Saturday, March 14, 2026
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बिहार चुनाव में शराबबंदी, प्रशांत किशोर और मीडिया

बिहार चुनाव हाल ही में बीता है और नीतीश सरकार ने प्रचंड बहुमत के साथ वापसी की है। गौर करने वाली बात यह है पिछले कुछ सालों से महिलाएं खुलकर मतदान करती आ रही हैं। पुरुषों के लिए चुनाव सत्ता बदलने का माध्यम हो सकता है मगर महिलाओं के लिए हर चुनाव उनके अस्तित्व की लड़ाई होता है। बिहार में भी चुनाव ऐसा ही था। सच तो यह है कि बिहार में एनडीए की जीत से महिलाओं में खुशी थी मगर निराशा पुरुषों में ज्यादा रही। पता है, इसका प्रमुख कारण क्या था, वह यह कि विपक्ष ने वापसी के लिए शराबबंदी और गुंडागर्दी को हथियार बनाया। लोग लालू प्रसाद यादव के जंगलराज को नहीं भूले महिलाएं अपने साथ होने वाले अत्याचारों को। ऐसा नहीं है कि नीतीश राज में अपराध घटने की कोई शत-प्रतिशत गारंटी है मगर पहले से कम होने की, महिलाओं के स्वालंबन की गारंटी जरूर है। विपक्ष ने चुनाव जीतने के लिए महिलाओं की जिंदगी को दांव पर लगा दिया और हैरत की बात यह है कि ऐसा करने में वह पार्टी आगे रही जो बिहार में बदलाव की बड़ी -बड़ी बातें करती नजर आई। मेरी समझ के बाहर था कि बिहार में बदलाव लाने का यह कौन सा रास्ता था जो प्रशांत किशोर जैसे व्यक्ति ने शराब की नैया का सहारा लिया। सीधी सी बात है, उनको वोट से मतलब है।
हर एक पार्टी को वोट से मतलब है और सबको पता है कि बिहार में शराबबंदी से महिलाओं का जीना आसान हुआ है मगर पुरुष समाज अभी भी पितृसत्तात्मक सोच के दबाव में अपना वही रुआब वापस लाने की ख्वाहिश पाले बैठा है जहां औरतें उसके लिए पैर की जूती रहीं। शराब उसकी अंधी सत्ता और अहंकार के प्रदर्शन का माध्यम है जिसके नशे में वह अपने घर का सब कुछ लुटा सकता है, औरतों पर अपनी मर्दानगी दिखा सकता था मगर किसी तेजस्वी या प्रशांत किशोर को इन बातों से क्या मतलब है? उनको तो चुनाव जीतना है, 28 हजार करोड़ के राजस्व के घाटे की बात बताकर…मैं पूछना चाहती हूँ..प्रशांत किशोर से…आप इतने पढ़े – लिखे हैं, आपके सम्पर्क इतने अच्छे हैं, आप अर्थशास्त्रियों के सम्पर्क हैं तो आपको शराबबंदी की बैसाखी क्यों चाहिए थी? तेजस्वी तो मान लिया कि नौवीं फेल हैं मगर आप तो शिक्षित थे, आपको चुनाव चिह्न भी स्कूल बैग मिला था। आप क्या कक्षाओं में बच्चों को शराब पीने की ट्रेनिंग देने को तैयार हैं। आप एलिट क्लास से हैं, आपका बच्चा आपके सामने शराब पीयेगा तो आप इसे आधुनिकता मानकर स्वीकार कर लेंगे मगर उन मध्यमवर्गीय परिवारों का क्या, जिनकी जिंदगी शराबखोरी ने तबाह की है। नीतीश ने भी माना था कि शराबबंदी से राज्य सरकार को हर साल 5,000-6,000 करोड़ रुपए के राजस्व का नुकसान होता है। शराबबंदी की घोषणा के समय स्वयं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा था कि यह नीति मैं महिलाओं के आग्रह पर ला रहा हूं। मैं जानता हूं कि इससे हमें राजस्व की हानि होगी, लेकिन यह समाज की बेहतरी के लिए है। इस बयान ने नीतीश कुमार को महिला समर्थक नेता के रूप में स्थापित किया। शराबबंदी ने इस बार भी महिला मतदाताओं के बीच एनडीए को अद्भुत समर्थन दिलाया।महिलाओं ने 10 हजार रुपए के बजाय शराबबंदी के नाम पर वोट दिया है। यही एनडीए और नीतीश कुमार की जीत का बड़ा कारण बना है। चुनाव आयोग ने पार्टी को ‘स्कूल बैग’ के चिह्न पर राज्य की सभी 243 सीटों पर ताल लड़ी और हार गयी और इसका कारण प्रशांत किशोर की बेशर्म स्वार्थपरता है जो सत्ता के लिए किसी भी हद तक नीचे गिर सकती है। आप खुद को शिक्षित कहते हैं तो पहले एक बार शिक्षा शब्द का अर्थ किताबों में जाकर देखिए। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार बिहार में दोनों चरणों में कुल मतदान 66.91 फीसदी रहा था। मतदान के दोनों ही चरणों में पुरुषों के मुकाबले में महिलाओं ने ज्यादा वोटिंग की। आंकड़ों के मुताबिक महिलाओं का मतदान प्रतिशत 71.6 फीसदी रहा था। वर्ष 2015 में जब नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव का महागठबंधन जीता था, तब महिलाओं (60.48 प्रतिशत) ने पहली बार पुरुषों (53.32 प्रतिशत) को मतदान में पीछे छोड़ दिया था। इस परिवर्तन का सीधा असर चुनाव परिणाम पर पड़ा था। हालांकि, उस समय तक शराबबंदी लागू नहीं हुई थी, लेकिन महिलाओं को उम्मीद थी कि अगर नीतीश कुमार सत्ता में लौटे तो वह शराब पर रोक लगाएंगे। नीतीश कुमार ने इसी महिला समर्थन को साइलेंट रिवोल्यूशन कहा था और यही भावनात्मक जुड़ाव वर्ष 2016 में शराबबंदी लागू होने की पृष्ठभूमि बना। वर्ष 2020 के चुनाव में भी महिलाओं का मतदान प्रतिशत 59.58 और पुरुषों का 54.68 रहा था। महिला मतदाताओं की एकजुटता ने एनडीए और नीतीश कुमार को चुनौतीपूर्ण संघर्ष में जीत दिलाई थी। इस बार भी महिला वोटर एनडीए के लिए सत्ता की धुरी बनी हैं। जहां महिलाओं का वोट प्रतिशत 71.6 रहा, वहीं 62.8 प्रतिशत पुरुषों ने ही वोट डाला। यह अब तक का सबसे बड़ा अंतर है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि महिलाओं ने न केवल मतदान किया, बल्कि अपनी राजनीतिक चेतना को नए स्तर पर पहुंचाया है। नवोदित नेता प्रशांत किशोर ने तो शराबबंदी को खत्म करने का ऐलान तक कर दिया था। राजद और कांग्रेस ने शराबबंदी को नीतीश कुमार की सबसे बड़ी नीतिगत विफलता बताया था। हालांकि, नीतीश कुमार इसे अपनी नैतिक उपलब्धि मानते हैं। उनका स्पष्ट तौर पर कहना है कि शराबबंदी से घरेलू हिंसा घटी, महिलाओं की स्थिति सुधरी और पारिवारिक माहौल बेहतर हुआ। सवाल यह नहीं कि शराबबंदी नीति का उद्देश्य क्या था? बल्कि यह है कि उसका परिणाम क्या हुआ? बिहार में हुए हालिया सर्वे के अनुसार 95–99 प्रतिशत महिलाएं शराबबंदी का समर्थन करती हैं। उनका मानना है कि इस कानून ने घर की शांति लौटाई है। पति की आमदनी अब बच्चों की पढ़ाई में लगती है। सड़क पर महिलाओं की सुरक्षा बेहतर हुई है। प्रशांत किशोर इस हद तक नीचे गिर चुके हैं कि उन्होंने बिहार की स्वाभिमानी महिलाओं को लालची तक कह दिया। महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े मामलों पर मौनी बाबा बने रहे जबकि हकीकत यह है कि बिहार की महिलाओं के खाते में जब 10 हजार जाते हैं, तो उनको रोजगार का साधन भी मिलता है। बिहार की महिलाएं स्वावलंबी बन रही हैं। यह वह प्रशांत किशोर हैं जो आर जी कर पर मौन रहते हैं, संदेशखाली पर मौन रहते हैं, जब बंगाल में ममता दीदी लक्खी भंडार योजना चलाती हैं तो उनको बंगाल की महिलाएं लालची नहीं, मासूम लगती हैं। सत्य यह है कि बंगाल में लक्खी भंडार ने महिलाओं की सृजन शक्ति छीन ली है और युवाओं को काहिल बना दिया है, इतना स्वार्थी बना दिया है कि वे दूसरी महिलाओं का दर्द न देख पा रही हैं और न समझ पा रही हैं। तुष्टीकरण की राजनीति को देखकर भी सबके मुंह में दही जमा है।
यह वही प्रशांत किशोर हैं जो ममता बनर्जी की सरकार बनवाने का दावा करते हैं और इनकी ही नीतियों के कारण आज बंगाल जल रहा है। चुनावी हिंसा में न जाने कितनों के घर छूटे मगर इनके मुंह से बोल नहीं फूटे। आप शायद वही हैं जिनको खुद नीतीश कुमार ने ही जदयू का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया, तब भी चाहते थे तो बिहार के लिए बहुत कुछ कर सकते थे मगर इन्होंने नहीं किया। यह वही प्रशांत किशोर हैं जिनके एक नहीं बल्कि दो मतदाता पहचान पत्र हैं और यह धांधली की बात करते हैं और अब तो इन्होंने अपने दर्शन करवाने के लिए एक हजार रुपये की डिमांड रख दी है। पिछले दस वर्षों में राज्य की राजनीति में महिलाओं ने न केवल मतदान का स्वरूप बदला है, बल्कि उन्होंने एक ऐसा मतदाता वर्ग तैयार किया है, जो अब चुनावी परिणामों को निर्णायक रूप से प्रभावित करता है।
दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा अल्कोहल बाज़ार है। साल 2024 के आकंड़ों के मुताबिक, भारत का अल्कोहल का बाजार 4.4 लाख करोड़ रुपए को पार कर गया है, जो दुनिया के 90 से ज्यादा देशों की जीडीपी से ज्यादा है। भारत में हर साल लगभग 6 अरब लीटर की खपत होती है। जो साल दर साल बढ़ रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, साल 2019 में प्रति व्यक्ति (15+आयु) शुद्ध एल्कोहल की खपत 5.5 लीटर थी। अब बात शराब के कारण होने वाले नुकसान की बात की जाए। डाउन टू अर्थ की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि शराब का सेवन हर साल 26 लाख से ज्यादा लोगों की मौत का कारण बन रहा है। यह दुनिया भर में हो रही कुल मौतों का 4.7 फीसदी है। मतलब कि हर 20 में से एक मौत के लिए शराब जिम्मेवार है। वहीं नशीली दवाओं और ड्रग्स से होने वाली मौतों को भी इसमें जोड़ दें तो यह आंकड़ा बढ़कर 30 लाख से ज्यादा है। मरने वालों में पुरुषों का आंकड़ा कहीं ज्यादा रहा। आंकड़ों के मुताबिक जहां 20 लाख पुरुषों की मौत के लिए शराब जिम्मेवार रही, वहीं नशीली दवाएं सालाना चार लाख पुरुषों को जिंदगियां लील रही हैं। जनसत्ता में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 16 करोड़ या इससे अधिक लोग शराब पीते हैं। इनमें 95 प्रतिशत 18 से 49 वर्ष की आयु के हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक सालाना दो लाख सड़क दुर्घटनाएं होती हैं और इनमें से 75 प्रतिशत दुर्घटनाओं का कारण शराब पीकर गाड़ी चलाना है। बीते कुछ समय से शराब पीकर गाड़ी चलाने और लोगों को कुचल देने के अनेक मामले आए जिनमें कई अपराधी नाबालिग थे।
बात शराबबंदी की हो रही है तो बात मीडिया और उन सभी संस्थानों की भी करने का मन है जहां शराबखोरी को प्रश्रय दिया जाता है। पत्रकार होने के नाते इस मामले में आउटडेटेड हूँ क्योंकि जहां शराबखोरी हो और बोतलें हों, जाम पर जाम छलकाए जा रहे हों..वहां पल भर भी रुकना गवारा नहीं है। कोई भी शहर हो…ये वहां के प्रेस क्लब हैं और कॉकटेल पार्टियां हैं जो युवा पत्रकारों को शराबी बना रही हैं। बुजुर्ग पत्रकार शराब के इतने आदी हो चुके हैं कि जिसकी बुराइयां वह लिखते हैं, जिस शराबखोरी पर स्टोरी करके ईनाम जीतते हैं, उसी शराब के बगैर उनको लगता है कि वह लिख नहीं सकते। एक समय था जब हमारे बड़े सही रास्ता दिखाते थे मगर आज के बड़े दोस्ती के नाम पर अपने बच्चों की उम्र के युवाओं के साथ बेशर्मी से जाम छलकाते हैं। हमारे कई युवा साथी पत्रकार असमय काल के ग्रास हो गये क्योंकि अत्यधिक मदिरापान से उनके लीवर सड़ गये, मल्टी ऑर्गन फैल्योर हो गया। आप तो चले जाते हैं मगर एक मिनट के लिए भी उन लोगों के बारे में नहीं सोचते जो आप पर निर्भर हैं। प्रेस क्लब और संस्थाओं का क्या है, वह तो एक तस्वीर पर माला चढ़ाकर अपनी ड्यूटी से फारिग हो जाते हैं। सोशल मीडिया पर एक बड़ा सा पोस्ट लिखा और बात खत्म और तब तक एक युवा मौत की राह पर निकल पड़ा है। प्रेस क्लब की आलमारियों में शराब की बोतलों की जगह किताबें देखने का इंतजार जारी रहेगा। जारी रहेगा इंतजार जहां युवाओं को राष्ट्र निर्माण से जुड़े प्रशिक्षण मिलें। काश कि ऐसे लोग कभी अपनी सत्ता के मद से बाहर निकलकर उस मासूम की गुहार सुन सकें जिसने शराबखोरी के कारण अपने पिता या माता को खोया है…तब तक हम आउटडेटेड ही भले।

गीता जयंती पर विशेष : सहज कर्म-पथ का आह्वान है भगवद्गीता

गिरीश्वर मिश्र

कालजयी श्रीमद्भगवद्गीता उस महाभारत का अंश है जिसे भारतीय चिंतन की परम्परा में इतिहास में परिगणित किया गया है। यह महान रचना इस अर्थ में विशिष्ट है कि इसके रचयिता महर्षि वेदव्यास स्वयं उन घटनाओं के साक्षी और भागीदार भी थे जिनका वर्णन उन्होंने अपनी रचना में किया था। आगे चल कर भारत की सभी मुख्य भाषाओं में यह अमर गाथा निरंतर गाई जाती रही और भारतीय सर्जनात्मक प्रतिभा द्वारा महाभारत से सामग्री को लेकर प्रचुर संख्या में उपन्यास, नाटक और काव्य रचे जाते रहे हैं। इसने संगीत और नृत्य को भी निरंतर प्रभावित किया है।

वस्तुत: यह केवल एक सर्वसमावेशी औपचारिक शास्त्र ही नहीं रहा बल्कि लोक-जीवन में भी गहरे रच बस गया। महाभारत की महागाथा में धर्म की अवधारणा ही प्रमुख है। गीता का आरम्भ भी धर्म शब्द के साथ होता है। धर्म का तत्व देश, काल और पात्र के सापेक्ष होता है और गतिशील जीवन-पद्धति को इंगित करता है। स्वधर्म की बात आगे समझायी गई है। ईश्वर का अवतार धर्म को पहचानने और स्थापित करने के लिए होता है। धर्म को रीति और नीति से भिन्न समझना होगा। अपने से दुर्बल की सहायता करना ही परम धर्म है। इस दृष्टि से सामाजिक संदर्भ के सापेक्ष ही धर्म की समझ भी आकार लेती है। ऋग्वेद, उपनिषद और धर्मशास्त्र आदि सब का संज्ञान लेते हुए महाभारत रचा गया।

भगवद्गीता महाभारत का हृदय सरीखा है। भगवद्गीता महाभारत के भीष्म पर्व में है पर उसके पहले वन पर्व में व्याध-गीता का भी एक आख्यान आता है। आश्चर्य यह कि दोनों हिंसा की पृथभूमि में हैं, एक कसाई के घर में तो दूसरी युद्ध-भूमि में। भौतिक (प्रकृति) और मानसिक चैतन्य (पुरुष) का भेद दोनों में ही दिखता है। प्रकृति का सत्य विविधताओं से भरा हुआ है। मनुष्य की कल्पनाशीलता उसे चर-अचर अन्य सभी जीवों या पदार्थों से अलग करती है। वह अमरता की कल्पना कर सकता है। इसी क्रम में अर्थ की तलाश करते हुए चैतन्य या देही की अवधारणा प्रस्तुत हुई। मनुष्य से यह अपेक्षा है कि वह पाशविक वृत्ति से ऊपर उठ कर ऊर्ध्वमुखी हो। यही जीवन में व्याप्त हीनता और क्षुधा को दूर करने वाला है।

गीता की विचारधारा सदियों से देश-विदेश में मानवीय चिंतन को प्रभावित करती आ रही है। अब तक विश्व की विभिन्न भाषाओं में गीता के तीन हज़ार से अधिक अनुवाद हो चुके हैं। गीता की व्याख्या के लिए अनेक महत्वपूर्ण भाष्य शंकराचर्य, रामानुजाचार्य, माध्वाचार्य, अभिनव गुप्तपादाचार्य, संत ध्यानेश्वर, तथा स्वामी रामसुख दास आदि अनेकानेक आचार्यों और संतों ने ही नहीं लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, संत बिनोबा भावे आदि अनेक राष्ट्रप्रेमी नेताओं ने भी रचे हैं। गीता की संगीतात्मकता, उसकी लयबद्धता और विचार की विशालता ने उसके अनुवाद और पुनराख्यान के लिए प्रेरित किया। कहा गया कि गीता को अच्छी तरह गाना और गुनगुनाना चाहिए– गीता सुगीता कर्तव्या। सारे शास्त्रों को विस्तार में पढ़ने की जगह गीता को हृदयंगम करना ही पर्याप्त है। पर गीता को पढ़ें तो लगता है कि वहाँ सीधी रेखा में बात आगे नहीं बढ़ती है। कुछ विचार गीता में कई अध्यायों में इतस्तत: बिखरे मिलते हैं, कुछ बार-बार अनेक स्थलों पर दुहराये गए हैं, कुछ ऐसे भी हैं जो अन्यत्र वेद तथा उपनिषद आदि में विद्यमान हैं। यदि इसमें एक ही शब्द के अनेक अर्थ मिलते हैं तो एक ही अर्थ के लिए कई भिन्न शब्द भी प्रयुक्त मिलते हैं। आत्मा, देही, तथा शरीर आदि शब्दों का प्रयोग इसी तरह का है।

कृष्ण जीवन के अनेकानेक संदर्भों में आज भी प्रासंगिक बनी हुई है। संरचना की दृष्टि से यह भी विलक्षण है कि कृष्ण के विचार सीधे हम तक नहीं पहुचते। धृतराष्ट्र ने पूछा और संजय ने सुना कर बताया। अधिकारहीन पर अद्भुत दृष्टिसंपन्न संजय वक्ता हैं जो युद्ध को देख कर दृष्टिहीन परन्तु अधिकारसंपन्न धृतराष्ट्र को वर्णन सुनाते हैं और उन्होंने जो देख कर सुनाया वह हम सुनते पढ़ते हैं। कृष्ण स्रोत हैं पर संजय सूचना या संदेश के प्रस्तोता हैं। शायद धृतराष्ट्र और अर्जुन दोनों श्रीकृष्ण के वचनों को सुनते हैं पर अपने अपने ढंग से और कदाचित भिन्न भिन्न रूपों में। अर्जुन श्रीकृष्ण से प्रश्न पूछते हैं। धृतराष्ट्र चुप रहते हैं। वे डरे सहमे हुए हैं, शायद मन ही मन कृष्ण के वचनों को सुन कर गुनते-आंकते हैं।

गीता में उपस्थित विमर्श में श्रीकृष्ण विश्लेषण (सांख्य) और संश्लेषण (योग) दोनों पद्धतियों का उपयोग करते हैं। उन्होंने व्यावहारिक कर्म-योग, भावनात्मक भक्ति-योग और बौद्धिक ज्ञान-योग का प्रतिपादन किया है। गीता के पाँचवे अध्याय में श्रीकृष्ण शरीर को नौ द्वारों वाली एक पुरी बताते हैं। गीता द्वारा मानस का विस्तार और यथार्थ का बोध संभव होता है। कर्म का सिद्धांत यह बताता है कि आप वर्तमान परिस्थिति को तो नहीं नियंत्रित कर सकते किंतु उस परिस्थिति के प्रति प्रतिक्रिया कैसे करें यह जरूर चुन सकते हैं। गीता का कर्मवाद यह भी स्पष्ट करता है कि मनुष्य अपनी परिस्थितियों का स्वयं निर्माता भी है। इसका संदेश यही है कि आप स्वयं अपने जीवन के लिए उत्तरदायी हैं। हमारे बस में मात्र यही है कि हम परिस्थिति के प्रति किस तरह प्रतिक्रिया करते हैं। पर हम समाज के अंग हैं और सबसे अलग-थलग भी नहीं हैं। हम दूसरों के कर्म से भी प्रभावित होते हैं। इसलिए कई बार बीज कुछ होता है और फल उससे भिन्न कुछ अन्य प्रकार का।

इसीलिए गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म पर ध्यान देने को कहते हैं न कि फल पर। कर्म का परिणाम जो भी हो पाँच चीज़ों पर निर्भर करता है– शरीर, मन, उपकरण, विधि तथा दैव (भाग्य)। मूर्ख ही ख़ुद को अकेले कारण मानता है। यदि हम ख़ुद को कर्मों के परिणामों से नहीं बाँधते तो कर्म भी हमको नहीं बाँधते। सुख, शक्ति और स्वर्ग की कामना से किया गया कर्म जब किया जाता है तो आँख फल पर टिकी होती है न कि कर्म पर। कर्म, विकर्म और अकर्म के बीच के अंतर को समझना कठिन है। बुद्धिमान लोग कर्म फल से बिना जुड़े निर्लिप्त हो कर काम करते हैं। कर्तृत्व के अभिमान से मुक्त होने और फ़लेच्छा का त्याग करने पर कर्म अकर्म हो जाता है। कर्म करते हुए निर्लिप्त रहना और निर्लिप्त हो कर कर्म करना कर्मयोगी श्रेष्ठ बनाता है। सक्रिय होना कर्म है पर जब कर्म-परिणाम को बिना नियंत्रित करने की चेष्टा के कर्म करना कर्म-योग है। बिना किसी प्रत्याशा के कर्म के विचार को देख कर यह प्रश्न उठता है कि उस स्थिति में कर्म के लिए क्या प्रेरणा का तत्व होगा। वृक्ष और पशु अपने लिए खाद्य और सुरक्षा पाने के लिए सक्रिय होते हैं। एक मनुष्य ही है जो दूसरों के खाद्य और सुरक्षा के लिए कर्म कर सकता है। इसी दृष्टि को अपनाना धर्म है।

हमारा शरीर मरणधर्मा है और सुरक्षा चाहता है। वह सीमाएं भी बनाता है। किंतु इस शरीर में अमर आत्मा का वास है जिसे किसी किस्म की सुरक्षा या बन्धन की दरकार नहीं है। मरणधर्मा हाड़ मांस से लिपट कर यह आत्मा जीवन और मृत्यु का स्वाद बार-बार लेता है। अमरता और पुनर्जन्म के विचार के साथ श्री कृष्ण मानवीय जीवन के विमर्श का पूरा नक़्शा ही बदल देते हैं: शरीर का अंत अंत नहीं होता और न शरीर का आरम्भ आरम्भ होता है। क्षण-क्षण बदलती दुनिया जिस पर अधिकार जमाना संभव नहीं उसे बदले और अस्थायी चीजों में हम अवलोकन करते हैं, खोज करते हैं और गद्गद होते हैं। वस्तुत: हम एक महा आख्यान के हिस्से होते हैं, अतीत की कथा वर्तमान को और वर्तमान भविष्य को रचती चलती रहती है। उन कथाओं को तो हम नहीं जानते पर उनमें भूमिका जरूर अदा करते हैं। जो कथा हम अनुभव करते हैं या याद करते हैं वह कोई अकेली कथा नहीं होती। हमारी जिंदगी दूसरी कथाओं में हमारी भूमिकाओं पर निर्भर करतो है।

रोचक बात यह है कि कथा या भूमिका याद न भी हो तो भी हम उसके परिणामों से नहीं बच सकते। पुनर्जन्म यह भी बताता चलता है कि यह विश्व हमारे पहले भी था और हमारे बाद भी रहेगा। गीता व्यक्ति के मानसिक-आध्यात्मिक उन्नयन पर बल देती है। अस्तित्व का अर्थ और मूल्य ही गीता का प्रतिपाद्य है। कर्म मार्ग का प्रवर्तन ही उसका प्रमुख उद्देश्य है। कर्म की गति गहन होती है। कर्म से मुक्ति संभव नहीं है। कर्म की गुणवत्ता उसे करने में नहीं बल्कि उसके पीछे निहित इच्छा के त्याग में है। त्याग इच्छाओं का अभाव है। गीता इच्छाओं से आसक्ति दूर करना चाहती है न कि कर्म से। लोक-संग्रह के लिए जीवन का ढर्रा बदलना होगा। बंधुत्व का भाव आवश्यक है। अपने स्वभाव के अनुसार कर्म में निरत हो कर मनुष्य को सिद्धि प्राप्त होती है।

(लेखक, महात्मा गांधी अंतररराष्ट्रीय हिंदी विवि, वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)

(साभार – हिन्दुस्तान समाचार)

बंगाल समेत 12 राज्यों में बढ़ी एसआईआर की समय सीमा

– 11 तारीख तक चलेगी प्रक्रिया, पहला ड्राफ्ट 16 दिसम्बर को
-सूची के अंतिम प्रकाशन 14 फरवरी को
कोलकाता। चुनाव आयोग ने 12 भारतीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की तारीख बढ़ा दी। इसे लेकर चुनाव आयोग ने रविवार को नोटिफिकेशन जारी किया है। भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) ने एसआईआर की समय सीमा सात दिन बढ़ा दी है। अब यह प्रक्रिया 11 दिसंबर तक चलेगी। पहले के शेड्यूल के मुताबिक, वोटरों के एन्यूमरेशन फॉर्म जमा करने और उन्हें डिजिटाइज करने का काम 4 दिसंबर को तय किया गया था। पोलिंग स्टेशनों को ठीक करने या फिर से व्यवस्थित करने की तारीख भी 11 दिसंबर तय की गई है। पहले के शेड्यूल के मुताबिक, ड्राफ्ट इलेक्टोरल रोल के पब्लिकेशन की आखिरी तारीख 9 दिसंबर थी, जिसे अब बढ़ाकर 16 दिसंबर कर दिया गया है।
नए शेड्यूल के मुताबिक, दावे और आपत्तियां दर्ज करने का समय 16 दिसंबर, 2025 से 15 जनवरी, 2026 के बीच तय किया गया है। नोटिस फेज की तारीखें, जिसमें एन्यूमरेशन फॉर्म जारी करना, सुनवाई, वेरिफिकेशन और उन पर फैसला और इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ईआरओ) द्वारा दावों और आपत्तियों का निपटारा एक साथ किया जाना शामिल है, 16 दिसंबर, 2025 से 7 फरवरी, 2026 के बीच तय की गई हैं।
चेकिंग की नई तारीख वोटर रोल के हेल्थ पैरामीटर्स की जांच और फाइनल पब्लिकेशन के लिए ईसीआई की अनुमति लेने की आखिरी तारीख 10 फरवरी, 2026 है । मतदाता सूची के अंतिम प्रकाशन की नई तारीख 14 फरवरी है, जो पहले 7 फरवरी तय की गई थी।
शुरू से ही, विपक्षी पार्टियां चुनाव आयोग पर जल्दबाजी में एसआईआर कराने का आरोप लगा रही हैं। इस मुद्दे पर तृणमूल कांग्रेस भी चुनाव आयोग के खिलाफ है। इस मामले पर राजनीतिक पार्टियों की तरफ से अभी बयान आना बाकी है। हालांकि, पश्चिम बंगाल टीएमी के एक सदस्य ने नाम न बताने की सख्त शर्त पर कहा कि सात दिन का एक्सटेंशन सिर्फ दिखावा है। उन्होंने कहा, “इस मामले में कोई भी ऑफिशियल बयान या तो मुख्यमंत्री ममता बनर्जी या हमारी पार्टी के जनरल सेक्रेटरी अभिषेक बनर्जी देंगे।”

 

श्री शिक्षायतन कॉलेज में मनाया गया विश्व एड्स दिवस

कोलकाता । श्री शिक्षायतन कॉलेज की राष्ट्रीय सेवा योजना (एन. एस. एस.) समिति और रेड रिबन क्लब ने पश्चिम बंगाल राज्य एड्स रोकथाम और नियंत्रण सोसायटी, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग, पश्चिम बंगाल के संयुक्त तत्वावधान में राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम के तहत सघन अभियान का आयोजन एच.आई.वी / एड्स से मुक्त दुनिया बनाने के लिए गत शनिवार 29 नवंबर को किया गया। कॉलेज की प्राचार्या डॉ. तानिया चक्रवर्ती ने स्वागत भाषण में एच. आई. वी./ एड्स की रोकथाम और जागरूकता फैलाने की बात पर जोर दिया और संस्थाओं द्वारा इस क्षेत्र में अनुदान की राशि बढ़ाने की ओर भी संकेत किया जिससे कि इस तरह के अभियान को तेज और सक्रिय करने में सहायता प्राप्त हो ।

एम. आर. बांगुर ,जिला अस्पताल की काउन्सिलर अरुंधति दत्ता, जिन्हें पश्चिम बंगाल स्टेट एड्स प्रिवेंशन एंड कंट्रोल सोसाइटी के तहत नेशनल एड्स कंट्रोल प्रोग्राम के तहत पब्लिक हेल्थ प्रोजेक्ट्स का अनुभव है, ने एच. आई. वी./ एड्स से होने वाले मानसिक तनाव को कम करने    के बारे में जागरूकता फैलाने और ज़्यादा असरदार तरीके से भेदभाव को दूर करने के लिए इन गतिविधियों में युवाओं को शामिल करने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। अतिथियों और उपस्थित दर्शकों का स्वागत कॉलेज की छात्राओं द्वारा समूह नृत्य प्रस्तुत कर किया गया। कॉलेज की छात्रा ऋषिता, इशिका और शिवांगी ने क्रमशः बंगला, हिन्दी और अंग्रेजी में अपने वक्तव्य से एड्स के प्रति दर्शकों को जागरूक करने का प्रयास किया। एड्स की रोकथाम पर छात्राओं द्वारा नाट्य और गीत की प्रस्तुति के अलावा फ्लैश मॉब द्वारा भी जागरूकता फैलाने का सफल प्रयास किया गया। कार्यक्रम को सफल बनाने में कॉलेज के सचिव प्रदीप कुमार शर्मा के सहयोग एवं एन. एस. एस. समिति की कार्यक्रम अधिकारी डॉ. बर्नाली लाहा, समिति के अन्य सदस्यों एवं छात्राओं का योगदान रहा।

बंगाल में ‘वक्फ कानून लागू, संपत्तियों का विवरण अपलोड शुरू

-केंद्र के ‘उमिद’ पोर्टल पर 6 दिसम्बर तक भरना होगा
कोलकाता । पश्चिम बंगाल के अल्पसंख्यक मामलों और मदरसा शिक्षा विभाग ने सभी जिलाधिकारियों को वक्फ संपत्तियों का विवरण केंद्र के ‘उमिद’ पोर्टल पर अपलोड करने की प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया है। विभाग के सूत्रों के अनुसार, यह केंद्र सरकार द्वारा तय की गई समयबद्ध अनुपालन प्रक्रिया है। सूत्रों ने बताया कि केंद्र ने राज्यों से कहा है कि वे सभी “विवादरहित” वक्फ संपत्तियों की जानकारी को छह दिसम्बर तक पोर्टल पर डाल दें। इसी वजह से राज्य प्रशासन ने तुरंत डेटा एंट्री का काम शुरू कर दिया है। सूचना के मुताबिक जिलाधिकारियों को भेजे गए पत्र में चार मुख्य निर्देश दिए गए हैं। सबसे पहले उन्हें इमामों, मुअज्ज़िनों और मदरसा शिक्षकों के साथ बैठक कर अपलोडिंग प्रक्रिया समझाने को कहा गया है। इसके अलावा जिलाधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि सिर्फ वही संपत्तियां पोर्टल पर दर्ज होंगी जिन पर कोई विवाद नहीं है। राज्य सरकार का कहना है कि सभी जिलों को इसके लिए सुविधा केंद्र बनाने को कहा गया है ताकि प्रक्रिया आसानी से और समय पर पूरी हो सके।

गोवा में भगवान राम की 77 फीट ऊंची प्रतिमा का अनावरण

पणजी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गोवा में भगवान राम की 77 फीट ऊंची कांस्य प्रतिमा का अनावरण किया। गुजरात में ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ डिजाइन करने वाले मूर्तिकार राम सुतार ने भगवान राम की इस प्रतिमा को बनाया है। गोवा के लोक निर्माण मंत्री दिगंबर कामत ने बताया कि यह दुनिया की सबसे ऊंची भगवान राम की प्रतिमा है। यह आयोजन श्री संस्थान गोकर्ण जीवोत्थम मठ के 550वें वर्ष के उत्सव के अंतर्गत हुआ। मोदी ने दक्षिण गोवा के पर्तगाली स्थित मठ में स्थित मंदिर का भी दौरा किया। यह मठ भारत के सबसे पुराने मठ संस्थानों में से एक है और अपने आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक योगदानों के लिए जाना जाता है। सरस्वत समुदाय में इसका महत्वपूर्ण स्थान है। गोवा के राज्यपाल अशोक गजपति राजू और मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत भी समारोह में उपस्थित थे।

बंगाल सरकार ने किया 14 आईपीएस अधिकारियों का तबादला

– कई जिलों में बड़े पैमाने पर बदलाव
कोलकाता। पश्चिम बंगाल सरकार ने गुरुवार को पुलिस प्रशासन में बड़े पैमाने पर फेरबदल करते हुए कुल 14 आईपीएस अधिकारियों का तबादला कर दिया। गृह विभाग द्वारा जारी अधिसूचना के मुताबिक, यह बदलाव तत्काल प्रभाव से लागू होंगे और अधिकारी नई जगहों पर अपना कार्यभार संभालेंगे। निर्देश के अनुसार, अरिजीत सिन्हा को एसपी झारग्राम से हटाकर मिदनापुर रेंज के डीआईजी के पद पर नियुक्त किया गया है। वैभव तिवारी को एसपी बांकुड़ा से एसपी पुरुलिया भेजा गया है, जबकि अभिजीत बनर्जी को एसपी पुरुलिया से एसपी मालदा बनाया गया है। इसी तरह प्रदीप कुमार यादव को एसपी मालदा से हटाकर उत्तर दिनाजपुर में ट्रैफिक एसपी की जिम्मेदारी दी गई है। वाई. राघुवंशी को एसपी अलीपुरदुआर से एसपी जलपाईगुड़ी स्थानांतरित किया गया है। आईपीएस सचिन को एसएस, आईबी, डब्ल्यूबी से डीसी न्यू टाउन, बिधाननगर पुलिस कमिश्नरेट में पदस्थ किया गया है। धृतिमान सरकार को एसपी पश्चिम मेदिनीपुर से एसएस, आईबी, डब्ल्यूबी भेजा गया है। खांदबहाले उमेश गणपत को एसपी जलपाईगुड़ी से एसएस अलीपुरदुआर की जिम्मेदारी दी गई है। वहीं डॉ. सोनावणे कुलदीप सुरेश को वेस्ट जोन, आसनसोल दुर्गापुर से हटाकर एसपी रायगंज पुलिस जिला बनाया गया है। सौम्यदीप भट्टाचार्य को एसपी पूर्व मेदिनीपुर से हटाकर एसपी बांकुड़ा भेजा गया है। मानव सिंगला को डीसी न्यू टाउन बिधाननगर पीसी से एसपी झारग्राम बनाया गया है। पलाश चंद्र ढाली को एसपी बारुईपुर से एसपी पश्चिम मेदिनीपुर भेजा गया है। शुभेन्द्र कुमार को एडिशनल एसपी (रूरल) पूर्व मेदिनीपुर से एसपी बारुईपुर पुलिस जिला नियुक्त किया गया है। अधिसूचना में कहा गया है कि ये सभी नियुक्तियां सार्वजनिक हित में की गई हैं और आगे के आदेश तक प्रभावी रहेंगी।

8.2 प्रतिशत बढ़ी भारत की जीडीपी

– पीएम ने बताया उत्साहजनक
नयी दिल्‍ली। देश की अर्थव्यवस्था दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर) में 8.2 फीसदी की दर से बढ़ी है, जो पिछले छह तिमाहियों में सबसे तेज वृद्धि है। चालू वित्त वर्ष की (अप्रैल-जून) पहली तिमाही में यह वृद्धि दर 7.8 फीसदी थी। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने शुक्रवार को राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के जारी आंकड़ों में बताया कि चालू वित्‍त वर्ष 2025-26 की (जुलाई-सितंबर) दूसरी तिमाही में देश की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 8.2 फीसदी की दर से बढ़ी है, जो पिछली छह तिमाहियों में सर्वाधिक है। पहली तिमाही में यह 7.8 फीसदी रही थी, जबकि पिछले वित्त वर्ष 2024-25 की समान तिमाही में यह 5.6 फीसदी थी। एनएसओ के मुताबिक भारतीय अर्थव्यवस्था ने लगार तीसरी तिमाही में शानदार प्रदर्शन जारी रखा है। यह छह तिमाहियों में सबसे ज्‍यादा 8.2 फीसदी की दर से बढ़ी है, जबकि पिछली तिमाही में यह 7.8 फीसदी थी। आंकड़ों के अनुसार विनिर्माण, जो देश के सकल घरेलू उत्पाद जीडीपी का 14 फीसदी है, दूसरी तिमाही में 9.1 फीसदी बढ़ा है, जबकि पिछले वित्त वर्ष 2024-25 की इसी तिमाही में यह 2.2 फीसदी था। विनिर्माण क्षेत्र देश की जीडीपी में लगभग 14 फीसदी का योगदान देता है। वहीं, चालू वित्‍त वर्ष के पहले सात महीनों अप्रैल से अक्‍टूबर के बीच भारत का राजकोषीय घाटा 8.25 लाख करोड़ रुपये रहा। यह वार्षिक अनुमानों का 52.6 फीसदी है। इस बार राजकोषीय घाटा पिछले वर्ष के 46.5 फीसदी से अधिक है। सरकार का लक्ष्य इस वित्‍त वर्ष में राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 4.4 फीसदी तक कम करना है, यह एक साल पहले 4.8 फीसदी था। आर्थिक मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि वस्‍तु एवं सेवा कर (जीएसटी) दरों में कटौती और उपभोक्ता मांग में तेजी के कारण कारखानों ने उत्पादन बढ़ाया, जिससे समग्र विकास दर में तेजी आई है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2025-26 की दूसरी तिमाही में भारत की अर्थव्यवस्था में दर्ज 8.2 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धि पर प्रसन्नता व्यक्त की है। प्रधानमंत्री ने कहा कि यह उपलब्धि सरकार की विकासोन्मुख नीतियों और सुधारों के सकारात्मक प्रभाव के साथ-साथ देशवासियों की मेहनत और उद्यमशीलता को दर्शाती है। प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर एक पोस्ट में कहा कि दूसरी तिमाही में 8.2 प्रतिशत की जीडीपी वृद्धि अत्यंत उत्साहजनक है और यह दर्शाती है कि देश सही दिशा में आगे बढ़ रहा है। सरकार सुधारों को गति देने तथा प्रत्येक नागरिक के ईज ऑफ लिविंग को सुदृढ़ करने के लिए संकल्पित है, ताकि विकास का लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुंच सके। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था की लगातार प्रगति सरकार की नीतिगत स्थिरता, पारदर्शिता और सुधारों के प्रति निरंतर प्रतिबद्धता को प्रतिबिंबित करती है।

 

एक करोड़ युवाओं को नौकरी एवं रोजगार देगी बिहार सरकार

पटना । बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गुरुवार को राज्य में सरकारी नौकरी को लेकर बड़ा आदेश दिया है। उन्होंने कहा कि अगले 5 सालों में एक करोड़ युवाओं को नौकरी एवं रोजगार देना सरकार की प्राथमिकता है। सीएम नीतीश कुमार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, “राज्य में अधिक से अधिक युवाओं को सरकारी नौकरी और रोजगार मिले, ये शुरू से ही हम लोगों की प्राथमिकता रही है। सात निश्चय-2 के तहत वर्ष 2020-25 के बीच राज्य में 50 लाख युवाओं को सरकारी नौकरी एवं रोजगार दिया गया है। अगले 5 वर्षों (2025-30) में हम लोगों ने 1 करोड़ युवाओं को नौकरी एवं रोजगार देने का लक्ष्य निर्धारित किया है।” उन्होंने लिखा, ”नई सरकार के गठन के पश्चात राज्य में अधिक से अधिक सरकारी नौकरी एवं रोजगार के अवसर उपलब्ध करने के लिए हम लोगों ने तेजी से काम शुरू कर दिया है। सरकारी नौकरी की रिक्तियों को जल्द से जल्द भरने के लिए कई ठोस कदम उठाए गए हैं। राज्य के अधीन सभी प्रशासी विभाग, सभी प्रमंडलीय आयुक्त, पुलिस मुख्यालय के अधीन सभी कार्यालय एवं सभी जिलाधिकारियों को निर्देशित किया है कि वे सामान्य प्रशासन विभाग को रिक्तियों से संबंधित अधियाचना दिनांक 31.12.2025 तक अवश्य उपलब्ध करा दें। सामान्य प्रशासन विभाग प्राप्त अधियाचनाओं को यथाशीघ्र जांच कर संबंधित विभिन्न नियुक्ति आयोगों को भेज दें।”
मुख्यमत्री नीतीश कुमार ने आगे लिखा, ”सभी नियुक्ति आयोगों एवं चयन एजेंसियों को निर्देशित किया गया है कि जनवरी 2026 में नियुक्ति हेतु पूरे साल का कैलेंडर प्रकाशित करें, जिसमें अन्य आवश्यक सूचनाओं के अतिरिक्त विज्ञापन प्रकाशन की तिथि, परीक्षा आयोजन की संभावित अवधि, अंतिम परीक्षाफल प्रकाशन की तिथि आदि का स्पष्ट रूप से उल्लेख हो। परीक्षा के चाहे जितने भी चरण हों, किसी भी परिस्थिति में विज्ञापन प्रकाशन से अंतिम परीक्षाफल में एक साल से अधिक समय नहीं लगना चाहिए।” उन्होंने एक्स पोस्ट में लिखा, ”सभी परीक्षाओं को पारदर्शी एवं स्वच्छ तरीके से संपन्न कराने हेतु सभी नियुक्ति आयोगों एवं चयन एजेंसियों को निर्देशित किया गया है। परीक्षाओं में अनुचित साधन की रोकथाम के लिए सख्त और तत्काल कार्रवाई की जाए। परीक्षा में किसी भी प्रकार की अनियमितता पाए जाने पर दोषियों को चिन्हित करते हुए उनके विरुद्ध फास्ट ट्रैक कोर्ट के माध्यम से दंडित कराने का भी निर्देश दिया गया है।” सीएम नीतीश कुमार ने बताया कि बिहार में ऑनलाइन परीक्षा सीबीटी (कंप्यूटर आधारित टेस्ट) हेतु परीक्षा केन्द्रों की संख्या को बढ़ाने का भी निर्देश दिया गया है ताकि परीक्षाओं का आयोजन ससमय एवं सुचारू रूप से किया जा सके। राज्य के युवाओं के सुखद भविष्य के लिए हमलोग शुरू से काम कर रहे हैं। अधिक से अधिक सरकारी नौकरी एवं रोजगार देने के लिए राज्य सरकार प्रतिबद्ध है। सभी परीक्षाएं ससमय एवं पूर्ण पारदर्शिता के साथ आयोजित की जाएंगी। बिहार के युवा दक्ष एवं आत्मनिर्भर हों तथा उन्हें अधिक से अधिक रोजगार मिल सके, और उनका भविष्य सुरक्षित हो, इसके लिए हमलोग कृतसंकल्पित हैं।

एसआईआर पर फिलहाल रोक नहीं : सुप्रीम कोर्ट

नयी दिल्ली । राज्यों में एसआईआर पर चल रही राजनीतिक बहस के बीच, सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को पूछा कि क्या सरकारी स्कीमों का लाभ प्राप्त करने के लिए आधार कार्ड रखने वाले “घुसपैठियों” को भी वोट देने की अनुमति दी जानी चाहिए। पीठ ने कहा कि चुनाव आयोग कोई पोस्ट आफिस नहीं है, जो बिना कुछ पूछे फार्म-6 स्वीकार कर ले। आयोग के पास हमेशा दस्तावेज की सत्यता जांचने का वैधानिक अधिकार होता है। सिब्बल ने कहा कि जैसा इस बार हो रहा है, वैसा देश में पहले कभी नहीं हुआ।”आधार कार्ड एक क़ानून की रचना है। और वैध है। इस हद तक कि यह उस पर आधारित लाभों या विशेषाधिकारों को स्वीकार करता है। कोई भी इस पर विवाद नहीं कर सकता। चीफ जस्टिस सूर्य कांत ने सामाजिक कल्याण और मताधिकार के बीच एक स्पष्ट अंतर खींचा। सीजेआई ने टिप्पणी की, “मान लीजिए कि कुछ व्यक्ति हैं जो किसी दूसरे देश से, पड़ोसी देशों से घुसपैठ करते हैं, वे भारत आते हैं, वे भारत में काम कर रहे हैं। भारत में रह रहे हैं, कोई गरीब रिक्शा चालक के रूप में काम कर रहा है, कोई निर्माण स्थल पर मजदूर के रूप में काम कर रहा है। अगर आप उसे आधार कार्ड जारी करते हैं ताकि वह रियायती राशन या किसी अन्य लाभ का फायदा उठा सके। तो यह हमारे संवैधानिक लोकाचार का हिस्सा है, यह हमारी संवैधानिक नैतिकता है। लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि अब उसे मतदाता भी बनाया जाना चाहिए?” चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जयमाल्य बागची की बेंच कई राज्यों में मतदाता सूचियों को साफ करने के उद्देश्य से एसआईआर की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, जो पश्चिम बंगाल और केरल राज्यों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, ने एसआईआर प्रक्रिया को “जल्दबाजी, और अनुचित” करार देते हुए इसकी निंदा की। उसी दौरान बीच चीफ जस्टिस का यह क्लासिकल सवाल सामने आया। सिब्बल ने अदालत से आग्रह किया, “एक अनुमान है। एक स्व-घोषणा, कि मैं एक नागरिक हूं। मैं यहां रहता हूं। मेरे पास एक आधार कार्ड है। यह मेरा निवास है। अगर आप इसे हटाना चाहते हैं, तो एक प्रक्रिया के माध्यम से हटा दें।” उन्होंने अनपढ़ और हाशिए पर रहने वाले मतदाताओं, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं की दुर्दशा पर जोर दिया, जिनके बाहर होने का खतरा है। उसी पर चीफ जस्टिस ने टिप्पणी की थी।