Tuesday, April 7, 2026
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बंगाली अभिनेता अभिषेक चटर्जी का निधन

कोलकाता । लोकप्रिय बंगाली अभिनेता अभिषेक चटर्जी का गत 24 मार्ड़च को उनके निवास पर दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। परिवार के सदस्यों ने यह जानकारी दी।
उन्होंने बताया कि चटर्जी (58) ने गत बुधवार को एक शो की शूटिंग के दौरान पेट में मरोड़ की शिकायत की थी और उन्हें प्रिंस अनवर शाह रोड पर स्थित उनके निवास पर ही सेलाइन चढ़ाया गया था।
चटर्जी के परिवार में पत्नी एवं एक बेटी है। उन्होंने (चटर्जी ने) 1986 में ‘पथभोला’ फिल्म से बंगाली फिल्म जगत में कदम रखा था और आने वाले वर्षों में ऋतुपर्णो घोष की ‘दहन’ एवं ‘बारीवाली’ तथा मजूमदार के ‘आलो’ समेत कई हिट फिल्मों में अपने अभिनय की छाप छोड़ी। वह बंगाली धारावाहिकों में भी जाना-पहचाना चेहरा थे।

सतर्कता बरत रहे हैं भारतीय उपभोक्ता, बचत पर दे रहे हैं ध्यान : रिपोर्ट

नयी दिल्ली । भारतीय उपभोक्ता सतर्कता का रुख अपना रहे हैं और भविष्य के लिए अधिक बचत कर रहे हैं। साथ ही वे गैर-विवेकाधीन खर्च यानी जरूरी खर्च को संतुलित करने का प्रयास कर रहे हैं। एक रिपोर्ट में यह बात कही गई है।
डेलॉयट की उपभोक्ता गतिविधियों पर निगरानी रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय अपनी खरीदारी, मनोरंजन और ‘शौक’ पर अपने खर्च की प्राथमिकता तय कर रहे हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि सर्वे में शामिल उपभोक्ता व्यक्तिगत देखभाल और कपड़ों, शौकियां गतिविधियों, मनोरंजन और यात्राओं पर खर्च करने की तैयारी कर रहे हैं। इसके बाद इलेक्ट्रॉनिक्स, घर का साजोसामान और रेस्तरां का नंबर आता है।
रिपोर्ट कहती है कि विश्लेषण से पता चलता है कि उपभोक्ताओं में अब धारणा सकारात्मक हो रही है। वे सतर्कता से अपनी खुशियों और खर्च के बीच संतुलन बैठाने का प्रयास कर रहे हैं और भविष्य के लिए अधिक बचत कर रहे हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि कॉरपोरेट भारत में अब चीजें सामान्य हो रही हैं और यात्रा अंकुश हट रहे हैं। ऐसे में भारतीय कारोबारी यात्रा की तैयारियां कर रहे हैं।
सर्वे के अनुसार, करीब 83 प्रतिशत भारतीयों के अगले तीन माह के दौरान कारोबारी यात्रा पर जाने की उम्मीद है। सर्वे में शामिल ज्यादातर उपभोक्ता अगले तीन साल के दौरान अपनी वित्तीय स्थिति को लेकर आशान्वित नजर आए।
डेलॉयट टच तोहमात्सु इंडिया एलएलपी (डीटीटीआईएलएलपी) के भागीदार और उपभोक्ता उद्योग लीडर पोरस डॉक्टर ने कहा, ‘‘भारतीय उपभोक्ता अब भविष्य के लिए बचत करने पर अधिक ध्यान दे रहे हैं।’’

421 बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की लागत 4.73 लाख करोड़ रुपये बढ़ी

नयी दिल्ली । बुनियादी ढांचा क्षेत्र की 150 करोड़ रुपये या इससे अधिक के खर्च वाली 421 परियोजनाओं की लागत में तय अनुमान से 4.73 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है। एक रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है। देरी और अन्य कारणों की वजह से इन परियोजनाओं की लागत बढ़ी है।
सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय 150 करोड़ रुपये या इससे अधिक की लागत वाली बुनियादी ढांचा क्षेत्र की परियोजनाओं की निगरानी करता है। मंत्रालय की फरवरी-2022 की रिपोर्ट में कहा गया है कि इस तरह की 1,565 परियोजनाओं में से 421 की लागत बढ़ी है, जबकि 647 परियोजनाएं देरी से चल रही हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, ‘‘इन 1,565 परियोजनाओं के क्रियान्वयन की मूल लागत 21,86,542.05 करोड़ रुपये थी, जिसके बढ़कर 26,59,914.61 करोड़ रुपये पर पहुंच जाने का अनुमान है। इससे पता चलता है कि इन परियोजनाओं की लागत 21.65 प्रतिशत या 4,73,352.56 करोड़ रुपये बढ़ी है।’’ रिपोर्ट के अनुसार, फरवरी-2022 तक इन परियोजनाओं पर 13,26,569.75 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं, जो कुल अनुमानित लागत का 49.87 प्रतिशत है। हालांकि, मंत्रालय का कहना है कि यदि परियोजनाओं के पूरा होने की हालिया समयसीमा के हिसाब से देखें, तो देरी से चल रही परियोजनाओं की संख्या कम होकर 553 पर आ जाएगी। रिपोर्ट में 631 परियोजनाओं के चालू होने के साल के बारे में जानकारी नहीं दी गई है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि देरी से चल रही 647 परियोजनाओं में 84 परियोजनाएं एक महीने से 12 महीने, 124 परियोजनाएं 13 से 24 महीने की, 327 परियोजनाएं 25 से 60 महीने की और 112 परियोजनाएं 61 महीने या अधिक की देरी में चल रही हैं। इन 647 परियोजनाओं की देरी का औसत 42.60 महीने है।
इन परियोजनाओं की देरी के कारणों में भूमि अधिग्रहण में विलंब, पर्यावरण और वन विभाग की मंजूरियां मिलने में देरी और बुनियादी संरचना की कमी प्रमुख है। इनके अलावा परियोजना का वित्तपोषण, विस्तृत अभियांत्रिकी को मूर्त रूप दिये जाने में विलंब, परियोजनाओं की संभावनाओं में बदलाव, निविदा प्रक्रिया में देरी, ठेके देने व उपकरण मंगाने में देरी, कानूनी व अन्य दिक्कतें, अप्रत्याशित भू-परिवर्तन आदि की वजह से भी इन परियोजनाओं में विलंब हुआ है।

2023 से ‘फ्लीट मोड’ में एक साथ 10 परमाणु ऊर्जा संयंत्रों का निर्माण शुरू करेगा भारत 

नयी दिल्ली । कर्नाटक के कैगा में 2023 में 700 मेगावाट के परमाणु ऊर्जा संयंत्र के लिए नींव डालने के साथ भारत अगले तीन वर्षों में ‘फ्लीट मोड’ में एक साथ 10 परमाणु रिएक्टरों के निर्माण कार्यों को गति देने के लिए तैयार है। नींव के लिए कंक्रीट डालने (एफपीसी) के साथ परमाणु ऊर्जा रिएक्टरों का निर्माण अब पूर्व-परियोजना चरण से आगे बढ़कर निर्माण को गति देने का संकेत है, जिसमें परियोजना स्थल पर उत्खनन गतिविधियां शामिल हैं। परमाणु ऊर्जा विभाग (डीएई) के अधिकारियों ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर संसदीय समिति को बताया, ‘कैगा इकाइयों 5 और 6 का एफपीसी 2023 में अपेक्षित है, गोरखपुर हरियाणा अणु विद्युत परियोजन इकाइयों 3 और 4 और माही बांसवाड़ा राजस्थान परमाणु ऊर्जा परियोजना इकाई 1 से 4 का एफपीसी 2024 में अपेक्षित है और 2025 में चुटका मध्य प्रदेश परमाणु ऊर्जा परियोजना इकाइयों 1 और 2 का एफपीसी होने की संभावना है।’ केंद्र ने जून 2017 में 700 मेगावाट के 10 स्वदेशी विकसित दबावयुक्त भारी जल संयंत्र (पीएचडब्ल्यूआर) के निर्माण को मंजूरी दी थी। ये 10 पीएचडब्ल्यूआर 1.05 लाख करोड़ रुपये की लागत से बनाए जाएंगे। यह पहली बार है जब सरकार ने लागत कम करने और निर्माण के समय में तेजी लाने के उद्देश्य से एक बार में 10 परमाणु ऊर्जा रिएक्टरों के निर्माण को मंजूरी दी थी। डीएई अधिकारी कहा कि ‘फ्लीट मोड’ परियोजनाओं के लिए थोक स्तर पर खरीद की जा रही थी जिसमें स्टीम जेनरेटर, एसएस 304 एल जाली ट्यूब और एंड शील्ड के लिए प्लेट, प्रेशराइजर फोर्जिंग, ब्लीड कंडेनसर फोर्जिंग, 40 स्टीम जनरेटर के लिए इंकोलॉय-800 ट्यूब, रिएक्टर हेडर के निर्माण के लिए ऑर्डर दिए गए थे। उन्होंने कहा कि गोरखपुर इकाई 3 और 4 तथा कैगा इकाई 5 और 6 के टरबाइन आइलैंड के लिए इंजीनियरिंग, खरीद और निर्माण पैकेज प्रदान किए गए हैं। ‘फ्लीट मोड’ के तहत पांच साल की अवधि में एक परमाणु ऊर्जा संयंत्र के निर्माण की उम्मीद है।

नोएडा की सड़कों पर रात 12 बजे दौड़ रहे प्रदीप ने जीता दिल

नयी दिल्ली । रात के 12 बजे नोएडा की सड़कों पर दौड़ लगाता 19 साल का प्रदीप सोशल मीडिया का सितारा बन गया है। दरअसल, पूर्व पत्रकार और फिल्मकार विनोद कापड़ी देर रात अपनी गाड़ी से कहीं जा रहे थे, तभी उनकी नजर इस लड़के पर पड़ी जो कंधे पर बैग लादे दौड़ा चला जा रहा था। कापड़ी ने उसे कहा कि अगर कहीं जाना है तो वो उसे लिफ्ट दे सकते हैं। लेकिन लड़का इसके लिए राजी नहीं हुआ और उसने अपनी जो कहानी बताई, उसने इस वीडियो को देखने वाले हर इंसान का दिल जीत लिया। प्रदीप रोजाना नोएडा सेक्टर-16 से बरौला स्थित अपने घर तक दस किलोमीटर की दौड़ लगाता है। उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के रहने वाले प्रदीप ने बताया कि वो नोएडा में अपने भाई के साथ रह रहा है और उसकी मां अस्पताल में है। वीडियो बना रहे कापड़ी ने जब प्रदीप को साथ में डिनर करने का ऑफर दिया तो 19 साल के इस लड़के ने ऐसा जवाब दिया कि कोई भी अपना दिल हार जाए। कापड़ी ने इस वीडियो को शेयर करने के साथ ही कैप्शन में लिखा, ‘दिस इज प्योर गोल्ड।’ नोएडा की सड़क पर कल रात 12 बजे मुझे ये लड़का कंधे पर बैग टांगे बहुत तेज़ दौड़ता नज़र आया. मैंने सोचा किसी परेशानी में होगा, लिफ़्ट देनी चाहिए। बार बार लिफ़्ट का ऑफ़र किया पर इसने मना कर दिया. वजह सुनेंगे तो आपको इस बच्चे से प्यार हो जाएगा
सोशल मीडिया पर प्रदीप का वीडियो वायरल हो चुका है और लोग ना सिर्फ उसके जज्बे को सलाम कर रहे हैं।

बीएचयू के विद्यार्थी ने बताया रामचरित मानस से फीजिक्स और केमेस्ट्री पढ़ने का तरीका

वाराणसी। क्या रामचरित मानस के माध्यम से फीजिक्स और केमेस्ट्री जैसे विषय पढ़े या समझे जा सकते हैं। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय यानी बीएचयू का विद्यार्थी प्रिंस यह मानता है और उसने यह कर भी दिखाया है।
इधर राम मन्दिर के निर्माण का रास्ता साफ हुआ तो बीएचयू के छात्र ने मन्दिर निर्माण के विरोध में स्कूल की वकालत करने वालो को जवाब देने का रास्ता तैयार कर लिया । बीएचयू के छात्र प्रिंस तिवारी ने फैसले वाले दिन ही एक स्कूल ”  द स्कूल ऑफ राम “के नाम से एक डिजिटल स्कूल की स्थापना कर दी। सोशल मीडिया पर इस स्कूल की स्थापना का मुख्य उद्देश्य भगवान राम के जीवन पर आधारित गोस्वामी तुलसीदास रचित राम चरित मानस को आधुनिक व्यवसायिक विषयों के साथ जोड़ने का था। इस से आज के युवा विषयों को सीखने के लिए राम चरित मानस की चौपाइयों से आसानी से समझ सकते है।

छात्रावास में छात्रों की आपसी बहस ने दिया विचार
2019 में जब राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया तो प्रिंस तिवारी अपने छात्रावास में दोस्तो के साथ बैठे हुए थे । बीएचयू के हिंदी विभाग से स्नातक के छात्र छात्रों की बहस को सुन रहे थे । बहस के दौरान कई छात्र राम के जीवन और मन्दिर की सार्थकता को लेकर बहस कर रहे थे । ऐसे में प्रिंस ने तय किया कि आज की युवा पीढ़ी को राम के जीवन से जुड़े उन अनछुए पहलुओं से रूबरू कराएंगे जिस से अब तक युवा वर्ग अछूता रहा है। प्रिंस ने एनबीटी ऑनलाइन को बताया कि तभी उन्हें इस स्कूल का ख्याल आया और अपने सनातन साहित्य राम चरित मानस की चौपाई को आज के विषयों में कैसे प्रासंगिक है, इस पर काम शुरू किया । 1 साल तक विषय पर शोध करने के बाद प्रिंस ने कई विषयो के सिद्धांतो को प्रिंस ने राम चरित मानस की चौपाइयों में खोज निकाला और उसे एक कोर्स का स्वरूप दे कर अपने “द स्कूल ऑफ रामा” के पाठ्यक्रम में शामिल किया।

देश- दुनिया के हज़ारों लोग जुड़े अब तक द स्कूल ऑफ रामा से
इस पूरे स्कूल को संचालित करना प्रिंस के अकेले बस में नही था। इसके लिए उसने अपने साथ के छात्रों को हफ्ते के कुछ घण्टे इस वर्चुअल स्कूल के प्रमोशन के लिए तैयार किया। आज बीएचयू , जेएनयू , जामिया , डीयू समेत कई विश्वविद्यालयों के करीब 22 छात्र इस स्कूल के संचालन से जुड़े है। धीरे धीरे इस स्कूल में अब करीब 15 हज़ार से ज्यादा लोग जुड़ चुके है । इन लोगो मे ज्यादातर विदेशों के छात्र है जो किसी न किसी कार्यक्षेत्र से जुड़े है। लेकिन रोज़मर्रा के जुड़े मामलों को समझने के लिए इस वर्चुअल स्कूल के क्लास से जुड़ते हैं । प्रिंस और उनके साथी इन सवालों का जवाब राम चरित मानस के चौपाई के माध्यम से समझाने का प्रयास करते हैं।

भौतिक विज्ञान से लेकर अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों को समझाती है राम चरित मानस की चौपाई
प्रिंस से एनबीटी ऑनलाइन ने समझना चाहा कि आखिर कैसे चौपाई से आज के आधुनिक विषयो को समझा जा सकता है तो उदाहरण के तौर पर प्रिंस ने बताया कि राम चरित मानस की एक चौपाई है..

तृषा जाई वरु मृगजल नाना।
वरु जामहिं सर सीस निधाना।।

उक्त चौपाई में उल्लेखित मृगमरीचिका को प्रकाशिकी के अपवर्तन सिद्धांत से समझ सकते है।

इसी प्रकार से – न्यूटन के गति के तीसरे नियम “क्रिया प्रतिक्रिया को एक चौपाई,

बार-बार रधुवीर संभारी।
तरकेउ पवन तनय बल भारी।
जेहिं गिरी चरन देह हनुमंता।
चलेउ सा गा पाताल तुरंता।।
से समझाने का प्रयास किया जाता है।

इस चौपाई को समझाने के लिए क्रिया प्रतिक्रिया एवं संवेग के सिद्धांत पर आधारित हाइड्रोक्लोरिक एवं एथेन रॉकेट के प्रयोग का सहारा किया जाता है।

ऊर्जा रूपांतरण के सिद्धांत को , एकु दारुगत देखिअ एकू,पावक सम जुग ब्रह्म बिबेकू।। चौपाई से समझ सकते हैं ।

इतना ही नही अगर हम राम के सम्पूर्ण जीवन काल को राम चरित मानस की चौपाई के माध्यम से समझने का प्रयास करें तो हम देखते है बिना किसी संसाधन के 14 वर्षो तक जंगलों में रहना एक दूसरे राज्य लंका पर अपनी वानर सेना तैयार कर के जीत हासिल करना । ये सब दिखता है कि आप किस तरह से एक कुशल प्रशासक , राजनेता, नेतृत्वकर्ता, अंतररष्ट्रीय कूटनीति के गुण राम के जीवन से सीख सकते हैं। राम का पूरा जीवन चौपाई में छिपा है और जीवन के हर एक पहलू पर कठिन परिस्थितियों से कैसे आपको सामना करना है ये रास्ता बताया गया है । बस जरूरत है इस चौपाई को आसान भाषा मे लोगो को समझाने का जो हम इस स्कूल के माध्यम से एक प्रयास कर रहे हैं।

(साभार – नवभारत टाइम्स)

महंगाई से निपटना है तो मुफ्तखोरी से निजात पानी होगी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक में, कुछ अधिकारियों ने कई राज्यों की तरफ से घोषित लोकलुभावन योजनाओं पर चिंता जताई और दावा किया कि वे आर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं हैं और वे उन्हें श्रीलंका के रास्ते पर ले जा सकती हैं। इधर, महंगाई एक बार फिर बढ़ गयी और यह कोई नयी बात नहीं है। जीएसटी के रिकॉर्डतोड़ संग्रह के बीच महंगाई बढ़ी है और आम जनता के लिए, खासकर मध्यम वर्ग के लिए कहीं कोई राहत नहीं है। विपक्ष के लिए यह आन्दोलन का मुद्दा है और सरकार के लिए परिस्थिति। रूस और यूक्रेन के युद्ध का हवाला दिया जा रहा है। हर बार की तरह विलाप जारी है मगर कोई ठोस समाधान न तो खोजा जा रहा है और न ही किसी की दिलचस्पी है।
अब एक सवाल हम खुद से पूछें कि क्या हम इस गम्भीर समस्या के समाधान के लिए वाकई गम्भीर हैं? हकीकत है नहीं और इसका कारण है कि हमारा दोहरापन..हमें मुफ्त में चीजें चाहिए, सब्सिडी चाहिए..नेताओं ने वोट बैंक की राजनीति के लिए कर्जमाफी, सब्सिडी, फ्री की राजनीति तो की ही..आम जनता में मुफ्तखोरी की आदत डाल दी है… और इसका सीधा असर मूल्यवृद्धि का कारण बनता है। गरीब को गरीब रहने देना और उसे सक्षम न बनने देना, यही सरकारों की नीति है क्योंकि गरीब जब सक्षम होंगे तो उनको वोट कौन देगा।? किसी भी सरकारी योजना में प्रशिक्षण और उन्नत होने का स्पष्ट रास्ता कम ही दिखता है। कभी चावल बाँटेंगे, कभी चश्मा बाँट देंगे, कभी कम्बल बाँट देंगे मगर उपभोक्ता की क्रय शक्ति को मजबूत करने पर किसी का ध्यान ही नहीं है। जाहिर है कि इसका बोझ भी आम आदमी पर ही पड़ता है। आम जनता को भी समझने की जरूरत है कि संरचना के लिए खर्च करना पड़ता है और कहाँ खर्च करना है, यह भी समझदारी से तय करने की जरूरत है।
सीधी सी बात यह है कि इसका सीधा रिश्ता अर्थव्यवस्था से है। सरकारें सब कुछ फ्री करती जाती हैं और नतीजा यह है कि इस फ्री का बोझ आम आदमी पर ही पड़ता है। उत्पादन, उपयोग, विक्रय और लाभ एक चक्र है और जब यह चक्र काम ही नहीं करेगा यानी व्यवसाय करने वाले की लागत ही नहीं निकलेगी और पैसा अपने ही घर से जाएगा तो वह फिर से उत्पादन और व्यवसाय करने की हिम्मत कहाँ से लायेगा। इससे उत्पादक एक – एक करके कम होंगे…माँग बढ़ेगी और पर्याप्त आपूर्ति नहीं होगी तो कीमतें बढ़ेंगी और महंगाई डायन खाती ही रहेगी।

विद्यासागर विश्वविद्यालय में सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन

मिदनापुर । विद्यासागर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की ओर से सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। स्वागत वक्तव्य देते हुए डॉ संजय जायसवाल ने कहा कि कला और संस्कृति से विद्यार्थी सृजनात्मक एवं उच्चतर मूल्यों से जुड़ते हैं। अतः विद्यार्थियों को एकेडमिक शिक्षण के साथ-साथ सांस्कृतिक कार्यक्रमों से जुड़ना चाहिए। इस अवसर पर पूजा मिश्रा, नीलोफ़र बेग़म, रेणु सिन्हा, मुस्कान खातून और राधिका ने संगीत प्रस्तुत किया। मधु सिंह, उस्मिता गौंड़ा, राहुल गौंड़, पंकज सिंह, अन्नू तिवारी, संजीत महतो, ज्योति सिंह, श्वेता सोनकर, पूजा साव, बिट्टू कौर, रौशन कुमार झा, प्रिया कुमारी चौधरी और अंजली ओझा ने कविता पाठ किया तथा नेहा शर्मा, के स्वाति रेखा, पी. मधु, वर्षा गुप्ता और निरुपमा ने समूह और अलीशा देवी और पी.बेबी ने एकल भावनृत्य प्रस्तुत किया। विभाग के सहायक अध्यापक डॉ श्रीकांत द्विवेदी ने कहा कि विद्यार्थियों की रचनाशीलता, तार्किकता और सांस्कृतिक दक्षता को देखकर बहुत अच्छा लग रहा है। निश्चित तौर पर ये विद्यार्थी आगे चलकर व्यापक मानवीय मूल्यों से जुड़ेंगे। कार्यक्रम को सफल बनाने में राधेश्याम सिंह,फरहाना परवीन,मोनू,डी.देवी.,डिंकी कोमल अहिरवाल रागिनी ,सिमरन,पूजा गोप,अपर्णा शर्मा आदि ने विशेष सहयोग दिया। कार्यक्रम का संचालन सिमरन गुप्ता तथा धन्यवाद ज्ञापन रूपेश यादव ने दिया।

शुभजिता स्वदेशी – रसोई का पुराना स्वाद वनस्पति घी का लोकप्रिय विकल्प था डालडा

डालडा…वह नाम जो कभी भारत के अधिकांश घरों में सुनने को मिल जाता था। मौका कोई भी हो, कुछ खास बनाना हो तो डालडा इस्तेमाल होता ही होता था। 25-30 वर्षों तक डालडा ने बाजार पर एकछत्र राज किया। इसके बाद रसोई में डालडा के टिन के डिब्बे की जगह प्लास्टिक के डिब्बे और फिर पैकेट्स ने ली। फिर ऐसा वक्त आया कि रिफाइंड ऑयल ने धीरे-धीरे वनस्पति घी की जगह लेनी शुरू कर दी। डालडा का सफर तो दिलचस्प है ही, साथ ही दिलचस्प है, इसके नाम की कहानी…कहां से आया यह नाम डालडा, क्या है इसका मतलब और कैसे शुरू हुआ लगभग 85 साल पुराने डालडा का सफर, आइए जानते हैं…

अंग्रेजों के काल से हुई शुरुआत
डालडा की शुरुआत अंग्रेजों के टाइम से हुई थी। कासिम दादा नाम के व्यक्ति 1930 के दशक से पहले एक डच कंपनी से देसी घी या क्लैरिफाइड मक्खन के सस्ते विकल्प के रूप में वनस्पति घी का आयात करते थे। उन औपनिवेशिक दिनों के ब्रिटिश भारत में, देसी घी को एक महंगा उत्पाद माना जाता था। आम जनता के लिए इसे खरीदना आसान नहीं था। इसलिए वनस्पति घी की जरूरत महसूस की गई, जो देसी घी का विकल्प हो और उससे सस्ता हो।

1930 के दशक की शुरुआत तक भारत में उपलब्ध हाइड्रोजनेटेड वनस्पति घी, कासिम दादा और हिंदुस्तान वनस्पति मैन्युफैक्चरिंग कंपनी द्वारा देश में आयात किया जाता था। हिंदुस्तान वनस्पति को अब हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड (एचयूएल) और यूनिलीवर पाकिस्तान कहा जाता है। कासिम दादा अपना आयातित उत्पाद ‘दादा वनस्पति’ के नाम से बेचते थे। यूनिलीवर के लीवर ब्रदर्स जानते थे कि देसी घी महंगा होने के चलते इसके विकल्प के लिए एक मुनाफेवाला बाजार मौजूद है। इसलिए हिंदुस्तान वनस्पति स्थानीय स्तर पर हाइड्रोजनेटेड वनस्पति तेल का निर्माण शुरू करना चाहती थी।
घरेलू वनस्पति घी बाजार में पैठ बनाने के अवसर को भांपते हुए लीवर ब्रदर्स ने अपने हाइड्रोजनेटेड वनस्पति घी के लिए कासिम दादा का सहयोग मांगा और भारत में ‘दादा’ बनाने के अधिकार खरीद लिए। लेकिन इसकी बिक्री के लिए एक पूर्व शर्त थी और वह यह कि दादा नाम बरकरार रखना था। लेकिन अगर यह नाम बरकरार रखा जाता तो यूनिलीवर कहां झलकती। तो इसके लिए समाधान निकाला गया कि नाम के बीच में ‘L’ डाला जाए और इसे दादा की बजाया डालडा नाम दिया जाए। कासिम दादा इस पर मान गए और इस तरह डालडा नाम अस्तित्व में आया। अगर इंग्लैंड के लीवर ब्रदर्स ने नाम में ‘एल’ अक्षर डालने पर जोर नहीं दिया होता, तो शायद भारत का सबसे लोकप्रिय वनस्पति घी ‘दादा’ कहलाता।
1937 में पेश किया गया डालडा
इसके बााद डालडा को 1937 में पेश किया गया और यह भारत और पाकिस्तान में सबसे लंबे समय तक चलने वाले ब्रांडों में से एक बन गया। लेकिन शुरुआत में डालडा की राह आसान नहीं थी। भारतीय जनता आश्वस्त नहीं थी कि घी का कोई विकल्प हो सकता है। घी आमतौर पर खाना पकाते वक्त या फिर तैयार खाने पर छिड़कने पर भी अपना स्वाद और सुगंध देता है। ऐसे में शुरुआत में डालडा के लिए चुनौती थी कि इसका स्वाद देसी घी की तरह हो, डीप फ्राइंग प्रॉपर्टीज हों लेकिन घी की तरह यह जेब पर भारी न हो।

फिर आक्रामक मार्केटिंग का लिया गया सहारा
यहीं से कहानी में लीवर की विज्ञापन एजेंसी लिन्टस का प्रवेश हुआ। लिंटास में डालडा अकाउंट को संभालने वाले हार्वे डंकन ने 1939 में भारत का पहला मल्टी-मीडिया विज्ञापन अभियान कैंपेन बनाया। इसके तहत सिनेमाघरों में प्रदर्शित होने के लिए एक लघु फिल्म थी, सड़कों पर घूमने के लिए टिन के आकार की एक गोल वैन थी, पढ़ेलिखे लोगों के लिए प्रिंट विज्ञापन था, और विज्ञापन ब्लिट्जक्रेग के हिस्से के रूप में नमून और परचे यानी लीफलेट्स वितरण के लिए स्टॉल थे।
डालडा ने न केवल व्यापक प्रचार अभियान के बलबूते पर, बल्कि पीले रंग पर हरे ताड़ के पेड़ के लोगो वाले टिन के डिब्बों के कारण भी खड़ा होना शुरू किया। लीवर ने इन विशिष्ट टिनों को अपने वितरण नेटवर्क के माध्यम से देश भर में पहुंचाया। अलग-अलग उपभोक्ताओं को लक्षित करने के लिए अलग-अलग आकार के पैक थे। उदाहरण के लिए संस्थागत उपयोगकर्ताओं जैसे होटल और रेस्तरां के लिए एक बड़ा स्क्वैयर आकार का टिन और घर में खपत के लिए छोटे गोल टिन। लीवर ने डालडा को घी के एक विश्वसनीय विकल्प के रूप में पेश करते हुए, इसे बढ़ावा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, अपने अस्तित्व के पहले 25-30 वर्षों में डालडा की स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय खाद्य तेल निर्माताओं से कोई प्रतिस्पर्धा नहीं थी। 1980 के दशक तक डालडा का बाजार पर एकाधिकार था। हिंदुस्तान वनस्पति का ‘डालडा’ इतना फेमस हुआ कि हाइड्रोजनेटेड वनस्पति तेल की मुख्य शैली को आमतौर पर ‘वनस्पति घी’ के रूप में जाना जाने लगा।

विवादों से रहा नाता
डालडा ब्रांड विवादों में भी काफी घिरा रहा है। 1950 के दशक में डालडा पर प्रतिबंध लगाने का आह्वान किया गया था। आलोचकों का कहना था कि डालडा, देसी घी का मिलावटी रूप है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। तब तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने एक राष्ट्रव्यापी जनमत सर्वेक्षण किया, जो अनिर्णायक साबित हुआ। सरकार ने घी में मिलावट रोकने के उपाय सुझाने के लिए एक कमेटी का गठन किया था। लेकिन उससे भी कुछ निष्कर्ष नहीं निकला।
इसके सालों बाद डालडा को एक और विवाद का सामना करना पड़ा, जब कहा गया कि इसमें जानवरों की चर्बी होती है। यह विवाद 1990 के दशक में जन्मा। तब तक डालडा को “क्लियर ऑयल्स” या रिफाइंड वनस्पति तेलों जैसे मूंगफली (पोस्टमैन), सरसों, कुसुम (सफोला), सूरजमुखी (सनड्रॉप) और पाम ऑयल (पामोलिन) आदि से प्रतिस्पर्धा मिलने लगी थी। इन्हें वनस्पति घी का एक स्वस्थ विकल्प माना जाता था।

फिर दूसरी कंपनी को बेचा गया ब्रांड
विवाद और बढ़ती प्रतिस्पर्धा के चलते डालडा भारतीय रसोई पर अपनी पकड़ खो रहा था। डालडा की चमक ऐसी फीकी पड़ी कि साल 2003 में Bunge Limited ने कथित तौर पर 100 करोड़ रुपये से कम में हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड से डालडा ब्रांड का अधिग्रहण किया। 30 मार्च 2004 को यूनिलीवर पाकिस्तान ने 1.33 अरब रुपये में नयी निगमित कंपनी डालडा फूड्स (प्राइवेट) लिमिटेड को अपने डालडा ब्रांड और खाद्य तेलों व फैट्स के संबंधित व्यवसाय की बिक्री कर दी। यह पाकिस्तान में एक तरह का कॉर्पोरेट लेनदेन था, जिसमें छह वरिष्ठ यूनिलीवर अधिकारियों के एक समूह ने एक प्रबंधन समूह का गठन किया और सफलतापूर्वक यूनिलीवर पाकिस्तान से डालडा व्यवसाय खरीदा।

बंज के लिए डालडा का अधिग्रहण खाद्य तेल बाजार में बड़ी छलांग थी। कंपनी ने डालडा ब्रांड को दोबारा खड़ा करने के लिए पहली बार 2007 में डालडा के तहत एक खाद्य तेल रेंज लॉन्च की। बंज ने इसे हस्बेंड्स च्वॉएस टैगलाइन के तहत पेश किया। लेकिन कंपनी को जल्द ही एहसास हुआ कि यह बाजार में पहुंच नहीं बना पा रहा है। इसके बाद 2013 में बंज ने ‘डब्बा खाली, पेट फुल’ टैगलाइन के तहत रेंज को फिर से लॉन्च किया। साथ ही ब्रांड की इस नई पोजिशनिंग को बढ़ावा देने के लिए कैंपेन्स के अलावा व्यापक अन्य गतिविधियों का भी सहारा लिया। आज डालडा ब्रांड के तहत डालडा वनस्पति, कॉटन सीड ऑयल, सरसों का तेल, सोयाबीन तेल, सनफ्लॉवर ऑयल, राइस ब्रायन ऑयल, ग्राउंडनट ऑयल उत्पाद बिकते हैं।

(स्त्रोत साभार – नवभारत टाइम्स)

नवरात्रि पर बनाएं विशेष फलाहारी आहार

साबूदाना खिचड़ी

सामग्री : 250 ग्राम साबूदाना, 1/2 कटोरी मूंगफली के पिसे दाने, 1 बड़ा आलू, 1/2 चम्मच जीरा, 4-5 पत्ता मीठा नीम, काली मिर्च पाउडर 1/2 चम्मच, हरी मिर्च 2-3 बारीक कटी हुई, एक छोटा चम्मच शकर, सेंधा नमक स्वादानुसार, नीबू, बारीक कटा हरा धनिया एवं फलाहारी मिक्चर।

विधि : उपवास के दौरान खिचड़ी में आलू डालने से उसका स्वाद तो बढ़ जाता है। अत: साबूदाने की खिचड़ी बनाने से 3-4 घंटे पूर्व साबूदाने को भिगो कर रख दें। आलू को छीलकर टुकड़े कर लें। एक कढ़ाई में घी गरम करके उसमें जीरा, मीठा नीम व हरी मिर्च का छौक लगाएं। तत्पश्चात आलू डाल दें और धीमी आंच पर पकने दें। अधपके होने पर साबूदाने और मूंगफली के दाने डाल दें और धीमी आंच पर पकाएं। थोड़ी देर बाद नमक, काली मिर्च एवं शकर डालें एवं अच्छी तरह मिला लें। लीजिए तैयार है लाजवाब साबूदाना खिचड़ी । व्र‍त के दिन हरा धनिया, फलाहारी मिक्चर और नीबू से सजाकर इसे परोसें।

साबूदाना खीर

सामग्री : 1 लीटर फुल क्रीम दूध, 1/2 कप साबूदाना, 150 ग्राम शकर, 1/4 कटोरी काजू-पिस्ता, बादाम की कतरन, 3-4 केसर के लच्छे, 1 चम्मच पिसी इलायची, 2 छोटे चम्मच कन्डेंस्ड मिल्क।

विधि : खीर बनाने से एक-दो घंटे पूर्व साबूदाने को धोकर भीगो दें। अब एक बर्तन में दूध को गरम कर अच्छा उबलने दें। तत्पश्चात एक अलग कटोरी में एक छोटा चम्मच गरम दूध लेकर केसर गला दें। अब उबल रहे दूध में भीगा हुआ साबूदाना डाल दें और लगातार चलाते हुए धीमी आंच पर पकाएं। एक अलग कटोरी में कन्डेंस्ड मिल्क घोलकर दूध में मिला दें। अब साबूदाने को तब तक पकाएं जब तक कि वह कांच जैसा चमकने न लगे। फिर शकर मिलाकर 5-7 उबाल आने तक पकाएं और आंच को बंद कर दें। ऊपर से कटे मेवे, केसर और इलायची पावडर डालकर अच्छी तरह मिलाएं। साबूदाने की लाजवाब खीर तैयार है।

मोरधन ढोकला

सामग्री : 100 ग्राम सिंघाड़ा आटा, 200 ग्राम मोरधन, 100 ग्राम राजगिरा आटा, 1 कटोरी दही, जीरा, सोडा एक चम्मच, आवश्यकतानुसार सेंधा नमक।

विधि : मोरधन को सबसे पहले 2 घंटे गला दें। दही फेंट कर राजगिरा व सिंघाड़ा आटा मिला दें। मोरधन को पीसकर सभी चीजें मिलाकर मिश्रण तैयार करें। इसमें एक चम्मच सोड़ा एवं नमक डालकर अच्छे से फेंटे और कुकर के डिब्बे में भर कर एक सीटी तक पकाएं। अब इसे ठंडा होने दें। ठंडा होने पर इसके मनचाहे आकार में काट लें। अब एक बर्तन में तेल गर्म करके जीरा तड़काएं और तैयार तेल को कटे हुए ढोकले पर चारों तरफ बुरकाएं, ऊपर से धनिया से सजाएं और तली हुई मिर्च अथवा दही के साथ लाजवाब मोरधन के ढोकले  पेश करें।

लौकी के पकौड़े

सामग्री : 250 ग्राम लौकी (घीया), 200 ग्राम सिंघाड़े का आटा, 1 चम्मच अदरक व 1 चम्मच हरीमिर्च का पेस्ट, नमक, जीरा, मिर्च स्वादानुसार, हरा धनिया, तलने के लिए तेल।

विधि : लौकी को छिलकर कद्दूकस कर लें। अब इसमें सभी मसाला सामग्री और सिंघाड़े का आटा मिलाकर गाढ़ा घोल कर लें। ध्यान रखें कि लौकी को घिसने के बाद उसमें भी काफी मात्रा में पानी होता है, अत: घोल बनाते समय ज्यादा पानी को उपयोग में ना लें। अच्छीतरह मिक्स कर लें। एक कढ़ाई में तेल गर्म करके छोटे-छोटे पकौड़े तल लें। खाने में बड़े ही स्वादिष्ट लौकी के ये पकौड़े एक झटपट तैयार की जाने वाली रेसिपी है। अब फलाहारी में इसे उपयोग में लाएं। सर्व करते समय दही या हरी चटनी के साथ पेश करें।

राजगिरा – साबूदाना डोसा

सामग्री : 100 ग्राम राजगिरा आटा, 200 ग्राम साबूदाना, 50 ग्राम दही, आलू उबले 500 ग्राम, सेंधा व नमक घी आवश्यकतानुसार, काली मिर्च चुटकीभर, कटा हरा धनिया, हरी मिर्च व नीबू रस।

विधि : साबूदाने को रात्रि या सुबह जल्दी पानी से धोकर गला दें। 4-5 घंटे के बाद दही डालकर मिक्सर में पीसें। राजगिरे का आटा भी इसमें मिलाए। नमक डालकर डोसे का घोल तैयार करें। आलू को छिलकर मैश करें। कढ़ाई में घी गर्म करें, जीरा चटकाएं व नमक-मिर्च डालकर मिश्रण तैयार करें। ऊपर से नीबू का रस डालकर हरा धनिया बुरकें। अब तवे को गरम करें। घी लगाकर मिश्रण (घोल) से डोसे बनाएं और कुरकुरे सेकें। इन्हीं पर आलू का मिश्रण रखें और लपेटकर राजगिरा आटा और साबूदाने का फलाहारी हेल्द‍ी डोसा (healthy dosa recipe) सर्व करें।

आलू – नारियल कोफ्ता 

सामग्री : 4-5 उबले हुए आलू बड़े आकार के, 100 ग्राम ताजा पनीर, 100 ग्राम कसा नारियल, 100 एमएल दूध, 50 ग्राम सिंघाड़े का आटा, हरी धनिया एवं हरी मिर्च, राजगिरे का आटा, एक छोटा चम्मच जीरा, 4-5 टमाटर, दो-तीन चम्मच शक्कर, सेंधा नमक व लाल मिर्च स्वादानुसार।

विधि : कोफ्ते बनाने के लिए उबले आलू को छिलकर मसल लें। इसमें पनीर कसकर मिला लें। इस मिश्रण में सिंघाड़े का आटा, हरी मिर्च व हरी धनिया, नमक व लाल मिर्च मिलाकर कोफ्ते के गोले बना लें। इन गोलों को राजगिरे के सूखे आटे में लपेटकर तल लें। अब दूसरी कढ़ाई में 3-4 चम्मच तेल गर्म करके जीरा डालें, अब टमाटर प्यूरी डाल कर भून लें। अब इसमें सेंधा नमक, दो-तीन चम्मच शक्कर डालें। किसा नारियल और दूध डालकर पका लें। पकने पर कोफ्ते डालें और गरमा-गरम कोफ्ते  को राजगिरे की पूरी या सिंघाड़े की पूरी के साथ पेश करें।

खस्ता नमकीन पूरी

सामग्री : 1/2 कटोरी सिंघाड़े का आटा, 2 कटोरी राजगिरे का आटा, 1/2 कटोरी मूंगफली दाने, 1 चम्मच सौंफ दरदरी पिसी हुई, 4-5 हरी मिर्च का पेस्ट, हर धनिया बारीक कटा, 1 चम्मच लाल मिर्च, नमक (सेंधा) स्वादानुसार, तेल या घी तलने के लिए।

विधि : सबसे पहले राजगिरे व सिंघाड़े का आटा छानकर एक कढ़ाई में हल्का गुलाबी होने तक सेंक लें। अब दाने को सेंक कर बारीक पिस लें। ठंडा होने पर एक थाली में दोनों आटे को मिक्स करके उपरोक्त सभी सामग्री डालकर अच्छी तरह मिक्स करके थोड़ा कड़ा आटा गूंथ लें और थोड़ी देर ढंक कर रखें। अब आटे की छोटी-छोटी लोई बनाकर पूरियां बना कर मूंगफली तेल या शुद्ध घी में कुरकुरी तल लें। तैयार गरमा-गरम लाजवाब फलाहारी नमकीन पूरी दही के रायते तथा हरी चटनी के साथ सर्व करें।

कच्चे केले का बड़ा 

सामग्री : 3 कच्चे केले उबले मैश किए, 250 ग्राम कुट्टू का आटा, सेंधा नमक 2 चम्मच, हरी मिर्च 4, हरा धनिया 1 लच्छी, उबले आलू 8, भुने एवं दरदरे पिसे मूंगफली दाने 1 छोटी कटोरी, तलने के लिए तेल।

विधि : हरी मिर्च और हरे धनिया को बारीक काट लें। कुट्टू के आटे में 1/2 चम्मच नमक और मैश किए केले मिलाकर गाढ़ा पेस्ट बनाएं। आलुओं को मैश करें और इसमें हरा धनिया, हरी मिर्च, मूंगफली दाना और नमक मिलाएं। इसके छोटे-छोटे गोले बनाएं और इन्हें तैयार आटे के मिश्रण में डुबोएं। गरम तेल में धीमी आंच पर सुनहरा होने तक तलें। अब फलाहारी टमाटर की चटनी के साथ गरमा-गरम कच्चे केले का बड़ा परोसें।

मोरधन कचोरी

सामग्री : 150 ग्राम मोरधन या समा के चावल, 3 आलू मध्यम आकार के, राजगिरे का आटा 100 ग्राम, सिंघाड़े का आटा 50 ग्राम, कालीमिर्च, लौंग, लाल मिर्च, अदरक का पेस्ट, जीरा सभी चीजें एक-एक छोटा चम्मच, नमक अंदाज से, 2-3 हरी मिर्च, हरा धनिया बारीक कटा, तेल तलने के लिए।

विधि : मोरधन को साफ करके 2 घंटे के लिए भिगो दें, फिर मिक्सी में महीन पीस लें। आलू उबालकर मेश कर लें। कढ़ाई में 50 ग्राम तेल डालकर गरम करें। जीरा व हरी मिर्च डाल दें, तड़कने लगे तब मोरधन का पेस्ट डालकर धीमी आंच पर भूनें। खुशबू आने लगे तब आलू का पेस्ट व सारे मसाले डाल दें। कुछ देर और भूनें, उतारकर हरा धनिया डाल दें। ठंडा होने पर बड़े आकार की गोलियां बना लें। अब राजगिरे व सिंघाड़े के आटे में थोड़ा-सा नमक व एक छोटा चम्मच तेल डालकर पूड़ी के आटे जैसा गूंथ लें। छोटी-छोटी लोइयां बनाकर छोटी पपड़ी बेलें। हर पपड़ी में मिश्रण की गोली रखकर कचोरी का आकार दें। अब गरम तेल में धीमी आंच पर गुलाबी होने तल लें, लीजिए आपके लिए मोरधन की स्वादिष्ट खस्ता कचोरी तैयार हैं। इन्हें गरमा-गरम ही हरी चटनी या दही के रायते के साथ परोसें।

 अरबी की कढ़ी

सामग्री : 200 ग्राम अरबी, 1 चम्‍मच अजवाइन, आधा कप दही, 1 चम्‍मच अदरक किसा हुआ, स्‍वादनुसार सेंधा नमक, 1/2 चम्‍मच मि‍र्च पावडर, 1/4 कप घी, सर्व करने के लिए हरा धनि‍या।

वि‍धि : कढ़ाई में घी गरम करें और अजवाइन डालें। जब अजवाइन तड़तड़ाने लगे तो उसमें दही डाल दें और तब तक हि‍लाते रहें जब तक वो घी ना छोड़ने लगे। अब नमक और लाल मि‍र्च डालें। थोड़ा हि‍लाने के बाद उसमें कटी हुई अरबी डाल दें और आंच तेज कर दें। थोड़ी देर पकने दें। दो कप पानी डालें और उबाल आने दें। मध्‍यम आंच पर 15 मि‍नट तक पकाएं। अब गरमा-गरम फलाहारी पराठे के साथ अरबी की टेस्टी कढ़ी परोसें।

(साभार – वेबदुनिया )