Tuesday, October 27, 2026
खबर एवं विज्ञापन हेतु सम्पर्क करें - [email protected]
Home Blog Page 385

विद्या मंदिर सोसायटी द्वारा टीकाकरण अभियान

बीएचएस और सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल भी हुए शामिल

 कोलकाता : विद्या मंदिर सोसाइटी ने अपनी सभी इकाइयों के लिए हाल ही में टीकाकरण अभियान का आयोजन किया। इसमें बिड़ला हाई स्कूल, बिड़ला हाई स्कूल-मुकुंदपुर, सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल, जेडीबीआई और शिक्षायतन फाउंडेशन के कुछ कर्मचारी भी शामिल हैं। यह अभियान बिड़ला हाई स्कूल के परिसर में आयोजित किया गया था। यह अभियान टेक्नो इंडिया दामा के सहयोग से चलाया गया। यह टीकाकरण अभियान कर्मचारियों, शिक्षकों, उनके परिवारों और आश्रितों के लिए था। Covisheild के 300 से अधिक जैब्स प्रशासित किए गए। सभी कोविड प्रोटोकॉल का पालन करते हुए कार्यक्रम की सुचारू शुरुआत हुई। विद्या मंदिर सोसाइटी का उद्देश्य अपने फ्लैगशिप के तहत अधिक से अधिक लोगों को टीकाकरण करना था, जिससे न केवल अपने कर्मचारियों बल्कि उनके परिवार के सदस्यों और उनके आश्रितों तक भी पहुंच सके।

कहीं आपका बच्चा आत्ममुग्धता का शिकार तो नहीं

कई अध्ययनों ने साबित किया है कि जो माता-पिता अपने बच्चों को ‘अत्यधिक अहम’ मानते हैं, यानी ओवर वैल्यू करते हैं, उन बच्चों में आत्ममुग्धता यानी नार्सिस्टिक बिहेवियर देखने को मिलता है, जो डिसऑर्डर में बदल सकता है।

नार्सिसिस्टिक डिसऑर्डर क्या है?
व्यक्ति जब ख़ुद के प्रति बहुत ज़्यादा प्रेम करे, ख़ुद की तारीफ़, ख़ुद को ही महत्व देे और ख़ुद की आवश्यकताओं, इच्छाओं और ख़ुद से ही मतलब रखे, तो इसे नार्सिसिस्टिक पर्सनालिटी डिसऑर्डर (एनपीडी) कहा जाता है।

क्या नतीजे हो सकते हैं?
}अगर बच्चे में आत्ममुग्धता आ जाए, तो वो किसी से नज़दीकी और भरोसे के रिश्ते नहीं बना पाता। समानुभूति यानी दूसरों के भावों को ना समझने की उसकी प्रवृत्ति उसे किसी के करीब नहीं आने देती।
}ऐसे बच्चे किसी और की राय से कभी इत्तेफ़ाक नहीं रख पाते। उन्हें उनकी राय ही सबसे उचित और सही लगती है।
}आत्ममुग्ध बच्चे ख़ुद को बहुत स्पेशल मानते हैं। उनकी प्रतिभाएं विशेष हैं और उनके जैसा कोई और हो ही नहीं सकता -यह विचार उनमें गहरे जमा रहता है।
}ऐसे बच्चे सामाजिक नहीं हो पाते क्योंकि वे किसी और को कुछ नहीं समझते।

कहां है आत्ममुग्ध व्यवहार की जड़ ?
जो चाहिए मिलेगा ही, वे सबसे बेहतर हैं, कोई और मुझे कुछ समझा नहीं सकता, हारना तो हमें आता ही नहीं- ऐसी भावनाएं बच्चों में डालने वाले अभिभावकों के व्यवहार में होती हैं आत्ममुग्धता की जड़ें।

ज़रूरत से ज़्यादा लाड़
बच्चे की ग़लती न देखना, उसकी ग़लतियों पर पर्दा डालना, मुंह मांगी चीज़ तुरंत ला देना, ग़लत करने पर भी हमेशा साथ देना ये कुछ सामान्य कारण हैं जो बच्चों को इस समस्या का शिकार बनाते हैं। बच्चों को लगने लगता है कि वे कुछ भी करेंगे तो अभिभावक उनका साथ तो देंगे ही। इसलिए वे कुछ भी ग़लत करने में हिचकिचाते नहीं हैं।
जीत हर क़ीमत पर
इस तरह के बच्चे हमेशा अव्वल आना चाहते हैं, फिर चाहे बेईमानी से ही क्यों न आएं। हारना या पीछे रहना उन्हें मंज़ूर नहीं होता। बचपन में जब बच्चे कोई खेल खेलते हैं, तो अभिभावक उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए हमेशा जिता देते हैं और फिर यही उनकी मांग बन जाती है। असल ज़िंदगी में या किसी खेल में जब ये बच्चे पिछड़ने लगते हैं तो पीछे रहने के कारण तनाव और अवसाद से घिरने लगते हैं।
ओवर प्रोटेक्टिव
कई माता-पिता बच्चों को लेकर ओवर केयरिंग व ओवर प्रोटेक्टिव होते हैं। किसी अन्य व्यक्ति का उनके बच्चे को समझाना या डांटना उन्हें रास नहीं आता। इसलिए कई बार देखा जाता है कि बच्चों के कारण माता-पिता आसपड़ोस के लोगों से झगड़ने तक पहुंच जाते हैं। फिर बच्चा किसी भी बड़े से मार्गदर्शन लेना पसंद ही नहीं करता।
बढ़ती अपेक्षाएं
जब माता-पिता अपने बच्चे से बहुत ज़्यादा अपेक्षाएं रखते हैं तो बच्चे को ख़ुद को बहुत होशियार या कहें कि समझदार समझने लगते हैं और वे ख़ुद के सामने बाक़ी लोगों को कुछ नहीं समझते। इस कारण उनके दोस्त नहीं बनते और दोस्त बनते भी हैं तो जल्द ही दूर हो जाते हैं।

क्या है निदान?
जितनी कम उम्र में इस व्यवहार की पहचान कर ली जाए, निदान करना उतना ही आसान हो जाता है। बड़े बच्चों के साथ व्यक्तित्व की दूसरी जटिलताएं भी सिर उठाने लगती हैं। कॉग्निटिव बिहेवियर थैरेपी निदान का रास्ता है।

बच्चे की सीमाओं को पहले बड़ों को स्वीकार करना होगा – बच्चे की सीमाओं को जानें, हरफनमौला बनाने या परफेक्ट बनाने की जबरन कोशिश ना करें।
जबरन प्रशंसा ना करें – तुमने बहुत शानदार काम किया’ कहने के बजाय ‘यह काम अच्छा रहा’ जैसी तारीफ़ करें ताकि बच्चा हक़ीक़त से जुड़ा रहे।

वर्तमान में रहें – ‘तुम हमेशा अच्छा काम करते हो’ कहने की बजाय जिस काम की बात हो रही है, बस उसका उल्लेख करें।
 जैसे को तैसा – उसे सिखाएं कि वो दूसरों से वैसा व्यवहार करे, जैसे वो चाहता है कि लोग उसके साथ करें। इससे उसमें भावनाओं की समझ विकसित होगी।
तुरंत कुछ नहीं – बच्चे की हर मांग पर तुरंत खड़े हो जाने की बजाय उन्हें एक टाइम फ्रेम दें कि इतने समय में यह काम पूरा होगा और उन्हें सब्र रखना होगा।
 हारना कोई बुरी बात नहीं – खेल हो, पढ़ाई के नतीजे या कोई भी काम, कोशिश करके जीत जाना या उच्चांक पाना अच्छी बात है लेकिन किसी और की मेहनत या उसकी जीत से ईर्ष्या करना, उसे नकारना सही नहीं है।

(साभार – दैनिक भास्कर)

रतन टाटा को नए स्टार्टअप्स में निवेश की टिप्स देते हैं शांतनु नायडू

28 साल के शांतनु नायडू ने छोटी उम्र में ही बिजनेस इंडस्ट्री में एक नया मुकाम हासिल कर लिया है। शांतनु नायडू ने अपने आइडियाज से देश के दिग्गज उद्योगपति रतन टाटा को भी अपना फैन बना लिया है। शांतनु नायडू की एक कंपनी है, जिसका नाम है मोटोपॉज और ये कंपनी कुत्तों के कॉलर का निर्माण करती है।
ये कॉलर अंधेरे में चमकते हैं ताकि कोई वाहन उन्हें ठोककर मार ना दे। इस कंपनी का आरोप चार देशों में 20 से ज्यादा शहरों में फैला हुआ है। ऐसी खबरें हैं कि रतन टाटा अपना पर्सनल निवेश जिन स्टार्टअप्स में करते हैं, उनके पीछे 28 साल के शांतनु नायडू का दिमाग होता है। आइए शांतनु नायडू के बारे में और जानते हैं…
कुत्तों के लिए बनाया चमकने वाला कॉलर
शांतनु नायडू का कहना है कि उन्होंने कई बार गाड़ियों के नीचे आकर कुत्तों के मरते देखा है। शांतनु का कहना है कि अंधेरे में गाड़ियां कुत्तों को नहीं देख पाती, जिस वजह से ये दुर्घटनाएं होती हैं। इसके बाद शांतनु को रिफलेक्टर कॉलर बनाने का आइडिया आया और मोटोपॉज कॉलर बना दी। इस कॉलर की मदद से ड्राइवर बिना स्ट्रीट लाइट के भी कुत्तों को दूर से देख सकता है।
टाटा को पसंद आया शांतनु का अविष्कार
बता दें कि रतन टाटा को भी कुत्तों से काफी लगाव है और टाटा समूह के न्यूज लेटर में इसके बारे में लिखा गया। बाद में रतन टाटा पर इसकी नजर पड़ी। शांतनु ने अपने पिता के कहने पर रतन टाटा को पत्र लिखा और जवाब में उन्हें रतन टाटा से मिलने का न्योता मिला। शांतनु से पहले उनकी चार पीढ़िया रतन टाटा के साथ काम कर चुकी थीं लेकिन किसी को भी उनसे मिलने का मौका नहीं मिला। रतन टाटा ने स्ट्रीट डॉग्स प्रोजेक्ट की मदद के लिए शांतनु से पूछा लेकिन उन्होंने मना कर दिया। हालांकि रतन टाटा ने जोर देकर निवेश किया और उसके बाद मोटोपॉज की पहुंच 11 अलग-अलग शहरों तक हो गई। अब शांतनु लगातार रतन टाटा से मिलते रहते हैं।
एमबीए के बाद रतन टाटा के साथ काम करने का मौका मिला
मोटोपॉज की शुरुआत करने के बाद शांतनु ने कॉर्नेल में दाखिला लिया। यहां से शांतनु ने एमबीए किया। एमबीए के दौरान उद्यमिता, निवेश, नए स्टार्टअप के साथ-साथ क्रेडिबल स्टार्टअप्स की खोज, इंटरेस्टिंग बिजनेस आइडिया और मुख्य इंडस्ट्री ट्रेंड्स पर पूरा ध्यान लगाकर पढ़ाई की। कोर्स खत्म करने के बाद उन्हें रतन टाटा के साथ काम करने का मौका मिला। शांतनु का कहना है कि ऐसा मौका जिंदगी में पहली बार मिलता है और रतन टाटा के साथ रहकर हर मिनट कुछ ना कुछ सीखने को मिलता है।
स्टार्टअप्स में रतन टाटा की रुचि ज्यादा
81 साल के रतन टाटा देश के स्टार्टअप इकोसिस्टम में खासा रुचि रखते हैं। जून 2016 में रतन टाटा की प्राइवेट निवेश कंपनी आरएनटी असोसिएट्स और कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी ने स्टार्टअप को मदद करने के लिए हाथ मिलाया था। इसके अलावा उद्यमियों को रतन टाटा के साथ काम करने का मौका भी मिलता है। यही वजह है कि जिन स्टार्टअप्स को रतन टाटा का सपोर्ट मिलता है उनकी वैल्यू तुरंत बढ़ जाती है।

कोरोना : बंगाल में बढ़ी 1 जुलाई तक सख्ती

दफ्तरों में नहीं आएंगे 25 प्रतिशत से अधिक कर्मी
कोलकाता : पश्चिम बंगाल सरकार ने कोरोना से जुड़ी पाबंदियों को 1 जुलाई तक बढ़ा दिया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इसकी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि 1 जुलाई तक रात 9 बजे से सुबह 5 बजे के बीच लोगों की आवाजाही पर रोक रहेगी। हालांकि, जरूरी सेवाओं को छूट दी गयी है। सभी सरकारी दफ्तरों में 25 प्रतिशत कर्मचारी ही आएंगे। निजी और कॉर्पोरेट ऑफिस सुबह 10 से शाम 4 बजे तक खुले रहेंगे। इनमें भी भी 25 प्रतिशत से ज्यादा स्टाफ नहीं बुलाया जा सकेगा। प्राइवेट कंपनियां अपने स्टाफ के लिए ई-पास के जरिए ट्रांसपोर्ट सर्विस का इंतजाम कर सकती हैं। इसके अलावा शॉपिंग मॉल और कॉम्प्लेक्स में दुकानें सुबह 11 बजे से शाम 6 बजे तक खोली जा सकेंगी। इनमें 50 प्रतिशत कर्मचारी ही मौजूद रहेंगे। खेलों का आयोजन बिना दर्शकों के कराया जा सकेगा। सभी शिक्षण संस्थान बंद रहेंगे। निजी वाहनों की आवाजाही इमरजेंसी को छोड़कर बंद रहेगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि बार वाले रेस्टोरेंट दोपहर 12 से रात 8 बजे के बीच खुल सकते हैं। इनमें क्षमता से आधे लोग ही मौजूद रहे सकेंगे।

3 महीने में बनाए जाएंगे देश में 50 मॉड्यूलर अस्पताल

 इनमें आईसीयू और ऑक्सीजन का इंतजाम होगा
नयी दिल्ली : कोरोना की तीसरी लहर से लड़ने के लिए केंद्र ने हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर को तुरंत मजबूती देना वाला प्लान बनाया है। केंद्र की योजना है कि अगले 3 महीने में देशभर में 50 मॉड्यूलर हॉस्पिटल बनाए जाएं, जिनमें आईसीयू बेड्स के साथ ऑक्सीजन आपूर्ति की व्यवस्था हो। दूसरी लहर के दौरान ऑक्सीजन की सप्लाई की सबसे बड़ी समस्या थी। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, ये मॉड्यूलर हॉस्पिटल मौजूदा अस्पतालों के करीब ही बनाए जाएंगे। इसके जरिए हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर का विस्तार किया जाएगा। खास बात है कि 3 करोड़ की लागत से बनने वाले इस तरह के अस्पताल 3 हफ्तों के कम समय में तैयार किए जा सकेंगे। इनमें ICU, ऑक्सीजन सपोर्ट और दूसरे लाइफ सपोर्ट सिस्टम की सुविधा होगी। इन मॉड्यूलर हॉस्पिटलों की उम्र कम से कम 25 साल तक होती है। आपदा के समय इन अस्पतालों को एक हफ्ते में शिफ्ट किया जा सकता है।

मॉड्यूलर अस्पताल  की खासियत –

100 बेड वाला अस्पताल होगा।
आईसीयू के लिए समर्पित जोन होगा।
ऐसे सरकारी अस्पताल जहां इलेक्ट्रिसिटी, ऑक्सीजन और पानी की व्यवस्था होगी, वहां इन्हें बनाया जाएगा।
एक अस्पताल में 3 करोड़ का खर्च होगा और 3 हफ्तों में ये काम करने लगेंगे।
छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों पर फोकस
रिपोर्ट के मुताबिक, ये प्रोजेक्ट प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार के विजय राघवन ने शुरू किया है। अभी इसे सरकारी अस्पतालों में ही लागू किया जाएगा। ये अस्पताल खासतौर पर छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी को पूरा करेंगे।
प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार दफ्तर की अदिति लेले ने बताया कि हम राज्यों से लगातार संपर्क में हैं, जहां ऐसे अस्पतालों की जरूरत है। खासतौर पर वो राज्य जहां कोविड के केस लगातार तेजी से बढ़ रहे हैं। इसमें हमने कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सबिलिटी के तहत अन्य पार्टनर्स से भी संपर्क किया है, जो इस प्रोजेक्ट में हमारी मदद कर सकते हैं।

इन शहरों में अस्पताल बनेंगे
इस योजना के तहत छत्तीसगढ़ के बिलासपुर, महाराष्ट्र के पुणे, जालना, पंजाब के मोहाली में ये अस्पताल बनाए जाएंगे। इसके अलावा छत्तीसगढ़ के रायपुर में ऐसा 20 बिस्तरों वाला अस्पताल बनेगा। कर्नाटक के बेंगलुरु में पहले चरण में 20, 50 और 100 बिस्तर वाले ऐसे बेड बनाए जाएंगे।

महिला सरपंच की पहल से भरे 7 नाड़ी तालाब, मानसून में विकसित होंगे चारागाह

ओसियां : निकटवर्ती पंचायत जाटीपुरा मुकाम सिमरथ नगर पंचायत की युवा एवं पढ़ी लिखी प्रथम महिला सरपंच सुमन चौधरी की सोच ने गांव के नाडी, तालाब, गोचर, ओरण एवं चारागाह की तस्वीर बदल दी। सरपंच के प्रस्ताव पर उनके ससुर व ओसियां के पूर्व सरपंच चौधरी देवीलाल ने इस काम में समस्त महाजन ट्रस्ट से सम्पर्क कर जेसीबी मशीन उपलब्ध करवाने की अपील की। ट्रस्ट द्वारा जेसीबी मशीन निःशुल्क उपलब्ध करवाने पर चौधरी ने डीजल व अन्य खर्चे खुद वहन करके गोचर व ओरण से अंग्रेजी बबूल की सफाई करवाई। इसी प्रकार से पंचायत क्षेत्र की सात नाडियों से कंटीली झाड़ियां कटा कर साफ सफाई करवाई। तीन महीने तक 750 घण्टे काम कराया गया। रोजाना 5 हजार रुपये का खर्च चौधरी ने खुद वहन किया। जाटीपुरा सहित आसपास की ग्राम पंचायतों के लोगों ने भी स्वागत किया।
उन्होंने चौधरियों की नाडी, रेवाणी नाडी, तिण्डिया नाडा, रातड़ा नाडा, सोनेलाई नाडी, दादोलाई नाडी, कानानाडा तथा बांदेलाव तालाब के आगोर व गोचर की 750 बीघा जमीन को अंग्रेजी बबूल व अन्य कंटीली झाड़ियों से मुक्त कर सभी नाडियों को गहरा करवा दिया है। इन सभी परम्परागत जल स्रोत में पानी की आवक के रास्ते खोलने एवं अतिरिक्त मिट्टी निकालने का कार्य लगभग पूर्ण होने के स्तर पर है। देवीलाल चौधरी ने बताया कि वर्षों से उनका यह सपना था कि उनके आसपास के क्षेत्र में अंग्रेजी बबूल हट जाए तथा उसकी जगह पर पशुओं के लिए चारागाह एवं हरे-भरे छायादार पौधे लगे। सातों नाड़ी में अब वर्षभर पानी रहेगा, जिससे पशुओं के साथ साथ क्षेत्र के समस्त पशु-पक्षी, वन्य जीवों को वर्ष पर्यंत पीने का पानी मिलेगा।

जल स्रोतों की दुर्दशा को देखकर उठाया बीड़ा
सरपंच सुमन चौधरी ने बताया कि ग्राम पंचायत क्षेत्र के परम्परागत जल स्रोतों की दुर्दशा को देखकर इनकी सुध लेने की बात मैंने मेरे ससुर पूर्व सरपंच चौधरी देवीलाल के सामने रखी तो उन्होंने सरकारी पैसे का इंतज़ार किए बिना अपनी निजी आय से कार्य करवाने की हां कर दी। पूर्व सरपंच चौधरी देवीलाल ने बताया कि इस कार्य के लिए बजट बहुत ज्यादा होने के कारण यह कार्य काफी समय तक सपना ही बना रहा लेकिन समस्त महाजन संस्था के आगे आने से उनके द्वारा बिना किराए जेसीबी मशीन उपलब्ध कराने से यह काम आसान हो गया। डीजल का खर्चा मैंने स्वयं वहन किया, इस वजह से यह कार्य संभव हो सका। आने वाली बरसात के सीजन में मेरी तरफ से सभी ग्रामीणों को मुफ्त में पौधे उपलब्ध करवाए जाएंगे तथा उसके बदले में उन पौधों को पानी पिलाने की जिम्मेदारी ग्रामवासियों को दी जाएगी। सेवण घास के बीज लगाकर चारागाह का विकास भी किया जाएगा।

(साभार – दैनिक भास्कर)

लॉकडाउन में 6 गुना बढ़े पुरुष प्रताड़ना के मामले

पत्नियों पर मारपीट और मानसिक उत्पीड़न के आरोप
पुणे : महाराष्ट्र में कोरोना के चलते बीते डेढ़ साल से ज्यादातर लोग वर्क फ्रॉम होम कर रहे हैं। इस दौरान सामने आया है कि घर पर 24 घंटे साथ रहने के दौरान पति-पत्नी के बीच झगड़े बढ़ रहे हैं। लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि पति ज्यादा प्रताड़ित हुए हैं। पुणे पुलिस की ट्रस्ट सेल (भरोसा सेल) ने यह दावा किया है कि लॉकडाउन के दौरान घरों में रहने वाले पति लॉकडाउन से पहले की तुलना में पत्नियों से ज्यादा प्रताड़ित हुए हैं।
लॉकडाउन में पति प्रताड़ना के केस 6 गुना बढ़े
भरोसा सेल की प्रमुख सुजाता शानमे ने बताया कि लॉकडाउन से पहले के एक साल के दौरान 1283 लोगों ने पुणे पुलिस की ट्रस्ट सेल में पारिवारिक झगड़े की शिकायत दर्ज कराई थी। इनमें पत्नियों की संख्या 791 थी, जबकि पति सिर्फ 252 थे लेकिन लॉकडाउन के दौरान, यानी बीते 15 महीने में यह आंकड़ा बढ़कर 3,075 तक पहुंच गया है। इसमें से पतियों के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाने वाली महिलाओं की संख्या 1540 है, जबकि पुरुषों की संख्या 1535 है। यानी शिकायत करने वाले पुरुषों की संख्या लॉकडाउन से पहले के एक साल की तुलना में 6 गुना बढ़ गई है।
सुजाता के मुताबिक पिछले डेढ़ साल के दौरान घरेलू कलह के तीन हजार से ज्यादा केस दर्ज हुए हैं। इनमें ज्यादातर केस मारपीट, शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न के हैं। कुछ शिकायतों में यह भी दावा किया गया है कि उनकी पत्नियां झगड़ा कर उनके बच्चों के साथ मायके चली गईं हैं और अब वे लौट नहीं रही हैं।
घर में रहने के कारण लोगों में बढ़ रहा मानसिक तनाव
सुजाता ने बताया कि 24 घंटे बंद कमरे में रहने के चलते लोगों में मानसिक तनाव लगातार बढ़ रहा है। पति-पत्नी, छोटी-छोटी बातों पर झगड़ रहे हैं। हम ऐसे लोगों को अपने यहां बुलाकर या फिर ऑनलाइन माध्यम से उनकी काउंसिलिंग कर समझाने की कोशिश करते हैं।
पुणे में 2 साल पहले बना भरोसा सेल
पुणे पुलिस के भरोसा सेल का गठन 9 जनवरी 2019 को हुआ था। इसका मकसद बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं की हरसंभव मदद करना है। सेल से जुड़े पुलिसकर्मी घरेलू हिंसा, कलह से जुड़े मामलों में महिलाओं या पुरुषों की काउंसिलिंग भी करते हैं।

पुलित्जर अवॉर्ड्स: जॉर्ज फ्लॉयड को न्याय दिलाने वाला वीडियो पुरस्कृत

पुलिस के हाथों हत्या का वीडियो बनाने वाली डेरनेला फ्रेजियर को विशेष पुरस्कार 

न्यूयॉर्क : इस साल के पुलित्जर अवॉर्ड्स का ऐलान कर दिया गया है। इस बार ज्यूरी ने एक विशेष पुरस्कार भी देने की घोषणा की है और यह नाम अब मशहूर हो चुका है। अमेरिका के मिनेपोलिस में पिछले साल 25 मई को अश्वेत व्यक्ति जॉर्ज फ्लॉयड को एक पुलिस अफसर ने गला घोंटकर मार डाला था। पुलिस अफसर की इस वहशियाना हरकत को 17 साल की अश्वेत लड़की डेरनेला फ्रेजियर ने अपने मोबाइल फोन में रिकॉर्ड कर लिया था। बाद में यह वायरल हुआ और अदालत में सबूत के तौर पर पेश किया गया। अब फ्रेजियर को उनकी इस बहादुरी के लिए स्पेशल पुलित्जर अवॉर्ड देने का ऐलान किया गया है। पुलित्जर अवॉर्ड्स आमतौर पर जर्नलिज्म के लिए दिए जाते हैं।

फ्रेजियर ने साहस दिखाया
जॉर्ज फ्लायड पर मामूली धोखाधड़ी का आरोप था। 25 मई 2020 को पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने पहुंची। वो घर पर नहीं मिले। लौटते वक्त एक कार के किनारे दिखे तो पुलिस ने उन्हें घेरकर गिरा दिया। डेरेक चौविन नाम के पुलिस ने जॉर्ज की गर्दन पर अपना घुटना रख दिया और उन्हें दबाने लगा। यह सिलसिला 8 मिनट चला। आखिरकार जॉर्ज की मौत हो गई। कुछ दूरी पर मौजूद फ्रेजियर ने पुलिस की इस हरकत का वीडियो बनाया। ये कुछ ही घंटे में वायरल हो गया। चौविन का मामला जब अदालत पहुंचा तो यही वीडियो पब्लिक प्रॉसीक्यूटर ने सबूत के तौर पर पेश किया। फोरेंसिक जांच में साबित हो गया कि वीडियो असली और उसी दिन का है, जब जॉर्ज की हत्या हुई। इसके बाद अमेरिका में काफी हिंसा हुई। दुनियाभर में ब्लैक लाइव्स मैटर के बैनर तले आंदोलन चला।
नस्लभेद का जिक्र
पुलित्जर बोर्ड ने कहा- फ्रेजियर ने जॉर्ज की हत्या का वीडियो बनाकर साहस की मिसाल पेश की है। हम ये जान पाए हैं कि पुलिस किस हद तक वहशियाना तरीके अपनाती है। फ्रेजियर की इस कोशिश के चलते ही दुनिया का ध्यान इस मुद्दे पर गया। वैसे, इस बार अवॉर्ड्स पर महामारी का मुद्दा ही छाया रहा। पहले यह पुरस्कार 19 अप्रैल को दिए जाने थे। बाद में इन्हें री-शेड्यूल करके 11 जून किया गया। ये पुरस्कार 1917 से दिए जा रहे हैं।

महत्वपूर्ण पुरस्कार किसे मिले
पब्लिक सर्विस : द न्यूयॉर्क टाइम्स
ब्रेकिंग न्यूज रिर्पोटिंग : स्टार ट्रिब्यून
इन्वेस्टिगेटिव रिर्पोटिंग : बोस्टन ग्लोब के पांच पत्रकारों को
एक्सप्लेनरी रिर्पोटिंग : द अटलांटिक के एड यंग और रॉयटर्स के पांच जर्नलिस्टस को
लोकल रिर्पोटिंग : टाम्पा बे टाइम्स के दो पत्रकारों को

दावा : 15 हजार साल पहले थी बिलासपुर में थी इंसानों की बस्ती

अरपा नदी के किनारे हजारों साल पुराने पत्थर के औजार मिलने का दावा
बिलासपुर : छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में अरपा नदी किनारे पाषाण काल के अवशेष मिले हैं। इनमें पत्थर के औजार हैंडेक्स, क्लिवर, प्वाइंट्स और अन्य चीजें शामिल हैं। इन्हें जशपुर में एंथ्रोपोलॉजी (मानव शास्त्र) के प्रोफेसर डॉ. विनय तिवारी ने इकट्ठा किया है। उनका दावा है कि यह औजार 15 हजार साल से भी ज्यादा पुराने हैं। इसका काम खुदाई, छिलाई, कटाई सहित अन्य काम में होता था। इससे पता चलता है कि अरपा के किनारे पाषाण काल दौरान मानव संस्कृति बसा करती थी।
दावे के पीछे तीन कारण
अरपा नदी का इतिहास समृद्ध रहा है। काफी साल पहले जब यह इलाका जंगल था, तब निश्चित रूप से नदी बहा करती थी। इसके पानी का उपयोग यहां रहने वाले जंगली जानवर के अलावा पाषाण काल के मनुष्य किया करते थे। नदी में मछलियाँ, जंगल में कंद-मूल सहित खाने और शिकार की दूसरी चीजें आसानी से उपलब्ध थीं। जिसके चलते ही यहां इंसानों के बसने के तथ्य में दम लगता है।उपकरण और रॉ मटेरियल का उपलब्ध होना। इन्हीं के जरिए वे शिकार और रोजमर्रा के जीवन की दूसरी चीजें करते होंगे।


भू-गर्भ शास्त्रियों से की चर्चा, जांचेंगे कितना पुराना है औजार
प्रोफसर तिवारी का कहना है कि उन्होंने इसके संदर्भ में रायपुर के जियोलॉजी डिपार्टमेंट के अधिकारियों से बात की है। आने वाले दिनों में यह शोध का विषय होगा कि यह पत्थर और औजार कितने पुराने हैं। उन्होंने बताया कि जो पत्थर मिले हैं, उनमें क्वाडजाइट, सैंडस्टोन है और जेसफर है। कहा कि यह पत्थर पाषाण काल के सबसे प्राचीन समय का है। जिसकी जांच के लिए वे जल्द ही रायपुर के अधिकारियों से मिलकर उन्हें जांच करने की बात कहेंगे।
बिलासपुर के तोरवा निवासी डॉ. विनय तिवारी जशपुर के एक शासकीय कॉलेज में प्रोफेसर हैं। वे साल 2012 से पढ़ा रहे हैं। इससे पहले रायपुर की रविशंकर यूनिवर्सिटी में पढ़ाते थे। उनकी खास रुचि भी इतिहास को जानने में रही है। बिलासपुर आने के दौरान जब भी सुबह टहलने निकलते तो उनकी नजर ऐसे पत्थरों पर पड़ जाती। वे इसे इकट्ठा करते। कहते हैं जिस तरह के पत्थरों के औजार को उन्होंने संग्रहित किया है उसे प्रकृति नहीं बनाती, बल्कि जरूरतमंद लोग बनाते हैं। छत्तीसगढ़ के पुरातत्व विभाग के पुरात्वविद आरके भगत का कहना है कि पत्थर अरपा के किनारे मिले पत्थर इस बात के प्रमाण हैं कि पाषाण काल में मानव संस्कृति यहां रहती थी। ये बेहतरीन उपकरण हैं। यह कितने पुराने हैं, इसकी जाँच करेंगे।

दस हजार रुपये में शुरू की मोतियों की खेती, आज कमाते हैं लाखों

नयी दिल्ली : महाराष्ट्र के गढ़चिरौली के रहने वाले संजय गंडाते एक सामान्य परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता पारंपरिक खेती करते थे। संजय ने कुछ साल सरकारी नौकरी की तैयारी की। सफलता नहीं मिली तो मोतियों की खेती करना शुरू किया। पिछले 7 साल से वे मोतियों की फार्मिंग (Pearl Farming) और मार्केटिंग का काम कर रहे हैं। भारत के साथ ही इटली, अमेरिका जैसे देशों में भी उनके मोतियों की डिमांड है। अभी इससे वे सालाना 10 लाख रुपए की कमाई कर रहे हैं। 38 साल के संजय बताते हैं कि मेरा लगाव बचपन से मोतियों से रहा है। गांव के पास ही नदी होने से अक्सर हम अपने दोस्तों के साथ सीपियां चुनने जाते थे। हालांकि कभी इसके बिजनेस के बारे में नहीं सोचा था और कोई खास जानकारी भी नहीं थी। कुछ साल सरकारी टीचर बनने की तैयारी की, लेकिन जब सिलेक्शन नहीं हुआ तो प्लान किया कि कहीं कंपनी में काम करने से अच्छा है खेती बाड़ी की जाए।
नौकरी नहीं मिली तो मोतियों की खेती शुरू की
संजय पारंपरिक खेती नहीं करना चाहते थे। वे कुछ नया करने का प्लान कर रहे थे। तभी उन्हें ख्याल आया कि जो सीपें उनके गांव की नदी में भरपूर मात्रा में उपलब्ध हैं, उनसे वे कुछ तैयार कर सकते हैं क्या? इसके बाद वे पास के कृषि विज्ञान केंद्र पहुंचे। वहां से संजय को पता चला कि इन सीपियों की मदद से मोती तैयार किए जा सकते हैं। हालांकि इसकी प्रोसेस के बारे में उन्हें ज्यादा जानकारी नहीं मिली।
संजय कहते हैं कि सीपियों से मेरा लगाव था ही इसलिए तय किया कि अब जो भी नफा-नुकसान हो अपने पैशन को ही प्रोफेशन में बदलेंगे। इसके बाद उन्होंने इस संबंध में गांव के कुछ लोगों से और कुछ पत्र-पत्रिकाओं के जरिए जानकारी जुटाई। फिर नदी से वे कुछ सीपी लेकर आए और किराए पर तालाब लेकर काम शुरू कर दिया। तब उन्होंने ज्यादातर संसाधन खुद ही डेवलप किया था। इसलिए उनकी लगात 10 हजार रुपए से भी कम लगी थी।
शुरुआत में घाटा हुआ, लेकिन हार नहीं मानी
संजय चूंकि नए-नए थे। उन्हें इसका कोई खास तौर तरीका पता नहीं था। इसके चलते उन्हें शुरुआत में नुकसान उठाना पड़ा। ज्यादातर सीपियां मर गईं। इसके बाद भी उन्होंने इरादा नहीं बदला। उन्होंने इसकी प्रोसेस को समझने के लिए थोड़ा और वक्त लिया। इंटरनेट के माध्यम से जानकारी जुटाई। कुछ रिसर्च किया। और फिर से मोतियों की खेती शुरू की। इस बार उनका काम चल गया और काफी अच्छी संख्या में मोती तैयार हुए। इसके बाद संजय ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। धीरे-धीरे वे अपने काम का दायरा बढ़ाते गए। आज उन्होंने घर पर ही एक तालाब बना लिया है। जिसमें अभी पांच हजार सीपियां हैं। इनसे वे एक दर्जन से ज्यादा डिजाइन की अलग-अलग वैराइटी की मोतियां तैयार कर रहे हैं।
संजय कहते हैं कि मैं अपने उत्पाद किसी कंपनी के जरिए नहीं बेचता हूं। मिडिलमैन का रोल खत्म कर दिया है। क्योंकि इससे सही कीमत नहीं मिलती और वे लोग औने-पौने दाम पर खरीद लेते हैं। इससे बचने के लिए मैं खुद ही मार्केटिंग करता हूँ। वे कहते हैं कि हमने सोशल मीडिया से मार्केटिंग की शुरुआत की थी। आज भी हम उस प्लेटफॉर्म का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करते हैं। साथ ही हमने खुद की वेबसाइट भी शुरू की है। जहां से लोग ऑनलाइन शॉपिंग कर सकते हैं। कई लोग फोन के जरिए भी ऑर्डर करते हैं। उसके बाद हम कूरियर के जरिए उन तक मोती भेज देते हैं। वे 1200 रुपए प्रति कैरेट के हिसाब से मोती बेचते हैं।
फार्मिंग के साथ प्रशिक्षण भी देते हैं
संजय ने अपने घर पर ही मोतियों की खेती का एक ट्रेनिंग सेंटर खोल रखा है। जहां वे लोगों को इसकी पूरी प्रक्रिया के बारे में जानकारी देते हैं। उन्होंने इसके लिए अभी 6 हजार रुपए फीस रखी है। लॉकडाउन से पहले महाराष्ट्र के साथ ही बिहार, राजस्थान, मध्यप्रदेश सहित कई राज्यों से लोग उनके पास ट्रेनिंग के लिए आते थे। उन्होंने एक हजार से ज्यादा लोगों को अब तक ट्रेंड किया है। वे पूरी तरह से व्यावहारिक प्रशिक्षण देते हैं।