Wednesday, April 1, 2026
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बलदेव सिंह: बंटवारा न चाहने वाला सिख जो पहला रक्षा मंत्री बना

सरदार बलदेव सिंह… चंडीगढ़ के ज्‍यादातर लोगों को नहीं पता होगा कि उनके शहर को बसाने में इस नाम का कितना योगदान है। सिंह इसी इलाके से पहली बार 1937 में लाहौर की पंजाब में विधायक बने थे। उस वक्‍त यह इलाका अम्‍बाला जिले में आता था। पहाड़‍ियों से निकलने वाले झरने और नाले कहर बरपाते थे, इसकी गिनती सबसे पिछड़े इलाकों में होती थी। बंटवारे के बाद नए पंजाब की राजधानी कुछ समय के लिए शिमला रही। पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू राजधानी के रूप में ऐसा शहर बसाना चाहते थे जो नया और आधुनिक हो।

नेहरू पर सरदार बलदेव सिंह का असर ही था कि इस इलाके में नई राजधानी बनाने का फैसला हुआ। आज चंडीगढ़ देश के सबसे खुशहाल शहरों में से एक है। पंजाब सिखों के प्रतिनिधि के रूप में सिंह भारत की स्‍वतंत्रता को लेकर चल रही सियासी बातचीत का हिस्‍सा थे। बंटवारे में भी सरदार बलदेव सिंह की अहम भूमिका रही। 11 जुलाई, 1902 को जन्‍मे बलदेव सिंह 15 अगस्‍त, 1947 को स्‍वतंत्र भारत के पहले रक्षा मंत्री बने।
बलदेव सिंह: सिखों का बड़ा तरफदार था तारा सिंह का चेला

बलदेव सिंह एक संपन्‍न परिवार में जन्‍मे। अमृतसर के खालसा कॉलेज से पढ़ाई के बाद बलदेव ने अकाली पार्टी के जरिए राजनीति में दस्‍तक दी। मास्‍टर तारा सिंह को पूरी उम्र गुरु मानने की कसम खाई। लाहौर में सिख नैशनल कॉलेज बनवाले में बलदेव सिंह की बड़ी भूमिका रही। जब दूसरा विश्‍व युद्ध छिड़ा तो बलदेव सिंह ने सेना में सिखों की ज्‍यादा से ज्‍यादा भर्ती की वकालत की। कांग्रेस इस विचार का विरोध कर रही थी।

1942 का क्रिप्‍स मिशन… जिन्‍ना की वो जिद
1942-
ब्रिटिश युद्ध कैबिनेट ने 1942 में भारत का राजनीतिक भविष्‍य के लिए खास प्रस्‍तावों के साथ क्रिप्‍स मिशन को भेजा। सरदार बलदेव सिंह सिखों के डेलिगेशन का हिस्‍सा थे। इस डेलिगेशन में मास्‍टर तारा सिंह, सर जोगेद्र सिंह और सरदार उज्‍जल सिंह थे। मिशन फेल साबित हुआ क्‍योंकि कोई राजनीतिक दल किसी प्रस्‍ताव पर सहमत नहीं हो पाया।
स्‍वतंत्रता की कोशिशें तेज हो चली थीं मगर मुस्लिम समुदाय ने मोहम्‍मद अली जिन्‍ना को अपना इकलौता प्रवक्‍ता मान लिया। जिन्‍ना इस बात पर अड़े थे कि उन्‍हें मुस्लिम बहुत इलाका, मुस्लिमों के टोटल कंट्रोल में चाहिए। इसके अलावा वो कोई दूसरा प्रस्‍ताव मंजूर नहीं करेंगे।

पंजाब की धुर विरोधी पार्टियों को एक करा दिया

जून 1942 में यूनियनिस्‍ट पार्टी के सर सिकंदर हयात खान पंजाब के प्रीमियर बने। सरदार बलदेव सिंह ने अकाली नेताओं और यूनियनिस्‍ट पार्टी के बीच लंबे वक्‍त से चली आ रही खींचतान खत्‍म कराई। दोनों दलों के बीच एक समझौता हुआ और अकाली गठबंधन सरकार का हिस्‍सा बने। बलदेव सिंह ने 26 जून, 1942 को विकास मंत्री के पद की शपथ ली।
दिसंबर 1942 में जब सर सिकंदर गुजरे तो मलिक खिजर हयात तिवाना सीएम बने। बलदेव सिंह 1946 तक अपने पद पर बने रहे। 2 सितंबर, 1946 को उनसे भारत की पहली राष्‍ट्रीय सरकार में रक्षा मंत्री के रूप में शामिल होने को कहा गया।

देश का बंटवारा नहीं चाहते थे सरदार बलदेव सिंह

भावी संविधान पर भारतीय नेताओं से बातचीत करने ब्रिटिश कैबिनेट मिशन 1946 में भारत आया। बल‍देव सिंह को सिखों के प्रतिनिधि के रूप में चुना गया। वह सिखों की विशेष सुरक्षा के लिए अलग से मिशन से मिले। वह देश का बंटवारा नहीं चाहते थे। बलदेव सिंह की राय थी कि एकजुट भारत हो जिसमें अल्‍पसंख्‍यकों की रक्षा के प्रावधान हों।
अगर मुस्लिम लीग की तरफ से थोपा गया बंटवारा होता है तो बलदेव सिंह पंजाब की सीमाओं का फिर से निर्धारण चाहते थे। वह रावलपिंडी और मुल्‍तान जैसे मुस्लिम बहुल डिविजंस को काटकर अलग कर देना चाहते थे ताकि बाकी पंजाब में सिखों के पक्ष में पलड़ा झुका रहे।

ब्रिटिश काल के तीसरे सबसे बड़े पद पर बैठे सरदार

कैबिनेट मिशन के प्रस्‍ताव में मुस्लिमों के ऑटोनॉमी के दावे को काफी हद तक मान लिया गया था। मई 1946 में सिखों ने पूरी कवायद का बहिष्‍कार करते हुए प्रस्‍ताव को खारिज कर दिया। जवाहरलाल नेहरू की अपील पर पंथिक प्रतिनिधि बोर्ड ने 14 अगस्‍त, 1946 की एक बैठक में दोहराया कि कैबिनेट मिशन योजना सिखों के साथ अन्‍याय है, मगर बहिष्‍कार वापस ले लिया।
जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्‍व में बनी कैबिनेट में सिखों के प्रतिनिधि के रूप में सरदार बलदेव सिंह 2 सितंबर, 1946 को शामिल हुए। रक्षा मंत्रालय ब्रिटिश काल में अंग्रेजों के कमांडर-इन-चीफ के पास रहता आया था। यह पद अंग्रेजी हुकूमत में वायसराय और गवर्नर-जनरल के बाद तीसरे नंबर पर था।

सिखों का वो फैसला जिसने इतिहास की दिशा बदल दी
अंग्रेजों ने आखिरकार भारत छोड़ने और उससे पहले उसके दो टुकड़े करने का फैसला किया। कांग्रेस पार्टी, मुस्लिम लीग और सिखों के एक-एक प्रतिनिधि को लंदन बुलाया गया। इसमें जवाहरलाल नेहरू, मोहम्‍मद अली जिन्‍ना और सरदार बलदेव सिंह शामिल थे। अंग्रेजों ने पूरी कोशिश की कि सिख किसी तरह पाकिस्‍तान के साथ रह जाएं। वह चाहते थे कि सरदार बलदेव सिंह इस बारे में जिन्‍ना से मोल-भाव करें।
सिखों ने मास्‍टर तारा सिंह की अगुवाई में मुस्लिम लीग के सारे प्रलोभन ठुकरा दिए। सरदार बलदेव सिंह की अकाली पार्टी की कोशिशों के चलते पंजाब का बंटवारा हो पाया। एक सीमा आयोग बनाया गया। 15 अगस्‍त, 1947 को जब उसका फैसला आया तो सबसे तगड़ी चोट सिखों को सहनी पड़ी।

‘बलदेव की अगुवाई में सेना ने हैदराबाद को भारत में म‍िलाया’
स्‍वतंत्रता के बाद रक्षा मंत्री के रूप में, सरदार बलदेव सिंह ने रक्षा बलों को बदलकर रख दिया। सेना के पूरी तरह से राष्‍ट्रीयकरण के पीछे बलदेव सिंह ही थे। कश्‍मीर में पाकिस्‍तानी घुसपैठ, जूनागढ़ और हैदराबाद में पुलिस कार्रवाई… रक्षा मंत्री के रूप में बलदेव सिंह के आगे चुनौतियां कड़ी थीं, मगर उन्‍होंने जिस तरह मुकाबला किया, उसकी खूब तारीफ हुई। हालांकि, सिख समुदाय के प्रतिनिधि के रूप में बलदेव सिंह को लगता था कि कांग्रेस पार्टी ने सिखों को एक अल्‍पसंख्‍यक समुदाय के रूप में जो संवैधानिक अधिकार देने का वादा किया था, उसे वह पूरा नहीं करवा सके।
वह नेहरू और बाकी नेताओं से स्‍वतंत्रता आंदोलन के समय किए गए वादों को पूरा करने की गुहार लगा रहे थे। सरदार बलदेव सिंह 1952 में सांसद चुने गए मगर उन्‍हें कैबिनेट में नहीं लिया गया। नेहरू के निजी सहायक रहे एमओ मथाई अपनी किताब Reminiscences of the Nehru Age में लिखते हैं कि नेहरू को बलदेव सिंह की राजनीतिक ईमानदारी पर भरोसा नहीं रह गया था, इसलिए उन्‍हें हटा दिया। बलदेव की जगह पंजाब से स्‍वर्ण सिंह को कैबिनेट में जगह दी गई। एन. गोपालस्‍वामी आयंगर भारत के दूसरे रक्षा मंत्री बने।
1957 में सरदार बलदेव सिंह दोबारा सांसद निर्वाचित हुए मगर उनकी तबीयत बिगड़ने लगी थी। 29 जून, 1961 को लंबी बीमारी के बाद दिल्‍ली में उनका निधन हो गया।

(साभार नवभारत टाइम्स)

 

जानिए अशोक स्तम्भ की कहानी

हमारा जो राष्‍ट्रीय प्रतीक है, वह अशोक स्‍तंभ का शीर्ष भाग है। मूल स्‍तंभ के शीर्ष पर चार भारतीय शेर एक-दूसरे से पीठ सटाए खड़े हैं, जिसे सिंहचतुर्मुख कहते हैं। सिंहचतुर्मुख के आधार के बीच में अशोक चक्र है जो राष्‍ट्रीय ध्‍वज के बीच में दिखाई देता है।
केवल सात स्‍तंभ ही बच पाए, सारनाथ वाला उनमें से एक
करीब सवा दो मीटर का सिंहचतुर्मुख आज की तारीख में सारनाथ म्‍यूजियम में रखा है। जिस अशोक स्‍तंभ का यह शीर्ष है, वह अब भी अपने मूल स्‍थान पर ही है। सम्राट अशोक ने करीब 250 ईसा पूर्व सिंहचतुर्मुख को स्‍तंभ के शीर्ष पर रखवाया था। ऐसे कई स्‍तंभ अशोक ने भारतीय उपमहाद्वीप में फैले अपने साम्राज्‍य में कई जगह लगवाए थे, जिनमें से सांची का स्‍तंभ प्रमुख है। अब केवल सात अशोक स्‍तंभ ही बचे हैं। कई चीनी यात्रियों के विवरणों में इन स्‍तंभों का जिक्र मिलता है। सारनाथ के स्‍तंभ का भी ब्‍योरा दिया गया था मगर 20वीं सदी की शुरुआत तक इसे खोजा नहीं जा सका था। वजह, पुरातत्‍वविदों को सारनाथ की जमीन पर ऐसा कोई संकेत नहीं मिलता था कि नीचे ऐसा कुछ दबा हो सकता है।
एक सिविल इंजिनियर जिसे आर्कियोलॉजी का ‘अ’ नहीं पता था
1851 में खुदाई के दौरान सांची से एक अशोक स्‍तंभ मिल चुका था। उसका सिंहचतुर्मुख सारनाथ वाले से थोड़ा अलग है। ब्रिटिश राज पर कई किताबें लिखने वाले मशहूर इतिहासकार चार्ल्‍स रॉबिन एलेन ने सम्राट अशोक से जुड़ी खोजों पर भी लिखा। अशोका :  द सर्च फॉर इंडियाज लॉस्ट एम्परर  में वह सारनाथ के अशोक स्‍तंभ की खोज का विवरण देते हैं। फ्रेडरिक ऑस्‍कर ओरटेल की पैदाइश जर्मनी में हुई थी। वह जवानी में जर्मन नागरिकता छोड़कर भारत आए और तबके नियमों के हिसाब से ब्रिटिश नागरिकता ले ली। रुड़की के थॉमसन कॉलेज ऑफ सिविल इंजिनियरिंग (अब IIT रुड़की) से डिग्री ली। रेलवे में बतौर स‍िविल इंजिनियर काम करने के बाद फ्रेडरिक ऑस्‍कर ओरटेल ने लोक निर्माण विभाग में ट्रांसफर ले लिया।
1903 में ओरटेल की तैनाती बनारस (अब वाराणसी) में हुई। सारनाथ की वाराणसी से दूरी बमुश्किल साढ़े तीन कोस होगी। ओरटेल के पास आर्कियोलॉजी का कोई अनुभव नहीं था, इसके बावजूद उन्‍हें इजाजत मिल गई कि वो सारनाथ में खुदाई करवा सकें। सबसे पहले मुख्‍य स्‍तूप के पास गुप्त काल के मंदिर के अवशेष मिले, उसके नीचे अशोक काल का एक ढांचा था। पश्चिम की तरफ फ्रेडरिक को स्‍तंभ का सबसे निचला हिस्‍सा मिला। आस-पास ही स्‍तंभ के बाकी हिस्‍से भी मिल गए। फिर सांची जैसे शीर्ष की तलाश शुरू हुई। एलेन अपनी किताब में लिखते हैं कि विशेषज्ञों को लगा कि किसी समयकाल में स्‍तंभ को जानबूझकर ध्‍वस्‍त किया गया था। फ्रेडरिक के हाथ तो जैसे लॉटरी लग गई थी। मार्च 1905 में स्‍तंभ का शीर्ष मिल गया।

फ्रेडरिक ने घर का नाम ‘सारनाथ’ रखा
जहां स्‍तंभ म‍िला था, फौरन ही वहां म्‍यूजियम यानी संग्रहालय बनाने के आदेश दे दिए गए। सारनाथ म्‍यूजियम भारत का पहला ऑन-साइट म्‍यूजियम है। अगले साल जब शाही दौरा हुआ तो फ्रेडरिक ने वेल्‍स के राजकुमार और राजकुमारी (बाद में किंग जॉर्ज पंचम और महारानी मेरी) को सारनाथ में अपनी खोज दिखाई। अगले 15 सालों के दौरान फ्रेडरिक ने बनारस, लखनऊ, कानपुर, असम में कई महत्‍वपूर्ण इमारतों का निर्माण करवाया। 1921 में वह यूनाइटेड किंगडम लौट गए। 1928 तक फ्रेडरिक लंदन के टेडिंगटन स्थित जिस घर में रहे, उसे उन्‍होंने ‘सारनाथ’ नाम दिया था। वह भारत से कई ऐतिहासिक कलाकृतियां, मूर्तियां अपने साथ ले गए थे।

अशोक स्‍तंभ का सिंहचतुर्मुख कैसे बना राष्‍ट्रीय प्रतीक?
सारनाथ में अशोक स्‍तंभ की खोज भारत में आर्कियोलॉजी की बेहद महत्‍वपूर्ण घटना है। जब भारत अंग्रेजों के चंगुल से आजाद हुआ तो एक राष्‍ट्रीय प्रतीक की जरूरत महसूस हुई। भारतीय अधिराज्य ने 30 दिसंबर 1947 को सारनाथ के अशोक स्‍तंभ के सिंहचतुर्मुख की अनुकृति को राष्‍ट्रीय प्रतीक के रूप में अपनाया। इधर संविधान ड्राफ्ट किए जाने की शुरुआत हुई। हाथों से लिखे जा रहे संविधान पर भी राष्‍ट्रीय प्रतीक उकेरा जाना था।

संविधान की हस्‍तलिखित प्रति को सजाने का काम मिला आधुनिक भारतीय कला के पुरोधाओं में से एक नंदलाल बोस को। बोस ने एक टीम बनाई जिसमें 21 साल के दीनानाथ भार्गव भी थे। बोस का मन था कि संविधान के शुरुआती पन्‍नों में ही सिंहचतुर्मुख चित्रित होना चाहिए। चूंकि भार्गव कोलकाता के चिड़‍ियाघर में शेरों के व्‍यवहार पर रिसर्च कर चुके थे, इसलिए बोस ने उन्‍हें चुना। 26 जनवरी, 1950 को ‘सत्‍यमेय जयते’ के ऊपर अशोक के सिंहचतुर्मुख की एक अनुकृति को भारत के राष्‍ट्रीय प्रतीक के रूप में स्‍वीकार किया गया।

नयी संसद ऐसी होगी
1921 से 1927 के बीच पुराने संसद भवन का निर्माण हुआ था। नया संसद भवन 64,500 वर्ग मीटर में फैला है जो अभी की इमारत से 17,000 वर्ग मीटर ज्‍यादा है। लोकसभा का आकार मौजूदा सदन से लगभग तिगुना होगा। लोकसभा में 888 सदस्यों के लिए सीटें होंगी। वहीं दूसरी ओर राज्यसभा में 326 सीटें होंगी। संयुक्त सत्र के दौरान 1224 सदस्य साथ में बैठ सकेंगे।
नई इमारत तीन मंजिला है। नए संसद भवन का डिजाइन त्रिकोणीय है। नई बिल्डिंग की डिजाइन में लोकसभा, राज्यसभा और एक खुला आंगन है। दोनों ही सदन सुविधाओं व डिजाइनिंग के लिहाज से स्टेट ऑफ आर्ट हैं।
वर्तमान संसद भवन का गेट आप दाईं ओर देख सकते हैं। नए संसद भवन का गेट आकार में बड़ा है। उसपर अशोक चक्र बना है और ‘सत्‍यमेव जयते’ लिखा है।
संसद भवन की छत पर एक गुंबद है। नई बन रही इमारत की छत पर 6.5 मीटर ऊंचा राष्‍ट्रीय प्रतीक ‘अशोक स्‍तंभ’ स्‍थापित किया गया है। इमारत में बड़ा सा कांस्टीट्यूशन हॉल, सांसदों के लिए लाउंज, एक लाइब्रेरी, कमिटी रूम, डाइनिंग एरिया और पार्किंग भी होगी। इसका बड़ा आकर्षण कांस्टीट्यूशन हॉल होगा, जहां भारत की लोकतांत्रिक विरासत को दर्शाने के लिए तमाम चीजों के साथ-साथ संविधान की मूल प्रति, डिजिटल डिस्प्ले वगैरह दिखाए जाएंगे।
नई संसद में दोनों सदनों के साथ-साथ सभी सांसदों के लिए आधुनिक सुविधाओं से लैस ऑफिस की व्यवस्था भी होगी। यहां सांसदों के लिए डिजिटल सुविधाएं उपलब्ध होंगी। नए सदन में सांसदों की बैठने की व्यवस्था मौजूदा व्यवस्था से हटकर ज्यादा खुली व आरामदेह होगी। एक टेबल पर दो सासंद बैठेंगे। सभी मंत्रियों के एक ही जगह पर बैठने की व्यवस्था की गई है, जिससे उनके आने जाने में लगने वाले वक्त की बचत हो सके।

भारत का राजकीय प्रतीक क्‍या है?
भारत सरकार की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, भारत का राजचिह्न सारनाथ स्थित अशोक के सिंह स्तंभ की अनुकृति है, जो सारनाथ के संग्रहालय में सुरक्षित है। मूल स्तंभ में शीर्ष पर चार सिंह हैं, जो एक-दूसरे की ओर पीठ किए हुए हैं। इसके नीचे घंटे के आकार के पदम के ऊपर एक चित्र वल्लरी में एक हाथी, चौकड़ी भरता हुआ एक घोड़ा, एक सांड तथा एक सिंह की उभरी हुई मूर्तियां हैं। इसके बीच-बीच में चक्र बने हुए हैं। एक ही पत्थर को काट कर बनाए गए इस सिंह स्तंभ के ऊपर ‘धर्मचक्र’ रखा हुआ है।

भारत सरकार ने यह चिन्ह 26 जनवरी, 1950 को अपनाया। इसमें केवल तीन सिंह दिखाई पड़ते हैं, चौथा दिखाई नही देता। पट्टी के मध्य में उभरी हुई नक्काशी में चक्र है, जिसके दाईं ओर एक सांड और बाईं ओर एक घोड़ा है। दाएं तथा बाएं छोरों पर अन्य चक्रों के किनारे हैं। आधार का पदम छोड़ दिया गया है। फलक के नीचे मुण्डकोपनिषद का सूत्र ‘सत्यमेव जयते’ देवनागरी लिपि में अंकित है, जिसका अर्थ है- ‘सत्य की ही विजय होती है’।’

(साभा नवभारत टाइम्स)

केदारनाथ में स्वचालित मौसम केंद्र स्थापित

रुद्रप्रयाग । केदारनाथ में हर समय मौसम से जुड़ी सटीक जानकारी पाने के लिए रूद्रप्रयाग जिला प्रशासन ने भारतीय प्रोद्यौगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर के वैज्ञानिकों की मदद से हिमालयी धाम में स्वचालित मौसम केंद्र (स्टेशन) स्थापित किया है।

इस मौसम केंद्र से केदारनाथ के पल-पल बदलते मौसम की जानकारी प्रशासन के साथ ही भगवान शिव के धाम आने वाले तीर्थ यात्रियों को भी आसानी से उपलब्ध होगी। आईआईटी कानपुर के प्रो. इंद्रसेन ने रुद्रप्रयाग जिला प्रशासन के अनुरोध पर यह प्रणाली केदारनाथ में स्थापित की है।

रुद्रप्रयाग के जिलाधिकारी ने बताया कि केदारनाथ धाम में मौसम प्रणाली लगने से वहां पुनर्निर्माण, यात्रा संचालन और हेलीकॉप्टर सेवा का संचालन भी और बेहतर तरीके से होगा। उन्होंने कहा कि इसके साथ ही केदारनाथ धाम में दर्शन करने के लिए आने वाले तीर्थ यात्रियों को भी मौसम की जानकारी समय से मिलेगी और वे अपनी यात्रा सुगमता के साथ कर सकेंगे।

ईपीएफओ की केंद्रीय प्रणाली की तैयारी, एक साथ मिलेगी 73 लाख पेंशनभोगियों को पेंशन

नयी दिल्ली । कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) अपनी 29 और 30 जुलाई को होने वाली बैठक में केंद्रीय पेंशन वितरण प्रणाली की स्थापना के प्रस्ताव पर विचार के बाद इसे मंजूरी देगा। इस प्रणाली की स्थापना से देशभर में 73 पेंशनभोगियों के खातों में पेंशन को एक बार में एक साथ स्थानांतरित किया जा सकेगा।
अभी ईपीएफओ के 138 क्षेत्रीय कार्यालय अपने क्षेत्र के लाभार्थियों के खातों में पेंशन डालते हैं। ऐसे में पेंशनभोगियों को पेंशन अलग-अलग दिन और समय पर मिलती है।
एक सूत्र ने पीटीआई-भाषा से कहा कि ईपीएफओ के निर्णय लेने वाले शीर्ष निकाय केंद्रीय न्यासी बोर्ड (सीबीटी) की 29 और 30 जुलाई को होने वाली बैठक में केंद्रीय पेंशन वितरण प्रणाली के गठन का प्रस्ताव रखा जाएगा।
सूत्र ने कहा कि इस प्रणाली की स्थापना के बाद पेंशन का वितरण 138 क्षेत्रीय कार्यालय के डेटाबेस के आधार पर किया जाएगा। इससे 73 लाख पेंशनभोगियों को एक साथ पेंशन दी जा सकेगी।
सूत्र ने बताया कि सभी क्षेत्रीय कार्यालय अपने क्षेत्र के पेंशनभोगियों की जरूरतों को अलग-अलग देखते हैं। इससे पेंशनभोगियों को अलग-अलग दिन पेंशन का भुगतान हो पाता है।
सीबीटी की 20 नवंबर, 2021 को हुई 229वीं बैठक में न्यासियों ने सी-डीएसी द्वारा केंद्रीकृत आईटी आधारित प्रणाली के विकास के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी।
श्रम मंत्रालय ने बैठक के बाद बयान में कहा था कि इसके बाद क्षेत्रीय कार्यालयों के ब्योरे को चरणबद्ध तरीके से केंद्रीय डेटाबेस में स्थानांतरित किया जाएगा। इससे सेवाओं का परिचालन और आपूर्ति सुगम हो सकेगी।

दोस्त भारत के लिए चीन से भिड़ गए थे शिंजो आबे, खोला था जापान का खजाना

नयी दिल्ली । जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे की मौत हो गई है। एक हमलावर ने सुबह उन्हें गोली मार दी थी और बाद में अस्पताल में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। उनका जाना भारत के लिए एक अपूरणीय क्षति है। इसकी वजह यह है कि उन्होंने दोनों देशों के रिश्तों को नई दिशा दी थी।यूं तो भारत और जापान के रिश्ते सदियों पुराने हैं लेकिन शिंजो आबे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन्हें एक अलग मुकाम पर पहुंचाया। शिंजो आबे ने ऐसे समय भारत की मदद की जब दूसरे देशों ने भारत से मुंह मोड लिया था। आज जापान के सहयोग से भारत में कई परियोजनाओं चल रही हैं। इनका श्रेय काफी हद तक शिंजो आबे को जाता है। इनमें बुलेट ट्रेन, दिल्ली मेट्रो, दिल्ली मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर , शहरों में बुनियादी ढांचे के विकास से जुड़ी परियोजनाओं और पूर्वोत्तर के विकास से जुड़ी कई परियोजनाएं अहम हैं। एक तरह से उन्होंने जापान के खजाने का मुंह भारत के लिए खोल दिया था।
भारत के प्रति शिंजो आबे के लगाव को इसी बात से समझा जा सकता है कि प्रधानमंत्री रहते उन्होंने कई बार भारत की यात्रा की थी। उन्हें भारत के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म विभूषण (Padma Vibhushan) से सम्मानित किया गया है। शिंजो आबे न केवल जापान के सबसे ज्यादा लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे हैं, बल्कि वह सबसे ज्यादा बार भारत आने वाले जापानी प्रधानमंत्री रहे हैं। अपने करीब नौ साल के कार्यकाल में आबे चार बार भारत आए। आबे जापान के पहले प्रधानमंत्री थे जो गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि रहे। उन्हें 2014 में गणतंत्र दिवस के मौके पर मुख्य अतिथि रहे। उस समय भारत में मनमोहन सिंह की सरकार थी।
बुलेट ट्रेन के लिए सस्ता कर्ज
साल 2014 में मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत और जापान के रिश्तों में नया जोश भर गया। इस दौरान दोनों देशों के बीच कई अहम समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। इनमें काशी को क्योटो के तर्ज पर विकसित करने, बुलेट ट्रेन परियोजना, न्यूक्लियर एनर्जी, इंडो पेसिफिक रणनीति और एक्ट ईस्ट पॉलिसी शामिल है। 2014 में जब मोदी जापान गए तो काशी को क्योटो के तर्ज पर विकसित करने का समझौता हुआ था। इसके तहत जापान काशी को स्मार्ट सिटी बनाने में जरूरी इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाने के साथ-साथ ऐतिहासिक धरोहरों, कला और संस्कृति को संरक्षित में भी मदद कर रहा है।
भारत में पहली बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट की शुरुआत भी आबे में हुई। इसके तहत दोनों देशों के बीच 2015 में समझौता हुआ था। 2017 में मोदी और आबे ने इस अहम प्रोजेक्ट की आधारशिला रखी थी। समझौते के तहत अहमदाबाद से मुंबई तक बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट में करीब 1.1 लाख करोड़ रुपये खर्च होंगे। इसके लिए 81 फीसदी राशि जापान सरकार के सहयोग से जापान अंतरराष्ट्रीय सहयोग एजेंसी (JICA) देगी। जापान इसके लिए 0.1 फीसदी पर लोन दे रहा है। पीएम मोदी के इस फेवरेट प्रोजेक्ट के लिए जापान टेक्निकल सपोर्ट से लेकर बुलेट ट्रेन की आपूर्ति तक कर रहा है। हालांकि कई कारणों से यह प्रोजेक्ट देरी से चल रहा है और देश में पहली बुलेट ट्रेन 2026 से चलने की संभावना है।
ऐतिहासिक भाषण
आबे जब पहली बार प्रधानमंत्री बने तो वह अगस्त 2007 में भारत आए थे। उस समय उन्होंने भारत और जापान के संबंधों को लेकर एक अहम भाषण दिया था जिसे ‘दो सागरों का मिलन’ के रूप में याद किया जाता है। जानकारों का मानना है कि भारत-जापान के संबंधों को नई ऊंचाइयों तक ले जाने में उस भाषण ने नींव रखी थी। इसके बाद दोनों देशों के बीच करीबी बढ़ी।
दिल्ली और मुंबई के बीच बन रहे 1483 किमी लंबे दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर ( डीएमआईसी) में भी जापान सहयोग कर रहा है। जनवरी 2014 में आबे के भारत आने से पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल की आर्थिक मामले की समिति ने इस प्रोजेक्ट को हरी झंडी दी थी। 90 अरब डॉलर की इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए पहली मदद जापान से ही मिली थी। जापान ने इसके लिए 4.5 अरब डॉलर का लोन दिया था। इसके अलावा देश के कई शहरों में जापान के सहयोग से मेट्रो प्रोजेक्ट बन रहे हैं।
चीन के विरोध को किया दरकिनार
आबे के प्रयासों से ही भारत-जापान रिश्तों में अंतिम बाधा पार हुई थी। जापान भारत को न्यूक्लियर पावर के तौर पर मान्यता नहीं देता था लेकिन आबे के प्रयासों से 2016 में दोनों देशों के बीच सिविल न्यूक्लियर पैक्ट हुआ। उन्होंने एनपीटी का सदस्य नहीं होने के बाद भी भारत के साथ सिविल न्यूक्लियर समझौता किया। साथ ही विदेश और रक्षा मंत्री के साथ (2+2) मीटिंग और डिफेंस इक्विपमेंट की तकनीक ट्रांसफर पर भी दोनों देशों के बीच कई अहम समझौते हुए। इससे दुनिया के दूसरे देशों के साथ भी भारत के संबंधों को नया आयाम मिला।
जापान पूर्वोत्तर की कई परियोजनाओं में मदद दे रहा है। इसके लिए उसने चीन के विरोध को भी दरकिनार कर दिया था। 2017 में आबे के भारत दौरे में पूर्वोत्तर की कई परियोजनाओं के लिए भारत और जापान के बीच समझौता हुआ था। चीन अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा करता रहा है और इस विवादित मसला मानता है। उसका कहना था कि भारत और चीन के बीच सीमा को लेकर विवाद है, इसलिए किसी तीसरे देश को वहां निवेश से बचना चाहिए। लेकिन जापान ने चीन के विरोध को दरकिनार कर दिया और वह पूर्वोत्तर में कई विकास परियोजनाओं में मदद कर रहा है।
(साभार – नवभारत टाइम्स)

94 साल की स्प्रिंटर दादी ने जीता वर्ल्ड मास्टर्स एथलेटिक्स चैंपियनशिप में स्वर्ण और कांस्य

नयी दिल्ली । उम्र तो सिर्फ एक आंकड़ा है… इस कहावत को भारत की 94 वर्षीय भगवानी देवी ने साबित कर दिखाया है। जिस उम्र में अमूमन लोग ठीक ढंग से उठ-बैठ नहीं पाते उस उम्र में उन्होंने विदेश में भारत के तिरंगे का माना बढ़ाया है। उन्होंने वर्ल्ड मास्टर्स एथलेटिक्स चैंपियनशिप में सीनियर सिटीजन कैटिगरी में 100 मीटर रेस का गोल्ड जीता तो फिर शॉटपुट में कांस्य पदक हासिल किया।
फिनलैंड के टेम्परे में वर्ल्ड मास्टर्स एथलेटिक्स चैंपियनशिप में ‘स्प्रिंटर दादी’ भगवानी ने 100 मीटर स्प्रिंट इवेंट में यह कमाल किया। उन्होंने 24.74 सेकंड के टाइम के साथ स्वर्ण पदक अपनी झोली में डाला। साथ ही शॉटपुट यानी गोला फेंक में भी ब्रॉन्ज मेडल हासिल किया। तिरंगा वाली जर्सी में, जिसपर इंडिया लिखा है, वह पदक दिखाती नजर आ रही हैं।
उनकी यह तस्वीर वायरल हो रही है और हर कोई उनकी हिम्मत की दाद रहे रहा है। मिनिस्ट्री ऑफ यूथ अफेयर्स एंड स्पोर्ट्स ने ऑफिशल ट्विटर अकाउंट पर उनकी तस्वीर को पोस्ट करते हुए तारीफ की है। मिनिस्ट्री की ओर से लिखा गया- भारत की 94 वर्षीय भगवानी देवी ने एकबार फिर बतला दिया है कि उम्र तो सिर्फ संख्या है। उन्होंने गोल्ड और और ब्रॉन्ज मेडल जीता। वाकई में साहसिक प्रदर्शन।

अब डॉलर नहीं बल्कि रुपये में होगा आयात-निर्यात : आरबीआई

नयी दिल्ली । भारतीय रिजर्व बैंक ने एक ऐसा फैसला किया है, जिससे भारत को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने में सबसे बड़ी मदद मिलेगी। भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकों को निर्देश दिया है कि वह भारतीय मुद्रा यानी रुपये में आयात-निर्यात के निपटारे का इंतजाम करें। केंद्रीय बैंक ने यह कदम वैश्विक कारोबारी समुदाय की बढ़ती दिलचस्पी को देखते हुए उठाया है। भारतीय रिजर्व बैंक के इस कदम के बाद अब लोग यह सोच रहे हैं कि इससे भारत को क्या फायदा होगा? सवाल ये भी है कि क्या इससे आम आदमी को कोई फायदा होगा? आइए जानते हैं।
डॉलर पर घटेगी भारत की निर्भरता
अभी तक आयात-निर्यात के लिए भारत समेत अधिकतर देश डॉलर पर निर्भर हैं। यानी अगर उन्हें किसी दूसरे देश से कुछ खरीदना है या बेचना है तो उन्हें डॉलर में भुगतान करना होता है। अमेरिकी डॉलर दुनिया की सबसे ताकतवर करेंसी है। कुल वैश्विक व्यापार में इसकी हिस्सेदारी करीब 80 फीसदी है। इसका मतलब है कि वैश्विक कारोबार का 80 फीसदी से ज्यादा ट्रांजेक्शन डॉलर में होता है। इसीलिए इसे दुनिया की सबसे ताकतवर करेंसी माना जाता है। जब रुपये में अंतरराष्ट्रीय ट्रेड होने लगेगा तो इससे डॉलर पर हमारी निर्भरता घटेगी।
अमेरिका के दबाव में नहीं रहेगा भारत!
जब भारत की डॉलर पर निर्भरता घटेगी तो अमेरिका से किसी तनाव की स्थिति में भी भारत को अधिक डरने की जरूरत नहीं होगी। जब रूस ने यूक्रेन पर हमला किया तो सबसे पहले अमेरिका ने उस पर डॉलर में ट्रेड करने पर प्रतिबंध लगा दिया। इसकी वजह से रूस को अंतराष्ट्रीय ट्रांजेक्शन करने में थोड़ी दिक्कत हुई, लेकिन वह पहले से ही अपनी करंसी रूबल में कई अंतरराष्ट्रीय ट्रांजेक्शन करने लगा था, इसलिए उस पर अमेरिका का ज्यादा दबाव नहीं बना। भारत की भी अपनी करंसी अंतरराष्ट्रीय ट्रेड के लिए इस्तेमाल होगी तो भारत को अमेरिका से तनाव की किसी स्थिति में दिक्कतों का सामना नहीं करना पड़ेगा।
आम आदमी को कैसे होगा फायदा?
रुपया अंतरराष्ट्रीय ट्रेडिंग में इस्तेमाल होने से आम आदमी को कई तरह से फायदा होगा। सबसे बड़ा फायदा तो यही होगा कि कई प्रोडक्ट सस्ते हो सकते हैं। जैसे कुछ ही महीनों पहले रूस ने भारत को सस्ता कच्चा तेल ऑफर किया था। यानी पेट्रोल-डीजल के दाम कम हो सकते थे। हालांकि, भारत की निजी कंपनियों ने इसे अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया और निर्यात पर ज्यादा जोर दिया। ये तो सिर्फ एक उदाहरण था। भारत और अन्य देशों के बीच सिर्फ कच्चे तेल ही नहीं, बल्कि खाने के तेल, ड्राई फ्रूट्स, गैस, कोयला, दवाएं समेत कई चीजों का व्यापार होता है। कई बार तो प्याज भी आयात किया जाता है। रूपये में ट्रेड होने से एक्सचेंज रेट का रिस्क नहीं रहेगा और कारोबारी बेहतर बार्गेनिंग करते हुए सस्ते में डील फाइनल कर सकते हैं, जिससे आम आदमी तक वह सामान सस्ते में पहुंच सकेगा।
अपनी करंसी में अंतरराष्ट्रीय ट्रेड के फायदे
इसका एक फायदा तो ये है कि अगर किसी देश की करंसी में अंतरराष्ट्रीय ट्रेड होता है तो इससे निर्यातकों को बड़ा फायदा होता है। उन्हें एक्सचेंज रेट रिस्क कम करने में मदद मिलती है। इसका सबसे बड़ा फायदा उन प्रोडक्ट्स में होता है, जिनका भुगतान सामान का ऑर्डर मिलने के काफी समय बाद होता है। इतने दिनों में डॉलर से एक्सचेंज रेट घटने-बढ़ने का निर्यातकों पर बड़ा असर होता है। वहीं दूसरा फायदा ये है कि रुपये में अंतरराष्ट्रीय ट्रेडिंग से एक्सचेंज रेट के रिस्क के बिना ही भारतीय फर्म और वित्तीय संस्थान अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों तक पहुंच बना सकेंगे। साथ ही उन्हें सस्ती दरों पर और बड़े पैमाने पर उधार लेने की इजाजत मिलेगी।

मिजोरम जहाँ हर 100 अधिकारियों में 70 से भी अधिक महिलाएं

नयी दिल्ली । मिजोरम में वरिष्ठ अधिकारी और मैनेजर लेवल पर महिला और पुरुष का अनुपात सबसे अधिक है। यहां इन पदों पर 70.9 फीसदी महिलाएं हैं। जुलाई 2020- जून 2021 तक के पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे के आंकड़ों के अनुसार नगालैंड को छोड़कर बाकी पूरे उत्तर पूर्वी राज्यों में महिलाओं का दबदबा है। इन जगहों पुरुषों की तुलना में बड़े पदों पर महिलाओं की संख्या डबल डिजिट में है।
मिजोरम के बाद नंबर आता है सिक्किम का, जहां यह अनुपात 48.2 फीसदी है। वहीं मणिपुर में अनुपात 45.1 फीसदी है। 44.8 फीसदी के साथ इस लिस्ट में मेघालय भी है। इनके बाद आंध्र प्रदेश इस लिस्ट में 43 फीसदी के अनुपात के साथ आता है। असम की बात करें तो वहां यह अनुपात 16.1 फीसदी है, जबकि नगालैंड में यह अनुपात 9.1 फीसदी है। अगर पूरे देश में लेजिस्लेटर, वरिष्ठ अधिकारी और मैनेजर लेवल के पदों पर महिलाओं की पुरुषों से तुलना करें तो यह रेश्यो 22.8 फीसदी है।
कई ऐसे भी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश हैं जहां यह अनुपात बहुत अधिक कम है। बड़े राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कम अनुपात वाले राज्यों में उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर, बिहार, पंजाब और अंडमान-निकोबार शामिल हैं। दादरा नागर हवेली, दमन दीव में यह अनुपात सिर्फ 1.8 फीसदी है, जो सबसे कम है।
वरिष्ठ मैनेजर वाली नौकरियों के मामले में भी मिजोरम 40.8 फीसदी के अनुपात के साथ सबसे ऊपर है। वहीं सिक्किम इस लिस्ट में 32.5 फीसदी के साथ दूसरे नंबर पर। 31 फीसदी के साथ मेघालय तीसरे नंबर पर है। परंपरागत तौर पर ही उत्तर-पूर्वी राज्यों में वरिष्ठ मैनेजर वाली नौकरियों में महिलाओं की भागीदारी काफी अधिक रहती है। हालांकि, हैरान करने वाले आंकड़े पंजाब से आए हैं, जो कभी इस कैटेगरी में टॉप के राज्यों में शामिल था, लेकिन अब वहां यह अनुपात सिर्फ 7.5 फीसदी रह गया है।

सुनील देवड़े : जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स का गोल्ड मेडलिस्ट जिसने बनाया 21 फुट ऊंचा अशोक स्तंभ

नयी दिल्ली । राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में पीएम नरेंद्र मोदी ने सोमवार को नए संसद भवन की छत पर बने राष्ट्रीय प्रतीक या कहें अशोक स्तंभ की प्रतिमा का अनावरण किया। इसे बनाने में 100 से अधिक कामगारों की मेहनत और 9 महीने से अधिक का समय लगा। उच्च शुद्धता वाले कांस्य से बने भारत के राष्ट्रीय प्रतीक को स्थापित करना अपने आप में एक चुनौती थी क्योंकि यह जमीन से 33 मीटर ऊपर है। इन सबके बीच क्या आप यह जानते हैं कि इस राष्ट्रीय प्रतीक को डिजाइन करने के पीछे किसका हाथ है। लोगों के बीच इस प्रतिमा के सामने आने के बाद एख सवाल तेजी से उठ रहा है कि आखिर इतनी खूबसूरत प्रतिमा को बनाने के पीछे कौन है। तो आपको बता दें कि इसे महाराष्ट्र के औरंगाबाद के सुनील देवड़े और जयपुर के लक्ष्मण ने डिजाइन किया है।
कौन हैं सुनील देवड़े
राष्ट्रीय प्रतिमा को बनाने वाले 49 वर्षीय मूर्तिकार सुनील देवड़े जेजे स्कूल ऑफ ऑर्ट्स से गोल्ड मेडल की उपाधि पा चुके हैं। उनके पिता ने भी इसी कॉलेज से पढ़ाई की थी। इतना ही नहीं सुनील ने इसके अलावा अंजता एलोरा विजिटर सेंटर में अजंता एलोरा गुफाओं की रेप्लिकाएं भी बनाई हैं जिसका मूल्य 125 करोड़ बताया जाता है। इस रेप्लिकाओं को बनाने के पीछे का मकसद मूल अजंता एलोरा गुफाओं पर से दवाब कम करना था।
सुनील देवड़े और अशोक स्तंभ बनाने की कहानी
बकौल सुनील देवड़े कहते हैं कि इस बहुमूल्य कार्य को करने के लिए पूरे देश से मुझे चुना गया, इससे बडे़ सम्मान की बात और क्या हो सकती है। देवड़े ने हमारे सहयोगी टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत के दौरान कहा कि उन्हें यह प्रेरणा अपने पिता से मिली है जो खुद पुरात्तव विभाग के रिस्टोरेशन डिपार्टमेंट में काम करते हैं। देवड़े ने अशोक स्तंभ बनाने के पीछे की कहानी बताते हुए कहा कि अशोक स्तंभ को बनाने के लिए हमें टाटा प्रोजेक्ट्स लिमिटेड का साथ मिला। टाटा प्रोजेक्ट्स ने इस बाबत पिछले साल एक सर्वे भी किया था। सर्वे के आधार पर उन्होंने मेरे अनुभवों के आधार पर मेरा चुनाव किया।
मूर्तिकार सुनील देवड़े ने कहा कि उन्हें राष्ट्रीय प्रतीक का क्ले बनाने में लगभग 5 महीने लग गए। इसके बाद सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट्स से संबंधित एक्सपर्ट्स ने इसका मूल्यांकन किया जिसके बाद यह आगे के लिए पास किया गया। देवड़े ने आगे कहा कि एक बार पास पास हो जाने के बाद मैंने इस स्तंभ का फाइबर मॉडल बनाया। इस मॉडल को लेकर मैं जयपुर गया जहां इसे कांस्य से कास्ट किया गया।
कितना विशाल है अशोक स्तंभ
अशोक स्तंभ की हाइट 21 फुट है जिसे 5 फुट के पेडेस्टल पर रखा गया है। केंद्रीय आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि कांस्य से बने इस प्रतीक की ऊंचाई 6.5 मीटर हैं और इसे सहारा देने वाले ढांचे समेत इसका वजन 16,000 किलोग्राम (9,500 किलोग्राम वजन का राष्ट्रीय प्रतीक और इसे सहारा देने वाला 6,500 किलोग्राम वजनी ढांचा) है। उन्होंने बताया कि यह प्रतीक उच्च गुणवत्ता वाले कांस्य से बनाया गया है और यह भारतीय कारीगरों द्वारा पूर्णतय: हस्तनिर्मित है। उन्होंने कहा, ‘सामग्री और शिल्प कौशल के दृष्टिकोण से भारत में कहीं और प्रतीक का इस प्रकार के चित्रण नहीं किया गया है।’

सर्विकल कैंसर : पहली स्वदेशी एचपीवी वैक्सीन को मिली मंजूरी

पुणे । भारत के औषधि महानियंत्रक (डीसीजीआई) ने मंगलवार को सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया (एसआईआई) को ऐंटी सर्विकल कैंसर और देश में विकसित भारत के पहले क्वाड्रिवेलेंट ह्यूमन पैपिलोमावायरस टीके (क्यूएचपीवी) के मैन्युफैक्चरिंग के लिए मार्केटिंग क्लीयरेंस मिल गई है। यह भारत में सर्विकल कैंसर के खिलाफ विकसित पहली स्वदेशी वैक्सीन है जिसे इसी साल के अंत तक लॉन्च किया जा सकता है। गौरतलब है कि सर्विकल कैंसर 15-44 वर्ष आयु वर्ग की महिलाओं में दूसरा सबसे अधिक बार होने वाला कैंसर है।
सीरम इंस्टिट्यूट के सीईओ अदार पूनावाला ने ट्वीट कर इसके बारे में जानकारी दी। उन्होंने लिखा, ‘पहली बार महिलाओं में सर्विकल कैंसर के इलाज के लिए एक भारतीय एचवीपी वैक्सीन होगी जो सस्ती और सुलभ दोनों हैं। हम इस साल के अंत इसे लॉन्च करने के लिए उत्सुक हैं। हम इसे मंजूरी देने के लिए डीसीजीआई को धन्यवाद देते हैं।’
दो तिहाई क्लीनिकल ट्रायल पूरा
डीसीजीआई की मंजूरी इस पर 15 जून को केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) की कोविड-19 पर विषय विशेषज्ञ समिति की सिफारिश के बाद आई है। आधिकारिक सूत्रों ने कहा कि जैव प्रौद्योगिकी विभाग के सहयोग से चरण 2/3 क्लिनिकल ट्रायल पूरा होने के बाद इसकी शीघ्र उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए सीरम इंस्टिट्यूट में निदेशक (सरकारी और नियामक मामलों) प्रकाश कुमार सिंह ने डीसीजीआई को आवेदन कर क्यूएचपीवी के लिए मार्केटिंग क्लीयरेंस की मंजूरी मांगी थी।
हजार गुना अधिक असरदार है वैक्सीन
टीकाकरण पर राष्ट्रीय तकनीकी सलाहकार समूह (एनटीएजीआई) ने भी टीके के क्लिनिकल परीक्षण से संबंधित डेटा की समीक्षा करने के बाद हाल में क्यूएचपीवी को स्वीकृति प्रदान कर दी थी। समझा जाता है कि डीसीजीआई को दिए गए आवेदन में प्रकाश कुमार सिंह ने कहा है कि क्यूएचपीवी टीके सेरवावैक ने मजबूत एंटीबॉडी प्रतिक्रिया का प्रदर्शन किया है जो सभी लक्षित एचपीवी प्रकारों और सभी खुराक और आयु समूहों के आधार पर लगभग 1,000 गुना अधिक प्रभावी है।
आवेदन में, प्रकाश कुमार सिंह ने उल्लेख किया था कि हर साल लाखों महिलाओं को सर्विकल कैंसर के साथ-साथ कुछ अन्य कैंसर का पता चलता है और मृत्यु दर भी बहुत अधिक है। भारत में सर्विकल कैंसर 15 से 44 वर्ष आयु समूह की महिलाओं में दूसरा सर्वाधिक होने वाला कैंसर है।