Wednesday, April 8, 2026
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लघु बचत वाली योजनाओं की ब्याज दर में कोई बदलाव नहीं

नयी दिल्ली : फिक्स इनकम वाले निवेश विकल्पों में पैसे लगाने वाले लोगों के लिए खुशखबरी है। केंद्र सरकार ने लघु बचत यानी स्मॉल सेविंग की ब्याज दर में कोई बदलाव नहीं किया है। 30 सितंबर 2021 को समाप्त होने वाली तिमाही के लिए छोटी बचत पर ब्याज दरें अपरिवर्तित रखी गयी है। 30 जून 2021 को केंद्र सरकार द्वारा जारी एक सर्कुलर में कहा गया है कि पीपीएफ पर 7.1 फ़ीसदी, एनएससी पर 6.8 फीसदी और पोस्ट ऑफिस मासिक आय योजना अकाउंट पर 6.6 फ़ीसदी ब्याज मिलता रहेगा।
छोटी बचत में पब्लिक प्रोविडेंट फंड ( पीपीएफ), नेशनल सेविंग सर्टिफिकेट (एनएससी), सुकन्या समृद्धि योजना और अन्य योजनाएं आती हैं। इसका मतलब यह है कि पीपीएफ और सुकन्या योजना में निवेश करने वाले निवेशक को वही ब्याज मिलता रहेगा जो उन्हें 30 जून को समाप्त तिमाही में मिल रहा था। निवेश के इन विकल्पों में पैसे लगाने वाले लोगों को भी वही ब्याज मिलेगा जो पिछली तिमाही में मिल रहा था।
इससे पहले अप्रैल में सरकार ने छोटी बचत योजनाओं की ब्याज दरों में कमी करने का फैसला वापस ले लिया था। सरकार ने कुछ दिन पहले ही यह फैसला लिया था, लेकिन अगले दिन इस बारे में वित्त मंत्रालय की तरफ से ट्वीट के जरिए फैसला वापस लेने की जानकारी दी गयी। सवा साल पहले हुआ था बदलाव
सरकार ने करीब सवा साल पहले छोटी ब्याज योजनाओं की ब्याज दर में कमी की थी। तब वित्त वर्ष 2020-21 की पहली तिमाही में ब्याज दरों में 1.4 फीसदी तक की कमी की गई थी। अब सीनियर सिटीजन सेविंग्स स्कीम (एससीएसएस) पर ब्याज की दर 7.4 फीसदी होगी। अगर सरकार ने कटौती का फैसला वापस नहीं लिया होता तो यह दर 6.5 फीसदी रह जाती। पांच साल के रेकरिंग डिपॉजिट पर ब्याज की दर 5.8 फीसदी होगी। अगर सरकार ने कटौती का फैसला वापस नहीं लिया होता तो यह 5.3 फीसदी होती।

कनाडा में जानलेवा हीट डोम का कहर, गर्मी ने तोड़ा 10 हजार साल का रिकॉर्ड

एक दिन में 230 मरे
कनाडा के आसामान में बने हीट डोम के कारण गर्मी ने 10000 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। ब्रिटिश कोलंबिया प्रांत में तो पारा 49.44 डिग्री सेल्सियस तक रिकॉर्ड किया गया है। अत्याधिक गर्मी के कारण एक दिन में ही 230 लोगों की मौत हो गई है। ब्रिटिश कोलंबिया के प्रीमियर जॉन होर्गन ने मौत की पुष्टि करते हुए कहा कि उनके राज्य में तापमान के चरम तक पहुंचने के कारण 230 लोगों की मौत हुई है।
गत रविवार से पहले कनाडा में कभी भी तापमान 113 डिग्री फारेनहाइट यानी 45 डिग्री सेल्सियस से अधिक नहीं गया था। तापमान का यह रिकॉर्ड साल 1937 में बना था। लेकिन इस बार 10 हजार साल में एक बार बनने वाले हीट डोम के कारण तापमान 49 डिग्री सेल्सियस को भी पार कर गया। अधिकारियों का कहना है कि अकेले वैंकूवर में गर्मी के कारण 65 लोगों की मौत हुई है।
कनाडा की मौसम सेवा ने कहा कि इस अत्यधिक गर्मी को शब्दों का वर्णन नहीं कर सकता है। मौसम विभाग ने बताया कि ब्रिटिश कोलंबिया का रिकॉर्ड अब लास वेगास में दर्ज किए गए अबतक के सबसे उच्चतम तापमान से भी अधिक है। यह हीटवेव कनाडा से लेकर अमेरिका तक फैली हुई है। अमेरिका के वाशिंगटन और ओरेगन में भी रिकॉर्ड तापमान का अनुभव किया जा रहा है।

क्या है हीट डोम, जिसने मचाई तबाही
कनाडा में पिछले 10 हजार साल में पहला मौका है, जब हीट डोम ने गर्मी बढ़ाकर तबाही मचाई है। इसके कारण गर्मी वायुमंडल में अधिक फैलती है और दबाव और हवा के पैटर्न को प्रभावित करती है। गर्म हवा का यह ढेर उच्च दबाव वाले क्षेत्र में फंस जाता है। इससे आसपास की हवा और भी ज्यादा गर्म होती है। यह बाहरी हवा को अंदर नहीं आने देता है और अंदर की हवा को गर्म बनाए रखता है।
10 हजार साल में पहली बार ऐसा हुआ
अमेरिकी मीडिया सीबीएस के मौसम वैज्ञानिक जेफ बेरार्डेली ने कहा कि अगर आंकड़ों के हिसाब से बात करें तो 10000 साल में हीट डोम जैसी घटनाएं केवल एक बार होती हैं। अगर आप किसी स्थान पर पिछले 10 हजार साल से रह रहे हों तो आप केवल एक बार हीट डोम की गर्मी का अनुभव कर पाएंगे। बर्नाबी रॉयल कैनेडियन माउंटेड पुलिस के कैप्टन माइक कलांज ने कहा कि उन्हें पिछले 24 घंटे के अंदर लोगों के मौत के 25 फोन आए।

(साभार – नवभारत टाइम्स)

‘छत्रकुंवरी मम नाम है कहिबै को जग मांहि’

प्रो. गीता दूबे

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों राजघराने की स्त्रियों का साहित्य सृजन के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है, वह चाहे राजकुल की स्त्रियाँ हों या राज‌दरबार की नर्तकियाँ। किसी- किसी का नाम और योगदान चर्चित हुआ तो कुछ अचर्चित ही रह गया। राजस्थान के राजकुल से संबंधित छत्र कुंवरी बाई जो छत्र कुंवरी राठौड़ के नाम से भी जानी जाती हैं, ने भी साहित्य रचना की थी। वह किशनगढ़ के महाराजा सावंतसिंह की पोती और रूपनगढ़ के महाराज सरदारसिंह की पुत्री थीं। कवयित्री सुंदरी कुंवरी बाई इनकी बुआ थीं। इन का विवाह राघोगढ़ के खींची महाराजा बहादुर सिंह के साथ हुआ था| इनका संबंध निम्बार्क सम्प्रदाय से था। इनके द्वारा रचित एक ग्रंथ मिलता है, “प्रेम विनोद” जिसकी रचना तिथि पर विचार करने पर पता चलता है कि इसका सृजन सन 1800 के अंतिम दशक  के आस- पास हुआ है। अपने ग्रंथ में अपना और अपने वंशवृक्ष का परिचय देते हुए भक्त कवयित्री ने लिखा है-

“रूपनगर नृप राजसी, जिन सुत नागरिदास| 

तिन पुत्र जु सरदारसी, हों तनया तै मास||

छत्रकुंवरी मम नाम है कहिबै को जग मांहि| 

प्रिया सरन दासत्व तै, हौं हित चूर सदांहि ||

सरन सलेमाबाद की, पाई तासु प्रताप| 

आश्रम है जिन रहसि के, बरन्यो ध्यान सजाय||”

“प्रेम विनोद” कृष्ण भक्ति धारा से संबंधित काव्य- ग्रंथ है जिसे आलोचक उत्कृष्ट कोटि का कृष्ण काव्य मानते हैं। कृष्ण भक्ति में डूबकर कवयित्री ने लिखा-

“जुरन धुरन पुनि दुरन मुरन लोचन अनियारे।

बरनागति उर मैं, बानलगि फूट दुसारे।।

कवयित्री की भक्ति माधुर्य भाव की भक्ति है जिसमें डूबकर कृष्ण और गोपियों की लीला का वर्णन उन्होंने अत्यंत सरस ढंग से किया है। कृष्ण वियोग के पश्चात गोपियों की मनःस्थिति का वर्णन करते हुए उन्होंने कृष्ण के प्रति उनके प्रेम और समर्पण का अत्यंत मार्मिक वर्णन किया है।  श्रीकृष्ण के द्वारिका प्रस्थान के बाद गोपियाँ अपने प्रिय कृष्ण की पूजा के लिए फूल  चुनने जाती है। वे कदम्ब वृक्ष की डालियों से पुष्प चुनती हुए प्रियतम कृष्ण को याद करते हुए उनकी मधुर स्मृतियों में डूबकर  भाव-विभोर हो जाती है| गोपियों द्वारा फूल लोढ़ने के इस अवसर का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन कवयित्री छत्र कुंवरी बाई ने किया है-

“स्याम सखी हंसि कुंवरिदिस, बोली मधुरे बैन| 

सुमन लेन चलिए अबै, यह बिरिया देन||

यह बिरिया सुख देन, जान मुसकाय चली जब| 

नवत सखी करि कुंवरि, संग सहचरि विथुरी सब|| 

प्रेम भरी सब सुमन चुनत जित तिच सांझी हित|

ये दुहुं बेबीस अंग फिरत निज गति मति मिश्रित||”

फूल लोढ़ने का एक और रसमय प्रसंग निम्नलिखित पंक्तियों  में चित्रित है। श्लेष अलंकार के प्रयोग ने इन पंक्तियों के  काव्य सौन्दर्य के साथ ही अर्थ गांभीर्य को भी कई गुणा बढ़ा दिया है-

“गरवांही दीने कहूं, इकटक लखन लुभाहिं|

पग वग द्वे द्वे पेड़ पे, थकित खरी रहि जाहिं||

थकित खरी रहि जाहिं, दृगन दृग छूटे ते छूटे| 

तन मन फूल अपार, दहुं फल ताह सु लूदे||”

परिमार्जित ब्रजभाषा में रचित छत्र कुंवरी बाई की कविताओं में प्रेम और भक्ति का अद्भुत निदर्शन मिलता है। मध्यकाल की अधिकांश भक्त कवयित्रियों ने कृष्ण भक्ति का आश्रय लेकर अपने ह्रदय में संचित प्रेम और शृंगार के भावों को भी अनायास अभिव्यक्ति दी है इसीलिए कृष्ण भक्त कवयित्रियों के काव्य में माधुर्य भक्ति की माधुरी सहज ही प्रस्फुटित होती है।

 

सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल में मनाया गया वार्षिक समारोह

कोलकाता : सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल के प्राथमिक विभाग का वार्षिक समारोह में विभिन्न क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन करने वाली छात्राओं को पुरस्कृत तिया गया। कार्यक्रम की शुरुआत स्कूल गीत से हुई। इसके बाद स्कूल की प्रिंसिपल कोईली दे ने कार्यक्रम को संबोधित किया। उसने बताया कि पिछला साल उथल-पुथल, मिली-जुली भावनाओं और चुनौतियों का साल रहा। लेकिन एक टीम के रूप में हमने सभी बाधाओं का मुकाबला किया और एक फलदायी शैक्षणिक वर्ष के लिए अपनी पूरी कोशिश की। हेडमिस्ट्रेस ने वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत की। उन्होंने ऑनलाइन कक्षाओं की सफलता, सत्र के दौरान आयोजित शैक्षिक और सह-शैक्षिक गतिविधियों के साथ-साथ स्कूल के भीतर और बाहर छात्रों की उपलब्धियों पर प्रकाश डाला। बच्चों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश किये। इसके बाद पुरस्कारों की घोषणा हुई। शैक्षणिक समन्वयकों ने नर्सरी से कक्षा पांच तक के पुरस्कार विजेताओं की घोषणा की। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ।

 

बिड़ला हाई स्कूल में इन्टरहाउस वाद – विवाद 2021 -22

कोलकाता : बिड़ला हाई स्कूल में हाल ही में वर्चुअल इन्टरहाउस वाद – विवाद प्रतियोगिता जूम पर आयोजित की गयी। प्रतियोगिता का विषय “चिकित्सा विज्ञान ने कोविड -19 महामारी में मानवता को विफल कर दिया है” था। इस अवसर पर अतिथि के रूप में वक्ता राजू रमण उपस्थित थे जो वाद – विवाद में अपनी महारत रखते हैं। प्रतियोगिता के निर्णायकों में बिड़ला हाई स्कूल की प्रिंसिपल लवलीन सैगल, जूनियर सेक्शन की वरिष्ठ शिक्षिका जयन्ती श्रीकान्त, सुशीला बिड़ला गर्ल्स स्कूल की शिक्षिका रूमा चक्रवर्ती शामिल थीं। प्रतियोगिता का संचालन 12वीं (ह्यूमैनिटिज) के विद्यार्थी ईशान बनर्जी ने किया। 6 टीमें थीं और प्रत्येक वक्ता को 5 मिनट में अपना पक्ष समझाना था। कोविड, चिकित्सा सेवा और डॉक्टरों को लेकर चर्चा हुई. चिकित्सकों की भूमिका पर खूब बहस हुई। 54 प्रतिशत मतों के साथ प्रतियोगिता का मोशन गिर गया। सर्वश्रेष्ठ क्यू पैनलिस्ट का पुरस्कार उदिता अरुण नाथ को, सर्वश्रेष्ठ टीम पुष्कर और नक्षत पांडेय को सर्वश्रेष्ठ टीम. को मिला। शिवाजी हाउस के नक्षत को सर्वश्रेष्ठ वक्ता का पुस्कार मिला।
रिपोर्ट – उदित अरुण नाथ औऱ जयेश भिमानी,

 

‘निहायत जरूरी मनुष्य विमर्श है स्त्री विमर्श’

डॉ. विजया सिंह आलोचना के क्षेत्र में अपनी जमीन मजबूत कर रही हैं। पुस्तक समीक्षा में रुचि। फिलहाल रानी बिड़ला गर्ल्स कॉलेज में अध्यापन कर रही हैं। वे शुभ सृजन युवा मार्गदर्शक समूह की मेंटर भी हैं। डॉ. विजया सिंह से साहित्य, साहित्यिक विमर्श समेत विभिन्न विषयों पर बात हुई, प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश – 

स्त्री-विमर्श को आप किस रूप में देखती हैं?
मुझे लगता है कि स्त्री विमर्श निहायत जरूरी मनुष्य विमर्श है जो समानता पर आधारित समाज के निर्माण के लिए वैचारिक और व्यवहारिक स्तर पर क्रियाशील है। इसकी दरकार स्त्री और पुरुष दोनों को है ताकि वे तयशुदा भूमिकाओं के परम्परागत सामान्यीकरण से आगे बढ़ सके। नए विकल्पों को अपना सकें। तभी स्वतंत्रता और वास्तविक समानता का सौंदर्य दिखेगा।

साहित्य में स्त्री रचनाकारों की स्थिति पर आप क्या कहेंगी?
साहित्य के क्षेत्र में स्त्री रचनाकारों की बढ़ती संख्या ने स्त्री की पक्षधरता मजबूत की है। उन्होंने स्त्री
के बेहद निजी किन्तु राजनीतिक अनुभवों को व्यक्त कर साहित्य को निश्चित रूप से संपन्न किया है। स्त्री रचनाकारों ने न केवल स्त्री बल्कि समस्त मानवता के हित में अपनी लेखनी चलायी है। स्त्री रचनाकारों ने उन सभी अनुभवों से समाज को परिचित कराया है जो अब तक प्रतिबंधित थे।

आपके समय में जो वातावरण स्त्रियों को लेकर था और आज जो परिवेश है, उसे लेकर आप क्या सोचती हैं?

‌समय के साथ निश्चित रूप से स्त्रियां आगे बढ़ रही हैं। शिक्षा और आधुनिक जनसंचार माध्यमों ने उसकी गतिशीलता और जागरूकता बढ़ाई है। आज के परिवेश में उनके आगे चुनौतियाँ पहले से भी अधिक हैं। सबसे बड़ी समस्या उपभोक्तावाद से जुड़ी है। उसे सजग होकर वस्तुवादी नजरिये का विरोध करना होगा जो उसे मात्र देह में बदल देना चाहती है। आज की स्त्री जानती है कि उसकी अस्मिता का सम्बन्ध उसकी भूमिका से है, चेहरे और रूप की प्रशंसा उसे अंततः छोटा बनाती है। परंपरागत पितृसत्ताक व्यवहारों और तयशुदा भूमिकाओं से इतर उसे नए सम्बन्ध और व्यवहार तलाशने होगें। ये कुछ भी आसान नहीं होगा लेकिन इससे निजी और सामाजिक विकास के नए रास्ते खुलेंगे।

कविता आज एक आसान अवसर बन गयी है मशहूर होने का, और इससे गुणवत्ता प्रभावित हो रही है , क्या आप यह मानती हैं?
सभी ने नहीं तो भी अधिकांश रचनाकारों ने अपने रचनात्मक जीवन का आरंभ कविता लेखन से किया। यह भी कहना उचित है कि कविता लिखने का चलन बढ़ा है। इसी क्रम में ऐसा लिखा जा रहा है जिसका उद्देश्य हो सकता है कि रचना करने के अलावा कुछ और हो। फिर भी कविता लेखन को प्रोत्साहित करने की जरूरत है। यह केवल अभिव्यक्ति ही नहीं संवाद और संप्रेषण का भी माध्यम है। इससे नयी प्रतिभाओं को सामने आने का अवसर मिलता है।

क्या गद्य साहित्य उपेक्षित है, विशेष रूप से आलोचना?
बिलकुल नहीं। हाँ, रफ़्तार कम हो सकती है किंतु आलोचना उपेक्षित नहीं है।

पुस्तक समीक्षा और अनुवाद को प्रोत्साहित करने के लिए क्या किया जा सकता है?
‌ इन दोनों को गंभीरता से लिया जाना जरूरी हैं। इन दोनों का अलग-अलग महत्व है। एक ओर अच्छी, प्रभावी पुस्तक समीक्षा पढ़ने के लिए प्रेरित करती है वहीं दूसरी ओर अनुवाद भाषा और संस्कृति की फिसलनों से होते हुए विराट पाठक वर्ग को सम्मोहित किये रहते है। यानी दोनों जरूरी हैं। नयी भाषा नीति अनुवाद के महत्व को समझते हुए एक अलग और विशेष साहित्य के रूप में इसके विकास के कई प्रावधान करती है। आगे इसकी जमीनी हकीकत सामने आएगी। पुस्तक समीक्षा भी गंभीरता के साथ की जानी चाहिए ताकी पुस्तकों का सजग पाठक वर्ग तैयार हो सके।

आप युवाओं को क्या सन्देश देना चाहेंगी?
किताबों से दोस्ती करें और खुद से प्यार करें।

कोरोना के बीच कबाड़ बेचकर ही रेलवे हुआ मालामाल

 आरटीआई में खुलासा, कमाये 4575 करोड़
नयी दिल्ली : कोरोना के कारण रेलवे सेवा ठप पड़ी है, राजस्व का नुकसान हो रहा है पर आप नहीं जानते है कि कोरोना काल में भी रेलवे की कमाई हो रही है और वह भी हजार करोड़ की। दरअसल, कोरोना काल में रेलवे ने केवल कबाड़ बेचकर 4575 करोड़ रुपये कमाये हैं और यह खुलासा आरटीआई में हुआ है। सूचना का अधिकार (आरटीआई) के तहत मिले एक जवाब से पता चला कि 2020-21 में रेलवे को इस मद में अब तक की सर्वाधिक 4575 करोड़ रुपये की आय हुई। इससे पहले 2010-11 में कबाड़ बेचकर 4,409 करोड़ रुपये का राजस्व जुटाया गया था। पटरियों का पुराना होना, पुरानी लाइन को बदलने, पुराने ढांचे को त्यागने, पुराने इंजन, डिब्बों आदि से कबाड़ सामग्री बनती है। तेजी से रेल रूट्स के विद्युतीकरण, डीजल इंजनों को बदलने और कारखानों में निर्माण के दौरान भी कबाड़ सामग्री बनती है। पिछले कुछ वर्षों में रेलवे के लिए यह आय का अच्छा खासा स्रोत रहा है।
मध्य प्रदेश के चंद्र शेखर गौड़ द्वारा आरटीआई कानून के तहत मांगी गयी सूचना के जवाब में रेलवे बोर्ड ने कहा कि कोविड-19 महामारी से प्रभावित 2020-21 में रेलवे को कबाड़ से पिछले साल की तुलना में पांच प्रतिशत अधिक आय हुई। रेलवे ने कहा कि 2019-20 में 4,333 करोड़ रुपये की कबाड़ सामग्री की बिक्री की गयी और 2020-21 में कबाड़ से 4,575 करोड़ रुपये की आमदनी हुई।

पशुओं से खूब प्रेम करती है बहुमुखी प्रतिभा की धनी नन्ही मनस्वी

बहुत कम उम्र में उसने मां दुर्गा की आराधना शुरू कर दी है नहीं तो मुमकिन नहीं है कि इतने कठिन संस्कृत शब्द इतने सही ढंग से उच्चारित किए जा सके । मां दुर्गा तथा मां सरस्वती का आशीर्वाद है इस बच्ची पर किसे मां दुर्गा की स्तुति इतने अच्छे ढंग से याद है।आज हम बात करेंगे एक 8 वर्षीय बच्ची की जिसकी उम्र 8 साल है । कक्षा 3 में पढ़ती है। नाम मनस्वी शर्मा । पिता का नाम निर्मल शर्मा । मां लक्ष्मी शर्मा। मनस्वी शर्मा से की गयी बातचीत में उसने बताया कि उसे डांस करना अच्छा लगता है उसे संगीत सुनना और गाना दोनों ही अच्छा लगता है। नृत्य में वह कत्थक बहुत अच्छे से कर लेती है। ड्राइंग करना भी उसके शौक में शामिल है। वही किशोर कुमार के गाने उसे बहुत ज्यादा पसंद आते हैं। अपने वीडियो बनाकर यूट्यूब पर डालना भी उसका एक पसंदीदा शौक है और यह वीडियो जानवरों के साथ बनाकर व डालती है।

उसके काफी सारे वीडियो में गाय बिल्ली इनके ऊपर उसने अपने वीडियो डाले हैं। मनस्वी कहती है कि मुझे जानवरों से बहुत प्यार है मुझे जानवर अच्छे लगते हैं। घर में कम से कम पांच छह बिल्लियां पाल रखी है। उसने कहा कि मेरी मम्मी को भी बिल्लियां गाय बहुत पसंद है।

मनस्वी करीबन 3 साल की उम्र से कथक नृत्य सीखती आ रही है। खास बात यह है कि मनस्वी को भगवान की आरती भजन मंत्र भक्ति भाव से भरा हुआ संगीत बहुत पसंद आता है। उसे हनुमान चालीसा भी पूरी तरह याद है। एक तरफ जहां बच्चे सारा दिन मोबाइल फोन लेकर गेम खेलते है या फिर ऑनलाइन कार्टून देखते हैं। वही मनस्वी अपना समय अपने शौक को पूरा करने में लगाती हैं।

बेटे की साइकिल को बना दिया खेत जोतने वाला उपकरण

तमिलनाडु में एक किसान को भी अपने खून-पसीने की कमाई कोरोना की भेंट चढ़ गयी और अब वह साइकिल से अपना खेत जोतने के लिए मजबूर है। परिवार के सदस्य भी इस काम में किसान का हाथ बंटा रहे हैं। तमिलनाडु के अगूर में रहने वाले 37 साल के नागराज पारंपरिक रूप से धान की खेती करते थे। हालांकि इसमें जब नुकसान हुआ तो उन्होंने सम्मांगी/चंपक की फसल उगाने के लिए किया गया। इन फूलों का सबसे ज्यादा इस्तेमाल मंदिरों में किया जाता था। फूलों से माला बनाई जाती थी।

नागराज के परिवार ने कर्ज लेकर फूलों की खेती शुरू की थी। उन्होंने खेतों को समतल किया और फिर करीब छह महीने तक पौधों के बड़े होने का इंतजार किया। हालांकि जब पौधों पर फूल आना शुरू हुए तो दुर्भाग्य से कोरोना के कारण लॉकडाउन लग गया और मंदिरों के पाट बंद कर दिए गए। मंदिरों में श्रद्धालुओं के नहीं आने से फूलों की बिक्री भी बंद हो गई। साथ ही शादी समारोहों में भी फूलों का इस्तेमाल होता था, लेकिन ऐसे समारोहों पर भी पाबंदियां लगा दी गईं। करीब एक साल तक नागराज को मुश्किल हालातों का सामना करना पड़ा। कर्ज की चिंता तो थी ही साल भर में बचत भी खत्म हो गई। बावजूद इसके नागराज ने हिम्मत नहीं हारी और एक बार फिर सम्मांगी की फसल उगाने का फैसला किया।

साइकिल को बनाया खेत जोतने वाला उपकरण

नागराज ने अपने बेटे को स्कूल में मिली साइकिल की सहायता ली। स्कूली छात्रों को तमिलनाडु के स्कूलों में साइकिल मुफ्त दी जाती है। थोड़े बहुत पैसे से उसने साइकिल को खेत जोतने वाले उपकरण में तब्दील कर दिया। उनका 11 साल का बेटा ऑनलाइन पढ़ाई के साथ खेत में उनका हाथ बंटाता है। साथ ही नागराज का भाई भी खेती में सहयोग करता है।

खेती का काम करने में शर्म नहीं

उनके बेटे धनचेझियान ने कहा कि मैं हमेशा पिता और परिवार को खेत में काम करते देखता रहा हूं। जब वो थक जाते हैं तो मैं उनका हाथ बंटाता हूं। काम और मेहनत करने में परिवार के किसी भी शख्स को कोई शर्म नहीं है।

मुश्किल काम है सम्मांगी उगाना

नागराज के भाई का कहना है कि सम्मांगी को उगाना मुश्किल काम है। इसमें छह महीने कमाई की कोई उम्मीद नहीं होती है और लॉकडाउन के कारण फसल बर्बाद हो गई थी। हमें अधिकारियों से भी कोई मदद नहीं मिली है।

(साभार – लोकमत)

जानलेवा हुई गर्मी. देश में पिछले 50 साल में गर्मी ने लीं 17 हजार लोगों की मौत

नयी दिल्ली : देश में गर्मी हर साल कहर बरपाती है पर यह कितनी जानलेवा है, इसका खुलासा एक अध्ययन में हुआ है। अध्ययन के मुताबिर भारत में प्रचंड गर्मी ने 50 साल में 17000 से अधिक लोगों की जान ले ली है। 1971 से 2019 के बीच लू चलने की 706 घटनाएं हुई हैं। यह जानकारी देश के शीर्ष मौसम वैज्ञानिकों द्वारा प्रकाशित शोध पत्र से मिली है।
यह शोध पत्र पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव एम राजीवन ने वैज्ञानिक कमलजीत रे, वैज्ञानिक एसएस रे, वैज्ञानिक आरके गिरी और वैज्ञानिक एपी डीमरी ने इस साल की शुरुआत में लिखा था। इस पत्र के मुख्य लेखक कमलजीत रे हैं। लू अति प्रतिकूल मौसमी घटनाओं (ईडब्ल्यूई) में से एक है। अध्ययन के मुताबिक, 50 सालों (1971-2019) में ईडब्ल्यूई ने 1,41,308 लोगों की जान ली है। इनमें से 17,362 लोगों की मौत लू की वजह से हुई है जो कुल दर्ज मौत के आंकड़ों के 12 प्रतिशत से थोड़ा ज्यादा है। इसमें कहा गया कि लू से अधिकतर मौत आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और ओडिशा में हुईं। पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना उन राज्यों में शुमार हैं, जहां भीषण लू के मामले सबसे ज्यादा सामने आते हैं।
यह अध्ययन हाल के हफ्तों में उत्तरी गोलार्द्ध में पड़ी प्रचंड गर्मी की वजह से अहमियत रखता है। इस हफ्ते के शुरुआत में कनाडा और अमेरिका में भीषण गर्मी पड़ने से कई लोगों की मौत हो गई। कनाडा के शहर के वैंकूवर में पारा सारे रिकॉर्ड तोड़ते हुए 49 डिग्री सेल्सियस से भी अधिक हो गया। भारत के भी उत्तरी मैदानों और पर्वतों में भीषण गर्मी पड़ी है और लू चली है। मैदानी इलाकों में इस हफ्ते के शुरुआत में पारा 40 डिग्री से अधिक पहुंच गया है। मैदानी इलाकों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक होने और पर्वतीय इलाकों में 30 डिग्री सेल्सियस से अधिक होने पर किसी इलाके में लू की घोषणा की जाती है।