Tuesday, April 7, 2026
खबर एवं विज्ञापन हेतु सम्पर्क करें - [email protected]
Home Blog Page 378

85 प्रतिशत महिलाओं को नहीं मिली वेतन वृद्धि और पदोन्नति

देश में 37% महिलाओं को मिलता है पुरुषों से कम वेतन 

नयी दिल्ली : वैश्विक महामारी कोरोना से दुनियाभर के लोग जूझ रहे हैं। भारत की कामकाजी महिलाएं तो कोरोना के कारण अधिक दबाव महसूस कर रही हैं। यह निष्कर्ष ऑनलाइन पेशेवर नेटवर्क लिंक्डइन अपॉर्च्युनिटी-2021 के सर्वे से सामने आया है। सर्वे के मुताबिक कोरोना का विदेशों में काम कर रही महिलाओं की तुलना में देश की कामकाजी महिलाओं पर ज्यादा प्रभाव पड़ा है।
90% महिलाएं कोरोना के चलते दबाव में हैं। पूरे एशिया पेसिफिक देशों में महिलाओं को काम और सैलरी के लिए कड़ी लड़ाई लड़नी पड़ी है और कई जगह पर पक्षपात का सामना करना पड़ा। 22% महिलाओं का कहना है कि उन्हें पुरुषों की तुलना उतनी वरीयता नहीं दी जाती। 85% महिलाओं ने कहा कि 60% क्षेत्रीय औसत की तुलना में उन्हें सही समय पर प्रमोशन, वेतन बढ़ोतरी या वर्क ऑफर नहीं मिलता।
ये रिपोर्ट पुरुषों और महिलाओं के लिए उपलब्ध अवसरों की धारणा के अंतर को भी उजागर करती है। देश की 37% कामकाजी महिलाओं का कहना है कि उन्हें पुरुषों की तुलना में कम अवसर मिलते हैं, जबकि केवल 25% पुरुष ही इससे सहमत हैं। इन महिलाओं का कहना है कि उन्हें पुरुषों की तुलना में कम वेतन मिलता है।
सर्वे में महिलाओं के साथ पुरुषों ने भी माना कि वे नौकरी के तीन चीजों को जरूर देखते हैं- नौकरी की सुरक्षा, पसंद का काम और अच्छे काम के बीच जिंदगी में संतुलन। सर्वे 18 से 65 साल की उम्र के लोगों पर ऑनलाइन किया गया। इसमें ऑस्ट्रेलिया, चीन, भारत, जापान समेत 7 देशों के लोग शामिल हुए।
66% लोग बोले- माता-पिता के दौर के मुकाबले आज समानता बढ़ी
सर्वे में 66% लोगों ने माना कि उनके माता-पिता के दौर तुलना में लैंगिक समानता में सुधार हुआ है। सर्वे में कहा गया है कि घर से काम यानी वर्क फ्रॉम होम की वजह से कामकाजी माताओं की दिक्कतें बढ़ी हैं। अभी 10 में से 7 महिला (77 प्रतिशत) पूरे समय बच्चों की देखभाल कर रही हैं। वहीं, सिर्फ पांच में से एक यानी 20% पुरुष ही बच्चों की परवरिश में लगे हैं। लगभग दो-तिहाई कामकाजी महिलाएं पारिवारिक और घरेलू जिम्मेदारियों के कारण काम में भेदभाव का सामना कर रही हैं।
(साभार – दैनिक भास्कर)

सिर्फ त्याग, समर्पण और सेवा के लिए ही तो नहीं बनी लड़कियाँ….

सखी सुन 20

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, इन दिनों एक खबर अखबार की सुर्खियों में है और‌ टी. वी. के परदे पर भी छाई हुई है, जिसने देश‌भर को हिलाकर रख दिया है। यू ट्यूब के सनसनीखेज़ चैनलों पर‌ इससे‌ जुड़ा अपडेट हर एक घंटे में सनसनाता हुआ जारी होता है, भले ही उसमें कुछ‌ भी नया हो या ना हो। खैर उनकी बात रहने देते हैं क्योंकि उनके लिए तो हर खबर कमाई का सबब है, वह हत्या या बलात्कार की खबर हो या किसी की आत्महत्या की।

प्रो. गीता दूबे

कुछ खबरें ऐसी होती है जो देर तक नहीं दिनों तक दिल -दिमाग को मथती रहती हैं, बेचैन किए रहती हैं। ऐसी ही एक खबर है, सुर्खियों में छाई, आयशा की खुदकुशी की खबर। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के चंद दिनों पहले अगर हमारे देश में एक महिला इसलिए आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाए कि उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया जा रहा था या फिर इसलिए कि उसका वह पति जिससे वह बेइंतहा मोहब्बत करती थी, उसने किसी और के इश्क का नगमा गुनगुनाना शुरू कर दिया है तो बेहद- बेहद तकलीफ होती है। और इसके पीछे हमारी वह परवरिश काम करती है जिसमें लड़की को यह ज्ञान घुट्टी में पिलाया जाता है कि उसकी जिंदगी का असली मकसद शादी करना और पति को परमेश्वर मानकर उसकी पूजा करते हुए जिंदगी गुजार देना‌ है। उसे सिखाया ही जाता है कि वह डोली पर बैठकर ससुराल जाती है तो वह उसकी अंतिम विदाई होती है और वहाँ से मायके, वह मेहमान की तरह दो- चार दिन के लिए भले आ जाए लेकिन खराब से खराब स्थिति में भी हमेशा के लिए कभी लौटकर नहीं आ सकती। साथ ही यह भी सिखाया जाता है कि पति की प्यारी सबकी प्यारी होती है और पति के दिल तक पहुँचने के हजार रास्ते उसे बताए‌ या सुझाए जाते हैं। और अगर इसके बावजूद वह पति देवता का मन नहीं जीत पाई तो उसकी कद्र न ससुराल में होती है न मायके में। शायद इसीलिए स्त्री जीवन के केंद्र में हमेशा पुरुष रहा, कभी वह भाई की लंबी उम्र के लिए मंगलकामना करती है तो कभी पति और पुत्र के लिए ‌व्रत- उपवास रखती है। हाँ, वह स्वयं अवांछित और उपेक्षित ही रहती है। न उसके जन्म का उत्सव मनाया जाता है ना उसकी जिंदगी को अहमियत दी जाती है। एक समय पूरी हिंदी पट्टी में यह कहावत प्रचलित थी, “बिन ब्याही बेटी मरे और ठाढ़े ऊख बिकाय” अर्थात बिन ब्याही बेटी की मृत्यु उतनी ही लाभदायक होती है जितनी ऊख या गन्ने की खड़ी फसल का बिक जाना। और जब माँ -बाप के लिए ही बेटी का मरना -जीना कोई मायने नहीं ‌रखता तो सात फेरों और‌ चंद कसमों -वायदों की कवायद के बाद उसी अवांक्षित लड़की का मालिक बना पति अगर उससे यह कहता है कि “मरती है तो मर जा” तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। अगर हमने अपनी बेटियों को यह सीख दी होती कि वे हमारे लिए अनमोल हैं तो‌ शायद‌ वह भी अपनी कीमत समझतीं। यह अहसास तो उन्हें हमने ही कराया कि उनकी जिंदगी का कोई मोल‌ नहीं। वे तो बस त्याग, समर्पण और सेवा के लिए ही बनी हैं।

आज इक्कीसवीं शताब्दी में भी अगर लड़कियों को इन्हीं मूल्यबोधों की थाती सौंपी जाती है, उनके लिए सारे दरवाजे बंद रखे जाते हैं और पढाई -लिखाई करके अपने पैरों पर खड़े होने के बावजूद अगर उन्हें पति पर‌ निर्भरता का पाठ पढ़ाया जाता है तो उन लड़कियों का क्या कसूर जो पति को किसी और स्त्री के प्रति अनुरक्त देखकर सारे जगत को अंधकारमय समझकर, आत्महत्या के लिए प्रवृत्त हो जाती हैं‌। जिस दहेज प्रथा के खिलाफ न‌ जाने कितनी लड़ाइयाँ लड़ी गईं, उनके खिलाफ कानून बना, वह आज भी समाज का अनिवार्य अभिशाप बनी हुई है। पहले खुलेआम मांगा जाता था, आज फेरों से पहले धरवा लिया जाता है ताकि दहेज- विरोधी की छवि भी कायम रहे और‌ दहेज के सामानों से घर भी भर जाए। क्यों नहीं पढ़ी लिखी, आत्मनिर्भर लड़कियों के माता -पिता दहेज देकर विवाह करने का विरोध करते हैं और लड़कियाँ भी क्यों नहीं यह दृढ़ निश्चय करतीं कि उस व्यक्ति से विवाह के सूत्र में नहीं बधेंगी जो दहेज की शर्त सामने रखता है। लेकिन ऐसा होगा कैसे, उस समाज में, जहाँ यह माना जाता है कि जो परिवार‌ या लड़का दहेज की मांग नहीं रखता उसमें जरूर कोई ना कोई कमी होगी। प्रगतिशीलता तो सिर्फ मंचों तक सीमित हो कर रह गई है, जिसके अनुसार आप जोर- शोर से दहेज विरोध के नारे लगाइए और‌ अवसर मिलने पर स्वयं दहेज लेने से पीछे मत हटिए।

कहने का तात्पर्य यह है कि हमारा समाज पाखंड की जंजीरों में जकड़ा हुआ है और जब तक ऐसा रहेगा, इस तरह की मर्मभेदी घटनाएं घटती रहेंगी। इसलिए जरूरत है कि हम अपनी बेटियों से प्यार करें, उन्हें बोझ मत समझें। उनके जीवन का मोल जब हम समझेंगे तब दूसरे खुद ब खुद‌ समझ जाएंगे। उन्हें सिखाएं कि वे अपने लिए जीवन जीना सीखें। दूसरों से‌ प्रेम करने का पाठ तो हम न जाने कब से पढ़ाते‌ रहे हैं, त्याग की देवी बनाकर न जाने कब से चुपचाप अन्याय सहना सिखाते रहे हैं। अब जरूरत इस बात की है कि उन्हें खुद‌ से  प्रेम करना भी सिखाएं। जब वे खुद अपनी कद्र करना सीख जाएंगी तो किसी व्यक्ति के द्वारा नकारे जाने पर जिंदगी से मुँह नहीं मोड़ लेंगी। कोई अगर मरने की चुनौती देगा तो वह अपनी जान खुद नहीं लेंगी बल्कि पूरे हौसले से जिंदगी जीकर दिखा देंगी।

सखियों, आयशा जैसी मासूम बेटियों के दर्द को भी पहचानने की जरूरत है और उसकी दवा ढूंढने की भी। सामयिक तौर पर दुख प्रकट करने मात्र से हमारी जिम्मेदारी खत्म नहीं  हो जाती। जरूरत है, अपनी सोच को बदलने की। लड़की को एक लड़की की तरह नहीं बल्कि एक मुकम्मल इंसान की तरह पालेंगे, उसे जिंदगी को ढोना नहीं, पूरे हुलास के साथ जीना सिखाएंगे तो वह अपनी कीमत समझेगी और शायद खुदकुशी करने से पहले सौ बार सोचेगी। यह काम हम सबको मिलकर करना है, सखियों। आइए , नयी शुरुआत करें, इस कविता के साथ-

“बेटियों को जीने दो

देखने दो सपने।

पंख पसार

उड़ने दो,

विस्तृत नीले नभ में।

ढूंढ लेंगी

अपना ठिकाना

बना लेंगी

खुद अपना आशियाना

बस, उन पर‌ रखो

थोड़ा सा भरोसा।

बेटियों को जीने दो

हँसने, मुस्करने दो

ठहाके लगाने दो।

मत लगाओ बंदिशें

मत खींचों लक्ष्मण रेखा

खुद ही लिख लेंगी,

अपना इतिहास

बस, रखो उन पर

थोड़ा सा भरोसा।

 

शुभजिता क्लासरूम – क्या हो सकती है SSC JHT/SHT 2020 की Cut Off ?Expected Cut Off SSC JHT/SHT 2020?

प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए नीरज सिंह की प्रस्तुति। नीरज प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय के होनहार विद्यार्थी रह चुके हैं और इस समय रक्षा मंत्रालय में बतौर वरिष्ठ अनुवाद अधिकारी कार्यरत हैं –

 

रिपोर्टर दीदी की क्लास – समाचार संरचना

समाचार वही नहीं जो दिखाया जाये बल्कि वो भी है जो बताया नहीं जा रहा। आज की क्लास में समाचार किस तरह लिखे जाने हैं और किस बात का ध्यान रखना पड़ता है, वह जानिये

बॉलीवुड-ओटीटी में साहित्य से कहानियां लेने के दौर की वापसी , अधिकार लेने की होड़

भारत में ओटीटी (ओवर द टॉप स्ट्रीमिंग) के बढ़ते बाजार के चलते ऑरिजनल कंटेंट की मांग जोर पकड़ रही है। नया, ऑरिजनल, सहज, मासूम, छोटे गांव-कस्बे, क्राइम थ्रिलर, सस्पेंस की कहानियां ओटीटी का नया बाजार है। इसके लिए प्रोडयूसर-डायरेक्टर ने अब फिल्म राइटर को दो लाइन देकर बेजान कहानी लिखवाने की जगह साहित्य के समुद्र से कहानियां निकालने का नया ट्रेंड शुरू किया है। एक जमाना था जब ‘गाइड’, ‘तीसरी कसम’, ‘नौकर की कमीज’, ‘शतरंज के खिलाड़ी’, ‘रजनीगंधा’, ‘सारा आकाश’ जैसी सुपरहिट फिल्में साहित्य की देन थीं। मौलिक और उम्दा सामग्री की कमी से जूझ रहे ओटीटी और बॉलीवुड ने एक दफा फिर से किताब जगत में गोते लगाकर बेहतरीन कहानियों की तलाश शुरू की है।

किताबें बन रही हैं फिल्मी कहानियों का बड़ा स्त्रोत
हाल ही में कई निर्माता – निर्देशक ने कुछ किताबों के अधिकार लिए हैं और कुछ प्रोडक्शन हाउस की प्रकाशन समूहों से सौदे के लिए बातचीत जारी है। सूत्रों का कहना है कि प्रोड्यूसर-डायरेक्टर अनुभव सिन्हा ने पहले पर्दे के लिए श्रीलाल शुक्ला के उपन्यास ‘रागदरबारी’ के अधिकार ले लिए हैं। नेटफ्लिक्स की टॉपहिट फिल्म ‘शी’ के निर्देशक अविनाश दास बताते हैं कि हाल ही में उन्होंने खुद निखिल प्रधान के अंग्रेजी उपन्यास ‘दि कोल्ड ट्रूथ’ के अधिकार लिए हैं। उनके अनुसार जिस तरह से किताबों के अधिकार लेने का काम चल रहा है, कहा जा सकता है कि इस वक्त किताबें फिल्मी कहानियों का बड़ा सोर्स बन रही हैं।

साल 2024 में भारत ओटीटी के लिहाज से दुनिया का छठा सबसे बड़ा देश बन जाएगा
वाणी प्रकाशन की निदेशक अदिति  महेश्वरी का कहना है कि मुंबई के प्रोडक्शन हाउस ने जिन किताबों के लिए संपर्क किया है। उनमें मनोहर श्याम जोशी और नरेंद्र कोहली के उपन्यास भी शामिल हैं। इनके अलावा वाणी ने हॉरर सीरीज में कई उपन्यास छापे थे। जिसमें कई प्रोडक्शन हाउस ने पूछताछ की है। साहित्यकार गीताश्री भी एक प्रोडक्शन हाउस के लिए यूपी पर आधारित कहानी लिख रही हैं। वह बताती हैं कि उनसे खासतौर पर उत्तर प्रदेश आधारित कहानियां मांगी गई हैं। ओटीटी के लिए भारत न केवल नया बल्कि सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में से एक है। साल 2024 में भारत ओटीटी के लिहाज से दुनिया का छठा सबसे बड़ा देश बन जाएगा। प्राइसवाटरहाउस कूपर्स (पीडब्ल्यूसी) की एक रिपोर्ट बताती है कि कोविड की वजह से ओटीटी के कारोबार को उछाल मिला है और यह लगातार जारी रहेगा।साल 2024 तक इसके 5 बिलियन डॉलर तक होने की संभावना है। इस वक्त देश में अंदाजन 40 ओटीटी प्लेटफॉर्म हैं। इतनी बड़ी तादाद  में ओटीटी प्लेटफॉर्म हैं और इतने ही लगभग पाइपलाइन में हैं, तो इसके लिए मौलिक कहानी भी चाहिए। जाहिर है जब प्लेटफॉर्म इतने हैं, तो कहानी भी चाहिए, जिसमें किताबें काम करेंगी।

जंगल के दावेदार’ से ‘बागी बलिया’ तक सबके राइट्स ले चुके फिल्मकार
नीलोत्पल मृणाल के उपन्यास ‘द डार्क हाउस’, शशिकांत मिश्रा के उपन्यास ‘नॉन रेजिडेंट बिहारी’ और सत्य व्यास के उपन्यास ‘बागी बलिया’ के राइट्स भी ले लिए गए हैं। राजकमल प्रकाशन के निदेशक अलिंद माहेश्वरी बताते हैं कि फिल्मों के लिए उनकी कई रचनाओं के राइट्स ले लिए गए हैं, लेकिन इसकी घोषणा प्रोडक्शन हाउस ही करें तो अच्छा है। अलिंद के अनुसार, जिन किताबों पर प्रोडक्शन हाउस से लगभग बात फाइनल है, वे हैं- महाश्वेता देवी का उपन्यास ‘जंगल के दावेदार’, नवीन चौधरी का ‘जनता स्टोर’, अनुराधा बेनीवाल का ‘आजादी मेरा ब्रांड’, अवधेश प्रीत का ‘अशोक राजपथ’, मनोहरश्याम जोशी का ‘कसप’ उपन्यास।

(साभार – दैनिक भास्कर)

विनेश ने जीता यूक्रेन रेसलिंग टूर्नामेंट का खिताब

भारतीय पहलवान विनेश फोगट ने कोरोना के बाद सुनहरी वापसी की। एक साल बाद रिंग में उतरी विनेश ने यूक्रेन की राजधानी कीव में चल रहे आउटस्टैंडिंग यूक्रेनियन रेसलर्स और कोचेस मेमोरियल टूर्नामेंट में गोल्ड पदक जीता। फाइनल में उन्होंने पूर्व वर्ल्ड चैम्पियन वेनेसा कलाजिंसकाया को हराया। मैच के दौरान विनेश 6-8 से पीछे चल रही थीं, लेकिन आखिरी 35 सेकंड में उन्होंने 4 पॉइंट लेकर खेल पलट दिया।
53 किग्रा वेट कैटेगरी इवेंट के फाइनल में खेल रत्न से सम्मानित विनेश ने 2017 की वर्ल्ड चैम्पियन और वर्ल्ड नंबर-7 बेलारूस की कलाजिंसकाया को 10-8 से शिकस्त दी।
जिस पैर में फ्रैक्चर से विनेश को छोड़नी पड़ी बाउट, उसी को लोहे जैसा बनाया
विनेश को 2016 के रियो ओलिंपिक में पैर में फ्रैक्चर होने से बीच में बाउट छोड़नी पड़ी थी। वे 6 महीने बिस्तर पर रहीं। एक्सरसाइज नहीं कर सकती थीं, इसलिए खुद को दिमागी रूप से मजबूत करती रहीं। मेहनत कर उन्होंने 2018 में कॉमनवेल्थ और एशियाड में गोल्ड जीते। 2019 में वर्ल्ड सीनियर चैम्पियनशिप में ब्रॉन्ज मेडल जीतकर टोक्यो ओलिंपिक का टिकट पक्का किया। विशेषज्ञों ने पैर बचाकर खेलने की सलाह दी, पर विनेश ने लेग अटैक को अपनी मजबूती बनाया। वर्ल्ड चैम्पियनशिप में भी अंक बटोरने में लेग अटैक का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया।
टोक्यो ओलिंपिक के लिए पहले ही क्वालिफाई कर चुकीं
विनेश ने शनिवार को सेमीफाइनल में रोमानिया की एना ए को 2-0 से हराया था। उन्होंने राउंड ऑफ-16 में लूलिया लिओर्डा और क्वार्टर फाइनल में कैट्सियारिना पिचकोसकाया को हराया था। वे नवंबर, 2020 से यूरोप में प्रशिक्षण ले रही हैं। लॉकडाउन में विनेश हरियाणा में अपने गांव में प्रैक्टिस कर रही थीं। जबकि, उनके कोच वोलर एकोस वर्चुअली विनेश के रुटीन का ध्यान रखते थे।
2 कॉमनवेल्थ गेम्स और 1 एशियम गेम्स में स्वर्ण जीत चुकीं
इस साल की शुरुआत में विनेश बुडापेस्ट में फिर से अपने कोच से जुड़ गई थीं। यूक्रेन के बाद अब वे रोम जाएंगी। वहां 4 से 7 मार्च तक होने वाले सीजन के पहले रैंकिंग टूर्नामेंट में हिस्सा लेंगी। विनेश ने कॉमनवेल्थ गेम्स (2014, 2018) में 2 और एशियन गेम्स (2018) में एक स्वर्ण जीता है।

 

सोनम वांगचुक ने बनाया पहाड़ों पर तैनात जवानों के लिए टेंट

-20° में भी अंदर का तापमान 15° रहेगा
लेह : लद्दाख की गलवान वैली से कुछ अच्छी तस्वीरें सामने आई हैं। यहां समाजसेवी सोनम वांगचुक ने सेना के जवानों के लिए ऐसा टेंट बनाया है, जिसमें हमेशा 15 से 20 डिग्री सेल्सियस तापमान रहेगा। भले ही बाहर माइनस 20 डिग्री सेल्सियस वाली ठंड क्यों न हो। 12 हजार फीट से ज्यादा ऊंचाई पर मौजूद गलवान वैली वही जगह है, जहां पिछले साल जून में चीन और भारत के जवानों के बीच हिंसक झड़प हुई थी। इसमें 20 भारतीय जवान शहीद हुए थे, जबकि चीन के 40 से ज्यादा सैनिक मारे गए थे।


सोनम वांगचुक पर ही बनी थी फिल्म
सोनम वांगचुक वही शख्स हैं, जिन पर सुपरहिट फिल्म थ्री इडियट्स बनी थी। इस फिल्म में आमिर खान ने सोनम वांगचुक की भूमिका निभाई थी। इसमें आमिर का नाम रैंचो रहता है। सोनम वांगचुक ने बताया कि लद्दाख में 24 घंटे बिजली रहना मुश्किल है इसलिए यहां तैनात सेना के जवान ठंड दूर करने के लिए डीजल, मिट्‌टी के तेल से लकड़ी जलाते हैं। ये उनके लिए काफी नुकसानदेह भी रहता है। इस टेंट में हीटर लगा हुआ है। ये हीटर सोलर एनर्जी से गर्म होगा। सोलर एनर्जी को स्टोर करने की क्षमता भी है। एक टेंट में 10 जवान रह सकते हैं। इसका वजन 30 किलो से भी कम है।

 

ब्रिटेन के रिसर्च स्टेशन के पास टूटकर अलग हुआ बर्फ का बड़ा हिस्सा 

न्यूयॉर्क से भी बड़ा है आकार
अंटार्कटिका में ब्रंट आइस शेल्फ से बर्फ को बड़ा हिस्सा गत शुक्रवार को टूटकर अलग हो गया। यह जगह ब्रिटेन की साइंटिफिक आउटपोस्ट से बहुत दूर नहीं है। ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे (बीएएस) के मुताबिक, आइसबर्ग का टूटा हुआ हिस्सा 490 वर्ग मील (1270 वर्ग किलोमीटर) का है। यह साइज में न्यूयॉर्क शहर से भी बड़ा है। बीएएस के मुताबिक, यहां बर्फ की मोटाई करीब 150 मीटर है। इसमें बड़ी दरारें पड़ने के कारण वैज्ञानिक काफी समय से एक बड़े आइसबर्ग के टूटने की आशंका जता रहे थे। अभी इस जगह एक खाई सी तैयार हो गयी है। नवंबर में यहां एक बड़ी दरार दिखाई दी थी। जनवरी में यह एक किलोमीटर तक आगे बढ़ गई।
कई सौ मीटर चौड़ी हुई दरार
बीएएस ने कुछ दिन पहले बनाया इसका वीडियो जारी किया है। इसमें आइसबर्ग की लंबी दरार दिखाई दे रही है। यह दरार शुक्रवार सुबह कई सौ मीटर तक चौड़ी हो गई। इस वजह से यह हिस्सा अलग हो गया। बीएएस के डायरेक्टर जेन फ्रांसिस का कहना है कि हमारी टीमें कई साल से इस स्थिति के लिए तैयार हैं। सैटेलाइट इमेज और उनके नेटवर्क के जरिए इस जगह का हर रोज का अपडेट मिलता है। इस डेटा को एनालिसिस के लिए कैंब्रिज में भेज दिया जाता है। इसलिए हम जानते हैं कि अंटार्कटिक में क्या हो रहा है।

सर्दी की वजह से बंद है रिसर्च स्टेशन
बीएएस का हैली रिसर्च स्टेशन इस समय सर्दियों की वजह से बंद है। इसमें रहने वाला 12 लोगों का स्टाफ इस महीने की शुरुआत में यहां से निकल गया था। 1956 से ब्रंट आइस शेल्फ पर कई जगह 6 हैली रिसर्च स्टेशन बने हैं। सर्दियों में यहां कोई स्टाफ नहीं रहता। इस दौरान यहां का तापमान माइनस 50 डिग्री सेल्सियस तक नीचे गिर जाता है।
बीएएस ने एहतियात के तौर पर 2016 में हैली रिसर्च स्टेशन की जगह बदल दी थी। 2017 के बाद से स्टाफ यहां सिर्फ गर्मियों में काम कर रहा है, क्योंकि सर्दियों के दौरान उनका निकलना मुश्किल हो जाता है। BAS ने कहा कि 4 साल पहले हमने रिसर्च स्टेशन को दूर ले जाने का फैसला लिया था। हमें पता था कि जब आइसबर्ग टूटेगा तो फिर ऐसा नहीं कर पाएंगे। यह समझदारी भरा फैसला था।
हर साल 2 किमी खिसक जाती है बर्फ की परत
बर्फ की शेल्फ हर साल लगभग 2 किलोमीटर समुद्र की ओर बहती है। इसी के कुछ हिस्से टूट जाते हैं। BAS के मुताबिक, यह एक नेचुरल प्रोसेस है। 2017 में लार्सन सी आइस शेल्फ से भी बड़ा आइसबर्ग टूट गया था। पिछले साल के आखिर तक यह समुद्र में तैरने लगा था। लार्सन सी आइस शेल्फ पर देखी गई घटनाओं का इससे कोई संबंध नहीं है। इस बात का भी कोई सबूत नहीं है कि आइसबर्ग के अलग होने के पीछे क्लाइमेट चेंज है।

भारत दौरे के लिए दक्षिण अफ्रीकी टीम की कप्तान होंगी सुने लूस

लखनऊ के इकाना में खेले जाएंगे 8 मैच

नयी दिल्ली :  भारत दौरे के लिए साउथ अफ्रीकी महिला टीम का ऐलान कर दिया गया है। कप्तान डेन वान निएकर्क और क्लो ट्रीयोन की गैरमौजूदगी में सुने लूस साउथ अफ्रीकीटीम की कप्तानी करेंगी। क्रिकेट साउथ अफ्रीका (सीएसए) ने इसकी पुष्टि की। 7 मार्च से दौरे की शुरुआत होगी। लखनऊ में ही सभी 8 मैच खेले जाएंगे। दक्षिण अफ्रीकी वुमन्स टीम शनिवार को ही भारत पहुंच गई थी। फिलहाल टीम 6 दिन के क्वारैंटाइन में है। इसके बाद उन्हें 2 दिन ट्रेनिंग का मौका दिया जाएगा। 18 सदस्यीय अफ्रीकी टीम में उन सभी खिलाड़ियों को मौका मिला है, जो जनवरी में पाकिस्तान के खिलाफ टीम का हिस्सा थी।
लखनऊ के इकाना स्टेडियम में खेले जाएंगे 8 मैच
वान निएकर्क और क्लो उस दौरे पर भी टीम का हिस्सा नहीं थीं। सुने लूस ने ही पाकिस्तान के खिलाफ भी टीम की कप्तानी की थी। टीम के कोच हिल्टन मोरेंग ने कहा कि भारत में खेलना हमेशा ही शानदार रहा है। हम इस चैलेंज के लिए तैयार हैं। साउथ अफ्रीकी टीम दौरे पर 5 वनडे और 3 टी-20 मैच खेलेगी। इकाना स्टेडियम में मैच खेले जाएंगे।
इससे पहले गत शनिवार को वनडे और टी-20 सीरीज के लिए भारतीय महिला टीम का ऐलान किया गया था। वनडे की कप्तान मिताली राज और टी-20 टीम की कमान हरमनप्रीत कौर को सौंपी गयी।
क्रिकेट वेबसाइट क्रिकइंफो के मुताबिक, दोनों टीम को 5 दिन क्वारैंटाइन रखा जाएगा। इस दौरान 2 कोरोना टेस्ट होंगे। मेहमान टीम क्वारैंटाइन के बाद 5 मार्च से 2 दिन प्रैक्टिस कर सकेगी। मैच के दौरान स्टेडियम की क्षमता के 40-50% दर्शकों को प्रवेश मिल सकता है।
दक्षिण अफ्रीकी महिला टीम
सुने लूस (कप्तान), अयाबोंगा खाका, शबनिम इस्माइल, लौरा वोल्वार्ट, त्रिशा शेट्टी, सिनालो जाफ्ता, तस्मिन ब्रित्ज, मैरिजाने कैप, नोनदुमिसो शंगेज, लिजेल ली, एनेक बोश, फाये टुन्निक्लिफ, नोनकुलुलेको लाबा, मिगनोन डु प्रीज, नेडाइन डी क्लर्क, लारा गुडाल और टुमी सेखुखुने।
भारतीय महिला टीम
वनडे टीम: मिताली राज (कप्तान), स्मृति मंधाना, जेमिमाह रोड्रिग्ज, पूनम राउत, प्रिया पुनिया, यास्तिका भाटिया, हरमनप्रीत कौर (उप-कप्तान), डी. हेमलता, दीप्ति शर्मा, सुषमा वर्मा (विकेटकीपर), श्वेता वर्मा (विकेटकीपर), राधा यादव, राजेश्वरी गायकवाड़, झूलन गोस्वामी, मानसी जोशी, पूनम यादव, सी. प्रत्यूशा, मोनिका पटेल।
टी-20 टीम: हरमनप्रीत कौर (कप्तान), स्मृति मंधाना (उप-कप्तान), शेफाली वर्मा, जेमिमाह रोड्रिग्ज, दीप्ति शर्मा, ऋचा घोष, हरलीन देओल, सुषमा वर्मा (विकेटकीपर), नुजहत परवीन (विकेटकीपर) आयुषी सोनी, अरुंधति रेड्डी, राधा यादव, राजेश्वरी गायकवाड़, पूनम यादव, मानसी जोशी, मोनिका पटेल, सी.प्रत्यूशा, सिमरन दिल बहादुर।