Wednesday, April 8, 2026
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शुभजिता – उल्लास

साहित्य, कला और हस्तशिल्प के रंगों से सजा उल्लास खूब सराहा गया…यह आयोजन 5 से 15 अप्रैल तक चला

 

 

वेबिनार में हुई ऑनलाइन रोजगार की चुनौतियों और समाधान पर चर्चा

कोलकाता : भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज में प्रो उर्वी शुक्ला ने विद्यार्थियों को ऑनलाइन माध्यमों रोजगार हेतु साक्षात्कार और इससे जुड़ी चुनौतियों पर चर्चा की। इस विषय पर आयोजित एक वेबिनार में उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि एक ओर जहाँ कोरोना महामारी के दौरान कई लोगों के रोजगार चले गए वहीं दूसरी ओर ऑनलाइन रोजगार पाने के लिए की कई रास्ते खुल गए हैं। अब ऑनलाइन बहुत से रोजगार और नौकरियों के विज्ञापन ई – पेपर में प्राप्त हो जाते हैं। कॉर्पोरेट कपनियों, सरकारी और गैर सरकारी दोनों ही संस्थानों में, शिक्षण स्वास्थ्य और अन्य सभी जगह रिक्त पदों के विषय में जानकारी दी जाती है।
प्रो उर्वी शुक्ला ने वर्तमान स्थितियों में विद्यार्थियों को ऑनलाइन साक्षात्कार की तैयारियों से जुड़ी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि ऑनलाइन होने पर आमने सामने जब इंटरव्यू हो तो विद्यार्थियों को आत्मविश्वास, अपना व्यवहार, मानसिक, शारीरिक और तकनीकी रूप से पूरी तैयारी करनी आवश्यक है। 60 सेकेंड में ऑनलाइन पर अपना पूरा परिचय देने के तरीके बताये और कहा कि उम्मीदवारों की प्रतिभा और कमजोरियों को आंकने की आवश्यकता है। प्रश्नों के उत्तर पारदर्शिता से देने की सलाह दी। वर्तमान में यदि कोई विद्यार्थी कम्प्यूटर का पूरा ज्ञान रखता है उसके लिए ऑनलाइन रोजगार पाना मुश्किल नहीं है। 100 से अधिक विद्यार्थियों ने इस वेबिनार में भाग लिया ।कॉलेज के डीन प्रो दिलीप शाह ने विद्यार्थियों को बताया कि आने वाले समय में ऑनलाइन मिलने वाले रोजगारों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी, प्रो दिव्या उडीसी,प्रो श्रद्धा अग्रवाल और अन्य शिक्षक उपस्थित रहे । कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

‘अर्चना’ की मासिक गोष्ठी में कविताओं की गूँज

कोलकाता : साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्था ‘अर्चना’ की मासिक गोष्ठी जूम पर संपन्न हुई। सभी सदस्यों ने विभिन्न भाव लिए रंग बिरंगी रचनाएं सुनाई । प्रसन्ना चोपड़ा ने ने जिंदगी है उनकी साहित्य आराधना, हिम्मत चौरडिया ने हौसलों में बसी सफलता की कामना, शशि कंकानी ने नदी की मनोदशा का मार्मिक भावपूर्ण वर्णन, उषा श्राफ ने वर्षा में प्रकृति के मनोरम दृश्यों का वर्णन, मृदुला कोठारी ने प्रश्नोत्तर शैली में व्यक्त मनभावन रचना, वसुंधरा मिश्र ने प्राकृतिक भावभरे उद्वेगों को सहेजने, बनेचंद मालू ने बालस्मृति की रेलगाड़ी में सफर करवाना, समृद्धि मंत्री ने खूंटी पर टंगी कॉलेज की यादों से अपने वो दिन तरोताजा किए, सुशीला चनानी ने कहीं चांद, कहीं वन, नवरतन भंडारी ने महकती,मचलती मानवीय संवेदना अतीत के चक्रव्यूह में घूमती यादों का अनमोल खजाना,
विद्या भंडारी ने ससुराल में अपनापन दिखाना / पति- पत्नी को टेनिस बॉल की उपमा से सजाना, भारती मेहता ने सूने कक्ष में पड़े घड़े का अनोखा अंदाज बयां किया और इंदु चांडक ने बरसात में भीगी भीगी रचना से आनंदित किया। कविता की प्रमुख पंक्तियां – हौंसला मन में अगर तो जीत कितनी दूर तुमसे-हिम्मत चौरडिया, हाइकु ,क्षणिका ,वर्षा के गीत चांद की अदा,कितना मनमौजी है सूरज ,भीगा भीगा मौसम है- सुशीला चनानी, शर्मोहया के परदे में झुकी झुकी सी नज़र झरोखे से झांकती..मीना दूगड़ ।क्षणिकाएँ…रिक्त कक्ष हो, कोने में रखा हो जलपूरित गीला घड़ा…तो लगता है शीतलता अभी बाकी है-भारती मेहता, बारिश का मौसम आया-उषा श्राफ।यादों का सिलसिला-बनेचन्द मालू, कजरारे बदरा अम्बर पे छाये-इंदू चांडक। नदी की पुकार, मेरी महिमा को जान मुझसे करले तू प्यार -शशि कंकानी, उमस के पावस बरस गए/तरस गए हां बरस गए-मृदुला कोठारी, साहित्य की साधना आराधना करती साहित्य मेरी जिंदगी मेरी कलम चलती-प्रसन्ना चोपड़ा, जरा सा अपनापन दिखा कर तो देखो,वह खिंची चली आएगी, जरा सा अपनापन दिखा कर तो देखो,वह खिंची चली आएगी – विद्या भंडारी, प्रकृति के उद्वेग – वसुंधरा मिश्र आदि सभी कविताएं एक से बढ़कर एक रहीं। यह कार्यक्रम सात जुलाई बुधवार शाम अर्चना की मासिक कवि गोष्ठी के अंतर्गत आयोजित की गयीं जिसमें हमेशा की तरह स्वरचित कविताएँ पढ़ी जाती हैं जिससे मौलिक और सृजनात्मक रचनाओं को बढ़ावा मिलता है और लिखने के अभ्यास के साथ मस्तिष्क उर्वर बना रहता है। गोष्ठी में हाइकु ,क्षणिकाएं,मुक्त छन्द कवितायें ,गीत आदि विभिन्न विधाओं की रचनाएँ पढी गयीं। सामाजिक विषय भी कविताओं के माध्यम से उठाए गए पर वर्षा ऋतु की रचनाएँ हर दिल पर छाई रहीं। गोष्ठी का संचालन किया इन्दु चाण्डक ने।

भवानीपुर कॉलेज में सेल्फ ग्रूमिंग और एटीकेट्स पर वेबिनार

कोलकाता : भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज में ‘स्वयं को संवारना और शिष्टाचार’ विषय पर तीन दिन के वेबिनार का आयोजन किया गया। जूम पर आयोजित इस वेबिनार में विद्यार्थियों को सेल्फ ग्रूमिंग और एटीकेट्स के तरीके पता चले। वेबिनार में गेराल्डीन रसल रे प्रमुख वक्ता रहीं। उन्होंने फैशन पर चर्चा की और तीन दिनों तक चलने वाले इस सत्र में विषय पर आधारित कई बातें समझायीं। प्रथम दिन २१वीं सदी में होने वाले फैशन उद्योग और उससे जुड़े इतिहास पर केंद्रित रहा। बदलती जीवनशैली के अनुरूप परिधानों. डिजाइन, मेकअप, और फैशन के बारे में भी विद्यार्थियों को पता चला। दूसरे दिन गेराल्डीन ने शिष्टाचार के इतिहास और तीसरे दिन टेबल मैनर्स यानी मेज पर खाते समय किस तरह व्यवहार, होना चाहिए, यह बताया। गेराल्डीन रसल रे मॉडलिंग प्रशिक्षक हैं और बॉलीवुड हस्तियों के साथ काम कर चुकी हैं। तीन दिनों के इस सत्र का तकनीकी सहयोग बिनोद जोसेफ पॉल और गौरव किल्ला द्वारा किया गया । प्रश्नोत्तर सेशन में ‘कॉलेज में यूनीफॉर्म होना चाहिए कि नहीं ‘ विषय पर विद्यार्थियों ने वाद – संवाद किया। इस वेबिनार में 100 से अधिक विद्यार्थियों की उपस्थिति रही ।प्रो दिलीप शाह ने गैराल्डीन रसल रे को धन्यवाद दिया। प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी, प्रो दिव्या उडीसी आयोजन में रहे। इस कार्यक्रम की जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

 

 

 

 

 

कवि केदारनाथ सिंह की स्मृति में युवा कविता उत्सव का आयोजन

कोलकाता : सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन की ओर से हिंदी के लोकप्रिय दिवंगत कवि केदारनाथ सिंह के जन्मदिन के अवसर पर युवा कविता उत्सव का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत हिंदी सिनेमा के प्रसिद्ध अभिनेता दिलीप कुमार के निधन पर शोक ज्ञापन के साथ हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ आलोचक शंभुनाथ ने कहा कि मिशन की ओर से कवि केदारनाथ के जन्म दिवस को युवा कविता उत्सव के रूप मनाया जाना एक सराहनीय प्रयास है। केदारनाथ सिंह की कविताओं में भविष्य के लिए गहरी बेचैनी दिखती है। संस्कृतिकर्मी संजय जायसवाल ने कहा कि केदारनाथ जी मानव-विरोधी शक्तियों के बरक्स मनुष्यता की पहल करते हैं। वे साधारण को भी असाधारणत्व प्रदान करते हैं। इस अवसर पर डॉ राजेश मिश्र,प्रकाश त्रिपाठी, मधु सिंह,पंकज सिंह, अन्नू तिवारी, रूपेश कुमार यादव,गायत्री बाल्मीकि, सुशील कुमार,मधु साह,विक्रम साव ने स्वरचित कविता पाठ और सूर्यदेव राय,राहुल गौड़, पार्वती शॉ,निखिता पांडे, प्रीति साव,साक्षी झा, नलिनी साहा,राधा कुमारी ठाकुर और संजना जायसवाल ने केदारनाथ सिंह की कविताओं पर आवृत्ति की।कार्यक्रम का संचालन पंकज सिंह और धन्यवाद ज्ञापन श्री रामनिवास द्विवेदी ने दिया।

श्री शिक्षायतन कॉलेज में राष्ट्रीय ई- संगोष्ठी का आयोजन

कोलकाता : श्री शिक्षायतन कॉलेज (कोलकता) के हिन्दी विभाग द्वारा ‘लैंगिक विमर्शः साहित्य, समाज और सिनेमा’ पर राष्ट्रीय ई- संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का सफल संचालन विभाग की अध्यापिका प्रो. अल्पना नायक ने किया। संचालन के दौरान उन्होंने कहा कि एलजीबीटी समुदाय लैंगिक भेदभाव के कारण उत्पीड़न का शिकार है। हमें यही देखना है कि साहित्य और सिनेमा उनके साथ कितना न्यायकर पा रहे हैं। बीज वक्ता के रूप में असम विश्वविद्यालय के प्रो. जय कौशल ने सिनेमा और साहित्य के माध्यम से कई महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं पर अपनी बात रखी। उन्होनें कहा कि यह प्रश्न उठाना चाहिए कि समाज में हम जेंडर को लेकर कितने जागरूक हैं? एलजीबीटी समुदाय के लोगों को देख कर हमारी प्रतिक्रिया कैसी होती है? समाज में स्त्री, एलजीबीटी , बाईसेक्सुअल,गे आदि अधिक उत्पीड़ित होते हैं। एलजीबीटी समुदाय के प्रति सकारात्मक सोच में पश्चिम की तुलना में भारतीय समाज बहुत पीछे है। सिनेमा में प्रसिद्ध कलाकारों के द्वारा इस विषय पर रोल अदा कराने का प्रचलन बढ़ा है। साहित्य में भी इन विषयों पर सहजता से लिखा जा रहा है ताकि समाज इस समुदाय को सहज रूप में स्वीकार कर सके। दूसरी वक्ता के रूप में पाती पुरोहित ने नारीवाद की नजर से पुरुषत्व विषय पर अपनी बात रखी। उन्होनें कहा कि लैंगिक विमर्श इंटर सेक्सुअलीटी सब एक दूसरे से संबंधित हैं पर लोग इस विषय पर बात करने से कतराते हैं। इस विषय में भाषा बड़ा रोल अदा करती है। श्यामलाल कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय की अध्यापिका डॉ. सुजाता ने कहा कि कि जैविक अंतर ही स्त्री-पुरुष के अंतर का नींव है। एक सेक्स है जो जन्म से मिलता है और जेंडर समाज तय करता है। समाज में बचपन के खिलौने से स्त्री-पुरुष के बीच भेदभाव शुरु हो जाता है। । कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ लेखक प्रदीप सौरभ ने की । उन्होंने कहा समाज स्त्री और पुरुष के तालमेल के बिना नहीं चल सकता है। प्रश्नोत्तर सत्र का संचालन डॉ रचना पाण्डेय ने किया। विभाग की अध्यापिका डॉ. प्रीति सिंघी ने धन्यवाद ज्ञापित किया एवं इस संगोष्ठी की रिपोर्टिंग डॉ. रेणु चौधरी ने किया।

खिचड़ी….देश को एक सूत्र में बाँधने वाला व्यंजन

खिचड़ी के चार यार ,दही ,पापड़ ,घी और अचार’ और कही कही गुड़ भी। गुजरात की राम खिचड़ी बोलिए, महाराष्ट्र की वलाची खिचड़ी, आंध्रप्रदेश की कीमा खिचड़ी, कर्नाटक-तमिलनाडु की बेसीभिली भात या राजस्थान का खिचड़ा। सब कुछ मिलजुल कर खिचड़ी ही बनती है। राजस्थान में चावल कम और बाजरा ज्यादा का खिचड़ा तो सर्दियों का पकवान है।
खिचड़ी का इतिहास
माना जाता है कि खिचड़ी शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के खिच्चा शब्द से हुई है. खिच्चा चावल और विभिन्न प्रकार की दाल से बनने वाला खाद्य पदार्थ होता है. खिचड़ी का इतिहास करीब ढाई हजार साल पुराना है. इंडिया करेंट्स नामक वेबसाइट के एक लेख के अनुसार ग्रीक राजदूत सेलुकस ने लिखा है कि इंडिया में चावल और दाल से बना खाद्य पदार्थ काफी लोकप्रिय है. पाकशास्त्री मानते हैं कि ये डिश खिचड़ी या उसका पूर्व रूप रही होगी. मोरक्को के सैलानी इब्न बतूता ने भी भारत में चावल और मूंग की दाल से बनने वाली खिचड़ी का उल्लेख किया है. इब्न बतूता सन् 1350 में भारत आया था. 15वीं सदी में भारत आने वाले रूसी यात्री अफानसी निकितीन ने भी भारतीय उपमहाद्वीप में लोकप्रिय खिचड़ी का जिक्र किया है
आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के एक सर्वे में प्रमाण मिले हैं कि 1200 ईस्वी से पहले भारतीय लोग दाल-चावल को मिला कर खाया करते थे। इसके अलावा मगध के सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य के प्रधानमंत्री और कूटनीति के लिए विख्यात चाणक्य ने भी खिचड़ी को संतुलित आहार बताया है। चाणक्य के अनुसार एक भाग चावल, एक चौथाई भाग दाल, हल्का नमक और घी के साथ खिचड़ी खाना फायदेमंद होता है। खिचड़ी का सबसे पहला जिक्र आयुर्वेद में मिलता है। चरक संहिता में भी खिचड़ी का उल्लेख आता है। इसमें किशर शब्द से खिचड़ी निकला है। जिसको खाने के समय के बारे में कहा गया है कि, इसका उत्तम समय मकर संक्रांति के बाद शुरू होता है। इस समय देवयोग शुरू हो जाता है और खिचड़ी देवताओं को पसंद है। सूर्य का उत्तरायण होना उत्साह और ऊर्जा के संचारित होने का समय माना जाता है और खिचड़ी इंसानों के अंदर इसी उर्जा को प्रवाहित करती है। तमिलनाडु में इसे ‘पोंगल’ कहा जाता है। यहां ये चावल, मूंगदाल और दूध के साथ गुड़ डाल कर पकाया जाता है। तमिलनाडु में पोंगल सूर्य, इन्द्र देव, नई फ़सल और पशुओं को समर्पित एक त्योहार होता है।
पौराणिक इतिहास की बात करें तो इसमें जिक्र आता है कि, सबसे पहले भगवान शिव ने खिचड़ी बनाई थी और भगवान विष्णु ने इसे खाया था और इस भोजन को स्वादिष्ट के साथ ही सुपाच्य बताया था। लेकिन अगर इतिहास की बात करें तो आयुर्वेद के बाद खिचड़ी का जिक्र अच्छे तौर पर यूनान के शासक सिकंदर के सेनापति सेल्यूकस ने भी किया है। वहीं इब्नबतूता ने भी अपने यात्रा संस्मरणों में खिचड़ी का जिक्र किया है जिसमें उसने उस समय भारत में खिचड़ी को एक लोकप्रिय खाना बताया है। बतूता को मूंग की दाल वाली खिचड़ी खाने को मिली थी, जिसे उन्होंने स्वादिष्ट बताया था। वहीं पंद्रहवीं शताब्दी में भारत आए रूसी यात्री अफानसीनि निकेतिन ने भी खिचड़ी का जिक्र किया है। वहीं ‘आइने—ए—अकबरी’ में भी अबुल फजल ने खिचड़ी का जिक्र किया है और उसने सात तरह से खिचड़ी बनाने के तरीके भी बताएं हैं।
कहा जाता है कि, अकबर के बेटे जहांगीर को खिचड़ी बहुत पसंद थी। उसी समय से शाहजहांनी खिचड़ी का भी चलन चलता आ रहा है। उसने इसे लाजवाब कहा था। उसके मुगल दस्तरख्वान में खिचड़ी को अहम स्थान हासिल था। हालांकि उसकी खिचड़ी में सूखे फल, सूखे मेवे, केसर, तेजपत्ता, जावित्री लौंग का भी इस्तेमाल होता था। इस दौर में यह व्यंजन मांसाहारी हो गया जिसे हलीम नाम दे दिया गया।
नाथ परंपरा से जुड़ा है खिचड़ी का इतिहास
खिचड़ी को लेकर मकरसक्रांति का पर्व भी मनाया जाता है। इस पर्व का सबसे ज्यादा महत्व नाथ संप्रदाय के बीच देखने को मिलता है। कहा जाता है कि खिचड़ी को सबसे ज्यादा लोकप्रिय नाथों ने ही बनाया है। लोकमान्यता के मुताबिक खिलजी ने जब भारत पर आक्रमण किया था उस समय नाथ योगियों ने उसका डटकर मुकाबला किया। इस दौरान उन्हें भोजन पकाने का समय नहीं मिलता था और भूखे रहना पड़ता था। नतीजतन, नाथ संप्रदाय के बाबा गोरखनाथ ने दाल, चावल और सब्जी को एक साथ पकाने का यह नुस्खा निकाला। इसीलिए इस संप्रदाय के मठों और मंदिरों पर खिचड़ी का पर्व बहुत उल्लास से मनाया जाता है।
खिचड़ी चावल और विभिन्न प्रकार की दाल से बनने वाला भोजन होता है। कई जगहों पर बाजरा और मूंगदाल के साथ भी इसे पकाया जाता है। खिचड़ी कई मायनों में खास है। यह वह डिश है जिसे हर बच्चे को आसानी से यानी बिना किसी दिक्कत के खिलाया जा सकता है और इसी वजह से इसे फर्स्ट सॉलिड बेबी फूड भी कहा जाता है। व्रत के दौरान साबूदाने से बनाई गयी खिचड़ी भी खाई जाती है।
फायदे
खिचड़ी एक आयुर्वेदिक आहार है। इसे नियमित खाने से वात्त, पित्त और कफ की समस्या नहीं होती। वहीं ये शरीर को डिटॉक्स करने के साथ-साथ एनर्जी लेवल बढ़ाने और इम्युनिटी को सुधारने में भी मदद करता है। ये जितनी स्वादिष्ट होती है उतनी ही पोषण से भरपूर भी। यह शरीर को पोषक उर्जा और पोषण देने का काम करती है। खिचड़ी में आमतौर पर ज्यादा मसालों का प्रयोग नहीं किया जाता, यही कारण है कि, खिचड़ी हमेशा से एक सेहत के लिए उत्तम आहार मानी जाती रही है। आयुर्वेद बताता है कि यह फूड हमारी आंत और पेट के लिए बहुत फायदेमंद चीज है। गर्भावस्था के दौरान अक्सर महिलाओं को कब्ज या अपच की दिक्कत होती है। वहीं बाहर का खाना ज्यादा खाने से भी लोगों के पेट में यह समस्या हो जाती है। लेकिन इस सब का इलाज खिचड़ी है। खिचड़ी मूड सही करने के लिए भी सबसे सही भोजन माना जाता है।
उत्तराखंड की पहाड़ी खिचड़ी ज्यादातर सादी होती है। यह खिचड़ी प्रसाद के रूप में जानी जाती है. यहां के ब्रदीनाथ मंदिर समेत कई जगह प्रसाद के रूप में खिचड़ी दी जाती है। इसे सीधे पानी में उबाल कर बनाया जाता है और प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।
वही हिमाचल प्रदेश में दाल चावल के साथ कुछ राजमा और सफ़ेद छोले डालकर खिचड़ी बनायीं जाती है. इसका स्वाद राजमा और सफ़ेद छोले, के साथ कुछ स्थानीय मसाले के मिश्रण के साथ अलग ही लगता है।

उत्तर प्रदेश के व्यंजनों में आवला का प्रयोग किया जाता है तो यहाँ की खिचड़ी में काली दाल, चावल के साथ आवला का प्रयोग कर विशेष खिचड़ी बनायीं जाती है और ये मकर संक्रांति के त्यौहार पर दान में भी दी जाती है।
राजस्थान राज्य अपने शाही खाने के लिए काफी जाना जाता है, तो ऐसा कैसे हो सकता है की आपको राजस्थान में खिचड़ी का स्वाद न मिले. यही की खिचड़ी दाल, गेहू और बाजरा की बनती है और इसकी विशेषता ये है इससे बहुत अच्छे से पकाया जाता है और ये काफी गरम तासीर की होती है और ये सर्दियों में राजस्थानी सब घरो में मिलती है।
अब आते है गुजरात की खिचड़ी पर, इसमें खासतौर से हल्दी और हींग का प्रयोग किया जाता है। गुजरात की खिचड़ी आमतौर पर पतली बनायीं जाती है और ज्यादातर कढ़ी और सुराती उंधनिया आदि के साथ परोसी जाती है।
महाराष्ट्र में साबूदाने की खिचड़ी प्रसिद्ध हैं। मुंबई महानगरी में खिचड़ी बहुत ही मसालेदार बनती है और लोग उससे काफी उत्साह से कहते है और इससे भी लजीज खाने में गिनते है. यहां के लोग तीखी खिचड़ी खाते हैं। यही साबूदाने की खिचड़ी उत्तर भारत में ज्यादातर व्रत के दौरान भी बनाई और खायी जाती है।
तमिलनाडु में मीठी खिचड़ी बनाई जाती है और इससे पोंगल कहा जाता है। इस खिचड़ी का बहुत महत्व है, और इसकी खासियत है कि इसे नमकीन भी बनाया जा सकता है। मीठी खिचड़ी यहां के मंदिरों में प्रसाद के रूप में बांटी जाती है।
आंध्र प्रदेश में कीमा खिचड़ी खाई जाती हैं। जिसमें ग्राउंड बीफ, चावल, दाल, सॉस के साथ इमली और तिल का मिश्रण होता है। और कई जगह लोग इसमें दाल का प्रयोग नहीं करते हैं।
कर्ऩाटक में खिचड़ी सब्जियों से भरपूर होती है। यहां की खिचड़ी में इमली, गुड़, मौसमी सब्जियां, कढ़ी पत्ता, सूखे नारियल का बुरादा और सेमल की रुई का इस्तेमाल किया जाता है। और ये काफी मज़ेदार होती है।
बंगाल में खिचड़ी का विशेष स्थान रूप है. और ये दुर्गा पूजा में भोग के रूप में प्रसाद में दी जाती है, जो तैयार होती है दाल, चावल और विभिन्न सब्जियों से. यहां की खिचड़ी मीठी होती हैं। बिहार की खिचड़ी सब्जियों और मसालों से भरपूर होती है। आमतौर पर शनिवार को इसे बनाया जाता है।
(स्त्रोत साभार – आउटलुक हिन्दी, द इंडियननेस डॉट कॉम, रिलीजन वर्ल्ड डॉट इन, द्वारका एक्सप्रेस)

जानिए अपने जरूरी कानूनी अधिकार

अधिकार प्राप्त करने के लिए सबसे पहले उनकी जानकारी जरूरी है। अधिकतर महिलाएं अपने अधिकार जानती ही नहीं और इसी कारण से वे ज्यादती सहती हैं। उत्पीड़न का बड़ा कारण अधिकारों की जानकारी न होना है तो कुछ अधिकारों की जानकारी हम आपको दे रहे हैं  –

प्रसूति सुविधा अधिनियम 1961 के तहत वे मेटरनिटी लीव ले सकती हैं, महिला गवाह को पूछताछ के लिए पुलिस स्टेशन आने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। महिलाओं को अपने अधिकारों की जानकारी न होने से वे शिकायत नहीं कर पाती हैं। अगर उन्हें जानकारी हो तो वे हर परिस्थिति का सामना कर सकती हैं। इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट रूल-5, शेड्यूल-5 के तहत शारीरिक संबंध बनाने के प्रस्ताव को न मानने के कारण कर्मचारी को काम से निकालने व लाभों से वंचित करने पर कार्रवाई का प्रावधान है। समान काम के लिए महिलाओं को पुरुषों के बराबर वेतन पाने का अधिकार है।

धारा 66 के मुताबिक महिलाओं को सुबह 6 बजे से शाम 7 बजे के बाद काम करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। भले ही उन्हें ओवरटाइम दिया जाए। यदि वह शाम 7 बजे के बाद ऑफिस में न रुकना चाहे तो उसे रुकने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। ऑफिस में होने वाले उत्पीड़न के खिलाफ महिला कार्यस्थल प्रताड़ना के लिए सेक्सुअल हैरेसमेंट एक्ट 2013 के तहत प्रकरण दर्ज करा सकती हैं। प्रसूति सुविधा अधिनियम 1961 के तहत महिला मेटरनिटी लीव ले सकती हैं।

पुलिस थाने से जुड़े अधिकार

महिला द्वारा की जाने वाली शिकायत गंभीर प्रकृति की है, तो पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है। पुलिस को एफआईआर की कॉपी देना जरूरी है। सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के बाद किसी भी तरह की पूछताछ के लिए किसी भी महिला को पुलिस स्टेशन में नहीं रोका जा सकता। पुलिस स्टेशन में किसी भी महिला से पूछताछ करने या उसकी तलाशी के दौरान महिला आरक्षक का होना जरुरी है। महिला अपराधी की मेडिकल जांच महिला डॉक्टर करेगी या महिला डॉक्टर की उपस्थिति में कोई पुरुष डॉक्टर भी जांच कर सकता है। किसी भी महिला गवाह को पूछताछ के लिए पुलिस स्टेशन आने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। जरुरत पड़ने पर उससे पूछताछ के लिए पुलिस को ही उसके घर जाना होगा।

तो यहाँ करें शिकायत

यदि महिलाओं की पुलिस एफआईआर नहीं करती तो वह इसकी शिकायत एसपी के पास सीआरपीसी धारा 154 के सेक्शन 3 के तहत कर सकती है। इसके अलावा वह कोर्ट में सीआरपीसी धारा 200 के तहत परिवाद दायर कर सकती है। हाईकोर्ट में धारा 482 के तहत परिवाद दायर कर सकती है। साथ ही महिलाओं को निशुल्क कानूनी सहायता पाने के लिए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण में शिकायत कर सकती हैं। साथ ही महिलाएं राज्य महिला आयोग, मानवाधिकार आयोग में भी प्रकरण रजिस्टर करा सकती हैं।

बच्चों से संबंधित अधिकार

बच्चों से संबंधित अधिकार हिन्दू मैरेज एक्ट 1955 के सेक्शन 26 के मुताबिक पत्नी अपने बच्चे की सुरक्षा, भरण-पोषण और शिक्षा के लिए आवेदन कर सकती है। हिन्दू एडॉप्शन एंड सेक्शन एक्ट के तहत कोई भी वयस्क विवाहित या अविवाहित महिला बच्चे को गोद ले सकती है। दाखिले के लिए स्कूल के फॉर्म में पिता का नाम लिखना अब अनिवार्य नहीं है। बच्चे की मां या पिता में से किसी भी एक अभिभावक का नाम लिखना ही पर्याप्त है।

पिता की संपत्ति का अधिकार

भारत का कानून किसी महिला को अपने पिता की पुश्तैनी संपति में पूरा अधिकार देता है। अगर पिता ने खुद बनाई हुई संपति की कोई वसीयत नहीं की है, तब उनकी मृत्यु के बाद संपत्ति में लड़की को भी उसके भाईयों और मां जितना ही हिस्सा मिलेगा। यहंा तक कि शादी के बाद भी यह अधिकार बरकरार रहेगा।  जमीन जायदाद से जुड़े अधिकार विवाहित या अविवाहित, महिलाओं को अपने पिता की सम्पत्ति में बराबर का हिस्सा पाने का हक है। इसके अलावा विधवा बहू अपने ससुर से गुजरा भत्ता व संपत्ति में हिस्सा पाने की भी हकदार है।

हिन्दू मैरेज एक्ट

1955 के सेक्शन 26 के मुताबिक पत्नी अपने बच्चे की सुरक्षा, भरण-पोषण और शिक्षा के लिए आवेदन कर सकती है। हिन्दू एडॉप्शन एंड सेक्शन एक्ट के तहत कोई भी वयस्क विवाहित या अविवाहित महिला बच्चे को गोद ले सकती है। दाखिले के लिए स्कूल के फॉर्म में पिता का नाम लिखना अब अनिवार्य नहीं है। बच्चे की मां या पिता में से किसी भी एक अभिभावक का नाम लिखना ही पर्याप्त है। जमीन जायदाद से जुड़े अधिकार विवाहित या अविवाहित, महिलाओं को अपने पिता की सम्पत्ति में बराबर का हिस्सा पाने का हक है। इसके अलावा विधवा बहू अपने ससुर से गुजरा भत्ता व संपत्ति में हिस्सा पाने की भी हकदार है। हिन्दू मैरिज एक्ट 1954 के सेक्शन 27 के तहत पति और पत्नी दोनों की जितनी भी संपत्ति है, उसके बंटवारे की भी मांग पत्नी कर सकती है। पत्नी के अपने ‘स्त्री-धन’ पर भी उसका पूरा अधिकार रहता है। साथ ही कोपार्सेनरी राइट के तहत उन्हें अपने दादाजी या अपने पुरखों द्वारा अर्जित संपत्ति में से भी अपना हिस्सा पाने का पूरा अधिकार है। यह कानून सभी राज्यों में लागू हो चुका है।

अपनी संपत्ति से जुड़े निर्णय

कोई भी महिला अपने हिस्से में आई पैतृक संपत्ति और खुद अॢजत की गई संपत्ति का जो चाहे कर सकती है। अगर महिला उसे बेचना चाहे या उसे किसी और के नाम करना चाहे तो इसमें कोई और दखल नहीं दे सकता। महिला चाहे तो उस संपत्ति से अपने बच्चों को बेदखल भी कर सकती है।

घरेलू हिंसा से सुरक्षा

महिलाओं को अपने पिता या फिर पति के घर सुरक्षित रखने के लिए घरेलू हिंसा कानून है। आम तौर पर केवल पति के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले इस कानून के दायरे में महिला का कोई भी घरेलू संबंधी आ सकता है। घरेलू हिंसा का मतलब है महिला के साथ किसी भी तरह की हिंसा या प्रताडऩा। ये भी जान लीजिये कि केवल मारपीट ही नहीं फिर मानसिक या आॢथक प्रताडऩा भी घरेलू हिंसा के बराबर है। ताने मारना, गाली-गलौज करना या फिर किसी और तरह से महिला को भावनात्मक ठेस पहुंचाना अपराध है। किसी महिला को घर से निकाला जाना, उसका वेतन छीन लेना या फिर नौकरी से संबंधित दस्तावेज अपने कब्जे में ले लेना भी प्रताडऩा है, जिसके खिलाफ घरेलू हिंसा का मामला बनता है। बिना शादी साथ रहने यानी ‘लिव इन’ संबंधों में भी यह लागू होता है।

मुफ्त कानूनी मदद लेने का हक

अगर कोई महिला किसी केस में अभियुक्त है तो महिलाओं के लिए कानूनी मदद नि:शुल्क है। वह अदालत से सरकारी खर्चे पर वकील करने का अनुरोध कर सकती है। यह केवल गरीब ही नहीं बल्कि किसी भी आॢथक स्थिति की महिला के लिए है। पुलिस महिला की गिरफ्तारी के बाद कानूनी सहायता समिति से संपर्क करती है, जो कि महिला को मुफ्त कानूनी सलाह देने की व्यवस्था करती है।

(साभार – दैनिक भास्कर और न्यूज ट्रैक)

1 लाख 20 हजार में बिक गये तुलसी के 12 आम

जमशेदपुर : जमशेदपुर में एक व्यक्ति ने सड़क किनारे बिक रहे 12 आम के लिए एक लाख 20 हजार (1.20 लाख) रुपये कीमत चुकायी है। सड़क किनारे 1.20 लाख रुपये में आम बेचने वाली लड़की जमशेदपुर निवासी 12 वर्षीय तुलसी कुमारी है। उसके 12 आम के लिए 1.20 लाख रुपये चुकाए हैं मुम्बई की कंपनी वैल्युएबल एडुटेनमेंट प्राइवेट लिमिटेड ने। कंपनी ने तुलसी कुमारी से मात्र एक दर्जन आम 1.20 लाख रुपये में खरीदे हैं। ताकि सड़क किनारे आम बेचने वाली वो गरीब लड़की फिर अपनी पढ़ाई शुरू कर सके। कोरोना काल में ऑनलाइन पढ़ाई करने के लिए तुलसी को एक स्मार्ट मोबाइल फोन की आवश्यकता थी।
जमशेदपुर के स्ट्रैट माइल रोड के आउट हाउस में अपने माता-पिता के साथ रहने वाली और 5वीं कक्षा की छात्रा तुलसी विगत दिनों कीनन स्टेडियम के पास लॉकडाउन के दौरान आम बेच रही थी। तुलसी ने बताया कि वह 5000 रुपये कमाना चाहती थी, ताकि वह एक मोबाइल फोन खरीद सके और अपनी ऑनलाइन पढ़ाई फिर से शुरू कर सके। स्मार्ट फोन के अभाव में वह अपनी ऑनलाइन पढ़ाई शुरू नहीं कर पा रही थी। कहानी सोशल मीडिया पर वायरल हो गयी। तुलसी के प्रति लाखों लोग सहानुभूति व्यक्त करने लगे।

सोशल मीडिया से मिली जानकारी
मुम्बई स्थित वैल्यूएबल एडुटेनमेंट प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक अमेया हेटे को सोशल मीडिया के जरिये इसकी जानकारी मिली तो वो सिर्फ सहानुभूति व्यक्त करने तक नहीं रुके। उन्होंने 10,000 रुपये प्रति आम के हिसाब से लड़की से 12 आम 1,20,000 रुपये में खरीद लिये। उन्होंने पूरी राशि तुलसी के पिता के बैंक खाते में स्थानांतरित कर दी। साथ ही उन्होंने तुलसी को पत्र लिखा “आपकी दृढ़ता और संघर्ष की कहानी को मीडिया द्वारा आगे लाया गया था और वर्षा जहांगीरदार द्वारा मेरे संज्ञान में लाया गया था। आप जैसे कई छात्र हैं जो आवश्यक बुनियादी ढांचे की कमी के कारण ऑनलाइन सीखने के नये युग का सामना करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। मैं वास्तव में इस तथ्य से प्रभावित हूं कि आपने हार नहीं मानी और इससे निपटने के लिए संघर्ष किया। आपने साबित कर दिया है कि ‘जहां चाह है, वहां राह है’। आपने ‘इच्छा’ दिखाई है, हम ‘रास्ता’ खोजने में आपकी मदद कर रहे हैं।”
शिक्षिका बन गरीब बच्चों को पढ़ाना चाहती है तुलसी
तुलसी बताती हैं कि लॉकडाउन के कारण उसके पिता की नौकरी छूटने के बाद परिवार आर्थिक संकट का सामना कर रहा था। तुलसी पढ़ना चाहती थी, लेकिन मोबाइल फोन न खरीद पाने की वजह से पढ़ाई नहीं कर पा रही थी। तुलसी ने बताया कि अब वह स्वयं पढाई करेगी और साथ में दो बहनें रोशनी तथा दीपिका को भी पढ़ाएगी। उसका सपना है कि तीनों बहनें शिक्षिकाएं बनकर गरीब बच्चों के बीच शिक्षा का प्रसार करेंगी, जिससे कोई भी गरीब शिक्षा से वंचित न रह सके।