कोलकाता : राष्ट्रीय कवि संगम द्वारा एक अद्भुत विराट श्री राम काव्यपाठ प्रतियोगिता का आयोजन किया जा रहा है। यह विराट प्रतियोगिता तीन स्तरों पर होगी– जिला स्तर पर, प्रांत स्तर पर, राष्ट्रीय स्तर पर । इस प्रतियोगिता में प्रतिभागी भारत की किसी भी भाषा में काव्यपाठ कर सकता है। आयु का कोई बंधन नहीं । बंधन है तो सिर्फ समय का जो कि न्यूनतम 2:30 से अधिकतम 4:00 मिनट तक होगा। श्री राम की महिमा, उदारता,शक्ति और शील-सौंदर्य का वर्णन काव्यपाठ का विषय है। (ऐसी कोई भी कविता जिसमें श्री राम की महिमा की झलक न हो उसे प्रतियोगिता के योग्य नहीं माना जाएगा।) यह प्रतियोगिता राष्ट्रीय स्तर पर देश भर के सभी राज्यों में संपन्न होगी। इस विराट प्रतियोगिता को आयोजित करने के लिए गत सोमवार 12 जुलाई 2021 को पश्चिम बंगाल कार्यकारिणी की एक महत्वपूर्ण बैठक प्रांतीय अध्यक्ष डॉ. गिरिधर राय की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई। बैठक में राष्ट्रीय सह- महामंत्री महेश कुमार शर्मा और प्रान्तीय प्रभारी व राष्ट्रीय मंत्री दिनेश देवघरिया भी उपस्थित थे। बैठक का संचालन प्रान्तीय महामंत्री राम पुकार सिंह ने किया। प्रतियोगिता के प्रान्तीय संयोजक देवेश मिश्रा ने विस्तृत रूप से उक्त प्रतियोगिता से संबधित नियमावली को स्पष्ट ढ़ंग से पटल पर उपस्थित लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया। डॉ. गिरिधर राय ने सभी के प्रश्नों का समाधान दिया।
राजा नरेंद्रलाल खान वुमेन कॉलेज ‘प्रेमचंद का भारत’ पर वेबिनार
मिदनापुर : राजा नरेंद्रलाल खान वुमेन कॉलेज के हिंदी विभाग की ओर से ‘प्रेमचंद का भारत’ विषय पर वेबिनार आयोजित किया गया। अतिथियों का स्वागत करते हुए प्राचार्य डॉ जयश्री लाहा ने कहा कि हिंदी विभाग निरंतर प्रगति कर रहा है। प्रेमचंद का साहित्य हम सभी को जोड़ता है। विषय प्रवर्तन करते हुए विभागाध्यक्ष डॉ रेणु गुप्ता ने कहा कि प्रेमचंद ने स्वतंत्रता और समानता के भारत का सपना देखा था। बीएचयू के सहायक प्रोफेसर डॉ विवेक सिंह ने कहा कि प्रेमचंद भारतीयता के लेखक हैं। उन्होंने सामान्य भारतीयों के जीवन सत्य के साथ भारत के स्वराज के लिए संघर्ष की कथा को लिखा।प्रेमचंद ने भारतीय समाज में व्याप्त संस्थागत बुराइयों को बेपर्दा किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए भारतीय भाषा परिषद के निदेशक डॉ शंभुनाथ ने कहा कि प्रेमचंद का कथा साहित्य पूरे भारत की तस्वीर है। प्रेमचंद ने राष्ट्र मुक्ति के साथ आर्थिक स्वराज का स्वप्न देखा। उनका साहित्य त्रासदी और ह्रदय परिवर्तन का साहित्य है। इस अवसर पर हिंदी विभाग की छात्रा सीता महतो ने ‘साहित्य संबंधी प्रेमचंद के विचार’, अंजलि तमांग ने ‘सामाजिक यथार्थ के परिप्रेक्ष्य में दो बैलों की कथा’,अर्चना गुप्ता ने ‘पूस की रात कहानी में किसान जीवन का संघर्ष’और बिट्टू कौर ने ‘सुमन की चारित्रिक विशेषताएं’ विषय पर आलेख पाठ किया। इस संगोष्ठी में देश भर से शिक्षक,विद्यार्थी और साहित्य प्रेमी जुड़े थे। धन्यवाद ज्ञापन प्रो.सुमिता भकत ने दिया।
साहित्य का सशक्त हस्ताक्षर हैं उषा किरण खान

कथाकार उषा किरण खान – किरण और मिन्नी के नाम से भी परिचित हैं । वे अपना परिचय महादेवी वर्मा की इन पंक्तियों से करती हैं –
‘परिचय इतना इतिहास यही,
उमड़ी कल थी, बह आज चली’
इनका जन्म 7 जुलाई 1945 में लहेरिया सराय, पकड़िया गांँव, जिला दरभंगा के कोसी क्षेत्र बिहार राज्य में हुआ।
पिता का नाम जगदीश चौधरी, माता का नाम शकुंतला चौधरी
पांँच भाईयों – सुवेश, अखिलेश, विश्वेश, चंद्रेश और राकेश के बीच अकेली बहन
पति बालसखा रामचंद्र खान भारतीय पुलिस सेवा में 1968 से 2003 तक रहे।
चार बच्चों से भरपूरा परिवार, अनेक पौत्र – पौत्रियाँ। पौत्री लखिमा शंकर खान भी कला, शायरी और लोककला के प्रति संवेदनशील हैं।आद्या पंडित तीसरी पीढ़ी के बच्चों में सबसे छोटी ननिहाल की परंपरा की वाहक है। वैसे तो पूरा परिवार ही साहित्यिक संस्कारों से अनुप्राणित हैं।
उषा जी की प्रारंभिक शिक्षा एंगल गर्ल्स स्कूल, पटना में हुई, बाद में लेडी रदरफोर्ड, दरभंगा में हुई, जहाँ इनके लिए हॉस्टल बनाया गया।
हिंदी और मैथिली दोनों भाषाओं की लेखिका उषा जी बाबा नागार्जुन से प्रभावित रही हैं।
इनके पिता सर्वप्रथम लोकमान्य तिलक और बाद में महात्मा गाँधी के सहयोगी रहे। वर्षों तक जेल में भी रहे। हजारी प्रसाद द्विवेदी, रामधारी सिंह दिनकर, रामवृक्ष बेनीपुरी, गंगा शरण सिंह, नागार्जुन आदि साहित्यकारों का आरंभ से ही सानिध्य मिला। बाद में, नागार्जुन उनके अभिभावक रहे। यात्री काका (नागार्जुन) के साथ कविता भी पढ़ी, फिर कहानी और उपन्यास लेखन में आगे बढ़ती चली गईं। धर्मवीर भारती, कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव आदि ने इनकी कहानियों का खूब स्वागत और प्रकाशित किया। ये कथाकार के रूप में प्रतिष्ठित हुईं। भाषा सौन्दर्य और लेखन शैली पर नागार्जुन का प्रभाव पड़ने का प्रमुख कारण यही रहा कि उषा किरण खान ने नागार्जुन को पिता की तरह माना और उनके साहित्यिक संस्कारों से प्रभावित रहीं जो उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है।
इनकी मॉं का पुनर्विवाह हुआ था जिसके कारण उन्हें सामाजिक तिरस्कार का दंश भी भोगना पड़ा।उषा किरण की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इन्होंने अपनी भाषा और क्षेत्र को कभी नहीं छोड़ा।
उषा किरण अवकाश प्राप्त इतिहास शिक्षाविद् रही हैं। अतः सामाजिक, ऐतिहासिक,पुरातत्व शोध से आपका गहरा संबंध रहा है। मिथिलांचल की आदिवासी धरती से जुड़ी दलित और आदिवासी महिलाओं पर उन्होंने विशेष रूप से लिखा है। सीता की धरती मिथिलांचल से जुड़ी होने के कारण आपने मैथिली लोककथाओं में रच – बस कर मैथिली के साथ – साथ हिंदी साहित्य को भी समृद्ध किया है।
16 उपन्यास, 150 हिंदी, मैथिली में कहानी, 2 मैथिली नाटक, 2 हिंदी नाटक लिखे ।
गाँव और महानगर समाज की स्त्रियों को अपने साहित्य में बराबर स्थान दिया। बेमेल विवाह आदि बहुत सी सामाजिक बुराइयों को भी दूर करने में अपना योगदान दिया। ‘एक है जानकी’ जैसी कहानियों ने स्त्री संसार को नए दृष्टि कोण से देखने का नजरिया दिया।
उपन्यास – गई झूलनी टूट, पानी पर लकीर, फागुन के बाद, सीमांत कथा, रतनारे नयन (हिंदी), अनुत्तरित प्रश्न, हसीना मंजिल(12 भाषाओं में अनुदित) , भामती, सिरजनहार (मैथिली), अगन हिंडोला (ऐतिहासिक) आदि।
कहानी संग्रह – गीली पॉक, कासवन, दूब धान, विवश विक्रमादित्य, जन्म अवधि, घर से घर तक (हिंदी), कांचहि बांस (मैथिली) आदि।
नाटक – कहाँ गए मेरे उगना, हीरा डोम (हिंदी), फागुन, एक सारि ठाढ़, मुसकौल बला (मैथिली) कौस्तुभ स्तंभ, जवाहर लाल
बाल नाटक – डैडी बदल गए हैं, नानी की कहानी, सात भाई और चंपा, चिड़िया चुग गई खेत (हिंदी), घंटी से बान्हल राजू, बिरड़ो आबिगेल (मैथिली)
बाल उपन्यास – लड़ाकू जनमेजय।
स्त्री मन की कहानियाँ-डॉ कुमार वरुण(संपादक), उषा किरण खान का कथा लोक – सोनी पांडेय( संपादक) शोधपरक ग्रंथ हैं।
2015 में साहित्य और शिक्षा के लिए पद्मश्री से सम्मानित उषा किरण खान को कई महत्वपूर्ण पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुए।
2019 में भारत भारती पुरस्कार,
2011 में साहित्य अकादमी अवार्ड उपन्यास भामती:एक अविस्मरणीय प्रेम कथा (मैथिली)के लिए।
हिंदी सेवी सम्मान (राजभाषा विभाग बिहार सरकार), महादेवी वर्मा सम्मान (बिहार राजभाषा विभाग), दिनकर राष्ट्रीय पुरस्कार,बृजकिशोर मिश्र सम्मान।
कुसुमांजली साहित्य उपन्यास ‘सिरजनहार’ पर इंडियन कौन्सिल फॉर कल्चरल रिलेशन्स द्वारा ढाई लाख रुपये का पुरस्कार, विद्यानिवास मिश्र पुरस्कार,
2020 में प्रबोध साहित्य सम्मान – (आजीवन योगदान के लिए)
साहित्य से जुड़ने के साथ साथ उषा किरण खान सामाजिक क्रियाकलापों में भी बेहद सक्रिय रहीं। पटना की महिला चर्खा समिति की अध्यक्षा हैं। इनका मानना है कि साहित्य में विचारधारा हावी हो, यह सही नहीं है क्योंकि लेखक को समदर्शी होना चाहिए।
इन्होंने’आयाम’ नामक संस्था की स्थापना की जो साहित्य का स्त्री स्वर है जिसका उद्देश्य ही है समाज की स्त्रियों के स्वर को प्रोत्साहित करना, घरों में बैठी संकोच में डूबी कवि लेखक स्त्रियों की पहचान कराना और स्त्री लेखन का सूचीकरण इत्यादि कार्यों को आगे बढ़ाना।इनके साहित्य में चूड़ीहारिन से लेकर महानगर की स्त्रियों को पढ़ा जा सकता है।
‘गई झुलनी टूट’ उपन्यास जल्द ही ‘पॉडकास्ट’ पर भी आने वाला है जिसकी प्रस्तुति ‘आयाम’ की युवा लेखिकाओं /कवयित्रियों द्वारा किया गया है।
एक मजेदार किस्सा – –
उनकी सास गंगा देवी जिनका पुकार नाम बुच्ची दाई था, इनका बहुत ही अंतरंग रिश्ता था। वे उन्हें चाची कहतीं जिनका साथ 1995 तक ही रहा। उनका बनाया सुस्वाद मैथिली भोजन आज भी उनको स्मरण हो आता है। उषा किरण जी के ही शब्दों में – –
‘सौम्य शिष्ट और परम सुंदरी गंगा देवी 14 की थीं, जब दबंग सास की बहू हुईं। खाना बनाना ससुराल में ही सीखा होगा। वह बड़ी आनंदी स्वभाव की थीं। गीत का संचयन बहुत था। लेकिन यदि दोपहर और शाम में प्राती गाने की धुन पूछियेगा तो वो नहीं बतातीं बल्कि एक कहावत सुनातीं – –
साँझ पराती, भोर बसंत
तखनहिं बूझू गीतक अंत
हास्य कथाओं की भंडार थीं, अभिनय करके कथा सुनातीं। सौन्दर्य, अभिनय कला और पाक कला उनकी सात पौत्रियों में उनसे ही आया है, पर गंगा देवी एक बड़े पंडित की बेटी तथा बड़े पंडित की पत्नी होती हुई निरक्षर थीं। मैंने जिन गांँव की कहानियों का जिक्र किया है सब उनसे ही सुना जिसे मैं हिंदी में अनुदित कर पटल पर रखूंँगी। अति परिश्रमी घोर दुःख सहकर भी आनंदी स्वभाव वाली गंगा देवी मेरी सास, मेरी सदा सहेली रहीं। ‘
सास बहू का रिश्ता सिर्फ रिश्ता ही नहीं है बल्कि उषा जी ने इसे पूरे घर, समाज, देश और राष्ट्र के परिप्रेक्ष्य में क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर से जोड़ा है।
चालीस साल पहले की लिखी कहानी ‘अड़हुल की वापसी’ का एक छोटा- सा अंश—
यह ठेठ कोसी क्षेत्र के गाँव की कहानी है। अड़हुल और ओवरसीयर साहब की कहानी, एकतरफ़ा उद्दाम प्रेम और नदी के वेग सा टीस उठता मन में। दशकों बाद फिर वह बेला आती है जब फिर दोनों आमने-सामने होते हैं। देखें क्या होता है – –
अड़हुल – –
घर पहुंँचते पहुंँचते मेरे अंदर सालों पहले की अड़हुल जाग कर बैठ गई। मेरा रोयांँ इस उमर में भी खड़ा होने लगा। कलेजा धक – धक करने लगा। यह क्या हो रहा है। साहेब के बगल में बैठी तीन घंटे से मैं नया जनम नहीं पुनरजनम लेने गई हाय राम!
जब उन्होंने कहा कि वे लौट जाना चाहते हैं तो राहत की सांस ली लेकिन ये बच्चे भी न, अंकल – अंकल कहकर उन्हें रोक दिया। आगत स्वागत किया है सो ठीक पर मेरा मन चंचल हो रहा था। मेरा भोला भाला बेटा उनसे यहाँ रहने की, केंद्र खोलने की सिफारिश कर रहा है। मैं तो पागल हो जाऊंँगी।
साहब की मंशा क्या है नहीं मालूम। वे भी केंद्र खोलने की बात पर हामी भर रहे हैं। उनके लोग बहुत दिन से आवाजाही करते रहे हैं। अब ये रहकर इलाके का हेतु देखेंगे। अपने मन में सोच रही हूँ कि अगर ये रहने को तैयार होंगे या जादे आवाजाही करेंगे तो हम पुरैनिया दूसरे बेटे के पास चले जाएंँगे। काहे तो मन घबड़ा रहा है।
साहेब गाड़ी पर बैठ गया, भर नजर हमारी ओर देखा, हाथ उठाकर बोला – “अच्छा अड़हुल हम जाते हैं, तुम्हारा गाँव घर बच्चे सब याद रहेंगे। जल्दी ही लोग आएंँगे केंद्र खोलने। मुझे बच्चों के पास विदेस जाना है।”
अपने आदत के अनुसार हमने आँचल से मुंँह ढक लिया – जानते हैं क्यों, इस हमारे गांँव में बाल बुतरू के सामने नाम धरके पुकारे इसीलिए, यह मेरा नैहर थोड़े न है। लेकिन जी हल्का हो गया। गाड़ी नजर से दूर चली गई।
यह कहानी उस अड़हुल और ओवरसियर साहेब की है जिनकी आशनाई चालीस साल पहले कोशी के बीच पनपी थी और दफन हो गई थी। समय कैसे कैसे किसे उखाड़ लाता है देखिए गुनिए।
उषा किरण खान के साहित्य संसार को मैंने छोटी सी खिड़की से केवल झाँका भर ही है, पूरे दरवाजे के पार जाना संभवतः स्त्री के पूरे तंत्रों – मंत्रों को समझना है जो प्याज की परतों की तरह उतराते- गहराते हैं, जहांँ खट्टे – मीठे – तीखे – कड़वे – कसैले विभिन्न स्त्री संवेदनाओं और भावों के विभिन्न रंगों और भावों का एकीकरण मिलता है। जहाँ संस्कार है, संस्कृति की धरोहर है और स्त्री सशक्तीकरण है, अपने अधिकारों के प्रति सजग स्त्री मन है।
वरिष्ठ कथाकार के कहानी संसार का वैविध्य विस्मित करता है। उनकी कहानियाँ स्त्री जीवन के विविध रूपों का दस्तावेज़ है।लेखन में गतिशीलता जारी है।
सम्बलपुरी साड़ी : धागों में लिपटी ओडिशा की श्रद्धा और हस्तशिल्प की जादूगरी
संबलपुरी साड़ी एक पारंपरिक हाथ से बुनी हुई साड़ी होती है जिसमें ताना और बाना बुनाई के साथ ‘टाई-डाई’ होते हैं। इसका उत्पादन ओडिशा के बरगढ़, सोनेपुर, संबलपुर, बलांगीर और बौध जिले में किया जाता है। संबलपुरी साड़ियों को शंख, चक्र, फूल जैसे पारंपरिक रूपांकनों के शामिल किए जाने के लिए जाना जाता है, जिनमें से सभी का गहरा प्रतीकवाद है। कभी-कभी जानवरों के रूपांकनों का उपयोग सी
माओं और पल्लू को सजाने के लिए भी किया जाता है।
इन साड़ियों का उच्च बिंदु “बांधकला” का पारंपरिक शिल्प कौशल है। इस तकनीक में, थ्रेड्स को पहले टाई-डाई किया जाता है और बाद में एक कपड़े में बुना जाता है, जिसमें पूरी प्रक्रिया में कई सप्ताह लगते हैं। संबलपुरी साड़ी एक हथकरघा पर बुने हुए कपड़े से बनाई जाती है और पूरे भारत में लोकप्रिय है।
संबलपुरी साड़ी की किस्मों में सोनपुरी, पसापाली, बोमकाई, बारपाली और बाप्पा साड़ियां शामिल हैं, जो उच्च मांग में हैं। संबलपुरी साड़ी का कपड़ा और डिज़ाइन, शिल्प की एक मूल शैली को दर्शाता है, जिसे बांधा के नाम से जाना जाता है। परंपरागत रूप से, शिल्पकारों ने वनस्पतियों और जीवों की छवियों के साथ या ज्यामितीय पैटर्न के साथ बांधाओं का निर्माण किया है। बाँधा कपड़े को टाई-डाई तकनीक का उपयोग करके बनाया गया है। रंजक के अवशोषण को रोकने के लिए यार्न को वांछित पैटर्न के अनुसार बांधा जाता है, और फिर रंगे जाते हैं। उत्पादित यार्न के यार्न या सेट को ‘बाधा’ कहा जाता है।
डिजाइनिंग के इस रूप की अनूठी विशेषता यह है कि डिजाइन कपड़े के दोनों ओर लगभग समान रूप से परिलक्षित होते हैं। एक बार कपड़े को रंगे जाने के बाद इसे कभी भी दूसरे रंग में ब्लीच नहीं किया जा सकता है। कपड़े पतले और धीरे-धीरे खराब हो सकते हैं लेकिन रंग अभी भी फीका नहीं पड़ता है। कपड़े रेशम और कपास दोनों में होते हैं। यह बहुमुखी तकनीक एक शिल्पकार को एक विचार या संदेश को प्रेरित करने में सक्षम कपड़े में रंगीन डिजाइन, पैटर्न और छवियों को बुनने में सक्षम बनाती है।
संबलपुरी साड़ी के अग्रणी श्री राधेश्याम मेहर ने कारीगरों के कौशल और उत्पादों की गुणवत्ता में एक क्रांतिकारी सुधार लाया था। 1926 में, राधेश्याम ने 90 इंच चौड़ाई के वस्त्र बुनने के लिए पहला हथकरघा डिजाइन किया। बांधा कला में उनकी निपुणता और क्षेत्र में बुनाई समुदाय को प्रेरित करने की उनकी क्षमता, आवश्यक प्रशिक्षण और प्रोत्साहन प्रदान करके उनके कौशल में सुधार करने के लिए नए डिजाइनों के निर्माण में सक्षम हुए जिन्होंने अंतर्राष्ट्रीय ख्याति और मान्यता प्राप्त की। ये साड़ियां पहली बार राज्य के बाहर लोकप्रिय हुईं जब दिवंगत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें पहनना शुरू किया।
1980 और 1990 के दशक में वे पूरे भारत में लोकप्रिय हो गए। इस कला का अभ्यास करने वाले बुनकरों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए, ओडिशा के संबलपुर और बेरहामपुर में निर्मित हथकरघा रेशम साड़ियों को भारत सरकार की भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री में शामिल किया गया था। उद्योग संबलपुरी साड़ी संबलपुरी बस्तरालय हैंडलूम कोऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड राज्य और देश की सबसे बड़ी प्राथमिक हथकरघा सहकारी समिति है। ओडिशा साड़ी स्टोर की शुरुआत वर्ष 2013 में हथकरघा संबलपुरी, इकत, खंडुआ, कोटपाड, सिमोनी साड़ियों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से हुई थी क्योंकि यह कला बहुत तेजी से मर रही है। साड़ी के अलावा संबलपुरी पर्दे, बेडशीट, दीवान सेट, सोफा कवर, तौलिया, ड्रेस सामग्री, संबलपुरी सलवार कमीज, कुर्ती और ढिला मिल सकता है।
(स्त्रोत साभार – जीके टुडे हिन्दी तथा दसबसडॉट कॉम)
शुभजिता स्वदेशी – महिला सशक्तीकरण का प्रतीक मजेदार, लज्जतदार लिज्जत पापड़
चाय कॉफी के संग भाए, कर्रम कुर्रम – कुर्रम कर्रम
मेहमानों को खुश कर जाए, कर्रम कुर्रम – कुर्रम कर्रम
मजेदार, लज्जतदार, स्वाद स्वाद में लिज्जत – लिज्जत पापड़!
90 के दशक से ये जिंगल लोगों की जुबान पर चढ़ा हुआ है। उसी जुबान पर चढ़ा है लिज्जत पापड़ का स्वाद भी। लिज्जत पापड़ की शुरुआत 7 गुजराती महिलाओं ने 80 रुपये कर्ज लेकर की थी। आज महिलाओं की संख्या 7 से बढ़कर 45 हजार हो गई है और 80 रुपए का कर्ज अब 1600 करोड़ रुपये के टर्नओवर में बदल चुका है।
7 गुजराती महिलाएं और ‘लोहाना निवास’ की छत : बात है 1959 के गर्मियों की। मुंबई के गिरगांव इलाके में लोहाना निवास नाम की एक इमारत थी। उसकी छत पर 7 गुजराती महिलाएं बैठक के लिए इकट्टा हुईं। एजेंडा था कि कैसे अपने खाली समय का उपयोग करके घर की आर्थिक स्थिति को सुधारने में मदद की जाए। तय हुआ कि वो मिलकर पापड़ बनाएंगी और बाजार में बेचेंगी। 80 रुपए कर्ज लेकर पापड़ का सामान लाया गया। सभी महिलाओं ने मिलकर पहले दिन 4 पैकेट पापड़ बनाए। पापड़ बेचने में पुरुषोत्तम दामोदर दत्तानी ने उनकी मदद की। उन्होंने चारो पैकेट गिरगांव के आनंदजी प्रेमजी स्टोर में बेच दिए।
पहले दिन 1 किलो पापड़ बेचकर 50 पैसे कमाई हुई। अगले दिन 1 रुपए। धीरे-धीरे और महिलाओं ने जुड़ना शुरू किया। अगले 3-4 महीने में ही 200 से ज्यादा महिलाएं जुड़ गईं। जल्द ही वडाला में भी एक ब्रांच खोलनी पड़ी। साल 1959 में 6 हजार रुपए की बिक्री हुई थी, जो उस वक्त के हिसाब से काफी बड़ी रकम थी।
कारोबार बढ़ने लगा तो बनाई को-ऑपरेटिव सोसायटी : इन सात महिलाओं को समाजसेवी छगन बप्पा का साथ मिला। उन्होंने कुछ आर्थिक मदद की जिसका इस्तेमाल महिलाओं ने मार्केटिंग टीम, प्रचार या लेबर बढ़ाने में नहीं, बल्कि पापड़ की गुणवत्ता सुधारने में किया। मुनाफा देख और महिलाओं ने जुड़ने की इच्छा जताई तो इसके संस्थापकों ने एक को-ऑपरेटिव सोसाइटी रजिस्टर कराने का फैसला लिया। इसमें शुरुआत से ही कोई एक मालिक नहीं बनाया गया बल्कि महिलाओं का समूह ही इसे चलाता है। सात महिलाओं के साथ शुरू हुए इस वेंचर में आज करीब 45 हजार से ज्यादा महिलाएं काम करती हैं।

दशकों से लिज्जत पापड़ के स्वाद और गुणवत्ता का राज : लिज्जत पापड़ के देश भर में करीब 60 सेंटर हैं, लेकिन हर जगह के पापड़ का स्वाद एक जैसा रहता है। इसके पीछे एक राज है। दरअसल, पापड़ के लिए उड़द की दाल म्यांमार से, हींग अफगानिस्तान से और काली मिर्च केरल से ही मंगवाई जाती है। इन कच्चे माल को तैयार करने का तरीका भी एक जैसा है। दाल, मसाले और नमक से आटा तैयार कर लिया जाता है। इसे ही अलग-अलग सेंटर से महिलाएं उठाती हैं और पापड़ बनाकर सेंटर में वापस जमा कर देती हैं। गुणवत्ता एक जैसी रहे, इसके लिए स्टाफ के सदस्य अचानक दौरे भी करते रहते हैं। मुंबई की एक प्रयोगशाला में स्वाद परीक्षण भी होता है।
महिला सशक्तिकरण का नायाब उदाहरण है लिज्जत पापड़ : संस्था में ‘बहन’ कहकर संबोधित की जाने वाली महिलाएं सुबह 4.30 बजे से अपना काम शुरू कर देती हैं। एक समूह द्वारा शाखा में आटा गूंथा जाता है और दूसरे समूह द्वारा इसे एकत्रित कर, घर में पापड़ बेला जाता है। इस दौरान आवाजाही के लिए एक मिनी-बस की मदद ली जाती है। इस पूरी संचालन प्रक्रिया की निगरानी, मुंबई की एक 21 सदस्यीय केंद्रीय प्रबंध समिति करती है।
लिज्जत की प्रेसिडेंट स्वाती रवींद्र पराड़कर महज 10 साल की थीं, जब उनके पिता का देहांत हो गया। परिवार आर्थिक संकट में था। उनकी मां पापड़ बनाती थीं और स्वाती रोज स्कूल जाने से पहले छुट्टियों में उनकी मदद करतीं। बाद में उन्होंने लिज्जत को-ऑपरेटिव ज्वॉइन कर लिया और इसकी प्रेसिडेंट भी बन गई। लिज्जत पापड़ पर आशुतोष गोवारिकर एक फिल्म बनाने जा रहे हैं जिसका नाम होगा कर्रम कुर्रम। खबरों के मुताबिक इसमें कियारा आडवाणी लीड रोल निभाएंगी। फिल्म का डायरेक्शन ग्लेन बैरेटो और अंकुश मोहला करेंगे।

लिज्जत पापड़ सिर्फ एक व्यवसाय के सफल होने की कहानी नहीं है बल्कि एक सामाजिक जिम्मेदारी की भी कहानी है। को-ऑपरेटिव में 15 साल से काम कर रहीं उषा जुवेकर का कहना है कि अगर देश में सभी लोग महिलाओं की इतनी फिक्र करते जितनी लिज्जत करता है, तो हमने तरक्की की नई इबारत लिख दी होती।
कहां से शुरू हुई यह संघर्ष की कहानी: मुम्बई की रहने वाली जसवंती जमनादास पोपट ने अपना परिवार चलाने के लिए 1959 में पापड़ बेलने का काम शुरू किया था। जसवंती बेन गरीब परिवार से ताल्लुक रखती थी और कम पढ़ी-लिखी भी थी लेकिन उनमें कारोबार की अच्छी समझ थी। उन्होंने इस काम में अपने साथ और छह गरीब बेरोजगार महिलाओं को जोड़ा और 80 रुपये का कर्ज लिया और पापड़ बेलने का काम शुरु किया। उनके साथ शामिल हुईं महिलाओं के नाम थे उजमबेन नरानदास कुण्डलिया, पार्वतीबेन रामदास ठोदानी, लागुबेन अमृतलाल गोकानी, बानुबेन तन्ना, जयाबेन विठलानी और उनके साथ एक और महिला थी, जिसे पापड़ों को बेचने की जिम्मेदारी ली थी। यह सभी महिलाएं गुजराती परिवार से थीं, तो जाहिर सी बात है कि उन्हें पापड़-खाखरा बनाने में महारत हासिल थीं। इन महिलाओं द्वारा 15 मार्च 1959 को लिज्जत का पहला पापड़ बेला गया था। पापड़ बेलने की शुरूआत किसी बड़े उद्योग या फिर पैसे कमाने के उद्देश्य से नहीं हुई थी।
कैसा है लिज्जत पापड़ का उद्योग: ये कंपनी बाकी कंपनियों से थोड़ी अलग है, इस व्यापार में सभी महिला सदस्य हैं। यहां अध्यक्षता कार्यकारी समिति से सदस्य बारी-बारी से संभालते हैं और वो भी सबकी सहमति से चुने जाते हैं। यानी सबको मौका दिया जाता है जो इस उद्योग की सफलता में एक अहम किरदार निभाते हैं। हर शाखा का नेतृत्व एक संचालिका करती है। इन शाखाओं के संचालन के लिए 21 सदस्यों वाली एक केंद्रीय प्रबंधन समिति भी बनी है। जिसमें एक अध्यक्ष, दो उपाध्यक्ष, दो सचिव और दो कोषाध्यक्ष सहित छह निर्वाचित अधिकारी हैं। इनका चुनाव सर्वसम्मति से किया जाता है और जो हर साल बदलती रहती हैं। आज की तारीख में श्री महिला गृह उद्योग लिज्जत पापड़ अब पापड़ के अलावा डिटर्जेंट और ब्रेड बनाने का काम भी कर रही है।
(स्त्रोत साभार – दैनिक भास्कर तथा इंडीटाइम्स)
जानिए, कैसे आया पापड़?
किसी वृक्ष या शरीर के ऊपरी हिस्से के उस स्तर को परत कहते हैं जो सूखने के बाद अपने मूल आधार को छोड़ देता है। इसी परत को पपड़ी भी कहा जाता है। पपड़ी आमतौर पर किसी पदार्थ की अलग हो सकनेवाली ऊपरी परत के लिए प्रयुक्त शब्द है किन्तु सामान्य तौर पर कोई भी परत, पपड़ी हो सकती है। भूवैज्ञानिक नज़रिये से धरती के कई स्तर हैं। धरती के सबसे ऊपरी स्तर को भी पपड़ी कहा जाता है। पपड़ी से मिलता जुलता एक अन्य शब्द है पापड़। चटपटा-करारा मसालेदार पापड़ भूख बढ़ा देता है और हर भोजनथाल की शान है। पपड़ी पापड़ सरीखी भी होती है, मगर पापड़ पपड़ी नहीं है। अर्थात पापड़ किसी चीज़ की परत नहीं है। स्पष्ट है कि पपड़ी के रूपाकार और लक्षणों के आधार पर पपड़ीनुमा दिखनेवाले एक खाद्य पदार्थ को पापड़ कहा गया। चना, उड़द या मूँग की दाल के आटे से बनी लोई को बेलकर खास तरीके से बनाई अत्यंत पतली-महीन चपाती को पापड़ कहते हैं। पापड़ बनाने की प्रक्रिया बहुत बारीक, श्रमसाध्य और धैर्य की होती है इसीलिए हिन्दी को इसके जरिए पापड़ बेलना जैसा मुहावरा मिला जिसमें कठोर परिश्रम या कष्टसाध्य प्रयास का भाव है। किसी ने भारी मेहनत के बाद अगर कोई सफलता पाई है तो कहा जाता है कि इस काम के लिए उसे बहुत पापड़ बेलने पड़े हैं। पापड़ में हालाँकि मशक्कत बहुत है और यह देश का यह प्रमुख कुटीर उद्योग है।
पपड़ी और पापड़ शब्द का मूल एक ही है। संस्कृत के पर्पट, पर्पटक या पर्पटिका से पापड़ की व्युत्पत्ति मानी जाती है। हिन्दी समेत विभिन्न बोलियों में इसके मिलते-जुलते रूप मिलते हैं जैसे सिन्धी में यह पापड़ु है तो नेपाली में पापड़ो, गुजराती, हिन्दी, पंजाबी में यह पापड़ है। बंगाली में यह पापड़ी है। दक्षिण भारतीय भाषाओं में भी इससे मिलते जुलते नामों से इसे पहचाना जाता है। मलयालम में यह पापडम् (pappadam) है तो कन्नड़ में इसे हप्पाला (happala) है। तमिल में इसे अप्पलम और पप्पपतम् (pappaṭam) कहते हैं। तेलुगू में इसे अप्पादम कहते हैं। भारतीय भाषाओं में प्रचलित पापड़ के 19 तरह के नाम विकीपीडिया में दर्ज हैं। मराठी में छोटे पापड़ को पापड़ी कहा जाता है। पापड़ हमेशा मसालेदार तीता ही नहीं होता बल्कि मीठा भी होता है। महाराष्ट्र मे चावल या अनाज के आटे से एक विशेष चपाती बनाई जाती है जिसे पापड़ी कहते हैं। इसकी एक किस्म को गूळपापड़ी भी कहते हैं। पपड़ी की व्युत्पत्ति पर्पटिका से ज्यादा तार्किक है। रोटी की ऊपरी परत को मराठी में पापुद्रा कहते हैं जिसमें आवरण, कवच, रक्षापरत का भाव है। यह पापुद्रा भी पर्पट का विकास है कुछ इस तरह-पर्पटिका > पप्पड़िआ > पापुद्रा आदि। इसी तरह पर्पटक > पप्पटक > पप्पड़अ > पापड़ के क्रम में हिन्दी व्यंजनों की शब्दावली में एक नया शब्द जुड़ा।
पर्पटक के मूल में संस्कृत की पृ धातु है जिसमें रखना, आगे लाना, काम कराना, रक्षा करना, जीवित रखना, उन्नति करना, पूरा करना, उद्धार करना, निस्तार करना जैसे भाव हैं। ध्यान रहे देवनागरी के प वर्ण में ही रक्षा, बचाव जैसे भाव हैं। इसके साथ ऋ का मेल होने से बना पृ। याद रहे देवनागरी का ऋ अक्षर दरअसल संस्कृत भाषा का एक मूल शब्द भी है जिसका अर्थ है जाना, पाना। जाहिर है किसी मार्ग पर चलकर कुछ पाने का भाव इसमें समाहित है। इसी तरह र के मायने गति या वेग से चलना है जाहिर है मार्ग या राह का अर्थ भी इसमें छुपा है। ऋ की महिमा से कई इंडो यूरोपीय भाषाओं जैसे हिन्दी, उर्दू, फारसी, मालवा, निमाड़, गुजरात और महाराष्ट्र में एक से डेढ़ फुट लम्बा, और कुछ कुछ गोलाई लिए हुए एक व्यंजन का नाम भी फाफड़ा है जो इसी पापड़ का रिश्तेदार होता है।अंग्रेजी, जर्मन वगैरह में दर्जनों ऐसे शब्दों का निर्माण हुआ जिन्हें बोलचाल की भाषा में रोजाना इस्तेमाल किया जाता है। ऋ में राह दिखाने, पथ प्रदर्शन का भाव भी है। इसी से बना है ऋत् जिसका अर्थ है घूमना। वृत्त, वृत्ताकार जैसे शब्द इसी मूल से बने हैं। संस्कृत की ऋत् धातु से भी इसकी रिश्तेदारी है जिससे ऋतु शब्द बना है। गोलाई और घूमने का रिश्ता ऋतु से स्पष्ट है क्योंकि सभी ऋतुएं बारह महिनों के अंतराल पर खुद को दोहराती हैं अर्थात उनका पथ वृत्ताकार होता है। दोहराने की यह क्रिया ही आवृत्ति है जिसका अर्थ मुड़ना, लौटना, पलटना, प्रत्यावर्तन, चक्करखाना आदि है। खास बात यह कि किसी चीज़ को सुरक्षित रखने के लिए उसके इर्दगिर्द जो सुरक्षा का घेरा बनाया जाता है उसे भी आवरण कहते हैं। आवरण बना है वृ धातु से जिसमें सुरक्षा का भाव ही है।
इसी तरह प में ऋ के मेल से पृ धातु बनी। इसमें प में निहित पालने पोसनेवाला अर्थ तो सुरक्षा से सबंद्ध है ही साथ ही इसके साथ ऋ में निहित चारों ओर से घिरे रहनेवाली सुरक्षा भाव भी पर्पट या पर्पटिका में जाहिर हो रहा है। पपड़ी मूलतः एक शल्क या छिलका ही होती है जिससे तने की या शरीर की सुरक्षा होती है। पपड़ी जैसा पदार्थ ही पापड़ है। मालवा, निमाड़, गुजरात और महाराष्ट्र में एक से डेढ़ फुट लम्बा, और कुछ कुछ गोलाई लिए हुए एक व्यंजन का नाम भी फाफड़ा है जो इसी पापड़ का रिश्तेदार होता है। मालवा में सेव-पपड़ी का भी खूब चलन है। हिन्दी शब्दसागर में पापड़ा या पापड़ी नाम के एक वृक्ष का भी उल्लेख है जो मध्यप्रदेश, बंगाल, मद्रास और पंजाब में होता है। इसकी पत्तियाँ खूब झड़ती है और इसकी खाल पीलापन लिए सफ़ेद होती है।
( स्त्रोत साभार – शब्दावली ब्लॉग स्पॉट डॉट कॉम)
एमएसएन डीआरडीई के साथ कोविड रोगियों के लिए ला रही है नयी दवा
कोलकाता : एमएसएन लेबोरेटरीज प्राइवेट लिमिटेड (एमएसएन) ने मेडिकल क्षेत्र में एक और कदम आगे बढ़ाया है। कम्पनी ने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की इकाई रक्षा अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान (डीआरडीई), इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूक्लियर मेडिसिन एंड एलाइड साइंसेज (आईएनएमएएस) के साथ भारत में 2-डीऑक्सी-डी-ग्लूकोज (2-डीजी) के निर्माण, वितरण और विपणनके लिए एक लाइसेंस करार किया है। डीआरडीओ द्वारा विकसित, 2-डीजीको ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीसीजीआई) द्वारा गंभीर कोविड-19रोगियों के लिए सहायक चिकित्सा के रूप में इस दवा के आपातकालीन उपयोग की अनुमति दी गयी है।
एमएसएन लैब्स2 डीजी को दिन में दो बार उपयोग वाले उत्पाद के रूप में सैशे के रूप में एमएसएन 2डी ब्रांड नाम के तहत 2.34 ग्राम क्षमता में लॉन्च करेंगी। कोविड उपचार रेंज के हिस्से के रूप में, एमएसएन ने पहले ही ‘ओसेलो’ ब्रांड नाम के तहत ओसेलटामिविर कैप्सूल एंटी-वायरल दवा, ब्रांड नाम ”फेविलो” के तहत फेविपीरिवर जैसी एंटी कोविड दवा; ”बारीडोज ” ब्रांड नाम के तहत बारीसिटिनब और ”पोसावन” ब्रांड नाम के तहत पोसाकोनाजोल जैसी एंटिफंगल दवाएं लॉन्च कर दी हैं। इसके अलावा एमएसएन अस्पताल में भर्ती कोविड के गंभीर मरीजों पर अविप्टाडिल और हल्के और मध्यम कोविडरोगियों पर मोलनुपिरवीर जैसी दवाओं के साथ के साथ क्लिनिकल परीक्षण का संचालन भी कर रहा है।
भवानीपुर कॉलेज में ‘एक्चुरियल साइंस में कॅरियर’ पर वेबिनार
कोलकाता : भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज में एक्चुरियल साइंस पर वेबिनार आयोजित किया गया। वेबिनार में मुख्य वक्ता बतौर ऋषभ लड्ढा एसोसिएट एक्यूटी नॉलेज पार्टनर्स और रौनक घोरावत वरिष्ठ एनालिस्ट एकसेन्चर रहे। यह वेबिनार आईक्यू ए सी के साथ मिलकर किया गया।
एक्चुरियल साइंस क्या है तथा किस तरह एक सफल एक्चुरिज बना जा सकता है? इस फील्ड में कॅरियर विकास की क्या संभावना है ? इस क्षेत्र में हाई सैलरी पैकेज तथा सुरक्षा की भावना आदि कई ऐसे कारण हैं जिनकी वजह से ज्यादातर छात्र इस क्षेत्र में अपना कॅरियर बनाना चाहते हैं। इसकी माँग भी अधिक है क्योंकि विभिन्न उद्योगों में आने वाले जोखिमों की कमी नहीं होती है। एक्चुरिज की एक बड़ी विशेषता यह है कि वे किसी भी उद्योग में कार्य कर सकते हैं। एक फ्रेशर को भी 3-5 लाख रूपये की सालाना तनख्वाह मिलती है। आगे चलकर 3-5 वर्ष के अनुभव के बाद सालाना लगभग 10-15 लाख रुपये तक कमा सकते हैं। भारत के किसी एक्चुरिज इंस्टीट्यूट के फेलो मेंबर बनने पर लगभग 20 से 30 लाख रूपये सालाना कमा सकते हैं। रौनक घोरावत ने स्क्रीन शेयर कर अपनी बात रखी।
ऋषभ लढ्ढा ने एक्चुरिज के इंस्टीट्यूटशन के विषय में जानकारी दी। एक्चुरिज को रिक्रूट करने वाले कुछ लोकप्रिय इंस्टीट्यूट्स के विषय में बताया जैसे डब्ल्यू एन एस ग्लोबल सर्विसेज, पी डब्ल्यू सी एक्चुरियल सर्विसेज इंडिया, मिलीमैन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, फ्यूचर जेनराली इंश्योरेंस, आईडीबीआई बैंक, मैकिंसे एडवांस्ड हेल्थकेयर एनालिटिक्स, विलिज टावर्स वाटसन, डाइरेक्टोरेट ऑफ पोस्टल लाइफ इंश्योरेंस, अर्नेस्ट एंड यंग इंडियाआदि।
एक्चुरियल साइंस के अंतर्गत पाठ्यक्रम और परीक्षा की जानकारी दी। इस कार्यक्रम का संचालन श्रेयसी घोष ने किया। दुष्यंत चतुर्वेदी ने प्रश्नोत्तर सेशन में अपना योगदान दिया। प्रो. दिलीप शाह ने सभी विद्यार्थियों को नये कोर्स के विषय के प्रति जागरूक किया। आज डेटाबेस और स्टेटिकस के आधार पर सभी बिजनस हो रहे हैं। गणित और सांख्यिकी वाले विद्यार्थियों के लिए तो अच्छे मौके है ही, दूसरे विषय के विद्यार्थी भी अपने कॅरियर को अच्छा बना सकते हैं। प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी, प्रो दिव्या उडीसी, और डॉ वसुंधरा मिश्र की उपस्थिति रही।
‘पत्रकारिता का स्वराज’ विषय पर एक राष्ट्रीय वेब संगोष्ठी
कोलकाता : भारतीय भाषा परिषद को ओर से ‘पत्रकारिता का स्वराज’ विषय पर एक राष्ट्रीय वेब संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने कहा कि आज अघोषित पाबंदियों ने पत्रकारिता के स्वराज को छीन लिया है। ऐसे में स्वराज को बचाने के लिए सोशल मीडिया पर सिटीजन जनर्लिज्म मुखर हुआ है। नयी दुनिया के पूर्व संपादक श्रवण गर्ग ने कहा कि पत्रकारिता का स्वराज निडरता और विवेकपरकता से ही बच सकता है। हमें पत्रकारिता के स्वराज को नागरिकता के स्वराज से जोड़ने की जरूरत है। पत्रकार-लेखक अरुण कुमार त्रिपाठी ने कहा कि पत्रकारिता के स्वराज का अर्थ सत्य के प्रकटीकरण और अनुसंधान से जुड़ा है। हमें भय और लोभ से बचकर स्वराज को बचाना चाहिए। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए भारतीय भाषा परिषद के निदेशक शंभुनाथ ने कहा कि आज समाचार पत्रों में संपादक की जगह प्रबंधक ने ले लिया है। ऐसे में पत्रकारिता के स्वराज का प्रश्न हाशिये पर चला गया है। पत्रकारों को निडरता के साथ पत्रकारिता के स्वराज को बचाने की जरूरत है। संस्था की अध्यक्ष प्रख्यात लेखिका कुसुम खेमानी ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि पत्रकारिता का लक्ष्य बहुत व्यापक है। हर दौर में पत्रकारिता के स्वराज पर आक्रमण हुआ परंतु कुछ समर्पित पत्रकारों ने घुटने टेकने के बजाय एक सशक्त प्रतिरोध खड़ा किया। कार्यक्रम का संचालन करते हुए प्रो. संजय जायसवाल ने कहा कि सत्ता का निरंकुश और फासीवादी चेहरा पत्रकारिता के स्वराज का सबसे बड़ा शत्रु है। इस अवसर पर देश के विभिन्न हिस्सों से भारी संख्या में साहित्य और संस्कृति प्रेमी वेब संगोष्ठी में उपस्थित थे।धन्यवाद ज्ञापन संस्था के मंत्री केयूर मजमूदार ने दिया। तकनीकी संचालन सौमित्र आनंद और मधु सिंह ने किया।
केले के बेकार तनों से बनाया हस्तशिल्प, आज 9 लाख का टर्नओवर
मजदूर पिता का बेटे दे रहा है 450 लोगों को रोजगार
नयी दिल्ली : उत्तर प्रदेश के कुशीनगर के रहने वाले रवि प्रसाद का बचपन तंगहाली में गुजरा। सड़क हादसे में पिता की मौत हो गयी। रवि की पढ़ाई बीच में छूट गई और उनके कंधे पर परिवार की जिम्मेदारी आ गई। उन्होंने मजदूरी की, प्राइवेट कंपनी में काम किया। आज वे केले के कचरे से हस्तशिल्प उत्पाद तैयार करते हैं, ऑनलाइन और ऑफलाइन माध्यमों से देश भर में बेच रहे हैं। 450 से ज्यादा महिलाओं को उन्होंने रोजगार से जोड़ा है। अभी हर साल वे 8 से 9 लाख रुपये का कारोबार कर रहे हैं।
36 साल के रवि बताते हैं कि पिता जी मजदूरी करते थे। मैं उनके काम में मदद के साथ पढ़ाई भी करता था। मास्टर्स में दाखिला लिया था, लेकिन एक हादसे में पिता की मौत हो गई। उसके बाद मैंने पढ़ाई छोड़ दी और धंधे की तलाश में लग गया। कई साल तक इधर-उधर काम करता रहा और घर परिवार का खर्च चलाता रहा।
रवि बताते हैं कि साल 2016 में अपने दोस्तों के साथ काम के लिए दिल्ली गया। उसी दौरान एक दिन प्रगति मैदान में जाने का मौका मिला। वहां दक्षिण के कुछ कारीगर आए थे। उन लोगों ने केले के वर्ज्य पदार्थों से बने हस्तशिल्प उत्पादों का स्टॉल लगाया था। उनसे बातचीत के बाद मुझे लगा कि ये काम किया जा सकता है। हमारे यहां तो केले की खूब खेती होती है और लोग केले से निकला वर्ज्य यूं ही फेंक देते हैं।
उन्होंने मेले में ही एक कारीगर से दोस्ती की और काम सिखाने का आग्रह किया। इसके बाद वे दिल्ली से ही कोयंबटूर चले गए। वहां करीब एक महीने वे उस कारीगर के गांव में ठहरे। वहां के किसानों से मिले, उनके काम को समझा। बनाना फाइबर वेस्ट से हस्तशिल्प उत्पाद बनाना सीखा। जब वे काम सीख गए तो वापस अपने गांव लौट आए।
रवि बताते हैं कि मुझे काम की जानकारी तो मिल गई थी, लेकिन प्रोसेसिंग मशीन खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। मैंने कोशिश जारी रखी। लोन के लिए भी कुछ जगह कोशिश की। इसी बीच मुझे एक परिचित के जरिए जिला उद्योग केंद्र के बारे में पता चला। वहां जाकर मैंने जनरल मैनेजर से मुलाकात की। उन्हें अपने काम और प्रशिक्षण के बारे में जानकारी दी। वे मेरे आइडिया से काफी प्रभावित हुए और लोन के लिए प्रपोजल बनाने में मदद की।
5 लाख रुपये बैंक से कर्ज लिये
साल 2018 में रवि को बैंक से 5 लाख रुपये का कर्ज मिल गया। इससे उन्होंने प्रोसेसिंग मशीन खरीदी, कुछ महिलाओं को काम पर रखा और अपने काम की शुरुआत की। वे धीरे-धीरे एक के बाद एक नए-नए सामान तैयार करने लगे और स्थानीय बाजार में उसे सप्लाई करने लगे। इसके बाद यूपी सरकार से भी प्रोत्साहन मिला। राज्य सरकार की वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट स्कीम के लिए मेरा चयन हुआ। उसके जरिए कई महिलाएं मुझसे जुड़ीं। मार्केटिंग के लिए मुझे प्लेटफॉर्म मिला। रवि फिलहाल केले के कचरे , रेशा, सैनिटरी नैपकिन, ग्रो बैग सहित दर्जनभर उत्पाद तैयार कर रहे हैं। वे अपने प्रोडक्ट सीधे बड़ी-बड़ी टेक्स्टाइल कंपनियों को भेजते हैं।
इसके बाद रवि दिल्ली, लखनऊ सहित कई शहरों में लगने वाले मेलों में जाने लगे। स्टॉल लगाकर अपने प्रोडक्ट की मार्केटिंग करने लगे। कुछ मीडिया कवरेज में उनको जगह मिली तो लोग ऑनलाइन भी उनसे उत्पाद खरीदने लगे। वे अभी सोशल मीडिया के साथ ही अमेजन और फ्लिपकार्ट के जरिए अपने प्रोडक्ट की मार्केटिंग कर रहे हैं। देशभर से उन्हें ऑर्डर आ रहे हैं।
(साभार – दैनिक भास्कर)




