Friday, April 10, 2026
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लैक्मे : पंडित जवाहरलाल नेहरू का सपना जो टाटा ने साकार किया और माता लक्ष्मी से है जिसका सम्बन्ध

लैक्मे! इस नाम को कौन नहीं जानता। सौन्दर्य उत्पाद या कॉस्मेटिक्स की दुनिया में लैक्मे नाम किसी पहचान का मोहताज नहीं है। लैक्मे भारत की पहली कॉस्मेटिक्स कंपनी है। आज भारत के नंबर वन कॉस्मेटिक्स ब्रांड पर काबिज इस कम्पनी को शुरू किया था जेआरडी टाटा ने। लैक्मे के जरिए टाटा समूह ने पहली बार कॉस्मेटिकक्स उद्योग में कदम रखा था। टाटा समूह ने भारतीय महिलाओं की संजने-संवरने की आकांक्षा और त्वचा की जरूरतों को कुछ इस कदर समझा कि लैक्मे ब्रांड शुरू होने के साथ ही लोकप्रिय होता चला गया। लैक्मे…इस नाम का सम्बन्ध जेआरडी टाटा के साथ-साथ देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और माँ लक्ष्मी से भी है। आइए जानते हैं लैक्मे की शुरुआत का दिलचस्प किस्सा और बुलंदियों पर पहुंचने की इसकी पूरी कहानी…

बात 1952 की है। आजादी के बाद का वह दौर जब स्वतंत्र भारत की अर्थव्यवस्था अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश कर रही थी। लैक्मे की स्थापना के पीछे पंडित जवाहरलाल नेहरू की सोच रही। देश में अच्छी गुणवत्ता वाले निजी देखभाल वाले देसी सौन्दर्य उत्पादों की कमी थी और भारतीय निर्माता भी बेहद कम थे। लिहाजा उस वक्त देश के संपन्न परिवारों की महिलाएं विदेशी सौन्दर्य उत्पाद इस्तेमाल करती थीं। मध्यम वर्गीय परिवारों की महिलाएं घर पर ही तैयार किए गए सौंदर्य उत्पादों का इस्तेमाल करती थीं। सौन्दर्य उत्पादों के आयात के एवज में देश से एक मोटी धनराशि विदेश जाती थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को इस बात को लेकर चिंता हुई और यही चिंता लैक्मे की उत्पत्ति का कारण बनी।

जेआरडी टाटा से साझा किया विचार

नेहरू ने टाटा ग्रुप के चेयरमैन और अपने दोस्त जेआरडी टाटा से इस बारे में बात की और देश के अंदर अच्छी गुणवत्ता वाले कॉस्मेटिक्स बनाने वाली कंपनी स्थापित करने को कहा। नेहरू जानते थे कि जेआरडी टाटा ही वह शख्स हैं, जिनमें चुनौतियों से जूझने का जुनून और एंटरप्रेन्योरिशप के स्किल हैं। जेआरडी टाटा को भी यह आइडिया पसंद आया क्योंकि कॉस्मेटिक्स के बाजार में देश के अंदर कॉम्पिटीशन न के बराबर था। इस तरह उत्पत्ति हुई लैक्मे ब्रांड की। एक ऐसी कॉस्मेटिक्स कंपनी, जिसने भारतीयों की त्वचा और भारतीय जलवायु को ध्यान में रखकर कॉस्मेटिक्स उतारे।

​टाटा ऑयल मिल्स कंपनी की सब्सिडियरी के तौर पर लॉन्चिंग

लैक्मे को टाटा ऑयल मिल्स कंपनी (टॉम्को) की पूर्ण स्वामित्व वाली सब्सिडियरी के तौर पर 1953 में लॉन्च किया गया। टॉम्को को कोचीन में 1920 में शुरू किया गया था। कोचीन का वर्तमान नाम कोच्चि है। लैक्मे को टॉम्को ने फ्रांस की दो नामी कंपनियों रॉर्बट पिग्वेट और रेनॉयर  के साथ मिलकर शुरू किया था। विदेशी सहयोगियों की इक्विटी में कोई भागीदारी नहीं थी। उनकी भागीदारी केवल उनके संरक्षित परफ्यूम बेसेस के बारे में तकनीकी जानकारी देने तक सीमित थी, जिसके लिए उन्हें टाटा की ओर से फीस का भुगतान किया जाता था। लैक्मे पूरी तरह से एक स्वदेशी ब्रांड था।

​माँ लक्ष्मी से कैसे नाता

लैक्मे, फ्रेंच शब्द है और इसका अर्थ लक्ष्मी है। यह नाम पड़ना भी काफी दिलचस्प है। जब कंपनी को शुरू किया गया तो फ्रांसीसी सहयोगियों को एक नाम सुझाने को कहा गया। एक ऐसा नाम, जिसमें दोनों देशों की झलक हो। तब लैक्मे नाम सामने आया, जो पेरिस में उस वक्त विख्यात एक ओपेरा से प्रेरित था। उस ओपेरा का नाम लैक्मे था, जो समृद्धि और सुंदरता की देवी लक्ष्मी पर आधारित था। तो यह कंपनी के लिए एक सही नाम था। वहीं यह भी कहा जाता है कि लैक्मे का नाम जेआरडी टाटा ने लक्ष्मी ही रखा था और बाद में इसे बदला गया।

​एक छोटे किराए के परिसर से शुरुआत

लैक्मे की शुरुआत मुंबई में पेद्दार रोड पर एक छोटे किराए के परिसर से हुई थी। लॉन्च होने के बाद इसके परिचालन और प्रॉडक्ट रेंज तेजी से बढ़ी और 1960 आते-आते कंपनी बड़े परिसर की तलाश करने लगी। लैक्मे के प्रॉडक्ट अच्छे भी थे और कम कीमतों पर उपलब्ध थे। जल्द ही लैक्मे को टॉम्को की सेवरी फैक्ट्री में शिफ्ट कर दिया गया। लैक्मे के लॉच होने के बाद भारत में विदेशी सौन्दर्य उत्पादों की खेप आनी लगभग बंद सी हो गई। फिल्मों में भी मेकअप के लिए लैक्मे के सौन्दर्य उत्पाद इस्तेमाल किए जाने लगे, जिससे आम लोगों में इसके प्रति विश्वास जगा।

सिमौन ने दी नयी ऊँचाई

इसके बाद लैक्मे को एक नई उंचाई पर लेकर गईं सिमोन टाटा, जो नवल एच टाटा की पत्नी थीं। उन्होंने 1961 में लैक्मे की प्रबन्ध निदेशक का पद संभाला। सिमोन का जन्म जेनेवा, स्विट्जरलैंड में हुआ था। 1953 में वह एक पर्यटक के तौर पर भारत आईं, जहां उनकी मुलाकात नवल एच टाटा से हुई। नवल और सिमोन ने साल 1955 में शादी कर ली और फिर सिमोन हमेशा के लिए मुंबई में बस गईं। सिमोन, नवल टाटा की दूसरी पत्नी हैं। टाटा ग्रुप के वर्तमान चेयरमैन एमिरेट्स रतन टाटा, नावल टाटा और उनकी पहली पत्नी की संतान हैं। सिमोन टाटा की सौन्दर्य को लेकर समझ और व्यवसाय की सूझबूझ ने जल्द ही लैक्मे को नई बुलंदियों पर पहुंचा दिया और यह एक आइकॉनिक ब्रांड बन गया। सिमोन 1982 में लैक्मे की चेयरपर्सन बनीं। सिमोन जब भी विदेशी जाती थीं, वह सौन्केदद सैंपल साथ लाती थीं और उन्हें केमिस्ट को देती थीं ताकि उनके स्पेसिफिकेशन के बारे में पता किया जा सके और लैक्मे को और उम्दा बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सके।

 

​बॉलीवुड की शीर्ष  हीरोइनों का लिया गया साथ

लैक्मे यूं ही इतनी बुलंदी पर नहीं पहुंची। सेल्स ऑफिसेज, सेल्सपर्सन्स, डीलर और एजेंटों के पूरे नेटवर्क ने सुनिश्चित किया कि लैक्मे पूरे भारत के शहरी बाजारों में और उम्दा प्रदर्शन करे। वक्त—वक्त पर मार्केट सर्वे किए गए, अच्छे से सोचसमझ कर तैयार की गई मार्केट स्ट्रैटेजीस पर अमल किया गया और बड़े पैमाने पर पब्लिसिटी कैंपेन चलाए गए। लैक्मे ब्रांड को खड़ा करने के लिए उस जमाने की दिग्गज बॉलीवुड अभिनेत्रियों जैसे रेखा, हेमा मालिनी, जया प्रदा आदि को लैक्मे के विज्ञापन में लिया गया। लैक्मे का पहला ब्रांड फेस मॉडल श्यामोली वर्मा थीं, जो कि 80 के दशक की शुरुआत में एक जानामाना नाम थीं। हर उस भारतीय कस्बे को डिस्ट्रीब्यूशन के तहत कवर किया गया, जिसकी आबादी 20000 लोग या उससे ज्यादा थी। उस वक्त लैक्मे की प्रॉडक्ट रेंज में महिलाओं के लिए मेकअप, स्किनकेयर प्रॉडक्ट और टॉयलेटरीज शामिल थे। बाद में कंपनी पुरुषों के लिए पर्सनल केयर रेंज में भी उतरी, जिसने लैक्मे को और सफलता दिलाई। लैक्मे प्रॉडक्ट्स को कड़े क्वालिटी परीक्षण से गुजारा जाता था ताकि हर प्रॉडक्ट उच्च ग्रेड का हो और अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा उतरे।

​1980 में पहला ब्यूटी सैलन खुला
1980-1980 में लैक्मे का पहला ब्रांडेड ब्यूटी सैलों खुला। सैलों में महिलाओं को ब्यूटी ट्रीटमेंट की पूरी रेंज उपलब्ध कराई गई, इसके लिए क्वालिफाइड ब्यूटीशियंस की मदद ली गई। साल 1993 में टॉम्को को हिंदुस्तान यूनिलीवर के साथ मर्ज कर दिया गया। पहले हिंदुस्तान यूनिलीवर, हिंदुस्तान लीवर (एचएलएल) के नाम से जानी जाती थी।

हिंदुस्तान यूनिलीवर का हुआ ब्रांड

इसके बाद 1996 में टाटा समूह और हिंदुस्तान यूनिलीवर की लैक्मे में 50:50 की साझेदारी हो गयी। साल 1998 में लैक्मे की पूरी हिस्सेदारी हिंदुस्तान यूनिलीवर को मिल गई और लैक्मे, हिंदुस्तान यूनिलीवर के ब्रांड के नाम से जाना जाने लगा। लैक्मे को इस सोच के साथ हिंदुस्तान यूनिलीवर को दिया गया था कि वह ही भविष्य में इसके साथ बेहतर न्याय कर पाएगी और हिन्दुस्तान यूनीलिवर इस विश्वास पर खरा उतरा।

​300 उत्पाद, 70 से भी ज्यादा देशों में कारोबार
आज लैक्मे प्रॉडक्ट की रेंज 100 रुपये से शुरू होती है। इसके लगभग 300 उत्पाद हैं और 70 से ज्यादा देशों में बिक रहे हैं। आज लैक्मे का 6 माह का ब्यूटी कोर्स भी है, जो कि एक डिप्लोमा कोर्स है। गरीब लड़कियों के लिए स्कॉलरशिप प्रोग्राम और स्टार्टअप शुरू करने में मदद की भी पेशकश की जा रही है। लैक्मे फैशन वीक, लैक्मे शोज जैसे ईवेंट भी आयोजित किए जाते हैं।

 (स्त्रोत साभार – नवभारत टाइम्स, दैनिक जागरण, विकिपीडिया)

प्रख्यात साहित्यकार श्रीनिवास शर्मा का निधन

कोलकाता : प्रख्यात वरिष्ठ साहित्यकार एवं आलोचक श्रीनिवास शर्मा का निधन शुक्रवार 2 दिसम्बर की रात हो गया। वे 89 वर्ष के थे। स्वास्थ्य बिगड़ने के कारण उनको महानगर के मारवाड़ी रिलीफ सोसायटी अस्पताल में दाखिल करवाया गया था। उनके स्वास्थ्य में सुधार हो रहा था परन्तु इस बीच अन्य शारीरिक व्याधियों के कारण उनकी तबीयत बिगड़ती चली गयी और उनको बचाया नहीं जा सका। वयोवृद्ध साहित्यकार श्रीनिवास को उनके साहित्यिक योगदान के अतिरिक्त विशेष रूप से दैनिक छपते – छपते के उत्सव विशेषांक के सम्पादन के लिए याद किया जायेगा। इस पत्रिका का सम्पादन उन्होंने निरन्तर 37 वर्ष तक किया। छपते – छपते के सम्पादक एवं ताजा टीवी के चेयरमैन वरिष्ठ पत्रकार विश्वम्भर नेवर ने कहा कि श्रीनिवास जी के प्रयास से ही उत्सव विशेषांक हिन्दी का सर्वश्रेष्ठ विशेषांक बन सका था। उनके निधन के कोलकाता के साहित्य जगत में शोक की लहर है।

अच्छा नागरिक बनना ही देश के प्रति सच्ची प्रतिबद्धता होगी

यह साल का अंतिम महीना है और हम नये साल की तरफ बढ़ रहे हैं। आने वाला साल देश के लिए बहुत महत्वपूर्ण होगा। कोविड -19 के टीकाकरण का रिकॉर्ड भले ही हम बना चुके हैं मगर वैक्सीन की दूसरी खुराक अब भी कई लोग नहीं ले रहे हैं। इस बीच ओमिक्रॉन नाम का नया वैरिएंट नया खतरा बनकर सामने आ गया है। ऐसे में जरूरी है कि हम सभी अपनी जिम्मेदारी समझते हुए कोरोना सम्बन्धी नियमों का पालन करें। देखा जाये तो पहले की तुलना में कोविड -19 को लेकर पहले की तुलना में अधिक जागरुकता आई है मगर इसे बरकरार भी रखना होगा। यह समय है कि जब हम पीछे मुड़कर देखें कि क्या हमने पाया है और कहाँ हमें सुधार करने की जरूरत है। साल भर किसानों का आन्दोलन छाया रहा। चुनाव को देखते हुए काफी कुछ बदलाव हुए पर जिस तरह से आन्दोलन हुआ या जिस तरह के तरीके अपनाए गये…उसे देखते हुए कहीं न कहीं आन्दोलन के तरीकों पर एक बार फिर से हमें नजर डालनी होगी और यह सिर्फ किसानों के साथ नहीं है बल्कि कहीं भी हो…अराजकता को प्रश्रय देने वाली हर बात को विरोध की प्रक्रिया से दूर रखना होगा। 2021 ने काफी कुछ सिखाया है, यूँ कहें कि हम चुनौतियों से जूझना और इसके बीच चलना सीख रहे हैं तो यह गलत नहीं होगा। अब जरूरी है कि अब जब हम आगे बढ़ें तो पूरे आत्मविश्वास और संयम के साथ बढ़ें और सबसे अधिक जरूरी यह कि जिम्मेदार नागरिक बनें। अगले साल देश की आजादी को 75 साल पूरे होंगे और अमृत महोत्सव के दौरान एक अच्छा नागरिक बनना ही देश के प्रति सच्ची प्रतिबद्धता होगी।

शब्दकोश ‘मरियम वेबस्टर’ ने ‘वैक्सीन’ को चुना 2021 का शब्द

न्यूयॉर्क : शब्दकोश ‘मरियम वेबस्टर’ ने ‘वैक्सीन’ (टीके) को 2021 का शब्द चुना है। ‘मरियम वेबस्टर’ के एडिटर-एट-लार्ज पीटर सोकोलोवस्की ने ‘एपी’ को सोमवार को होने वाली घोषणा से पहले बताया, ‘‘ 2021 में यह शब्द हम सभी के जीवन में सबसे अधिक मौजूद रहा। यह दो अलग-अलग कहानी बयां करता है। एक विज्ञान से जुड़ी, जो उस उल्लेखनीय गति को बयां करती है, जिससे टीके का निर्माण किया गया। साथ ही नीति, राजनीति और राजनीतिक संबद्धता को लेकर भी इसके संबंध में चर्चा जारी है। यह एक शब्द है, जो दो बड़ी कहानियां बयां करता है।’’‘ऑक्सफोर्ड’ अंग्रेजी शब्दकोश को प्रकाशित करने वाले लोगों ने वर्ष के शब्द के रूप में ‘वैक्स’ का चयन किया था। वहीं, ‘मरियम-वेबस्टर’ ने पिछले साल ‘पैनडेमिक’ शब्द का चयन किया था, जो उसकी ऑनलाइन साइट पर सबसे अधिक खोजा गया।
सोकोलोवस्की ने कहा कि ‘पैनडेमिक’ अब पीछे छूटता जा रहा है और हम अब उसके प्रभावों को देख रहे हैं। उन्होंने बताया कि अमेरिका में दिसंबर में कोविड-19 रोधी टीके की पहली खुराक दिए जाने के बाद ‘मरियम वेबस्टर’ पर ‘वैक्सीन’ को 601 प्रतिशत अधिक खोजा गया। 2019 में, जब टीकों के बारे में बहुत कम बात हो रही थी, उसकी की तुलना ‘मरियम-वेबस्टर’ पर इस वर्ष ‘वैक्सीन’ शब्द को 1,048 प्रतिशत अधिक खोजा गया। सोकोलोवस्की ने कहा कि असमान वितरण, टीका अनिवार्यता और ‘बूस्टर’ खुराक पर बहस के कारण भी इस शब्द में लोगों की रुचि बढ़ी है। साथ ही, टीका लगाने को लेकर लोगों में संकोच को लेकर भी इसकी लोकप्रियता बढ़ी।

 

जब जज साहब ने खुद ही भर दी आईआईटी की छात्रा की फीस

प्रयागराज : इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस दिनेश कुमार सिंह एक दलित छात्रा की योग्यता से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने खुद उसकी फीस भर दी। उन्होंने जॉइंट सीट एलोकेशन अथॉरिटी और आईआईटी बीएचयू को भी निर्देश दिए कि छात्रा को तीन दिन में दाखिला दिया जाए। अगर सीट न खाली हो तो अतिरिक्त सीट की व्यवस्था की जाए। हाई कोर्ट में दाखिल याचिका में छात्रा ने बताया कि उसके पिता की किडनी खराब हैं। उनकी बीमारी व कोविड की मार के कारण परिवार की आर्थिक हालत बुरी होने से वह फीस नहीं जमा कर पाई। उसने जॉइंट सीट एलोकेशन अथॉरिटी को पत्र लिखकर फीस जमा करने के लिए मोहलत मांगी, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। मजबूरन उसे कोर्ट आना पड़ा। उसने मांग की थी कि फीस की व्यवस्था करने के लिए कुछ और समय दिया जाए।
शुरू से ही रहा अच्छा प्रदर्शन
दरअसल छात्रा दलित है। उसने दसवीं की परीक्षा में 95 प्रतिशत तथा बारहवीं कक्षा में 94 प्रतिशत अंक हासिल किये थे। वह जेईई की परीक्षा में बैठी और उसने मेन्स में 92 प्रतिशत अंक प्राप्त किये तथा उसे बतौर अनुसूचित जाति श्रेणी में 2062 वां रैंक हासिल हुआ। उसके बाद वह जेईई एडवांस की परीक्षा में शामिल हुई जिसमें वह 15 अक्टूबर 2021 को सफल घोषित की गई और उसकी रैंक 1469 आयी।
आईआीटी बीएचयू में मिली सीट
इसके पश्चात आईआईटी बीएचयू में उसे गणित एवं कम्पयूटर से जुड़े पंच वर्षीय कोर्स में सीट आवंटित की गई। किन्तु वह दाखिले की लिए जरूरी 15 हजार की व्यवस्था नहीं कर सकी और समय निकल गया। वह दाखिला नहीं ले पाई। उसने याचिका दाखिल कर मांग की थी कि उसे फीस की व्यवस्था करने के लिए कुछ और समय दे दिया जाए।
वकील तक का नहीं कर सकी इंतजाम
छात्रा इतनी गरीब है कि वह अपने लिए एक वकील का भी इंतजाम भी नहीं कर सकी थी। इस पर अदालत के कहने पर अधिवक्तागण सर्वेश दुबे एवं समता राव ने आगे आकर छात्रा का पक्ष रखने में अदालत का सहयेाग किया।
सप्ताह में दो बार होती है पिता का डायलसिस
छात्रा ने याचिका में कहा कि उसके पिता के गुर्दे खराब हैं और उसका प्रत्यारोपण होना है। अभी उनका सप्ताह में दो बार डायलसिस होता है। ऐसे में पिता की बीमारी एवं कोविड की मार के कारण उसके परिवार की आर्थिक हालत बुरी होने के कारण वह समय पर फीस नहीं जमा कर पाई। जबकि वह प्रारम्भ से ही एक मेधावी छात्रा रही है।

महामारी में निकाले थे 1500 कर्मचारी, अब दोबारा दी नौकरी

नयी दिल्ली : कोविड महामारी का दौर हर किसी के लिए मुश्किल रहा। कंपनियों के कारोबार का नुकसान हुआ तो उन्होंने कॉस्ट कटिंग करते हुए छंटनी शुरू की, जिसके चलते न जाने कितने लोगों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। फ्रांस की हॉस्पिटैलिटी कम्पनी एकॉर ग्रुप ने भी 1500 लोगों को नौकरी से निकाला। लेकिन अब यह कंपनी उनकी फिर से नियुक्ति कर रही है। इतना ही नहीं उन 1500 कर्मचारियों में से एक तिहाई को कंपनी वापस भी रख चुकी है।
एकॉर की भारत में 55 संपत्तियां हैं। भारत, मध्य पूर्व और अफ्रीका के लिए एक्कोर के सीओओ मार्क डेसक्रोजाइल ने टीओआई को बताया, ‘हमारे पास भारत में 6,000 कर्मचारी हैं। कोविड के दौरान और रेवेन्यु में कमी के चलते दुर्भाग्य से उनमें से 25% की छंटनी करनी पड़ी। हमने कर्मचारियों के लिए उस राशि से एक फंड बनाया, जो शेयरधारकों को लाभांश के रूप में भुगतान किया जाना था। दूसरी लहर के बाद की रिकवरी उम्मीद से कहीं ज्यादा मजबूत रही है और हमने भारत में निर्धारित कार्यबल को फिर से नियुक्त करना शुरू कर दिया है।’
कुछ ने ठुकरा दिया ऑफर
अब तक, छंटनी किए गए लोगों में से लगभग एक तिहाई को लौटने के लिए आमंत्रित किया गया है। उन्होंने कहा कि जिन लोगों को यह कॉल मिली, उनमें से कुछ ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया क्योंकि उन्होंने महामारी के दौरान कुछ और करना शुरू कर दिया था।
होटल में सुविधाओं पर अधिक खर्च कर रहे लोग
रिकवरी को लेकर डेस्क्रोजाइल ने कहा कि चूंकि ऑक्युपेंसी बढ़ रही है, इसलिए एवरेज रूम रेट पिछड़ रहे हैं। लोग अब होटल में ठहरने, खाने-पीने या अपने कमरे को अपग्रेड करने पर ज्यादा खर्च कर रहे हैं। बड़ी संख्या में मेहमान इन दिनों ब्रेक पर जा रहे हैं। हवाई किराए पर बचत होने से वे होटल में ठहरने के लिए सुविधाओं पर अधिक खर्च कर सकते हैं। शादियों का चल रहा सीजन होटलों के लिए थोड़ी राहत लेकर आ रहा है। भले ही फुटफॉल बढ़ रहा है, लेकिन कुल मिलाकर राजस्व अभी भी प्री कोविड लेवल के करीब नहीं है।

गुफा में खुदाई कर रहे पुरातत्वविदों ने खोजा 14 हजार साल पुराना पूरा शहर

अंकारा : जर्मन पुरातत्व संस्थान ने घोषणा करते हुए बताया कि तुर्की के पश्चिमी तट पर पहली बार 14,000 साल पुरानी एक बस्ती की खोज की गई है। इस साइट की खोज पिछले साल की शरद ऋतु के दौरान तुर्की और जर्मन वैज्ञानिकों के वैज्ञानिकों की एक टीम ने की थी। यहां डिकिली और बर्गमा शहरों के बीच एक गुफा में खुदाई का पुरातात्विक सर्वे किया गया। पाई गई परतें एपिपेलियोलिथिक काल की हैं।
शोधकर्ताओं ने रेडियोकार्बन विधि का इस्तेमाल करके और पत्थर के औजार और हड्डियों जैसी अन्य खोजों की बारीकी से जांच करके उम्र का निर्धारण किया। अन्य खोजें बीजान्टिन और इस्लामी काल के साथ-साथ कांस्य युग से संबंधित हैं। कुछ महीने पहले तुर्की के संस्कृति और पर्यटन मंत्रालय के सहयोग से और बर्गामा म्यूजियम के निर्देशन में प्राचीन स्थल पर और शोध करने के लिए छह हफ्ते का खुदाई अभियान चलाया गया था।
गुफा में रहते थे शिकारी
जिस गुफा में बस्ती की खोज की गई थी उसका इस्तेमाल शिकारियों के रहने और उत्पादन स्थल के रूप में भी किया जाता था। इससे पहले फ्रांस के ल्योन शहर से 128 किलोमीटर दूर पुरातत्वविदों ने एक प्राचीन कैपिटल सिटी की खोज की थी। इस जगह से खोजकर्ताओं को सैकड़ों तरह की अलग-अलग वस्तुएं भी मिली थीं। बताया गया था कि ये सारा सामान यीशु मसीह के जन्म के लगभग 800 साल पहले का है।
फ्रांस के ल्योन शहर से मिला खजाना
खोजे गए खजानों में कांस्य हथियार और ट्रिंकेट, साथ ही कुम्हार के घड़े और रथ के टुकड़े मिले थे। इतनी मात्रा में प्राचीन सामान मिलने से टूलूज़-जीन जारेस विश्वविद्यालय के पुरातत्वविद काफी खुश हुए थे। उनका दावा था कि यह सेल्टिक कैपिटल सिटी का हिस्सा हो सकता है। यहां से मिली कलाकृतियों को लगभग 800 ईसा पूर्व या फ्रांस के कांस्य युग से संबंधित अर्नफील्ड संस्कृति (1,300 से 800 ईसा पूर्व) के अंत का बताया जा गया था।

जिजिविषा का अद्भुत उदाहरण हैं राजकोट के मारू

पाठ्यक्रम में शामिल होगी उनकी संघर्ष गाथा

राजकोट : गुजरात के जिला राजकोट में रहने वाले 20 वर्षीय उत्तम मारू से जिन्‍होंने कभी न हारने वाली अपनी भावना से अंधापन, कमजोर फेफड़े, चलने में कठिनाई जैसी तमाम चुनौतियों को दरकिनार कर दिया और जीवन में आगे बढ़ रहे हैं। मारू संगीतकार हैं और वे सौराष्ट्र विश्वविद्यालय (एसयू) की स्नातक परीक्षा दे रहे हैं। कुछ भी हो, ऐसा तप निश्चित रूप से पाठ्यपुस्तक सामग्री है। उनके साहस को देखते हुए एसयू ने मारू के जीवन की कहानी को अपने कला संकाय के पाठ्यक्रम में शामिल करने का फैसला किया है। जसनी कॉलेज में बीए सेमेस्टर-5 की परीक्षा दे रहे मारू ने पूरे उपनिषद के अलावा गीता के 700 श्लोकों को कंठस्थ कर लिया है। मारू पंडित की तरह श्लोकों का पाठ कर सकते हैं। संगीत के प्रति अपने जुनून को बनाए रखने के लिए गायन में विशारद की डिग्री प्राप्त ली है और वे तबला भी बजाते हैं।
जीवनी मनोविज्ञान और समाजशास्त्र के पाठ्क्रम में शामिल
कॉलेज का दौरा करने वाले एसयू के प्रो-वाइस चांसलर विजय देसानी ने कहा, “हम अपने पाठ्यक्रमों में इतने सारे लोगों की जीवनी पढ़ाते हैं। मारू के साहस और अपने जीवन में चुनौतियों से पार पाने का दृढ़ संकल्प लाखों किशोरों के लिए प्रेरणा है। हमने उनकी कहानी को मनोविज्ञान और समाजशास्त्र विभागों के सर्वश्रेष्ठ व्यक्तित्व अध्यायों में शामिल करने का फैसला किया है।”
परिवार ने भी नहीं मानी हार
मारू की शारीरिक अक्षमता जन्मजात है। उनके परिवार के अनुसार राजकोट में कई डॉक्टरों ने उम्मीद छोड़ दी थी कि मारू जन्म के बाद भी जीवित रहेगा। टाइम्‍स ऑफ इंडिया से बात करते हुए मारू के दादा कुंवरजीभाई ने कहा: “डॉक्टरों ने हार मान ली थी, लेकिन हमने नहीं। हमने स्थिति को स्वीकार किया और जो कुछ भी हम कर सकते थे वह करने का फैसला किया। हमने उन्हें प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया। मैं श्लोकों का पाठ तब से कर रहा हूं जब वह बहुत छोटा था। मारू ने सब कुछ सुनकर सीखा। वह व्याख्यान रिकॉर्ड करता है और सीखता है।”
(साभार – नवभारत टाइम्स)

वैज्ञानिकों ने खोजे 41,500 साल पुराने ‘जेवर’, हाथी के दांत से बनाया गया था पेंडेंट

वारसॉ : पोलैंड में पुरातत्वविदों ने विशाल हाथी दांत से बने 41,500 साल पुराने पेंडेंट के अवशेष खोजे हैं, जिन्हें खास निशानों से सजाया गया है। कहा जा रहा है कि ये रेकॉर्ड में यूरेशिया के आधुनिक मानव द्वारा बनाए गए गहनों का सबसे पुराना नमूना है। पेंडेंट, जो अब दो टुकड़ों में है, 2010 में पोलैंड के स्टैजनिया गुफा में किए गए पुरातात्विक उत्खनन के दौरान पाया गया था। वैज्ञानिकों की एक टीम ने साइंटिफिक रिपोर्ट्स मैग्जीन में गुरुवार (25 नवंबर) को ऑनलाइन प्रकाशित एक पेपर में बताया कि हाल ही में हुए रेडियोकार्बन से पता चलता है कि यह पेंडेंट 41,500 साल पुराना है। टीम ने एक बयान में कहा कि पेंडेंट की सजावट में एक लूपिंग कर्व में 50 से अधिक पंचर के निशान और दो छेद शामिल है। उन्होंने नोट किया कि प्रत्येक पंचर का निशान एक सफल पशु शिकार या चंद्रमा या सूर्य के चक्र का प्रतिनिधित्व करता है।
पेंडेंट के गले में पहनने का अनुमान
शोधकर्ताओं ने अध्ययन में लिखा, ‘यह यूरेशिया में अपनी तरह का सबसे पुराना ज्ञात आभूषण है और यह यूरोप में आधुनिक होमो सेपियंस के प्रसार से सीधे जुड़ी एक नई तारीख स्थापित करता है।’ इटली में बोलोग्ना विश्वविद्यालय में रसायन विज्ञान की प्रोफेसर और अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता सहरा तालामो, जो मानव विकास और रेडियोकार्बन डेटिंग में माहिर हैं, ने कहा पेंडेंट संभवतः गले में पहना जाता था लेकिन हम इसे लेकर कोई दावा नहीं कर सकते हैं।
इंसानों ने पहली बार क्यों पहने गहने?
शोधकर्ताओं ने कहा कि पेंडेंट ऐसे समय में बनाया गया था जब शारीरिक रूप से आधुनिक मानव दुनिया भर में पहली बार गहने और शरीर के आभूषणों के अन्य रूपों का विकास कर रहे थे। तालामो ने कहा कि इंसानों ने उस समय गहनों का इस्तेमाल करना क्यों शुरू किया, यह एक रहस्य है जिसे शोधकर्ता समझने की कोशिश कर रहे हैं।
(साभार – नवभारत टाइम्स)

देश में पहली बार पुरुष से ज्यादा महिलाएं :  नेशनल फैमिली एंड हेल्थ सर्वे

देश में प्रजनन दर में भी आई कमी, अब औसतन एक महिला के 2 ही बच्चे
नयी दिल्ली : देश की आबादी में पहली बार लिंगानुपात की दृष्टि से पुरुषों की आबादी की तुलना में महिलाओं की आबादी ज्यादा हो गयी है। कभी मिसिंग विमेन का तोहमत झेलने वाले देश के लिए ये बड़ी खुशखबरी है। यही नहीं, देश में प्रजनन दर में भी कमी आई है। नेशनल फैमिली एंड हेल्थ सर्वे के अनुसार, देश में अब 1,000 पुरुषों की तुलना में महिलाओं की आबादी 1,020 हो गई है।

ऐसे बढ़ी महिलाओं की आबादी
नोबेल प्राइज विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने 1990 में एक लेख में भारत में महिलाओं की कम आबादी के लिए ‘मिसिंग वूमन’ शब्द का इस्तेमाल किया किया था। लेकिन धीरे-धीरे भारत में चीजें बदली हैं और अब देश में महिलाओं की आबादी पुरुषों से ज्यादा हो गई है। 1990 के दौरान भारत में प्रति हजार पुरुषों की तुलना में महिलाओं का अनुपात 927 था। 2005-06 में यह आंकड़ा 1000-1000 तक आ गया। हालांकि, 2015-16 में यह घटकर प्रति हजार पुरुषों की तुलना में 991 पहुंच गया था लेकिन इस बार ये आंकड़ा 1000-1,020 तक पहुंच गया है।

अब एक महिला के 2 ही बच्चे
सर्वे में एक और बड़ी बात निकलकर सामने आई है। प्रजनन दर या एक महिला पर बच्चों की संख्या में कमी दर्ज की गई है। सर्वे के अनुसार औसतन एक महिला के अब केवल 2 बच्चे हैं, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर के मानकों से भी कम है। माना जा रहा है कि भारत आबादी के मामले में पीक पर पहुंच चुका है। हालांकि, इसकी पुष्टि को नई जनगणना के बाद ही हो पाएगी।
प्रजनन दर घटी, जनसंख्या में आएगी कमी?
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने एनएफएचएस -5 के आंकड़े जारी किए हैं। प्रजनन दर घटने का असर देश की आबादी घटने में दिखेगा इसका पता तो अगली जनगणना में ही पता चलेगा। एनएफएचएस के पांचवें राउंड के सर्वे में 2010-14 के दौरान पुरुषों में जीवन प्रत्याशा 66.4 साल है जबकि महिलाओं में 69.6 साल।

लड़के की चाहत में कमी नहीं!
सर्वे में कहा गया है कि बच्चों के जन्म का लिंग अनुपात (Gender Ratio) अभी भी 929 है। यानी अभी भी लोगों के बीच लड़के की चाहत ज्यादा दिख रही है। प्रति हजार नवजातों के जन्म में लड़कियों की संख्या 929 ही है। हालांकि, सख्ती के बाद लिंग का पता करने की कोशिशों में कमी आई है और भ्रूण हत्या में कमी देखी जा रही है। वहीं, महिलाएं पुरुषों की तुलना में ज्यादा जी रही हैं।

एनएफएचएस -5 का सर्वे यूं किया गया
एनएफएचएस -5 का सर्वे दो चरणों में 2019 और 2021 में किया गया। देश के 707 जिलों के 6,50,000 घरों में ये सर्वे किया गया। दूसरे चरण का सर्वे अरुणाचल प्रदेश, चंडीगढ़, छत्तीसगढ़, हरियाणा, झारखंड, मध्य प्रदेश, दिल्ली, ओडिशा, पुड्डुचेरी, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में किया गया।
(साभार – नवभारत टाइम्स)