Friday, March 13, 2026
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बहनों के हिस्से की जगह तो छोड़िए

हमारे देश की परम्परा में बहनों का महत्व रहा है, हमेशा से रहा है। माता सरस्वती को भगवान शिव का भाई कहा गया है और सरस्वती का एक नाम शिवानुजा भी है। श्रीराम समेत चारों भाइयों की बहन शांता थीं। नारायण माता पार्वती के भाई बने। यम -यमी की कहानी हम जानते हैं, सुभद्रा प्रभु जगन्नाथ और दाऊ बलराम के साथ रथ पर विराजमान दिखती हैं। महाभारत के युद्ध में उनकी बड़ी भूमिका रही है। वीर अभिमन्यु का पालन – पोषण द्वारका में ही हुआ। बिहार में छठ महापर्व है और भगवान सूर्य की आराधना के साथ छठी मइया को भी पूजा जाता है। हम बता दें कि सूर्य भगवान की बहन छठी मैया (जिन्हें षष्ठी देवी या छठ माता भी कहा जाता है) हैं। इन्हें ब्रह्मा की मानस पुत्री और सूर्य देव की बहन माना जाता है। इसी कारण छठ पूजा के दौरान सूर्य देव के साथ छठी मैया की पूजा की जाती है। कहने की जरूरत नहीं है कि हमने जितनी बहनों के नाम गिनाए, उनमें से कोई भी बेचारी, मोहताज नहीं है। सभी के व्यक्तित्व प्रखर हैं और सृष्टि के संचालन में उनकी भूमिका रही है, उनको अधिकार मिले हैं। बंगाल में बहनों को सम्पत्ति में अधिकार दिया जाता रहा है। दक्षिण भारत और पूर्वोत्तर भारत में मातृ सत्ता ही है। हम किसी सत्ता की बात नहीं कर रहे लेकिन क्या विवाह हो या न हो, क्या जिस घर में कन्या पली -बढ़ी. वहाँ उसका कोई अधिकार नहीं? आप खुद सोचिए कि हम अपने समाज को कहां ले आए हैं जिस कन्या को लक्ष्मी की तरह रखने, सरस्वती की तरह सहेजने और शक्ति के समान पूजने की परम्परा रही है, उसी समाज में आज तक लड़कियों को उनके ही घर में एक कमरा तक नहीं मिल पा रहा है। कई विवाह समारोह होते रहे हैं और देखा गया है कि बुआ से अधिक मौसी प्यारी है। यह प्रेम बुरा नहीं पर क्या यह प्रेम इतना अधिक महत्वपूर्ण है कि घर की बेटी की जगह आप उस लड़की को दे रहे हैं जिसे आए कुछ दिन हुए हैं मगर जो बहन जन्म से लेकर आज तक आपके हर सुख-दुःख में खड़ी रही है, वह आज आपके लिए रिप्लेस करने लायक रिश्ता हो गयी है।
तुलसीदास कह गये हैं –
ससुरारि पिआरि लगी जब तें। रिपुरूप कुटुंब भए तब तें॥
नृप पाप परायन धर्म नहीं। करि दंड बिडंब प्रजा नितहीं॥3॥
भावार्थ:-जब से ससुराल प्यारी लगने लगी, तब से कुटुम्बी शत्रु रूप हो गए। राजा लोग पाप परायण हो गए, उनमें धर्म नहीं रहा। आगे वह कहते हैं * कलिकाल बिहाल किए मनुजा। नहिं मानत क्वौ अनुजा तनुजा॥
नहिं तोष बिचार न सीतलता। सब जाति कुजाति भए मगता॥3॥
भावार्थ:-कलिकाल ने मनुष्य को बेहाल (अस्त-व्यस्त) कर डाला। कोई बहिन-बेटी का भी विचार नहीं करता। (लोगों में) न संतोष है, न विवेक है और न शीतलता है। जाति, कुजाति सभी लोग भीख माँगने वाले हो गए॥3॥
अब तक मुझे लगता था कि यह रोग युवाओं में है पर हाल की कुछ घटनाओं को देखकर लगा कि यह बीमारी तो बहुत पुरानी है और इसका कारण भी स्त्रियां है। देखिए, परिवार किसी एक रिश्ते में केंद्रित होकर नहीं चल सकता, वह तब चलता है जब आप एक दूसरे के रिश्ते का सम्मान करें। यहां लड़कों ने तो ससुरारि को सम्भालना सीख लिया और ऐसा सीखा कि उन्होंने अपने घर – परिवार को ही बिसार दिया मगर लड़कियों ने अपने मायके को हमेशा अधिक महत्व दिया। ननद उनके लिए सहचरी से अधिक प्रतिद्वन्द्वी रह गयी और आज अधिकांश परिवार सम्पत्ति और वर्चस्व के चक्कर में अपने भाई -बहनों को उसी घर में आश्रित होते देखने के आदी बन चुके हैं, जिसे बनाने में उनके साथ उनके भाई -बहनों की भूमिका रही है। मुझे हैरत के साथ दुःख हुआ जब एक घटना में यह पता चला कि एक विवाह में ननदों को भौजाइयों ने यह कहकर कमरा नहीं दिया कि उसकी बेटी और दामाद आ रहे हैं। शायद वह भौजाई यह भूल गयी कि जिसे आज वह बाहर कर रही है, वह घर भी उसी ननद ने दिया है और उसके पति पर उससे पहले उसकी बहनों का अधिकार है। वह जहां रह रही है, वहां इसलिए रह रही है क्योंकि बहनों ने सम्पत्ति पर वह अधिकार मांगा नहीं जिस पर उसका कानूनी अधिकार है। कहने का मतलब यह कि यह गैरकानूनी है मगर बहनें मायके का चेहरा देखने आती हैं। अब आप बताइए कि अगर कोई हमसे कोई चीज मांगे नहीं तो क्या हमारा उस पर अधिकार बनता है? नहीं बनता क्योंकि यह सीधे बेईमानी है। बहनों का मायके पर नैसर्गिक अधिकार है और इसे कोई भाई- भौजाई नहीं छीन सकता। अच्छा माएं करती हैं तो करती हैं मगर क्या आज की समझदार युवा पीढ़ी अपनी मांओं को ऐसा करने से नहीं रोक सकती। वह भतीजी कह सकती थी कि बुआ का हक है क्योंकि स्त्री सशक्त तभी होगी जब वह एक दूसरे के अधिकार का सम्मान करे। ठीक है आयोजक होटल का प्रबंध कर देते हैं मगर क्या कोई बेटी होटल में दिन काटने के लिए आई है। आखिर क्यों वह अपने घर ही घर में अपरिचित की तरह रहे, क्यों किसी बहन को उसके उस घर में स्थान पाने के लिए संघर्ष करना पड़े, जहां वह जन्मी, पली और बढ़ी है। यह एक सुनियोजित उदासीनता है जिससे लड़कियां इस अपमान के बाद धीरे – धीरे दूरी बना लेती हैं। आज अधिकतर परिवार ऐसे हैं जो विशाल तो हैं मगर एक पीढ़ी के लिए दूसरी पीढ़ी अजनबी है, क्या आप ऐसे परिवार व्यवस्था को बचाने जा रहे हैं। एक ऐसी घटना भी दिखी जहां खुद भाई ने अपने सालों को अपने साथ रखा मगर बहन को पूछा तक नहीं। यहां तक कि आमने – सामने होते हुए भी उससे मिला तक नहीं, जिसे बुआ ने गोद में खिलाया, उस भतीजे ने अभिवादन तक नहीं किया…। क्या आपको ऐसा नहीं लगता है कि हर मकान में बहनों के नाम पर एक पूरा तल होना चाहिेए क्योंकि बेटियां तो बेटियां होती हैं। आपको बुरा लग सकता है मगर ससुराल एक एक्सटेंडड फैमिली है, यह बात लड़कियां बखूबी समझती हैं मगर अपने मायके वालों को ऐसे फिट कर देती हैं कि लड़के का अपना परिवार उसके हाथ से छिटक जाता है और वह कबीर की माया महाठगिनी में ऐसा व्यस्त है कि वह यह सब होने देता है। क्या यह जरूरी नहीं है कि ऐक्सटेंडड फैमिली ऐक्सटेंडड फैमिली की तरह रहे। क्या इससे परिवार की मान- प्रतिष्ठा बढ़ेगी और खुद लड़की वाले अपने स्वार्थ में इतने अंधे हैं कि उनको समझ नहीं आ रहा है कि उनके अधिकारों की सीमा कहां खत्म हो रही हैं। बहुएं बड़े – छोटे का लिहाज नहीं कर रही हैं तो उनको उनकी भाषा में जवाब देना जरूरी है जिस सम्पत्ति पर वह इतना घमंड कर रही है, वह उसके मायके से नहीं मिली बल्कि जिनको वह दुत्कार रही है और पैंतरे दिखा रही है, घर की असली हकदार वही हैं।
परिवार समझे न समझे तो क्या यह समाज और कानून की जिम्मेदारी नहीं है कि ऐसी स्त्रियों और ऐसे पुरुषों की बिगड़ैल मनमानी पर अंकुश लगाकर उनको सीधे रास्ते पर लाये। जब आप बहनों का प्रेम छीनने के लिए खाप पंचायत बन जाते हैं तो उनको अधिकार दिलाने में क्यों पीछे हैं। यह सामाजिक और कानूनी तौर पर बाध्यतामूलक होना चाहिए कि हर परिवार में अगर फ्लैट है तो एक कमरा और अगर मकान है तो पूरा फ्लोर बहनों के लिए रखा जाए। यहां लड़कियों की गलती है कि उन्होंने अपनी परवाह नहीं की और सब कुछ सहती चली गयीं मगर उनका यह रवैया आने वाली पीढ़ी के लिए घातक रहा है इसलिए अब उनको अपने हक की आवाज उठानी होगी और सामने आना होगा।

वेतन के आधार पर समानता नहीं, मानती हैं 33 प्रतिशत महिलाएं

मुंबई । भारत में कार्यस्थलों पर महिलाओं को मिलने वाले वेतन को लेकर तस्वीर पूरी तरह एक जैसी नहीं है। एक ओर बड़ी संख्या में महिलाएं मानती हैं कि उन्हें पुरुषों के बराबर वेतन मिल रहा है, वहीं एक बड़ा वर्ग अब भी वेतन असमानता की समस्या महसूस करता है। नौकरी डॉट कॉम की रिपोर्ट ‘व्हाट वूमेन प्रोफेशनल्स वांट’ के अनुसार देश के विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहीं महिलाओं में से 67 प्रतिशत का मानना है कि उनके कार्यस्थलों पर वेतन समानता मौजूद है, जबकि 33 प्रतिशत महिलाएं मानती हैं कि अब भी वेतन में अंतर बना हुआ है। यह सर्वे देश के 50 से अधिक उद्योगों में काम करने वाली लगभग 50,000 महिलाओं के अनुभवों पर आधारित है।
रिपोर्ट से यह भी स्पष्ट होता है कि वेतन असमानता का अनुभव अलग-अलग क्षेत्रों में अलग स्तर पर महसूस किया जाता है। पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, रियल एस्टेट क्षेत्र की 42 प्रतिशत महिला पेशेवरों ने वेतन अंतर की बात कही। इसके बाद एफएमसीजी क्षेत्र में 38 प्रतिशत और फार्मास्युटिकल तथा लाइफ साइंसेज सेक्टर में भी 38 प्रतिशत महिलाओं ने वेतन समानता न होने की बात कही। ऑटोमोबाइल सेक्टर में 37 प्रतिशत महिलाओं ने वेतन अंतर महसूस किया। इसके अलावा रिटेल तथा होटल और रेस्टोरेंट उद्योग में 35 प्रतिशत महिला पेशेवरों ने वेतन अंतर की बात कही। आईटी सर्विसेज और कंसल्टिंग सेक्टर तथा टेलीकॉम/आईएसपी में 34 प्रतिशत महिलाओं ने भी इसी तरह का अनुभव साझा किया। मेडिकल सर्विसेज और अस्पतालों के क्षेत्र तथा ऑयल एंड गैस सेक्टर में 33 प्रतिशत महिलाओं ने वेतन असमानता की बात कही। रिपोर्ट अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस से पहले जारी की गई है और इसमें यह भी सामने आया है कि महिलाओं के बीच समान वेतन की पारदर्शिता और अधिकारों को लेकर जागरूकता बढ़ रही है। कार्यस्थलों पर ‘इक्वल पे ऑडिट’ और ‘मेंस्ट्रुअल लीव’ की मांग अब तेजी से बढ़ रही है। इस तरह की मांग करने वाली महिलाओं का प्रतिशत पिछले वर्ष के 19 प्रतिशत से बढ़कर इस वर्ष 27 प्रतिशत हो गया है।
दिलचस्प बात यह है कि यह मांग अधिक आय वर्ग में काम करने वाली महिलाओं में सबसे अधिक है। रिपोर्ट के अनुसार उच्च आय वर्ग की लगभग 48 प्रतिशत महिलाएं कार्यस्थलों पर समान वेतन ऑडिट और मासिक धर्म अवकाश जैसे प्रावधानों की जरूरत महसूस करती हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि जैसे-जैसे महिलाएं संगठन के ऊंचे पदों के करीब पहुंचती हैं, उन्हें वेतन अंतर के संकेत अधिक स्पष्ट दिखाई देने लगते हैं। रिपोर्ट के अनुसार कार्यस्थलों पर विविधता से जुड़ी महिलाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती भर्ती और प्रमोशन में होने वाला पक्षपात है। करीब 42 प्रतिशत महिलाओं ने इसे सबसे बड़ी समस्या बताया। यह आंकड़ा पिछले वर्ष की तुलना में 7 आधार अंक अधिक है। चेन्नई में 44 प्रतिशत और दिल्ली-एनसीआर में 43 प्रतिशत महिलाओं ने भी इसी तरह की चिंता जताई। हालांकि चुनौतियों के बावजूद नेतृत्व के अवसरों को लेकर महिलाओं में सकारात्मक रुझान भी दिखाई देता है। सर्वे में शामिल 83 प्रतिशत महिलाओं ने कहा कि उन्हें नेतृत्व की भूमिकाओं को अपनाने के लिए प्रोत्साहन मिलता है। यह आंकड़ा पहले 66 प्रतिशत था। खासकर दक्षिण भारत के शहरों में यह रुझान अधिक मजबूत दिखाई देता है।

भवानीपुर कॉलेज के गैर शैक्षणिक कर्मचारियों ने मनाई फूलों की फागुन 

कोलकाता ।  भवानीपुर एडुकेशन सोसाइटी कॉलेज के जुबली सभागार में आयोजित फागुन उत्सव मनाया गया जो मुख्य रूप से गैर शैक्षणिक कर्मचारियों के लिए था। यह फूलों से फागुन का रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम विद्यार्थियों द्वारा किया गया ।वर्ष में एक बार कॉलेज मैनेजमेंट सभी कर्मचारियों को उपहार, ठंडाई और नाश्ता प्रदान किया जाता है ।कॉलेज के रेक्टर और डीन प्रो दिलीप शाह ने इस परंपरा की शुरुआत की थी जो बहुत ही अनोखी और प्रेरक है। एच आर, सिक्युरिटी ,एकाउंट्स, एनसीसी, क्लीनर्स ,क्म्प्यूटर ,सोसाइटी स्पोर्ट्स आदि विभिन्न विभागों के अधिकारियों को सम्मानित किया गया।300 से अधिक कर्मचारियों और शिक्षिकाओं ने भाग लिया। प्रो दिलीप शाह ने इस अवसर पर विद्यार्थियों ने सभी कर्मचारियों के लिए होली से संबंधित शास्त्रीय नृत्य, वेस्टर्न डांस, हास्य नाटिका और क्वीज प्रश्नों द्वारा उनका मनोरंजन किया ।वाइस प्रिंसिपल प्रो मीनाक्षी चतुर्वेदी ने सांस्कृतिक कार्यक्रम का संयोजन किया। कार्यक्रम में सभी विभागों के अधिकारी प्रमुख अधिकारी उपस्थित रहे। अंत में, सभी ने एक दूसरे पर गेंदें फूलों की बौछारें की ।जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

चंग रंगीली फौज ने मनाई रंग लीला फाग

कोलकाता । आईडियल ग्रैंड हावड़ा की रंगीली फौज की महिला सदस्यों ने तीन दिन तक होली उत्सव की धूम मचाई।रंगीली फौज मार्च 2021 से होली समारोहों के लिए राजस्थानी महिलाओं द्वारा टीम बनाई गई है। इस टीम की सात महिला प्रवासी राजस्थानी सदस्यों ने मिलकर राजस्थानी भाषा, संस्कृति और संस्कारों को संरक्षित करने के लिए इस अनोखी टीम को बनाया है। यह हावड़ा और कोलकाता की विभिन्न राजस्थानी समुदायों में अपने कार्यक्रम देती हैं। रुचि बोहरा, सुचित्रा जैन, नीलम संचेती, मनीषा पटावरी, मीनू तोशनीवाल, चन्द्र जैन, सुनीता सुराणा इसकी संस्थापक सदस्याएं हैं।
होली उत्सव के दौरान होली के विशेष संगीत वाद्ययंत्र ‘चंग’ के साथ प्रदर्शन करती हैं जो ऊर्जा और उत्साह से भरा होता है। विभिन्न समुदायों में रंगीली फौज के कार्यक्रमों की सराहना की जाती है। कोलकाता के विभिन्न क्षेत्रों में होली समारोह में महिलाओं की वेशभूषा और राजस्थानी रंगों के साथ गीत नृत्य नाटिका आदि आयोजित करती हैं।धरती धोरा री से लेकर फागण की नोंक झोंक और गुलाल ने प्रेम और आनंद का संदेश दिया। इसकी जानकारी डॉ वसुंधरा मिश्र ने दी।

परिवार कई रंगों से बनता है, किसी एक रंग से नहीं

रंग हमारी जिंदगी को जीवन देते हैं। कहते हैं कि पानी रंगहीन होता है लेकिन पता नहीं क्यों लगता है रंग का नहीं होना भी तो एक रंग है। उदासी भी एक रंग है जीवन का….अगर हम रंगों को समझने लगें तो जीवन कितना सहज हो जाए..रंगों को समझें और वह जो कहना चाहते हैं, वह भी वह भी समझें। हरियाली का हरा, सूर्य की लालिमा, सोने का पीला रंग, आसमान का नीला, गुलाब का गुलाबी, सृष्टि ने कितने रंग दिए हैं हमको पर क्या कोई भी एक रंग, एक या दो रंगों को चुनकर उपवन सजा सकता है ? उपवन बाहर से चाहे जितना भी सुन्दर लगे और हम खुद को चाहे जितना समझा लें मगर रहेगा वह अधूरा है। यही बात हमारी जिन्दगी के साथ है, यही बात हमारी संस्कृति और हमारे देश के साथ है। रंग कोई भी हो, कैसा भी हो, छोटा या बड़ा नहीं होता, उसका होना ही काफी होता है और कई बार वही रंग हमारी जिंदगी को नयी दिशा दे जाता है। चलिए बात करते हैं हमारे परिवारों की। ऐसा लगता है कि उत्तर आधुनिकतावाद के समय में हमारी संस्कृति ऐसे मोड़ पर आ चुकी है जहां लगता है कि अब लौटने की जरूरत है। आज की नयी पीढ़ी भले ही बौद्धिक स्तर पर सूचनाओं का खजाना हो, तकनीक में महारत रखती हो मगर जिन्दगी सूचनाओं से नहीं चलती, वह चलती है संवेदना से…और आज की पीढ़ी का आई क्यू भले ही बेहतर हो मगर ई क्यू की स्थिति शोचनीय है। आज के बच्चों में बहुत गुस्सा है तो दिल पर हाथ रखकर सोचिए कि इसका कारण कौन है। वह कारण कोई और नहीं, हम और आप हैं। जिन चीजों को एकल परिवार के मोह में आपने आउटडेटेड समझकर छोड़ दिया, वह दरअसल हमारा रक्षा कवच थी। अपने अनुभव से बताती हूँ…संयुक्त परिवार में रहना चुनौती भरा हो सकता है मगर अपने स्वार्थ को पीछे धकेलकर खुद से पूछेंगे तो समझ सकेंगे कि हमारे परिवारों ही काउंसिलर हुआ करते थे…हमें किसी प्रोफेशनल काउंसिलर की जरूरत नहीं पड़ी। अगर हम भटके तो किसी ताऊ, चाचा, मामा, मौसा या भाई -बहन ने हाथ थामे रखा…डिप्रेशन क्या होता था, तब पता ही नहीं चला। आज के माता-पिता अपनी औलादों के आगे बेबस हैं क्योंकि आपने तकनीक दी, पैसे खर्च किये मगर आप संवेदना नहीं दे सके क्योंकि मशीन संवेदनशील नहीं बना सकती । आपने भौतिक सुखों से परवरिश को बेहतर बनाना चाहा, चलिए आपने समय भी दिया मगर माता- पिता की परवरिश तक की दुनिया सीमित नहीं है, बच्चों को दुलार की जरूरत है। उसे भाई- बहनों का साहचर्य चाहिए, उसे चाचा-बुआ…मौसा…मामा…मौसी का दुलार चाहिए। सच तो यह है कि यह मिथक है कि माता- पिता बच्चे की दुनिया बन सकते हैं। माता-पिता भी इंसान हैं और एक समय के बाद वह भी थकते हैं और तब यही परिवार उनका सहारा बनता है। बच्चों के हाथ में पहले किताब थी, आज माता – पिता खुद नहीं पढ़ते तो बच्चे कहां से पढ़ेंगे। यह समय है कि एकल परिवारों के कर्णधारो को हार मान लेनी चाहिए क्योंकि आप हर बात का विकल्प और हर बात का उत्तर नहीं बन सकते। भाई – बहनों के साथ खेलते – खेलते हार – जीत होती थी तो खेल भावना ऐसे ही विकसित हो जाती थी। शिक्षक हों या पड़ोसी हों या कोई और भी हो, वह एक सीमा तक ही आपके साथ हो सकता है। आप अपने परिवार में रहते हुए जितने समझौते करते थे, आज आप उससे कहीं अधिक समझौते कर रहे हैं। परिवारों में अगर उमर लंबी होती तो भी एकाकीपन नहीं था मगर आज बुजुर्ग अकेले भी हैं और असहाय भी। गांव में चौपाल जमती थी तो वह एक आसरा हुआ करता था। आंगन में जब सब बैठते थे तो वह एक पिकनिक थी। ये सब जीवन के वही रंग हैं जिनको हमने हाथ लगाना बंद कर दिया और जिंदगी बदरंग बना ली है। समस्याएं, चुनौतियां, दुःख…हर जगह हैं मगर परिवार हौसला देता है और याद रहे परिवार का मतलब पूरा परिवार..क्योंकि एकल परिवार एक ईकाई हो सकता है मगर अब वह विकल्प काम नहीं कर रहा है। परिवार कई रंगों से बनता है, किसी एक रंग से नहीं। आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाएं।
सम्पादक

समझिए रंगों का मनोविज्ञान

होली केवल रंगों का त्योहार नहीं है, यह मन के भीतर जमे हुए भावों को धो देने का अवसर भी है। सर्दियों के बाद जैसे प्रकृति में नई कोंपलें फूटती हैं, वैसे ही यह पर्व हमारे भीतर दबे हुए तनाव, शिकायत और दूरी को पिघलाने का संदेश देता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो होली एक सामूहिक “इमोशनल रिलीज़” का माध्यम है। हम सामान्य दिनों में अपने क्रोध, ईर्ष्या या दुख को दबाकर रखते हैं, पर इस दिन हँसी, रंग और संगीत के बीच मन हल्का हो जाता है। रंग लगाना केवल चेहरे पर गुलाल लगाना नहीं, बल्कि संबंधों पर जमी धूल को साफ करना भी है। जब हम किसी को रंग लगाते हैं, तो अनकही दूरियाँ भी कुछ कम हो जाती हैं।

रंगों का भी अपना मनोवैज्ञानिक अर्थ है। लाल ऊर्जा और उत्साह का प्रतीक है, पीला आशा और सकारात्मकता का, हरा संतुलन और विकास का, और नीला शांति का संकेत देता है। ये रंग हमें याद दिलाते हैं कि जीवन एक ही भावना का नाम नहीं, बल्कि कई भावों का सुंदर संगम है।
होली हमें यह भी सिखाती है कि जीवन में कभी-कभी “बेखौफ” होना जरूरी है ..थोड़ा खुलकर हँसना, गले मिलना, और अपने भीतर के बच्चे को जीने देना। यही सहजता मानसिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक है। अंततः, होली हमें यह संदेश देती है कि मन के अंधेरे को जलाकर, रिश्तों में नए रंग भरना ही सच्ची खुशी है। रंगों से भी अधिक महत्वपूर्ण है वह अपनापन, जो इस दिन दिलों को जोड़ देता है।

होली पर बेहतरीन कविताओं से चुनिंदा अंश

होली हर्ष और उल्लास का पर्व है। इस दिन लोग भी गिले, शिकवे बुलाकर प्यार का रंग लगाते हैं। कवियों ने इस प्यार के त्यौहार पर अनेक सुंदर रचनाएं लिखी हैं।

केशर की कलि की पिचकारी / सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला”

केशर की, कलि की पिचकारी
पात-पात की गात सँवारी

राग-पराग-कपोल किए हैं
लाल-गुलाल अमोल लिए हैं
तरू-तरू के तन खोल दिए हैं
आरती जोत-उदोत उतारी
गन्ध-पवन की धूप धवारी

हरिवंशराय बच्चन

तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है।

देखी मैंने बहुत दिनों तक
दुनिया की रंगीनी,
किंतु रही कोरी की कोरी
मेरी चादर झीनी,
तन के तार छूए बहुतों ने
मन का तार न भीगा,
तुम अपने रँग में रँग लो तो होली है।

 

केदारनाथ अग्रवाल

फूलों ने होली फूलों से खेली

लाल गुलाबी पीत-परागी
रंगों की रँगरेली पेलीकाम्य कपोली कुंज किलोली
अंगों की अठखेली ठेली

मत्त मतंगी मोद मृदंगी
प्राकृत कंठ कुलेली रेली

फणीश्वर नाथ रेणु

साजन! होली आई है!

सुख से हँसना
जी भर गाना
मस्ती से मन को बहलाना
पर्व हो गया आज-
साजन! होली आई है!
हँसाने हमको आई है!

साजन! होली आई है!
इसी बहाने
क्षण भर गा लें
दुखमय जीवन को बहला लें
ले मस्ती की आग-
साजन! होली आई है!
जलाने जग को आई है!

नज़ीर अकबराबादी

हाँ इधर को भी ऐ गुंचादहन पिचकारी 

देखें कैसी है तेरी रंगबिरंग पिचकारी

तेरी पिचकारी की तक़दीद में ऐ गुल हर सुबह
साथ ले निकले है सूरज की किरण पिचकारी

जिस पे हो रंग फिशाँ उसको बना देती है
सर से ले पाँव तलक रश्के चमन पिचकारी

बात कुछ बस की नहीं वर्ना तेरे हाथों में
अभी आ बैठें यहीं बनकर हम तंग पिचकारी

हो न हो दिल ही किसी आशिके शैदा का ‘नज़ीर’
पहुँचा है हाथ में उसके बनकर पिचकारी

साभार- कविताकोश 

बड़ाबाजार में को मिला पहला निजी हेरिटेज सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल

कोलकाता । चारनॉक हॉस्पिटल ने सेंट्रल कोलकाता में पश्चिम बंगाल के पहले प्राइवेट हेरिटेज सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, चारनॉक लोहिया हॉस्पिटल का उद्घाटन किया। अत्याधुनिक उपकरणों के साथ खुले इस अस्पताल ने बंगाल के हेल्थकेयर लैंडस्केप में एक ऐतिहासिक उपस्थिति दर्ज की है। 250 बेडों की क्षमता वाले इस मल्टी सुपर स्पेशियलिटी फैसिलिटी अस्पताल ने लगभग 200 साल पुरानी ग्रेड I हेरिटेज बिल्डिंग, जिसे पहले लोहिया मातृ सेवा सदन के नाम से जाना जाता था, इस अस्पताल में नई जान फूंक दी है, जिसमें संरक्षित लेगेसी आर्किटेक्चर को कटिंग-एज मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ नये तरीके से जोड़ा गया है। चारनॉक लोहिया हॉस्पिटल के उद्घाटन मौके पर सम्मानीय अतिथियों में मेयर फिरहाद बॉबी हकीम , शशि पांजा ( एमआइसी, इंडस्ट्री, कॉमर्स और एंटरप्राइज महिला एवं बाल विकास और समाज कल्याण, पश्चिम बंगाल सरकार), चंद्रिमा भट्टाचार्य (एमआईसी, वित्त, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, भूमि एवं भूमि सुधार, शरणार्थी एवं पुनर्वास, पश्चिम बंगाल सरकार), सुजीत बोस (अग्निशमन राज्य मंत्री, पश्चिम बंगाल सरकार), दोला सेन (संसद सदस्य), विवेक गुप्ता (विधायक), देबोप्रसाद बाग (विधायक), राजेश कुमार सिन्हा (पार्षद), एलोरा साहा (पार्षद), तारक नाथ चट्टोपाध्याय (पार्षद), मृणाल साहा (पूर्व पार्षद), स्मिता बख्शी (पूर्व विधायक), संजय बख्शी (पूर्व विधायक), प्रशांत शर्मा (चारनोक हॉस्पिटल के प्रबंध निदेशक) के साथ समाज की कई दूसरी जानी-मानी हस्तियां इसमें शामिल हुए। लगभग 4 बीघे ज़मीन पर फैले, चारनॉक लोहिया हॉस्पिटल की एक-एक अत्याधुनिक व्यवस्थाएं एवं यहां की मशीनों का रेस्टोरेशन मरीजों की हितों के अनुसार है। जिसने ग्रेड I स्ट्रक्चर की आर्किटेक्चरल शान और हेरिटेज कैरेक्टर को बनाए रखा है, साथ ही इसे मॉडर्न सुपर स्पेशियलिटी हेल्थकेयर से जुड़ी सभी सुविधाओं से लैस रखा गया है। इस अस्पताल के आधुनिकीकरण में 250 करोड़ रुपये से ज़्यादा की लागत आई है।

यह अस्पताल मरीजों की सुविधा एवं उन्हें स्वस्थ व शेहदमंद रखने के लिए एक ऐतिहासिक प्रॉपर्टी के अडैप्टिव रीयूज़ का एक अनोखा और मिसाल है। इस अस्पताल से लगभग 1,000 से अधिक लोगों को रोजगार मिलने की संभावना है, जो लोकल इकॉनमी में बड़ा योगदान देगा। गिरीश पार्क मेट्रो स्टेशन से 500 मीटर की दूरी पर मौजूद इस अस्पताल के खुलने से बड़ाबाजार, जोरासांको, नीमतला घाट स्ट्रीट और विवेकानंद रोड में रहने वाले लोगों को काफी ज्यादा फायदा होगा। इसके अलावा यहां पहुंचने के और भी कई एक्सेस पॉइंट हैं, अस्पताल में बड़ी पार्किंग की सुविधाएं भी उपलब्ध हैं। चारनॉक लोहिया हॉस्पिटल में वर्ल्ड-क्लास इंफ्रास्ट्रक्चर की सुविधाएं है, जिसे पूरी टर्शियरी और क्रिटिकल केयर सर्विस देने के लिए डिज़ाइन किया गया है। 250 बेडों की क्षमता वाले इस अस्पताल में 90 से ज़्यादा वार्ड बेड और 20 प्राइवेट केबिन हैं, जिन्हें कई क्रिटिकल केयर स्पेशलिटीज़ में 70 आइसीयू बेड की सुविधा भी मिलेगी। हॉस्पिटल में 4-6 स्टेट-ऑफ़-द-आर्ट मॉड्यूलर ऑपरेशन थिएटर, डेडिकेटेड कैथ लैब, सीटीवीएस और न्यूरो ऑपरेशन थिएटर, 10 बेड का इमरजेंसी डिपार्टमेंट और 10 बेड की डायलिसिस यूनिट भी उपलब्ध हैं। इसके साथ यहां एडवांस्ड डायग्नोस्टिक और इमेजिंग सुविधाएँ भी मिलेंगी। इस अस्पताल में एक ही छत के नीचे आसान, टेक्नोलॉजी से चलने वाली देखभाल से जुड़ी कई सुविधाएं मिलेगी। मीडिया से बात करते हुए चारनॉक हॉस्पिटल के प्रबंध निदेशक प्रशांत शर्मा ने कहा, पूरे बंगाल में काफी ज़्यादा पोटेंशियल वाली कई हिस्टोरिक प्रॉपर्टीज़ का इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है। चारनॉक लोहिया हॉस्पिटल के ज़रिए, हमने दिखाया है कि हेरिटेज कंज़र्वेशन और मॉडर्न हेल्थकेयर एक साथ आसानी से चल सकते हैं। सेंट्रल कोलकाता में खासकर बड़ाबाज़ार और उसके आस-पास के इलाके लंबे समय से एक वाइब्रेंट कमर्शियल हब रहे हैं, लेकिन पाँच किलोमीटर के दायरे में एक मॉडर्न प्राइवेट सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल तक यहां उपलब्ध नहीं थी। चार्नॉक लोहिया हॉस्पिटल की लॉन्चिंग के साथ हम इय इलाके की ज़रूरी कमी को पूरा कर रहे हैं। आपातकालीन स्थिति में किसी मरीज को एडवांस्ड केयर समय मिलने से मरीज की जान बच सकती है। हमारा विज़न वर्ल्ड-क्लास हेल्थकेयर को लोगों के रहने और काम करने की जगह के करीब लाना है, जो हमारी पेशेंट फर्स्ट की फिलॉसफी के मुताबिक है।

भवानीपुर एडुकेशन सोसाइटी कॉलेज में शोभा डे के साथ संवाद सत्र 

कोलकाता । एक्साइड कोलकाता लिटरेरी मीट के एक भाग के रूप में, भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज ने गणतंत्र दिवस के अवसर पर 26 फरवरी को सुबह 10:30 बजे सोसाइटी हॉल में “एक राष्ट्र का जन्म, एक बेटी का जन्म” विषय पर सुश्री शोभा डे के साथ एक इंटरैक्टिव सत्र का आयोजन किया। सत्र का मुख्य आकर्षण एक प्रसिद्ध भारतीय लेखिका, स्तंभकार और सांस्कृतिक आइकन सुश्री शोभा डे के साथ एक आकर्षक बातचीत थी। अपनी निर्भीक आवाज़ और समकालीन दृष्टिकोण के लिए जानी जाने वाली, उन्होंने अपने जीवन, लेखन यात्रा और समाज की टिप्पणियों से लिए गए अंतर्दृष्टिपूर्ण विचारों को साझा किया। सुश्री शोभा डे ने अतीत में फंसे रहने के बजाय भविष्य की ओर देखने के महत्व के बारे में बात की। .अपने स्वयं के जीवन में आए बदलावों और पिछले कुछ वर्षों में भारत के परिवर्तन के बीच समानताएं बनाते हुए, उन्होंने इस बात पर विचार किया कि औपनिवेशिक शासन से स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद भारतीय होने का क्या मतलब है और स्वतंत्रता का विचार कैसे विकसित हो रहा है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आज के भारत की असली ताकत उसके लोगों में निहित है। युवा पीढ़ी, विशेषकर युवा लड़कियों को संबोधित करते हुए उन्होंने सोशल मीडिया को एक शक्तिशाली उपकरण बताया जिसका प्रभाव पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करता है कि इसका उपयोग कैसे किया जाता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सोशल मीडिया को ऐसी चीज़ के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए जिसके बारे में माता-पिता को घबराने की ज़रूरत है, बल्कि इसे एक ऐसे माध्यम के रूप में देखा जाना चाहिए जिसे समझदारी से समझने, नियंत्रित करने और संसाधित करने की आवश्यकता है। उन्होंने हिंग्लिश के एक ऐसी भाषा के रूप में उभरने के बारे में भी बात की जो सड़कों और रोजमर्रा की बातचीत की लय को दर्शाती है, जिसने उनके लेखन को बहुत प्रभावित किया। आत्म-खोज के महत्व पर जोर देते हुए, उन्होंने छात्रों को खुद को पहचानने के लिए प्रोत्साहित किया कि वे वास्तव में कौन हैं और अपनी आवाज खुद खोजें। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि लेखन कौशल को मजबूत करने में पढ़ना कैसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और इच्छुक लेखकों से वे जो करते हैं उसके प्रति सच्चा प्यार विकसित करने का आग्रह किया। शोभा डे ने दर्शकों को याद दिलाया कि लेखन व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति है और युवा लेखकों को बस लिखना शुरू करने के लिए प्रेरित किया, और उन्हें आश्वस्त किया कि दृढ़ता के साथ स्पष्टता और दिशा मिलती है।

सफलता पर अपना दृष्टिकोण साझा करते हुए, उन्होंने एक सफल महिला को वह महिला बताया जिसके पास ना कहने की शक्ति है। उन्होंने छात्रों को उन स्थितियों से दूर रहने के लिए प्रोत्साहित किया जो असुविधा का कारण बनती हैं, चाहे वह आकर्षक नौकरी का अवसर हो या कोई ऐसी स्थिति जो खुशी से समझौता करती हो। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि लैंगिक समानता एक जन्मसिद्ध अधिकार है और इस पर बिना किसी हिचकिचाहट के विश्वास किया जाना चाहिए। सत्र के अंत में, उन्होंने महत्वाकांक्षी पाठकों और लेखकों के लिए कई पुस्तकों की सिफारिश की, जिससे उन्हें अपनी साहित्यिक रुचियों को गहरा करने के लिए प्रेरणा मिली।  यह कार्यक्रम दोपहर 12:00 बजे सुश्री शोभा डे को रेक्टर और छात्र मामलों के डीन, प्रो. दिलीप शाह द्वारा सम्मानित किए जाने के साथ संपन्न हुआ। यह सत्र एक विचारोत्तेजक और प्रेरक अनुभव साबित हुआ, जिससे दर्शकों को लेखन, पहचान और स्वयं के प्रति सच्चे बने रहने के साहस पर बहुमूल्य अंतर्दृष्टि प्राप्त हुई। रिपोर्टर: आमना शमीम और नीलेशा नाथ थे और जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

भवानीपुर एडुकेशन सोसाइटी कॉलेज में मनाया गया अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस

कोलकाता । भवानीपुर एडुकेशन सोसाइटी कॉलेज में अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया गया जिसमें मुख्य अतिथि के रूप में कवयित्री, उपन्यासकार और अनुवादक साहित्यकार तृष्णा बासक रहीं ।इस अवसर पर उडिया उर्दू मारवाड़ी गुजराती हिंदी आदि विभिन्न भाषाओं में अपने वक्तव्य और कविताएं सुनाई गई। प्रो शंख आचार्य ने विज्ञापन में प्रादेशिक भाषा के प्रयोग के विषय में जानकारी दी ।उदाहरण अमूल का देते हुए न लोकल एजेंसी द्वारा प्रादेशिक और क्षेत्रीय भाषाओं को पूरे भारत में हर भाषा का प्रयोग हो रहा है, स्लाइड प्रेजेंटेशन द्वारा समझाया। कार्यक्रम की शुरुआत उत्तिया चट्टोपाध्याय के उद्घाटन गीत से हुई। रेक्टर और डीन प्रो दिलीप शाह ने संस्कृत में एक श्लोक द्वारा भाषा की सुगमता और मधुरता को अपने वक्तव्य में रखा ।मुख्य अतिथि तृष्णा बासक ने वैश्विक स्तर पर अपनी बात विनोद कुमार शुक्ल और केदारनाथ सिंह की पंक्तियों से बात की शरुआत करते हुए विस्तार से अपनी मातृभाषा पर विचार प्रकट किया। दो कविताएं भी सुनाई । शिल्पा शर्मा ने उड़िया , वनिता शर्मा ने मारवाड़ी , डॉ रेखा नारिवाल ने मारवाड़ी गीत पधारो म्हारे देश , डॉ वसुंधरा मिश्र ने हिंदी , डॉ सम्पा सिन्हा बासु ने बांग्ला , आर्शी ने उर्दू , फोरम शाह ने गुजराती , डॉ श्रद्धा सिंह ने हिंदी भाषा में अपने वक्तव्य और कविताएं रखी साथ ही मातृभाषा के विषय में अपनी-अपनी बात रखी ।
डॉ कस्तूरी मुखर्जी ने कार्यक्रम का संचालन किया ।कार्यक्रम बांग्ला विभाग के द्वारा आयोजित किया गया। साठ से अधिक शिक्षक शिक्षिकाओं, विद्यार्थियों की उपस्थिति रही।विद्यार्थियों ने बांग्ला में गीत ‘आमी बांग्ला के भालोभाषी’ द्वारा कार्यक्रम का अंत किया गया। डॉ मिली समाद्दार ने सभी को धन्यवाद दिया और नाश्ते मिठाई के पैकेट दिए गए। बंगाली विभाग ने 21 फरवरी, 2026 को सोसाइटी हॉल में हुआ। यह जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।