कोलकाता । हेरिटेज इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी, कोलकाता गर्व से अनाउंस करता है कि उसके पुराने स्टूडेंट सौविक घोष, जो डिपार्टमेंट ऑफ़ एप्लाइड इलेक्ट्रॉनिक्स एंड इंस्ट्रूमेंटेशन इंजीनियरिंग से हैं, ने एक शानदार ग्लोबल माइलस्टोन हासिल किया है। उनके स्टार्टअप, कॉग्निटी, जिसे गुरुग्राम की इनोवेटर्स झिलिका त्रिसाल (शूलिनी यूनिवर्सिटी की पुरानी स्टूडेंट) और रायपुर की फाल्गुनी श्रीवास्तव (शूलिनी यूनिवर्सिटी की पुरानी स्टूडेंट) के साथ मिलकर शुरू किया गया था, ने द बिसेस्टर कलेक्शन द्वारा दिया जाने वाला मशहूर $100,000 का अनलॉक हर फ्यूचर प्राइज़ 2025 जीता है।
40 से ज्यादा देशों में 2,900 से ज़्यादा एप्लीकेशन में से चुने गए, कॉग्निटी को पब्लिक स्पेशल एजुकेशन सिस्टम को मज़बूत करने के मकसद से एआई से चलने वाला प्लेटफॉर्म डेवलप करने के लिए छह इंटरनेशनल विनर्स में से एक चुना गया। यह प्लेटफ़ॉर्म शुरुआती स्क्रीनिंग टूल, लर्निंग सिस्टम, एजुकेटर को-पायलट और पॉलिसी डैशबोर्ड को जोड़ता है—जो भारत के डिसेबिलिटी आइडेंटिफिकेशन और इनक्लूजन फ्रेमवर्क में ज़रूरी कमियों को पूरा करता है। कॉगनीटि शुरू करने से पहले, सौविक ने कई असरदार एआई एप्लिकेशन डेवलप किए, जिनमें महिलाओं की सुरक्षा और दिल की बीमारी का अनुमान लगाने के टूल शामिल हैं, जो टेक्नोलॉजी के ज़रिए समाज की भलाई के लिए लगातार कमिटमेंट दिखाते हैं। तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और केरल में पहले से ही पायलट चल रहे हैं, कॉगनीटि डिसेबिलिटी प्रिवेलेंस ट्रैकिंग, इनक्लूजन आउटकम और बजट के इस्तेमाल को बेहतर बनाने के लिए राज्य सिस्टम के साथ मिलकर काम कर रहा है। $100 के का अवॉर्ड गहरी सरकारी पार्टनरशिप को सपोर्ट करेगा और भारत की पहली नेशनल डिसेबिलिटी डेटा लेयर बनाने में तेज़ी लाएगा।
शौभिक ने कहा, “यह पहचान न सिर्फ़ कॉगनीटि के लिए बल्कि उन लाखों बच्चों के लिए भी एक बहुत बड़ा पल है जो मेनस्ट्रीम सिस्टम में नज़र नहीं आते।” हेरिटेज ग्रुप ऑफ़ इंस्टिट्यूशंस, कोलकाता के सीईओ प्रदीप अग्रवाल ने कहा कि “शौभिक घोष की यह कामयाबी हेरिटेज की असली भावना को दिखाती है — जहाँ इनोवेशन मकसद से मिलता है। ऐसे समय में जब भारत एआई और डिजिटल एजुकेशन में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है, कॉग्निटी की ग्लोबल पहचान दिखाती है कि टेक्नोलॉजी कैसे ज़मीनी स्तर पर लोगों की ज़िंदगी बदल सकती है। हमें सौविक के सफ़र, सोशल इम्पैक्ट के लिए उनके कमिटमेंट और सबको साथ लेकर चलने वाली एजुकेशन के उनके विज़न पर बहुत गर्व है। यह ग्लोबल जीत सिर्फ़ उनके लिए ही एक मील का पत्थर नहीं है, बल्कि हमारे देश के हर युवा इंजीनियर और इनोवेटर के लिए एक प्रेरणा है।” ।
एचआईटीके के पूर्व विद्यार्थी ने जीता एजुकेशन स्टार्टअप अवार्ड
देविका, वह बहादुर बच्ची जिसकी गवाही पर हुई थी कसाब को फांसी
मुंबई में 18 जवानों और 166 निर्दोष लोगों की जान लेने वाले पाकिस्तानी आतंकी अजमल कसाब तो फांसी पर टंग गया, मगर जाते-जाते उसने बांद्रा के गर्वमेंट कॉलोनी में रहने वाली 19 वर्षीय देविका रोटवानी की जिंदगी को बदल कर रख दी। देविका ही वह मुख्य गवाह हैं, जिनकी गवाही को अदालत ने मान्य किया और कसाब को फांसी की सजा सुनाई।2006 में मां को खो चुकी देविका तब मात्र नौ साल की थी, जब उसने कसाब को आंखों के सामने सीएसटी स्टेशन पर खून की होली खेलते हुए देखा था। देविका बताती हैं, ‘आंतकी कसाब ने मेरी जिंदगी बदल कर रख दी है। दुनिया हमें कसाब की बेटी तक कहने लगी, जो मुझे बहुत बुरा लगता है।’देविका बताती हैं, ‘उस शाम मैं अपने पिता नटवरलाल रोटवानी और छोटे भाई जयेश के साथ बड़े भाई भरत से पुणे मिलने जा रही थी। हमलोग सीएसटी के प्लैटफॉर्म 12 पर खड़े होकर ट्रेन का इंतजार कर रहे थे। अचानक लोगों के चीखने, चिल्लाने और भागो-भागो की आवाजें आने लगीं। बीच-बीच में गोलियों की तेज आवाजें और धमाके सुनाई देने लगे। पिता ने मेरा हाथ पकड़ा और भीड़ के साथ भागने की कोशिश करने लगे। मगर अचानक मुझे गोली लगी और मैं वहीं गिर पड़ी।’वह कहती हैं, ‘जब आंखें खुलीं, सामने एक व्यक्ति को हंसते हुए लोगों पर गोलियां चलाते हुए देखा। वह कसाब था, जो अंधाधुंध गोलियां बरसा रहा था। कुछ देर बाद मैं फिर बेहोश हो गई और होश आने पर खुद को पहले कामा और बाद में जेजे अस्पताल में पाया। सौभाग्य से पिता और भाई को गोली नहीं लगी थी। मगर, जेजे अस्पताल में ढाई महीने तक चले इलाज के दौरान मेरे साथ-साथ दूसरे जख्मियों के ड्रेसिंग बदलने के चक्कर में भाई बीमार हो गया। उसके गले में संक्रमण हो गया, जबकि मेरे पैरों की छह बार सर्जरी करानी पड़ी। थोड़ा सामान्य होने पर हमलोग मुंबई से राजस्थान चले गए।’

बकौल देविका, ‘अचानक एक दिन मुंबई पुलिस का फोन आया कि आप कसाब के खिलाफ अदालत में गवाही देंगी? पहले तो उस आतंकी का खौफनाक चेहरा आंखों के सामने आते ही मैं सहम गई, मगर उसकी बर्बरता और खूंखार हंसी से लबरेज गोलीबारी ने हौसला बढ़ा दिया। मैंने गवाही देने के लिए हामी भर दीं। वैसाखी के सहारे में अदालत में पहुंची, जहां मेरे सामने तीन लोगों को पहचान के लिए लाया गया। उनमें से एक कसाब भी था। मैं जज के सामने उसको पहचान गई। दिल तो किया की वैसाखी उठाकर उस पर हमला कर दूं, मगर चाहकर भी कर नहीं पाई।’कसाब पर गवाही देने के बाद देविका का जीवन बदल गया। वह कहती हैं, ‘कसाब की पहचान लिए जाने की बातें जब मीडिया से होते हुए रिश्तेदारों और पड़ोसियों तक पहुंचीं, तो सब का रवैया बदल गया। मेवे के कारोबारी पिता को होलसेलरों ने माल (मेवा) देना बंद कर दिया। स्कूल वालों में मेरा नाम काट दिया। पड़ोसियों ने दूरी बना ली। कर्जा देने को कोई तैयार नहीं था। लोगों को डर था कि कहीं आंतकवादी उनके घरों, दुकानों या रिश्तेदारों पर हमला न कर दें। मेरी हालत गुनहगार जैसी हो गई, मगर पिता और भाई ने मेरा हौसला बढ़ाए रखा, क्योंकि मैं देश के लिए काम कर रही थीं। एक एनजीओ की मदद से सातवीं में दाखिला मिल गया।’मुंबई आतंकवादी हमले की एक चश्मदीद गवाह, देविका रोटवान, को 17 साल बाद आवास मिल गया है. देविका को 2008 के हमले में आतंकवादी अजमल कसाब ने गोली मारी थी. उन्होंने कसाब की अदालत में पहचान की थी जिससे उसे फांसी की सजा हुई थी लेकिन देविका को अपना घर पाने के लिए 17 साल तक कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ी। 2011 में उन्हें शुरुआती तौर पर घर आवंटित किया गया था, लेकिन बाद में यह जानकारी गलत पाई गई। 2020 में उन्होंने सरकार के खिलाफ याचिका दायर की और 2024 में आखिरकार उन्हें अंधेरी वेस्ट, मुंबई में एक घर आवंटित किया गया। यह घर आवंटन उनके लिए एक बड़ी जीत है और वर्षों के संघर्ष का फल है।
एक ही मतदाता के दस -दस पिता, चुनावी गड़बड़ी से परेशान बीएलओ
कोलकाता । पश्चिम बंगाल में चल रहे वोटर लिस्ट के विशेष सघन पुनरीक्षण यानी एसआईआर मुहिम के दौरान एक बेहद चौंकाने वाला विवाद सामने आया है। ब्लॉक लेवल ऑफिसर (बीएलओ) एसोसिएशन ने आरोप लगाया है कि कई लोग वोटर लिस्ट में शामिल होने के लिए ऐसे दस्तावेज़ जमा कर रहे हैं, जिनसे वे अंजान लोगों को अपना पिता या परिवार के सदस्य साबित कर रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि इस प्रक्रिया में एक ही व्यक्ति के नाम को 10–10 लोगों का पिता दिखाया जा रहा है। संगठन का कहना है कि यह सीधा चुनावी हेरफेर का मामला है और इससे भविष्य में वोटर लिस्ट की विश्वसनीयता पर गहरा खतरा पैदा हो सकता है।
इस मामले को लेकर बीएलओ एसोसिएशन ने पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को एक विस्तृत पत्र भेजा है। पत्र में बताया गया है कि खास तौर से बॉर्डर के ज़िलों में यह गड़बड़ी ज़्यादा देखने को मिल रही है। जिन लोगों का 2002 के रिकॉर्ड से कोई संबंध नहीं है, वे किसी ऐसे वरिष्ठ नागरिक के दस्तावेजों का इस्तेमाल कर रहे हैं जो पहले से सूची में मौजूद हैं। सिर्फ समान सरनेम और रिकॉर्ड नंबर के आधार पर खुद को उनका बेटा या रिश्तेदार दिखाकर लिंकिंग करा ली जा रही है। इस तरह एक व्यक्ति के नाम के साथ 10 तक लोगों को उसका बेटा बनाया जा रहा है, जिससे पहचान सत्यापन पूरी तरह संदेह के घेरे में आ गया है। बीएलओ एक्या मंच के महासचिव स्वपन मंडल ने कहा कि संगठन ने इसे लेकर चुनाव आयोग को पत्र लिखकर जानकारी दी है। आयोग ने कहा है कि वह इस मामले को एआई की मदद से जांचेगा। लेकिन मंडल का कहना है कि असली समस्या सिर्फ सिस्टम की नहीं, डराने-धमकाने की भी है। उनके अनुसार कई बीएलओ को काम के दौरान धमकियों का सामना करना पड़ रहा है और इस कारण वे शिकायतें दर्ज करने से भी कतरा रहे हैं। पत्र में यह भी लिखा गया है कि एसआईआर के दौरान बीएलओ लगातार भारी दबाव में काम कर रहे है। बीएलओ ऐप में एडिट ऑप्शन हटाए जाने के कारण सुधार करना मुश्किल हो गया है। सर्वर दिनभर बेहद धीमा चलता है और सिर्फ आधी रात के बाद तेज होता है, जिससे कर्मचारियों पर मानसिक दबाव बढ़ रहा है। इसके अलावा अलग-अलग ईआरओ से अलग निर्देश आने के कारण भ्रम की स्थिति बनी रहती है। डिजिटाइजेशन अपडेट दिखाई नहीं दे रहे, मैपिंग में उम्र नहीं मिलने के कारण समस्या हो रही है। संगठन ने इसके साथ मृत और बीमार बीएलओ के लिए मुआवज़े की मांग भी की है। बीएलओ संगठन ने चुनाव आयोग से अपील की है कि इन सभी समस्याओं पर तुरंत कार्रवाई की जाए, क्योंकि अगर फर्जी लिंकिंग और तकनीकी गड़बड़ियों को नहीं रोका गया तो आने वाले चुनावों की पारदर्शिता पर बड़ा असर पड़ सकता है। संगठन का कहना है कि एसआईआर एक संवेदनशील प्रक्रिया है और इसके दौरान सिस्टम तथा मैदान दोनों स्तर पर ज़्यादा जवाबदेही ज़रूरी है। चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया और निर्देशों का इंतज़ार अब पूरे राज्य के बीएलओ कर रहे हैं।
दुनिया को अलविदा कह गये ही मैन धर्मेंद्र
मुंबई । बॉलीवुड से एक बेहद दुखद और मन को झकझोर देने वाली खबर सामने आई है। हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के दिग्गज अभिनेता और ‘ही-मैन’ के नाम से मशहूर धर्मेंद्र का 89 वर्ष की उम्र में निधन हो गया है। उनकी इस दुनिया से विदाई ने न सिर्फ उनके परिवार, बल्कि पूरे देश और भारतीय सिनेमा को गहरे शोक में डुबो दिया है। बीते कुछ समय से धर्मेंद्र की सेहत लगातार गिर रही थी और वह बढ़ती उम्र से जुड़ी कई समस्याओं से जूझ रहे थे। कुछ दिन पहले उन्हें मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां उनकी हालत बिगड़ने पर परिवार लगातार उनके साथ था। बाद में उन्हें घर ले जाया गया, जहां उनका इलाज चल रहा था। धर्मेंद्र का अंतिम संस्कार पवन हंस श्मशान घाट पर किया गया। उनका पूरा नाम धर्मेंद्र केवल कृष्ण देओल था और उनका जन्म 8 दिसंबर, 1935 को पंजाब के नसरानी गांव में हुआ था। एक छोटे-से गांव से निकलकर भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े सितारों में शामिल होने तक का उनका सफर किसी किंवदंती से कम नहीं रहा। धर्मेंद्र के निधन की खबर फैलते ही फिल्म इंडस्ट्री में मातम छा गया। उनके चाहने वाले, साथी कलाकार और दोस्त इस खबर पर विश्वास नहीं कर पा रहे हैं। सोशल मीडिया पर हजारों पोस्ट उनके नाम से भरे पड़े हैं, फैंस, सेलेब्रिटीज और फिल्मकार उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे हैं। सभी के संदेशों में एक ही बात है, धर्मेंद्र का जाना एक युग का अंत है। उनकी मुस्कुराती तस्वीरें, उनकी भारी-भरकम आवाज, उनका करिश्मा और सादगी, सब अब केवल यादों में रह जाएंगे। कई लोग मानने को तैयार ही नहीं कि बॉलीवुड का ‘ही-मैन’ अब इस दुनिया में नहीं है।धर्मेंद्र का फिल्मी सफर किसी सपने जैसा रहा, एक ऐसा सफर, जिसकी शुरुआत 1960 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘दिल भी तेरा हम भी तेरे’ से हुई थी। एक नौजवान, जो सिर्फ कैमरे से नहीं बल्कि दिलों से बात करने के लिए पैदा हुआ था। अगले ही साल वह ‘बॉय फ्रेंड’ में सपोर्टिंग रोल में नजर आए, और वहीं से उनके अंदर का असली सितारा चमकने लगा। उनकी आंखों की मासूमियत, उनकी मुस्कान की सादगी और उनकी भारी आवाज़ का जादू धीरे-धीरे भारतीय सिनेमा पर पूरी तरह छा गया। कुछ ही सालों में धर्मेंद्र ऐसे मुकाम पर पहुंच गए, जहां पहुंचना सिर्फ एक्टरों के बस की बात नहीं, वह सिर्फ मेहनत, जुनून और ईमानदार लगन का नतीजा होता है। लगभग 65 वर्षों तक धर्मेंद्र ने लगातार बड़े पर्दे पर अपनी मौजूदगी का जादू चलाया। यह वह दौर था जब हर साल उनकी किसी न किसी फिल्म का इंतज़ार होता था, और थिएटरों में भीड़ सिर्फ एक नाम की वजह से उमड़ती थी, धर्मेंद्र। उन्होंने रोमांस भी किया तो दिल जीत लिया, कॉमेडी की तो हर डायलॉग पर हंसी गूंज उठी, और जब एक्शन किया तो लोग सीटियां बजाना नहीं रोक पाए। उनकी बहुमुखी प्रतिभा की मिसाल आज भी दी जाती है। धर्मेंद्र की सुपरहिट फिल्मों की सूची इतनी लंबी है कि उसे गिनते-गिनते वक्त लग जाए, लेकिन कुछ फिल्में ऐसी हैं जो भारतीय सिनेमा की रीढ़ बन चुकी हैं। ‘शोले’ (1975) में वीरू बनकर उन्होंने दोस्ती और मस्ती दोनों को एक नए रूप में पेश किया। ‘चुपके-चुपके’ में प्रोफेसर परिमल त्रिपाठी के किरदार में उनकी कॉमिक टाइमिंग आज भी लोग मिसाल के तौर पर याद करते हैं। ‘सीता और गीता’ (1972), ‘धरमवीर’ (1977), ‘फूल और पत्थर’ (1966), ‘जुगनू’ (1973) और ‘यादों की बारात’ (1973) इन फिल्मों का ज़िक्र किए बिना हिंदी सिनेमा का इतिहास अधूरा है। धर्मेंद्र सिर्फ एक सुपरस्टार नहीं थे, वह दर्शकों की भावनाओं के बेहद करीब थे। उनकी रोमांटिक इमेज ने लड़कियों का दिल जीत लिया, उनकी एक्शन हीरो की छवि ने उन्हें ‘ही-मैन’ बनाया, और उनकी कॉमिक टाइमिंग ने उन्हें हर घर का चेहरा बना दिया। लोग सिर्फ उनकी फिल्में नहीं देखते थे, बल्कि उन्हें अपना मानते थे। स्क्रीन पर धर्मेंद्र का आना मतलब पूरा हॉल तालियों और सीटियों से गूंज उठना और यही स्टारडम की असली परिभाषा है। धर्मेंद्र के चाहने वालों के लिए एक और भावनात्मक पल हाल ही में आया, जब फिल्म ‘इक्कीस’ से उनका नया मोशन पोस्टर जारी किया गया। इस पोस्टर में धर्मेंद्र की आवाज भी सुनाई देती है, जिसने फैंस को भावुक कर दिया है। अगस्त्य नंदा स्टारर यह फिल्म 25 दिसंबर को रिलीज़ होगी और यही धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म मानी जा रही है। उनकी आवाज और उनकी मौजूदगी इस फिल्म के ज़रिए फैंस को एक बार फिर उनसे जोड़ देगी।
दैत्य सुदान मंदिर : लोहे से बनी है भगवान विष्णु की मूर्ति
देशभर में भगवान विष्णु के कई प्रसिद्ध मंदिर हैं, जहां भक्त अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए जाते हैं। भगवान विष्णु के मंदिरों को आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र माना जाता है, लेकिन महाराष्ट्र के लोणार में भगवान विष्णु का ऐसा रहस्यमयी मंदिर है, जहां अनोखे रूप में भगवान विष्णु विराजमान हैं। ये मंदिर अपने रहस्य और वास्तुकला के लिए जाना जाता है। महाराष्ट्र के लोणार में भगवान विष्णु का दैत्य सुदान मंदिर है। इस मंदिर के निर्माण को लेकर कई तरह की कहानियां प्रचलित हैं। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण इसलिए पूरा नहीं हो पाया क्योंकि आक्रमणकारियों ने हमला कर दिया था और मंदिर को ध्वस्त करने की कोशिश की थी, लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि मंदिर की संरचना ही ऐसी है कि मंदिर देखने में किसी रहस्य की तरह ही लगता है। हर मंदिर में गुंबद या गोपुरम होता है, लेकिन इस मंदिर के गर्भगृह में छत ही नहीं है। मंदिर के गर्भगृह पर एक गोल बड़ा छेद है। इस छेद से आने वाली सूरज की रोशनी पूरे मंदिर को रोशन करती है और मंदिर में किसी तरह का अंधेरा नहीं रहता है। कुछ खास मौके पर सूरज की रोशनी सीधा भगवान विष्णु के मुख और चरणों पर पड़ती है। जब भी ऐसा मौका आता है, तब मंदिर सूरज की किरणों से जमगमा उठता है। मंदिर में भगवान विष्णु अनोखे रूप में विराजमान हैं। उन्हें किसी दैत्य के ऊपर खड़ा दिखाया गया है। मूर्ति काफी पुरानी है। हालांकि, देखरेख के आभाव में मंदिर और मूर्ति दोनों की हालत जर्जर हो चुकी है।
खास बात ये भी है कि भगवान विष्णु की मूर्ति लोहे से बनाई गई है, लेकिन देखने पर इस बात का पता नहीं लगाया जा सकता है, जब तक मूर्ति को छुआ न जाए। दैत्य सुदान मंदिर की वास्तुकला भी अनोखी है, जहां दीवारों और खंभों पर महाभारत और रामायण के पात्र देखने को मिलते हैं। इसके अलावा, मंदिर के कुछ हिस्सों में कामसूत्र की प्रतिमाएं भी दिख जाती हैं। यह मंदिर चालुक्य वंश के शासनकाल का है, जिसने छठी से बारहवीं शताब्दी के बीच मध्य और दक्षिण भारत पर शासन किया था। बताया जाता है कि मंदिर की मूल मूर्ति विलुप्त हो गई थी, जिसके बाद नागपुर के भोलसे शासकों ने भगवान विष्णु की मूर्ति का निर्माण कराया था।
सर्दियों में इस तरह करें शिशु की देखभाल
नयी दिल्ली। शीत ऋतु का मौसम मां और शिशु दोनों के लिए सावधानी वाला समय होता है। खासकर मां को अपने शिशु के लिए खास देखभाल की आवश्यकता होती है। शीत ऋतु में सिर्फ गर्म कपड़े पहनाकर ही शिशु का ध्यान नहीं रखा जाता, बल्कि कुछ अन्य आयुर्वेदिक तरीकों से शिशु को पोषण भी दिया जा सकता है। आयुर्वेद में माना गया है कि शीत ऋतु के समय बच्चे के स्वभाव में भी परिवर्तन आता है। शिशु थोड़ा चिड़चिड़ा हो जाता है, त्वचा में बहुत रूखापन आ जाता है, बालों में रूसी हो जाती है और नींद भी प्रभावित होती है। ऐसे में शिशु को स्नेह के साथ-साथ गर्माहट और तेल मालिश की जरूरत होती है। आयुर्वेद में शिशु अभ्यंग को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। इसके लिए एक दिन छोड़कर बादाम (जो कड़वा न हो) के तेल से बच्चे की मालिश करनी चाहिए। पहले सिर, फिर हाथ, उसके बाद पैर, छाती और पीठ की मालिश करनी चाहिए। ये मालिश करने का एक सही तरीका है। ऐसा करने से शिशु के शरीर में रक्त संचार बढ़ता है, हड्डियों को पोषण मिलता है, और शरीर को गर्माहट भी मिलती है। मालिश करने के बाद शिशु को सूती कपड़े में या तौलिये में लपेटें और धूप दिखाना न भूलें। शीत ऋतु में शिशुओं के सिर पर रूखापन जम जाता है जो स्कैल्प से बुरी तरीके से चिपक जाता है। ऐसे में हफ्ते में दो बार शिशु के सिर पर गुनगुने तेल से मालिश जरूर करें और हल्के हाथ से रूसी को हटाने की कोशिश करें। ऐसा करने से शिशु को आराम मिलेगा और उसे अच्छे से नींद भी आएगी। अभ्यंग के तुरंत बाद शिशु को कभी नहीं नहलाना चाहिए।
तकरीबन आधे घंटे बाद शिशु को हमेशा हल्के गुनगुने पानी से सौम्यता के साथ नहलाना चाहिए, जिसके बाद शिशु को पहले सूती कपड़े पहनाएं और फिर बाद में सर्दी के ऊनी कपड़े पहनाएं। शिशु की त्वचा बहुत कोमल होती है। ऊनी या गर्म कपड़े उनकी त्वचा पर खुजली की समस्या कर सकते हैं। शिशु की मानसिक और शारीरिक वृद्धि के लिए नींद बहुत जरूरी है। मालिश और नहाने के बाद शिशु को अच्छी नींद आती है। ऐसे में मालिश के बाद माताएं बच्चों को स्तनपान जरूर कराएं। साथ ही जब शिशु सो जाए तो उसके तलवों पर गुनगुना घी जरूर लगाएं, इससे शिशु के शरीर में गर्माहट बनी रहेगी और तलवे भी कोमल रहेंगे।
बंगाल के 10 जिलों में कहां से आए लाखों वोटर, एसआईआर बताएगा सच
कोलकाता । चुनाव आयोग की ओर से कराए जा रहे वोटर लिस्ट स्पेशल इंटेसिव रिविजन यानी एसआईआर पर राजनीति गरम है। गैर एनडीए शासित राज्यों की सरकारें और राजनीतिक दल खुलकर एसआईआर की आलोचना कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल में एसआईआर पर तलवारें खिंची हैं। बांग्लादेश के बॉर्डर पर भारत से वापस लौटने वाले बांग्लादेशियों की लाइन लगी है। इस बीच पश्चिम बंगाल से एक चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया है। 2002 से 2025 के बीच करीब 23 साल में राज्य में वोटरों की संख्या में 66 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। पश्चिम बंगाल में 10 जिलों में वोटरों का आंकड़ा अप्रत्याशित तौर से बढ़ा है, जिनमें 9 बांग्लादेश बॉर्डर से जुड़े हैं। माना जा रहा है कि एसआईआर के बाद सच सामने आएगा कि अचानक लाखों की तादाद में वोटर कहां से आए। ये घुसपैठिये हैं या उत्पीड़न के शिकार हिंदू शरणार्थी, जिसका दावा टीएमसी कर रही है। चुनाव ने 2002 में स्पेशल इंटेसिव रिविजन (एसआईआर) के जरिये वोटर लिस्ट की जांच की थी। इसके बाद से पूरे देश में वोटरों के नाम जुड़ते चले गए। बीते 23 साल के दौरान पश्चिम बंगाल में रजिस्टर्ड वोटरों की संख्या 4.58 करोड़ से बढ़कर 7.63 करोड़ हो गई है। दो दशक पहले राज्य में 18 जिले थे, अभी 23 जिले हैं। भारतीय निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार, इस दौरान बंगाल के 10 जिलों में वोटरों की संख्या में 70 फीसदी या उससे ज्यादा नए वोटरों के नाम जोड़े गए। इनमें 9 जिले बांग्लादेश के बॉर्डर पर बसे हैं। बीरभूम सिर्फ ऐसा जिला है, जिसकी सीमा बांग्लादेश से नहीं जुड़ती है मगर वहां 73.44 प्रतिशत वोट बढ़े। पश्चिम बंगाल के उत्तर दिनाजपुर में रेकॉर्ड 105.49 प्रतिशत वोटर बढ़े। बांग्लादेश बॉर्डर के पास बसे मालदा में 94.58 प्रतिशत और मुर्शिदाबाद में 87.65 प्रतिशत वोटरों के नाम जोड़े गए। दक्षिण 24 परगना में बढ़े वोटरों का आंकड़ा 83.30 प्रतिशत रहा। जलपाईगुड़ी में 82.3 प्रतिशत, कूचबिहार में 76.52 प्रतिशत और उत्तर 24 परगना में 72.18 प्रतिशत वोटर बढ़ गए। नादिया जिले में 71.46 प्रतिशत और दक्षिण दिनाजपुर में 70.94 प्रतिशत वोटर बढ़े। जब बॉर्डर वाले इलाकों में वोटर लिस्ट लंबी हो रही थी, तब राजधानी कोलकाता में सिर्फ 4.6 प्रतिशत वोटर बढ़े। 2002 में कोलकाता में 23,00,871 मतदाता थे, जो बढ़कर सिर्फ 24,07,145 हो गए।पश्चिम बंगाल के 10 जिलों में लाखों वोटर कैसे बढ़े, इस पर अब राजनीतिक घमासान जारी है। बीजेपी नेता राहुल सिन्हा का आरोप है कि बांग्लादेश से आए मुस्लिम घुसपैठियों ने राजनीतिक संरक्षण हासिल कर वोटर लिस्ट में अपना नाम दर्ज कराया है। घुसपैठियों के कारण बॉर्डर से सटे 7 जिलों की डेमोग्राफी बदल गई है। दूसरी ओर सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस का दावा है कि बांग्लादेश में उत्पीड़न से परेशान होकर हिंदू शरणार्थी भी बॉर्डर क्रॉस कर भारत आए हैं। टीएमसी प्रवक्ता अरूप चक्रवर्ती ने कहा कि बांग्लादेश के हिंदू शरणार्थी उत्पीड़न के कारण चीन नहीं गए, बल्कि असम, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल में बस गए। उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी मुस्लिम को घुसपैठिया बताकर झूठे नैरेटिव गढ़ रही है। उन्होंने कहा कि बांग्लादेशी शरणार्थियों के वोटों के कारण ही बीजेपी को कूचबिहार, अलीपुरद्वार और वनगांव जैसे क्षेत्रों में जीत मिली। टीएमसी और वाम मोर्चा सीमावर्ती जिलों में बढ़ती आबादी के लिए मुस्लिम घुसपैठियों के साथ हिंदू शरणार्थियों और बर्थ रेट को बड़ा कारण मानती है। सीपीएम के नेता एमडी सलीम ने कहा कि वाम मोर्चा शासन के दौरान छोटे कस्बों में विकसित किया गया, इसलिए गांवों के लोग सीधे कोलकाता नहीं आए। उन्होंने बीएसएफ की भूमिका पर भी सवाल उठाया। सलीम ने यह भी कहा कि कुछ हिंदू शरणार्थी भी आए हैं, जिसके कारण बांग्लादेश में हिंदू आबादी कम हुई है।
शहीदी दिवस विशेष : धर्म की रक्षा के लिए प्राण न्योछावर करने वाले गुरू तेग बहादुर
श्री गुरु तेग बहादुर जी का जन्म वैशाख वदि 5, (5 वैसाख), विक्रमी संवत 1678, (1 अप्रैल, 1621) को पवित्र शहर अमृतसर में गुरु के महल नामक घर में हुआ था। उनके चार भाई बाबा गुरदित्ता जी, बाबा सूरज मल जी, बाबा अनी राय जी, बाबा अटल राय जी और एक बहन बीबी वीरो जी थीं। वह श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी और माता नानकी जी के पांचवें और सबसे छोटे पुत्र थे। उनके बचपन का नाम त्याग मल था। पेंदा खान के खिलाफ करतारपुर की लड़ाई के बाद सिखों ने उन्हें तेग बहादुर कहना शुरू कर दिया, जिसमें वह महान तलवार-खिलाड़ी या ग्लैडीएटर साबित हुए। लेकिन वह खुद को ‘तेग बहादुर’ कहलाना पसंद करते थे। बचपन से ही श्री गुरु तेग बहादुर जी घर के अंदर बैठकर अपना अधिकांश समय ध्यान में व्यतीत करते थे। वे अपनी उम्र के अन्य बच्चों के साथ कम ही खेलते थे। घर के समृद्ध धार्मिक वातावरण के कारण उनमें एक विशिष्ट दार्शनिक प्रवृत्ति विकसित हुई। स्वाभाविक रूप से उनमें निःस्वार्थ सेवा और त्याग के जीवन की प्रेरणाएँ विकसित हुईं। श्री गुरु तेग बहादुर जी ने छह वर्ष की आयु से ही नियमित स्कूली शिक्षा प्राप्त की। जहाँ उन्होंने शास्त्रीय, गायन और वाद्य संगीत की भी शिक्षा ली। भाई गुरदास जी ने उन्हें गुरबानी और हिंदू पौराणिक कथाओं की भी शिक्षा दी। स्कूली शिक्षा के अलावा, उन्हें घुड़सवारी, तलवारबाजी, भाला फेंकना और निशानेबाज़ी जैसी सैन्य शिक्षा भी दी गई। उन्होंने अमृतसर और करतारपुर की लड़ाइयों को देखा और उनमें भाग भी लिया। इन सबके बावजूद, समय के साथ उनमें एक असाधारण रहस्यवादी प्रवृत्ति विकसित हुई।
श्री गुरु तेग बहादुर जी का विवाह करतारपुर के श्री लाल चंद और बिशन कौर की पुत्री गुजरी जी (माता) से अल्पायु में 15 आसू, संवत 1689 (14 सितंबर, 1632) को हुआ था। उनके एक पुत्र (गुरु) गोबिंद सिंह (साहिब) का जन्म पोह सुदी सप्तमी संवत 1723 (22 दिसंबर, 1666) को हुआ था। गुजरी (माता) एक धार्मिक महिला भी थीं। उनका व्यवहार अनुशासित और स्वभाव विनम्र था। उनके पिता एक कुलीन और धनी व्यक्ति थे। श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी के देहांत के तुरंत बाद, श्री गुरु तेग बहादुर जी की माता माता नानकी जी उन्हें और उनकी पत्नी (गुजरी) को ब्यास नदी के पास अपने पैतृक गाँव (बाबा) बकाला ले गईं। कुछ इतिहासों में कहा गया है कि भाई मेहरा, जो श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी के एक भक्त सिख थे, ने श्री गुरु तेग बहादुर जी के लिए एक घर का निर्माण करवाया, जहाँ वे पूर्ण शांति से रहे और अगले बीस वर्षों (1644 से 1666 तक) तक सामान्य जीवन व्यतीत किया।
यह पूरी तरह से गलत धारणा है (जैसा कि कुछ इतिहासकार बताते हैं) कि गुरु साहिब ने अपने घर में एक एकांत कक्ष का निर्माण करवाया था जहाँ वे अक्सर ईश्वर का ध्यान करते थे। वास्तव में, यह देखा गया है कि श्री गुरु तेग बहादुर जी के आत्म-शुद्धि और आत्म-प्राप्ति के ध्यान को गलत तरीके से समझा गया है। गुरु नानक की आध्यात्मिक परंपराओं का मानना है कि दिव्य प्रकाश प्राप्त करने के बाद, दुनिया को मुक्ति दिलाने के लिए दूसरों को अंधकार से ऊपर उठाना होता है। जपजी साहिब में, श्री गुरु नानक देव जी कहते हैं: “सक्रिय सेवा के बिना ईश्वर से प्रेम नहीं हो सकता।” श्री गुरु तेग बहादुर जी के मौन ध्यान के लंबे दौर ने उनकी इच्छा को सिद्ध किया। ध्यान के माध्यम से श्री गुरु तेग बहादुर जी ने श्री गुरु नानक देव जी की रचनात्मक दृष्टि की मशाल को संजोया। उन्होंने ईश्वर की इच्छा का पालन करने के नैतिक और आध्यात्मिक साहस के साथ निस्वार्थ सेवा और बलिदान के जीवन की आकांक्षाएं विकसित कीं। जब श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी ने श्री गुरु हर राय जी को गुरुपद प्रदान किया उन्होंने कभी भी अपने पिता (गुरु) की इच्छा का विरोध नहीं किया।
बाबा बकाला में प्रवास के दौरान, श्री गुरु तेग बहादुर जी ने गोइंदवाल, कीरतपुर साहिब, हरिद्वार, प्रयाग, मथुरा, आगरा, काशी (बनारस) और गया जैसे कई पवित्र और ऐतिहासिक स्थानों की यात्रा की। श्री गुरु तेग बहादुर जी के एक समर्पित सिख, भाई जेठा जी, श्री गुरु तेग बहादुर जी को पटना ले गए। यहाँ उन्होंने श्री गुरु हर राय जी (6 अक्टूबर, 1661) के निधन का समाचार सुना और कीरतपुर साहिब लौटने का फैसला किया। वापसी में वे 21 मार्च, 1664 को दिल्ली पहुँचे, जहाँ उन्हें राजा जय सिंह के निवास पर श्री गुरु हरकृष्ण जी के आगमन का पता चला। उन्होंने अपनी माता और अन्य सिखों के साथ श्री गुरु हरकृष्ण जी के दर्शन किए और गुरु साहिब और उनकी माता माता कृष्ण कौर जी के प्रति गहरा दुःख और सहानुभूति व्यक्त करने के बाद, वे बाबा बकाला (पंजाब) के लिए रवाना हुए।
कुछ दिनों बाद, श्री गुरु हरकृष्ण जी ने (अपनी मृत्यु की पूर्व संध्या पर) भविष्यवाणी करते हुए केवल दो शब्द कहे, “बाबा बकाला”, जिसका अर्थ था कि उनका उत्तराधिकारी (बाबा) बकाला में मिलेगा। इस घोषणा के साथ ही, छोटे से गाँव बकाला में लगभग बाईस उत्तराधिकारी और स्वयंभू उत्तराधिकारी उभर आए। इनमें सबसे प्रमुख थे धीर मल, जो ज्येष्ठ पुत्र बाबा गुरदित्ता जी के एकमात्र प्रत्यक्ष वंशज थे और श्री गुरु अर्जन देव जी द्वारा रचित गुरु ग्रंथ साहिब की पहली प्रति उन्हीं के पास थी।
यह स्थिति कुछ महीनों तक भोले-भाले सिख श्रद्धालुओं को उलझन में डालती रही। फिर अगस्त 1664 में, दिल्ली से कुछ प्रमुख सिखों के नेतृत्व में सिख संगत बकाला गाँव पहुँची और श्री गुरु तेग बहादुर जी को नौवें नानक के रूप में स्वीकार किया, लेकिन बाबा बकाला गाँव में माहौल जस का तस बना रहा। श्री गुरु तेग बहादुर जी ने आध्यात्मिक उत्तराधिकार स्वीकार कर लिया, लेकिन ढोंगियों के साथ प्रतिस्पर्धा के दलदल में फँसना उन्हें कभी पसंद नहीं आया। वे उनसे दूर ही रहे। एक दिन एक ऐसी घटना घटी जिसने इस विवाद का पूरा परिदृश्य ही बदल दिया।
टांडा जिला झेलम (अब पाकिस्तान में) से एक धनी व्यापारी और एक धर्मनिष्ठ सिख, मक्खन शाह लुबाना, बकाला गाँव में गुरु साहिब को अपनी श्रद्धा और 500 स्वर्ण मुद्राएँ भेंट करने आए। ऐसा कहा जाता है कि पहले उनका माल से भरा जहाज तूफान में फंस गया था। लेकिन गुरु साहिब से उनकी प्रार्थना के कारण, उनका जहाज बच गया। उन्होंने सुरक्षा के बदले में 500 स्वर्ण मुद्राएँ अर्पित करने का मन बनाया। बकाला गाँव पहुँचने पर उन्हें बहुत सारे ‘गुरुओं’ का सामना करना पड़ा। सभी ने असली ‘गुरु’ होने की होड़ लगाई। उन्होंने सभी को केवल दो सिक्के दिए और उनमें से किसी ने भी चुनौती नहीं दी। ढोंगी केवल दो सिक्के स्वीकार करने में प्रसन्न थे। लेकिन उन्हें निराशा हुई क्योंकि उन्हें कुछ गड़बड़ का आभास हुआ।
एक दिन उन्हें कुछ गाँव वालों से पता चला कि तेग बहादुर जी नाम के एक और गुरु भी हैं। वह गुरु से मिलने गए जो एकांत घर में ध्यान कर रहे थे। जब उन्होंने श्री गुरु तेग बहादुर जी को दो सिक्के भेंट किए, तो गुरु तेग बहादुर जी ने प्रश्न किया कि मक्खन शाह अपना वादा तोड़कर पाँच सौ के बजाय केवल दो सिक्के क्यों दे रहे हैं। यह सुनकर मक्खन शाह खुशी से फूले नहीं समाए। वह तुरंत उसी घर की छत पर चढ़ गए और ज़ोर से चिल्लाए कि उन्हें सच्चे गुरु (गुरु लाधो रे…गुरु लाधो रे…) मिल गए हैं। यह सुनकर बड़ी संख्या में सिख श्रद्धालु वहाँ इकट्ठा हुए और सच्चे गुरु को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की। इस घटना से धीर मल बहुत क्रोधित हुआ और उसने किराए के गुंडों के साथ श्री गुरु तेग बहादुर जी पर हमला कर दिया। एक गोली गुरु साहिब को लगी और जब सिखों को इस हमले के बारे में पता चला, तो उन्होंने जवाबी कार्रवाई की और धीर मल के पास पड़े (गुरु) ग्रंथ साहिब को अपने कब्जे में ले लिया। लेकिन गुरु साहिब ने उसे क्षमा करते हुए उसे धीर मल को लौटा दिया।
श्री गुरु तेग बहादुर जी अपने पूरे परिवार के साथ हरमंदिर साहिब में मत्था टेकने के लिए अमृतसर (लगभग नवंबर, 1664) पहुंचे, लेकिन पवित्र स्थान के मंत्रियों ने उनके लिए दरवाजे बंद कर दिए और उन्हें प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी। श्री गुरु तेग बहादुर जी ने उन पर दबाव नहीं डाला या जबरदस्ती प्रवेश नहीं किया, बल्कि शांति से लौट आए और वल्लाह, खंडूर साहिब, गोइंदवाल साहिब, तरनतारन साहिब, खेमकरण होते हुए कीरतपुर साहिब पहुंचे। कीरतपुर पहुंचने से पहले, उन्होंने तलवंडी साबो के, बांगर और धंधौर का भी दौरा किया। यह ध्यान देने योग्य है कि जहां भी गुरु साहिब गए, वहां उन्होंने नए मंजी (सिख धर्म के प्रचार केंद्र) स्थापित किए। मई 1665 में गुरु तेग बहादुर साहिब कीरतपुर साहिब पहुंचे। जून 1665 में श्री गुरु तेग बहादुर जी ने सतलुज नदी के तट पर माखोवाल गाँव के पास बिलासपुर के राजा से कुछ ज़मीन खरीदी
नए बसाए गए शहर में कुछ समय रुकने के बाद, श्री गुरु तेग बहादुर जी नए प्रचार केंद्र स्थापित करके और पुराने का नवीनीकरण करके सिख राष्ट्र को मजबूत करने के लिए पूर्व की ओर एक लंबी यात्रा पर निकल पड़े। यह उनकी दूसरी मिशनरी यात्रा थी। उन्होंने अगस्त 1665 में अपने करीबी परिवार के सदस्यों के अलावा भाई मती दास जी, भाई सती दास जी, भाई संगतिया जी, भाई दयाल दास जी और भाई जेठा जी जैसे कई कट्टर सिखों के साथ आनंदपुर साहिब छोड़ दिया। यह पीड़ित मानवता के लिए एक लंबी यात्रा की तरह था। इस मिशन ने मुगलों के रूढ़िवादी शासन को झकझोर दिया, क्योंकि बड़ी भीड़ सभाओं में शामिल होने लगी और गुरु का आशीर्वाद लेने लगी। जब दिसंबर 1665 में श्री गुरु तेग बहादुर जी बांगर क्षेत्र के धमधन में आ रहे थे, तो एक मुगल प्रवर्तन अधिकारी आलम खान रोहेल्ला ने उन्हें भाई सती दास जी, भाई मोती दास जी, भाई दयाल दास जी और कुछ अन्य सिख अनुयायियों के साथ दिल्ली से शाही आदेश के तहत गिरफ्तार कर लिया। इन सभी को बादशाह औरंगज़ेब के दरबार में पेश किया गया, जिसने उन्हें राजा जय सिंह मिर्ज़ा के पुत्र कंवर राम सिंह कछवाहा को सौंपने का आदेश दिया। राजा जय सिंह का पूरा परिवार गुरु साहिब का कट्टर अनुयायी था, इसलिए उन्होंने उन्हें कैदी जैसा नहीं, बल्कि अत्यंत सम्मान दिया और शाही दरबार से रिहाई का आदेश भी प्राप्त किया। लगभग दो महीने बाद गुरु साहिब रिहा हो गए। अपने मिशन को आगे बढ़ाते हुए, गुरु साहिब मथुरा और फिर आगरा पहुँचे और यहाँ से इटावा, कानपुर और फतेहपुर होते हुए इलाहाबाद पहुँचे। उन्होंने बनारस और सासाराम का भी दौरा किया और फिर मई 1666 में पटना पहुँचे।
अक्टूबर 1666 में श्री गुरु तेग बहादुर जी मोंगैर, कालीकट (अब कोलकाता), साहिबगंज और कांत नगर होते हुए ढाका की ओर आगे बढ़े। लेकिन इन स्थानों के लिए प्रस्थान करने से पहले, उन्होंने माता पैड़ी नामक एक धर्मपरायण सिख महिला की देखरेख में, वर्षा ऋतु में अपने परिवार के सदस्यों के पटना में सुरक्षित प्रवास के लिए आवश्यक व्यवस्थाएँ कीं। उस समय माता गुजरी जी गर्भवती थीं। गुरु साहिब जहाँ भी रुके, वहाँ प्रतिदिन सत्संग और कीर्तन (गुरु ग्रंथ साहिब की आयतों का पाठ) आयोजित किए गए और धार्मिक प्रवचन दिए गए। भाई मती दास जी, भाई सती दास जी, भाई दयाल दास जी और बाबा गुरदित्ता जी जैसे कई प्रमुख सिखों ने इन यात्राओं के दौरान धार्मिक बैठकों में गुरु साहिब का साथ दिया।
ढाका में गुरु साहिब ने अलमस्त जी और नाथा साहिब जैसे उत्साही अनुयायियों की सहायता से एक विशाल हज़ूरी संगत की स्थापना की। गुरुद्वारा संगत टोला अब उस स्थान का प्रतीक है जहाँ गुरु साहिब श्रोताओं को पवित्र उपदेश देते थे। यहीं पर गुरु साहिब ने अपने पुत्र (गुरु गोबिंद सिंह साहिब) के जन्म का समाचार सुना, जिनका जन्म पोह सुदी सप्तमी (23 पोह) विक्रमी संवत 1723 (22 दिसंबर, 1666) को पटना में हुआ था। ढाका से, गुरु साहिब जटिया हिल्स और सिलहट की ओर बढ़े जहाँ उन्होंने सिख संगत के लिए एक उपदेश केंद्र की स्थापना की और अगरतला होते हुए चटगाँव पहुँचे।
गुरु साहिब 1668 में ढाका लौट आए। इस समय स्वर्गीय राजा जय सिंह के पुत्र राजा राम सिंह, जो असम के अपने अभियान की व्यवस्था करने के लिए पहले से ही ढाका में मौजूद थे, ने गुरु साहिब से मुलाकात की और आशीर्वाद लिया। (कुछ इतिहास बताते हैं कि राजा राम सिंह ने गया में गुरु साहिब से मुलाकात की)। चूंकि गुरु साहिब पहले से ही सुदूर पूर्व के स्थानों का दौरा कर रहे थे, राजा राम सिंह ने गुरु साहिब से अभियान के दौरान उनके साथ चलने का अनुरोध किया। गुरु साहिब ने ऐसा ही किया। इस दौरे के दौरान गुरु साहिब ने असम के धुबरी में ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर ध्यान किया, जहाँ श्री दमदमा साहिब के नाम से एक गुरुद्वारा है। इससे पहले गुरु नानक साहिब ने भी इस स्थान को पवित्र किया था। ऐसा कहा जाता है कि गुरु तेग बहादुर साहिब की कृपा से कामरूप के शासक और राजा राम सिंह के बीच खूनी संघर्ष के बजाय एक शांतिपूर्ण समझौता हुआ
मुस्लिम आस्तिक राज्य ने भारत में हिंदुओं पर आतंक का राज स्थापित कर दिया था। हिंदुओं पर अत्याचार उसके शासनकाल की सबसे क्रूरतम घटना थी। औरंगज़ेब ने किसी भी तरह भारत से हिंदू धर्म को मिटाने का मन बना लिया था, और उसने हिंदू व्यापारियों के लिए विशेष कर, गैर-मुसलमानों के लिए धार्मिक कर (ज़ज़िया) जैसी कई इस्लामी कट्टरपंथी योजनाएँ लागू कीं। दिवाली और होली मनाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। उसने कई महत्वपूर्ण और पवित्र हिंदू मंदिरों को ध्वस्त कर दिया और उनकी जगह मस्जिदें बनवाईं। इतिहास में कुछ सिख गुरुद्वारों को भी ध्वस्त करने की बात कही गई है।
श्री गुरु तेग बहादुर जी को औरंगज़ेब के इन काले कारनामों के बारे में पता चला और वे पंजाब की ओर चल पड़े। रास्ते में, जून 1670 में गुरु साहिब को उनके कई प्रमुख सिखों के साथ आगरा में गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें दिल्ली के एक शाही दरबार में पेश किया गया, लेकिन जल्द ही रिहा कर दिया गया। गुरु साहिब फरवरी 1671 में आनंदपुर साहिब लौट आए। उन्होंने वहाँ लगभग दो साल शांतिपूर्वक सिख धर्म का प्रचार किया। यहाँ उन्होंने आम जनता के दुखों और पीड़ाओं में अपनी गहरी आस्था व्यक्त की।
1672 में, गुरु साहिब पंजाब के मालवा क्षेत्र की ओर एक और धार्मिक यात्रा पर निकले। सामाजिक और आर्थिक रूप से यह क्षेत्र पिछड़ा और लगभग उपेक्षित था, लेकिन यहाँ के लोग मेहनती और गरीब थे। वे ताज़ा पेयजल, दूध और साधारण भोजन जैसी बुनियादी सुविधाओं से भी वंचित थे। गुरु साहिब ने लगभग डेढ़ साल तक इस क्षेत्र का भ्रमण किया।
उन्होंने गाँव वालों की अनेक प्रकार से सहायता की। गुरु साहिब और सिख संगत ने बंजर भूमि पर वृक्षारोपण में उनकी सहायता की। उन्हें डेयरी फार्मिंग शुरू करने की भी सलाह दी और इस संबंध में कई पशु भी गरीब और भूमिहीन किसानों में निःशुल्क वितरित किए गए। पानी की कमी से निपटने के लिए गुरु साहिब के आदेश पर कार-सेवा करके कई सामुदायिक कुएँ खोदे गए। इस प्रकार गुरु साहिब ने स्वयं को आम जनता के साथ जोड़ लिया। इस समय सखी सरवर (एक मुस्लिम संगठन) के कई अनुयायी सिख धर्म में शामिल हो गए। दूसरी ओर, गुरु साहिब ने इन स्थानों पर सिख धर्म के कई नए प्रचार केंद्र स्थापित किए। गुरु साहिब के मुख्य और महत्वपूर्ण पड़ाव पटियाला (दुखनिवारन साहिब), समाओं, भीकी, टाहला साहिब और भटिंडा में तलवंडी, गोबिंदपुरा, मकरोड़ा, बांगर और धमधान थे। गुरु साहिब ने लगभग डेढ़ वर्ष तक इन क्षेत्रों का दौरा किया और 1675 में आनंदपुर साहिब लौट आए।
इन प्रचार यात्राओं और सामाजिक कार्यों ने मुस्लिम कट्टरपंथियों को नाराज़ कर दिया और उच्च वर्ग में भय का माहौल पैदा कर दिया। दूसरी ओर, मुगल साम्राज्य के गुप्तचरों ने गुरु तेग बहादुर साहिब की धार्मिक गतिविधियों के बारे में अतिरंजित और व्यक्तिपरक रिपोर्टें भेजीं।
जैसा कि पहले बताया जा चुका है कि मुस्लिम आस्तिक राज्य ने भारत को दार-उल-इस्लाम बनाने के लिए बलपूर्वक धर्मांतरण करवाया और इस लक्ष्य को शीघ्रातिशीघ्र प्राप्त करने के लिए काशी, प्रयाग, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार और कश्मीर के हिंदू पंडितों और ब्राह्मणों (प्रचारक वर्ग) को इस उद्देश्य के लिए चिन्हित किया गया। उन पर हर प्रकार के अत्याचार किए गए। उन्हें या तो इस्लाम अपनाने या मृत्यु के लिए तैयार रहने की चेतावनी दी गई। खेद की बात है कि यह सब कुछ उन अनेक तथाकथित वीर हिंदू और राजपूत राजाओं और सरदारों की नाक के नीचे हुआ, जो दिल्ली के शाही राज्य के अधीन थे। वे केवल मूक दर्शक बनकर अपने स्वार्थ में लगे रहे। उन्होंने औरंगजेब के कुकृत्यों के विरुद्ध विरोध का एक छोटा सा स्वर भी नहीं उठाया। भारत में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण की लहर चल पड़ी और शाही वायसराय शेर अफगान खान ने सबसे पहले कश्मीर में यह प्रयास किया। हजारों कश्मीरी पंडितों का कत्लेआम किया गया और उनकी संपत्ति लूट ली गई।
इस मोड़ पर, ब्राह्मणों ने विशेष रूप से पंडित किरपा राम दत्त के नेतृत्व में कश्मीरी पंडितों ने मई 1675 में आनंदपुर साहिब में श्री गुरु तेग बहादुर जी से संपर्क किया। उन्होंने गुरु साहिब को अपनी दुःख भरी कहानियां सुनाईं और अपने सम्मान और विश्वास की रक्षा करने का अनुरोध किया। गुरु साहिब ने उनके विचारों को सुना और शांतिपूर्ण तरीकों से जबरन धर्मांतरण के नापाक कृत्य का विरोध करने के लिए सहमत हुए। प्रमुख सिखों और कश्मीरी पंडितों के साथ लंबी चर्चा के बाद, गुरु साहिब ने “धार्मिकता” के लिए और “धर्म” (धर्म) की स्वतंत्रता के लिए खुद को बलिदान करने का मन बना लिया। गुरु साहिब की सलाह पर, कश्मीरी पंडितों ने सम्राट को एक याचिका प्रस्तुत की और इसके बदले में दिल्ली की एक शाही अदालत ने श्री गुरु तेग बहादुर जी को उक्त अदालत में पेश होने के लिए सम्मन जारी किया। लेकिन दूसरी ओर, शाही बुलावा आनंदपुर साहिब पहुंचने से पहले ही, गुरु साहिब ने अपने पुत्र (गुरु) गोबिंद साहिब को जुलाई 1675 में दसवें नानक के रूप में स्थापित करने के बाद दिल्ली की ओर अपनी यात्रा शुरू कर दी। भाई दयाल दास जी, भाई मोती दास जी, भाई सती दास जी और कई अन्य समर्पित सिखों ने गुरु साहिब का अनुसरण किया। जब श्री गुरु तेग बहादुर जी रोपड़ के पास मलिकपुर रघरान गाँव के पास पहुँचे, तो मिर्ज़ा नूर मोहम्मद खान के नेतृत्व में एक शाही सशस्त्र टुकड़ी ने गुरु साहिब और उनके कुछ प्रमुख अनुयायियों को गिरफ्तार कर लिया। उसने उन्हें बस्सी पठानन की जेल में रखा और रोजाना यातनाएँ दीं। अब गुरु साहिब की बारी थी जो शांत और स्थिर रहे। अधिकारियों ने तीन विकल्प दिए: (1) चमत्कार दिखाना, या (2) इस्लाम धर्म अपनाना, या (3) खुद को मौत के लिए तैयार करना। गुरु साहिब ने अंतिम विकल्प स्वीकार कर लिया। इतिहासकार इस तिथि को 11 नवंबर, 1675 ई. बताते हैं। (चांदनी चौक स्थित गुरुद्वारा सीस गंज वह स्थान है जहाँ गुरु तेग बहादुर जी को फाँसी दी गई थी।) इस क्रूर कृत्य के बाद भयंकर तूफान आया। इससे शहर और उसके आसपास अफरा-तफरी मच गई। इन परिस्थितियों में भाई जैता जी ने गुरु साहिब का पवित्र शीश उठाया, उसे एक टोकरी में रखा, उसे सावधानीपूर्वक ढका और आनंदपुर साहिब से निकल पड़े। वे 15 नवंबर को आनंदपुर साहिब के निकट कीरतपुर साहिब पहुँचे। युवा गुरु गोबिंद राय ने उनका बड़े सम्मान के साथ स्वागत किया और उन्हें “रंगरेटा गुरु का बेटा” कहकर सम्मानित किया। अगले दिन पूरे सम्मान और उचित रीति-रिवाजों के साथ शीश का दाह संस्कार किया गया। (गुरुद्वारा सीस गंज वह स्थान भी है जहाँ शीश का दाह संस्कार किया गया था।) इसी स्थिति का लाभ उठाकर श्री गुरु तेग बहादुर जी के शरीर के दूसरे भाग को एक बहादुर सिख लखी शाह लुबाना, जो एक प्रसिद्ध व्यापारी और ठेकेदार थे, उठा ले गए और उन्होंने तुरंत अपने घर के अंदर एक चिता बनाई और शाम को उसमें आग लगा दी। इस प्रकार पूरा घर और अन्य कीमती सामान जलकर नष्ट हो गए। कहा जाता है कि शाही पुलिस का एक गार्ड शव की तलाश में घटनास्थल पर पहुँचा, लेकिन जब लौटा, तो घर जल रहा था और घरवाले फूट-फूट कर रो रहे थे। (अब नई दिल्ली स्थित गुरुद्वारा रकाबगंज उस जगह का नाम है।)
गुरु साहिब की शहादत के दूरगामी परिणाम हुए और इसने भारत के इतिहास को गहराई से प्रभावित किया। इसने समकालीन राज्य के मूल आस्तिक स्वरूप को उजागर किया, अत्याचार और अन्याय को उजागर किया। इसने भारत के लोगों को औरंगज़ेब और उसकी सरकार से पहले से कहीं अधिक घृणा करने पर मजबूर कर दिया और सिख राष्ट्र को उग्र राष्ट्र में बदल दिया। इसने उन्हें यह एहसास दिलाया कि वे अपने धर्म की रक्षा केवल शस्त्रों से ही कर सकते हैं। इसने खालसा पंथ के निर्माण के अंतिम चरण का मार्ग प्रशस्त किया, जिसने भारत के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण और महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
गुरु साहिब एक महान कवि और विचारक भी थे। उदाहरण के लिए, हम उनके एक श्लोक को उद्धृत कर सकते हैं, जिसमें उन्होंने कहा है: भई काहू कौ देत नैह नैह भाई मानत अन्न, काहू नानक सुनु रे मन गाई ताहि बखान। (गुरु गोविंद सिंह जी 1427) (नानक जी कहते हैं, जो किसी से नहीं डरता, न ही किसी से डरता है, वही सच्चा ज्ञानी है)। गुरु साहिब ने 57 श्लोकों के अलावा पंद्रह रागों में गुरबाणी लिखी, जिसे दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी ने गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल किया। श्री गुरु तेग बहादुर जी ‘हिंद दी चादर’ ने धर्म, सत्य और मानवता की भलाई के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया।
( साभार -दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति)
गीता दत्त: मिठास ऐसी कि लता मंगेशकर भी बन गई थीं प्रशंसक
संगीत की दुनिया में अगर स्वर्ण अक्षरों में किसी का नाम लिखा जाएगा, तो वह स्वर कोकिला लता मंगेशकर का नाम होगा, लेकिन क्या आप जानते हैं कि लता मंगेशकर भी एक महिला गायिका की आवाज की दीवानी थीं। हम बात कर रहे हैं बंगाली और हिंदी सिनेमा में अपनी आवाज से दिलों पर जादू कर देने वाली प्लेबैक सिंगर गीता दत्त की। गीता दत्त की आवाज और लहजे की दीवानी लता मंगेशकर भी हुआ करती थीं। 23 नवंबर को गीता दत्त की जयंती है। उनका जन्म 23 नवंबर 1930 में पूर्वी बंगाल के फरीदपुर जिले में हुआ था। उन्हें बचपन से ही गाने का शौक था। गाने की विरासत गीता को अपने परिवार से ही मिली थी। उनकी मां कविताएं लिखती थीं और उनके पिता मुकुल रॉय संगीतकार थे। दोनों के गुण गीता के अंदर थे और उनकी आवाज में ऐसा जादू था कि एक बार सुनने पर उनकी आवाज को भूल पाना मुमकिन था। गीता दत्त ने पहली बार गायन कला का प्रदर्शन साल 1946 में आई फिल्म ‘भक्त प्रह्लाद’ में किया था। हालांकि गाने में उन्होंने सिर्फ दो लाइनें ही गाई थीं, लेकिन फिर भी उनकी आवाज को खूब प्रशंसा मिली। इसके बाद उन्होंने फिल्म ‘दो भाई’ के गानों में आवाज दी और देखते ही देखते उन्होंने अलग-अलग फिल्मों में अपने जादुई आवाज से कई हिट गाने दिए। उनके ‘पिया ऐसो जिया में समाय गयो रे’, ‘जाने कहां मेरा जिगर गया जी’, ‘चिन चिन चू’, ‘मुझे जान न कहो मेरी जान’, ‘ऐ दिल मुझे बता दे’, ‘वक्त ने किया क्या हसीं सितम’, और ‘बाबू जी धीरे चलना’ सबसे ज्यादा पॉपुलर हुए थे।
गीता ने अपने करियर में तकरीबन 1500 गाने गाए। यतींद्र मिश्र लिखित किताब ‘लता सुर गाथा’ में लता मंगेशकर और गीता दत्त के बीच के एक किस्से को बताया गया है। दोनों ने मिलकर फिल्म ‘शहनाई’ के गाने ‘जवानी की रेल चली जाय रे’ में अपनी आवाज दी थी और उसी समय दोनों सिंगर्स की पहली मुलाकात भी हुई थी।
लता जी ने जब पहली बार गीता दत्त की आवाज सुनी थी, तो वे उनकी फैन हो गई थीं। किताब में जिक्र है कि गीता आमतौर पर बंगाली भाषा बोलती थी और हिंदी का प्रयोग कम करती थीं, लेकिन जैसे ही वे माइक पर गाने के लिए आती थीं, तो उच्चारण बिल्कुल साफ हो जाता था और लहजा बिल्कुल बदल जाता था। उनके इस रूप को देखकर लता मंगेशकर भी हैरान थीं।
भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज में स्नातक सम्मान समारोह
कोलकाता । भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज ने शुक्रवार, 14 नवंबर 2025 को धनो धान्य ऑडिटोरियम, अलीपुर में 2025 के विद्यार्थियों के लिए स्नातक सम्मान समारोह की मेजबानी की। यह दिन उत्कृष्टता, गौरव और नई शुरुआत का उत्सव गर्व की भावना से भरा था।कहा गया है कि शिक्षा बाल्टी भरना नहीं है, बल्कि आग जलाना है – और आज, वे लपटें पहले से कहीं अधिक तेज हो गईं क्योंकि लगभग 1,100 छात्रों को उनके शैक्षणिक सर्वश्रेष्ठ उपलब्धियों के लिए सम्मानित किया गया। यह समारोह कार्यक्रम विद्यार्थियों की प्रतिभा, सिद्धि, पूर्णता, संपादन, साधन, निपुणता, दक्षता, और अलंकरण से परिपूर्ण रहा।
स्नातक समारोह के दिन की शुरुआत स्नातकों द्वारा पंजीकरण पूरा करने और अपने औपचारिक गाउन और ऑक्सफोर्ड टोपी पहनने के लिए पहुंचने से हुई। अपराह्न 3:00 बजे तक, सभागार छात्रों, अभिभावकों, संकाय सदस्यों, प्रशासनिक निकाय के सदस्यों और विशिष्ट अतिथियों के साथ इस महत्वपूर्ण क्षण का गवाह बनने के लिए उत्सुकता से भरा हुआ था।
धन धान्य ऑडिटोरियम में समारोह की शुरुआत कॉलेज के प्रतिष्ठित गणमान्य व्यक्तियों के गरिमामय आगमन के साथ हुई, जिसका नेतृत्व मुख्य अतिथि, श्री अश्नीर ग्रोवर, उद्यमी और भारत पेन्स के पूर्व प्रबंध निदेशक और विशिष्ट अतिथि, डॉ. जे.के. दास ने किया पीजी अध्ययन के डीन, यूजी काउंसिल के अध्यक्ष और कलकत्ता विश्वविद्यालय के वाणिज्य एवं वित्त अधिकारी के लिए बीओएस। जैसे ही कालजयी गीत “माइंड विदाउट फियर” हॉल में गूंजा, दर्शकों का सम्मान और प्रशंसनीय उद्गार बढ़ गए ।
कॉलेज की सांस्कृतिक शास्त्रीय टीम द्वारा मंत्रमुग्ध कर देने वाले उद्घाटन शास्त्रीय नृत्य प्रदर्शन द्वारा शाम का वातावरण मनोरम और भव्यता से परिपूर्ण हो गया । औपचारिक दीप प्रज्ज्वलन से कार्यक्रम का आधिकारिक शुभारंभ हुआ जो ज्ञानोदय, ज्ञान और नई शुरुआत का प्रतीक है। अध्यक्ष रजनीकांत दानी और उपाध्यक्ष मिराज डी शाह द्वारा शक्ति, अनुग्रह और ज्ञान का प्रतिनिधित्व करने वाली मां दुर्गा की हस्तनिर्मित सोल मूर्ति सहित गणमान्य व्यक्तियों को स्मृति चिन्ह से सम्मानित किया गया, जिसके बाद अध्यक्ष ने स्नातक होने वाले बैच को हार्दिक और प्रेरणादायक शपथ दिलाई , और उनसे अपने अल्मा मेटर की विरासत का सम्मान करने का आग्रह किया ।फिर मुख्य अतिथि ने प्रत्येक विभाग के शीर्ष रैंक धारकों को सम्मानित किया और एक प्रभावशाली, स्पष्ट भाषण दिया जो उद्यमशीलता अंतर्दृष्टि, हास्य और प्रेरणा से भरपूर रहा। इसके पश्चात छात्रों के साथ एक आकर्षक प्रश्नोत्तरी हुई।
कार्यक्रम में रजनीकांत दानी, प्रो डॉ जे के दास, रेनुका भट्ट, अमिता यू पटेल, जीतू शाह, भरत अजमेरा, डॉ संदीप कुमार दान, उमेश ठक्कर, प्रो डॉ सीतानाथ मजमूदार, प्रो दिलीप शाह की उपस्थिति ने सभी विद्यार्थियों को प्रोत्साहित किया।
मुख्य सम्मान समारोह निर्बाध रूप से समन्वित, बहु-स्टेशन प्रारूप में आयोजित किया गया, जिससे स्नातकों को दस के समकालिक समूहों में अपने प्रमाणपत्र प्राप्त करने की अनुमति मिली। पहले चरण का संचालन प्रबंधन के सदस्यों द्वारा किया गया, उसके बाद प्रशासनिक प्रमुखों द्वारा और अंत में वरिष्ठ संकाय सदस्यों द्वारा किया गया।प्रो डॉ शुभव्रत गंगोपाध्याय, डॉ समीर कांति दत्ता, डॉ पिंकी साहा सरदार, प्रो देबजानी गांगुली, प्रो सॉस्पो चक्रवर्ती, डॉ त्रिदिब सेनगुप्ता, प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी,प्रो अनन्या बनर्जी, प्रो सायन राय, प्रो विवेक पटवारी विभागीय प्रमुख अध्यक्ष शिक्षक और शिक्षिकाओं ने विद्यार्थियों को डिग्री प्रदान कर प्रोत्साहित किया । डॉ वसुंधरा मिश्र ने बताया कि कॉलेज की छात्राओं राजनंदिनी और वेधी द्वारा संचालित शानदार ढंग से आयोजित इस समारोह में आयोजक टीम की सावधानीपूर्वक योजना, टीम वर्क और सटीकता प्रतिबिंबित हुई। कॉलेज द्वारा सर्वश्रेष्ठ अंक प्राप्त स्नातक विद्यार्थियों के माता-पिता को आमंत्रित किया गया था जो कि उनके बच्चों के लिए और उनके लिए गौरव की बात और हृदयस्पर्शी आकर्षण रहा ।माता-पिता और अभिभावकों की उपस्थिति ने अपनी भावनाओं से सभागार को आनंद से भर दिया । जब वे अपने बच्चों को मंच पर चलते हुए देख रहे थे तो उनका गर्व, मुस्कुराहट और आंखों में खुशी के आंसुओं ने प्यार और संतुष्टि का माहौल बना दिया। कई माता-पिता ने इसे “जीवन में एक बार मिलने वाला क्षण” और “वर्षों की कड़ी मेहनत और बलिदान का प्रतिफल” बताया।पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज रहा था जो कॉलेज के शिक्षकों और शिक्षिकाओं और मैनेजमेंट के अथक परिश्रम का सुफल लगा। समारोह का समापन एक भावनात्मक और प्रतीकात्मक क्षण के साथ हुआ क्योंकि रेक्टर और छात्र मामलों के डीन, प्रो दिलीप शाह ने ऑक्सफ़ोर्ड टोपियाँ उछालने के प्रतिष्ठित कार्यक्रम का नेतृत्व किया जिसमें उपलब्धि, खुशी और भविष्य के लिए आशा के साझा संकेत में 2025 केे स्नातक विद्यार्थियों को एकजुट किया। गर्व, उत्सव और यादगार यादों का दिन – इस समारोह में भवानीपुर की भावना और इसके स्नातक वर्ग के सपनों को खूबसूरती से दर्शाया गया।




