Thursday, April 2, 2026
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नहीं रहीं इंस्टेंट नूडल्स की आविष्कारक नूरैनी

इंस्टेंट नूडल्स की आविष्कारक कही जाने वाली नूनक नूरैनी का गत 27 जनवरी को निधन हो गया है। वे 59 साल की थी। उनकी मौत की वजह अभी तक स्पष्ट नहीं हुई है। वह नूनक ही थीं, जिन्होंने सबसे पहले इंडोनेशिया में इंस्टेंट नूडल्स की शुरुआत की थी। इसके बाद नूडल्स पूरी दुनिया में मशहूर हुए। नूरैनी के नूडल्स की वजह से ही इंडोमी कंपनी का मी-गुरेंग ब्रांड मशहूर हुआ था। बीते 30 सालों से नूरैनी कंपनी के फ्लेवर डिपार्टमेंट में मैनेजर के तौर पर काम कर रही थीं।

इंस्टेंट नूडल्स को पहली बार 1988 में नाइजीरिया में निर्यात किया गया था। उसके बाद 1995 में कंपनी ने अपनी पहली नूडल्स बनाने वाली फैक्ट्री की शुरुआत की। लोगों के बीच इस नूडल्स की बढ़ती मांग को देखते हुए हर रोज इस फैक्ट्री में लगभग 8 करोड़ पैकेट बनाए जाने लगे।

दस साल की सान्वी एम प्राजित ने 1 घंटे में बनाये 33 व्यंजन

एर्नाकुलम : भारत में युवा प्रतिभाओं की कमी नहीं है। ऐसी ही एक प्रतिभा केरल के एर्नाकुलम की सान्वी एम प्राजित में देखा जा सकता है। सान्वी ने एक घंटे से भी कम समय में सबसे कम उम्र की बच्ची द्वारा 33 व्यंजन बनाने का रिकॉर्ड कायम किया है। इसका नाम एशिया और इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज हुआ है। सान्वी ने जो चीजें बनाई उसमें इडली, वेफल, कॉर्न, फिटर्स, मशरूम टिक्का, उत्तपम, पनीर टिक्का, एग बुल्स आई, सैंडविच, पापड़ी चाट, फ्राइड राइस, चिकन रोस्ट, पैनकेक, अप्पम शामिल हैं। सान्वी एयर फोर्स के विंग कमांडर प्राजित बाबू की बेटी हैं। उनकी मां का नाम मंजिमा है।

विशाखापट्‌टनम के अपने घर में सान्वी का 33 डिश बनाते हुए ऑनलाइन वीडियो एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स अथॉरिटीज ने देखा। मंजिमा ने बताया कि सान्वी को बहुत कम उम्र से कुकिंग का शौक है। वे जब छोटी थी तो अपने पैरेंट्स और दादा-दादी को कुकिंग करते हुए देखती थी। यहीं नहीं, इस बच्ची का अपना यू ट्यूब चैनल भी है जहां वे दर्शकों को आसान तरीके से खाना बनाना सिखाती हैं। सान्वी को इस काम की प्रेरणा अपनी मां मंजिमा से मिली। मंजिमा खुद स्टार शेफ और कुकरी शो की फाइनलिस्ट हैं। सान्वी खुद भी कुकरी शो में अपनी प्रतिभा दिखा चुकी हैं। उनकी उपलब्धि के लिए कुलिनरी फील्ड में उन्हें सराहा भी गया है।

(साभार – दैनिक भास्कर)

स्पेन की माया बनीं फेरारी की पहली महिला अकादमी ड्राइवर

स्पेन की रहने वाली माया वेग को 16 साल की उम्र में फेरारी की पहली महिला अकादमी ड्राइवर बनने का गौरव मिला है। माया इस साल फॉर्मूला 4 में हिस्सा लेंगी। वेग इतालवी टीम के मारानेलो मुख्यालय और फियोरानो परीक्षण ट्रैक में पांच दिन के स्काउंटिंग शिविर की विजेता हैं। फॉर्मूला वन टीम की बॉस मैटिया बिनोटो के अनुसार, ”इस एकेडमी के इतिहास में माया का आना गर्व की बात है। टीनएजर माया का यहां तक पहुंचना इस बात की ओर इशारा करता है कि पुरुष प्रधान माने जाने वाले इस क्षेत्र में महिलाएं भी आगे बढ़ सकती हैं”। माया के पिता डच निवासी और मां बेल्जियन हैं। माया ने फेरारी की पहली महिला एकेडमी ड्राइवर बनने के लिए चार प्रतिभागियों को हराया। इसमें फ्रांस की डोरियन पिन, एंटोनेला बासानी और ब्राजील की जूलिया अयूब शामिल हैं। माया पर जिन लोगों ने अपना विश्वास जाहिर किया है, वे उस सब लोगों के इस विश्वास को बनाए रखना चाहती हैं। वे खुद को फेरारी ड्राइवर एकेडमी की यूनिफार्म पहनने के लायक मानती हैं। एफआईए के अध्यक्ष जीन टोड ने माया की इस उपलब्धि को उनकी जिंदगी का सबसे खास पल बताया। साथ ही फाइनल सिलेक्शन तक पहुंचने वाली अन्य चारों महिला ड्राइवरों को भी बधाई दी।

164 साल की ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में करीब 6 करोड़ से ज्यादा शब्द हैं शामिल

लन्दन : अंग्रेजी डिक्शनरी की बात करें तो हमेशा हमारे दिमाग में ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी का ख्याल आता है। आज ऑक्सफोर्ड की  डिक्शनरी हर किसी की जिन्दगी का हिस्सा है। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी 1 फरवरी 1884 को पहली बार प्रकाशित हुई थी। हालांकि, इसे बनाने की शुरुआत 1857 में ही हो गई थी।

उस समय लंदन के फिलोलॉजिकल सोसाइटी के लोगों ने व्यवस्थित रूप से इंग्लिश की डिक्शनरी तैयार करने पर विचार किया था। इसमें 11वीं शताब्दी से 18वीं शताब्दी में प्रचलित एंग्लो-सेक्सोन शब्दों को शामिल किया गया। उस वक्त इसे 4 संस्करणों में तैयार किया गया। इसमें 6,400 ज्यादा शब्द शामिल किए गए थे।

इसके 40 साल बाद डिक्शनरी को 1928 में पूरी तरह से तैयार कर लिया गया। इस डिक्शनरी में 4 लाख से ज्यादा शब्द शामिल किए गए और इसे 10 वॉल्यूम में तैयार किया गया। इसका शीर्षक था- अ न्यू इंग्लिश डिक्शनरी ऑन हिस्टोरिकल प्रिंसिपल (A NEW ENGLISH DICTIONARY ON HISTORICAL PRINCIPLES)। तब से हर साल ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में हर भाषा के शब्दों को शामिल किया जाता है।

इस तरह ये डिक्शनरी हर साल अपडेट की जाती है। 1984 में डिक्शनरी का इलेक्ट्रॉनिक वर्जन लाने पर विचार किया गया। इसके लिए 120 लोगों ने डिक्शनरी के शब्द टाइप किए। 50 प्रूफ रीडर रखे गए। 2000 से डिक्शनरी का ऑनलाइन संस्करण सक्रिय है। वर्तमान में ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के 20 वॉल्यूम मौजूद हैं। इसमें 60 मिलियन (6 करोड़) शब्द मौजूद हैं। इसका वजन 62 किलो से ज्यादा है। ऐसा कहा जाता है कि अगर डिक्शनरी में शामिल सभी शब्दों को टाइप करें तो 120 साल से ज्यादा का समय लग सकता है।

(साभार – दैनिक भास्कर)

पर्यटक हाईवे में बदलेगी लेह से कारगिल की सड़क, हर 25 किमी पर खुलेगा ऑक्सीजन पार्लर

लेह : लेह से कारगिल जाने वाली सड़क को पर्यटक हाईवे का रूप दिया जाएगा। केंद्र सरकार के संस्कृति और पर्यटन मंत्रालय ने यह प्लान तैयार किया है। लेह-कारगिल के बीच करीब 230 किमी हाईवे पर नियमित अंतराल पर पर्यटकों के लिए तमाम सुविधाओं को डेवलप किया जाएगा। यहां हर 25 किमी की दूरी पर ऑक्सीजन पार्लर भी खोले जाएंगे। जिससे लेह से कारगिल का सफर आसान और आकर्षक होगा।
एक्शन प्लान तैयार
दुनिया में पर्यटन के क्षेत्र में कारगिल को पहचान दिलाने के लिए अब यहां पर्यटकों के लिए कई तरह की सहूलियतों को बढ़ाने का एक्शन प्लान तैयार हो रहा है। मंत्रालय को उम्मीद है कि कारगिल की रोड और एयर कनेक्टिविटी बेहतर होने पर घूमने के लिए स्विटजरलैंड आदि दूसरे देशों में जाने वाले भारतीय कारगिल, द्रास आदि इलाकों में घूमना पसंद करेंगे।
स्थानीय लोगों को मिलेगा रोजगार
केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार प्रहलाद सिंह पटेल ने न्यूज एजेंसी को बताया कि लेह-लद्दाख से कारगिल जाने वाले रास्ते पर अभी जनसुविधाएं नहीं हैं। हम चाहते हैं कि हाईवे पर हर 20 से 25 किलोमीटर पर ऑक्सीजन पॉर्लर खोले जाएं। जहां ऑक्सीजन की व्यवस्था के साथ चिकित्सकीय सुविधा भी हो। कूड़े के भी प्रबंध हों। ये इंफ्रास्ट्रक्चर सरकार बनाएगी, लेकिन चलाएंगे इसे स्थानीय गांव के लोग।
धरोहरों की कल्चरल मैपिंग होगी
पटेल के मुताबिक, लेह-लद्दाख और कारगिल में स्थित सैकड़ों धरोहरों के बारे में अभी लोगों को ज्यादा जानकारी नहीं है। ऐसे में सभी धरोहरों की कल्चरल मैपिंग की भी पहल की जा रही है। लेह से कारगिल जाने वाले रास्ते पर कौन-कौन सी धरोहरें स्थित हैं, इसके बारे में मंत्रालय की वेबसाइट से जानकारी मिलेगी। लेह-कारगिल की सड़क को पर्यटन हाईवे बनाने से पर्यटकों को आसानी होगी। वे वेबसाइट पर जनसुविधाएं ढूंढ सकेंगे। टॉयलेट की भी ऑनलाइन जानकारी मिलेगी।
2019 में लद्दाख केंद्रशासित प्रदेश बना
दरअसल, अगस्त 2019 में लद्दाख के केंद्रशासित प्रदेश बनने के बाद मोदी सरकार का फोकस यहां के विकास पर है। स्थानीय लोग केंद्र सरकार से कारगिल में टूरिज्म प्रमोशन की मांग कर चुके हैं। लद्दाख के सांसद जामयांग सेरिंग नामग्याल का कहना है कि लोग आज भी कारगिल को 1999 की लड़ाई की रोशनी में देखते हैं, जबकि कारगिल वॉर जोन नहीं, बल्कि पीस जोन बन चुका है। यहां पर पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं। रूरल टूरिज्म से लेह-लद्दाख और कारगिल में रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।
विंटर स्पोर्ट्स और एडवेंचर टूरिज्म की तैयारी
कारगिल की तरफ दुनिया का ध्यान खींचने के लिए यहां विंटर स्पोर्ट्स और एडवेंचर टूरिज्म को बढ़ावा देने की कोशिशें केंद्र सरकार की तरफ से चल रही हैं। कश्मीर के गुलमर्ग की तरह अब कारगिल में भी इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ स्कीइंग एंड माउंटेनिरिंग खोलने की तैयारी है। कारगिल में जमीन की तलाश हो चुकी है। सूत्रों के मुताबिक, दो साल मेंं यहां इंस्टीट्यूट बनकर तैयार हो जाएगा। जिससे स्थानीय और बाहरी युवा साहसिक खेलों की ट्रेनिंग लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले सकेंगे।

ब्रिटेन की पहली महिला शेफ क्लेयर स्मिथ को मिला थर्ड मिशेलिन स्टार

लन्दन :  प्रिंस हैरी और मेगन मार्केल की शादी में कैटरिंग की जिम्मेदारी बखूबी निभाने वाली शेफ क्लेयर स्मिथ ने थर्ड मिशेलिन स्टार जीता है। वे पहली ऐसी ब्रिटिश वुमन हैं जिन्हें अपने रेस्तरां के लिए ये प्रतिष्ठित अवार्ड मिला है। इस शेफ के लंदन स्थित रेस्टोरेंट ‘कोर’ को एक ऑनलाइन सेरेमनी में यह अवार्ड मिला। लॉकडाउन के दौरान क्लेयर ने अपने रेस्टोरेंट में न सिर्फ एनएचएस स्टाफ को खाना खिलाया, बल्कि टेक अवे बॉक्सेस में उम्दा खाना भी दिया। क्लेयर ने कहा – ”मिशेलिन स्टार के स्तर तक पहुंचना मेरा सपना था। लेकिन मैंने ये कभी नहीं सोचा था कि ये सपना सच होगा”। उनके रेस्तरां की शुरुआत तीन साल पहले हुई है लेकिन इसे खोलने की योजना वो 16 साल की उम्र से ही बना रही थीं। स्मिथ ने कहा कि मुझे उम्मीद है भविष्य में महिलाओं और पुरुषों को रेस्टोरेंट खोलने का मौका मिलेगा और वे मिशेलिन स्टार जैसे प्रतिष्ठित अवार्ड पा सकेंगे। 2018 में प्रिंस हैरी और मेघन मार्केल की फ्रॉगमोर हाउस में हुई शाही शादी के लिए स्मिथ ने ऑर्गेनिक मेन्यू तैयार किया था। शाही परिवार के लिए खाना बनाना इस शेफ के लिए यकीनन यादगार रहा। ये मेन्यू शाही परिवार के लिए बहुत खास था जिसका हिस्सा बनकर स्मिथ काफी खुश थी।

(साभार – दैनिक भास्कर)

15 सालों से जादू टोने और डायन प्रथा के खिलाफ अभियान चला रहीं बीरूबाला रभा

गुवाहाटी : देश की जिन महान हस्तियों को पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया, उनमें मानवाधिकार कार्यकर्ता बीरूबाला रभा का नाम भी शामिल है। बीरूबाला पिछले 15 सालों से महिलाओं के हक की लड़ाई लड़ रही हैं। वे जादू टोने और डायन के नाम पर महिलाओं की हत्या के खिलाफ अभियान चला रही हैं। वे असम के दूर-दराज के गांवों में जाकर महिलाओं के साथ होने वाले अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाती हैं। फिलहाल बीरूबाला पद्मश्री पुरस्कार पाकर काफी उत्साहित हैं। वे पद्मश्री पुरस्कार का असली हकदार उन लोगों को मानती हैं जिन्होंने इस अभियान को सफल बनाने में उनका साथ दिया।
असम की बीरूबाला जब 6 साल की थी, तब उनके पिता इस दुनिया से चल बसे। उन्हें मजबूरी में स्कूल छोड़ना पड़ा और वे अपनी मां के साथ खेतों में काम करने लगीं। 15 साल की उम्र में एक किसान से उनकी शादी हुई। वे कपड़ा बुनकर घर का खर्च और अपने तीन बच्चों की जिम्मेदारी उठाने लगीं। 1980 के मध्य में उनके बड़े बेटे को टायफाइड हुआ। वे उसे इलाज के लिए एक नीम-हकीम के पास लेकर गईं। उन्होंने बताया कि यह बच्चा मर जाएगा। लेकिन बच्चे की जान बच गई। तब से बीरूबाला ने नीम हकीम और जादू टोना करने वालों के विरोध में अभियान चलाने की शुरुआत की।
बीरूबाला ने जब ये देखा कि गांवों में महिलाओं को डायन बताकर उनकी हत्या कर दी जाती है, तो उन्होंने महिलाओं का एक समुह बनाया और डायन के नाम पर महिलाओं के साथ होने वाले अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलंद की। वे स्कूलों में जाकर बच्चों को डायन प्रथा और जादू टोने से दूर रहने के प्रति जागरूक करती हैं। बीरूबाला अब तक 42 से अधिक महिलाओं की जान बचा चुकी हैं। उनकी कोशिशों के चलते असम की विधानसभा ने “डायन हत्या निषेध” विधेयक पारित किया है। बीरूबाला के अथक प्रयासों से प्रभावित होकर उन्हें 2018 में वुमंस वर्ल्ड समिट फाउंडेशन प्राइज से सम्मानित किया गया था। उन्हें वुमंस वर्ल्ड समिट फाउंडेशन, जिनेवा, स्विट्जरलैंड की ओर से भी सम्मान प्राप्त है।

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री शैवाल गुप्ता का निधन

पटना : प्रसिद्ध अर्थशास्त्री और सेंटर फॉर इकॉनोमिक पॉलिसी एंड पब्लिक फाइनेंस के निदेशक शैवाल गुप्ता का गत गुरुवार को लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया । पारिवारिक सूत्रों ने इसकी जानकारी दी । सूत्रों ने बताया कि वह 67 वर्ष के थे । उनके परिवार में पत्नी के अलावा दो बच्चे हैं । वह आद्री नामक संस्था के सदस्य सचिव भी थे । उन्होंने बताया कि शैवाल कुछ समय से विभिन्न बीमारियों से पीड़ित थे और उनकी तबीयत अधिक बिगडने पर इस महीने की शुरुआत में एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। शैवाल ने बिहार में वित्त आयोग के सदस्य थे इसके साथ ही कई संस्थाओं को उन्होंने अपने अनुभवों का लाभ पहुंचाया था। बिहार के कई आर्थिक सुधारों में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

किसानों को सियासत की बैसाखी मत दीजिए…खुद आगे चलने दीजिए

विमर्श का दौर चल पड़ा है और इन दिनों किसान विमर्श केन्द्र में है। किसान यानी अन्नदाता..बात तो सही है। पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने भी जय जवान, जय किसान का नारा भी दिया था लेकिन इस नारे का सम्मान करते हुए 26 जनवरी 2021 की घटना को जब हम याद करते हैं तो मन में सवाल उठने लगते हैं। तब शायद शास्त्री जी ने भी नहीं सोचा होगा कि वे जिनकी जय लगाने का नारा दे रहे हैं…एक दिन उनके नाम पर राजनीति होगी और देश के तिरंगे को भी किसान आन्दोलन के नाम पर अपमानित करने का घृणित प्रयास होगा। लाल किले पर जिस दिन तिरंगे को हम सम्मान देते हैं…उसी दिन तिरंगे के बगल में कोई और झंडा लगाया जायेगा…यह दृश्य तो हर भारतीय की कल्पना से बाहर था…मगर यह हुआ..और अब इस पर लीपापोती करने की पूरी कोशिश की जा रही है..अपनी जान देकर हमारे जिन शहीदों ने हमें आजादी दी….तिरंगे के लिए हमारे वीर जवानों ने अपना जीवन न्योछावर कर दिया…क्या खूब सम्मान मिल रहा है इनको। हम एक बात और कहना चाहेंगे….सहयोग की कामना करनी चाहिए…जरूरत से अधिक दिया गया सहारा बैसाखी बन जाता है और वह सिर्फ पंगु ही बनाता है क्योंकि ऐसी स्थिति में पाने वाले को इन बैसाखियों की आदत पड़ जायेगी और वह इनकी आदत कभी नहीं छोड़ेगा। एक समय के बाद तो माता – पिता भी अपने बच्चों को अकेला छोड़ते हैं कि वह अकेले चलना सीखे…पक्षी अपने बच्चों तो तब छोड़ देते हैं जिससे वह दाना चुगने के लिए आसमान में उड़ान भर सके…मगर इस देश में सब्सिडी की ऐसी बैसाखी दी है कि किसान पर इन पर निर्भर है…किसान ही क्यों…हर जगह..सब्सिडी देना गलत नहीं है मगर इसकी अवधि तो तय होनी ही चाहिए जिससे अपनी आय को बढ़ाने के लिए आधुनिक उपकरणों को ही नहीं बल्कि सोच को भी लोग अपना सकें…..आज उन्नत सोच, तकनीक के साथ सही उद्देश्य के जरिए ऐसे किसान भी हमने देखे जो लखपति भी बन रहे हैं। यह भी एक सत्य है कि हर किसान अगर अमीर नहीं है तो हर किसान गरीब भी नहीं है…क्या हर किसान या हर किसी को सब्सिडी मिलनी चाहिए या इसका कोई मापदंड तय होना चाहिए। हमें ठहरकर सोचना होगा कि जय जवान, जय किसान के नाम पर हम कहीं दूसरे क्षेत्रों के साथ अन्याय तो नहीं कर रहे,,इस देश को जवान और किसान के साथ श्रमिक भी चाहिए..विज्ञान चाहिए…चिकित्सक और इंजीनियर चाहिए…शिक्षक चाहिए और सबकी जय होनी चाहिए इसलिए हमें एक बार ठहरकर सोचने की जरूरत है कि कहीं हम दूसरे क्षेत्रों को तो हाशिये पर नहीं ले जा रहे…किसानों को अब आगे बढ़ने की जरूरत है…विर्मशों और राजनीति से भी आगे…तभी उनकी जय हो सकेगी।

इतिहास के पन्नों में खो गयीं गणिका से बौद्ध भिक्षुणी बनने वाली विमला

ऐ सखी सुन 15

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों हमारे बीच कुछ ऐसी स्त्रियाँ भी हैं जिन्हें हमारा समाज परित्यक्ता या त्याज्य  मानता है और उनके बारे में इशारों या संकेतों में बात की जाती है। हाँ, समाज का एक वर्ग ऐसा भी है जो इनकी बातों में ही नहीं संगति में भी भरपूर रस लेता है, भले ही इस रस या आनंद को सामाजिक स्वीकृति नहीं मिलती। लुक- छिपकर तो बहुत कुछ किया जा सकता है।

प्रो. गीता दूबे

समाज के ही कुछ समझदार लोगों का यह भी मानना है कि वे स्त्रियाँ समाज के लिए एक ऐसी नाली का काम करती हैं जिनका होना बहुत ही आवश्यक है क्योंकि नालियों के बिना हमारी सफाई की व्यवस्था ठप्प पड़ जाएगी। घरों का कूड़ा- कचरा, गंदगी अर्थात तमाम उत्सर्जित पदार्थ नालियों में बहा दिए जाते हैं ताकि हमारे घर साफ- सुथरे रह सकें। लेकिन क्या कभी नालियों के पार या नालियों की तरह बज बजाती हुई गंदगी के बीच में जिंदगी बसर करने वाली इन स्त्रियों के बारे में किसी ने सोचा है। सखियों, जब मैं सखी शब्द का संबोधन करती हूँ तो इसकी व्याप्ति उन सभी स्त्रियों तक भी होती  है जिन्हें हमारा तथाकथित सभ्य समाज सम्मान के साथ जीने का अधिकार नहीं देता है। अगर उन्हें सम्मान सहित जीने का अधिकार ही नहीं है तो भला उनकी भावनाएँ, उनकी सोच, उनकी विचारधारा आदि से किसी को क्या मतलब हो सकता है। अगर थोड़ा ठहर कर सोचे तो इन स्त्रियों में भी भावनाएँ होती हैं, इससे किसी को इनकार नहीं। भले ही उन्हें यह सिखाया जाता है कि उन्हें अपनी भावनाओं को कैसे उपयोग में लाना है या फिर  उनसे कैसे लाभ उठाना है। लेकिन सखियों यह बात तो हर स्त्री को कभी न कभी, किसी न किसी रूप में समझाई, बताई या सिखाई जाती है। खैर, आज मैं आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूंगी, समाज में हाशिए का जीवन व्यतीत करने वाली उन स्त्रियों की ओर जिन्हें समाज ने सिर्फ उनकी पेशेगत विशेषताओं के कारण याद रखा लेकिन उनके रचनात्मक अवदान को विस्मृत कर दिया गया। डॉ सुमन राजे ने अपनी किताब “इतिहास में स्त्री” में ऐसी कई लेखिकाओं या कवयित्रियों पर प्रकाश डाला है जो अपने पारिवारिक या पारंपारिक पेशेगत कर्तव्यों का पालन करते हुए भी साहित्य सृजन करती हैं। उनमें से कुछ अपने पेशे  को त्याग कर बौद्ध भिक्षुणियाँ या थेरियाँ  बन गईं। वे शिक्षित तो थीं ही विभिन्न ललित कलाओं में भी निष्णात थीं। इन्होंने अपने जीवनानुभवों को पूरी मार्मिकता और विश्वसनीयता के साथ अपनी रचनाओं में उकेरा है। इन रचनाओं को “थेरी गाथाएँ” कहा जाता है और स्त्री विमर्श के इतिहास में इन गाथाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। ऐसी ही एक महिला हैं, विमला। इनके बारे में माना जाता है कि वह एक गणिका की पुत्री थी और उनका काम ही था, लोगों को आकर्षित करके अपनी आजीविका चलाना। विमला बौद्ध काल में में वैशाली के एक वेश्यालय में रहती थीं और वेश्यागृह के द्वार पर बैठकर, अन्य गणिकाओं की तरह लोगों को लुभाकर अपनी आजीविका चलाती थीं। उसी दौरान स्थविर महामौदगल्यायन वैशाली में भिक्षाटन करते थे। विमला ने उन्हें अपनी ओर आकर्षित करने की भरपूर कोशिश की लेकिन स्थविर उनकी उपेक्षा करते रहे। अंततः आम्रपाली के पदचिन्हों पर चलते हुए विमला ने धर्म की शरण ग्रहण की। लेकिन बौद्ध धर्म में दीक्षित होने के बावजूद उनके मन में वैराग्य की भावना दृढ़ नहीं हुई ओर वह “गृहस्थ शिक्षा उपासिका” बन गईं।

कालांतर में उन्होंने कठिन साधना की और अंततः संघ में उन्हें शरण मिली। उनकी कविताओं या गाथाओं में वेश्याओं के जीवन सत्य और मोहभंग का जीवंत अंकन हुआ है-

“रूप- लावण्य- सौभाग्य और यश

से मतवाली मैं

यौवन के अहंकार में मस्त

अज्ञानी मैं

अपने को कितना गौरवमयी

समझती थी

शरीर को 

गहनों सज विभूषित और चित्रित किए हुए मैं

शरीर कै तरुणों को आकर्षित करने

का माध्यम बनती थी

वेश्यागृह के द्वार पर बैठे- बैठे

सतर्क दृष्टि से व्याध के समान

फैलाती थी जाल।

छोड़कर लज्जा और शर्म

उघाड़कर दिखाती थी

अपने आभूषण

और गुह्य अंग

अनेक मायाएँ रचती थी मैं

मनुष्यों के पतन के लिए।

वही मैं आज

 भिक्षाचारिणी

मुंडित शीश

चीवर वसना

वृक्षों के नीचे बैठ

अवितर्क ध्यान को प्राप्त कर

विहरती हूँ।”

सखियों, विमला जैसी बहुत सी कवयित्रियों को समाज ने भले ही भुला दिया है लेकिन इनकी परिपक्व जीवनानुभूति से संपन्न रचनाओं का अपना अलग महत्व है और इन्हें पढ़ा और समझा जाना चाहिए।