Saturday, April 11, 2026
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टाइम्स की 100 प्रभावशाली हस्तियों की सूची में महिलाओं का दबदबा

नयी दिल्ली  : टाइम मैगजीन ने 2021 में दुनिया की 100 प्रभावशाली हस्तियों की सूची जारी की है। इनमें से आधी से ज्यादा जगहों पर यानी 54 महिला शख्सियतों ने जगह बनाई है। खास बात यह है कि टाइम ने दुनिया की जिन हस्तियों को 6  में रखा है, उनमें से 5 श्रेणियों में महिलाओं ने पुरुषों को पीछे छोड़ दिया है। छठी श्रेणी इनोवेटर्स की है और उसमें भी महिलाओं का दबदबा कायम है। हालांकि, उसमें उनको शीर्ष स्थानों पर जगह नहीं मिली है। फरवरी, 2016 की बात है, जब टाइम मैगजीन ने कॉलेज क्लास में 100 सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली महिला लेखिकाओं की सूची जारी की। बवाल तब मचा, जब सूची में 97वें पायदान पर किसी महिला को नहीं, बल्कि एक पुरुष लेखक एवलिन वॉग को रखा गया था। बहुत बवाल हुआ, लोगों ने यहां तक कह दिया कि टाइम में किस तरह का स्टाफ रखा जाता है, जिन्हें यह तक नहीं पता कि कौन महिला है और कौन पुरुष। खैर जो भी हो, इस गलती के बावजूद टाइम की साख नहीं घटी। अब उसी टाइम ने दुनियाभर की महिला शख्सियतों को खासी तवज्जो दी है। जानिए, कौन हैं टाइम की लिस्ट में जगह पाने वाली प्रभावशाली महिलाएं-
आइकंस: अपनी बेबाकी और जुदा अंदाज के लिए जानी जाती हैं मेगन
टाइम की आइकंस की श्रेणी में ब्रिटेन के प्रिंस हैरी के साथ उनकी पत्नी मेगन मर्केल ने सबसे आगे जगह बनाई है। इस श्रेणी में 16 शख्सियतें हैं, जिसमें 10 महिलाएं हैं। मेगन अपनी बेबाकी और स्टाइल के लिए चर्चित हैं। इस साल उन्होंने ओपरा विनफ्रे को दिए इंटरव्यू में बर्मिंघम पैलेस पर कई आरोप लगाकर तहलका मचा दिया था। इस सूची में दुनिया की पूर्व नंबर वन जापान की टेनिस खिलाड़ी नाओमी ओसाका का भी नाम है, जिन्होंने इस साल मानसिक परेशानियों के चलते इस साल फ्रेंच ओपन से नाम वापस ले लिया था। इसी में नस्लवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाली भारतीय अमेरिकी मंजूषा पी कुलकर्णी का भी नाम है।

पायनियर्स: पॉप सिंगर बेलिश में है दुनिया बदलने की ताकत
टाइम की पायनियर्स श्रेणी में 18 हस्तियां हैं, जिनमें 11 महिलाएं हैं। इस कैटेगरी में 4 साल की उम्र से गीत लिखने वाली अमेरिकी गीतकार और पॉप सिंगर बेली एलिश आगे रही हैं, जिन्होंने इस साल 7वां ग्रैमी अवॉर्ड जीता है। इसमें सुनीसा ली, फेलिस एमिडो जैसी प्रभावशाली महिलाओं के नाम हैं, जिनमें दुनिया को बदलने की ताकत है।
टाइटंस : जैसी थीं, वैसी ही खुद को पेश किया और बनाई मिसाल
इस श्रेणी में कुल 13 लोगों को शामिल किया गया है, जिसमें 7 महिलाएं हैं। इसे अमेरिका की जिम्नास्ट स्टार सिमोन बाइल्स लीड कर रही हैं। टोक्यो ओलंपिक के दौरान वह यूथ आइकन रहीं। शीर्ष एथलीटों के बीच अवसाद के मुद्दे को उठाकर टोक्यो ओलंपिक में सुर्खियों में आने के बाद सिमोन बाइल्स मेट गाला में रेड कार्पेट पर सुर्खियां बटोरी थीं। उन्होंने एपल के सीईओ टिम कुक को भी पीछे छोड़ दिया है। वहीं, शोंडा राइमस, निकोल होन्नाह जैसी महिलाएं हैं, जिन्होंने दुनिया को राह दिखाई है।

कलाकार : महिला अधिकारों की वकालत कर रहीं केट
इस श्रेणी में 16 में से 7 महिलाएं हैं, जिसकी अगुवाई टाइटैनिक फेम अभिनेत्री-केट विंस्लेट कर रही हैं। केट ने हाल ही में अफगानिस्तान में महिलाओं का समर्थन किया था। इसके अलावा वह कई मंचों से महिलाओं के अधिकारों की वकालत करती रही हैं।

नेता : ममता बनर्जी, कमला हैरिस भी शामिल, ओकोंजो टॉप पर
इस कैटेगरी में 20 में 9 महिलाएं हैं। इसे अफ्रीकी मूूल की नगोजी ओकोंजो लीड कर रही हैं। विश्व व्यापार संगठन की महानिदेशक ओकोंजो ने अपने फैसलों से दुनिया में छाप छोड़ी है। पहली बार किसी अश्वेत महिला को संगठन की कमान दी गई है। इस सूची में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भी इस सूची में जगह दी गई है। इसमें अमेरिका की उपराष्ट्रपति और भारतीय मूल की कमला हैरिस का भी नाम है।
इनोवटर्स: आधुनिक खयालों से मचाई दुनिया में हलचल
इस कैटेगरी में 17 में 10 महिलाएं हैं, मगर इसकी अगुवाई ताईवानी अमेरिकी अरबपति कारोबारी जेनसिंग हुआंग कर रहे है। हालांकि, महिलाओं का इस कैटेगरी में दबदबा है। इसमें टेस्ला के सीईओ एलन मस्क का भी नाम है। इसके अलावा, एड्रियाने बैनफील्ड नोरिस, विलो स्मिथ और जाडा पिंकिट स्मिथ जैसी आधुनिक विचारों वाली महिलाएं हैं, जिन्होंने हलचल मचाई है।

बंग महिला : आधुनिक कथा साहित्य की बुनियाद रचने वाली लेखिका

बंग महिला ने अपने लेखों में इंडियन पीनल कोड पर किया करारा व्यंग्य
लॉर्ड कर्जन की बांटो और राज करो की नीति पर जड़ा तमाचा
मनपसंद पति चुनने और तलाक की बात कर मचाया तहलका

यह बात 115 साल पहले तब की है, जब अगस्त, 1905 में तत्कालीन कलकत्ता के टाउनहाल में एक सभा आयोजित की गई थी। मुद्दा था ब्रिटिश हुकूमत की बांटो और राज करो की नीति की मुखालफत करना। सभा में अंग्रेजों की बंगाल बंटवारे की योजना के खिलाफ पूरे हिंदुस्तान में स्वदेशी आंदोलन और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का एलान किया गया। तब अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ किसी भी आंदोलन का केंद्र रहे कलकत्ता की सड़कों और गलियों से महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे निकल पड़े। कोई नहीं जानता था कि इस आंदोलन को लेकर ब्रिटिश भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन का अगला कदम क्या होगा? हालांकि, इससे पहले करीब साल भर पहले चलें, जब 1904 में उस दौर की मशहूर पत्रिका सरस्वती में एक लेखिका ‘बंग महिला’ की हिन्दी कहानी छपी, जिसका शीर्षक था ‘चंद्रदेव से मेरी बातें’। खत की शैली में लिखी गई इस कहानी में बेहद साहसिक तरीके से लॉर्ड कर्जन पर तंज कसा गया था। कहानी में अंग्रेजी राज की भारत की अर्थव्यवस्था काे चौपट करने और बांटो और राज करो की नीति की पोल खोली गई थी। यह कहानी छपते ही देश में हलचल मच गई, हाय-तौबा मची। अंग्रेजों के चाटुकारों ने तब इस पर पाबंदी लगाने और कहानी को जब्त करने की वकालत की। पता लगाने की कोशिश की गई कि आखिर यह बंग महिला कौन है? यह भी कोई नाम हुआ? इसके पीछे कौन है?

मुखर होने के नाते चरित्र पर लगे लांछन, पर नहीं टूटा हौसला
दरअसल, यह और कोई नहीं आधुनिक हिन्दी नव जागरण की पहली महिला कहानीकार राजेंद्र बाला घोष थीं, जिन्होंने आक्रामक लेखन से पुरुषों के वर्चस्व और उनकी दुनिया को चुनौती दी। राजेंद्र बाला घोष (1882-1951) बंग महिला के छद्मनाम से हिन्दी में लिखती थीं। भारत में अपने लेखों से फेमिनिज्म यानी नारीवादी आंदोलन की शुरुआत करने वालीं बंग महिला को लोगों ने जाने क्या क्या नहीं कहा। कोई उनके चरित्र पर लांछन लगाता तो कोई कहता कि वह बहुत लड़ाका किस्म की हैं। वह इन आरोपों से न तो घबराईं, न टूटीं और न ही उनके हौसलों को कोई थाम सका। उनका नारी मुक्ति का अभियान फेमिनिस्ट आंदोलन के लिए मील का पत्थर साबित हुआ। उनकी बनाई जमीन पर मुंशी प्रेमचंद और जयशंकर प्रसाद जैसे दिग्गज कथाकारों ने हिन्दी कहानी को नई धार दी। उनका लेखन स्वदेशी आंदोलन के बाद के दौर में उस वक्त तब बेहद मजबूती से सामने आया, जब भारत में ब्रिटेन के मैनचेस्टर में बने कपड़ों और लिवरपूल के नमक जैसी वस्तुओं के बहिष्कार किए गए। बंटवारा लागू होने के बाद वंदे मातरम् गीत गाकर विरोध किया तो रवींद्रनाथ टैगोर की लिखी आमार सोनार बांग्ला काे लोगों ने एकता का प्रतीक माना। आखिरकार 1911 में लोगों के जबरदस्त विरोध को देखते हुए अंग्रेजी हुकूमत को बंगाल विभाजन की योजना रद्द करनी पड़ी।

‘भारत भ्रमण पर आएं तो देवताओं के चीफ जस्टिस चित्रगुप्त जी को साथ जरूर लाएं’
बंग महिला की कहानी चंद्रदेव से मेरी बातें में कटाक्ष करते हुए चंद्रदेव को संबोधित किया गया है। जैसे इसकी एक बानगी देखें…आप इतने पुराने हैं तो सही, पर काम सदा से एक ही और एक ही स्थान में करते आते है। आप कभी भारत-भ्रमण करने आएं तो अपने ‘फैमिली डॉक्टर’ धन्वन्तरि महाशय को और देवताओं के ‘चीफ जस्टिस’ चित्रगुप्त’ जी को साथ अवश्य लेते आएं। आशा है कि धन्वन्तरी महाशय यहां के डॉक्टरों के सन्निकट चिकित्सा संबंधी बहुत कुछ शिक्षा का लाभ कर सकेंगे।

इंडियन पीनल कोड पर करारा व्यंग्य, कामकाज पर भी साधा निशाना
कहानी में वह तंज कसते हुए कहती हैं कि यदि प्लेग महाराज (ईश्वर न करे) आपके चंद्रलोक या देवलोक में घुस पड़े तो, वहां से उनको निकालना कुछ सहज बात न होगी। यहीं जब चिकित्सा शास्त्र के बड़े-बड़े शूरमा उन पर विजय नहीं पा सकते, तब वहां आपके देवलोक में जड़ी-बूटियों के प्रयोग से क्या होगा? यहां के ‘इंडियन पीनल कोड’ की धाराओं को देखकर चित्रगुप्त जी महाराज अपने यहां की दंड विधि (कानून) को बहुत कुछ सुधार सकते हैं। और यदि बोझ न हो तो यहां से वे दो चार ‘टाईपराइटर’ भी खरीद ले जाए। जब प्लेग महाराज के अपार अनुग्रह से उनके ऑफिस में कार्य की अधिकता होवे, तब उससे उनकी ‘राइटर्स बिल्डिंग’ के राइटर्स के काम में बहुत ही सुविधा और सहायता पहुंचेगी। वे लोग दो दिन का काम दो घंटे में कर डालेंगे।

दुलाईवाली कहानी आधुनिक हिन्दी की पहली कहानियों में शुमार
बंग महिला मूल रूप से हिन्दी भाषी नहीं थीं। उनके घर में सभी लोग बांग्ला ही बोलते थे, मगर उन्होंने हिन्दी को ही प्रमुख रूप से लेखन का जरिया बनाया। बंग महिला की प्रमुख कहानी दुलाईवाली है, जो 1907 में सरस्वती पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। हिन्दी की पहली कहानी पर तो वैसे साहित्यकारों में मतभेद है, मगर इस बात पर सब एकमत हैं कि हिन्दी की पहली कहानियों में बंग महिला की दुलाईवाली भी है, जिसने आधुनिक हिन्दी कहानी की नींव रखी। वह बांग्ला में भी लिखती थीं, मगर यहां उनके लेखों पर उनका नाम प्रवासिनी हुआ करता था।

राजनीतिक विरोध और प्रदर्शनों के माहौल के बीच पली-बढ़ीं
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के करीब तीन साल पहले राजेंद्र बाला घोष का जन्म वाराणसी में 1882 में हुआ था। 1857 की क्रांति के बाद भारतीयों द्वारा राजनीतिक तौर तरीके से विरोध करने के लिए कांग्रेस संगठन बनाया गया। ऐसे ही माहौल में राजेंद्र बाला प्रतिष्ठित बंगाली परिवार में पली बढ़ीं। माता-पिता की दुलारी थीं तो बचपन में उन्हें ‘रानी’ और ‘चारुबाला’ के नाम से सब बुलाते थे।

बच्चों और पति की मौत के बाद छूटा लेखन, गुमनामी के अंधेरे में डूबीं
बंग महिला नाम से राजेंद्र बाला घोष 1904 से 1917 तक लिखती रहीं। बाद में दो बच्चों की असमय मौत और 1916 में पति के इस दुनिया से जाने के बाद वे टूट सी गईं। लेखन छूट गया और गुमनामी व अवसाद के अंधेर में डूब गईं। आखिरकार 24 फरवरी, 1951 को उनका निधन हो गया। कुछ साहित्यकार कहते हैं कि अगर उनका लेखन नहीं छूटा होता तो शायद हिन्दी और समृद्ध और शक्तिशाली होती।
महिलाएं जब बेड़ियों में जकड़ी थीं, तब की मनपसंद पति चुनने की आजादी की बात
बंग महिला के दौर में महिलाओं का ज्यादा आजाद ख्याल अच्छा नहीं माना जाता था। वे कई तरह की परंपराओं और कुरीतियों की बेड़ियों में जकड़ी हुई थीं। उन्होंने पहले तो स्त्री शिक्षा की जमकर वकालत की और महिलाओं को अपनी मनपसंद पति का चुनाव करने की बातें की। यहां तक कि तलाक जैसी बातें भी उन्होंने अपने लेखों में की, जिससे परंपरावादी समाज हिल गया था।

पुरुष भी हो रहे हैं एसिड अटैक का शिकार, 30 से 40 प्रतिशत पुरुष पीड़ित

नयी दिल्ली : जब भी हम एसिड अटैक की खबर सुनते हैं, तो हमारे जेहन में एक लड़की की तस्वीर उभरती है। चेहरा छुपाए एक लड़की, पट्टियों में लिपटी एक लड़की, चीखती-चिल्लती और इंसाफ की गुहार लगाती एक लड़की। इसकी वजह है कि एसिड अटैक की शिकार ज्यादातर लड़कियां होती हैं, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है कि सिर्फ महिलाओं पर ही तेजाब फेंका जाता है, पुरुषों पर भी एसिड अटैक हो रहे हैं। नेशनल क्राइम ब्यूरो रिकॉर्ड (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के मुताबिक, एसिड अटैक के कुल पीड़ितों में से 30 से 40 फीसदी संख्या पुरुषों की है।

हिसार: विदेश जा रहे युवक पर प्रेमिका ने फेंका तेजाब
हरियाणा के हिसार जिले से 3 सितंबर को खौफनाक खबर सामने आई। विदेश जा रहे युवक पर उसकी प्रेमिका ने तेजाब फेंक दिया। हादसे में गांव डुमरखां कला निवासी 22 वर्षीय शुभम सोनी बुरी तरह झुलस गया। शुभम कनाडा जा रहा था और युवती उस पर शादी का दबाव बना रही थी। शुभम ने कनाडा से लौटने के बाद शादी करने की बात कही, जिससे खफा हो युवती ने तेजाब उड़ेल दिया।
उदयपुर: प्रेम में मिला धोखा तो युवती ने इंजीनियर पर कराया एसिड अटैक
राजस्थान के उदयपुर में प्यार में धोखा खाने वाली इंजीनियर युवती ने सबक सिखाने के लिए सहकर्मी इंजीनियर युवक पर तेजाब हमला करवाया। उदयपुर की सीमेंट फैक्ट्री में कर कर रहे अभिषेक का सहकर्मी युवती से प्रेम संबंध था। नाइजा शादी का दबाव बनाने लगी, तो अभिषेक ने उससे रिश्ता खत्म कर लिया। इससे आहत होकर लड़की ने बॉस के साथ नजदीकियां बढ़ाकर साजिश रची। मई, 2021 में बॉस के भाई से अभिषेक पर तेजाब हमला करवाया।
आगरा: प्रेमिका ने प्रेमी पर फेंका तेजाब, अस्पताल में मौत
उत्तर प्रदेश के आगरा से 25 मार्च 2021 को दिल दहलाने वाली घटना सामने आई। आगरा के हरीपर्वत थाना क्षेत्र में एक युवती ने अपने प्रेमी को घर बुलाया और तेजाब फेंक दिया। तेजाब हमले में बुरी तरह झुलसे कासगंज निवासी देवेंद्र को अस्पताल ले जाया गया, लेकिन वहां उसकी मौत हो गई। पुलिस के मुताबिक, प्रेमी की शादी दूसरी जगह तय होने के कारण युवती नाराज थी। देवेंद्र आगरा की एक लैब में असिस्टेंट का काम करता था, जबकि आरोपी लड़की सोनम एक निजी अस्पताल में नर्स थी।

देश: हर दो दिन में एक एसिड अटैक
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक, हर दो दिन में एक एसिड अटैक की घटना होती है। वहीं कुल एसिड अटैक विक्टिम में से 30-40 फीसदी से ज्यादा संख्या पुरुषों की होती है।

साल दर साल रिपोर्ट किए गए मामले
वर्ष मामले
2014 309
2015 222
2016 167
2017 244
2018 228
2019 240
(स्त्रोत: नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो)
एसिड अटैक पीड़ित तीन मरीज में से एक पुरुष
‘हेल्पिंग हैंड’ नाम की संस्था चलाने वाले प्लास्टिक एंड कॉस्मेटिक सर्जन डॉ. योगी ऐरन अब तक लाखों ऐसे मरीजों की सर्जरी कर चुके हैं, जो एसिड अटैक या फिर जलने के अपने शरीर का कोई अंग खो देते हैं। पद्मश्री पुरस्कार विजेता डॉ. योगी के बेटे और डॉ. कुश ने बताया कि वह संस्था में वालंटियर सर्जन हैं। उनके सामने अब तक सिर्फ तीन एसिड अटैक पीड़ित सर्जरी के लिए आए, जिनमें दो महिलाएं और एक पुरुष था। बता दें कि ‘हेल्पिंग हैंड’ एसिड अटैक के शिकार हुए और आग में जलने वाले गरीब लोगों का निशुल्क इलाज करता है।

(साभार – दैनिक भास्कर)

महिलाओं के मेनोपॉज की तरह पुरुषों को होता है एंड्रोपॉज

हजार में 5 पुरुष सेक्स हार्मोन की कमी से जूझ रहे
पुरुषों में होने वाले एंड्रोपॉज की समस्या महिलाओं से कई मायनों में अलग

महिलाओं में मेनोपॉज पर तो खूब बात होती है लेकिन पुरुषों में एंड्रोपॉज के बारे में कम ही लोग जानते हैं। दरअसल मसला ये है कि एंड्रोपॉज पुरुषों की यौन ताकत से जुड़ा है इसलिए इसपर बात नहीं होती। विशेषज्ञों के मुताबिक, 40 साल की उम्र के बाद हर साल पुरुषों के टेस्टोस्टेरोन में 3% तक की कमी होती जाती है। उम्र के बढ़ने पर इस कमी से सामना होना तो सामान्य बात हो सकती है लेकिन अब गलत लाइफस्टाइल के चलते युवा भी स्पर्म काउंट में कमी से जूझ रहे हैं। वहीं, 60 साल की उम्र के बाद करीब 20% पुरुष एंड्रोपॉज से गुजरते हैं। 70% पुरुषों में इस कमी का पता ही नहीं चलता। ब्रिटिश पब्लिक हेल्थ सिस्टम के अनुमान के मुताबिक करीब एक हजार में से 5 लोग टेस्टोस्टेरोन की कमी से जूझते हैं।

क्या है एंड्रोपॉज और मेनोपॉज में फर्क
पुरुषों में होने वाले एंड्रोपॉज की प्रॉब्लम महिलाओं से कई मायनों में अलग है। महिलाओं में मेनोपॉज के दौरान एस्ट्रोजन हॉर्मोन्स की कमी आने लगती है। वहीं, पुरुषों के शरीर में एक उम्र के बाद टेस्टोस्टेरोन हॉर्मोन्स की कमी होने लगती है। हॉर्मोन्स का घटना उम्र के साथ धीरे-धीरे होता है। महिलाओं में मेनोपॉज 45-55 की उम्र में देखने को मिलता है, जबकि पुरुषों में 50 से 60 साल की उम्र के बीच। हेल्थलाइन के आंकड़ों के अनुसार एडल्ट लाइफ यानी 20 से 30 साल की उम्र के बीच टेस्टोस्टेरोन सबसे ज्यादा होता है, जो उसके बाद हर साल 1 पर्सेंट की दर से कम होने लगता है।
पुरुषों में एंड्रोपॉज की वजह
उम्र के साथ होने वाली इस सामान्य प्रोसेस में टेस्टोस्टेरोन कम होने की कंडीशन को हाइपोगोनाडिज्म कहा जाता है। डायबिटीज, एचआईवी, फेफड़े से जुड़ी बीमारी, बढ़ता मोटापा, ज्यादा धूम्रपान, तनाव और खान-पान की खराब आदतें भी एंड्रोपॉज जल्द शुरु होने की वजह बन सकती हैं। जर्नल ऑफ यूरोलॉजी में प्रकाशित रिसर्च के अनुसार कम फैट वाला खाना खाने से पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन की कमी हो सकती है। वहीं, इंग्लैंड की डरहम यूनिवर्सिटी की रिसर्च की मानें तो जिन जगहों पर इन्फेक्शन का खतरा ज्यादा रहता है, वहां युवा लड़कों में आगे चलकर टेस्टोस्टेरोन का लेवल कम होने की आशंका रहती है।

कम टेस्टोस्टेरोन लेवल वाले पुरुषों को कोरोना का खतरा
फूड एंड ड्रग ऐडमिनिस्ट्रेशन के अनुसार पुरुष के शरीर में टेस्टोस्टेरोन की नॉर्मल रेंज 300 से 1 हजार नैनोग्राम प्रति डेसीलीटर होनी चाहिए। लेकिन जब टेस्टोस्टेरोन लेवल 300 से नीचे चला जाता है, तो इसे टेस्टोस्टेरोन लेवल की कमी के रूप में देखा जाता है। न्यू इंग्लैंड रिसर्च इंस्टीट्यूट ने पुरुषों में कम टेस्टोस्टेरोन को लेकर सर्वे किया। इसमें कुल 1,475 पुरुषों को शामिल किया गया था, जिनकी उम्र 35 से 60 के बीच थी। रिसर्च में सामने आया कि कम टेस्टोस्टेरोन के लक्षण वालों में सेक्स की इच्छा कम थी। वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन की रिसर्च के अनुसार जिन पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन लेवल कम होता है उन्हें कोरोना से गंभीर इंफेक्शन का ज्यादा खतरा हो सकता है।
टेस्टोस्टेरोन रिप्लेसमेंट थेरेपी से फायदा
ये समझना जरूरी है कि हर इंसान के शरीर में हार्मोनल बदलाव होते हैं। अगर इस दौरान आप उदासी और अकेलेपन जैसी चीजें महसूस कर रहे हैं तो मदद के लिए डॉक्टर से जरूर बात करें। क्योंकि कुछ बातों का ध्यान रखते हुए इस दौर को थोड़ा आसान और बेहतर बनाया जा सकता है। एंड्रोपॉज के दौरान टेस्टोस्टेरोन रिप्लेसमेंट थेरेपी के जरिये भी इसके लक्षणों में सुधार किया जा सकता है।
टेस्टोस्टेरॉन थेरेपी से कम हो सकता है हार्ट अटैक का खतरा
बोस्टन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन के एक्सपर्ट की रिसर्च के अनुसार जो पुरुष टेस्टोस्टोरोन हार्मोन बढ़ाने का इलाज करवाते हैं उनमें दिल की बीमारियों का रिस्क कम हो जाता है। ये स्टडी टेस्टोस्टोरोन थेरेपी का इलाज करवाने वाले 255 पुरुषों के बीच की गई। इस दौरान पांच सालों तक उनकी सेहत पर नजर रखी। रिसर्च में देखा गया कि इन पुरुषों के बैड कोलेस्ट्रॉल का स्तर कम हुआ और गुड कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ा, जिससे हाइपरटेंशन और कार्डियोवास्कुलर बीमारी का रिस्क कम हुआ है।
इन बातों का रखें ध्यान

50 साल की उम्र के बाद पुरुष अपनी सेहत को लेकर ज्यादा अलर्ट रहे। में आहार में सप्लीमेंट्स, आयरन और फाइबर वाले फूड शामिल होना चाहिए।
कैल्शियम हड्डियों को मजबूत बनाने और आयरन शरीर में रक्त का प्रवाह बनाए रखता है। इससे ब्लड वेसल्स का वॉल्यूम बनाए रखने में मदद मिलती है।
एंड्रोपॉज में पुरुष तनाव से दूर रहने की कोशिश करें। वरना डिप्रेशन हो सकता हैं।
उम्र के इस पड़ाव में महिलाओं की तरह ही पुरुषों को भी खास देखभाल की जरूरत होती है। इसलिए सेहत भरी खुराक लें।

(साभार – दैनिक भास्कर)

21वीं सदी में विश्व का मार्गदर्शन कर सकती है हिन्दी- प्रो. चक्रधर त्रिपाठी

कोलकाता : राष्ट्रीय पुस्तकालय कोलकाता द्वारा 1 से 14 सितंबर के दौरान हिंदी पखवाड़ा का आयोजन किया गया। पखवाड़े का शुभारंभ 1 सितंबर से हिंदी प्रतियोगिताओं के साथ किया गया जो 14 सितंबर तक जारी रहा। इस अवधि में संस्थान के हिंदी भाषी तथा हिंदीतर भाषी अधिकारियों/कर्मचारियों/ पाठकों तथा परिजनों के लिए अलग-अलग हिंदी प्रतियोगिताएं आयोजित की गईं। संस्थान के कर्मचारियों हेतु निबंध लेखन, टिप्पणी-आलेखन एवं पत्राचार, हिंदी टंकण, आशुभाषण, कविता पाठ प्रतियोगिता तथा पाठकों एवं परिजनों के लिए आशुभाषण प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। इन प्रतियोगिताओं में प्रतिभागियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।

हिंदी पखवाड़े का समापन समारोह संस्थान के भाषा भवन के सम्मेलन कक्ष में दिनांक 14 सितंबर 2021 को हिंदी दिवस समारोह के साथ संपन्न हुआ। उक्त समारोह में बतौर मुख्य अतिथि प्रो. चक्रधर त्रिपाठी, विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, विश्वभारती विश्वविद्यालय, प. बं. तथा बतौर विशिष्ट अतिथि सेनानिवृत प्रो. एच. आर. मीणा, केंद्रीय हिंदी संस्थान, क्षेत्रीय प्रभारी उपस्थित थे, जिसकी अध्यक्षता प्रो. अजय प्रताप सिंह, महानिदेशक, राष्ट्रीय पुस्तकालय, कोलकाता ने किया। मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथि और अध्यक्ष ने विभिन्न हिंदी प्रतियोगिताओं के विजेताओं को पुरस्कार स्वरूप नकद राशि और स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया। प्रत्येक प्रतियोगिता के विजेताओं को क्रमश: प्रथम पुरस्कार स्वरूप दो हजार रुपये नकद, द्वितीय पुरस्कार एक हजार पांच सौ रुपये नकद और तृतीय पुरस्कार एक हजार रुपये नकद तथा 24 प्रतिभागियों को सांत्वना पुरस्कार के रूप में प्रति प्रतिभागी सात सौ रुपये का नकद पुरस्कार भी दिए गए।

मुख्य अतिथि ने अपने संबोधन में कहा कि हिंदी अत्यंत सहज एवं सरल भाषा है। इसको बोलना भी सहज है और लिखना भी। इसलिए हमें अपनी भाषा को गौरवान्वित करना होगा तभी हम विश्व का मार्गदर्शन कर सकते हैं। क्योंकि भारत का उदय ही मानवता के उत्थान के लिए हुआ है। उत्थान हम तभी कर सकते हैं जब अपनी भाषा यानी हिंदी को गौरवान्वित करेंगे। और यह आज की जरूरत भी है। 21वीं सदी में विश्व का मार्गदर्शन हिंदी ही कर सकती है। वहीं विशिष्ट अतिथि ने हिंदी को केवल राष्ट्रीय मंच पर ही नहीं बल्कि विश्व स्तर पर हिंदी को स्थापित करने के लिए कर्मचारियों से हिंदी के प्रयोग पर बल देने के लिए आवाह्न किया।
अपने अध्यक्षीय संबोधन में महानिदेशक महोदय प्रो. अजय प्रताप सिंह ने हिंदी प्रतियोगिताओं के विजेताओं को बधाई दी एवं हिंदी पखवाड़ा आयोजन समिति के सदस्यों को पखवाड़े के सुचारु ढंग से संचालन के लिए धन्यवाद दिया। साथ ही उन्होंने सभी कर्मचारियों से राजभाषा कार्यान्वयन से जुड़े नियमों के अनुपालन हेतु आग्रह किया। समारोह के अंत में सुनील कुमार, प्रभारी, हिंदी अधिकारी ने सम्मेलन कक्ष में उपस्थित मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथि, अध्यक्ष, कर्मचारियों, प्रतिभागियों, संयोजक एवं संचालक का धन्यवाद ज्ञापन किया। हिंदी पखवाड़ा से संबंधित समारोह का मंच संचालन तथा सभी प्रतियोगिताओं का समन्वयन विनोद कुमार यादव, कनिष्ठ हिंदी अनुवादक, राष्ट्रीय पुस्तकालय द्वारा किया गया।

पीड़ा को शब्दों में संजोकर कविता रचने वाली रानी चावड़ी

प्रो. गीता दूबे

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों स्त्री वह चाहे रानी हो या बांदी, उसकी सबसे बड़ी पहचान यही होती है कि वह स्त्री है। भले ही तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में मंथरा के मुख से कहलवाया हो- 

“कोउ नृप होउ हमहि का हानी। चेरि छाड़ि अब होब कि रानी॥”

 लेकिन यह अंतर तो ऊपर का है। थोड़ा गहराई में उतर कर देखें तो हर स्त्री अपने हिस्से में दासत्व या सेवा के व्रत के सौभाग्य अथवा दुर्भाग्य के साथ जन्म लेती है। इस नियति को बदलना बहुत ही मुश्किल और चुनौतीपूर्ण है। सखियों, आज मैं आपको एक रानी की कथा सुनाऊंगी और यह निर्णय आप पर ही छोड़ती हूं कि उस रानी की नियति साधारण स्त्री से अलग है या नहीं।

जोधपुर के महाराजा मानसिंह की दूसरी पत्नी थी, रानी चावड़ी जी। अब राजा तो राजा होता है। राज्य विस्तार के लिए या राजनीतिक अभिसंधियों के लिए एकाधिक विवाह कर सकता है। इतिहास के विशेष कालखंडों में बहुविवाह की प्रथा भी विद्यमान थी। साथ ही राजा या सामंत विवाह के अलावा भी एकाधिक संबंध रख सकता था। इसे मध्ययुग के प्रचलित सामाजिक नियमों के विरुद्ध भी नहीं माना जाता था बल्कि इससे उसकी शान में वृद्धि ही होती थी। लेकिन दूसरी, तीसरी या चौथी पत्नी होने का दर्द क्या होता है, यह तो स्त्री ही जानती है। जिस समाज में पति के बिना स्त्री की कोई अलग पहचान नहीं है वहाँ पति की नजर और ह्रदय में बने रहने के लिए कितने उपक्रम करने पड़ते होंगे, इसकी तफसील तो रानियों के ह्रदय में छिपी पड़ी है। कहीं- कहीं इस पीड़ा को शब्द भी मिले हैं। रानियों के भीतर अगर रचानात्मक क्षमता होती थी तो वह अपने सुख- दुख, विरह- व्यथा को शब्दों का जामा पहनाकर दुनिया के सामने साकार रूप दे देती थीं। 

रानी चावड़ी जी भी पद्य और गीत रचती थी। इतिहासकारों के अनुसार राजा मानसिंह ने कुल तेरह विवाह किए थे। कवयित्री प्रताप कुंवरी बाई भी इनकी पत्नी थीं। इसके साथ ही उनकी कई रक्षिताएं भी थीं। ऐसे में पत्नियों की भीड़ में शामिल रानी के कवि ह्रदय ने वियोग के गीत रचकर अपनी पीड़ा को अभिव्यक्ति दी। हालांकि यह माना जाता है कि वे पति के ह्रदय के निकट और उन्हें प्रिय थीं लेकिन इसके बावजूद पति से दूरी का अनुभव उन्होंने अवश्य किया होगा। प्रिय की प्रतीक्षा में ‌व्याकुल प्रिया की पीड़ा और मिलन की आकांक्षा इस पद में साकार हो उठीं है-

“बेगा नी पधारो म्हारा आलीजा जी हो।

 छाती सी नाजक धन रा पीन।।

ओ सावणियो उमंग्यो छै।

हरिजी ने ओडण दिखणी चरि।।

इण औसर मिलणो कद होसी।

लाडी जी रो थांपर जीव।।

छोटी सी छण रा नाजक पीजी।”

रानी चावड़ी की रचनाओं का कोई संकलन नहीं मिलता, संभवतः उनका संकलन हुआ ही ना हो। हाँ, यत्र तत्र बिखरे उनके कुछ पद अवश्य मिलते हैं। राजस्थानी साहित्य पर शोध करने वाले लेखकों के आलेखों में भी उनके पदों और गीतों के उद्धरण मिल जाते हैं।‌ रानी ने कुछ विवाह गीतों की रचना भी की थी। उनकी विडंबना तो देखिए कि बहुविवाह करने वाले पति के विवाह के अवसर के लिए भी उन्होंने गीतों की रचना की और‌ स्वयं गाया भी। डॉ. सुमन राजे की पुस्तक “इतिहास में स्त्री” में उनका ऐसा ही एक गीत संकलित है। पत्नी की स्थिति देखिए, पति फिर से केसरिया पाग बाँध कर विवाह के फेरे लेने जा रहा है और पत्नी इस मंगल अवसर पर त्याग और समर्पण का मूर्तिमान स्वरूप बनी, ह्रदय में अश्रु और‌ अधरों पर मुस्कान सजाए पूरे उछाह के साथ मंगल गीत गा रही है-

“चाली मृग नैणियाँ जी चम्पा ब्याहियाँ।

उठे लाल तम्बूड़ा तणियाँ

पनी सुमरे संगरा साथी

ज्यू माला रा मणियाँ 

रसीलों राज नींद मदमाती।

सुख समाज रंग वणियाँ

फेर बँधावण चालो सखी

पिव केसरिया वणियाँ।

महाराज मानसिंह का शासन काल 1803 से 1843 तक माना जाता है। तकरीबन यही समय रानी चावड़ी जी की रचनात्मक सक्रियता का भी माना जा सकता है। दुख इस बात का है कि रानी के जीवन का अंत बेहद दुखद रहा। साहित्यप्रेमी, कवि और कलानुरागी एवं दानवीर के रूप में ख्यात महाराजा मानसिंह जिनका जीवन काफी विलासितापूर्ण था, के विरुद्ध उनके पुत्रों के मन में विरोध की अग्नि सुलगने लगी। फलस्वरूप उन्होंने विलासी पिता के प्रति विद्रोह का बिगुल बजाया। रानी ने भी संभवतः पुत्रों का ही साथ दिया जिसका दारुण परिणाम भी उन्हें झेलना पड़ा। डा. सावित्री सिन्हा ने अपनी पुस्तक “मध्यकालीन हिन्दी कवयित्रियाँ” में लिखा है कि कवयित्री पत्नी को उनके राजा पति ने ही उनके ही शयनकक्ष में कैद कर दिया। शयन कक्ष काल कोठरी में बदल गया जहाँ भूख प्यास से तड़प- तड़प कर रानी ने प्राण त्याग दिये। इतिहास विरोध करनेवाली स्त्रियों को ऐसी ही सजा देता है ताकि पूरी स्त्री जाति को सबक मिल सके। सखियों, यह समय उन ऐतिहासिक सबकों से सीख लेकर डर- डर कर जीने का नहीं बल्कि नया इतिहास रचने का है। रानी चावड़ी जी जैसी कवयित्री को नमन करते हुए, उनके रचनात्मक अवदान के प्रति श्रद्धा प्रकट करते हुए, उनके पदों को पढ़ते हुए हमें उनके प्रति समादर अवश्य प्रकट करना चाहिए लेकिन उनकी नियति के प्रति विद्रोह की आवश्यकता भी है। वह नियति आज की स्त्री की नियति नहीं होनी चाहिए। पितृसत्तात्मक समाज की स्त्री विरोधी मानसिकता के खिलाफ हमें एकजुटता के साथ डट कर खड़े होने की आवश्यकता है। तभी स्त्रियों की पारंपरिक दुखद नियति में परिवर्तन आएगा। समाज आखिर कब तक स्त्री की आवाज़ दबाता रहेगा। एक ना एक दिन उसे स्त्री की बात सुननी ही होगी और स्वीकारने के लिए भी प्रस्तुत होना होगा।

 

जोड़ियों के लिए अनूठा रोमांचक अनुभव रहा ‘एमडीजेस जोड़ी नम्बर 1’

महावीर दान्वर ज्वेलर्स और सन्मार्ग ने किया आयोजन
कोलकाता : महावीर दान्वर ज्वेलर्स और सन्मार्ग ने जोड़ियों को हाल ही में शानदार अनुभव देते हुए एक अनूठी प्रतियोगिता ‘एमडीजेस जोड़ी नम्बर 1’ आयोजित की। यह भारत में आयोजित की गयी अपनी तरह की पहली प्रतियोगिता थी। आज का आधुनिक युवा कोर्टशिप और शादी के पूर्व होने वाले समारोहों को खूब पसन्द करता है और उसका आनन्द भी उठाता है। एमडीजे सगाई कर चुके जोड़ों के लिए उनके विवाह तथा अन्य अवसरों को ध्यान में रखकर उनकी पसन्द के आभूषण चुनने का अवसर देता रहा है। पूरी प्रतियोगिता इस बात को ध्यान में रखकर आयोजित की गयी।
‘एमडीजेस जोड़ी नम्बर 1’ प्रतियोगिता गत 15 जनवरी 2021 को आरम्भ हुई थी और इसका ग्रांड फिनाले आईटीसी रॉयल बंगाल में आयोजित किया गया। प्रतियोगिता के निर्णायकों में अभिनेत्री ऋचा शर्मा, सेलिब्रिटी साड़ी ड्रेपिस्ट एवं स्टाइलिशस्ट डॉली जैन, प्रख्यात प्रेरक वक्ता यानी मोटिवेशन स्पीकर नैना मोरे शामिल थीं। इस अवसर पर अतिथियों में लोपामुद्रा मण्डल साहा, मॉडल एडोलिना गांगुली, मोहर दत्ता समेत कई अन्य अतिथि उपस्थित थे।
प्रतियोगिता में हर सप्ताह सगाई कर चुकी जोड़ियों से उनके कोर्टशिप के समय की खास युगल तस्वीर माँगी गयी थी और सर्वश्रेष्ठ तस्वीरों का चयन किया गया था। सभी चयनित प्रतिभागी जोड़ियों को स्क्रीनिंग के दौर से गुजरना पड़ता था। हर सप्ताह जोड़ियों का चयन होता था और विजेता जोड़ियाँ एमडीजे के शोरूम से डिस्काउंट वाउचर प्राप्त करती थीं। ग्रांड फिनाले में 9 जोड़ियों का चयन हुआ। प्रतियोगिता 3 माह तक चली। हर महीने चयनित ‘जोड़ी ऑफ द मंथ’ एवं फाइनल जीतने वाली विजेता जोड़ी का फोटोशूट महाबीर दान्वर ज्वेलर्स के स्टोर में हुआ। सगाई के बन्धन में बंध चुकी जोड़ियों ने महाबीर के आभूषण पहने और विजेता जोड़ी को आई फोन 12 (64जीबी) उपहार के रूप में दिया गया। प्रत्येक रनर अप जोड़ी (संख्या में 4) को पंचसितारा होटल में डेट डिनर उपहार के रूप में मिला।
महाबीर दान्वर ज्वेलर्स के निदेशक विजय सोनी ने प्रतियोगिता को एक चुनौतीपूर्ण अनुभव बताया। उन्होंने कहा, ‘यह सचमुच एक चुनौतीपूर्ण अनुभव था फिनाले यानी अंतिम चरण के लिए 5 जोड़ियों को चुनना बहुत कठिन था। रोज आवेदन आते थे। प्रतिभागियों को स्क्रीनिंग और पेशेवर फोटोशूट के लिए स्टोर में बुलाया जाता था। एमडीजे के साथ एक कॉफी राउंड एवं प्रश्न -उत्तर सत्र भी चला।’ इसके बाद प्रतियोगियों को गिफ्ट हैम्पर्स उपहार के रूप में दिये जाते थे। जोड़ियों को उनके विवाह के लिए सर्वश्रेष्ठ आभूषण चुनने में सहायक आवश्यक परामर्श भी दिये जाते थे।’
फिनाले को लेकर सन्मार्ग की निदेशक ‘रुचिका गुप्ता ने कहा ‘सन्मार्ग इस नवोन्मेषी यानी नये विचार के साथ आया है और आज के युवाओं के साथ एक मजबूत रिश्ता कायम करना चाहता है। इस चरह के कार्यक्रमों से आज के युवाओं को समझने में मदद मिलती है और कल और आज के समय के अन्तर को भी समझा जा सकता है।
अभिनेत्री ऋचा शर्मा ने कहा ‘एमडीजे जोड़ी नम्बर 1′ एमडीजे और सन्मार्ग द्वारा आय़ोजित जाने वाला एक शानदार कार्यक्रम था जो युवा जोड़ियों के सम्बन्धों को और मजबूत करेगा। शुरुआती चरणों में हमने सौहार्द सीखा और ग्रैंड फिनाले में इन्होंने अपनी क्षमता को साबित किया।’
सेलिब्रिटी साड़ी ड्रेपिस्ट और स्टाइलिस्ट डॉली जैन ने कार्यक्रम की सराहना करते हुए कहा ‘ ग्रैंड फिनाले के लिए जोड़ी का चयन करना बहुत कठिन था। मेरे लिए हर एक जोड़ी विशेष और सर्वश्रेष्ठ थी। मैं कहना चाहूँगी कि एमजीजे और सन्मार्ग द्वारा आयोजित यह प्रतियोगिता दिल को छू लेने वाली रही। सभी जोड़ियाँ समान रूप से श्रेष्ठ थीं और उनका प्रदर्शन बेहतरीन था। ‘
सेलिब्रिटी प्रेरक वक्ता नैना मोरे ने कहा, ‘मैं इन जोड़ियों को देखकर रोमांमचित हूँ और सभी स्वर्ग में बनायी गयी जोड़ियाँ हैं। जिस तरीके से कार्यक्रम की योजना बनी और एमडीजे ने जिस प्रकार से इसे आयोजित किया, वह इसे अलग बनाता है। मैं उनको शुभकामनाएँ देती हूँ।’
विजेताओं की सूची
विजेता
1. आकाश जायसवाल एवं ऋतु सराफ
सांत्वना पुरस्कार
1. निखिल बेंगानी एवं हर्षिता झँवर (प्रथम रनर अप)
2. मुकुन्द राठी एवं प्रिया हलवाई (द्वितीय रनर अप)
3. रजनीश कुमार श्रीवास्तव एवं नर्मदा श्रीवास्तव (तृतीय रनर अप)
4. गिरीश अग्रवाल एवं निकिता अग्रवाल – (चतुर्थ रनर अप)
5. रोहित सुराणा एवं यांकी सेठिया (पंचम रनर अप)

एक्जिक्यूटिव पैलेस कॉम्प्लेक्स का प्रथम गणपति उत्सव सम्पन्न

कोलकाता : कोविड -19 की परिस्थितियों के बीच सभी नियमों का पालन करते हुए एक्जिक्यूटिव पैलेस कॉम्प्लेक्स में पहली बार गणपति उत्सव आयोजित किया गया । महामारी की विकटता को देखते हुए गत वर्ष पूजा का आयोजन सम्भव नहीं हो सका था। इस बार स्थितियाँ बेहतर रहीं। अतएव इस कॉम्प्लेक्स में उत्सव का आयोजन पहली बार किया गया। कोरोना सम्बन्धी सावधानियों का पालन करते हुए महानगर के बागुईआटी इलाके में वीआईपी रोड स्थित इस कॉम्प्लेक्स में आयोजित प्रथम गणपति उत्सव की जानकारी कॉम्प्लेक्स के सचिव अंकित अग्रवाल ने दी। उन्होंने कहा कि गणपति पूजा आयोजित करने का निर्णय अंतिम क्षणों में लिया गया इसलिए इस वर्ष गणपति बप्पा की प्रतिमा खरीदी गयी है। अगले वर्ष से निर्धारित समय से पूर्व उत्सव की तैयारी की जाएगी। गणपति उत्सव देश के पश्चिमी राज्यों में मनाया जाता है परन्तु बंगाल में भी गणपति पूजा लोकप्रिय हो चुकी है। गौरतलब है कि गत 18 माह में आइसोलेशन की स्थिति बनी हुई है। गणपति पूजा को आयोजित करने में कॉम्प्लेक्स के सचिव अंकित अग्रवाल के अतिरिक्त कोषाध्यक्ष एम. पी. अग्रवाल और अध्यक्ष पी. एल. दास एवं कमेटी के अन्य सदस्यों का सहयोग रहा।

कन्हैया लाल सेठिया…रचनाकर्म पर कुछ बातें

– डॉ. वसुंधरा मिश्र

रेगिस्तानी धरती से निःसृत साहित्य सपूत,
विधाता ने दिया वाक् शक्ति का मंगल वरदान,
सुरभित है आपका संपूर्ण सृजन संसार,
गूंँजे विश्व में आपका सदैव यश कीर्ति गान।

बंगाल की धरती से मुझे भी जुड़ने का अवसर मिला और सेठिया जी का आशीर्वाद मिला, जिसे मैं अपना सौभाग्य समझती हूँ । राजस्थान मेरी जन्म स्थली, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय शिक्षा स्थली और बंगाल कार्य स्थली के रूप में तीन प्रदेशों की संस्कृति से जुड़ी । मातृभाषा हाड़ौती, सहयोगी हमजोली भाषा शेखावाटी, अन्य भाषाओं में भोजपुरी, बांग्ला एवं राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी और संपर्क भाषा अंग्रेजी से मेरा गहरा संबंध है। बोलचाल और साहित्य में हिंदी भाषा रची बसी हुई है।
सेठिया जी बराबर कहते थे मायण भाषा कदै नहीं छोड़नी चाए। आपणी भाषा में ही सो क्यूँ है? घर में ही बोलो। पर विडंबना ऐसी रही कि मैंने किसी को नहीं छोड़ा लेकिन हिंदी ने हमपर एकाधिकार जमा लिया।
यह सच है कि मायण भाषा में बोलने वालों की कमी आती जा रही है और यही कारण है कि हम डरे हुए भी हैं कि धीरे-धीरे कहीं भाषा का भी वैश्वीकरण न हो जाए। बचाने की कोशिश तो चल रही है।
माता- पिता ही हैं, जो ये काम आगे बढा़ सकते हैं। वैसे तो परिवार, धर्म, ईश्वर, पूजा- पाठ, रीति-रिवाज भी जन्म के अनुसार नहीं हो रहे हैं और न ही कर्म अनुसार ही।
कलकत्ता में बांग्ला भाषा की स्थिति अच्छी थी। अब वह भी कोलकाता बनने में लगा हुआ है। बड़ा बाजार अभी भी मीनी राजस्थान के रूप में अपनी भूमिका निभा रहा है। बहुत से परिवार कोलकाता के दूसरे अंचलों में बसते जा रहे हैं। आधुनिक पीढ़ी के सोचने का तरीका और सोच में परिवर्तन इसका मुख्य कारण है।
सेठिया जी के जन्म की बात करें तो उनका जन्म सुजानगढ चुरु राजस्थान में 11 सितंबर 1919 में हुआ। पिता छगनलाल सेठिया और माँ मनोहारी देवी की संतान के रूप में सुपुत्र कन्हैयालाल ने अपने कुल का नाम रौशन किया।
1937 में धापू देवी के साथ विवाह बंधन में बंधे। मात्र 19 वर्ष की आयु में ही विवाह हुआ। एक युवा का उत्साह और सपने लिए सेठिया जी उसी राजस्थान की मिट्टी के सपूत थे जिस मिट्टी में महाराणा प्रताप के आत्म गौरव और देशभक्ति के मंत्रों की ध्वनि की टंकार गूंजती रहती है।
महाकवि सेठियाजी उसी राजस्थान की धरती से जन्मे वे रत्न हैं जिनकी ये पंक्तियाँ महाराणा प्रताप के मातृभूमि प्रेम की तरह ही अजर-अमर हैं – –
धरती धोरां री
आ तो सुरगां न सरमावे
इ पर देव रमण न आवे
इरा जस नर नारी गावे
धरती धोरां री।
इस गीत में पूरा राजस्थान समाया हुआ है जो अद्भुत है।
महाकवि सेठियाजी कलम के सिपाही थे जिन्होंने राजस्थान में सामंतवाद को समाप्त करने के लिए जबर्दस्त मुहिम चलाई और पिछड़े वर्ग को आगे लाने के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया।
राजस्थान के स्वतंत्रता सेनानी पुरस्कार से सम्मानित सेठिया जी की कलम की ताकत किसी देशप्रेमी रण बांकुरे से कम नहीं थी। उनकी रचना’ जागो जीवन के अभिमानी’ की ये पंक्तियाँ – –
लील रहा मधु ऋतु को पतझर
मरण आ रहा आज चरण धर
कुचल रहा कलि कुसुम
कर रहा अपनी ही मनमानी
जागो जीवन के अभिमानी
देश वासियों को जागरूक करने का ही आह्वान इन पंक्तियों में मिलता है।
‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान सेठिया जी करांची में थे। सन् 1943 में कवि महान नेताओं जयप्रकाश नारायण और राममनोहर लोहिया के संपर्क में भी रहे।
सुदूर पश्चिम से आकर बंगाल की धरती के प्रति भी सेठिया जी की सहृदयता और संवेदनशीलता एक बच्चे का अपनी माँ के प्रति जुड़ाव की तरह ही था। दोनों ही प्रदेशों की सांस्कृतिक और भाषिक धरातल से जुड़े रहे।
जिस समय सेठिया जी का रचना कर्म अपने सृजन के परवान चढ़ रहा था उस समय नवजागरण काल विकास की सीढ़ियों पर कुलांचे भर रहा था।
वैसे तो अपने लंबे सृजनात्मक अनुभवों को सेठिया जी ने अपने बहुविध काव्य संसार में समेटा है।आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रवर्तक भारतेंदू हरिश्चंद्र ने भाषा की परिवर्तन शीलता को बहुत पहले ही भांप लिया था जिसका परिणाम हम देख रहे हैं – –
निज भाषा उन्नति अहै सब भाषा को मूल,
बिन निज भाषा ज्ञान के मिटै न हिय को शूल। इसकी स्थापना तो हो रही थी। हिंदी मुख्य धारा में प्रवेश करने लगी थी। निज भाषा अर्थात् मायण भाषा को सेठिया जी ने प्रमुखता से अपने जीवन में धारण किया। भाषा भारतीय संस्कृति की आत्मा है। सेठिया जी अंत तक अपनी भाषा के गौरव के लिए तत्पर रहे। इसी कारण आज भी हम उनको पढ़ रहे हैं।
कविर्मनीषी सेठिया जी एक सेनानी, सामाजिक कार्यकर्ता, सुधारक परोपकारी और पर्यावरणविद भी रहे। वे स्वयं मानते हैं कि केवल रचना करके कवि अपने दायित्वों से मुक्त नहीं हो सकता, उसका संदेश पूरे विश्व से जुड़े तभी उसकी सार्थकता है।
सेठिया जी समाज के साथ चलने वाले व्यक्ति रहे हैं। खादी वस्त्र धारण करना, दलित उद्धार में लगना, राष्ट्र भक्ति से ओतप्रोत रचनाएँ लिखना उनके लेखन के अंग रहे हैं।
मुक्तिबोध की “चकमक की चिंगारियां” की ये पंक्तियाँ उद्धृत करना चाहूँगी – – – –
नहीं होती, कहीं भी ख़त्म कविता
नहीं होती कि वह आवेग त्वरित काल यात्री है
व मैं उसका नहीं है कर्ता,
पिता धाता
कि वह अभी दुहिता नहीं होती
परम स्वाधीन है, वह विश्व शास्त्री है। (चाँद का मुँह टेढ़ा है, पृष्ठ. 155)
1942 में गाँधी जी ने’ करो या मरो’ का आह्वान किया। उस समय सेठियाजी का काव्य संग्रह ‘अग्नि वीणा’ प्रकाशित हुई। बीकानेर में इस पर राजद्रोह का मुकदमा चला। बाद में तो राजस्थान सरकार ने इन्हें स्वतंत्रता सेनानी का सम्मान प्रदान किया। ऐसे साहित्य सेवी और देश भक्त कवि की काव्य यात्रा को दो काल- खंडों में देखा जा सकता है – सन् 1936-1975 प्रथम और द्वितीय सन् 1976 – 2005 की रचनाधर्मिता।
14 राजस्थानी, 20 हिंदी, 2 उर्दू में रचनात्मक साहित्य के रचयिता कविर्मनीषी को सन् 1976 से जो पुरस्कार मिलने का जो सिलसिला शुरू हुआ वह सन् 2005 तक मिलता चला गया ।साहित्य अकादमी, डॉ तेस्सीतोरी स्मृति स्वर्ण पदक, साहित्य मनीषी, मूर्ति देवी पुरस्कार, सूर्य मल्ल मिश्रण शिखा पुरस्कार, टांटिया पुरस्कार, पृथ्वीराज राठौड़ पुरस्कार और अनगिनत पुरस्कार। मिले। 2004 में पद्मश्री से सम्मानित हुए।
कवि के रचना संसार पर दृष्टि डालें तो जिन देश काल की परिस्थितियों से भी गुजरना होगा।
देश की राष्ट्रीय सांस्कृतिक काव्य धारा जो प्रमुख धारा रही, सेठिया जी को वहाँ से जोड़ कर देखा जा सकता । यह धारा सन् 1857 की क्रांति के बाद से ही शुरू हो गई थी। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय हलचलों ने भी राष्ट्रीयता को प्रभावित किया। भारतेंदु युग में जहाँ औपनिवेशिक सत्ता के लूट को उजागर किया जा रहा था, वहीं द्विवेदी युग में राष्ट्र वाद को प्रतिष्ठा दी जा रही थी।
गाँधी के आगमन के बाद भारतीय राजनीति में नरमदल का प्रभाव बढा़ और कविता भी आत्मपीड़न को नरमी के साथ अभिव्यक्त करने लगी। लेकिन भारतीय राजनीति में गरम दल के प्रभाव, रूस की क्रांति की सफलता, भारत में वामपंथ की स्थापना आदि के बाद कविता ओजपूर्ण और बुलंद स्वर के साथ राष्ट्र मुक्ति में भागीदारी निभाने लगी।
रामधारी सिंह ‘दिनकर ‘, गोपाल सिंह नेपाली सोहनलाल द्विवेदी आदि की राष्ट्रीय चेतना से ओतप्रोत कविताएँ आ रही थीं।
1930-35 से लेकर 1947-48 और उससे आगे सन् 1962 तक देश के विभिन्न भूखंडों और जनवृत्तों में तरह-तरह की घटनाएँ घटीं।
बंगाल में अकाल, द्वितीय महा युद्ध का प्रभाव, नौ सेना विद्रोह आदि बहुत सी घटनाएँ घटीं।
फिर 1942 की शहादत, देश का आजाद होना विभाजन दंगे अंग्रेजी हुकूमत से मुक्त हुए लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री का राजनीतिक मोहभंग आदि घटनाओं की निरंतरता।
स्वदेशी शासन व्यवस्था में जिस तरह की कामना लेकर उस समय कवि बढे़ थे, उनकी कामनाओं और सपनों पर तुषारापात हो गया। मगर प्रतिबद्ध रचनाकार विचलित नहीं हुए, डटे रहे।
मैत्री का समझौता कर लेने के बावजूद सन् 1962 में चीन ने भारत पर हमला कर दिया और लद्दाख में 15-20 हजार वर्ग किलोमीटर भूमि पर कब्जा कर लिया।
‘इस धोखे का नाम दोस्ती है और इस दोस्ती को हम चीन कहते हैं।’ ऐसी ही कविता हर देश भक्त कवि की लेखनी से निकल रही थी।
सेठिया जी ने अपने जीवन काल में आजादी से पहले, आजादी के बाद और आजाद भारत में आधुनिक भारत के बनने की प्रक्रिया को भी देखा।उनके काव्य में गाँव, प्रकृति, समाज, राष्ट्र, अनिष्ट से लड़ना वर्तमान को सुधारना, वर्ग संघर्ष, मातृभूमि के प्रति प्रेम आदि के साथ धर्म, दर्शन और अध्यात्म का सुंदर समायोजन मिलता है। कहीं कोई दुराव छिपाव नहीं है। प्रेम और उदारता का नाटक नहीं है। यही निश्छलता सेठिया जी के रचना संसार को दीर्घकालिक बनाती है।
पहला काव्य संग्रह दीपकिरण 1954 में आता है। 1947- 1967 के बीस वर्षों की नीति देखकर तैयार हुई इस नयी पीढ़ी का रोष पूर्ववर्ती की तुलना में थोड़ा तल्ख लेकिन विचार पद्धति सुदृढ़ और सुविचारित हुई। यहाँ तक आते आते कविता की भाषा में प्रहार बढ़ गया। धूमिल, रघुवीर सहाय आदि की कविताओं में वे कहते हैं –
न टूटे न टूटे तिलस्म सत्ता का
मेरे अंदर एक कायर
टूटेगा टूट
मेरे मन टूट मत
झूठ मूठ ऊब मत रूठ
आस्था का लौट आना, मन के भीतर बैठे कायर को टूटने की आज्ञा देना उस समय की बड़ी घटना थी। कविता में कवि का यही आत्म संकल्प हिंदी को प्रगतिशील जनवाद से आगे फिर समकालीन कविता से जोड़ता है।
प्रगति चेतना लोकमंगल की भावना और मानव प्रेम की यह धारा नयी पीढ़ी भी बनी और अपनी नयी चिंतन पद्धति का उत्तरदायित्व का सौंप गए।
सेठिया जी की कविताओं में परंपरागत और आधुनिकता के बीच द्वंद्व समय परिवेश की समस्याएँ चिंता संघर्ष आदि बहुत विषयों का विस्तार है।

क्रमशः

कलम सिर्फ चलती है 

डॉ. वसुंधरा मिश्र

कलम एक ऐसा माध्यम है जो दुनिया को अपनी मुट्ठी में भी कैद कर सकता है और ऐसा समाज भी निर्मित कर सकता है जहाँ लोग अमन-चैन से जीवन बिता सकते हैं। कलम चलाता कौन है? हमारे शास्त्रों को किसने लिपि दी? अलग- अलग भाषाओं में हमने पत्थरों से लेकर धातुओं पर लिखा। अपने विचारों को हर युग ने अपनी शर्तों पर लिखा।
भारत की संस्कृति बहुत पुरानी है। मुझे भाषा का बोलचाल वाला रूप याद आ रहा है। जानते हैं उसे ही सरस्वती या वाग्देवी या फिर वीणापाणी माँ भारती का रूप माना जाता है। भारत ही ऐसा देश है जहाँ लिखे शब्दों को ब्रह्म कहा गया है। लिखने के पहले कलम की पूजा करने की आवश्यकता है। ये संस्कार दिए जाते थे कि जो भी लिखा जाए समाज के कल्याण के लिए लिखा जाए।
जैसा हम सोचते हैं वैसा ही लिखते हैं। बचपन में स्लेट और बर्ता से लिखते थे, बाद में चॉक फिर बड़े हुए तो पेंसिल दी गई फिर पेन आया। कितनी ख्वाहिश रहती थी कि कब पेन मिलेगा। कभी पिताजी के पेन को चुरा लेते थे और उसकी पूरी स्याही घिस घिस कर खत्म कर देते थे।
स्याही की दवात में से पिचकू से भरते थे। कभी-कभी पेन में स्याही भरते समय जमीन पर गिर जाती थी, तब कोई छोटे कपड़े से जल्दी जल्दी पोंछ कर उस कपड़े को छिपा देते थे। स्याही का दाम 3-4 रुपया होगा। मुझे सही कीमत नहीं पता क्योंकि पिताजी लेकर आते थे।
कक्षा पाँच तक तो कलम के दर्शन नहीं हुए। क्योंकि उस समय तक हमलोग छोटे ही थे। वैसे तो बड़े होकर भी छोटे और नासमझ की ही श्रेणी में रखे जाते थे।
खैर, कक्षा छह में कलम मिली वह भी बिल्कुल सस्ती वाली। कलम की कामना करते करते कलम मिली। स्याही की नई दवात भी आई। कलम स्याही एक – दूसरे के पूरक हैं। एक नहीं, तो कलम रुक जाती थी।
लिखने-पढ़ने वाला हो या व्यवसायी हो या कवि लेखक कथाकार कोई भी हो उसकी जेब में कलम लगी रहती थी। नेताओं के कुर्तों की जेब में एक से एक महंगे और ब्रांडेड कलम करीने से लगा कर रखते हैं। ये बात अलग है कि वे लोग कौन- सी सोच से प्रजा को हांकते हैं। कोट में गोल्डन पेन का हुक बहुत अच्छा लगता था।
कलम एक बार खरीद लो और स्याही भर- भर कर चलाते रहो। हम कभी भी स्याही भरने में आलस्य नहीं करते थे। हॉं,परीक्षा के दौरान लिखते- लिखते जब स्याही खत्म हो जाती तब बहुत गुस्सा आता था। आजकल तो कलम फेंक कर दूसरे कलम ले लेते हैं।
कई बार तो नींब भी टूट जाती थी। पहले पिताजी की डांट खाओ फिर नीब लगवाकर लाते। बहुत बड़ा काम था। स्याही की तो बात ही निराली थी।
स्याही ने तो अपने रंग से हमलोगों को बहुत राहत दी थी। कक्षा में मित्रों के साथ लड़ने झगड़ने में स्याही छिड़क कर अपना बदला लेते रहते थे। काली और नीली स्याही हमलोगों के काम आती थी। बड़ा पक्का रंग था। कागज में पानी लगने से पूरा कागज नीला हो जाता था।
सुलेखा ब्रांड की स्याही की दवात न जाने कितनी खर्च हो गईं होगीं, याद भी नहीं है।
सच में, स्याही के कलम को बहुत सहेज कर रखे थे डिब्बों में, अब तो हर रोज प्लास्टिक के पेन को “यूज एंड थ्रो” के आधार पर फेंकते रहते हैं। पेन के अंदर की गाढ़ी इंक खत्म होने पर दूसरा पेन खरीद लेते हैं। पेन बहुत सस्ता और सुलभ हो गया है। अब तो वे जमाने लद गए जब कलम को पूजा में रखते थे और उसे सिर से लगाते थे। – –

“कलम के दिन अब फिर न आएंँगे
की – बोर्ड पर अंगुलियां थिरकती हैं
हवा से बात करते अनगिनत शब्द
न जाने किन किन विचारों के पुल गढ़ते हैं
लिखना कभी न होगा बंद
जब तक रहेगा मनुष्य विचार रहेंगे। “