Friday, April 10, 2026
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बच्चों के लिए आई नयी कोरोना वैक्सीन

देश में बच्चों के लिए कोरोना वैक्सीन जल्द लगनी शुरू हो सकती है। सरकार ने जायडस हेल्थकेयर की तरफ से बनाई गई दुनिया की पहली डीएनए बेस्ड कोरोना वैक्सीन ZyCov-D की 1 करोड़ खुराक का ऑर्डर दे दिया है। यह वैक्सीन 12 साल से ऊपर के उम्र वाले लोगों को लगाई जा सकती है। सरकार इसे 12-18 साल के बच्चों को लगाने के लिए खरीद रही है। क्या है कीमत, क्यों यह बाकी वैक्सीन से अलग है, कोरोना से बचाव में यह कितनी कारगर है…आइए जानतें हैं इससे जुड़ी बड़ी बातें।

सरकार को कितने में पड़ रहा एक डोज?

ZyCov-D तीन डोज वाली वैक्सीन है। सरकार इसके लिए 265 रुपये प्रति डोज के हिसाब से ऑर्डर दिया है। यानी 3 डोज की कीमत पड़ी 795 रुपये। नीडल-फ्री तकनीक के लिए 93 रुपये प्रति डोज अलग से लगेंगे। इसमें जीएसटी शामिल नहीं है। इस तरह सरकार के लिए तीनों डोज के लिए कीमत 1,074 रुपये होगी।
क्या आम आदमी को इसके लिए देने पड़ेंगे पैसे?
अगर सरकारी सेंटर पर वैक्सीन लगवाते हैं तो यह मुफ्त में पड़ेगी। लेकिन प्राइवेट सेंटर पर इस वैक्सीन का पूरा कोर्स यानी 3 डोज 1500-2500 रुपये के बीच हो सकता है।
किनको लगेगी ये वैक्सीन?
यह वैक्सीन 12 साल या इससे ऊपर के व्यक्ति को लगाई जा सकती है। इसका मतलब है कि इसे 12 साल से 18 साल तक के बच्चों को भी लगाया जा सकता है। यह बात इसे खास बनाती है क्योंकि फिलहाल देश में बच्चों को कोरोना की वैक्सीन नहीं लग रही है। सरकार ने इसे 12 से 18 साल के बच्चों के लिए ही खरीदा है।
तीनों डोज के बीच कितने दिनों का अन्तर ?
ZyCov-D के हर डोज के बीच कम से कम 28 दिन का अंतराल रहेगा। यानी पहला डोज लेने के 28वें दिन दूसरा डोज और 56वें दिन तीसरा डोज। इस हिसाब से भले ही इसके 3 डोज हो लेकिन इसका कोर्स कोविशील्ड से पहले ही पूरा हो जाएगा। दो डोज वाली कोविशील्ड के दोनों डोज के बीच का गैप फिलहाल 84 दिन है।
क्यों बाकी वैक्सीन से अलग है ZyCov-D?
यह भारत ही नहीं, दुनिया की भी पहली डीएनए बेस्ड कोरोना वैक्सीन है। इसके अलावा इसका कोर्स 3 डोज का है जबकि ज्यादातर कोरोना वैक्सीन दो डोज वाली हैं। इसे लगाने के लिए सूई की भी जरूरत नहीं होगी।
कैसे काम करती है डीएनए वैक्सीन?
जायडस कैडिला की यह कोरोना वैक्सीन दुनिया की पहली डीएनए वैक्सीन है। इसके जरिए जेनेटिकली इंजीनियर्ड प्लास्मिड्स को शरीर में इंजेक्ट किया जाता है। इससे शरीर में कोविड-19 के स्पाइक प्रोटीन का उत्पादन होता है और इस तरह वायरस से बचाव वाले एंटीबॉडी पैदा होते हैं। ज्यादातर कोरोना वैक्सीन के 2 डोज लगते हैं लेकिन कैडिला की इस वैक्सीन के 3 डोज लगेंगे।
सूई से नहीं लगाने का क्या फायदा है?
इस वैक्सीन के बारे में एक और खास बात है। यह सूई से नहीं लगाई जाएगी। इसे एक खास डिवाइस के जरिए लगाया जाएगा। जायडस कैडिला का दावा है कि इस मेथड से वैक्सीन लगने की वजह से दर्द नहीं होगा। कंपनी का तो यहां तक दावा है कि इससे वैक्सीन के साइड इफेक्ट भी कम हैं।
कितनी कारगर है ZyCov-D?
फेज-3 के क्लीनिकल ट्रायल में ZyCov-D 66.6 प्रतिशत कारगर पाई गई है।
ZyCov-D को किसने बनाया है?
ZyCov-D को भारतीय कंपनी जायडस कैडिला ने बनाया है। इसे मिशन कोविड सुरक्षा के तहत सरकार के बायोटेक्नॉलजी डिपार्टमेंट के साथ साझीदारी में विकसित किया गया है।

पद्मश्री : खुद गरीबी के कारण पढ़ नहीं सके मगर सन्तरे बेचकर खोला स्कूल

बेंगलुरु : संतरे बेचने वाले 65 वर्षीय हरेकाला हजब्बा को पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया। हजब्बा को यह सम्मान शिक्षा के क्षेत्र में सामाजिक कार्य करने के लिए दिया गया। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रपति भवन के दरबार हॉल में हजब्बा को देश के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में से एक पद्मश्री से नवाजा। र्नाटक के दक्षिण कन्नड़ा के न्यूपाड़ापू गांव के रहने वाले हरेकाला हजब्बा ने अपने गाँव में अपनी जमापूंजी से एक स्कूल खोला। इसके साथ ही वह हर साल अपनी बचत का पूरा हिस्सा स्कूल के विकास के लिए देते रहे। हजब्बा को पद्मश्री पुरस्कार देने की घोषणा 25 जनवरी 2020 में ही हुई थी, लेकिन फिर कोरोना वायरस महामारी के चलते समारोह का आयोजन नहीं हो सका।
कौन हैं हरेकला हजाब्बा ?
हरेकला हजब्बा कर्नाटक के मैंगलोर शहर में एक संतरा विक्रेता हैं. उनकी उम्र 65 साल है। अपने गाँव में स्कूल न होने की वजह से हजब्बा पढ़ाई न कर सके, लेकिन शिक्षा के प्रति समर्पण ऐसा था कि अब वो शिक्षितों के लिए भी मिसाल बनकर उभरे हैं।
 कैसे मिली स्कूल खोलने की प्रेरणा?
हजाब्बा पढ़े-लिखे नहीं हैं। यहां तक कि वो कभी स्कूल नहीं गए। वो बताते हैं, ‘एक दिन विदेशी कपल उनसे संतरे खरीदना चाहता था। उन्होंने कीमत भी पूछी। लेकिन मैं समझ नहीं सका। उन्होंने कहा कि यह मेरी बदकिस्मती थी कि मैं स्थानीय भाषा के अलावा कोई दूसरी भाषा नहीं बोल सकता। वह कपल चला गया। मुझे बेहद बुरा लगा। इसके बाद मुझे यह ख्याल आया कि गांव में एक प्राइमरी स्कूल होना चाहिए ताकि हमारे गांव के बच्चों को कभी उस स्थिति से गुजरना ना पड़े जिससे मैं गुजरा हूं।’
और फिर जब शुरू किया स्कूल
हजाब्बा ने गांववालों को समझाया और उनकी मदद से स्थानीय मस्जिद में एक स्कूल शुरू किया। इसके अलावा वो स्कूल की साफ-सफाई और बच्चों के लिए पीने का पानी भी उबालते। साथ ही, छुट्टियों के दौरान वह गांव से 25 किलोमीटर दूर दक्षिण कन्नड़ जिला पंचायत कार्यालय जाते और बार-बार अधिकारियों से शैक्षणिक सुविधाओं को औपचारिक रूप देने की विनती करते। हजाब्बा की मेहनत रंग लाई। जिला प्रशासन ने साल 2008 में दक्षिण कन्नड़ जिला पंचायत के अंतर्गत नयापुडु गांव में 14वां माध्यमिक स्कूल बनवाया।

क्या होती है सांसद निधि; क्यों ये सांसदों के बैंक खाते में नहीं भेजी जाती?

नयी दिल्ली : केंद्र सरकार ने अहम फैसले में सांसद निधि को बहाल कर दिया है। तकनीकी भाषा में इस योजना को संसद सदस्य स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (एमपीलैड) कहा जाता है। इस योजना के तहत देश के प्रत्येक सांसद यानी राज्यसभा और लोकसभा दोनों के सदस्यों को हर साल अपने क्षेत्र में विकास कार्य करवाने के लिए 5 करोड़ रुपये जारी किए जाते हैं। केंद्र सरकार ने चालू वित्त वर्ष की शेष अवधि से ही योजना को बहाल करने का फैसला किया है। ऐसे में चालू वित्त वर्ष की शेष अवधि के लिए सांसदों को एकमुश्त दो करोड़ रुपये जारी किए जाएंगे। उन्हें अगले वित्त वर्ष यानी 2022-23 से योजना की पूरी राशि मिलेगी।
केंद्र सरकार ने सांसद निधि को बहाल कर दिया है। एमपीलैड योजना को अप्रैल 2020 में कोविड-19 महामारी के कारण अस्थायी रूप से निलंबित कर दिया गया था और इसका धन भारत के समेकित कोष में चला गया था। अब केंद्रीय मंत्रिमंडल ने फिर से इसे बहाल कर दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल की बैठक के बाद सूचना और प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने कहा कि वित्तीय वर्ष 2021-22 की शेष अवधि के साथ ही योजना को बहाल कर दिया गया है। यह योजना 2025-26 तक जारी रहेगी।
कैसे शुरू हुई थी योजना
इस योजना की शुरुआत पहली बार वर्ष 1993 में हुई थी। उस वक्त देश में स्वर्गीय प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव की सरकार थी। उस वक्त सांसदों को अपने क्षेत्र के विकास के लिए एक करोड़ रुपये सालाना जारी किए जाते थे। कुछ साल बाद इस फंड को बढ़ाकर 2 करोड़ रुपये और फिर 2011-12 में मनमोहन सिंह की सरकार में पांच करोड़ रुपये कर दिया गया।
योजना का उद्देश्य
भारत सरकार के सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के मुताबिक इस योजना का मुख्य उद्देश्य संसद सदस्यों को उनके निर्वाचन क्षेत्र में विकास से जुड़े कार्यों की सिफारिश करने में सक्षम बनाना है। सांसद इस पैसे से अपने क्षेत्र मे पीने के पानी, शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छता के साथ सड़कों के निर्माण की सिफारिश कर सकते हैं।
सांसदों के खाते में नहीं जाता पैसा
इस योजना से उद्देश्य और दिशानिर्देशों से स्पष्ट है कि सांसद अपने क्षेत्र के विकास से जुड़े कार्यों की सिफारिश कर सकते हैं। इसका बिल्कुल यह मतलब नहीं हुआ कि यह पैसा सांसदों के खाते में जाता है और वह अपने हिसाब से खर्च करते हैं। सरकार के स्तर पर उनकी सिफारिश स्वीकार की जाती है और सरकार प्रशासनिक अमला उसे क्रियान्वित करता है।
इस साल कम मिलेगा फंड
केंद्रीय मंत्री ने बताया कि 2021-22 की शेष अवधि के लिए हर एक सांसद को एक किश्त में दो करोड़ रुपये की राशि जारी की जाएगी। उन्होंने कहा कि 2022-23 से 2025-26 तक प्रत्येक सांसद को पांच करोड़ रुपये प्रति वर्ष दी जाएगी। इसे साल में 2.5 करोड़ रुपये की दर से दो किश्तों में जारी की जाएगी। कोविड-19 महामारी के दौरान मंत्रिमंडल ने निर्णय लिया गया था कि साल 2020-21 से 2021-22 तक, एमपीलैड योजना के धन का उपयोग महामारी से निपटने में किया जाएगा।

आर्थिक स्थिति में सुधार के कारण योजना बहाल
सरकार का कहना है कि आर्थिक परिदृश्य में सुधार के मद्देनजर, जिस तरह से आर्थिक सुधार हुआ है और विभिन्न क्षेत्रों में भी विकास देखा गया है। वित्तीय वर्ष 2021-22 की शेष अवधि के लिए एमपीलैड योजना को बहाल करने का निर्णय लिया गया है। वित्‍त वर्ष 2021-22 के शेष महीनों के दौरान सांसद स्‍थानीय क्षेत्र विकास योजना को बहाल करने और 15वें वित्त आयोग की अवधि के साथ-साथ वित्‍त वर्ष 2025-26 तक इसे जारी रखने को मंजूरी दे दी है।
योजना पर 2025-26 तक 17 हजार करोड़ से अधिक खर्च
एमपीलैड को वित्त वर्ष 2021-22 की शेष अवधि के लिए फिर से शुरू करने और इसे 2025-26 तक जारी रखने पर कुल वित्तीय परिव्यय 17417 करोड़ रुपये होगा। अप्रैल 2020 से अब तक योजना निलंबित थी। इस कारण कुल 7,900 करोड़ रुपये की धनराशि का उपयोग बुनियादी स्वास्थ्य ढांचे में सुधार और कोविड-19 महामारी से निपटने में किया जाएगा। सरकार ने सांसदों के वेतन में भी 30 फीसदी की कटौती की थी।
क्या है योजना
इस योजना के तहत सांसद अपने निर्वाचन क्षेत्रों में हर साल पांच करोड़ रुपये तक के विकास कार्यों की सिफारिश कर सकते हैं। सरकार ने एक बयान में कहा है कि एमपीलैड योजना को फिर से शुरू करने और इसके क्रियान्वयन को जारी रखने से क्षेत्र में सामुदायिक विकास परियोजनाओं, कार्यों की फिर से शुरूआत होगी जो एमपीलैड के तहत धन की कमी के कारण रुक गयी थीं। इससे स्थानीय समुदाय की आकांक्षाओं और विकास संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने और स्थायी परिसंपत्तियों के निर्माण की फिर से शुरुआत होगी। सरकार ने कहा कि सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्‍वयन मंत्रालय ने 2021 के दौरान देश भर के 216 जिलों में एमपीलैड कार्यों का मूल्यांकन, तीसरे पक्ष के द्वारा करवाया है। मूल्यांकन रिपोर्ट में एमपीलैड को जारी रखने की सिफारिश की गयी है। बयान के मुताबिक इस योजना की शुरुआत से लेकर अब तक कुल 19.86 लाख से ज्यादा कार्य, परियोजनाएं पूरी की जा चुकी हैं जिन पर 54171.09 करोड़ रुपये की वित्तीय लागत आई है।

(साभार – न्यूज 18 डॉट कॉम)

भूली बिसरी यादें –2

डॉ. एस. आनन्द

उस समय की एक घटना याद आ गयी। बढ़ती बेरोजगारी और गिरते शिक्षा मूल्य को केन्द्रित कर मुझे एक व्यंग्य लिखना था और मैंने लिखा भी मगर जब वह गुप्ता जी के पास गया पढ़ने के लिए तो वह पढ़ने के बाद प्रूफ को रोककर मुझे अपने चेंबर में बुलाया और बोले- यह क्या लिख दिया? क्यों मारना चाहते हो अपने बाप को? अगर वह तुम्हारा बाप है तो मेरा मित्र भी और मैं अपने ही अख़बार में उसे भला कैसे मार सकता हूं। तुम इस कविता के कोटेशन को बदलो।
दरअसल वह कविता की पंक्तियां थीं-
ऐ मेरे बाप!
कब मरेंगे आप?
अब तक तो मैं हो जाता इंगेज
अगर करने दिया होता इंटरकास्ट मैरेज!
मैंने दलील दी-सर! यह तो कविता है, कोई हकीकत नहीं। उन्होंने कहा-चाहे जो भी हो, या तो तुम इसे बदलो या हटा दो। मैं इसे बर्दाश्त नहीं कर सकता। मैंने कहा- इसे बदल देते हैं सर! फिर मैंने उसे इस तरह कर दिया-
ऐ मेरे बाप!
कितने नालायक हैं आप?
यह बदलाव देखने के बाद गुप्ता जी एक पल के लिए मुस्कुराते हुए कहा- यह कुछ हद तक ठीक है इसलिए कि महेन्द्र शंकर तुम्हारे पिता हैं, अब वे लायक हैं या नालायक, इसका आकलन तुम खुद करो, यह कहकर वह जोर से हंसने लगे और मैं प्रूफ लेकर लेजर डिपार्टमेंट में आ गया।
आदरणीय गुप्ता जी सहज, सरल स्वभाव के धनी एक कुशल मार्गदर्शक रहे। वे एक जिज्ञासु प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। एक बार का वाकया है। मैंने लस्टम पस्टम में एक ग़ज़ल की चा पंक्तियां लिखी थीं-
ये नये दौर के मसीहा हैं
एक रेशे का जाल करते हैं
रिन्द ऐसे कि देवता को भी
पेश जामे सिफाल करते हैं।
प्रूफ पढ़ने के बाद उन्होंने मुझे अपने चेम्बर में बुलाया। मै डरा सहमा हाजिर हुआ तो उन्होंने बैठने का इशारा किया। दराज खोलकर दो बिस्किट निकाल कर मुझे देते हुए बोले-जानदार है तुम्हारा यह व्यंग्य, काफी मारक है मगर एक बात बताओ, रिन्द माने क्या होता है? मैंने कहा सर! इसके माने होता है -पीने वाला। यह सुनते ही उन्होंने अपनी डायरी निकाली और उसमें इसे लिखा। चलते-चलते उन्होंने अपने पाकेट से 200 रुपये निकाल कर देते हुए कहा-लो इससे मिठाई खा लेना। मैंने कहा-सर जी! इस कालम के लिखने का पैसा तो मुझे मिलता है तो उन्होंने कहा-यह मैं दे रहा हूं, वह आफिस देता है। मैं उनकी बात सुनकर निरुत्तर हो बाहर निकल आया।
सन्मार्ग के सम्पादकीय और विज्ञापन व सर्कुलेशन तथा एकाउंट विभाग में काम करने वाले प्राय: उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान के लोग थे। विज्ञापन में रमेशचंद्र अग्रवाल, मुन्नीलाल सिंह व राजेश अग्रवाल तीन लोग ही मुख्यतया काम करते थे। सन्मार्ग विज्ञपनों के मामले में काफी धनी था क्योंकि वह नम्बर एक था। हर कर्मचारी अपने दायित्व को बखूबी समझता और उसका निर्वहन करता। गुप्ता जी का प्रोत्साहन इसमें संजीवनी का काम करता था। उन्हें अखबार का सारा हिसाब किताब जुबानी याद था। संपादकीय में रमाकांत उपाध्याय, रामखेलावन त्रिपाठी रुक्म, राधाकृष्ण प्रसाद, हरिराम पाण्डेय, अजय सिंह तोमर, मोतीलाल चौधरी, महमिया अजय, रवीन्द्र पांडेय, विमल कुमार राय, ओमप्रकाश मिश्र तथा रिपोर्टिंग में राजेंद्र उपाध्याय, राज मिठौलिया कार्यरत थे। प्रूफ सेक्शन में राजीव नयन, जे.चतुर्वेदी चिराग और पार्ट टाइमर वहशी जी। इतने ही लोगों ने अपनी मेहनत और ईमानदारी से अपने दायित्व को बखूबी निभाया और दिनों दिन सन्मार्ग प्रगति के पथ पर तेजी से आगे बढ़ता रहा। (क्रमश:)

पद्मश्री : मजदूरी के साथ की चित्रकारी, विदेश जाते हैं भूरी बाई के चित्र

भोपाल : भील जनजाति की संस्कृति को दीवारों और कैनवास पर उकरने वाली एमपी की भूरी बाईको पद्मश्री पुरस्कार मिला है। राष्ट्रपति ने नई दिल्ली में उन्हें इस पुरस्कार से सम्मानित किया है। इसके बाद भूरी बाई काफी खुश नजर आई हैं। भुरी बाई का बचपन काफी गरीबी में गुजरा है। वह भोपाल स्थित भारत भवन में कभी मजदूरी करती थीं। साथ ही साथ पेटिंग भी करती थीं।
पद्मश्री से सम्मानित होने के बाद भूरी बाई ने कहा कि ये पुरस्कार मुझे आदिवासी भील पेंटिंग करने के लिए मिला है, मैंने मिट्टी से पेंटिंग की शुरुआत की थी। मैं भोपाल के भारत भवन में मजदूरी करती थी और उसके साथ पेंटिंग भी बनाती थी। मेरी पेंटिंग आज देश विदेश में जाती है। मैं बहुत खुश हूँ।
ठीक से हिंदी नहीं बोल पाती भूरी बाई
गौरतलब है कि पिछड़े इलाके से आने वाली भूरी बाई आज भी सही से हिंदी नहीं बोल पाती हैं। लेकिन इस पुरस्कार के मिलने के बाद वह अभिभूत हैं। भूरी बाई अभी जनजातीय संग्रहालय भोपाल में कलाकार के पद पर पदस्थ हैं।
गरीबी में बीता बचपन
भूरी बाई बरिया का जीवन गरीबी में बीता है। अवॉर्ड की घोषणा होने के बाद उन्होंने कहा था कि मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मेरी चित्रकारी का शौक ही मेरी पहचान बन जाएगी। उन्होंने कहा था कि मेरे लिए बाहर जाना तो दूर की बात है, मुझे तो ठीक से हिंदी भी बोलनी नहीं आती है। मेरा बचपन गरीबी में बीता है, लेकिन अब खुशी है कि मैं अपने बच्चों के लिए कुछ पाई हूं।
अमेरिका तक पेटिंग की माँग
भूरी बाई जनजातीय संग्रहालय के बगल में स्थित भारत भवन में कभी मजदूरी करती थीं। वहीं, अब प्रदेश की मशहूर चित्रकार बन गयी हैं। उनकी बनाई पेंटिंग्स मध्यप्रदेश संग्रहालय से लेकर अमेरिका तक अपनी छाप छोड़ चुकी है। कला के क्षेत्र में एमपी का सर्वोच्च सम्मान उनके नाम दर्ज है। आज की तारीख में वह अलग-अलग जिलों में जाकर भील आर्ट और पिथोरा आर्ट पर कार्यशाला करवाती हैं।

पंजाब के 3,20,000 सैनिकों ने प्रथम विश्व युद्ध में संभाला था ब्रिटिश सेना का मोर्चा

97 साल तक गुमनाम रही ‘वीरगाथा’

लंदन : पहले विश्व युद्ध में लड़ने वाले पंजाब के 320,000 सैनिकों के रेकॉर्ड 97 सालों तक एक तहखाने में गुमनामी के अंधेरे में खोए रहे। अब ब्रिटेन के इतिहासकारों ने युद्ध में भारतीय सैनिकों के योगदान को लेकर इनका खुलासा किया है। ये फाइलें पाकिस्तान के लाहौर म्यूजियम की गहराइयों में मिली हैं। इन्हें अब डिजिटल रूप में बदलकर  Armistice Day के लिए एक वेबसाइट पर अपलोड कर दिया गया है। अभी तक ब्रिटिश और आयरिश सैनिकों के वंशजों और इतिहासकारों के पास सर्विस रेकॉर्ड के सार्वजनिक डेटाबेस मौजूद थे। लेकिन भारतीय सैनिकों के परिवारों के पास ऐसी कोई सुविधा मौजूद नहीं थी। पंजाबी मूल के कुछ ब्रिटिश नागरिकों को डेटाबेस में अपने पूर्वजों की खोज के लिए पहले ही आमंत्रित किया जा चुका है। परिवारों ने पाया कि उनके गांव के सैनिकों ने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान फ्रांस, मध्य पूर्व, गैलीपोली, अदन और पूर्वी अफ्रीका के साथ-साथ ब्रिटिश इंडिया के अन्य हिस्सों के लिए अपनी सेवा दी थी।
युद्ध में शामिल हुए ब्रिटिश सिख मंत्री के परदादा
पंजाब 1947 में भारत और पाकिस्तान के बीच दो हिस्सों में विभाजित हो गया था। ब्रिटिश मंत्री तनमनजीत ढेसी ने फाइलों से सबूतों को उजागर करते हुए बताया कि उनके परदादा ने इराक में सेवा की थी। इस कार्रवाई में वह घायल हो गए थे और अपना एक पैर खो दिया था। यह आशा की जाती है कि ये रेकॉर्ड भारतीय सैनिकों के योगदान के बारे में मिथकों को दूर करने में मदद करेंगे।
सैनिकों की भर्ती का ‘प्रमुख मैदान’ था पंजाब
यूके पंजाब हेरिटेज एसोसिएशन के अध्यक्ष अमनदीप मदरा ने फाइलों को डिजिटाइज़ करने के लिए ग्रीनविच विश्वविद्यालय के साथ काम किया है। उन्होंने बताया कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय सेना की भर्ती के लिए पंजाब प्रमुख ‘भर्ती मैदान’ था। इसके बाद भी ज्यादातर लोगों का योगदान गुमनाम ही रहा। ज्यादातर मामलों में हम उनके नाम तक नहीं जानते हैं। सभी धर्मों के पंजाबी, जिनमें हिंदू, मुस्लिम और सिख शामिल थे, भारतीय सेना का लगभग एक तिहाई हिस्सा और साम्राज्य की संपूर्ण विदेशी सेना का करीब छठा हिस्सा थे।
(साभार – नवभारत टाइम्स)

बेशकीमती हीरे जड़े कंगन 61 करोड़ रुपये में बिके

फ्रांस की रानी के गहने हुए नीलाम
जिनेवा : फ्रांसीसी राजा लुई 16वें की प्रसिद्ध पत्नी मैरी एंटोनेट के कंगन की एक जोड़ी नीलामी में 7.46 मिलियन स्विस फ्रै़ंक्स (8.34 मिलियन डॉलर) में बिकी। इन कंगनों पर बेशकीमती हीरे जड़े हुए हैं। ये फ्रांसीसी शाही परिवार के गहनों के दुर्लभ अवशेषों में से एक हैं। जिनेवा में क्रिस्टी की नीलामी में इन कंगनों ने सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा।
इसमें 112 हीरे लगे हुए हैं और प्रत्येक हीरे का वजन 97 ग्राम (3.4 औंस) है। इसके अलावा इसमें चांदी और सोना भी लगा हुआ है। ये कंगन दो से चार मिलियन स्विस फ्रैंक्स के पूर्व-बिक्री अनुमान से कहीं अधिक कीमत पर बिके। अंतिम कीमत में टैक्स और दूसरे शुल्क भी शामिल थे। अभी खरीदार की पहचान उजागर नहीं की गई है। बुधवार को सोथबीज ने भी नीलामी का आयोजन किया जिसमें 26.8 कैरेट का एक नीलम और मैचिंग ईयर क्लिप्स बिक्री के लिए रखी गई थीं।
रूस के शाही गहने हुए नीलाम
ये गहने कभी रूस की ग्रैंड डचेस मारिया पावलोवना के थे। 1917 में रूस की क्रांति के दौरान ये देश से बाहर चले गए थे। इन तीनों के 480,000 फ़्रैंक (525,800 डॉलर) तक पहुंचने की उम्मीद है। दूसरी ओर अमेरिका में शर्लॉक होम्स के नॉवेल ‘द हाउंड ऑफ द बास्करविल्स’ की मूल स्क्रिप्ट का एक हैंडरिटेन पेज 423,000 डॉलर यानी 3.13 करोड़ रुपए में बेचा गया है।
शेरलॉक होम्स की स्क्रिप्ट हुई नीलाम
20×33 सेमी का यह पेज टेक्सास के डलास में हेरिटेज नीलामी की ओर से एक निजी खरीदार को बेचा गया था। जानकारी के मुताबिक पेज अच्छी स्थिति में है। इसकी शीर्षक ‘चैप्टर XIII, फिक्सिंग द नेट्स’ है। इसमें होम्स और डॉ वाटसन को मूर पर एक हत्या और एक संदिग्ध को गिरफ्तार करने के बारे में चर्चा करते हुए दिखाया गया है। पेज में एक लाइन कटी हुई भी है जहां इस पुस्तक के लेखक कॉनन डॉयल ने स्क्रिप्ट में सुधार किया था।

15 हजार पौधे, पानी में उगा रहे स्ट्रॉबेरी, लौकी और करेला जैसी सब्जियां

बरेली : अभी तक फार्म हाउस के बारे में तो खूब सुना होगा लेकिन बरेली के एक पत्रकार ने अपने मकान को हाउस फार्म में बदलकर अनूठी मिसाल पेश की है। रामवीर ने अपने मकान में ही हाइड्रोपोनिक्स विधि से अलग-अलग तरह के 15 हजार पौधे और बेल लगा रखी हैं। उनके पास 100 बीघा खेत भी हैं, जहां वह ऑर्गेनिक खेती करते हैं।
एक घटना ने दिखाई राह
जीवन में एक घटना के बाद रामवीर ने ठान लिया कि वह अब ऑर्गेनिक खेती ही करेंगे। बात 2016 की है। उनके दोस्त के चाचा का कैंसर से निधन हो गया। वह कोई नशा नहीं करते थे। बाद में डॉक्टरों ने बताया कि इसकी वजह कीटनाशक हो सकते हैं जो सब्जियों और हमारे घरों में आने वाले अन्य खाने की चीजों में इस्तेमाल किए जाते हैं। उसके बाद से एक अभियान के तौर पर रामवीर ऑर्गेनिक खेती करने लगे।
60 रुपये किलो आटा, 150 रुपये किलो गुड़
रामवीर का पूरा ध्यान खेती पर है और अभी वह फ्रीलांसिंग ही कर रहे हैं। अब वह ऑर्गेनिक खाद्य उत्पाद भी तैयार कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि 60 रुपये प्रति किलो गेहूं का आटा बेच रहे हैं। चावल 130 रुपये प्रति किलो और गुड़ का पाउडर 150 रुपये किलो बिकता है। वह छोटे किसानों को नि:शुल्क प्रशिक्षण भी देते हैं।
हाइड्रोपोनिक्स विधि पर एक नजर
केवल पानी में या बालू या कंकड़ों के बीच नियंत्रित जलवायु में बिना मिट्टी के पौधे उगाने की तकनीक को हाइड्रोपोनिक कहते हैं। हाइड्रोपोनिक शब्द की उत्पत्ति दो ग्रीक शब्दों ‘हाइड्रो’ और ‘पोनोस’ से मिलकर हुई है। हाइड्रो का मतलब है पानी, जबकि पोनोस का अर्थ है कार्य।
( साभार – नवभारत टाइम्स)

दुनिया का सबसे कीमती आभूषण है निजाम का हीरे का हार

इसकी कीमत करीब 6 अरब 59 करोड़ रुपये है
हैदराबाद के निजाम ने महारानी की शादी पर दिया था यह हार

लंदन : भारत की आजादी के समय दुनिया के सबसे धनी लोगों में शामिल रहे हैदराबाद के निजाम का खजाना एकबार फिर से चर्चा में है। ब्रिटेन की महारानी के गले की शोभा बढ़ा रहा यह हीरे से बना निजाम का हार विशेषज्ञों की नजर में विश्‍व भर में शाही आभूषणों में सबसे कीमती माना गया है। विशेषज्ञों के मुताबिक इस शानदार हार की कीमत वर्तमान समय में 6 अरब 59 करोड़ रुपये है। उन्‍होंने कहा कि महारानी के खजाने में एक से बढ़कर एक आभूषण हैं लेकिन इसकी चमक के आगे सब फीके हैं।
ब्रिटिश महारानी एलिजाबेथ द्वितीय ने कुछ समय पहले अपनी बहू को यह हार पहनने के लिए दिया था। इसे देखकर लोगों की आंखें चौधियां गई थीं। एक्‍सप्रेस डॉट कॉम की रिपोर्ट के मुताबिक महारानी को यह नेकलेस सबसे पहले साल 1947 में राजकुमार फिलीप के साथ सगाई के बाद हैदराबाद के निजाम की ओर से उपहार के रूप में मिला था। एलिजाबेथ उस समय राजकुमारी थीं और उसके 5 साल बाद वह महारानी बनी थीं।
हैदराबाद के निजाम की ओर से शादी का तोहफा
उस समय हैदराबाद पर आसफ जाह सप्‍तम का हैदराबाद पर शासन था। आसफ दुनिया के सबसे धनी लोगों में शामिल था। आभूषणों के मामलों की विशेषज्ञ डायना बोरोमन कहती हैं कि यह दुनिया की सबसे कीमती शाही आभूषण है और इसकी कीमत वर्तमान समय में करीब 6 अरब 59 करोड़ रुपये है। उन्‍होंने बताया कि राजकुमारी एलिजाबेथ को यह उनकी शादी का तोहफा हैदराबाद के निजाम की ओर से दिया गया था।
बोरोमन बताती हैं कि निजाम ने निर्देश दिया था कि राजकुमारी अपनी मर्जी से उनके संग्रह से जो भी जेवर लेना चाहें, वह ले सकती हैं। एलिजाबेथ ने इस हीरे से बने अद्भुत हार को चुना जिसे अब हैदराबाद के निजाम का नेकलेस कहा जाता है। यह हार देखने में तीन जुड़े हुए फूल की तरह से नजर आता है। महारानी को यह हार अभी भी बहुत पसंद है और वह अपनी बहू केट मिडलटन को कभी-कभी यह पहनने के लिए देती हैं।
हार में प्‍लेट‍िनम के अंदर 50 से ज्‍यादा हीरे लगाए गए
बोरोमन ने कहा कि इस हार में प्‍लेट‍िनम के अंदर 50 से ज्‍यादा हीरे लगाए गए हैं। महारानी खुद इसे कई खास मौकों पर पहन चुकी हैं। इसके अलावा महारानी जापानी मोती से बने हार को भी पहनती रही हैं। बता दें कि हैदराबाद के निजाम अपने शाही खजाने के लिए जाने जाते रहे हैं। हैदराबाद के आखिरी निजाम का खजाना आरबीआई के एक वॉल्ट में बंद है। इस खजाने को केवल दो बार ही प्रदर्शनी के लिए रखा गया है। एक बार 2001 और फिर 2006 में निजाम के आभूषणों को सालर जंग म्यूजियम में कुछ समय के लिए रखा गया था। आखिरी निजाम के वंशज हिमायत अली मिर्जा ने मांग की है कि निजाम के खजाने को रिजर्व बैंक की वॉल्ट से निकाल म्यूजियम में रखा जाए।
क्या है हैदराबाद के निजाम का खजाना ?
173 दुर्लभ आभूषण, जिनमें से कुछ 184 कैरेट के बिना कटे जैकब डायमंड हैं। इनमें से कुछ दुनिया के 5 सबसे बड़े हीरे से निकले हैं। इस खजाने को लेकर लड़ाई काफी पहले से जारी है। जैकब डायमंड निजाम के खजाने का सबसे कीमती गहना है। इसे छठवें निजाम महबूब अली खान ने शिमला के एक हीरा व्यापारी से खरीदा था। उस समय निजाम ने इसे 23 लाख में खरीदा था। अब इस कीमत 400 करोड़ रुपये के आसपास लगाई जा रही है।

(साभार – नवभारत टाइम्स)

विख्यात सिनेमा कलाकार शारदा का निधन

कोझिकोड : मलयाली फिल्म और टेलीविजन अभिनेत्री कोझिकोड शारदा का मंगलवार को यहां एक सरकारी मेडिकल कॉलेज में निधन हो गया। वह 84 साल की थीं। सूत्रों ने बताया कि अभिनेत्री उम्र संबंधी बिमारियों से पीड़ित थीं और बीते कुछ समय से अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। लोकप्रिय थियेटर कलाकार के रूप में शारदा ने 1979 में ‘अंगाकुरी’ में अभिनय करके रुपहले पर्दे पर पदार्पण किया था। वह कोझिकोड की रहने वाली थीं इसलिए उन्हें कोझिकोड शारदा के नाम से जाना जाता था। केरल विधानसभा के अध्यक्ष एम बी राजेश, लोक निर्माण मंत्री मोहम्मद रियास, संस्कृति मामलों के मंत्री साजी चेरियन ने शारदा के निधन पर शोक व्यक्त किया है।