वजनिक क्षेत्र की ओर से किया जाता है। हमारे यहां हर कंपनी को इसके लिए राशि तय करनी चाहिए। विदेश मंत्रालय, कॉमर्स एंड ट्रेड और एसोचैम के बीच बेहतर तालमेल समय की मांग है। कार्यप्रणाली को बेहतर बनाने के लिए उक्त व्यापार मण्डल से सुझाव भी माँगे।
3. कोरोना के दौरान मदद पर
कोरोना काल में मुश्किलों के बावजूद भारत ने दुनिया में दवाएं पहुंचाईं। वैक्सीन के मामले में भी भारत दूसरों की जरूरतों पर खरा उतरेगा।
4. स्वदेशी उत्पादों का प्रचार हो
एसोचैम के सदस्य ग्रामीण उत्पादों का प्रचार कर उसे वैश्विक बनाने में मदद कर सकते हैं। आज हमें समझ नहीं आता कि हमारे खाने की टेबल पर कितनी विदेशी चीजें सजी होती हैं। हमारी अपनी चीजों, पैदावार का एसोचैम द्वारा प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए। सभी को इस दिशा में मिलकर काम करने की जरूरत है।




