सूर्य नमस्कार योगासनों में सर्वश्रेष्ठ है। सूर्य नमस्कार का अभ्यास हमारे सम्पूर्ण शरीर का व्यायाम है। इसके दैनिक अभ्यास से हमारा शरीर निरोगी, स्वस्थ और चेहरा ओजपूर्ण हो जाता है। महिला हों या पुरुष, बच्चे हों या वृद्ध, सूर्य नमस्कार सभी के लिए बहुत लाभदायक है।
सूर्य नमस्कार में बारह आसन होते हैं: प्रणाम आसन, हस्तोत्तानासन, हस्तपाद आसन, अश्वसंचालन आसन, दंडासन, अष्टांग नमस्कार, भुजंग आसन, पर्वत आसन, अश्वसंचालन आसन, हस्तपाद आसन, हस्तोत्तानासन, ताड़ासन
सूर्य नमस्कार के लाभ
सूर्य नमस्कार से हृदय, यकृत, आँत, पेट, छाती, गला, पैर शरीर के सभी अंगो के लिए बहुत से लाभ हैं। सूर्य नमस्कार सिर से लेकर पैर तक शरीर के सभी अंगो को बहुत लाभान्वित करता है। यही कारण है कि सभी योग विशेषज्ञ इसके अभ्यास पर विशेष बल देते हैं। सूर्य नमस्कार के अभ्यास से शरीर, मन और आत्मा सबल होते हैं। सूर्य नमस्कार के शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक कई निम्नलिखित लाभ हैं:
1. सूर्य नमस्कार करने से शरीर स्वस्थ और हृष्ट- पुष्ट बनता है -सूर्य नमस्कार न सिर्फ शारीरिक स्वास्थ्य प्रदान करता है बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक बल भी प्रदान करता है। सूर्य नमस्कार के 12 आसन हमारे पूरे शरीर के आंतरिक और बाहरी अंगों को स्वस्थ और निरोगी बनाए रखते हैं।
2. बेहतर होता है पाचन तंत्र – सूर्य नमस्कार के आसन हमारे पेट के आंतरिक भाग को मजबूत बनाए रखने में सहायता करते हैं। यदि आप नियमित रूप से सूर्य नमस्कार कर रहे हैं तो आपका पाचन तंत्र मजबूत रहता है और पेट से संबंधित बिमारियाँ आपको परेशान नहीं करतीं।
3. सूर्य नमस्कार करने से पेट की चर्बी घटती है – सूर्य नमस्कार करने से पेट की चर्बी घटती है। जो लोग दिन-रात गूगल पर पेट की चर्बी कम करने के उपाय ढूंढते रहते हैं, उनके लिए यह खुशखबरी है। आज से ही सूर्य नमस्कार को अपने दैनिक जीवन का अंग बना लें। कुछ दिन में आप अपने आपको फिट पाएंगे।
4. सूर्य नमस्कार शरीर का डीटॉक्स करता है – हमारा शरीर, आए दिन के तनाव और जीवन शैली के बदलाव के कारण विषाक्त पदार्थ इकठ्ठा करता रहता है। सूर्य नमस्कार का अभ्यास हमारे शरीर के अनचाहे विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में हमारी मदद करता है।
5. सूर्य नमस्कार चिंता और तनाव को दूर रखता है -सूर्य नमस्कार न केवल हमें शारीरिक रूप से चुस्त-दुरुस्त रखता है बल्कि मानसिक रूप से भी चिंतामुक्त और तनावमुक्त बनाए रखता है। सूर्य नमस्कार के 12 आसन हमें दिन भर तरोताजा अनुभव करने में हमारी मदद करते हैं।
6. सूर्यनमस्कार शरीर को लचीला बनाए रखने में मदद करता है – सूर्य नमस्कार 12 आसनों का एक व्यायाम है। इसके अलग-अलग आसन, शरीर के अलग-अलग अंगों पर अपना प्रभाव डालते हैं। जब हम एक आसन से दूसरे आसन में जाते हैं तो व्यायाम की निरंतरता बनी रहती है और हमारे शरीर के सभी अंगों में लचीलापन और मजबूती आती है। प्रतिदिन सूर्य नमस्कार करने से शरीर में अकड़न नहीं रहती और हम अधिक लचीला अनुभव करते हैं।
7. रोज सूर्य नमस्कार करने से मासिक-धर्म नियमित रहता है – जो महिलाएं अपने मासिक धर्म में अनियमितता से परेशान हैं, सूर्य नमस्कार उनके लिए वरदान हो सकता है। नियमित सूर्य नमस्कार पेट के निचले हिस्से, नितम्ब, गर्भाशय (यूट्रस) और अंडाशय (ओवरी) को स्वस्थ बनाता है और मासिक धर्म की अनियमितता की समस्या को जड़ से दूर भगाता है। स्वास्थ्य के प्रति सचेत महिलाओं के लिए यह एक वरदान है। इससे न केवल अतिरिक्त कैलोरी कम होती है बल्कि पेट की मांसपेशियो के सहज खिचाव से बिना खर्च सही आकार पाया जा सकता है। सूर्य नमस्कार का नियमित अभ्यास महिलाओं के मासिक धर्म की अनियमितता को दूर करता है और प्रसव को भी आसान करता है। साथ ही, यह चेहरे पर निखार वापस लाने में मदद करता है, झुर्रियों को आने से रोकता है और चिरयुवा तथा कांतिमय बनाता है।
8. सूर्य नमस्कार से अंतर्दृष्टि (इंट्यूशन) विकसित होती है – सूर्य नमस्कार व ध्यान के नियमित अभ्यास से मणिपुर चक्र बादाम के आकार से बढ़कर हथेली के आकार का हो जाता है। मणिपुर चक्र का यह विकास जो कि दूसरा मस्तिष्क भी कहलाता है, अंतरदृष्टि विकसित कर, अधिक स्पष्ट और केंद्रित बनाता है। मणिपुर चक्र का सिकुड़ना अवसाद और दूसरी नकारात्मक प्रवृत्तियों की ओर ले जाता है। सूर्य नमस्कार के ढेरों लाभ हमारे शरीर को स्वस्थ और मन को शांत रखते हैं, इसलिए सभी योग विशेषज्ञ सूर्य नमस्कार के नियमित अभ्यास पर विशेष बल देते हैं।
9. रीढ़ की हड्डी को मिलती है मजबूती – सूर्य नमस्कार से रीढ़ की हड्डी के निचले भाग से लेकर ऊपरी भाग तक बढ़िया व्यायाम होता है। इससे रीढ़ की हड्डी को लचीलापन और मजबूती दोनों मिलते हैं।
10. सूर्य नमस्कार बच्चों में एकाग्रता बढ़ाता है – सूर्य नमस्कार मन शांत करता है और एकाग्रता को बढ़ाता है। आजकल बच्चे प्रतिस्पर्धा का सामना करते हैं इसलिए उन्हें नित्यप्रति सूर्य नमस्कार करना चाहिए क्योंकि इससे उनकी सहनशक्ति बढ़ती है और परीक्षा के दिनों की चिंता और असहजता कम होती है।
सूर्य नमस्कार के नियमित अभ्यास से शरीर में शक्ति और ओज की वृद्धि होती है। यह माँसपेशियों का सबसे अच्छा व्यायाम है और हमारे भविष्य के खिलाड़ियों के मेरुदण्ड और दूसरे अंगो के लचीलेपन को बढ़ाता है। 5 वर्ष से बच्चे नियमित सूर्य नमस्कार करना प्रारंभ कर सकते हैं।
सूर्य नमस्कार के पीछे का विज्ञान – सूर्य नमस्कार करने की विधि जानना ही पर्याप्त नहीं है, इस प्राचीन विधि के पीछे का विज्ञान समझना भी आवश्यक है। इस पवित्र व शक्तिशाली योगिक विधि की अच्छी समझ, इस विधि के प्रति उचित सोच व धारणा प्रदान करती है। यह सूर्य नमस्कार की सलाहें आपके अभ्यास को बेहतर बनाती हैं और सुखकर परिणाम देती हैं।
भारत के प्राचीन ऋषियों के द्वारा ऐसा कहा जाता है कि शरीर के विभिन्न अंग विभिन्न देवताओं (दिव्य संवेदनाए या दिव्य प्रकाश) के द्वारा संचालित होते है। मणिपुर चक्र (नाभि के पीछे स्थित जो मानव शरीर का केंद्र भी है) सूर्य से संबंधित है। सूर्य नमस्कार के लगातार अभ्यास से मणिपुर चक्र विकसित होता है, जिससे व्यक्ति की रचनात्मकता और अंतर्ज्ञान बढ़ते हैं। यही कारण था कि प्राचीन ऋषियों ने सूर्य नमस्कार के अभ्यास पर इतना बल दिया।
(साभार -आर्ट ऑफ लीविंग )
सूर्य नमस्कार और उसके लाभ
छठ पूजा विशेष : छठ पूजा में इसलिए महत्वपूर्ण है सूर्यदेव को अर्घ्य देना
लोक मान्यता का महापर्व माना जाता है छठ। छठ पूजा के दौरान महिलाएं 36 घंटे का कठिन निर्जल व्रत रखती हैं और भगवान सूर्य एवं छठी मैया की पूजा कर संतान की उन्नति और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। चार दिनों तक चलने वाली छठ पूजा में पहले दिन नहाय खाय होता है, दूसरे दिन खरना किया जाता है, तीसरे दिन सूर्य को संध्या अर्घ्य दिया जाता है और चौथा यानी कि अंतिम दिन उषा अर्घ्य दिया जाता है। छठ पूजा कृतज्ञता बोध का पर्व है । अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देना इसी कृतज्ञताबोध का प्रतीक है और उदित होते सूर्य को अर्घ्य देना आशा का प्रतीक है ।
शास्त्रों में सूर्य देव को ग्रहों का राजा माना जाता है। सूर्य देव की पूजा से व्यक्ति का भाग्य साथ देने लगता है, सौभाग्य में वृद्धि होती है, कैसा भी रोग क्यों न हो वह दूर हो जाता है और अगर जीवन में सफलता पाने में दिक्कत आ रही हो या बाधाएं आ रही हों तो वो भी दूर हो जाती हैं और भरपूर तरक्की होती है।
सूर्य देव की पूजा करने से और विशेष रूप से उन्हें रोजाना अर्घ्य देने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और जीवन के संकट दूर हो जाते हैं। इसी कारण से रामायण में भगवान श्री राम और महाभारत में कर्ण ने अपने जीवनकाल में हमेशा सूर्य को जल चढ़ाया और सूर्य की विधिवत पूजा-आराधना भी की।
ऐसा माना जाता है कि जब पहली बार माता सीता ने छठ पूजा की शुरुआत की थी तब मात सीता ने भी सूर्य को अर्घ्य दिया था और तभी से यह परंपरा चली आ रही है। इसके अलावा, लव-कुश के जन्म से पूर्व और बाद में भी माता सीता रोजाना उनकी सुख-समृद्धि के लिए सूर्य को जल अर्पित किया करती थीं।
छठ पूजा के दौरान सूर्य को अर्घ्य दो बार दिया जाता है, एक बार छठ पूजा के तीसरे दिन संध्या अर्घ्य और छठ पूजा के चौथे दिन प्रातः काल का अर्घ्य। मान्यता है कि छठ पूजा के दौरान सूर्य को अर्घ्य देने से संतान को उच्च पद की प्राप्ति होती है और धन, वैभव, ऐश्वर्य से जीवन परिपूर्ण रहता है।
वरिष्ठ कवि मानिक बच्छावत का निधन
भवानीपुर कॉलेज की छात्रा बनीं विश्व शतरंज बॉक्सिंग में कांस्य पदक विजेता
कोलकाता अनुभव संस्था द्वारा एक आनंदमय सांस्कृतिक शाम का आयोजन
2000 साल पुराना है परम्परा, फैशन की खूबसूरत पहचान बनारसी साड़ी का इतिहास
जातक कथाओं में मिलता है बनारसी साड़ी का जिक्र –महाकाव्य महाभारत और कुछ बौद्ध धर्मग्रंथों में भी इसका उल्लेख किया गया है। प्राचीन लोग राजसीपन का प्रतिनिधित्व करने के लिए इन खूबसूरत साड़ियों को पहनते थे। उन पुराने दिनों में, साड़ियों को असली सोने और चांदी के धागों का उपयोग करके बनाया जाता था और इसे बनाने में एक साल तक का समय लग सकता था। हालाँकि इन साड़ियों को भारत में बहुत पुराने समय से पसंद किया जाता रहा है, लेकिन मुगल सम्राट अकबर ने ही बनारसी सिल्क साड़ियों को और अधिक प्रसिद्ध बनाया। बनारसी साड़ी का सीधा मतलब सिल्क (रेशम) के कपड़े से है। अभी तक यह माना जाता है कि चीन में सबसे पहले सिल्क ईजाद हुआ और लंबे समय तक चीन ने इसे गुप्त रखा, लेकिन बनारसी साड़ी का जिक्र 300 ईसा पूर्व जातक कथाओं में मिलता है। इन कथाओं में गंगा किनारे कपड़ों की खूब खरीद-फरोख्त होने का जिक्र है. वहीं इनमें रेशम और जरी की साड़ियों का वर्णन मिलता है। ऐसा माना जाता है कि ये बनारसी साड़ी ही है जबकि ऋग वेद में ‘हिरण्य’ नाम का जिक्र है जिसे को रेशम पर हुई जरी का काम माना जाता है। जानकार कहते हैं कि यह बनारसी साड़ी की एक खासियत होती है। भारी जरी काम के लिए रेशम सबसे मुफीद होता है। वहीं इतिहासकार राल्फ पिच ने बनारस को सूती वस्त्र उद्योग के एक संपन्न केंद्र के रूप में वर्णित किया है. बनारस के जरी वस्त्रों का सबसे स्पष्ट उल्लेख मुगल काल के 14वीं शताब्दी के आस-पास का मिलता है जिसमें रेशम के ऊपर सोने और चांदी के धागे का उपयोग करके इन साड़ियों को बनाया जाता था।
बनारसी साड़ी कड़ुआ और फेकुआ – बनारसी साड़ी दो तरह की होती है कड़ुआ और फेकुआ। जब साड़ी को ढरकी पर बुना जाता है तो उसी समय दूसरा कारीगर सिरकी से डिजाइन को बनाता है। इस तरह की कारीगरी में दो लोगों की आवश्यकता होती है। एक साड़ी की बिनाई करता है तो दूसरा रेशम के ऊपर जरी के धागों से कढ़ाई करता है। इन साड़ियों पर कैरी की डिजाइन के साथ फूल पत्तियों की डिजाइन भी बनाई जाती है। कड़ुआ साड़ी को तैयार करने में कम से कम 2 महीने का समय लगता है. इसी वजह से इन साड़ियों की कीमत सबसे ज्यादा होती है जबकि फेकुआ साड़ी को बनाने में कड़ुआ जितनी मेहनत नहीं लगती है। आज बनारस के बजरडीहा इलाके में कड़ुआ बनारसी साड़ी बड़े पैमाने पर बनाई जाती है। वहीं वर्तमान में बनारसी साड़ी को सिल्क, कोरा, जार्जेट, शातिर पर बनाया जाता है. इनमें सबसे ज्यादा मशहूर सिल्क है।
बनारसी साड़ी को अकबर ने दिलाई बड़ी पहचान – मुगल बादशाह अकबर के समय बनारस में बनने वाली इस साड़ी को सबसे ज्यादा तवज्जो मिली। मुगल बादशाह बनारसी सिल्क और जरी के काम को बहुत पसंद करते थे। वह अपनी बेगमों के लिए यह साड़ियां तैयार करवाते थे. इन साड़ियों पर सोने-चांदी की जरी का काम भी होता था। वहीं वह इन साड़ियों का प्रयोग उपहार के तौर पर भी करते थे। वहीं बनारस में बनने वाली बनारसी साड़ी पर सबसे ज्यादा मुगल बादशाहों की छाप देखने को मिलती है। इस साड़ी का सबसे ज्यादा विकास अकबर और जहांगीर के शासनकाल में हुआ। उस समय इन साड़ियों पर इस्लामिक डिजाइन की फूल पत्तियां बनाई जाती थवहीं पर जाली का काम भी होता था, जो मुगलों का ही प्रभाव है. वर्तमान में अब बनारसी साड़ी पर हिंदू देवी देवताओं की डिजाइन भी देखने को मिलती है ।
बनारसी साड़ी का डिजाइन बनाना आसान नहीं – बनारसी साड़ी की डिजाइन को बनाना कोई आसान काम नहीं है. बल्कि यह एक सधा हुआ ज्ञान है। साड़ियों पर डिजाइन बनाने से पहले उसे ग्राफ पेपर पर बनाया जाता है फिर नक्शा पत्रा पर उसे उभारा जाता है। वहीं इनकी डिजाइन बनाना एक सधा हुआ विज्ञान है, जिसमें बहुत धैर्य की आवश्यकता होती है. क्योंकि अगर साड़ी का डिजाइन बिगड़ जाए तो उस पर खर्च होने वाले समय की बर्बादी भी होती है। सबसे पहले, सोने के मिश्र धातु के टुकड़ों से धातु की पट्टियाँ निकाली जाती हैं जिन्हें मशीनों से चपटा किया जाता है। फिर उनकी चमक बढ़ाने के लिए उन्हें पॉलिशर से गुज़ारा जाता है। साड़ी पर लगाए जाने वाले डिजाइन पहले कागज पर बनाए जाते हैं, जिनमें छिद्र ब्रेल लिपि की याद दिलाते हैं। एक साड़ी के लिए सैकड़ों पैटर्न बनाए जाते हैं, या तो फूलों की आकृति के रूप में या किसी अन्य पैटर्न के रूप में। साड़ियों को तैयार होने में 15 दिन से लेकर एक महीने तक का समय लग सकता है। कुछ मामलों में, इसमें छह महीने तक का समय लग सकता है। बनारसी साड़ियाँ असंख्य रंगों और खूबसूरत पैटर्न में आती हैं।
हाथ से बनी हुई बनारसी साड़ी की अलग पहचान – हाथ से बनने वाली बनारसी साड़ी पर डिजाइन और जरी का काम बहुत सधे हुए कारीगरों द्वारा किया जाता है। वहीं इस काम को करने में काफी समय भी लगता है. एक बनारसी साड़ी पर कम से कम 2 महीने तक समय खर्च होता है. वहीं कुछ साड़ियों पर तो महीनों का भी समय लग जाता है जिसके कारण इन साड़ियों की कीमत काफी ज्यादा होती है. जितनी अच्छी डिजाइन बनारसी साड़ी पर होती है, उसे बनाने में उतने ही महंगे कारीगर का इस्तेमाल होता है। इससे उस साड़ी की कीमत तय की जाती है. बनारसी साड़ी पर सोने-चांदी के जरी का इस्तेमाल किया जाए तो इनकी कीमत लाखों में पहुंचती है।
बनारसी में मोटिफ के प्रकार
बूटी – बनारसी साड़ी – बूटी छोटे-छोटे तस्वीरों की आकृति लिए हुए होता है। इसके अलग-अलग पैटर्न दो या तीन रंगो के धागे की सहायता से बनाये जाते हैं और यदि पाँच रंग के धागों का प्रयोग किया जाता है तो इसे पचरंगा (जामेवार) कहा जाता है। यह बनारसी साड़ी के लिए प्रमुख आवश्यक तथा महत्वपूर्ण डिजाइनों में से एक है। इससे साड़ी की जमीन या मुख्य भाग को सुसज्जित किया जाता है। पहले रंग को ‘हुनर का रंग ‘ कहा जाता है। जो सामान्यतः गोल्ड या सिल्वर धागे को एक एक्सट्रा भरनी से बनाया जाता है जिसके लिए सिरकी (बौबिन) का प्रयोग किया जाता है। हालाँकि आजकल इसके लिए रेशमी धागों का भी प्रयोग किया जाता है जिसे मीना कहा जाता है जो रेशमी धागे से ही बनता है। सामान्यतः मीने का रंग हुनर के रंग का होने चाहिए।
बूटा – जब बूटी की आकृति को बड़ा कर दिया जाता है तो इस बढ़ी हुई आकृति को बूटा कहा जाता है। छोटे बड़े पेड़-पौधे जिसके साथ छोटी-छोटी पत्तियाँ तथा फूल लगे हों इसी आकृति को बूटे से उभारा जाता है। यह पेड़ पौधे भी हो सकते हैं और कुछ फूल भी हो सकते हैं। गोल्ड, सिल्वर या रेशमी धागे या इनके मिश्रण से बूटा काढ़ा जाता है। रंगों का चयन डिज़ाइन तथा आवश्यकता के अनुसार किया जाता है। बूटा साड़ी के बॉर्डर, पल्लू तथा आंचल में काढ़ा जाता है जबकि ब्रोकेड के आंगन (पोत) में इसे काढ़ा जाता है। कभी-कभी साड़ी के किनारे में एक खास प्रकार के बूटे को काढ़ा जाता है, जिसे यहाँ के लोग अपनी भाषा में कोनिया कहते हैं।
कोनिया – पट्टी, बेल, कोनिया, शिकारगाह, जंगला – जब एक खास प्रकार की (आकृति) के बूटे को बनारसी वस्त्रों के कोने में काढ़ा जाता है तो उसे कोनिया कहते हैं। डिज़ाइन आकृति को इस तरह से बनाया जाता है जिससे वे कोने के आकार में आसानी से आ सकें तथा बूटे से वस्त्र और अच्छी तरह से आलंकृत हो सके। जिन वस्त्रों में स्वर्ण तथा चाँदी के धागों का प्रयोग किया जाता है उन्हीं में कोनिया को बनाया (काढ़ा) जाता है। सामान्यतः कोनिया काढ़ने के रिए रेशमी धागों का प्रयोग नहीं किया जाता है क्योंकि रेशमी धागों से शुद्ध फूल पत्तियों का डिजाइन सही ढ़ंग से नहीं उभर पाता। पल्लु डिज़ाइन के बाद, कोने से कोनिया बनाया जाता है जो कि प्राय: आम के आकार का रहता है जिसे बनाना बहुत कठिन होता है क्योंकि एक साथ इसमें तीन जालों से बुनाई की जाती है। यह एक पारम्परिक कला है।
बेल – यह एक आरी या धारीदार फूल पत्तियों या ज्यामितीय ढंग से सजाए गए डिज़ाइन होते हैं। इन्हें क्षैतिज, आडे या टेड़े मेड़े तरीके से बताया जाता है, जिससे एक भाग को दूसरे भाग से अलग किया जा सके। कभी-कभी बूटियों को इस तरह से सजाया जाता है कि वे पट्टी का रूप ले लें। भिन्न-भिन्न जगहों पर अलग-अलग तरीके के बेल बूटे बनाए जाते हैं। बेल साडी के किनारे पर लगती है और चार अंगुल में नापी जाती है। इससे घुंघट का नाप तय होता है। बेल में फूल-पत्तियों के अतिरिक्त विभिन्न पशु-पक्षियों व मानव आकृतियों के मोटिफ भी बनाए जाते हैं।
जाल और जंगला – जाल, जैसे नाम से ही स्पष्ट होता है जाल के आकृति लिए हुए होते हैं। जाल एक प्रकार का पैटर्न/बंदिश है, जिसके भीतर बूटी बनाई जाती है तथा इसे जाल- जंगला कहते हैं। जंगला डिज़ाइन प्राकृतिक तत्वों से काफी प्रभावित है। जंगला कतान और ताना का प्लेन वस्त्र है। ताना-बाना कतान का रहता है और डिज़ाइन के लिए सुनहरी या चाँदी की ज़री का प्रयोग होता है जिसमें समस्त फूल, पत्ते, जानवर, पक्षी इत्यादि बने होते हैं। जंगला, जाल से काफी मिलता जुलता होता है। यदि जंगले में मीनाकारी करनी हो तो अलग अलग रंगों के रेशम के धागों का प्रयोग किया जाता है। इसी प्रकार बेल जंगला भी बनाया जाता है।
झालर -बॉर्डर के तुरंत बाद जहाँ कपड़े का मुख्य भाग जिसे अंगना कहा जाता है की शुरुआत होती है वहाँ एक खास डिज़ाइन वस्त्र को और अधिक अलंकृत करने के लिए दिया जाता है, जिसे झालर कहा जाता है। सामान्यतः यह बॉर्डर के डिज़ाइन से रंग तथा मैटीरियल में मिलता होता है। झालर में तोता, मोर, पान, कैरी, तिन पतिया, पाँच पतिया मोटिव डिज़ाइन बनाए जाते हैं। झालर बेल के आखिर में साड़ियों के अलावा जरदोजी का काम भी यहाँ चालू हो चुका है। ये बनारस की अपनी अलग परम्परा नहीं है परन्तु अब लोगों ने बनारसी साड़ी में भी जरदोजी का काम करना प्रारम्भ कर दिया है।
बनारसी साड़ी के प्रकार
बनारसी चिनिया सिल्क-यह एक प्रकार की बनारस साड़ी है जो चिनिया नामक रेशम के धागे से बनाई जाती है। इसे आप कम बजट में भी खरीद सकते है। तो आपको एक बनारस चिनिया सिल्क साड़ी तो जरूर खरीद लेनी चाहिए।
बनारसी सूती साड़ी-बनारसी सूती साड़ी देखने में बेहद खूबसूरत होती है। यह संयोजन बनारसी कॉटन साड़ियों को कालातीत और आरामदायक बनाता है। यह उन लोगों के लिए बिल्कुल सही है जो रोजमर्रा में तरह तरह की साड़ियां पहनना पसंद करती हैं।
बनारसी जूट सिल्क साड़ियां-बनारसी जूट सिल्क साड़ियां टिकाऊ जूट के साथ उच्च गुणवत्ता वाले रेशम के संयोजन से बनाई जाती हैं। ये दूर से ही देखने में खूबसूरत नजर आती है। इस साड़ी को पहनकर आप कहीं भी और कभी भी जा सकती हैं।
शिफॉन बनारसी सिल्क साड़ियां-शिफॉन बनारसी सिल्क साड़ियां शिफॉन कपड़े में बनी खास प्रकार की बनारसी साड़ी है। ये गर्मियों के लिए बेस्ट होती है और बहुत आरामदेह होती है। आप इसे कभी भी पहन सकती हैं। इसे पहनकर आपको बहुत आराम महसूस होगा।
बनारसी कातन सिल्क-बनारसी कातन सिल्क की खास बात ये है कि ये बेहद हल्की होती है और इसे पहनकर आपको अलग ही महसूस होगा। यह एक विशेष बुनाई तकनीक से बनी होती है जिसमें रेशम की ताकत को कपास की कोमलता के साथ मिश्रित होती है।
बनारसी कुबेर सिल्क-बनारसी कुबेर सिल्क साड़ियां बढ़िया रेशम सामग्री से बनी होती हैं। यह नरम और हल्का है और इसमें बहने वाला गुण है जो इसकी चमकदार उपस्थिति को काफी लोकप्रिय बनाता है। इसे आप शादी के मौके पर भी पहन सकती हैं।
बनारसी जॉर्जेट-इस प्रकार की साड़ी शुद्ध कलात्मकता वाली होती है। बनारसी जॉर्जेट साड़ियों में एक जटिल इंटरवॉवन डिजाइन तकनीक इस्तेमाल होती है। कपड़े का डिजाइन पारंपरिक रूप से हमारी जटिल भारतीय विरासत को प्रदर्शित करती है। ज़री का काम और पत्थर का काम कुशल बुनकरों और कारीगरों द्वारा तैयार किया जाता है जिसे कटवर्क तकनीक कहा जाता है।
बनारसी मॉडल सिल्क- मॉडल फैब्रिक के आराम के साथ बनारसी के जटिल डिजाइनों का संयोजन, बनारसी मॉडल रेशम साड़ियाँ पारंपरिक बनारसी साड़ियों के लिए एक नरम और किफायती विकल्प प्रदान करती हैं, जिन्हें आप रोज पहन सकती हैं।
बनारसी साड़ी की कायापलट – नवाचार के परिणामस्वरूप बनारसी कपड़ों का उपयोग सजावट के लिए तेजी से किया जा रहा है। बनारसी कपड़ों की विविधता में वृद्धि हुई है। बनारसी ब्रोकेड लंबे समय से दुल्हन के कपड़ों से जुड़ा हुआ है, लेकिन अब इसका उपयोग सजावट, पोटली-गिफ्टिंग बैग, पर्दे, असबाब, ब्रोकेड आभूषण, सीट कुशन कवर, टेबल रनर, पर्दे, छत, उपहार लपेटने और शादी के कार्ड के लिए भी किया जा सकता है। चूंकि शिल्प की मूल आत्मा ही उसकी वास्तविक पहचान है, इसलिए यह वही रहेगा लेकिन शैली और प्रस्तुति के तरीके में इसे विकसित करना होगा। रंगों को तटस्थ रंगों में संशोधित किया जाता है। बनारसी रेशमी कपड़े में विभिन्न प्रकार के सामान बनाने की बहुत गुंजाइश है। उनमें से एक स्कार्फ है, लेकिन इसे इस तरह से डिज़ाइन और संशोधित किया जाना चाहिए कि विदेशी बाज़ार में इसे स्वीकार किया जा सके।
बनारसी साड़ी को मिल चुका है जी-आई टैग – बनारसी साड़ी की नकल करके चीन मशीनों के द्वारा सस्ती साड़ियां तैयार करने लगा, जिससे यहां के कारीगरों को नुकसान होने लगा। वही अब इन साड़ियों को जीआई टैग मिल चुका है। एक खास इलाके में बनी हुई साड़ियों को ही बनारसी साड़ी कहा जा सकेगा। बनारस, मिर्जापुर, चंदौली, जौनपुर और आजमगढ़ के जनपदों में बनने वाली साड़ी ही बनारसी कही जाएंगी।

सबसे अलग और सुन्दर दिखना सबकी कोशिश है मगर बजट का ख्याल रखना भी तो जरूरी है। अगर हम कहें कि आपकी बनारसी या बनारसी के लुक वाली कोई भी साड़ी आपको सुपर फैशनिस्ता बना सकती है तो विश्वास करिए कि ऐसा हो सकता है।
जरा सी सूझबूझ से आप अनोखे परिधान बनवा सकते हैं और बगैर बहुत अधिक खर्च के तैयार हो सकती हैं तो जरा ध्यान दीजिए इधर –
लहंगा और चोली – पुरानी बनारसी साड़ी को लहंगा और चोली में बदलें। लहंगे के लिए साड़ी के पल्लू का उपयोग करें और चोली के लिए साड़ी के अन्य हिस्सों का उपयोग करें।
अनारकली सूट – पुरानी बनारसी साड़ी को अनारकली सूट में बदलें। साड़ी के पल्लू का उपयोग सूट के लिए करें और अन्य हिस्सों का उपयोग दुपट्टे के लिए करें।
साड़ी को स्कार्फ और शॉल में बदलें – पुरानी बनारसी साड़ी को स्कार्फ और शॉल में बदलें। साड़ी के पल्लू का उपयोग स्कार्फ के लिए करें और अन्य हिस्सों का उपयोग शॉल के लिए करें।
बैग या क्लच – पुरानी बनारसी साड़ी के फैब्रिक से बैग या क्लच बनाएं। साड़ी के पल्लू का उपयोग बैग के लिए करें और अन्य हिस्सों का उपयोग क्लच के लिए करें।
जैकेट, कुरता या जोधपुरी ट्राउजर – सिर्फ महिलाएं ही नहीं बल्कि पुरुष भी बनारसी रिक्रेएशन को आजमा सकते हैं। सिल्क कुरते पर बनारसी जैकेट या जोधपुरी जैकेट और इसके साथ ही अगर आप कुछ और जोड़ना है तो पुरानी बनारसी या बनारसी दुप्पटे से पगड़ी बनाइए। शानदार दिखेंगे।
दीया और मोमबत्ती एक दूसरे की जरूरत हैं, बोझ नहीं
दीपावली बीत चली मगर दीयों का नाता किसी एक दिन से तो नहीं होता तो बात कही जा सकती है । दीया चाहे कितना भी छोटा क्यों न हो, वह प्रकाश है, दीया विश्वास है, दीया संघर्ष है, दीया परिवर्तन है। घनघोर अन्धेरे में बस एक दीया जलाकर रख दीजिए और उसे मोमबत्ती का सहारा दीजिए…वह अपनी क्षमता भर अन्धेरे से लड़ेगा । दीया जब अन्धेरे से जूझ रहा होता है तो बदले में कालिमा के कुछ भी तो नहीं मिलता। उसकी सज -धज तभी तक रहती है जब तक उसे जलाया नहीं गया । यही बात मोमबत्ती के साथ भी है..वह तभी तक सुन्दर दिखती है, जब तक कि उसे जलाया नहीं जाता । मोमबत्ती को जलाइए तो मोम गलने लगती है मगर मोमबत्ती की लौ से दीये को जलाया जाए तो मोमबत्ती असंख्य दीयों का प्रकाश बन जाती है। सोचिए क्या होगा अगर मोमबत्ती को अन्धेरे से प्रेम हो जाए और वह दीये को प्रकाश देना बंद कर दे और वह इस अहंकार में उसके बगैर तो दीये का अस्तित्व नहीं है । वृक्ष का अस्तित्व जड़ से है मगर उसकी शोभा पत्तों, तनों, फूल और फलों से है क्योंकि वह उसके होने का प्रमाण हैं, उसकी योग्यता का प्रतीक हैं। याद रहे कि दीया और मोमबत्ती तभी तक जलते हैं जब तक वे एक दूसरे को प्रकाशित करते रहें । अकेले न तो दीया जल सकता है और न ही मोमबत्ती की लौ की कोई उपयोगिता रह जाती है इसलिए अन्धेरा चाहता ही नहीं कि दोनों एक दूसरे के साथ आएं । कुरीतियों, रूढ़ियों और सामन्तवाद का अन्धेरा भी परिवर्तन के प्रकाश से डरता है इसलिए वह तोड़ना चाहता है, कभी दीये को तो कभी मोमबत्ती को। ज्ञान का प्रकाश, सृजनात्मकता का प्रकाश बिखेरना दीये का दायित्व है तो दीये को अपने ज्ञान से समृद्ध करना मोमबत्ती की जिम्मेदारी…इसलिए दोनों अपना काम कर रहे हैं..कोई किसी पर उपकार नहीं कर रहा । पारिवारिक परिदृश्य में इस सन्दर्भ को नयी पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी से जोड़िए, सामाजिक सन्दर्भ में गुरू और शिष्य से और कॉरपोरेट क्षेत्र में अधिकारी व कर्मचारियों से…सन्देश स्पष्ट है। आप दूसरों को प्रकाशित होंगे तो उसके प्रकाश के माध्यम से आपका अस्तित्व व्यापक होगा मगर अहंकार के अन्धेरे में दबाना चाहेंगे तो खुद भी समाप्त हो जाएंगे…इसलिए आप दोनों एक दूसरे की जरूरत हैं, बोझ नहीं।
दिवाली पर खाएं स्वास्थ्य से भरी मिठाइयां
सादा नारियल मावा बर्फी
सामग्री – 1 कप कद्दूकस किया हुआ नारियल , आधा कप मावा- , 3 चम्मच घी
विधि – सबसे पहले ऊपर बताई गई सामग्रियों को तैयार करके रख लें। फिर एक पैन में घी गर्म करें और जब गर्म हो जाए तो मावा डाल दें। फिर हल्का भूरा होने तक भूनें, ताकि उसका कच्चापन दूर हो जाए। इसके बाद कद्दूकस किया हुआ नारियल डालें और मिश्रण को अच्छे से मिलाएं। हल्की आंच पर 5-7 मिनट तक भूनें, ताकि नारियल और मावा का मिश्रण गाढ़ा हो जाए। इसके बाद गैस बंद कर दें और मिश्रण को ठंडा होने दें। ठंडा होने पर इस मिश्रण को प्लेट में फैला लें और मनपसंद आकार में काटें। आप बर्फी बना सकते हैं या लड्डू बनाकर स्टोर कर सकते हैं। इस बर्फी को 5-7 दिनों तक फ्रिज में स्टोर किया जा सकता है। अगर ताजा नारियल नहीं मिल रहा, तो सूखा नारियल भी इस्तेमाल कर सकते हैं, लेकिन ताजा नारियल का स्वाद बेहतर होता है।
बेसन की पिन्नी
सामग्री – 1 कप बेसन, आधा कप घी, थोड़े कटे बादाम
विधि – सबसे पहले ऊपर बताई गई सामग्रियों को तैयार करके रख लें। फिर इसमें एक पैन में घी गर्म करने के लिए रख दें। जब घी गर्म हो जाए तो इसमें बेसन डालें और हल्की आंच पर सुनहरा होने तक भून लें। फिर बेसन की खुशबू आने लगेगी और उसका रंग सुनहरा हो जाएगा। इसे भूनने में करीब 10-12 मिनट का समय लगेगा। फिर गैस बंद कर दें और बेसन को ठंडा होने दें। ठंडा होने पर इसमें कटे हुए बादाम डालें और मिश्रण से छोटे-छोटे लड्डू बनाएं। बस हो गया आपका काम, जिसे स्टोर करके रख सकते हैं। बेसन को हल्की आंच पर ही भूनें, ताकि जलने से बचे और इसमें अच्छा स्वाद और खुशबू आ सके। इसमें बादाम के अलावा, आप अपनी पसंद के मेवे जैसे अखरोट, पिस्ता आदि भी मिला सकते हैं।
रोशनी के पर्व पर बेसन से दमकाएं चेहरा
दिवाली पर हर कोई सबसे खूबसूरत और अट्रैक्टिव नजर आना चाहता है। इसके लिए अक्सर कई लोग पार्लर जाकर फेशियल करवाते हैं। लेकिन अगर आप अपने बिजी शेड्यूल की वजह से पार्लर नहीं जा सकते, तो घर पर ही बेसन की मदद से फेशियल कर सकते हैं। जी हां, बेसन त्वचा को एक्सफोलिएट करता है और डेड स्किन को हटाने का भी काम करता है। इसे लगाने से चेहरे के दाग-धब्बे दूर होते हैं और त्वचा चमकदार बनती है। अगर आप भी इस दिवाली अपने चेहरे पर नैचुरल ग्लो लाना चाहते हैं, तो बेसन से फेशियल कर सकते हैं। आज इस लेख में हम आपको बेसन से फेशियल करने के तरीके के बारे में बता रहे हैं। तो आइए, जानते हैं इसके बारे में विस्तार से –
क्लींजिंग – सबसे पहले आप एक कटोरी में 2 चम्मच बेसन लें। इसमें एक चम्मच दूध डालकर अच्छे से मिला लें। अब इसे चेहरे पर लगाएं और हल्के हाथों से चेहरे को 2-3 मिनट तक रगड़े। उसके बाद पानी से चेहरे को धो लें। क्लींजिंग से चेहरे पर जमा गंदगी और एक्स्ट्रा ऑयल हट जाता है।
स्क्रबिंग – क्लींजिंग के बाद चेहरे की स्क्रबिंग की जाती है। इससे डेड स्किन, ब्लैकहेड्स और वाइटहेड्स को हटाने में मदद मिलती है। इसके लिए आप एक कटोरी में 2 चम्मच बेसन और 1 चम्मच चावल का आटा लें। इसमें 2 चम्मच कच्चा दूध डालकर अच्छी तरह मिक्स कर लें। अब इस पेस्ट को अपने चेहरे पर लगाएं और हाथों को सर्कुलर मोशन में घुमाते हुए मसाज करें। करीब 5 मिनट बाद चेहरे को पानी से धो लें।
मसाज – फेशियल का तीसरा स्टेप मसाज करना होता है। इससे त्वचा को हाइड्रेटेड रखने और निखार लाने में मदद मिलती है। इसके लिए आप एक बाउल में 2 चम्मच बेसन लें। इसमें 2 चम्मच एलोवेरा जेल डालकर अच्छी तरह मिला लें। अब इस मिश्रण को अपने चेहरे पर लगाएं और 5 से 10 मिनट तक हल्के हाथों से मसाज करें। इसके बाद पानी से चेहरे को धो लें।
फेस पैक – फेशियल का आखिरी स्टेप चेहरे पर फेस पैक लगाना होता है। इसके लिए आप एक कटोरी में एक चम्मच बेसन लें। इसमें एक चम्मच दूध और चुटकी भर हल्दी डालकर अच्छी तरह मिक्स कर लें। अब इस पेस्ट को अपने चेहरे पर लगाएं और सूखने के लिए छोड़ दें। करीब 15-20 मिनट बाद चेहरे को पानी से धो लें।