आईआईटी से पढ़े दोस्तों ने ‘बीफॉरेस्ट’ नाम से स्टार्टअप शुरू किया है। जहां लोग नेचर में रहने के साथ परमाकल्चर फार्मिंग, यानी एक ही फार्मिंग लैंड पर एक साथ फल, सब्जियां, मसाले और अनाज उगा रहे हैं। इस अनूठे स्टार्टअप से पर्यावरण को तो फायदा हो ही रहा है। साथ ही उनकी अच्छी कमाई भी हो रही है। दोनों दोस्त सालाना 15 करोड़ रुपये का टर्नओवर कमा रहे हैं। इतना ही नहीं इस मुहिम के जरिए 200 से ज्यादा लोगों को रोजगार भी मिल रहा है।
37 साल के सुनीथ रेड्डी और 39 साल के शौर्य चंद्र हैदराबाद के रहने वाले हैं। सुनीथ ने कंप्यूटर साइंस की पढाई आईआईटी चेन्नई से की और शौर्य ने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग IIT रुड़की से करने के बाद आईआईएम अहमदाबाद से मैनेजमेंट किया। इसके बाद दोनों ने इंटरनेशनल कंपनी में काम किया, जहां उनकी अच्छी खासी तनख्वाह थी, बावजूद इसके उन्होंने कुछ अलग और नया करने का प्लान किया।
शौर्य चंद्र कहते हैं, ‘मैं और सुनीथ 13 साल से एक साथ काम कर रहे हैं और हमें शुरू से प्रकृति से बहुत लगाव रहा है। इसलिए हमने सोचा कि एक ऐसा काम शुरू कि जाए जो प्रकृति से जुड़ा हो। इस तरह से बीफारेस्ट स्टार्ट करने का आइडिया आया।’
सुनीथ बताते हैं स्टार्टअप का नाम ‘बी हैप्पी’ शब्द के तर्ज पर ‘बीफॉरेस्ट’ रखा। इसके पीछे हम लोगों को सन्देश देना चाहते हैं कि जिस तरह जीने के लिए खुश रहना जरूरी है उसी तरह प्रकृति के लिए जंगल और नेचुरल फार्मिंग भी जरूरी है। अगर प्रकृति से कुछ लेना है तो उसके साथ तालमेल बना कर रखना जरूरी है।
बीफॉरेस्ट में एक साथ एक ही जमीन पर कई तरह के फसलें उगाई जा सकती हैं। यानी फल, सब्जियां, मसाले, अनाज हर तरह की फसलों का लाभ लिया जा सकता है। बीफॉरेस्ट में एक साथ एक ही लैंड पर कई तरह के फसलें उगाई जा सकती हैं। यानी फल, सब्जियां, मसाले, अनाज हर तरह की फसलों का लाभ लिया जा सकता है।
शौर्य बताते हैं, “हमने स्टार्टअप से पहले रिसर्च किया, जिसमें पता चला बड़े किसानों की तुलना में छोटे किसानों को फार्मिंग से ज्यादा फायदा नहीं हो पता है। उसके कई कारण हैं- जैसे छोटे लैंड पर एक ही तरह की फसलों की फार्मिंग करना या मार्केट में उनकी फसलों का सही कीमत न मिलना। सभी के लिए बड़ी जमीन खरीद कर उस पर खेती करना संभव भी नहीं है। तब हमने छोटे-छोटे किसानों को एक साथ जोड़कर खेती करना शुरू किया।”
कन्वेंशनल फार्मिंग में एक ही तरह की फसल एक ही खेती योग्य जमीन तैयार की जाती है। जहां ज्यादा से ज्यादा उत्पाद के लिए केमिकल और पेस्टिसाइड्स के का इस्तेमाल किया जाता है, जबकि ‘परमाकल्चर’ इससे बिलकुल अलग है। परमाकल्चर में एक ही साथ एक ही फार्मिंग लैंड पर कई तरह की फसलें उगाई जाती हैं। इसमें केमिकल और पेस्टिसाइड का इस्तेमाल नहीं होता है। सुनीथ बताते हैं, “परमाकल्चर का सबसे बड़ा फायदा ये है कि एक फसल का बाई- प्रोडेक्ट दूसरी फसल को जल्दी उगाने में मदद करता है। इस तरह की फार्मिंग में फसलों को बाहर से न ही किसी तरह के केमिकल की जरूरत होती है और न ही मिट्टी का पोषण खत्म होता है। जैसे पेड़-पौधे प्रकृति से पोषण लेकर खुद ही बढ़ते हैं, वैसा ही परमाकल्चर में भी होता है।”
इसमें बहुत ही कम लागत में ज्यादा से ज्यादा उत्पादन किया जा सकता है। यहां कम संसाधन में प्राकृतिक रूप से फसल उगाया जा सकता है। सबसे अच्छी बात है कि साल भरा फार्मिंग लैंड पर किसी न किसी फसल का उत्पादन होता रहता है।
बीफारेस्ट में कई लोग जुड़ कर एक बड़ा फार्मिंग लैंड खरीदते हैं। फिर एक साथ बहुत ही कम लागत में ज्यादा से ज्यादा फसलों का उत्पादन किया जाता है। बीफारेस्ट का लैंड दिखने में किसी फारेस्ट की तरह ही दिखेगा। एक फूड फारेस्ट जहां जामुन, कटहल, संतरा, चेरी, कॉटन सिल्क, काली मिर्च और कॉफी सहित कई और फैसले उगाई गई होंगी। इस मुहिम से कोई भी जुड़ सकता है। सभी को शेयर भी बराबर का मिलता है।
सुनीथ बताते हैं,“पहले प्रोजेक्ट में शौर्य के अलावा, कुछ और लोग बीफॉरेस्ट से जुड़े थे। फार्मिंग के लिए हैदराबाद से पास किसी गांव में जमीन तलाशना शुरू कर दिया। हम सभी ने एक साथ जमीन के छोटे-छोटे हिस्सों पर काम करना शुरु कर दिया। पहले प्रोजेक्ट का रिजल्ट अच्छा रहा तो हमने अपने काम को और बढ़ाया। एक साल में हमारे प्रोजेक्ट में से काफी लोग जुड़ गए और धीरे-धीरे काम बढ़ता ही जा रहा है। फिलहाल बीफॉरेस्ट के चार प्रोजेक्ट हैदराबाद, मुंबई, कूर्ग और चिकमंगलूर में तकरीबन 500 एकड़ जमीन पर चल रहा है। जिसमें सुनीथ और शौर्य के साथ हर प्रोजेक्ट में अलग अलग साझेदार हैं।
प्रकृति के बीच रह कर प्राकृतिक संसाधनों की मदद से खेती होती है। ऐसे कई लोग हैं जो शहर की जिन्दगी छोड़, प्रकृति के नजदीक रहना चाहते हैं। यह स्टार्टअप उन्हें जंगल में रहने के साथ साथ कमाई करने में भी मदद मदद करता है। यहां पेड़-पौधे और फसल तो हैं हीं इसके अलावा घर भी परम्परागत तरीके से बने हैं जो पूरी तरह इको- फ्रेंडली होते हैं।
शौर्य ने कहते हैं, ‘हम यहाँ स्थानीय लोगों के साथ मिलकर काम करते हैं। इसलिए जो भी साझेदार गाँव में आकर रहना या काम करना चाहता है, वो इस बात का ध्यान रखता है कि यहां के लोग और उनके कल्चर को बढ़ावा मिले।’ सब एक साथ मिलजुल कर काम करते हैं
बीफॉरेस्ट में जमीन किसी एक व्यक्ति के पास न होकर परियोजना में शामिल सभी साझेदारों की होती है। सभी ग्रुप में मिलजुल कर काम करते हैं। एक ग्रुप के जरिए सभी किसानों को कैसे और क्या करना है, इसकी जानकारी दी जाती है। साथ ही खेती से होने वाली कमाई को कैसे आपस में बांटना है ये भी तय किया जाता है। शौर्य बताते हैं, “बीफारेस्ट स्थानीय किसानों को उनकी खेती की सही कीमत दिलाने और उन्हें सही बाजार में ले जाने में भी मदद करता है।
(साभार – दैनिक भास्कर)
2 दोस्तों ने शुरू किया फूड फॉरेस्ट, टर्नओवर 15 करोड़, दिये 200 रोजगार
18 साल के अस्थमा मरीज ने बनाया बेहद सस्ता एयर प्यूरीफायर
पढ़ाई के साथ अब लाखों का कारोबार
नयी दिल्ली : दिल्ली दुनिया के उन शहरों में शुमार है, जहां एयर क्वालिटी बहुत खराब है। ज्यादातर घरों में एयर प्यूरीफायर लगाना मजबूरी है, लेकिन महंगा होने के कारण सभी इसे अफोर्ड नहीं कर पाते हैं। इस परेशानी को देखते हुए दिल्ली के रहने वाले कृष ने दुनिया का पहला इको-फ्रेंडली एयर प्यूरीफायर बनाया है जो 100% स्वदेशी भी है। कृष ने दूसरों की मदद करने के मकसद से मात्र 18 साल की उम्र में स्टार्टअप की शुरुआत की और अपने ब्रांड का पेटेंट करा कर उसका ट्रेडमार्क भी ले लिया। कृष आज पढ़ाई के साथ लाखों का कारोबार सम्भाल रहे हैं और उन्होंने कई लोगों को रोजगार भी दिया है। आज इनके ब्रांड का प्यूरीफायर पूरे देश में बिक रहा है। दो साल में हजारों प्यूरीफायर बेचने के अलावा उन्होंने इसे कई जरूरतमंदों को दान भी किया है।
20 वर्षीय कृष चावला दिल्ली के रहने वाले हैं। कंप्यूटर साइंस में इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है। फिलहाल कैलिफोर्निया की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से आगे की पढ़ाई कर रहे हैं। बचपन से कृष को अस्थमा की बीमारी थी, जिसकी वजह से उन्हें सांस लेने में काफी दिक्कत होती थी। दिल्ली की खराब वायु गुणवत्ता की वजह से उन्हें घर में भी मास्क और नेबुलाइजर की जरूरत पड़ती थी। कृष बताते हैं, “मैं घर के बाहर मास्क के बिना नहीं जा सकता था। मुझे कई बार अस्थमा का दौरा भी आया। मेरी सेहत की वजह से मेरे घर में हमेशा प्यूरीफायर ऑन रहता था, ताकि मैं बीमार न हो जाऊं। एक दिन मैं संयोग से प्यूरीफायर को खोल दिया, तब मुझे पता चला कि इसे बनाना तो आसान है। मेरे घर में जो प्यूरीफायर लगा था, वह काफी महंगा था। मैं इंजीनियरिंग का विद्यार्थी था तो मुझे मशीनों के बारे में पता है और तब मुझे आइडिया आया की सस्ता प्यूरीफायर भी बनाया जा सकता है।”
कई बार खारिज होने के बाद के बाद बनाया प्यूरीफायर
बाजार में मिलने वाले ज्यादातर एयर प्यूरीफायर महंगे होते हैं, जिसे सब खरीद नहीं सकते। कृष के अनुसार प्यूरीफायर में लगने वाले पार्ट बहुत महंगे नहीं होते हैं, बावजूद इसके बाजार में मिलने वाले ज्यादातर प्यूरीफायर काफी महंगे होते हैं। कृष ने मात्र 18 साल की उम्र में ये तय किया कि वो देश में ही सस्ता और अच्छा प्यूरीफायर बनाएंगे।
2017 में एयर प्यूरीफायर बनाने की शुरुआत की गई, जिसमें कुछ खास बातों पर ध्यान दिया गया। शुरुआत में प्यूरीफायर के तकरीबन 320 प्रोटोटाइप बनाए, लेकिन इनमें से कोई भी बाजार के पैमानों पर खरा नहीं उतरा। इस काम में कृष के पिता ने भी उनका साथ दिया और आखिरकार कई महीनों की मेहनत के बाद फाइनल प्रोटोटाइप तैयार किया गया जिसे ‘ ब्रेदिफाई’ नाम से पेटेंट भी कराया और उसका ट्रेडमार्क भी लिया।
कृष बताते हैं ,”मेरे पास आईडिया तो था लेकिन किसी तरह का अनुभव नहीं था। जिस तरह का एयर प्यूरीफायर मैं बनाना चाहता था उसके लिए मुझे लगातार दो साल तक मेहनत करनी पड़ी और 2019 में ‘ ब्रेदिफाई’ ’ को लोगों तक पहुंचने में कामयाब रहा।”
कृष का एयर प्यूरिफायर दुनिया का पहला इको-फ्रेंडली प्यूरीफायर है जो 98% प्लास्टिक फ्री है। इसे अल्ट्रा-ड्यूरेबल कंप्रेस्ड लकड़ी से बनाया गया है। कृष बताते हैं कि प्यूरीफायर बनाने का मकसद ही लोगों को कम कीमत में प्यूरीफायर देना था वो भी पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना। कृष ने प्यूरीफायर बनाने के लिए कुछ पैमाने तय किये जैसे प्यूरीफायर की कीमत दूसरे ब्रांड की तुलना में बहुत कम और क्वालिटी अच्छी होनी चाहिए। इसके अलावा प्लास्टिक का इस्तेमाल न के बराबर हो, ताकि पर्यावरण को भी सुरक्षित रहे।
कृष बताते हैं, “मैंने अपने ब्रांड में ‘रिवर्स एयर तकनीक’ का इस्तेमाल किया है। जिससे हवा ज्यादा से ज्यादा शुद्ध होती है। साथ ही इसमें हाई ग्रेड हेपा (एचईपीए) फिल्टर का इस्तेमाल हुआ है। इसमें तीन तरफ से हवा अंदर जाती है और शुद्ध होती रहती है। इसलिए आप इसे कहीं भी रखें, यह अपना काम करता रहेगा। यह सभी तरह के हानिकारक प्रदूषकों से आपको सुरक्षित रखता है।”
कृष ने स्टार्टअप की शुरुआत एक लाख की लागत से छोटे स्तर पर की और आज इ-कॉमर्स के जरिये अपने उत्पाद को पूरे देश में बेच रहे हैं। यही नहीं कम उम्र में तकरीबन 10 लोगों को रोजगार भी दिया है।
कृष का मकसद स्टार्टअप से लोगों की मदद करना था और वो ये करने में कामयाब भी रहे। कृष बताते हैं, “ज्यादातर ब्रांडेड प्यूरीफायर के बेसिक मॉडल की शुरुआत 15 हजार से होती है और एक लाख रुपये तक जाती है। मार्केट में ज्यादातर बिकने वाले प्यूरीफायर 30-40 हजार के होते हैं, जबकि हमारे यहां बेसिक मॉडल 4 हजार का है। ज्यादातर हमारे ब्रांड के बिकने वाले प्यूरीफायर 4 से15 हजार के होते हैं। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं की हमारा ब्रांड मार्केट में कितना किफायती है। इसके अलावा हमारे सभी प्यूरीफायर स्वदेशी हैं और इसलिए अगर किसी भी ग्राहक को बाद में प्यूरीफायर का फिल्टर बदलना हो तो हम तुरंत उपलब्ध करा देते हैं।”
तकरीबन 4500 प्यूरीफायर बेच चुके हैं और 500 दान भी किए
कृष का स्टार्टअप 2019 में शुरू हुआ था, लेकिन 2020 में उन्हें बाजार से अच्छा प्रतिसाद मिला शुरू हुआ। कृष बताते हैं अब तक 5500 से ज्यादा एयर प्यूरीफायर की बिक्री हो गई है। साथ ही उन्होंने 500 से ज्यादा एयर प्यूरीफायर दिल्ली के हॉस्पिटल, स्कूल, अनाथालय और सामाजिक संगठनों को दान भी दिए हैं। कृष कहते हैं, “मेरा उद्देश्य देश में ज्यादा से ज्यादा मध्यमवर्गीय परिवारों को एयर प्यूरीफायर बेचना है, ताकि कोई भी वायु प्रदूषण की वजह से बीमार न पड़े। मैंने खुद ये तकलीफ झेली है और इसलिए मैं जानता हूं कि एयर प्यूरीफायर होना कोई लग्जरी नहीं बल्कि जरूरत है। ऐसे में इसकी कीमत कम होनी चाहिए।” कृष के इस इनोवेशन और स्टार्टअप को नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने भी सराहा है। अमिताभ ने अपने ट्विटर पर कृष के बारे में ट्वीट कर लिखा था कि युवा उद्यमी कृष चावला 100% मेड इन इंडिया एयर प्यूरीफायर बना रहे हैं, जो प्लास्टिक फ्री है। यह आत्मनिर्भर भारत की तरफ एक बेहतर कदम है।
(साभार – दैनिक भास्कर)
गलती से किसी और के बैंक अकाउंट में पैसे ट्रांसफर हो गए, अपनायें यह उपाय
एक बैंक से दूसरे बैंक अकाउंट में रकम ट्रांसफर करना असान हो गया है। फोनपे, गूगल पे, अमेजन पे और इंटनेट बैंकिग जैसे कई पेमेंट ऐप के होने से डिजिटल ट्रांजैक्शन में बढ़ोतरी हुई है। कई बार बैंक अकाउंट में मनी ट्रांसफर करते समय गलती से बैंक अकाउंट नंबर गलत इंटर हो जाने पर गलत अकाउंट में रकम ट्रांसफर हो जाती है। इसी को देखते हुए आज हम आपको कुछ नेटबैकिंग टिप दे रहे हैं कि अगर आपके साथ ऐसा हो जाए तो आपको क्या करना चाहिए। तो आइए जानते हैं….
सबसे पहले बैंक को इस बारे में जानकारी दें
अगर भूल से आपने दूसरे व्यक्ति के बैंक अकाउंट में पैसे ट्रांसफर कर दिए हैं तो सबसे पहले अपने बैंक को इसकी सूचना फोन या ईमेल से दें। बेहतर यह रहेगा कि आप जल्द से जल्द ब्रांच मैनेजर से मिलें। इस बात को समझिए कि जिस बैंक के खाते में आपने पैसे ट्रांसफर किए हैं, सिर्फ वही बैंक इस मसले को सुलझा सकता है। अपने बैंक को भूल से हुए ट्रांजेक्शन के बारे में डिटेल्स में जानकारी दें। इसमें ट्रांजेक्शन की तारीख और समय, अपना अकाउंट नंबर और जिस अकाउंट नंबर में भूल से पैसे ट्रांसफर हुए हैं आदि शामिल हैं।
बैंक को जल्द से जल्द कदम उठाना होगा
गलती से अमाउंट ट्रांसफर वाले ज्यादातर मामलों में रिसीवर पैसे लौटाने को तैयार हो जाता है। लेकिन अगर वह पैसे लौटाने से मना कर दे तो आप उसके खिलाफ केस दर्ज कर सकते हैं। आप अपनी तरफ से भी ऐसे मामलों में लीगल एक्शन लेने का अधिकार रखते हैं। आप बैंक से शिकायत दर्ज करा कर लीगल एक्शन ले सकते हैं। RBI के गाइडलाइन के अनुसार अगर गलती से पैसे किसी दूसरे के खाते में जमा हो जाते हैं तो आपके बैंक को जल्द से जल्द कदम उठाना होगा। बैंक को गलत खाते से पैसे को सही खाते में लौटाने की व्यवस्था करनी होगी।
वापस पा सकते हैं रकम
अगर आपने जिस बैंक खाते में पैसा ट्रांसफर किया है, वो अकाउंट नंबर ही गलत है या IFSC कोड गलत है, तो पैसा अपने आप ही आपके खाते में आ जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं है तो अपने बैंक ब्रांच में जाकर ब्रांच मैनेजर से मिलें। उसे इस गलत ट्रांजेक्शन के बारे में बताएं। ये जानने की कोशिश करें कि पैसे किस बैंक के खाते में गए हैं। अगर किसी दूसरे बैंक के खाते में पैसे गलती से ट्रांसफर हुए हैं तो रकम वापसी में ज्यादा समय लग सकता है। कई बार तो बैंक इस तरह के मामलों के निपटारे में 2 महीने तक का समय भी लगा सकते हैं। आप अपने बैंक से यह पता कर सकते हैं कि किस शहर की किस ब्रांच के किस अकाउंट में पैसा ट्रांसफर हुआ है। उस ब्रांच में बात करके आप रकम वापस ले सकते हैं।
ऑनलाइन भुगतान करते समय इन बातों को जरूर रखें ध्यान
पैसे ट्रांसफर करते वक्त प्राप्तकर्ता का बैंक अकाउंट नंबर दोबारा चेक कर लें।
जल्दबाजी में बैंक अकाउंट नंबर डालते वक्त गलती से एक भी डिजिट इधर-उधर हो जाने पर आपका पैसा गलत अकाउंट में ट्रांसफर हो सकता है।
पैसे भेजने के पहले अकाउंट बेनीफिशियरी एड करें, ताकि आपको बार-बार ट्रांसफर करने में सहुलियत हो।
पहली दफा दूसरे के अकाउंट में पैसे भेजने की शुरूआत कम राशि से करें, ताकि अगर पैसे गलत अकाउंट में चल जाएं तो नुकसान कम से कम हो।
इंडोनेशिया में मछुआरों ने खोजा 700 साल पुराना श्रीविजय का स्वर्ण द्वीप
सुमात्रा में हुई खोज, मिलीं प्रतिमाएँ एवं बहुमूल्य खजाना
जकार्ता : सदियों से दक्षिण पूर्वी एशिया का देश इंडोनेशिया भारतीय संस्कृति का विस्तार माना जाता रहा है। यहां के सुमात्रा द्वीप में सातवीं से 13 वीं शताब्दी तक श्रीविजय राजवंश का शासन रहा। पेलंगबांग को इस राजवंश का स्वर्ण द्वीप कहा जाता था। भारतीय चोल राजाओं ने यहां हमला कर बहुमूल्य खजाने को लूटा और श्रीविजय राजवंश के राजाओं को बंधक बना लिया। वापसी में ये खजाना गायब हो गया। खतरनाक मगरमच्छों से भरी पेलंगबांग की मुसी नदी में लोग इसकी खोज में लगे रहे। अब लगभग 700 साल बाद मछुआरों ने इस बहुमूल्य खजाने को खोज निकाला है। समुद्री खाेजकर्ता डॉ. शॉन किंगस्ले के अनुसार ये सुमात्रा के गायब स्वर्ण द्वीप की खोज है।

श्रीविजय राजवंश का था समुद्रों पर राज
इतिहासकारों के अनुसार सुमात्रा का श्रीविजय राजवंश 13 वीं शताब्दी तक दक्षिणपूर्वी एशिया के द्वीपों पर शासन था। समुद्री शक्ति होने के कारण इसका फैलाव भारत के पूर्वी तटाें और दक्षिण चीन महासागर था। यहां पूर्व में मिले भारतीय और चीनी सिक्के इस बात का प्रमाण है। अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्राें में श्रीविजय राजवंश का एकछत्र राज था। यहां बौद्ध और हिंदू धर्म की प्रतिमाएं भी मिली हैंं। बाद में ये राजवंश जावा के मलायु तक सिमट गया।
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार : छिछोरे सर्वश्रेष्ठ फिल्म, कंगना रणौत सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री, मनोज वाजपेयी सर्वश्रेष्ठ अभिनेता
रजनीकांत को मिला दादासाहब फाल्के पुरस्कार
67वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह का आयोजन विज्ञान भवन में किया गया। विजेताओं को उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने स्वर्ण कमल एवं रजत कमल, शॉल और ईनाम की राशि देकर सम्मानित किया। मनोज बाजपेयी, कंगना रणौत और धनुष को बेहतरीन अभिनय के लिए सम्मानित किया गया। छिछोरे को सर्वश्रेष्ठ हिंदी फिल्म का पुरस्कार मिला। सुशांत सिंह राजपूत की फिल्म छिछोरे के निर्देशक नितेश तिवारी को सम्मानित किया गया। 67वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की घोषणा मार्च 2021 में की गई थी। कंगना अपने मां और पिता के साथ अवॉर्ड लेने पहुंचीं। सुपरस्टार रजनीकांत को 51वें दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इस दौरान विज्ञान भवन में मौजूद सभी लोगों ने उनके लिए खड़े होकर तालियां बजाईं।
सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री – कंगना रणौत
अभिनेत्री कंगना रणौत को एक बार फिर से सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला है। उन्हें 25 जनवरी 2019 में रिलीज हुई मणिकर्णिका और 24 जनवरी 2020 में आई पंगा के लिए सम्मानित किया गया।
सर्वश्रेष्ठ अभिनेता – मनोज वाजपेयी
मनोज वाजपेयी को भोंसले के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का अवॉर्ड मिला है। देवाशीष मखीजा द्वारा लिखित और निर्देशित ड्रामा फिल्म में मनोज वाजपेयी की भूमिका को लेकर उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार दिया गया है।
सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता – विजय सेतुपति
दक्षिण के अभिनेता विजय सेतुपति को सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता के तौर पर राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया है। उन्हें तमिल फिल्म ‘सुपर डीलक्स’ के लिए सम्मानित किया गया, जो 29 मार्च 2019 में रिलीज हुई थी। त्यागराजन कुमार राजा ने फिल्म को निर्देशित किया था।
सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री– पल्लवी जोशी
‘द ताशकंद फाइल्स’ में प्रभावशाली किरदार निभाने के लिए दक्षिण अभिनेत्री पल्लवी जोशी को राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाज़ा गया है। विवेक अग्निहोत्री द्वारा निर्देशित यह फिल्म 12 अप्रैल 2019 में रिलीज हुई थी। 4 करोड़ के बजट वाली इस फिल्म ने 20 करोड़ से ज्यादा का बॉक्स ऑफिस कमाई की।
सर्वश्रेष्ठ बॉयोग्राफिकल फिल्म – एलिफेंट डू रिमेम्बर
स्वाती पांडे द्वारा निर्देशित ‘एलिफेंट डू रिमेम्बर’ ने बेस्ट बॉयोग्राफिकल फिल्म के लिए पुरस्कार जीता है।
अन्य पुरस्कार –
सर्वश्रेष्ठ फिल्म फ्रेंडली स्टेट – सिक्किम
सिनेमा पर सर्वश्रेष्ठ किताब – संजय सूरी द्वारा रचित ‘अ गांधियन अफेयर: इंडियाज क्यूरियस पोरट्रायल ऑफ लव इन सिनेमा’
सर्वश्रेष्ठ फिल्म समीक्षक – सोहिनी चट्टोपाध्याय
फीचर फिल्म्स
विशेष उल्लेखनीय – बिरयानी (मलयालम), जोनाकी पोरुआ (असमिया), लता भगवान कारे (मराठी), पिकासो (मराठी)
सर्वश्रेष्ठ तुलु फिल्म – पिंजारा
सर्वश्रेष्ठ पनिया फिल्म – केंजीरा
सर्वश्रेष्ठ मिशिंग फिल्म – अनु रुवाद
सर्वश्रेष्ठ खासी फिल्म – लेवदह
सर्वश्रेष्ठ हरियाणवी फिल्म – छोरियां छोरों से कम नहीं होती
सर्वश्रेष्ठ छत्तीसगढ़ी फिल्म – भुलान थे माजे
सर्वश्रेष्ठ तेलुगु फिल्म – जर्सी
सर्वश्रेष्ठ तमिल फिल्म – असुरन
सर्वश्रेष्ठ हिन्दी फिल्म – छिछोरे
सर्वश्रेष्ठ मराठी फिल्म – बार्दो
सर्वश्रेष्ठ बांग्ला फिल्म – गुमनामी
गैर फीचर फिल्म श्रेणी
सर्वश्रेष्ठ वाचन – वाइल्ड कर्नाटक, सर डेविड अटेन्बर्ग
सर्वश्रेष्ठ सम्पादन– शट अप सोना, अर्जुन गौरीसराई
सर्वश्रेष्ठ आत्मकथा – राधा, ऑल्विन रेगो और संजय मौर्या
सर्वश्रेष्ठ ऑन-लोकेशन साउंड रिकॉर्डिस्ट – रहस, सप्तर्षि सरकार
सर्वश्रेष्ठ सिनेमेटोग्राफी – सोनसी, सविता सिंह
सर्वश्रेष्ठ निर्देशन– नॉक नॉक नॉक, सुधांशु सरिया
पारिवारिक मूल्य – ओरू पाथिरा स्वपनम पोले (मलयालम)
सर्वश्रेष्ठ शार्ट फिक्शन फिल्म – कस्टडी
विशेष ज्यूरी पुरस्कार – स्मॉल स्केल सोसायटीज
सर्वश्रेष्ठ एनीमेशन फिल्म – राधा
सर्वश्रेष्ठ खोजी फिल्म – जक्कल
सर्वश्रेष्ठ एक्सप्लोरेशन फिल्म – वाइल्ड कर्णाटक
सर्वश्रेष्ठ शैक्षणिक फिल्म – एपल्स एंड ओरांजेस
सामाजिक मुद्दों पर बनी सर्वश्रेष्ठ फिल्म – होली राइट्स, लाडली
सर्वश्रेष्ठ एक्शन डायरेक्शन अवॉर्ड
स्टंट – अवाने श्रीमन्नारायण (कन्नड़)
सर्वश्रेष्ठ कोरियोग्राफी – महर्षि (तेलुगू)
सर्वश्रेष्ठ स्पेशल इफेक्ट्स – मरक्कर
सर्वश्रेष्ठ जूरी पुरस्कार – ओत्था सेरुप्पू साइज- 7 (तमिल)
सर्वश्रेष्ठ गीत – कोलम्बी (मलयालम)
सर्वश्रेष्ठ पटकथा
मौलिक पटकथा – ज्येष्ठोपुत्री
किसी रचना पर आधारित सर्वश्रेष्ठ पटकथा – गुमनामी
सर्वश्रेष्ठ संवाद लेखन – द ताशकंत फाइल्स
सर्वश्रेष्ठ सिनेमेटोग्राफी – जल्लीकट्टू
सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायिका – बार्दो
सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक – बी प्राक, केसरी, तेरी मिट्टी
भारत में कोविड रोधी टीकाकरण ने पार किया 100 करोड़ का आँकड़ा
नयी दिल्ली : भारत में कोविड-19 टीकों की अब तक दी गई खुराकों की संख्या 100 करोड़ के पार पहुँच गयी। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मांडविया ने एक ट्वीट करके देश को यह उपलब्धि हासिल करने पर बधाई दी और कहा कि यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सक्षम नेतृत्व का परिणाम है। उन्होंने लिखा, ‘‘बधाई हो भारत! यह दूरदर्शी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थ नेतृत्व का प्रतिफल है।’’
आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, देश में टीकाकरण के पात्र वयस्कों में से करीब 75 प्रतिशत लोगों को कम से कम एक खुराक लग चुकी है, जबकि करीब 31 प्रतिशत लोगों को टीके की दोनों खुराक लग चुकी हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, देश में टीकाकरण मुहिम शुरू होने के 85 दिन बाद तक 10 करोड़ खुराक लगाई जा चुकी थीं, इसके 45 और दिन बाद भारत ने 20 करोड़ का आंकड़ा छुआ और उसके 29 दिन बाद यह संख्या 30 करोड़ पहुँच गयी।
देश को 30 करोड़ से 40 करोड़ तक पहुंचने में 24 दिन लगे और इसके 20 और दिन बाद छह अगस्त को देश में टीकों की दी गई खुराकों की संख्या बढ़कर 50 करोड़ पहुँच गयी। इसके बाद उसे 100 करोड़ के आंकड़े तक पहुँचने में 76 दिन लगे। देश में टीकों की सर्वाधिक खुराक देने वाले शीर्ष पाँच राज्यों में उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, गुजरात और मध्य प्रदेश शामिल हैं। टीकाकरण मुहिम की शुरुआत 16 जनवरी को हुई थी और इसके पहले चरण में स्वास्थ्यकर्मियों को टीके लगाए गए थे। इसके बाद दो फरवरी से अग्रिम मोर्चे के कर्मियों का टीकाकरण आरंभ हुआ था। टीकाकरण मुहिम का अगला चरण एक मार्च से आरंभ हुआ, जिसमें 60 साल से अधिक आयु के सभी लोगों और गंभीर बीमारियों से ग्रस्त 45 वर्ष से अधिक आयु के लोगों को टीके लगाने शुरू किए गए। देश में 45 साल से अधिक आयु के सभी लोगों का टीकाकरण एक अप्रैल से आरंभ हुआ था और 18 साल से अधिक आयु के सभी लोगों का टीकाकरण एक मई से शुरू हुआ।
तुलसी का पौधा लगाइए, होगी जमकर कमाई
अगर आप भी औषधीय पौधे की खेती कर कम पूंजी से अच्छी कमाई करना चाहते हैं तो आपको तुलसी की खेती करने पर ध्यान देना चाहिए। तुलसी की खेती शुरु करने के लिए आपको बहुत अधिक पैसा खर्च करने की जरूरत नहीं है। आप कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के जरिए भी इस खेती की शुरुआत कर सकते हैं। आपको तुलसी की खेती के लिए महज 15,000 रुपये खर्च करने की जरूरत है। बुआई के 3 महीने बाद ही तुलसी की फसल औसतन 3 लाख रुपये में बिक जाती है। दवा मार्केट में मौजूद कई आयुर्वेदिक कंपनियां जैसे डाबर, वैद्यनाथ, पतंजलि आदि तुलसी की कॉन्ट्रैक्ट पर भी खेती करा रही हैं।
केंद्र सरकार देती है बढ़ावा
केंद्र सरकार इस समय देशभर में औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है। भारत सरकार के आयुष मंत्रालय ने अगले साल तक 75 लाख घरों पर औषधीय पौधों को पहुंचाने का लक्ष्य रखा है, तुलसी भी उन्हीं पौधों में से एक है।
कैसे करें तुलसी की खेती?
एक एकड़ खेत में तुलसी की खेती करने के लिए अलग से 600 ग्राम बीज डालकर पौध तैयार की जाती है। तुलसी की पौध तैयार करने का सही समय अप्रैल माह का पहला सप्ताह है। करीब 15-20 दिन में पौध तैयार हो जाती है। मानसूनी तुलसी की पौध जून-जुलाई में तैयार की जाती है। पौध तैयार होने के बाद नर्सरी से निकालकर लाइनों में रोप दी जाती है।
तुलसी के पौधे की दूरी
तुलसी के पौध की रोपाई के समय यह ध्यान रखा जाता है कि पौधे से पौधे की दूरी 12-15 इंच व लाइन से लाइन की दूरी 15-18 इंच हो। तुलसी की फसल में महीने में दो से तीन सिंचाई पर्याप्त हैं। तुलसी की फसल में कोई बीमारी नहीं लगती या कीड़ों का प्रकोप भी नहीं होता। तुलसी के पौधे को बढ़ाने के लिए खाद के रूप में केवल गोबर की खाद का ही प्रयोग किया जाता है।
तुलसी की फसल तैयार
तुलसी की फसल पौध रोपने के बाद 65-70 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। इसके बाद तुलसी के पौधे को काटकर सुखा लिया जाता है। जब तुलसी की पत्तियां सूख जाती हैं तो इन्हें इकठ्ठा कर लिया जाता है। उपज के रूप में एक एकड़ खेत में पांच-छह क्विंटल सूखी पत्ती प्राप्त होती है। डाबर, पतंजलि, वैद्यनाथ व हमदर्द जैसी औषधि कंपनियां तुलसी की पत्तियां 7000 रुपये क्विंटल के हिसाब से खरीद लेती हैं। एक एकड़ तुलसी की फसल पैदा करने में 5000 रुपये का खर्च आता है। एक एकड़ तुलसी की फसल से 36,000 रुपये की बचत एक फसल में हो जाती है। जबकि साल में तुलसी की तीन फसल पैदा की जा सकती है।
(साभार – नवभारत टाइम्स)
39 महिला सेना अधिकारियों ने जीती कानूनी लड़ाई, मिला स्थायी कमीशन
नयी दिल्ली : 39 महिला सेना अधिकारियों ने कानूनी लड़ाई जीत ली है और उन्हें स्थायी कमीशन देने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि वह सात दिनों के भीतर 39 महिला सेना अधिकारियों को स्थायी कमिशन प्रदान करे। इससे पहले केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि 39 स्थायी कमीशन देने की योग्यता रखती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि वह इस मामले में सात दिनों के भीतर आदेश पारित करे। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली बेंच ने रक्षा मंत्रालय के प्रयास की सराहना की और कहा कि एक नवंबर तक इन 39 महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल कर महिला अधिकारियों ने कहा था कि उन्हें स्थायी कमीशन देने से मना किया गया था। उनका दावा है कि उन्होंने तमाम मापदंडों को पूरा किया है। उन्होंने 60 फीसदी कटऑफ पाए हैं और विजिलेंस क्लीयरेंस हुआ है और साथ ही मेडिकली फिट हैं और मार्च में दिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विपरीत उनके दावे को नकारा गया है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि केंद्र से हलफनामा पेश करने को कहा था। साथ ही कहा था कि किसी महिला को इस दौरान रिलीव न किया जाए।
बिजली मंत्रालय के नये नियम कम करेंगे अंशधारकों पर वित्तीय दबाव
नयी दिल्ली : बिजली मंत्रालय ने क्षेत्र को आर्थिक रूप से व्यावहारिक बनाने के लिए गत शनिवार को कुछ नए नियमों की घोषणा की। इन नियमों का मकसद बिजली क्षेत्र के विभिन्न अंशधारकों से वित्तीय दबाव को कम करना और ऊर्जा उत्पादन की लागत को जल्द निकालना है।
एक बयान में कहा गया है कि मंत्रालय ने बिजली क्षेत्र में स्थिरता तथा स्वच्छ ऊर्जा को प्रोत्साहन के लिए नए नियम अधिसूचित किए हैं। इनके जरिये भारत जलवायु परिवर्तन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को भी पूरा कर सकेगा। बयान में कहा गया है कि बिजली क्षेत्र के निवेशक और अन्य अंशधारक कानून में बदलाव की वजह से लागत निकालने, नवीकरणीय ऊर्जा में कमी और इससे जुड़े अन्य मुद्दों की वजह से चिंतित हैं।
बयान में कहा गया है कि बिजली मंत्रालय ने बिजली अधिनियम, 2003 के तहत जो नियम अधिसूचित किए हैं वे उप़भोक्ताओं और अन्य अंशधारकों के हित में हैं। इन नियमों में बिजली (कानून में बदलाव की वजह से लागत की समय पर वसूली) नियम, 2021 शामिल है। दूसरा नियम बिजली (नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों से उत्पादन को प्रोत्साहन) से संबंधित है। मंत्रालय ने कहा कि कानून में बदलाव की वजह से लागत की जल्द वसूली काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि समय पर भुगतान बिजली क्षेत्र के लिए जरूरी है।
मंत्रालय ने कहा, ‘‘दुनियाभर में ऊर्जा में बदलाव हो रहा है। भारत ने भी इस क्षेत्र में बदलाव की प्रतिबद्धता जताई है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 2022 तक 175 गीगावॉट और 2030 तक 450 गीगावॉट की नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता की प्रतिबद्धता जताई है।’’ मंत्रालय ने कहा कि इन नियमों से देश को नवीकरणीय ऊर्जा के लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिलेगी। इससे उपभोक्ताओं को हरित और स्वच्छ ऊर्जा उपलब्ध हो सकेगी। इनके तहत जिन बिजली संयंत्रों का संचालन अनिवार्य है उनपर बिजली उत्पादन या आपूर्ति में कटौती का नियमन लागू नहीं होगा।
10वीं, 12वीं कक्षा की टर्म-1 परीक्षा में लघु विषय होंगी क्षेत्रीय भाषाएँ : सीबीएसई
नयी दिल्ली : केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने स्पष्ट किया कि 10वीं और 12वीं कक्षा की टर्म-1 परीक्षा के लघु विषयों की श्रेणी में सभी क्षेत्रीय विषयों को रखा गया है। सीबीएसई की ओर से यह स्पष्टीकरण ऐसे समय में आया है जब पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने मुख्य विषयों से पंजाबी को बाहर रखने पर आपत्ति व्यक्त की है ।
चन्नी ने ट्वीट किया था, ‘‘मैं पंजाबी को मुख्य विषयों से बाहर रखने के सीबीएसई के तानाशाही निर्णय का विरोध करता हूं । यह संविधान की संघीय भावना के खिलाफ है और पंजाबी युवकों को अपनी मातृभाषा में सीखने के अधिकार का उल्लंघन है। मैं पंजाबी को पक्षपातपूर्ण ढंग से बाहर रखने की निंदा करता हूं । ’’ पंजाब के मुख्यमंत्री की आपत्ति पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए बोर्ड के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ‘‘ यह सभी को पता है कि सीबीएसई ने 10वीं और 12वीं कक्षा की टर्म-1 परीक्षा के तहत मुख्य विषयों की तिथियों की घोषणा की है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘ यह स्पष्ट किया जाता है कि विषयों का वर्गीकरण प्रशासनिक आधार पर किया गया है जिसका मकसद विषयों में उपस्थित होने वाले उम्मीदवारों की संख्या के आधार पर टर्म-1 परीक्षा का आयोजन करना है और यह किसी भी रूप में मुख्य या लघु विषयों के महत्व से इसका कोई लेनाा-देना नहीं है।’’ अधिकारी ने कहा, ‘‘ अकादमिक दृष्टिकोण से सभी विषय समान रूप से महत्वपूर्ण है । पंजाबी क्षेत्रीय भाषा के तहत पेश की जाने वाली एक भाषा है। सभी क्षेत्रीय भाषाओं को लघु विषयों की श्रेणी के तहत प्रशासनिक सुविधा के उद्देश्य से रखा गया है जो परीक्षा आयोजित से जुड़ी व्यवस्था की जरूरतों को पूरा करने के लिये है। ’’
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने हाल ही में घोषणा की थी कि कक्षा 10वीं के लिए पहले टर्म की बोर्ड परीक्षा 30 नवंबर से शुरू होगी, जबकि 12वीं कक्षा की परीक्षा एक दिसंबर से शुरू होगी। इसके बाद, सीबीएसई ने कक्षा 10वीं और 12वीं बोर्ड परीक्षा के पहले टर्म के लघु (माइनर) विषयों के लिए तारीखों (डेटशीट) की घोषणा की।
दसवीं कक्षा के लिए लघु विषयों की परीक्षा 17 नवंबर से सात दिसंबर के बीच होगी जबकि 12वीं कक्षा के लिए 16 नवंबर से 30 दिसंबर के बीच परीक्षा होगी। सीबीएसई ने घोषणा की थी कि कक्षा 10वीं के लिए पहले टर्म की बोर्ड परीक्षा 30 नवंबर से शुरू होगी, जबकि 12वीं कक्षा की परीक्षा एक दिसंबर से शुरू होगी।
शैक्षणिक सत्र को विभाजित करना, दो टर्म वाली परीक्षा आयोजित करना और पाठ्यक्रम को युक्तिसंगत बनाना 2021-22 के लिए दसवीं और 12वीं कक्षा की बोर्ड परीक्षाओं के लिए विशेष मूल्यांकन योजना का हिस्सा था, जिसे जुलाई में कोविड-19 महामारी के मद्देनजर घोषित किया गया था।




