Friday, April 10, 2026
खबर एवं विज्ञापन हेतु सम्पर्क करें - [email protected]
Home Blog Page 300

सुष्मिता और लारा के बाद भारत की हरनाज बनीं मिस यूनिवर्स 2021

21 साल बाद किसी भारतीय ने जीता है खिताब

मिस यूनिवर्स 2021 का ताज भारत की हरनाज संधू ने अपने नाम कर लिया है। इजराइल में हुई इस प्रतियोगिता के प्रीलिमिनरी राउंड में 75 से ज्यादा खूबसूरत और प्रतिभाशाली युवतियों ने हिस्सा लिया था। टॉप 3 में साउथ अफ्रीका और पराग्वे की सुंदरियों को पीछे छोड़ते हुए हरनाज संधू ने ‘ब्रह्माण्ड सुंदरी’ के ताज पर अपना नाम लिख डाला। खास बात ये है कि हरनाज से पहले केवल दो भारतीय महिलाएं मिस यूनिवर्स बनी हैं। भारत ने इससे 21 साल पहले इस खिताब पर कब्जा किया था। 1994 में अभिनेत्री सुष्मिता सेन और 2000 में लारा दत्ता ने यह खिताब जीता था। हरनाज से पूछा गया था कि आज के दबावों से निपटने के लिए युवा महिलाओं को आप क्या सलाह देंगी?
इस सवाल पर हरनाज ने जवाब दिया, ‘आज का युवा जिस सबसे बड़े दबाव का सामना कर रहा है, वह है खुद पर विश्वास करने का। यह जानना कि आप यूनीक हैं, आपको सुंदर बनाता है। दूसरों के साथ अपनी तुलना करना बंद करें और दुनिया भर में हो रही ज्यादा महत्वपूर्ण चीजों के बारे में बात करें। बाहर निकलें, अपने लिए बोलें, क्योंकि आप अपनी लाइफ की लीडर हैं। आप खुद अपनी आवाज हैं। मुझे खुद पर विश्वास था और इसलिए मैं आज यहां खड़ी हूं।’ मिस यूनिवर्स 2021 का क्राउन जीतने के बाद एक वीडियो में हरनाज काफी खुश नजर आ रही हैं। हंसते हुए हरनाज ‘चक दे फट्टे इंडिया… चक दे फट्टे’ कहती दिखी। भारत की हरनाज संधू ने तीन घंटे चली लाइव ​प्रतियोगिता में मिस यूनिवर्स का खिताब अपने नाम करने से पहले कई राउंड पार किए। उन्होंने नेशनल कॉस्ट्यूम, इवनिंग गाउन, इंटरव्यू और स्विमवियर राउंड में कॉन्फिडेंस और ग्रेस दिखाया। उनके साथ टॉप 10 में पराग्वे, प्यूर्टो रिको, यूएसए, दक्षिण अफ्रीका, बहामास, फिलीपींस, फ्रांस, कोलंबिया और अरूबा की सुंदरियां शामिल थीं। सभी राउंड में बेहतर प्रदर्शन करते हुए हरनाज ने इतिहास रचा।

नेहरू के टोकने पर 10 भाषाओं में बोल गये झाँसी के पहले सांसद धुलेकर

हिन्दी बोलने पर टोका गया था

झांसी : झांसी के पहले सांसद आचार्य रघुनाथ विनायक धुलेकर मराठी परिवार से थे। लेकिन, उनकी बोलचाल की भाषा हिंदी ही थी। वह हिंदी के प्रबल पक्षधर थे। हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिलाने में उनका योगदान अहम रहा है। एक रोचक किस्सा संसद से जुड़ा है। किस्सा कुछ यूं है कि वह एक बार संसद में हिंदी में बोल रहे थे। इस पर तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें टोक दिया। पं. नेहरू ने कहा, संसद में अलग-अलग भाषाओं को जानने वाले बैठे हुए हैं। यदि आप अपनी बात अंग्रेजी में रखें तो सबको समझ में आएगी। इस पर धुलेकर रुके नहीं। वह, अंग्रेजी में ही नहीं, बल्कि मराठी, गुजराती, उड़िया, अरबी, बंगाली, संस्कृत, उर्दू समेत दस भाषाओं में बोले। वह बोलते जा रहे थे और संसद में मौजूद सभी लोग हतप्रभ थे। धुलेकर ने कहा, मुझे दस भाषाओं का ज्ञान है। पर, भारत को जोड़ने वाली भाषा हिंदी ही है, जिसे राजभाषा बनाया जाना चाहिए।

संविधान सभा में सबसे विवादास्पद विषय था भाषा । इस बात पर सबसे अधिक विवाद था की सदन में कौन सी भाषा बोली जाएगी , संविधान किस भाषा में लिखा जाएगा और किस भाषा को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा दिया जाएगा। इस पर 10 दिसंबर 1946 का दिन ऐतिहासिक है ।

संयुक्त प्रांत से चुनकर आनेवाले आर. वी. धुलेकर (स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित रघुनाथ विनायक धुलेकर का जन्म 1891 -1980, झांसी, शिक्षा कलकत्ता विश्वविद्यालय व इलाहाहाबाद विश्वविद्यालय) ने एक संशोधन विधेयक प्रस्ताव पेश किया । जब उन्होंने हिंदुस्तानी भाषा में बोलना शुरू किया तो सभा के अध्यक्ष ने उन्हें याद दिलाया कि बहुत सारे सदस्य उस भाषा को नहीं समझते जिस भाषा में वह बोल रहे हैं। इस पर धूलेकर का जवाब था, कि  जो लोग हिंदुस्तानी नहीं समझते हैं उन्हें इस देश में रहने का कोई अधिकार नहीं है । जो लोग भारत का संविधान बनाने के लिए इस सदन में मौजूद हैं, लेकिन हिंदुस्तानी भाषा नही जानते वे इस सदन के सदस्य रहने के काबिल नही हैं अच्छा हो वह सदन से बाहर चले जाएं, सदन में हंगामा मच गया , लेकिन धुलेकर ने अपना वक्तव्य जारी रखा और कहा प्रस्ताव करता हूं कि प्रक्रिया समिति अपना नियम अंग्रजी में न बनाकर हिंदुस्तानी भाषा में बनाए। धुलेकर ने अपना वक्तव्य जारी रखते हुए कहा, मैं अपील करता हूं की हमलोगों को, जिसने आजादी की लड़ाई जीती है और इसके लिए संघर्ष करते रहे हैं , अपनी भाषा में सोचना और अभिव्यक्ति करनी चाहिए । कितने धुरंधर , कितने दृढ़ निश्चय वाले थे हमारे वह पूर्वज जिन्होंने अपना सर्वस्व न्योछावर करके बिना कुछ पाने की उम्मीद के लीक से उतरे देश को केवल आत्मबल से ही लीक पर लाने का प्रयास करते रहे। शायद उनके मन ने एक दिवास्वप्न देखा था की हमारा आजाद भारत ऐसा होगा वैसा होगा शायद स्वर्ग से भी सुंदर ।
यह भाषाई बात इसलिए उठी थी कि भारत अब आजाद होने जा रहा था , लेकिन वर्षो तक अंग्रेजी भाषा और क्षेत्रीय भाषाओं के बल पर उसका  काम चलाता रहा , लेकिन अब जब देश आजाद होने जा रहा था, तो प्रश्न यह उठ रहा था कि किस  भाषा में संविधान लिखी जाए और उत्तर और दक्षिण के और पूरब पश्चिम के  राज्यों में सामंजस्य कैसे स्थापित हो ? उत्तर में गंगा के किनारे और उसके आसपास की भाषा अवधी , भोजपुरी, मैथिली, मारवाड़ी और भी कई अन्य भाषाओं की बोली समझ में आती थी । दूसरी बात यह की दक्षिण भारत के लोगों के लिए यह भाषाएं अपरिचित थी । पूर्वी और दक्षिण भारत के लोग असमी,बंगाली, उड़िया, तमिल और तेलुगू भाषा बोली जाती थी जिनके हरेक की अपनी लिपि थी और उनकी श्रेष्ठ कोटि की अपनी साहित्यिक परंपरा थी । इस मसले पर पुरुषोत्तम दास टंडन से खुलकर बहस हुई जो हिंदी को विदेशी प्रभावों से मुक्त करने के कट्टर हिमायती थे । टंडन अखिल भारतीय हिंदी साहित्य परिषद के उपाध्यक्ष थे, जिन्होंने मांग की थी की देवनागरी लिपि ही एक मात्र वह भाषा है, जिसके कारण   हिंदी ही इस देश की एकमात्र राष्ट्रभाषा हो सकती है राजर्षी पुरुषोत्तम दास टंडन 13 वर्षों तक उत्तर प्रदेश विधान सभा के अध्यक्ष रहे और उन्हें भारत रत्न से भी नवाजा गया ।

(साभार – अमर उजाला, चिरौरी न्यूज)

देवघर एम्स व एयरपोर्ट से जुड़ेगा पटना-कोलकाता एक्सप्रेस-वे

कोलकाता/ पटना : केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय द्वारा भारत माला-2 प्रोजेक्ट के तहत पटना-कोलकाता एक्सप्रेस-वे की स्वीकृति दिये जाने के बाद जनवरी में इस एक्सप्रेस-वे का टेंडर निकालने की अनुमति दे दी गयी है। एनएचआई ने पटना-कोलकाता एक्सप्रेस-वे की रूपरेखा तैयार कर ली है। पटना से 6 लेन यह एक्सप्रेस-वे बिहारशरीफ, सिकंदरा, चकाई से सीधे झारखंड में देवघर जिले के देवीपुर क्षेत्र में प्रवेश करेगी। देवीपुर में यह एक्सप्रेस-वे एम्स को जोड़ने वाली प्रस्तावित फोरलेन सड़क को कनेक्ट करते हुए मधुपुर की ओर निकल जायेगी। इससे देवघर की बिहार व बंगाल से कनेक्टिविटी बढ़ेगी. इतना ही नहीं, बिहार और बंगाल से एम्स आने वाले रोगियों को भी सुविधा होगी।

देवघर के मधुपुर में एयरपोर्ट को कनेक्ट करने वाली चांदडीह-मधुपुर स्टेट हाइवे पटना-कोलकाता एक्सप्रेस-वे से जुड़ जायेगा। मधुपुर से करौं होते हुए यह एक्सप्रेस-वे करमाटांड़ व जामताड़ा से दुर्गापुर होते हुए कोलकाता निकल जायेगी। देवघर जिले में करीब 250 गांवों से यह एक्सप्रेस-वे गुजरेगी। पटना-कोलकाता एक्सप्रेस-वे की लंबाई 495 किलोमीटर होगी। यह सड़क 6 लेन होगी व इसमें कुल 21 हजार करोड़ रुपये खर्च किये जायेंगे। यह एक्सप्रेस-वे पूरी तरह से नया ग्रीनफिल्ड बनेगा।

बिहार सरकार के प्रस्ताव पर केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने इस ग्रीनफिल्ड एक्सप्रेस-वे को मंजूरी दी है। अगस्त में देवघर आये बिहार के पीडब्ल्यूडी मंत्री नितिन नवीन व गोड्डा सांसद डॉ निशिकांत दुबे की बैठक में पटना-कोलकाता एक्सप्रेस-वे को एम्स व एयरपोर्ट से जोड़ने के लिए एलाइमेंट को फाइनल किया गया था। इस एलाइमेंट के अनुसार देवघर जिले में बहुत कम मकान टूटेंगे. अधिकांश खाली जमीन से एक्सप्रेस-वे गुजरेगी। यह मार्ग तैयार होने के बाद देवघर से पटना व कोलकाता का सफर दो से ढाई घंटे में पूरी करने की संभावना जतायी गयी है।

फसलों को जहरीले आर्सेनिक से बचाव करेगी नयी खाद

कोलकाता के दो विश्वविद्यालयों का साझा शोध
अब नई खाद फसलों को जहरीले आर्सेनिक से बचाव करेगी
कोलकाता : अब नई खाद फसलों को जहरीले आर्सेनिक से बचाव करेगी। कोलकाता के दो विश्वविद्यालयों के शोध से पता चला है कि कृषि में उर्वरक के रूप में सोडियम सल्फेट का उपयोग फसलों में आर्सेनिक के प्रवेश को रोक सकता है। यह मूल रूप से आर्सेनिक को मिट्टी के अंदर ही सोख लेता है। कलकत्ता और जादवपुर दो विश्वविद्यालयों का शोध पत्र हाल में एनवायरमेंट पाल्यूशन नामक विज्ञान पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। शोधकर्ताओं की एक टीम धान सहित विभिन्न फसलों में आर्सेनिक के प्रवेश को रोकने के लिए नए तरीके तलाश रही है। आर्सेनिक भूजल में पाया जाना वाला जहरीला रासायनिक तत्व है। शोधकर्ताओं ने आर्सेनिक को नियंत्रित करने के लिए खेती में सोडियम सल्फेट के इस्तेमाल का सुझाव दिया है। इस मामले में उन्होंने मुख्य रूप से धान पर शोध किया है। शोध पत्र के मुख्य लेखक जादवपुर के पारिस्थितिकी विभाग के दीपांजन मृधा हैं। उनके अनुसार सोडियम सल्फेट फसलों में आर्सेनिक जैसे घातक जहर के प्रवेश को रोकने में सक्षम है।
कृषि और पर्यावरणविदों ने बार-बार कहा है कि सिंचाई के लिए भूजल का उपयोग करने के परिणामस्वरूप आर्सेनिक भी धान और अन्य अनाजों में प्रवेश कर रहा है। उनके मुताबिक यह खतरा सिर्फ आर्सेनिक प्रभावित इलाकों तक ही सीमित नहीं है, यह अनाजों के जरिए अलग-अलग हिस्सों में फैल रहा है।
देश के 20 प्रतिशत भूजल में जहरीली मात्रा में आर्सेनिक मौजूद
आइआइटी खडग़पुर ने हाल में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की मदद से एक अध्ययन में पता लगाया है कि देश के करीब 20 प्रतिशत भूजल में जहरीला आर्सेनिक बड़े स्तर पर मौजूद है। देश की करीब 25 करोड़ आबादी आर्सेनिक वाले जहरीले पानी के संपर्क में है। देश में पंजाब, हरियाणा, बंगाल, बिहार, गुजरात, उत्तर प्रदेश, असम, आदि राज्यों में आर्सेनिक की समस्या गंभीर है। आर्सेनिक के लगातार संपर्क में आने से त्वचा, हृदय संबंधी रोग, डायबिटीज, श्वसन और गैस्ट्रो इंटेस्टाइनल संबंधित समस्याएं व कैंसर जैसे रोग हो सकते हैं।

 

अब लीज पर दिया जायेगा दिल्ली का पहला पाँच सितारा होटल अशोक

25 एकड़ में फैला है, 550 कमरे हैं
नयी दिल्ली : वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ढांचागत परियोजनाओं के वित्त पोषण के लिये पुरानी संपत्तियों को पट्टे पर देने या बेचने को लेकर राष्ट्रीय मौद्रिकरण पाइपलाइन (एनआईपी) की घोषणा की थी, इसके तहत अशोक होटल को 99 साल के लीज पर दिया जा सकता है
पंडित नेहरू ने बनवाया अशोक होटल
होटल अशोक साल 1956 में शुरू हुआ था। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की चाणक्यपुरी में मौजूद अशोक होटल में 7 मंजिल और 550 कमरे हैं। अशोक होटल की खासियत यहां मौजूद बिना खम्भों के सबसे बड़ा कन्वेंशन हॉल है। होटल अशोक का निर्माण भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा जम्मू-कश्मीर के राजकुमार कर्ण सिंह द्वारा सरकार को दान की गई 25 एकड़ की जमीन पार्कलैंड पर किया गया था। मशहूर आर्किटेक्ट ई बी डॉक्टर की अगुवाई में अशोक होटल का पूरा खाका तैयार हुआ था।
यूनेस्को की मेजबानी
अशोक की इमारत इंडो-मॉडर्निस्ट आर्किटेक्चर स्टाइल का प्रतीक है। अशोक होटल नई दिल्ली को नौवें यूनेस्को सम्मेलन के आयोजन के हिसाब से दुनिया भर के नेताओं और गणमान्य व्यक्तियों की मेजबानी के लिए बनाया गया था। अशोक होटल की स्थापना के वक्त इसके 23 शेयरहोल्डर्स में 15 रियासतों के शासक थे।
पंडित नेहरू के दिल के करीब
पीएम जवाहरलाल नेहरू अशोक होटल के निर्माण के काम को देखने के लिए घोड़े पर बैठकर आते थे। अशोक होटल परियोजना नेहरू के दिल के इतने करीब थी कि उन्होंने खुद परिसर में पेड़-पौधों को रोपने का काम देखा था। उसी समय होटल में आम का पहला पेड़ लगाया गया था। आज इसे ‘पिकल ट्री’ के नाम से जाना जाता है और इससे मिले फलों से होटल की जैम और मुरब्बे की जरूरतें पूरी हो जाती हैं।


अमिताभ की फिल्म शूट हुई
अमिताभ बच्चन की फिल्म लावारिस का एक सीन भी साल 1981 में अशोक होटल में शूट किया गया था। साल 2017 में अशोक होटल को बिल्डिंग ऑपरेशन और रखरखाव के लिए एलईईडी एलगोल्ड सर्टिफिकेट मिला था। 1970 के दशक में अशोक होटल ने नई दिल्ली में पहले नाइट क्लबों में से एक की मेजबानी की, जिसे सपर क्लब कहा जाता है। उषा उत्थुप , शेरोन प्रभाकर , हेमा मालिनी , उदय शंकर सभी ने स्टारडम हासिल करने से पहले कार्यक्रम स्थल पर प्रदर्शन किया।
कई बड़े आयोजनों का बना गवाह
साल 1968 में तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने अपने बेटे राजीव गांधी की सोनिया से शादी का जश्न मनाने के लिए अशोक होटल में एक बड़े भोज की मेजबानी की थी। 1980 के दशक में फिल्म अभिनेता शाहरुख खान अपने करियर के शुरुआती दिनों में अक्सर अशोक होटल जाते थे। साल 1989 में यश चोपड़ा की फिल्म चांदनी की शूटिंग भी अशोक होटल में हुई थी।
एनडीए नेताओं का भोज
अशोक होटल में करीब 1000 कर्मचारी काम करते हैं, जिसके संचालन में रोजाना करीब 35 लाख रुपये का खर्च आता है। भारत में साल 2019 के आम चुनाव के बाद सरकार बनाने से पहले प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने एनडीए गठबंधन के नेताओं के लिए अशोक होटल में अमित शाह की अध्यक्षता में एक रात्रिभोज की मेजबानी की थी।
अशोक होटल का प्रबंधन
अशोक होटल में फिदेल कास्त्रो, अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन का भी स्वागत हो चुका है। अशोक होटल में एयर इंडिया के स्टाफ के लिए 150 कमरे पहले से ही बुक रहते थे। पर्यटन मंत्रालय के अधीन आने वाला भारतीय पर्यटन विकास निगम लि. (आईटीडीसी) सार्वजनिक उपक्रम है, जो अशोक होटल को संभालता है। यह देश में विभिन्न स्थानों पर पर्यटकों के लिए होटल, रेस्तरां का परिचालन करने के साथ परिवहन सुविधाएं उपलब्ध कराता है।
सांसदों को भी अशोक का सुख
दिल्ली में सरकारी आवास मुहैया कराए जाने तक सांसदों को होटल में कमरे की सुविधा देने का प्रावधान था। पांच सितारा अशोक होटल में महीनों तक सांसद रहते थे। संसद में बड़ी संख्या में नए सदस्य आने और पुराने सांसदों की ओर से आवास खाली करने, घर की मरम्मत आदि में वक्त लगने की वजह से सांसद को पांच सितारा होटल अशोक में रहने की सुविधा मिलती थी।
अशोक को पट्टे पर देने की तैयारी
अशोक समूह के होटल आईटीडीसी के तहत प्रमुख होटल श्रृंखला हैं। अशोक होटल का ब्रांड मूल्य पिछले 40-50 वर्ष में विकसित हुआ है और विभिन्न मंत्रालयों तथा सार्वजनिक क्षेत्र की संस्थाओं द्वारा आयोजित सभी सरकारी कार्यक्रमों के लिए केंद्रीय मंच रहा है। मोदी सरकार की सोच है कि अशोक समूह के ब्रांड मूल्य का लाभ उठाया जा सकता है।
(साभार – नवभारत टाइम्स)

दुनिया में सबसे पहले समुद्र से निकला सिंहभूम, अफ्रीका-ऑस्ट्रेलिया से 20 करोड़ साल पुराना

7 साल की खोज में हुआ साबित

सिंहभूम : दुनिया में सबसे पहले समुद्र से बाहर कौन सा द्वीप बाहर आया? अब तक हम सब यही मानते रहे कि सबसे पहले अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया समुद्र से बाहर आए, लेकिन अब नये शोध में सामने आया है कि झारखंड में सिंहभूम जिला समुद्र से बाहर आने वाला दुनिया का पहला महाद्वीप है। 3 देशों के 8 शोधकर्ता, 7 साल के शोध के बाद इस नतीजे पर पहुंचे हैं। सिंहभूम में रिसर्च टीम की अगुआई करने वाले ऑस्ट्रेलिया के पीटर केवुड ने कहा, ‘हमारा सौरमंडल, पृथ्वी या दूसरे ग्रह कैसे बने? इन सवालों की खोज में मैं और मेरी टीम के 7 साथी, जिनमें 4 भारत से थे, ने 7 साल तक झारखंड के कोल्हान और ओडिशा के क्योंझर समेत कई दूसरे जिलों के पहाड़-पर्वतों को छान मारा। पृथ्वी से जमीन कब बाहर निकली, इस सवाल का जवाब खोजने के लिए जुनून जरूरी था। ये जगह नक्सल प्रभावित है लेकिन हमने तय किया था कि करना है, सो करना है।’ ‘अपने 6-7 साल के फील्ड वर्क में लगभग 300-400 किलो पत्थरों का लेबोरेट्री में परीक्षण किया है। इनमें कुछ बलुआ पत्थर थे और कुछ ग्रेनाइट। हमने जो बलुआ पत्थर देखें, उनकी खासियत यह थी कि उनका निर्माण नदी या समुद्र के किनारे हुआ था। नदी या समुद्र का किनारा तभी हो सकता है, जब आसपास भूखंड हो।
सिंहभूम 320 करोड़ साल पहले बना था
पीटर ने कहा, ‘जब हमने बलुआ पत्थरों की उम्र निर्धारित करने की कोशिश की, तब हमें पता चला कि सिंहभूम आज से लगभग 320 करोड़ साल पहले बना था। इसका मतलब यह हुआ कि आज से 320 करोड़ साल पहले यह हिस्सा एक भूखंड के रूप में समुद्र की सतह से ऊपर था।’ ‘अब तक माना जाता रहा है कि अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया के क्षेत्र सबसे पहले समुद्र से बाहर निकले लेकिन हमने पाया कि सिंहभूम क्षेत्र उनसे भी 20 करोड़ साल पहले बाहर आया। हमारा दावा कि सिंहभूम क्रेटान समुद्र से निकला पहला द्वीप है, यह हमारी पूरी टीम के लिए बड़ा ही रोमांचक पल था।’
सिंहभूम महाद्वीप के नाम से जाना जाता है इलाका
हमने सिंहभूम के ग्रेनाइट पत्थर की जब जांच की तो यह पता चला- सिंहभूम महाद्वीप आज से तकरीबन 350 से 320 करोड़ साल पहले लगातार ज्वालामुखी गतिविधियों से बना था। इसका मतलब यह हुआ कि 320 करोड़ साल पहले सिंहभूम महाद्वीप समुद्र की सतह से ऊपर आया, लेकिन उसके बनने की प्रक्रिया उससे भी पहले शुरू हो गई थी। यह क्षेत्र उत्तर में जमशेदपुर से लेकर दक्षिण में महागिरी तक, पूर्व में ओडिशा के सिमलीपाल से पश्चिम में वीर टोला तक फैला हुआ है। इस क्षेत्र को हम सिंहभूम क्रेटान या महाद्वीप कहते हैं। पीटर ने बताया, ‘​​​​शोध के लिए हमने पिछले 6-7 साल में कई बार सिंहभूम महाद्वीप के कई हिस्सों में फील्ड वर्क किया जैसे कि सिमलीपाल, जोडा, जमशेदपुर, क्योंझर इत्यादि। अध्ययन के दौरान हमारा केंद्र जमशेदपुर और ओडिशा का जोड़ा शहर था। यहीं से कभी बाइक से कभी बस-कार से फील्ड वर्क पर निकलते थे।’
आगे के शोध के लिए राह खुली
सिंहभूम दुनिया का पहला द्वीप है जो समुद्र से बाहर निकला, यानी यहां के आयरन ओर की पहाड़ियों समेत दूसरी पहाड़ियां 320 करोड़ साल से भी ज्यादा पुरानी हैं। इस रिसर्च के मॉड्यूल से पहाड़ी इलाकों अथवा पठारी क्षेत्र में आयरन, गोल्ड माइंस खोजने में सहूलियत हाेगी। इसके अलावा बस्तर, धारवाड़ इलाकों में भूमिगत घटनाओं की उत्पति की जानकारी मिलेगी। भू-गर्भीय अध्ययन के लिए भी यह रिसर्च बहुत उपयोगी साबित होगी।

कोलकाता-बारीपदा से कूरियर के जरिए ऑस्ट्रेलिया भेजते थे पत्थर
हमारी टीम अलग-अलग समय पर शोध के लिए भारत पहुंची। इस दौरान तीन से चार क्विंटल पत्थर रिसर्च के लिए इकट्ठे किए। उन्हें बारीपदा और कोलकाता के रास्ते ऑस्ट्रेलिया के लिए कूरियर से भेजा। हम लोग स्थानीय होटल या ढाबे में खाना खाते थे और रिसर्च के लिए जंगल-पहाड़ों काे निकलते थे। हमारा फील्ड वर्क 2017 और 2018 में ज्यादा रहा। हम खासतौर से बताना चाहते हैं कि नक्सल प्रभावित एरिया हाेने के बावजूद कभी परेशानी नहीं हुई।
सैंपल कलेक्शन में स्थानीय लोगों ने मदद की
हम पत्थरों को उनके प्राकृतिक रूप में समझने की कोशिश करते थे। जैसे उनका स्वरूप कैसा है, उनका रंग क्या है, वे कितनी आसानी से टूट सकते हैं, कितनी दूर तक फैले हुए हैं। हम अलग-अलग समय में आते थे। कभी बरसात, कभी गर्मी के दिनाें में। फील्ड वर्क में सबसे कठिन काम यह ढूंढना होता था कि पत्थर कहां पर मौजूद हैं। हमारे पास मैप होते थे, लेकिन ज्यादातर समय छोटी चट्टानें या फिर सड़कों के किनारे या नदी नालों के किनारे स्थित पत्थरों तक पहुंचने के लिए हमें स्थानीय लोगों की मदद लेनी पड़ी। सिंहभूम में फील्ड वर्क करने के दौरान ऐसी परिस्थितियां आईं, जब स्थानीय लोगों ने हमें पत्थर ढूंढने में बहुत मदद की थी।
5-5 किलो के थैलों में एकत्रित करते थे सैंपल
पत्थरों को प्राकृतिक रूप में जांचने के बाद हम उनका सैंपल कलेक्ट करते और लैबोरेट्रीज में ले जाते। हम 5-5 किलो के थैलों में सैंपल कलेक्ट करते थे। सैंपल कलेक्ट करने के लिए हम पत्थरों को हथौड़े से मारकर उनके टुकड़े करते। यह भी एक कठिन काम था। कभी-कभी ऐसे पत्थर मिलते थे, जिन्हें तोड़ने के लिए बहुत मशक्कत करनी पड़ी। इन सैंपल को हम लैबोरेट्री में ले जाते थे। वहां यह खोज की जाती थी कि वह किन- किन रासायनिक तत्वों से बने थे जैसे- लोहा, मैग्नीशियम, ऑक्सीजन वगैरह। आखिरकार हमारे संघर्ष का मुकाम सुखद रहा। इस तरह हमने पाया कि समुद्र से निकलने वाला द्वीप हमारा सिंहभूम ही था।

रिसर्च टीम में ये वैज्ञानिक शामिल
सिंहभूम पर 7 साल तक रिसर्च करने वाले वैज्ञानिकों की टीम में ऑस्ट्रेलिया की मोनाश यूनिविर्सिटी के पीटर केवुड, जैकब मल्डर, शुभोजीत राय, प्रियदर्शी चौधरी और ऑलिवर नेबेल, ऑस्ट्रेलिया की ही यूनिवर्सिटी ऑफ मेलबर्न की ऐश्ली वेनराइट, अमेरिका के कैलिफोर्निया इंस्टूट्यूट ऑफ टेकनोलॉजी के सूर्यजेंदु भट्टाचार्य के साथ दिल्ली यूनिवर्सिटी के शुभम मुखर्जी शामिल हैं।

(साभार – दैनिक भास्कर)

कश्मीर से कन्याकुमारी की पसन्द अलवर का कलाकंद

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भी भाता था इसका स्वाद
अलवर : पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जब भी सड़क मार्ग से जयपुर आते या जाते थे, तो बीच में एक जगह उनका काफिला जरूर रुकता था। ये जगह होती थी अलवर और रुकने की वजह होती दूध से बनी खास मिठाई कलाकंद। इस मिठाई को पसंद करने वालों की सूची काफी लंबी है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भारत के कोने-कोने तक इसका स्वाद पहुंच चुका है। मिल्क केक के नाम से प्रसिद्ध अलवर के कलाकंद का जायका आज कई सरहदें पार कर चुका है। राजस्थानी जायका की इस कड़ी में आपको ले चलते हैं कलाकंद के मीठे सफर पर।
कलाकंद बनने की कहानी काफी रोचक है। अभिषेक तनेजा बताते हैं आजादी से पहले पाकिस्तान में बाबा ठाकुर दास के हाथ से दूध फट गया था। तब बतौर हलवाई उन्होंने एक प्रयोग किया। दूध को फेंकने की बजाय इसमें चीनी मिलाकर ओटाने लगे। दूध से पानी खत्म होने के बाद इसे ठंडा करने के लिए खोमचे में रख दिया। जब इसे चखकर देखा तो स्वाद बेहतरीन लगा। ग्राहकों ने भी इसे काफी पसंद किया। आजादी के बाद बाबा ठाकुरदास का परिवार अलवर आकर बस गया। यहां छोटी सी दुकान खोली और कलाकंद बनाना शुरू किया। अभिषेक बाबा ठाकुरदास की तीसरी पीढ़ी से हैं। अलवर में आज उनके 5 स्टॉल हैं, यहां लगी भट्टियों में दिन रात कलाकंद तैयार होता है।


ठाकुरदास के हाथों बने कलाकंद का स्वाद लोगों की जुबान पर चढ़ने लगा। धीरे-धीरे स्थानीय हलवाईयों ने भी इसे बनाने का तरीका सीखा। आज पूरे अलवर में करीब ढाई हजार से ज्यादा दुकानों पर कलाकंद बनता है। कारोबारी बताते हैं कि अलवर शहर और गांवों में बनने वाले करीब 15 हजार किलो कलाकंद की खपत रोज होती है। अब तो अलवर का कलाकंद देश की सीमाओं के बाहर भी पहुंच चुका है। यहां आने वाले सैलानी तो इसे अपने साथ ले जाते ही हैं, लेकिन बाबा ठाकुरदास के नाम से इसका एक आउटलेट दुबई में भी खुलने जा रहा है।
ऐसे तैयार होता है कलाकंद
करीब 4 किलो दूध में 1 किलो मिल्क केक तैयार होता है। दूध को गर्म कर उसका छेना ( फाड़ा ) तैयार किया जाता है। फिर उसमें स्वाद के अनुसार चीनी मिलाई जाती है। केसर डालकर सांचे में जमाया जाता है। जरूरत के अनुसार ड्राई फ्रूट काम लेते हैं। ज्यादा भुना हुआ और कम भुना हुआ। दोनों का स्वाद अलग होता है।
सालाना कारोबार 200 करोड़ से ज्यादा
बाबा ठाकुर दास के पोते अभिषेक तनेजा ने बताया कि 1954 में मिल्क केक 2 रुपये प्रति किलो बिकता था। आज इसके भाव 400 रुपये किलो है। अभिषेक बताते हैं कि अकेले अलवर में कलाकंद का सालाना कारोबार 200 करोड़ से भी ज्यादा है। अगर जिले में ढाई हजार कारोबारियों को जोड़ा जाए तो इस काम में 10 हजार से ज्यादा लोग जुटे हुए हैं। अकेले बाबा ठाकुरदास की फैक्ट्री में करीब 1 हजार किलो मिल्क केक रोज तैयार होता है। फेस्टिवल सीजन में प्रोडक्शन दोगुना हो जाता है।
दूध पहुँचाने वालों की भी तीसरी पीढ़ी
खास बात ये भी है कि जो परिवार बाबा ठाकुरदास को दूध सप्लाई करता था, उसी परिवार की तीसरी पीढ़ी आज भी उन्हें दूध की आपूर्ति कर रहे हैं। मिल्क केक बनाने वाले कारोबारियों तक दूध गांवों से ही पहुंचता है।अलवर की मिल्क केक का स्वाद यहां आने वाले हर पर्यटक को अपनी ओर खींच लाता है।

(साभार – दैनिक भास्कर)

प्रयागराज में संगम के नीचे 45 किमी लंबी और 12000 साल पुरानी ‘सरस्वती’ नदी!

ऋग्वेद की वाणी पर वैज्ञानिकों के इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सर्वे की मुहर

प्रयागराज : अपने पूर्वजों से सुनते आए पवित्र सरस्वती नदी की कहानियाँ सिर्फ कहानी ही नहीं, बल्कि अखंड सच्चाई है। इस बात की पुष्टि समय-समय पर विज्ञान शोधों में मिलने वाले सबूत करते रहते हैं। अब तक मान्यता यही रही है कि हिंदुओं की धर्मनगरी प्रयागराज  में तीन प्राचीन एवं पवित्र नदियों- गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम है। अब भारतीय वैज्ञानिकों को संगम के नीचे लगभग 12,000 साल पुरानी नदी मिली है। माना जा रहा है कि यह ऋग्वैदिक काल की पूज्य और अब विलुप्त हो चुकी सरस्वती नदी हो सकती है।

वैज्ञानिकों द्वारा किए गए इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सर्वे में इस बात के ठोस प्रमाण मिले हैं कि संगम के नीचे 45 किलोमीटर लंबी यह प्राचीन नदी मौजूद है। वर्तमान में इस संगम तट पर गंगा और यमुना नदियों का मिलन होता है। ऐसे में इन दोनों की तलहटी में मौजूद सरस्वती नदी में जल का विशाल भंडार होने का अनुमान है। सीएसआईआर – एनजीआईआर के वैज्ञानिकों के इस संयुक्त अध्ययन को अडवांस्टड अर्थ एंड स्पेस साइंस में प्रकाशित किया गया है।

दरअसल, वैज्ञानिक इस बात का पता कर रहे थे कि पानी की बढ़ती खपत के कारण गंगा और यमुना नदी पर कितना प्रभाव पड़ रहा है। नदियों पर पड़ने वाले प्रभाव का सीधा असर पारिस्थितिकी और पर्यावरण पर पड़ता है। नदियों को रीचार्ज करने वाली जमीन के नीचे मौजूद पुरातन नदियों के बारे में वैज्ञानिक जानकारी हासिल करना चाह रहे थे, क्योंकि नदियों को सिर्फ हिमालय जैसे ग्लेशियरों से ही नहीं, बल्कि भूतल में मौजूद नदियों से भी जल मिलता है। इस का पता लगाने के लिए वैज्ञानिक इस क्षेत्र का थ्री डी मैपिंग करने के लिए इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सर्वे कर रहे थे।

वैज्ञानिकों ने पाया कि विंध्य फॉर्मेशन के अंतर्गत आने वाली एक अति प्राचीन नदी गंगा और यमुना की तलहटी में मौजूद है। इस प्राचीन नदी (पैलियोरीवर) का एक्वीफर सिस्टम और पुरातन नहरें आपस में जुड़ी हुई हैं और एक-दूसरे की पानी की जरूरतों को पूरा कर रही हैं। इस प्राचीन नदी की लंबाई 45 किलोमीटर, चौड़ाई 4 किलोमीटर और गहराई 15 मीटर है। इसमें 2700 एमसीएम रेत है और जब यह पानी से पूरी तरह भरी रहती है तो यह जमीन के ऊपर 1300 से 2000 वर्ग किलोमीटर के इलाके को सिंचित करने योग्य भूजल देती है। 1000 एमसीएम जल क्षमता वाली यह नदी गंगा और यमुना में जल के स्तर को संतुलित करने का भी काम करती है।

हिंदू धर्मग्रंथों में कहा गया है कि गंगा, यमुना और सरस्वती का उद्गम स्थल हिमालय है। अध्ययन में इस बात को माना गया है कि खोज में मिली यह नदी संभवत: हिमालय तक जाती है। नेशनल जियोफिजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (एनजेआरआई) के निदेशक ने बताया कि यह नदी धरती की 10 मीटर नीचे गहराई में स्थित है और 10,000 से 12,000 साल पुरानी है। उन्होंने कहा कि समुचित अध्ययन के बाद ही नदी के सही उम्र के बारे में जानकारी दी जा सकती है। उन्होंने बताया कि सर्वे का काम जारी है और अभी तक पता चला है यह नदी कानपुर की ओर बह रही है।

गौरतलब है कि प्राचीन नदियों की खोज के लिए जल संसाधन मंत्रालय द्वारा गठित 7 सदस्यीय आयोग ने 2016 में अपनी रिपोर्ट दी थी। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि भूतल में प्राचीन नदी सरस्वती के बहने के साक्ष्य मौजूद हैं। साल 2018 में मंत्रालय ने राजस्थान और हरियाणा में सरस्वती नदी की खोज को लेकर काम शुरू किया गया था। वैज्ञानिकों का मानना है कि हिमालय से निकलने वाली प्राचीन नदी अरब सागर में जाकर मिलती थी।
(साभार – ऑप इंडिया)

2027 तक 18.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर का हो जायेगा होम्योपैथी उत्पाद बाजार 

विश्वस्तर पर होगी बाजार में यह वृद्धि

कोलकाता :  होम्योपैथिक मेडिकल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (होमाई ) के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ रामजी सिंह ने आयुष नेशनल टास्क फोर्स, एसोचैम के अध्यक्ष डॉ सुदीप्त नारायण रॉय को सम्मानित किया। सम्मान समारोह का आयोजन राष्ट्रीय संयुक्त सचिव डॉ साहिदुल इस्लाम द्वारा किया गया था, जिसमें अन्य राष्ट्रीय पदाधिकारी जैसे डॉ अरुण भस्मे, डॉ सुरेश नडाल भी उपस्थित थे।
डॉ रॉय ने समारोह में मौजूद होम्योपैथी बिरादरी से 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा का हिस्सा बनने की अपील की, क्योंकि महामारी संकट समाज के लिए एक आंख खोलने वाला था कि होम्योपैथी कैसे सुरक्षित और प्रभावी है। महामारी के पहले नौ महीनों में आयुष खंड में 44 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई। डॉ रॉय ने यह भी उल्लेख किया कि विश्व स्तर पर 2027 तक होम्योपैथी उत्पाद बाजार 18.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर होने जा रहा है। भारतीय होम्योपैथी की महत्वपूर्ण भूमिका है। आयुष मंत्रालय आयुष के वैश्वीकरण के बारे में सक्रिय है, होम्योपैथी सबसे आगे चल सकती है क्योंकि यह विश्व स्तर पर चिकित्सा की दूसरी सबसे बड़ी प्रणाली है।
डॉ रॉय ने कहा कि महामारी संकट में एकीकृत दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। उन्हें विश्वास है कि अगर ओमिक्रॉन के कारण कोई संकट होता है, तो आयुष मंत्रालय निश्चित रूप से एक समाधान के साथ आएगा जैसा कि उन्होंने आर्सेनिक एल्बम 30 के साथ संकट की पहली लहर के दौरान किया था।
डॉ रॉय ने कहा, अगर पश्चिम बंगाल सरकार और आयुष मंत्रालय, भारत सरकार एसोचैम द्वारा प्रस्तावित होम्योपैथी हब के लिए सहयोग कर सकते हैं, आयुष के वैश्वीकरण की दिशा में भारतीय होम्योपैथी उद्योग द्वारा महत्वपूर्ण योगदान दिया जा सकता है।

उपेक्षा के अन्धकार में रह गयीं तुलसी को प्रेरित करने वाली पत्नी रत्नावली

प्रो. गीता दूबे

सभी सखियों को नमस्कार। सखियों, प्रसिद्ध पुरुष के पीछे खड़ी स्त्री के योगदान को तो समाज स्वीकार करता है लेकिन उस स्त्री की अलहदा पहचान को अक्सर नज़रंदाज़ किया जाता है। स्त्री का महत्व इसी में माना जाता है कि वह पुरुष के पीछे खड़ी होकर उसे संभालती रही, घर-परिवार के सारे दायित्व निभाती रहे और पति तथा उसकी उपलब्धियों को देखकर गदगद होती ‌रहे। इस त्याग के महिमा मंडित इतिहास में स्त्री का अपना अस्तित्व धीरे- धीरे धूमिल होता जाता है। समाज हो या साहित्य लोक प्रसिद्ध पति की महिमा के समक्ष पत्नी को अनायास भुला दिया जाता है। जगत प्रसिद्ध तुलसीदास जी के व्यक्तित्व और कृतित्व से कौन परिचित नहीं हैं। लेकिन रत्नावली का नाम कितनों को याद है ? अगर याद हो भी तो तुलसीदास की पत्नी के रूप में भले याद हो जिनसे ‌तुलसीदास अंध‌प्रेम करते थे और जिनके फटकारने पर तुलसीदास प्रात:स्मरणीय तुलसीदास बने। उसके बाद तुलसी तो प्रसिद्ध हो गये लेकिन रत्नावली उपेक्षा के अंधकार में गुम हो गईं। तुलसीदास की रचनाओं को जन- जन ने सराहा लेकिन रत्नावली की रचनात्मकता को किसी ने याद नहीं रखा। जी हाँ, रत्नावली भी साहित्य-सृजन करती थीं। उनके दोहों का साहित्यिक महत्त्व तो अवश्य है लेकिन उनका उल्लेख ना के बराबर मिलता है। तुलसीदास के आभामंडल के आलोक में रत्नावली के दोहों की आभा मंद पड़ गई लेकिन इससे उनका योगदान कम नहीं होता।
श्री मुरलीधर चतुर्वेदी ने “रत्नावली-चरित” के नाम से रत्नावली देवी की जीवनी लिखी है जिसे उनका प्रामाणिक जीवन वृत्तांत माना जाता है। उस पुस्तक के अनुसार रत्नावली का जन्म उत्तर प्रदेश के एटा जिले के बदरिया नामक गाँव में संवत् 1577 में हुआ था। एक और मत के अनुसार उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले का एक गाँव उनका जन्म स्थान है। उनके पिता का नाम पंडित दीनबंधु पाठक और माता का नाम दयावती था। तुलसीदास से उनका विवाह 12 वर्ष की आयु में 1589 में और गौना 1593 में हुआ। उस घटना को सभी जानते हैं जब तुलसीदास की पत्नी अपने मायके में थीं और उनके वियोग को न सह पाने के कारण अंधेरी रात में मूसलाधार ‌बरसात की परवाह न करते हुए, नाव और नाविक के अभाव में शव के सहारे नदी पारकर, दरवाजा बंद पाकर ऊपर की मंजिल पर चढ़ने के लिए साँप को रस्सी की तरह पकड़कर, तुलसीदास उनसे मिलने पहुँचे थे लेकिन पत्नी ने उनकी अधीरता देखकर क्षोभ से भरकर उन्हें फटकारते हुए कहा था-
“लाज न लागत आपको दौरे आयहु साथ।
धिक धिक ऐसे प्रेम को कहा कहौं मैं नाथ॥”
साथ ही उन्होंने यह भी कहा जिससे तुलसीदास के ज्ञान-चक्षु खुल गए-
“अस्थि-चर्म-मय देह मम तामै जैसी प्रीति।
तैसी जौ श्रीराम महँ होति न तौ भवभीति॥”
इस बात से तुलसीदास जी इस कदर आहत हुए कि उन्होंने रत्नावली को त्याग दिया, गृहस्थ जीवन से वैराग्य ले लिया और काशी चले गए। रत्नावली की उम्र उस समय 27 वर्ष थी। पति द्वारा त्याग दिए जाने के बाद वह भी जीवन से विरक्त होकर साध्वी बन गईं। रत्नावली अगर तुलसीदास को फटकारती नहीं तो संभवतः वह एक साधारण गृहस्थ ही बने रहते लेकिन इस घटना के बाद रामबोला तुलसीदास के रूप में प्रसिद्ध हुए और रत्नावली का जीवन दुख और अवसाद से घिर गया। भारतीय समाज में जहाँ विवाहिता स्त्री को पति की छाया माना जाता है वहाँ रत्नावली की स्थिति का अनुमान सहजता से लगाया जा सकता है। उन्होंने पूरी उम्र पति के स्मृतियों को सहेजते हुए में गुजार दी और 74 वर्ष की आयु में संवत् 1651 में इस निष्ठुर संसार को त्याग कर चली गईं।
साहित्य और लोकस्मृति दोनों ने रत्नावली की रचनात्मक प्रतिभा का मूल्यांकन नहीं किया। उन्होंने बहुत से दोहों की रचना की है। इन दोहों में उनकी पीड़ा का मर्मस्पर्शी अंकन हुआ है। संभवतः जीवन भर उनको तुलसीदास के चले जाने का‌ मलाल रहा और उस पीड़ा को उन्होंने बड़े दर्द के साथ अपने दोहों में पिरोया है। तुलसीदास से की गई उनकी क्षमायाचना ह्रदय को व्यथित कर देती है-
“छमा करहु अपराध सब, अपराधिन के आय।
बुरी भली हौं आप की, तजौं न लेहु निभाय।।”
लेकिन स्त्री को समाज सहजता से क्षमादान नहीं देता। रत्नावली भी जीवन भर परिताप की अग्नि में झुलसती रहीं। अपने जीवन के सूनेपन को उन्होंने पति की स्मृतियो से भरा और उनकी प्रतीक्षा में जीवन व्यतीत करती रहीं। यह दोहा देखिए जिसमें एक साधारण स्त्री की तरह वह अपने भाग्य को कोसती हुई दिखाई देती हैं-
“कहाँ हमारे भाग अस, जो पिय दरसन देयँ।
वाहि पाछिली दीठि सों, एक बार लषि लेयँ।।”
उनकी तड़प और प्रतीक्षा का एक और उदाहरण देखिए-
“कबहुँ कि ऊगै भाग रवि, कबहुँ कि होइ बिहान।
कबहुँ कि बिकसै उर कमल, रतनावलि सकुचान।।”
भारतीय समाज में पति विहीन स्त्री की पीड़ा को रत्नावली ने अपने दोहों में गहराई से उभारा है। नारी किस तरह पति विहीन होकर समाज में हीन या पानी बिन मीन की तरह हो जाती है, इसके अनेक उदाहरण उनके दोहों में सहज ही मिल जाते हैं-
“रतनावलि भवसिंधु मधि, तिय जीवन की नाव।
पिय केवट बिन कौन जग, षेय किनारे लाव।।”
वह उस नारी को ही सौभाग्यशाली मानती हैं जो अपने अपने पति के साथ सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करती हैं-
“नारि सोइ बड़भागिनी, जाके पीतम पास।
लषि लषि चष सीतल करै, हीतल लहै हुलास।।”
पति की उपेक्षा के बावजूद वह पति का नाम उसी तरह अपने ह्रदय में बसाकर रखती हैं जैसे भक्तगण अपने ह्रदय में अपने आराध्य का नाम अंकित करके संतोष और प्रसन्नता से भरे रहते हैं। अपने रामभक्त पति को अपने ह्रदय में बसाकर वह एक साथ दोनों लोकों को साधकर अपने जीवन को सफल समझकर संतोष पा लेती हैं-
“राम जासु हिरदे बसत, सो पिय मम उर धाम।
एक बसत दोउ बसैं, रतन भाग अभिराम।।”
रत्नवली देवी ने अपने दोहों के माध्यम से समाज को नैतिकता की शिक्षा देने का प्रयास भी किया है। उनके छोटे -छोटे दोहों में जीवन का सार भरा दिखाई देता है। जीवन में विवेक के महत्त्व को स्वीकारते और समझाते हुए वह कहती हैं-
“तरुनाई धन देह बल, बहु दोषुन आगार।
बिनु बिबेक रतनावली, पसु सम करत विचार॥”
इसी तरह शील के समान बहुमूल्य भूषण कोई दूसरा नहीं है, इसकी ओर भी वह गंभीरता पूर्वक संकेत करती हैं। उनका कहना है कि शील के बिना ढेरों आभूषण व्यर्थ हैं-
“भूषन रतन अनेक नग, पै न सील सम कोइ।
सील जासु नैनन बसत, सो जग भूषण होइ॥”
आज हम बहुत सी दुकानों पर लिखा हुआ पढ़ते हैं कि “उधार प्रेम की कैंची है” या यह कहते हैं कि पैसों और कर्ज से रिश्ते खराब होते हैं। इसी बात को रत्नावली जी अपने दोहों में सहजता से पिरो देती हैं कि उधार प्रेम को नष्ट कर देता है –
”स्वजन सषी सों जनि करहु, कबहूँ ऋन ब्यौहार।
ऋन सों प्रीति प्रतीत तिय, रतन होति सब छार॥”
हम सभी जब किसी के.लिए कुछ करते हैं तो मन में प्रतिदान की सहज आकांक्षा होती है लेकिन कवयित्री इसकी मनाही करती हुई उपकार के बदले कुछ भी प्रतिदान न मांगने की हिदायत देती हैं-
“रतन करहु उपकार पर, चहहु न प्रति उपकार।
लहहिं न बदलो साधुजन, बदलो लघु ब्यौहार॥”
संतान अगर अच्छी न हो तो निसंतान रहना भला, इस बात को सब स्वीकारते हैं। रत्नावली भी बड़ी गंभीरता से यह बात कहती हैं
“रतन बाँझ रहिबो भलौ, भले न सौउ कपूत।
बाँझ रहे तिय एक दुष, पाइ कपूत अकूत॥ ”
और सपूत किस तरह कुल और परिवार की मान बढ़ाता है, इस ओर भी वह संकेत करती हैं-
“कुल के एक सपूत सों, सकल सपूती नारि।
रतन एक ही चँद जिमि, करत जगत उजियारि॥”
सच्चे स्नेही अर्थात मित्र या प्रियजनों पहचान बताते हुए वह मुश्किल समय में साथ देनेवालों की ही सच्चा संबंधी मानती हैं
“सोइ सनेही जो रतन, करहिं विपति में नेह।
सुष संपति लषि जन बहुरि, वनें नेह के गेह॥
जीवन में संगति के महत्व पर तकरीबन सभी भक्त कवियों ने प्रकाश डाला है। रत्नावली के दोहों को पढ़ते हुए कबीर, तुलसी, रहीम के दोहों की याद हो आती है। वह दुर्जन व्यक्ति की संगति से बचने को कहती हैं, भले ही वह कितना भी गुणवान क्यों न हो-
“भलें होइ दुरजन गुनी भली न तासौ प्रीति।

विषधर मनिधर हू रतन, डसत करत जिमि भीति॥”
ब्रजभाषा में रचित रत्नावली के दोहों में जीवन का गूढ़ सत्य तो है ही मित्रवत सलाह भी है जिसे अपनाकर जीवन सहज और सफल हो सकता है। दुख इस बात का है कि रत्नावली के साहित्यिक अवदान के विषय में कम ही लोग जानते हैं। इनके दोहों में जीवन का मर्म छिपा हुआ है। साथ ही परित्यक्त स्त्री की पीड़ा को गहराई से महसूस किया जा सकता है। प्रिय वियोग की व्याकुलता का तीव्र आर्तनाद उनके दोहों का मुख्य स्वर है-
“असन बसन भूषन भवन, पिय बिन कछु न सुहाय।
भार रूप जीवन भयो, छिन छिन जिय अकुलाय॥”