Thursday, April 9, 2026
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आम आदमी की जिंदगी का रोजनामचा : ‘बदलते चैनल और अन्य कहानियां’

प्रो. गीता दूबे

आज के समय में जो कहानियां लिखीं या बुनी जा रही हैं उन्हें लेकर एक सहज सवाल हमारे मन में उठता है कि आखिर इनका उत्स कहाँ है, वास्तविक जिंदगी में या महज कल्पना की दुनिया में। निश्चित तौर पर कहानी लेखन का एक दौर ऐसा भी गुजरा है जब सिर्फ कल्पना का संसार कहानियों के माध्यम से उद्भासित हुआ है लेकिन उस कल्पानशीलता के माध्यम से भी वास्तविक जिंदगी की निर्ममता के बरक्स एक खूबसूरत दुनिया बनाने की कोशिश की गई। एक ऐसी दुनिया जहाँ आम और खास सभी को बराबर का हक मिले और सुकून की सांसें मयस्सर हों क्योंकि आम जिंदगी से तो यह सुकून और सुख -चैन निरंतर गायब होता जा रहा है। इस दुनिया के खास आदमियों ने तो फिर भी पुरसुकून जिंदगी का सपना पूरा करने में कुछ हद तक सफलता हासिल की है लेकिन आम आदमी की जिंदगी अभी भी जिंदगी की मूलभूत सुविधाएं जुटाने की कोशिश में ही तार- तार होती नजर आती है। आम इंसान की चुनौतीपूर्ण जिंदगी की इन्हीं मुश्किलों, संघर्ष , विफलता और दुख की छोटी -बड़ी कहानियों को बेहद सरल भाषा में बिना किसी लफ्फाजी या कलाबाजी के हमारे सामने बड़ी सादगी से परोसते हैं कथाकार सुरेश शॉ। उनके दूसरे कहानी संग्रह ‘बदलते चैनल तथा अन्य कहानियां’ में कल्पना की उड़ान के बदले जिंदगी की वास्तविक पूर्णतः यथार्थता के साथ उद्भासित होती है जिसे पढ़ते हुए बरबस यह महसूस होता है कि हम आम आदमी की जिंदगी का रोजनामचा बांच रहे हैं जो अपनी सादगी के बावजूद हमें उद्वेलित भी करता है और उद्विग्न भी, जिससे हम उबरना तो चाहते हैं पर छटपटाकर रह जाते हैं। सुरेश जी लंबे समय से साहित्य की दुनिया में अपनी सक्रिय उपस्थिति बनाए हुए हैं। उनका पहला कहानी संग्रह ‘बाघा’ जनवरी 2004 में रोशनाई प्रकाशन प्रकाशित हुआ था जिसकी कहानियों में भी निम्नमध्यवर्गीय और मध्यवर्गीय आदमी की जिंदगी और व्यवस्था की खामियों के कई मार्मिक चित्र धूसर और मटमैले रंगों में उकेरे गये हैं। समय के साथ जीवनगत अनुभवों के ही नहीं कहानियों के रंग भी और अधिक सान्द्र और परिपक्व  हुए हैं जिन्हें पढ़ना  देश और समाज के साथ ही आम आदमी की जिंदगी के कई जाने- अनजाने मोड़ों से गुजरने सरीखा लगता है। 

आम आदमी की जिंदगी की तीन मूलभूत आवश्यकताओं में से एक है मकान। रोटी और कपड़ा तो कई बार आदमी मेहनत मजदूरी करके जुटा ही लेता है लेकिन सबसे बड़ी समस्या होती है मकान की और इस समस्या से सबसे ज्यादा वह वर्ग जूझता है जो अपने गांव का कच्चा- पक्का घर छोड़कर दूसरे शहर में रोजी- रोटी की तलाश में पहुंचता है। पेट की भूख शांत होते ही जो सबसे महंगा सपना वह देखता  है वह महज घर का नहीं ‘अपने घर’ का होता है क्योंकि किराए के घर में सालों- साल पैसा देते रहने के बावजूद वह पराया ही रहता है, जहाँ एक कील ठोंकने के लिए भी मकान मालिक की इजाज़त लेनी पड़ती है और करणीय या अकरणीय की सूची इतनी लंबी होती है कि उसपर अमल करने से ज्यादा समय उसे पढ़ने में लगता है। लेकिन तथाकथित सफेदपोश इंसान न तो पेड़ के नीचे जिंदगी बसर कर सकता है न ही सड़क पर इसीलिए उसे मकान मालिक की तमाम शर्तों को सिर झुकाकर स्वीकार ही नहीं शिरोधार्य भी करना पड़ता है। और शायद इसीलिए किराए के घर बदलते -बदलते तंग आकर एक स्थाई पते की ख्वाहिश में यह आम आदमी जो सपना देखता है वह है अपने घर का सपना। हालांकि एक कहावत हमारे समाज में खूब प्रसिद्ध है कि “मूर्ख आदमी घर बनाता है और बुद्धिमान आदमी उसमें रहता है” लेकिन आज के समय में कोई भी बेचैन बुद्धिमान की बजाय सुखी मूर्ख बनना ज्यादा अच्छा समझता है। एक दौर वह भी था जब प्रवासी मजदूर या किरानी बड़े शहरों में आकर रोजी- रोटी तो कमाते थे लेकिन यहाँ बसने का सपना नहीं देखते थे। वह शहर की कमाई से गांव में पक्का मकान , कुआँ , मंदिर आदि बनवाते थे या फिर वहाँ खेत खरीदकर खुश होते थे क्योंकि उनका सपना नौकरी की समाप्ति के बाद गांव में बसने का होता था। यह बात और है कि अपने इस सपने को पूरा करने की खातिर वह अपनी जिंदगी के छोटे- छोटे सुखों का भी त्याग कर देते थे। उनका पूरा परिवार गांव में रहता था और वह अकेले सेना के सिपाही की तरह नौकरी और जिंदगी के मोर्चे पर तैनात रहते थे। लेकर बदलते समय के साथ इस प्रवासी कामकाजी आदमी की मानसिकता के साथ- साथ उसकी जिंदगी के इस ढर्रे में भी बदलाव आया। वह अपने परिवार को यहाँ लाकर बाल -बच्चों को शहर में पढ़ा- लिखाकर, बड़ा आदमी बनाने का सपना देखने लगा ताकि प्रवासी के बदले वह शहर का वासी बन पाए और ठीक उसी समय उसे एक स्थाई पते की जरूरत भी महसूस होने लगी जिसे पूरा करने के लिए वह एक बार फिर से अपने घर का सपने देखने लगा। आम आदमी के इस छोटे से सपने की खुशी और उसे पूरा कर पाने के संघर्ष को कथाकार सुरेश ने बड़े मर्मस्पर्शी ढंग से आलोच्य कथा संग्रह की पहली कहानी “द रीयल प्लाट” में उकेरा है और उसके टूटन की कठोर हकीकत को भी बेहद तकलीफदेह अंदाज़ में बयान किया गया है। 1977 में एक फिल्म आई थी “घरौंदा” जिसमें अमोल पालेकर और जरीना वहाब बड़े अरमानों से एक घर का सपना देखते हैं और अपनी जमापूंजी उसमें झोंक देते हैं ताकि अपने नये जीवन की शुरुआत कर सके लेकिन बिल्डर उनके और उन जैसे तमाम लोगों के पैसे लेकर गायब हो जाता है और नायक- नायिका की उम्मीदों का घरौंदा आबाद होने के पहले ही बिखर जाता है। इसी तरह आलोच्य कहानी के दिवाकर बाबू अपना घर बनाने का ख्वाब तो पालते हैं लेकिन अपने ही आस -पास के ईर्ष्यालु और मौकापरस्त लोगों के षडयंत्र का शिकार होकर पैसा तो गंवा देते हैं लेकिन प्लाट नहीं खरीद पाते। इंसान के टूटते भरोसे और दुनियादारी के अभाव में ठगे जाने की नियति आज के आम आदमी की नियति को दर्शाती है जो न जाने कितने धोखे खाकर भी इस बेदर्द दुनिया में चैन से जीने का सलीका नहीं सीख पाता। दिवाकर बाबू जैसे लोग झट से दूसरों पर भरोसा करके उम्मीदों की दुनिया सजाने लगते हैं और तपन दास जैसे चालाक लोग तो जैसे इस दुनिया को उजाड़कर अपनी जेब भरने की ताक में ही बैठे रहते हैं। तो ऐसे में आम आदमी की एक ही नियति है, ठगे जाना और टूट जाना।  तो क्या आदमी भरोसा करना छोड़ देता है, बिल्कुल नहीं। वह फिर भरोसा करता है , रिश्ते बनाता है और उन रिश्तों को निभाने की भरदम कोशिश भी करता है। इसी कोशिश में “बदस्तूर चलती जिंदगी” की जोधाबाई अपने ही भाई के हाथों छली जाती है लेकिन इन तमाम धोखों के बावजूद रिश्तों की डोर को चटकने नहीं देती पर अपनी तकलीफ और हताशा को अपने घर में अभिव्यक्ति जरूर देती है। इसी तरह मानवीय सरोकारों के कारण “वह लड़की” कहानी का सूत्रधार अपने पड़ोस में रहनेवाली उस भली सी लड़की के प्रति जिज्ञासु हो उठता है जो अपने घर की छत पर खड़ी होकर सधे हुए स्वर में रोज रवींद्र संगीत गाया करती थी। उसकी सुरीली आवाज से प्रभावित डा. बाबू उसके जीवन के बारे में जानना चाहते हैं और यह जानकर दुखी हो जाते हैं कि वह भी अपने जीवन में ठगी गई है, अपने ही बॉस या प्रेमी के हाथों। वह उसकी सहायता तो करना चाहते हैं लेकिन उसके पहले ही षड्यंत्र का शिकार होकर लड़की पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर ली जाती है और रात लॉकअप में गुजारने के बाद सुबह मृत पाई जाती है। रात की ड्यूटी पर तैनात जवान ने डा. के पूछने पर बताया कि लॉकअप के अंदर जाते ही लड़की एक से बढ़कर एक दर्दनाक रवींद्र संगीत के गीत रातभर गाती रही।” (प . 24) ओर अपने जीवन का सारा दर्द अपने गीतों में उड़ेलकर वह सुबह चिरनिद्रा में लीन हो गई। इसी तरह न जाने कितनी मासूम लड़कियाँ प्रेम के नाम पर शोषित होकर, जीवन से निराश होकर दम तोड़ देती हैं और उनकी इस नियति पर उनकी गरीब माएँ शर्मसार होती हैं, जबकि शर्मसार तो उन लोगों को होना चाहिए जो ऐसी भोली -भाली गरीब लड़कियों से उनका सब कुछ छीनकर उन्हें सिसक- सिसक कर मरने के लिए छोड़ देते हैं। ऐसी लड़कियों को समाज थोड़े ही दिनों में विस्मृत कर देता है और किसी को उनका नाम भी याद नहीं रहता , संभवतः इसीलिए लेखक भी उसे ‘वह लड़की’ ही कहता है। इस कहानी की एक खूबी यह भी है कि किसी भी पात्र को किसी नाम से संबोधित नहीं किया गया है। सारे पात्र सर्वनाम या जातिवाचक संज्ञा द्वारा उल्लिखित हैं, मानो वह इतने क्षुद्र या साधारण हैं कि उन्हें किसी नाम की आवश्यकता भी नहीं है। ऐसे पात्र हमें हर गली, मुहल्ले में मिल जाएंगे। लेकिन इन लोगों की बड़ी खूबी है कि संभवतः इन्हीं के अंदर संवेदनशीलता का स्रोत भी सुरक्षित है और ऐसे लोग ही बावजूद अपनी तमाम दिक्कतों और अभावों के मनुष्यता को क्षरित होने से बचाए रखते हैं। और इसी कारण इन कहानियों में कुछ ऐसे चरित्र बिखरे हुए हैं जो अपने प्रेम और संवेदनशीलता से पाठकों को प्रभावित जरूर करते हैं। जैसे ‘अश्रुधारा’ कहानी की निसंतान चाची जो अपनी सारी ममता अपने जेठ के पुत्र सुधाकर पर उड़ेल देती हैं और बदले में कुछ नहीं चाहतीं। एक- आध बार शहर में आती तो हैं लेकिन उस परिवेश में खुद को मिसफिट पाकर गांव वापस लौट जाती हैं। हालांकि सुधाकर को वह निरंतर अपनी कुशलता का समाचार भेजकर आशवस्त और चिंतामुक्त करती हैं लेकिन वह यह समझता है कि “उनकी बूढ़ी आंखें सदैव किसी अतृप्त तृष्णा का शिकार बनी रहती हैं और इन्हीं प्यासी आँखों की कोरों से सदैव आंसुओं की धारा बहती रहती है।’ (पृ. 96) लेकिन सब जान -समझकर  उनके लिए कुछ कर पाने में असमर्थ सिद्ध होता है क्योंकि शहरी जीवन की सुविधाओं और असुविधाओं ने उसे इस तरह जकड़ रखा है कि उससे निकलने का कोई रास्ता उसे समझ ही नहीं आता। निम्न मध्यवर्गीय  शहरी जीवन और उसकी छोटी- बड़ी बहुत सी परेशानियों के चित्र कई कहानियों में अंकित हुए हैं। “बदलते चैनल” ऐसी ही कहानी है जिसमें भौतिक सुख- सुविधाओं और टेलीविजन के बदलते चैनलों में परोसे गये नकली पर चमचमाते संसार की चकाचौंध के कारण अमर का भविष्य डगमगाने लगता है लेकिन ठोकर खाने के बाद जिंदगी संभलने का सलीका भी सिखा ही देती है और उसके पिता भी उसे भटकने से बचाने का संकल्प कर उसके लिए समय निकाल ही लेते हैं। 

पेशे से अध्यापक सुरेश जी ने अपने अध्यापकीय अनुभवों को कई कहानियों में विश्वसनीयता से पिरोया है। शिक्षक   वह भी हिंदी का जिस  सामाजिक उपेक्षा और उससे उत्पन्न हीनभावना का शिकार हो जाता है वह “कसमें वादे” कहानी में खूबसूरती से उभरा है। “गुहार” में शिक्षकों के बीच में चलने वाली रस्साकशी और ईर्ष्या द्वेष के साथ- साथ एक समय में देश में गोमांस खाने को लेकर चली बहस की ओर भी व्यंग्यपूर्ण संकेत किया गया है लेकिन शिक्षकों की उठापटक जितनी ज्यादा उभरकर आई है उतना वह व्यंग्य नहीं। कई बार बेहद सहज- सरल फ्रेम में कैद कहानियां सपाटबयानी का शिकार भी हो गई हैं। जैसे “प्रार्थना” जो स्कूल शिक्षकों के धूम्रपान और उसके दुष्प्रभावों को बयान करती एक साधारण कहानी है। यह कहानी का व्यंग्य और संदेश थोड़ा और मारक और प्रेरक हो सकता था लेकिन इसके बजाय वह स्कूल की उथली राजनीति का वर्णन मात्र करके रह जाती है जिसका चित्रण दूसरी कई कहानियों में भी होता है। “कैरी आन” कहानी में भी स्कूली परिवेश और वहाँ की राजनीति/ शोषण आदि का चित्रण है। डेविड जैसे शिक्षक अपने मैनेजमेंट की चमचागिरी कर अपनी जिंदगी को किसी भी कीमत पर चलाते हुए खुद को दिलासा देते रहते हैं कि, “पद बना रहेगा तो पेट भरा रहेगा” (पृ. 32) इस तरह के चरित्र आम जिंदगी में सहजता से मिल जाते हैं जिनमें से कुछ चापलूसी के बलबूते ही जिंदगी गुजारते हैं और जो चापलूसी या समझौता नहीं करते वह धमकियों से डरकर जिंदगी की गाड़ी चलाने को विवश होते हैं, जैसे प्रमोद सर को यह “फैसला” करना है कि उन्हें मैनेजमेंट का मोहरा बनकर फिराद आलम को स्कूल से बाहर करना है या नहीं और उनका फैसला संभवतः  मैनेजमेंट के पक्ष में ही होगा क्योंकि उनकी नौकरी का सवाल जो है।  जिंदगी की चुनौतियों का सामना करते हुए इस आम आदमी की जिंदगी कई बार ऐसी उलझनों में उलझ जाती है कि वह उससे निकलने का रास्ता नहीं ढूंढ पाता। “संकट के बादल” हिमांशु की जिंदगी को इस तरह घेर लेते हैं कि वह उनसे निकल ही नहीं पाता। हिमांशु के चाचा का जीवन भी जिंदगी की मुख्यधारा से कटे हताश आदमी की पीड़ा को दर्शाता है। न जाने कितने लोग इस तरह घर- बार की मुश्किलों से संत्रस्त होकर अस्वाभाविक जीवन बिताने को विवश हो जाते हैं। 

धर्म के पाखंड और उसके बलबूते फलते- फूलते पाखंडियों पर भी लेखक ने प्रहार किया है। “पुनर्जन्म” कहानी में स्वामी वंगानन्द  महाराज के जीवन के माध्यम से इस संसार में सबसे तेजी से फलते- फूलते धर्म के कारोबार पर तीखा व्यंग्य किया गया है। जिन धर्मगुरुओं को साधारण मनुष्य देवता की तरह पूजता है उनका जीवन कितना कलुषित और अपराध से घिरा हो सकता है इसके बहुत से उदाहरण आज के समाज में आसानी से मिल जाते हैं। आज बहुत से धर्मगुरु अपने अपराधों का प्रायश्चित जेल की सलाखों के पीछे कर रहे हैं। वर्तमान की इन्हीं घटनाओं की छाया इस कहानी में दिखाई देती है। इसी तरह “तकाजा” की नन मेरी उर्फ सोफिया का मिशन के फादर द्वारा किया गया शोषण और सोफिया का मानसिक संताप यह स्पष्ट कर देता है कि प्राय: हर धर्म तमाम तरह के पाखंडियों से भरा हुआ है जहाँ मेरी जैसी बहुत सी ननों या भक्तिनों को धर्मगुरुओं का शारीरक- मानसिक शोषण झेलना पड़ता है। मेरघ तो अपने दोस्त का सहारा पाकर उस नरक से भागकर, सोफिया बनकर अपने जीवन को नया आयाम देने में सफल हो जाती है लेकिन बहुत सी स्त्रियां इस यंत्रणा को आजन्म झेलने का बाध्य होती है और विरोध करनेवाली को किस तरह मौत के घाट उतार दिया जाता है यह हमने आज के दौर में देखा ही है।

सुरेश जी अपनी सजग दृष्टि से देश, समाज और परिवार की विभिन्न घटनाओं को देखते हैं और अपनी कहानियों में उन्हें चुटीले अंदाज में बयां करते हैं। व्यंग्य की धार संग्रह में कैद कुछ लघुकथाओं में और भी तीखेपन से चुभती है। ‘पंचकथा’ शीर्षक के तहत पांच लघुकथाएं संकलित हैं जो मानव मन के विभिन्न परतों को खोलती हुई उसकी अलग अलग मनोदशाओं को बड़ी तटस्थता से सामने रखती हैं। आदमी अपने छोटे- छोटे स्वार्थों के हाथों विवश होकर किस तरह अपने रिश्तेदार, दोस्त या पड़ोसी का दोहन करता है इसके कई निर्मम पर सच्चे चित्र इन कहानियों में मिलते हैं। “अंततोगत्वा” उस तथाकथित बुद्धिजीवी की कहानी है जिसने हमेशा अपने यार -दोस्तों को नीचा दिखाता है लेकिन जीवन की विषम परिस्थितियों में उसे उनकी कीमत तब समझ में आई जब सभी ने उससे कन्नी काट ली और अंततोगत्वा उसने तय किया कि वह अपनी तल्ख टिप्पणियों से बाज आएगा। जिंदगी से बड़ा शिक्षक कोई दूसरा नहीं होता और जिंदगी ही हमें सिखाती है कि हमें कैसा होना चाहिए और कैसा नहीं। “राजकीय शोक” जैसी कहानियां हमारी तकनीक निर्भरता पर व्यंग्य करती हैं और “माटी कहे कुम्हार से” में जीवन की निस्सारता का वर्णन है। 

वस्तुतः सुरेश जी ने अपनी कहानियों में अपने देखे, परखे और भोगे हुए यथार्थ को भरसक पूरी सच्चाई के साथ समेटने का प्रयास किया है। कहीं- कहीं यथार्थ वर्णन की रौ में भाषा थोड़ी भदेस भी हो गई है। सुरेश जी के पात्र और सूत्रधार वैसी ही भाषा बोलते हैं जो आमतौर पर हमारे गली मोहल्लों में बोली और समझी जाती है, जो कभी बहुत मधुर और अपनी सी लगती है तो कभी- कभी कानों को चुभती भी है। कहानियां प्रायः छोटी ही हैं जिसमें लंबा चौड़ा शब्दाडंबर नहीं है। लेखक सीधे- सीधे अपने कथ्य को पाठकों के सामने परोस देते हैं। उनकी यह विशेषता उनकी सफलता भी है और सीमा भी। 

पुस्तक – बदलते चैनल और अन्य कहानियां (कहानी संग्रह)

 लेखक – सुरेश शॉ

प्रकाशक आनंद प्रकाशन

समीक्षक सम्पर्क – 58 ए/ 1 प्रिंस गुलाम हुसैन शाह रोड, यादवपुर, कोलकाता- 700032, मोबाइल-9883224359, ईमेल- [email protected]

 

आयोजित हुआ हिन्दी मेले का ऑडिशन

कोलकाता : सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन तथा यूको बैंक की प्रेरणा शक्ति से आयोजित 26वें हिंदी मेले में ऑडिशन के तीसरे दिन चित्रांकन, कविता पोस्टर और काव्य आवृत्ति वर्ग ‘क’ का ऑडिशन किया गया, जिसमें देश के अलग-अलग हिस्सों से लगभग 550 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। चित्रांकन शिशु वर्ग के लिए विषय का बंधन नहीं था ।वर्ग ‘अ’ के लिए निर्धारित विषय ‘किसान’ पर प्रतिभागियों ने सुंदर चित्र बनाए। कविता पोस्टर ऑडिशन के लिए निर्धारित विषय अज्ञेय की कविता ‘सांप’ का वैविध्यपूर्ण पोस्टर प्रतिभागियों ने बनाया। इस ऑडिशन में निर्णायक की भूमिका में सुलोचना सारश्वत, अनिल गौड़, नागेश शर्मा मौजूद थे ।कार्यक्रम का सफल संचालन निखिता पांडेय, ममता साव,संजय सिंह, हरेकृष्ण यादव तथा इबरार खान ने किया। काव्य आवृति वर्ग ‘क’ के निर्णायक रामकेश सिंह ने कहा-“सभी प्रतिभागियों की प्रस्तुति सराहनीय है।युवा प्रतिभा से समृद्ध नौजवान संभावनाएं से भरे हैं। नीलम कुमारी ने हिंदी मेला वर्चुअल माध्यम के बारे में कहा कि “मेला का यह स्वरूप निश्चित तौर पर ज्यादा व्यापक और आकर्षक है।” इस वर्ग का संचालन राहुल गौड़ और विकास जायसवाल ने किया। चित्रांकन के संयोजक प्रो. इबरार खान के कहा- “बच्चों ने ‘किसान’ विषय पर बेहद गंभीर चित्र बनाएं और अज्ञेय की कविता ‘सांप’ के व्यंग्य को बखूबी पोस्टर का रूप दिया। कविता पोस्टर की संयोजक प्रो. मधु सिंह थीं।

ऑडिशन के पहले और दूसरे चरण में काव्य आवृत्ति, आशु भाषण और वाद-विवाद प्रतियोगिता का आयोजन किया गया।इन प्रतियोगिताओं के ऑडिशन में देश के विभिन्न राज्यों जैसे- पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पंजाब, केरल, मध्य प्रदेश, गुजरात के अलावा विदेश (कनाडा, मॉरीशस) से लगभग 950 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। काव्य आवृत्ति ‘शिशु’ वर्ग, ‘अ’ वर्ग, ‘क’ वर्ग के ऑडिशन को सफल बनाने में निर्णायक के रूप में डॉ विवेक सिंह, प्रो. अल्पना नायक, रामकेश सिंह, प्रो.रेणु गुप्ता, नागेंद्र पंडित और नीलम प्रसाद ने अपना बहुमूल्य समय दिया ।काव्य आवृत्ति का सफल संचालन मनीषा गुप्ता, पूजा सिंह, राजेश सिंह, नैना प्रसाद, गायत्री वाल्मीकि, सूर्य देव राय तथा धन्यवाद ज्ञापन सौमित्र आनंद ने दिया। आशु भाषण ‘अ’ और ‘क’ वर्ग के ऑडिशन में निर्णायक के रूप में प्रो. गीता दूबे, एन. चन्द्र राव, रंजीत कुमार संकल्प, प्रो. नीरज शर्मा उपस्थित थे।आशु भाषण के अंतर्गत ‘सड़क पर किसान’, ‘विज्ञापन और हिंदी भाषा’, ‘सिनेमा का समाज पर प्रभाव’, ‘धार्मिक कट्टरता बनाम मानवता’ आदि जैसे समसामयिक विषयों पर देश-विदेश के प्रतिभागियों ने अपनी प्रस्तुति दी।डॉ गीता दुबे ने कहा कि हिंदी मेला का यह आयोजन भीषण भय के बीच उल्लास और सृजन का अभियान है। कार्यक्रम का सफल संचालन नागेंद्र पंडित, साक्षी झा, प्रीति साव ने किया। वाद-विवाद वर्ग ‘अ’ और वर्ग ‘क’ के ऑडिशन में निर्णायक की भूमिका में प्रीति सिंघी, कलावती कुमारी, गुलनाज़ बेग़म, गौतम लामा ने अपना योगदान दिया और ऑडिशन का संचालन उत्तम कुमार और विकास जायसवाल ने किया। इस अवसर पर भारतीय भाषा परिषद के निदेशक शंभुनाथ ने कहा – “यह युवाओं का मेला है। वर्चुअल माध्यम से मेला राज्य के बाहर निकल कर देश और विदेश के विभिन्न संस्थानों तक पहुँचा है। यह हमारे लिए गर्व का विषय है।”।धन्यवाद ज्ञापन देते हुए संस्था के संयुक्त महासचिव संजय जायसवाल ने कहा हिंदी मेला बच्चों -नौजवानों को रचनात्मक मंच प्रदान करने के साथ सांस्कृतिक आंदोलन की जमीन तैयार कर रहा है।

मिस्र के ‘प्राचीन खजाने’ का मिला रास्ता, 3300 साल पुराने बबून ने दिखाया मार्ग

मिस्र अपनी प्राचीन कहानियों और अपने फिरौन के लिए दुनियाभर में मशहूर है। ऐसी ही एक प्राचीन कहानी है ‘भगवान की जमीन’ की। इसे लेकर कहा जाता है था कि यहां से निकलने वाले लोगों के हाथ हमेशा खजाना लगा करता था। कहा जाता है कि यह दुनिया के सबसे पुराने काल्पनिक कथाओं में से एक है।
पुरातत्वविदों ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि ऐसी एक जगह प्राचीन मिस्र में हुआ करती थी। इसके लिए उन्होंने एक पुराने बबून की खोपड़ी को सबूत के तौर पर पेश किया है, जो 3300 साल पुराना है। इसे लेकर पुरातत्वविदों ने कहा कि यह उसी जगह की है।
लेखों में हुआ यहां के खजाने का उल्लेख
प्राचीन मिस्र में लोगों ने 4500 साल पहले इस स्थान पर जाना शुरू किया और हजारों साल तक यहां की यात्रा करते रहे। इस स्थान को लेकर जितने भी लेख लिखे गए, उसमें खजाने के तौर खाने के सामान से लेकर धातु और दुर्लभ जानवरों का जिक्र था। हालांकि, आज तक किसी के हाथ यह खजाना नहीं लगा पाया है। लेकिन अब बबून की खोपड़ी मिलने के बाद एक बार फिर प्राचीन कथा की ओर पुरातत्वविदों का ध्यान जाना शुरू होगया है।
कहां है खजाने का इलाका
डार्टमाउथ कॉलेज में प्राइमेटॉलजिस्ट नथेनियल डॉमिनो और उनके साथियों को बबून की खोपड़ी एक ब्रिटिश म्यूजियम में सुरक्षित रखी मिली। इसके बाद डॉमिनो ने अपने साथियों संग मिलकर बबून के दांतों में मिलने वाले स्ट्रॉन्शियम के आइसोटोप्स का अध्ययन करना शुरू किया।
बता दें कि जानवरों के दांतों के इनैमल में स्ट्रॉन्शियम के आइसोटोप्स से यह पता चलता है कि जानवर ने किस जगह अपना जीवन बिताया होगा। डॉमिनो ओर उनके साथियों को पता चला कि यह बबून मिस्र में न पैदा होकर हॉर्न ऑफ अफ्रीका के क्षेत्र में पैदा हुआ होगा।
वर्तमान में यहां इरिट्रिया, इशियोपिया और सोमालिया जैसे देश स्थित हैं। माना जा रहा है कि यही क्षेत्र खजाना का इलाका है। इसी आधार पर माना जा रहा है कि यह  बबून उसके खजाने का हिस्सा है। यही कारण है कि माना जा रहा है कि प्राचीन कहानी सच साबित होने वाली है।
वहीं, बॉस्टन विश्वविद्यालय की पुरातत्वविद कैथरिन बार्ड ने साल 2001 से लेकर 2011 तक मिस्र के लाल सागर तट पर स्थित मेर्सा नामक एक जगह पर खुदाई की। इस दौरान उन्हें यहां से 2800 साल पुराना एक पत्थर मिला। पत्थर पर इस जगह का उल्लेख किया गया था। बार्ड ने कहा कि अब नयी खोज के जरिए हमें यह पता चल पाएगा कि आखिर यह जगह कहां स्थित है।

ई-अदालत परियोजना को मिला डिजिटल इंडिया अवॉर्ड

नयी दिल्ली : भारत सरकार के न्याय विभाग की ई-अदालत सेवा परियोजना ने इस साल का डिजिटल इंडिया पुरस्कार जीता है। अधिकारियों ने रविवार को यह जानकारी दी।
उन्होंने बताया कि परियोजना को यह पुरस्कार केंद्रीय मंत्रालय या विभाग में ‘डिजिटल शासन में उत्कृष्टता’ श्रेणी में मिला है। पुरस्कार वितरण समारोह 30 दिसंबर को होने की संभावना है।
उल्लेखनीय है कि ई-अदालत परियोजना की संकल्पना भारतीय न्यायपालिका में सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी को लागू करने के लिए तैयार राष्ट्रीय नीति एंव कार्य योजना-2005के आधार पर बनायी गयी थी । उच्चतम न्यायालय की ई-समिति ने न्यायापलिका में बदलाव के विचार के साथ राष्ट्रीय नीति एंव कार्य योजना सौंपी थी। ई-अदालत परियोजना मिशन के तहत पर पूरे देश में चलाई जा रही है और जिला अदालतों को डिजिटल करने की इस परियोजना की निगरानी एंव वित्तपोषण न्याय विभाग कर रहा है।

कोविड-19 महामारी की वजह से घटी परिवारों की बचत : सर्वे

नयी दिल्ली: कोविड-19 महामारी की वजह से परिवारों की बचत में गिरावट आई है। एक सर्वे में बड़ी संख्या में उपभोक्ताओं ने कहा है कि महामारी की वजह से उनकी बचत कम हुई है।
सर्वे में कहा गया है कि नौकरी छूटना, वेतन कटौती या भुगतान में देरी जैसी वजहों से परिवारों की बचत प्रभावित हुई है। लोकल सर्किल्स के उपभोक्ताओं के रुख पर छमाही सर्वे में कहा गया है कि महामारी के अब नौ माह हो गए हैं। बड़ी संख्या में उपभोक्ता रोजगार गंवाने और वेतन कटौती की वजह से अपनी वित्तीय स्थिति में आई गिरावट से उबर नहीं पाए हैं। सर्वे में शामिल 8,240 लोगों में से 68 प्रतिशत ने कहा कि कोविड-19 महामारी की वजह से पिछले आठ माह में उनकी बचत घटी है।
यह सर्वे त्योहारी सीजन के दौरान उपभोक्ताओं के खर्च के रुख, अगले चार माह के लिए खर्च की योजना, परिवार की आमदनी को लेकर उम्मीद तथा मार्च तक बचत की स्थिति के आकलन के लिए किया गया है।
सर्वे पर देश के 302 जिलों से करीब 44,000 प्रतिक्रियाएं मिलीं। इसमें 62 प्रतिशत पुरुष और 38 प्रतिशत महिलाएं शामिल हैं। सर्वे में शामिल लोगों में से 55 प्रतिशत पहली श्रेणी के शहरों से है। 26 प्रतिशत दूसरी श्रेणी और 19 प्रतिशत तीसरी और चौथी श्रेणी के शहरों या ग्रामीण जिलों से हैं।
सर्वे के अनुसार, करीब 50 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे अगले चार माह के दौरान विवेकाधीन उत्पाद या संपत्तियां खरीदने पर खर्च करेंगे। ‘‘करीब 10 प्रतिशत लोगों का कहना था कि अगले चार माह में उनकी विवेकाधीन खरीद पर 50,000 रुपये से अधिक खर्च करने की योजना है। वहीं 21 प्रतिशत ने कहा कि इस अवधि में वे 10,000 से 50,000 रुपये खर्च करेंगे।

भारतीय डाक, आईपीपीबी के ग्राहक अब ऐप ‘डाकपे’ के जरिए कर सकेंगे लेन-देन

नयी दिल्ली : डाक विभाग (भारतीय डाक) और भारतीय डाक भुगतान बैंक (आईपीपीबी) के उपभोक्ता अब ऐप ‘डाकपे’ के जरिए बैंकिंग सेवाओं का परिचालन कर सकते हैं। संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने मंगलवार को इस ऐप की शुरुआत की। डाकपे देशभर में भारतीय डाक और आईपीपीबी द्वारा डाक नेटवर्क के जरिए प्रदान की जाने वाली डिजिटल वित्त और बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध कराएगा।
डाकपे कई तरह की सेवाओं यानी पैसा भेजने, क्यूआर कोड को स्कैन करने सेवाओं के लिए तथा दुकानों पर डिजिटल तरीके से भुगतान करने में मदद करेगा। इसके अलावा यह ग्राहकों को देश में किसी भी बैंक के साथ इंटरऑपरेबल बैंकिंग सेवाएं भी उपलब्ध कराएगा।
प्रसाद ने इस ऐप को जारी करते हुए कहा कि डाकपे से भारतीय डाक की विरासत और समृद्ध होगी, जो आज देश के सभी परिवारों तक पहुंचने वाली है। यह एक नवोन्मेषी सेवा है, जो सिर्फ बैंकिंग सेवाओं और डाक उत्पादों तक ऑनलाइन पहुंच ही उपलब्ध नहीं कराती है, बल्कि यह एक विशिष्ट अवधारणा है जिसमें कोई ऑर्डर देकर डाक वित्तीय सेवाओं को अपने घर के दरवाजे पर पा सकता है।

5 राज्यों में 30 प्रतिशत से अधिक महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार : सर्वेक्षण

नयी दिल्ली : देश के 22 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में किए गए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के मुताबिक 5 राज्यों की 30 फीसदी से अधिक महिलाएं अपने पति द्वारा शारीरिक एवं यौन हिंसा की शिकार हुई हैं, वहीं सामाजिक कार्यकर्ताओं और गैरसरकारी संगठनों (एनजीओ) ने कोविड-19 महामारी के मद्देनजर ऐसी घटनाओं में वृद्धि की आशंका जताई है। महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा के मामलों में सबसे बुरा हाल कर्नाटक, असम, मिजोरम, तेलंगाना और बिहार में है।
सर्वेक्षण में 6.1 लाख घरों को शामिल किया गया। इसमें साक्षात्कार के जरिए आबादी, स्वास्थ्य, परिवार नियोजन और पोषण संबंधी मानकों के संबंध में सूचना एकत्र की गई। एनएफएचएस-5 सर्वेक्षण के मुताबिक कर्नाटक में 18-49 आयु वर्ग की करीब 44.4 फीसदी महिलाओं को अपने पति द्वारा घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ा जबकि 2015-2016 के सर्वेक्षण के दौरान राज्य में ऐसी महिलाओं की संख्या करीब 20.6 फीसदी थी।
सर्वेक्षण के आंकड़ों के मुताबिक बिहार में 40 फीसदी महिलाओं को उनके पति द्वारा शारीरिक और यौन हिंसा झेलनी पड़ी जबकि मणिपुर में 39 फीसदी, तेलंगाना में 36.9 फीसदी, असम में 32 फीसदी और आंध्रप्रदेश में 30 फीसदी महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार हुईं। इस सर्वेक्षण में 7 राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में पिछले एनएफएचएस सर्वेक्षण की तुलना में घरेलू हिंसा के मामलों में वृद्धि दर्ज की गयी।

एस एन लक्ष्मी ने 58 मिनट में 46 डिशेज बनाकर कायम किया वर्ल्ड रिकॉर्ड

चेन्नई : चेन्नई में एस एन लक्ष्मी सांई श्री ने 58 मिनट में 46 डिशेज बनाकर यूनिको वर्ल्ड रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज करवाया। लक्ष्मी ने बताया कुकिंग में उसका शौक माँ की वजह से पैदा हुआ। उसने अपनी माँ से खाना बनाना सीखा। वे वर्ल्ड रिकॉर्ड में अपना नाम आने से भी बेहद खुश हैं। लक्ष्मी की मां का नाम एक कलाईमगल है। उन्होंने बताया – ”लॉकडाउन के दौरान लक्ष्मी ने कुकिंग सीखने की शुरुआत की। मैं तमिलनाडु स्थित अपने घर पर अलग-अलग तरह की पारंपरिक चीजें बनाती हूं। लॉकडाउन में जब लक्ष्मी ने मुझे रसोई में इन चीजों को बनाते हुए देखा तो उसने भी इसे सीखने की कोशिश की। जब मैंने लक्ष्मी की इस रुचि के बारे में मेरे पति को बताया तो उन्होंने कुलीनरी एक्टिवटी में वर्ल्ड रिकार्ड के लिए लक्ष्मी का नाम देने का फैसला किया। इस बारे में जब हमने और जानकारी जुटाई तो पता चला कि लक्ष्मी से पहले केरल में 10 साल की सान्वी ने 30 डिशेज बनाकर वर्ल्ड रिकार्ड कायम किया था। लेकिन लक्ष्मी ने 46 डिशेज बनाकर सान्वी का रिकॉर्ड तोड़ दिया।

शादी के पहले दुल्हन गिरी छत से, अवधेश ने अस्पताल में की शादी

लखनऊ :  यूपी में रहने वाली आरती शादी के एक दिन पहले छत से गिर गई। उसकी रीढ़ की हड्‌डी में चोट आई। आरती के दूल्हे का नाम अवधेश है। अवधेश ने कहा जो हमारे साथ हुआ, वह हमारी किस्मत है। अवधेश ने डॉक्टर से अनुमति ली और अस्पताल में ही आरती से शादी की। इस शादी में दोनों परिवारों के लोग शामिल हुए। आरती का इलाज कर रहे डॉ. सचिन सिंह ने बताया कि आरती की रीढ़ की हड्‌डी में चोट आई है। फिलहाल वह अपना पैर भी नहीं हिला सकती। इसलिए हमने अस्पताल में ही अवधेश को आरती के साथ शादी करने की इजाजत दी।

दुल्हन ने कहा- ”मेरी इस हालत को देखकर मैं डर गई थी लेकिन मेरे पति ने मुझे हिम्मत दी। उन्होंने कहा कि अगर मैं कभी ठीक नहीं हुई और इसी हालत में बिस्तर पर रही, तब भी वे हमेशा मेरा साथ देंगे”। सोशल मीडिया पर इस खबर के वायरल होते ही कई लोगों ने अवधेश की तारीफ की, वहीं लोग आरती के जल्दी ठीक होने की दुआ भी कर रहे हैं। एक यूजर ने लिखा-‘इसे कहते हैं सच्चा प्यार’। दूसरे यूजर ने लिखा – ”ये गुण बहुत कम लड़कों में देखने को मिलता है। उस माता-पिता की तारीफ करना चाहिए जिसने अवधेश को जन्म दिया”।

क्रिसमस पर बनाइए अंडा रहित ब्राउनी

शेफ सुनीता सुराना

सामग्री :  2 कप मैदा या आटा, 2 बड़ा चम्मच चीनी पाउडर, 2 बड़ा चम्मच कोकोआ पाउडर, 2 बड़ा चम्मच दूध, 1 छोटा चम्मच तेल, 2 बड़ा चम्मच कटे हुए मेवे (काजू, बादाम, आखरोट आदि), 2 बड़ा चम्मच चॉकलेट सिरप
विधि : सबसे पहले एक बर्तन में मैदा या आटा लें, अब इसमें चीनी पाउडर, कोकआ पाउडर, और सूखे मेवे डालकर मिला लें। फिर इसमें दूध, चॉकलेट सिरप और तेल डालकर अच्छी तरह मिला लें। अब इस मिश्रण को 2 मिनट के लिए माइक्रोवेव में 180 डिग्री सेल्सियस पर रख कर बेक करें। स्वादिष्ट चॉकलेट ब्राउनी तैयार है। थोड़ा ठंडा होने के बाद आइसक्रीम के साथ परोसें।