Sunday, June 28, 2026
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भारत में 43 प्रतिशत बढ़ा दूसरी शादी का चलन

87 प्रतिशत पुरुषों को पत्नी की कमाई ज्यादा होने से दिक्कत नहीं

 नयी दिल्ली । अक्सर फिल्मी सितारों की सेकेंड मैरिज की खबर सुनने को मिलती है। पर, आम भारतीय में भी दूसरी शादी का ट्रेंड बढ़ता दिख रहा है। एक स्टडी में बताया गया है कि भारत में दूसरी शादी का 43 प्रतिशत ट्रेंड बढ़ा है। साथ ही शादी को लेकर जाति, पार्टनर का चुनाव आदि को लेकर भी कई बातें सामने आई हैं। 36 गुण देखने वाले लोग अब सिर्फ एकाध गुण वाले पार्टनर को खोज रहे हैं। जीवनसाथी की मॉडर्न मैचमेकिंग रिपोर्ट 2026″ के आधार पर भारतीय विवाहों में कई बड़े बदलाव देखने को मिल रहे हैं। साल 2016 में जहां शादी के लिए औसत उम्र 27 साल थी, वहीं, 2025 तक यह बढ़कर 29 साल हो गई है। सर्वे के मुताबकि, अब 50 प्रतिशत लोग 29 साल की उम्र में अपना पार्टनर खोजना शुरू करते हैं, क्योंकि वे सामाजिक दबाव के बजाय करियर की स्थिरता और खुद की पहचान को ज्यादा महत्व देते हैं। साथ ही भारत में दूसरी शादी का ट्रेंड भी बढ़ता दिख रहा है। सेकेंड मैरिज का ट्रेंड 2016 में 11 प्रतिशत तो वहीं, 2025 में 16 प्रतिशत के साथ 43 प्रतिशत तक बढ़ता दिख रहा है। इस हिसाब से भारत में दूसरी शादी को लेकर तेजी से दिलचस्पी बढ़ती दिख रही है। समाज में तलाक और दूसरी शादी को लेकर सोच बदली है। जीवनसाथी की हर 6 में से 1 सफलता की कहानी अब दूसरी शादी करने वालों की होती है। 2016 में 91 प्रतिशत लोग जाति को एक अनिवार्य शर्त मानते थे, लेकिन 2025 तक यह घटकर केवल 54 प्रतिशत रह गया है। महानगरों में तो यह आंकड़ा और भी कम (49 प्रतिशत) है, जो दिखाता है कि अब जाति से ज्यादा आपसी समझ मायने रखती है। कैपिटल सिटी जैसे- लखनऊ, जयपुर और भोपाल जैसे शहरों के युवा अपने शहर से ज्यादा दिल्ली में पार्टनर ढूंढना पसंद करते हैं। वैसे भी दिल्ली दिलवालों की है इसलिए, शायद लोगों को यहां पार्टनर खोजने में दिलचस्पी है। अब केवल एक व्यक्ति के कमाने का दौर खत्म हो रहा है। 42 प्रतिशत लोग मानते हैं कि पति-पत्नी दोनों को बराबर योगदान देना चाहिए। साथ ही, 87 प्रतिशत पुरुष अपनी पत्नी की उनसे ज्यादा कमाई होने पर सहज हैं। इस तरह से सोच भी बदलती दिख रही है। इतना ही नहीं, आज के दौर में “सही समय” से ज्यादा “सही इंसान” का मिलना महत्वपूर्ण हो गया है। लोग सही साथी मिलने पर 3-6 महीने के भीतर शादी करने के लिए तैयार रहते हैं।

 

 

कुंडलिनी शक्ति-विकासक योग बढ़ाएगा एकाग्रता और चुस्ती

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में ज़्यादातर लोग एक ही शिकायत करते हैं कि दिनभर सुस्ती बनी रहती है और काम में मन नहीं लगता। सुबह उठते ही थकान महसूस होती है, दिनभर शरीर भारी-भारी सा रहता है और ध्यान जल्दी भटक जाता है। चाहे पढ़ाई हो, ऑफिस का काम हो या घर की जिम्मेदारियां, एकाग्रता की कमी हर किसी की परेशानी बन चुकी है। ऐसे में अगर कोई आसान और असरदार उपाय मिल जाए, तो उससे बेहतर क्या हो सकता है? योग में ऐसी कई सरल क्रियाएं हैं जो बिना ज़्यादा मेहनत के शरीर और दिमाग दोनों को सक्रिय कर देती हैं। इन्हीं में से एक है कुंडलिनी शक्ति-विकासक क्रिया। यह क्रिया दिखने में भले ही बहुत साधारण लगे, लेकिन इसके फायदे कमाल के हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि इसे करने के लिए न तो ज्यादा जगह चाहिए और न ही किसी खास उपकरण की जरूरत होती है।
इस योग क्रिया को करने से सुस्ती धीरे-धीरे दूर होने लगती है। पैरों की मांसपेशियां सक्रिय होती हैं और शरीर में रक्त संचार तेज होता है। इसका सीधा असर हमारे ऊर्जा स्तर पर पड़ता है। कुछ ही दिनों के अभ्यास से शरीर हल्का महसूस होने लगता है और सुबह-सुबह आलस कम हो जाता है।
कुंडलिनी शक्ति-विकासक का एक बड़ा फायदा यह भी है कि यह एकाग्रता बढ़ाने में मदद करती है। इस क्रिया को करते समय शरीर की गति और सांसों का तालमेल बनता है, जिससे दिमाग वर्तमान क्षण पर केंद्रित रहता है। यही वजह है कि इसे करने के बाद मन ज्यादा शांत और फोकस्ड महसूस करता है। जो लोग पढ़ाई करते हैं या मानसिक कार्य ज्यादा करते हैं, उनके लिए यह योग क्रिया खास तौर पर फायदेमंद मानी जाती है।
अगर आप रोजाना सिर्फ 5 मिनट इस योग क्रिया के लिए निकाल लें, तो कुछ ही समय में फर्क महसूस होने लगता है। शुरुआत में इसे 20-25 बार करना पर्याप्त होता है। धीरे-धीरे अभ्यास बढ़ने पर अपनी क्षमता के अनुसार इसकी संख्या बढ़ाई जा सकती है। बेहतर परिणाम के लिए इसे सुबह खाली पेट या शाम को हल्के व्यायाम के रूप में किया जा सकता है।
इस क्रिया को करते समय ध्यान रखने वाली सबसे अहम बात यह है कि शरीर पर ज़ोर न डालें। शुरुआत में गति धीमी रखें और जैसे-जैसे अभ्यास बढ़े, वैसे-वैसे लय में तेजी लाएं। अगर घुटनों या पैरों में किसी तरह की समस्या हो, तो डॉक्टर या योग विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।

इन सुपरफूड्स से करें मधुमेह को कंट्रोल

तीस की उम्र के बाद खाने से लेकर सोने के समय में अगर परिवर्तन कर लिया जाए तो शरीर के आधे से ज्यादा रोग खुद-ब-खुद कम हो जाते हैं। अच्छे स्वास्थ्य के लिए कहा जाता है कि 30 के बाद आहार में मीठा और नमक दोनों की मात्रा आधी कर देनी चाहिए, लेकिन सभी के लिए ये करना बहुत मुश्किल है। बात चाहे सामान्य लोगों की हो या फिर मधुमेह से पीड़ित लोगों की, आज हम ऐसे सुपरफूड्स की जानकारी लेकर आए हैं जिनसे रक्त में शर्करा की मात्रा को नियंत्रित किया जा सकता है। आयुर्वेद में आहार को भी औषधि माना है। अगर आहार संतुलित है तो जीवन भी संतुलित है। भविष्य में होने वाली मधुमेह की परेशानी से बचने के लिए या मधुमेह को नियंत्रित करने के सारे गुण आहार में मौजूद हैं। सबसे पहले आता है मैथी दाना और ओट्स। मैथी दाना और ओट्स दोनों ही मधुमेह को नियंत्रित करने और इंसुलिन रेजिस्टेंस को संतुलित करने में मदद करते हैं। दोनों में ग्लूकोमैनन और बीटा-ग्लूकान होता है जो घुलनशील फाइबर होते हैं और रक्त में शर्करा की मात्रा को बढ़ने नहीं देते।
दूसरा है दालचीनी और करेला। दालचीनी और करेला दोनों ही भारतीय रसोई का हिस्सा हैं। मधुमेह से बचाव के लिए हफ्ते में तीन बार करेले का सेवन करना चाहिए और दालचीनी का इस्तेमाल खाने में और सुबह खाली पेट पानी पीने में कर सकते हैं। करेला और दालचीनी सेल्स को एक्टिव करते हैं, जिससे सेल्स ग्लूकोज का अच्छे से इस्तेमाल कर पाते हैं।
तीसरा है दालें, अलसी, सत्तू, और इसबगोल। यह सारी चीजें आसानी से किचन में मिल जाती हैं, बस उन्हें अपने आहार का हिस्सा बनाना जरूरी है। इन सभी में मैग्नीशियम, ओमेगा-3, और फाइबर भरपूर मात्रा में होते हैं, और ये इंसुलिन सेंसिटिविटी बढ़ाते हैं। चौथा है फलों का सेवन। आहार तभी पूर्ण होता है जब दिन में एक फल का सेवन जरूर किया जाए। मधुमेह से पीड़ित मरीजों को अमरूद, सेब और नाशपाती का सेवन करना चाहिए क्योंकि ये फल लो ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले फल होते हैं जो शुगर तेजी से नहीं बढ़ने देते। इसके अलावा दिनचर्या में कई तरह के बदलाव करने की जरूरत होती है, जैसे रोजाना 30 मिनट पैदल चलना, हल्की एक्सरसाइज, प्रोसेस्ड फूड और मीठे पेय से दूरी और आखिर में पूरी नींद।

सॉल्टलेक के कई बाजारों की होगी कायापलट

– बजट में दोगुना हुआ आवंटन

कोलकाता । सॉल्टलेक के कई मार्केट की हालत को सुधारने का बीड़ा विधाननगर नगर निगम ने उठाया है। वित्तीय वर्ष 2026-27 के बजट में मार्केट में सुधार के लिए 2 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया है। पिछले साल इस खाता में मात्र 1 करोड़ रुपया ही आवंटित हुआ था। इसका अर्थ है कि मार्केट की हालत को सुधारने के लिए एक ही झटके में विधाननगर नगर निगम ने आवंटन दोगुना कर दिया है पर अचानक क्यों आवंटन दोगुना कर सॉल्टलेक के मार्केट व बाजारों की हालत को सुधारने की पहल की जा रही है? मिली जानकारी के अनुसार ऑनलाइन शॉपिंग के साथ कदमताल मिलाते हुए खरीदारों को आकर्षित करने के उद्देश्य से ही यह फैसला लिया गया है। इस बारे में विधाननगर की मेयर कृष्णा चक्रवर्ती ने बताया कि जीडी, ईडी, बीडी, ईसी, सीए और एबी-एसी बाजारों में मरम्मत का काम पूरा हो चुका है। अब एजी, एए और एयू बाजारों की मरम्मत की योजना बनायी जा रही है। नगर निगम सॉल्टलेक के कुल 16 मार्केट की मरम्मत करने का फैसला लिया गया है। सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार मार्केट की छत और दीवारों की मरम्मत की जाएगी। पेवर टाइल्स लगायी जाएगी, बिजली के कनेक्शन का आधुनिकीकरण और शौचालयों की मरम्मत की जाएगी।बताया जाता है कि जीडी ब्लॉक के बाजारों में पहले चरण का काम खत्म करने में करीब 1.3 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं। विधाननगर के मेयर परिषद राजेश चिरीमार ने बताया कि दूसरे चरण का काम जल्द ही शुरू कर दिया जाएगा। वहीं वैशाखी बाजार के लिए लगभग 70 लाख रुपए के खर्च से विशेष परियोजना शुरू करने का प्रस्ताव राज्य सरकार के पास भेजा गया है। लगभग 3 साल पहले वैशाखी बाजार में शेड टूटकर गिरने की वजह से 5 लोग घायल हो गए थे। इसलिए इस बाजार की सुरक्षा व मरम्मत पर खास तौर पर ध्यान दिया जा रहा है। विधानगर नगर निगम के एक अधिकारी ने बताया कि वर्तमान में काफी लोग ऑनलाइन शॉपिंग करना पसंद करते हैं। इसकी वजह से स्थानीय बाजारों में लोगों की भीड़ कम होती जा रही है। इसलिए बाजारों को आकर्षक बनाने की कोशिशें की जा रही है। इससे आम लोग दुकानों पर आकर खरीदारी करने के लिए उत्साहित होंगे। अगर मार्केट की संरचनाएं अच्छी होंगी तो स्थानीय व्यवसायियों का रोजगार भी बढ़ेगा। उम्मीद की जा रही है कि इसके माध्यम से ही नगर निगर का राजस्व टैक्स भी बढ़ सकेगी।

यूपीआई बना लेनदेन का सबसे पसंदीदा माध्यम : रिपोर्ट

– रुपे डेबिट कार्ड को बढ़ावा देने की जरूरत
नयी दिल्‍ली। नकद लेन-देन को पीछे छोड़ते हुए अब यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) भुगतान का सबसे पसंदीदा जरिया बन गया है। हालांकि, गांवों तथा छोटे कस्बों में रुपे डेबिट कार्ड के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए लक्षित हस्तक्षेप की जरूरत है। वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग (डीएफएस) की जारी एक रिपोर्ट में यह बात कही गई है। वित्तीय सेवा विभाग (डीएफएस) ने 13-14 फरवरी को आयोजित चिंतन शिविर के दौरान ‘रुपे डेबिट कार्ड और कम मूल्य वाले भीम-यूपीआई (व्यक्ति-से-व्यापारी) लेन-देन को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहन योजना का सामाजिक-आर्थिक प्रभाव विश्लेषण’ शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की है।
इस रिपोर्ट में डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने, भुगतान अवसंरचना को मजबूत करने और वित्तीय समावेशन को आगे बढ़ाने में सरकार के प्रोत्साहन ढांचे की प्रभावशीलता का मूल्यांकन किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक डिजिटल लेन-देन में वर्ष 2021 से वर्ष 2025 के बीच लगभग 11 गुना वृद्धि हुई है, जिसमें कुल डिजिटल लेन-देन में यूपीआई की हिस्सेदारी बढ़कर लगभग 80 फीसदी हो गई है। रिपोर्ट के मुताबिक मूल्यांकन से पता चलता है कि विभिन्न सामाजिक-आर्थिक वर्गों में डिजिटल भुगतान को अपनाने में महत्वपूर्ण और निरंतर वृद्धि हुई है। सर्वेक्षण में शामिल उपयोगकर्ताओं में यूपीआई सबसे पसंदीदा लेन-देन माध्यम के रूप में उभरा है, जिसका प्रतिशत 57 फीसदी है, जो नकद लेनदेन (38 फीसदी) से कहीं अधिक है। इसका मुख्य कारण उपयोग में आसानी और तत्काल धन हस्तांतरण की क्षमता है। सामाजिक-आर्थिक प्रभाव विश्लेषण व्यापक प्राथमिक सर्वेक्षण पर आधारित है, जिसमें 15 राज्यों के 10,378 उत्तरदाताओं को शामिल किया गया है, जिनमें 6,167 उपयोगकर्ता, 2,199 व्यापारी और 2,012 सेवा प्रदाता शामिल हैं। अध्ययन से पता चलता है कि 90 फीसदी उपयोगकर्ताओं ने यूपीआई और रुपे कार्ड का उपयोग करने के बाद डिजिटल भुगतान में अपना विश्वास बढ़ाया है, साथ ही नकदी के उपयोग और एटीएम से निकासी में उल्लेखनीय कमी आई है। वित्त मंत्रालय के मुताबिक सामाजिक-आर्थिक प्रभाव विश्लेषण के निष्कर्षों से भविष्य की नीति निर्माण में मूल्यवर्धन होने और भारत के डिजिटल भुगतान इकोसिस्टम के लिए निरंतर समर्थन सुनिश्चित होने की उम्मीद है। ये रिपोर्ट आर्थिक विकास और वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने वाले लचीले, समावेशी और सुरक्षित डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे के निर्माण के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को सुदृढ़ करती है।

 

थोक महंगाई दरें सर्वाधिक हुईं, 1.81 प्रतिशत पर पहुंची  

नयी दिल्ली । जनवरी में थोक महंगाई बढ़कर 1.81 प्रतिशत पर पहुंच गई है। इससे पहले दिसंबर में थोक महंगाई 0.83 प्रतिशत पर थी। ये 10 महीनों में सबसे ज्यादा है। मार्च 2025 को ये 2.05 प्रतिशत पर थी। कॉमर्स मिनिस्ट्री ने आज यानी 16 फरवरी को थोक महंगाई के आंकड़े जारी किए हैं। रोजाना की जरूरत वाले सामानों (प्राइमरी आर्टिकल्स) की महंगाई 0.21 प्रतिशत से बढ़कर 2.21 प्रतिशत हो गई। खाने-पीने की चीजों (फूड इंडेक्स) की महंगाई माइनस 0.43 प्रतिशत से बढ़कर 1.55 प्रतिशत हो गई। फ्यूल और पावर की थोक महंगाई दर माइनस 2.31 प्रतिशत से घटकर माइनस 4.01 रही। मैन्युफैक्चरिंग प्रोडक्ट्स की थोक महंगाई दर 1.82 प्रतिशत से बढ़कर 2.86 प्रतिशत रही। प्राइमरी आर्टिकल, जिसका वेटेज 22.62 प्रतिशत  है। फ्यूल एंड पावर का वेटेज 13.15 प्रतिशत और मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट का वेटेज सबसे ज्यादा 64.23 प्रतिशत है। प्राइमरी आर्टिकल के भी चार हिस्से हैं। फूड आर्टिकल्स जैसे अनाज, गेहूं, सब्जियां, नॉन फूड आर्टिकल में ऑयल सीड आते हैं – मिनरल्स, क्रूड पेट्रोलियम जनवरी में रिटेल महंगाई पिछले महीने के मुकाबले बढ़कर 2.75 प्रतिशत पर पहुंच गई है। दिसंबर में ये 1.33 प्रतिशत पर थी। 8 महीनों में सबसे ज्यादा है। मई 2025 में महंगाई 2.82 प्रतिशत पर पहुंच गई थी। थोक महंगाई के लंबे समय तक बढ़े रहने से ज्यादातर प्रोडक्टिव सेक्टर पर इसका बुरा असर पड़ता है। अगर थोक मूल्य बहुत ज्यादा समय तक ऊंचे स्तर पर रहता है तो प्रोड्यूसर इसका बोझ कंज्यूमर्स पर डाल देते हैं। सरकार केवल टैक्स के जरिए डब्ल्यूपीआई को नियंत्रित कर सकती है। जैसे कच्चे तेल में तेज बढ़ोतरी की स्थिति में सरकार ने ईंधन पर एक्साइज ड्यूटी कटौती की थी। हालांकि, सरकार टैक्स कटौती एक सीमा में ही कम कर सकती है। ज्यादा वेटेज मेटल, केमिकल, प्लास्टिक, रबर जैसे फैक्ट्री से जुड़े सामानों का होता है। भारत में दो तरह की महंगाई होती है। एक रिटेल यानी खुदरा और दूसरी थोक महंगाई होती है। रिटेल महंगाई दर आम ग्राहकों की तरफ से दी जाने वाली कीमतों पर आधारित होती है। इसको कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स भी कहते हैं। वहीं, होलसेल प्राइस इंडेक्स का अर्थ उन कीमतों से होता है, जो थोक बाजार में एक कारोबारी दूसरे कारोबारी से वसूलता है। महंगाई मापने के लिए अलग-अलग आइटम्स को शामिल किया जाता है। जैसे थोक महंगाई में मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट्स की हिस्सेदारी 63.75 प्रतिशत, प्राइमरी आर्टिकल जैसे फूड 22.62 प्रतिशत और फ्यूल एंड पावर 13.15 प्रतिशत होती है। वहीं, रिटेल महंगाई में फूड और प्रोडक्ट की भागीदारी 45.86 प्रतिशत, हाउसिंग की 10.07 प्रतिशत और फ्यूल सहित अन्य आइटम्स की भी भागीदारी होती है।

 

 

अब बैट्री से चलेगी कोलकाता मेट्रो

-बिजली जाने पर भी सुरंग में नहीं फंसेंगे यात्री
कोलकाता । किसी कारणवश अगर विद्युतापूर्ति बाधित हुई तो सुरंग में ही रुक जाते हैं मेट्रो के पहिए। यह समस्या खास तौर पर कोलकाता मेट्रो के नॉर्थ-साउथ (ब्लू लाइन) कॉरिडोर में होती है। अगर किसी भी कारणवश स्टेशन छोड़ने के बाद मेट्रो में कोई यांत्रिक त्रुटि आयी तो भी सुरंग में मेट्रो के रुक जाने का खतरा बना रहता है।
ऐसा कई बार हुआ है जब यात्रियों को नजदीकी मेट्रो स्टेशन पर पहुंचने के लिए सुरंग में मेट्रो के ट्रैक पर अंधेरे में पैदल चलना पड़ता है। कभी-कभी यह दूरी थोड़ी होती है लेकिन कई बार यात्रियों को लंबी दूरी भी तय करनी पड़ती है। अब इस समस्या से यात्रियों को राहत मिलने वाली है। कैसे?
अब बैट्री से चलेगी कोलकाता मेट्रो। किसी भी कारणवश अगर मेट्रो में विद्युतापूर्ति बाधित होती है तो यात्री सुरंग में नहीं फंसेंगे। इस बारे में Zee न्यूज की मीडिया रिपोर्ट से मिली जानकारी के अनुसार विद्युतापूर्ति फिर से शुरू होने का इंतजार न कर मेट्रो प्रबंधन ने बैट्री से ही मेट्रो चलाने की व्यवस्था की है। बताया जाता है कि दमदम से दक्षिणेश्वर के बीच एक पूरी मेट्रो रेक को बैट्री से चलाकर नजदीकी मेट्रो स्टेशन तक ले जाने की व्यवस्था की गयी है।
बताया जाता है कि अगर यांत्रिक त्रुटि अथवा विद्युतापूर्ति बाधित होने की वजह से ट्रेन सुरंग में ही रुक जाती है तो बैट्री द्वारा मेट्रो को चलाकर नजदीकी स्टेशन तक ले जाया जा सकेगा। इस व्यवस्था का ट्रायल रन भी किया जा चुका है। हाल ही में कोलकाता मेट्रो के एक रेक को दक्षिणेश्वर से टॉलीगंज तक बैट्री से चलाकर ले जाया गया। इसी तरह से ब्लू लाइन की सभी 44 रेकों को बैट्री से चलाने की व्यवस्था कर दी गयी है।
कोलकाता मेट्रो को बैट्री से चलाने से व्यवस्था कब से शुरू की जाएगी, इस बारे में अभी तक आधिकारिक तौर पर कोई जानकारी नहीं दी गयी है। लेकिन संभावना जतायी जा रही है कि जल्द ही यात्रियों की सुविधा के लिए इस व्यवस्था को शुरू कर दिया जाएगा ताकि यांत्रिक त्रुटि अथवा विद्युतापूर्ति बाधित होने की वजह से सुरंग में किसी मेट्रो रेक के फंसने पर यात्रियों को नजदीकी स्टेशन तक पहुंचने में कोई समस्या न हो।

जल परिवहन की बेहतरी के लिए अत्याधुनिक जलयान खरीदेगा राज्य

कोलकाता । हुगली जलमार्ग परिवहन को और बेहतर बनाने के लिए इस बार राज्य सरकार ने अत्याधुनिक कैटामरन जहाज खरीदा है। राज्य परिवहन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि अब हुगली नदी में जो सभी लांच चलती हैं, उनकी तुलना में इसकी गति बहुत अधिक होगी। ईंधन की खपत भी कम होगी। इतना ही नहीं, इस जलयान पर चढ़कर थोड़े ही समय में कोलकाता से हल्दिया, सुंदरबन या गंगासागर पहुँचना संभव होगा। निकट भविष्य में कोलकाता से मुर्शिदाबाद, नवद्वीप, मायापुर तक सफर के लिए कैटामरान सेवा शुरू करने का भी विचार है। इसके जरिये आने वाले दिनों में राज्य के पर्यटन क्षेत्र में तेजी आने की उम्मीद है, राज्य सचिवालय के अधिकारी ऐसा मान रहे हैं।
राज्य के परिवहन मंत्री स्नेहाशीष चक्रवर्ती ने कहा, ‘नए प्रकार के जो कैटामरन जलयान खरीदे जा रहे हैं, वे अपेक्षाकृत कम वजन वाले स्टील से बनाए जाएंगे। इसलिए इसकी गति अधिक होगी। यात्रियों की सुविधा के लिए इसमें कुछ अतिरिक्त सुविधाएँ भी होंगी। हम कई नए घाट बना रहे हैं। इसके लिए नए जलयान खरीदने पड़ रहे हैं।’
परिवहन विभाग के सूत्रों से पता चला है कि कई करोड़ रुपये खर्च करके विभिन्न आकार के कैटामरन खरीदे जा रहे हैं। इनमें कुछ कैटामरन आकार में काफी बड़े हैं। उनमें लगभग 300 यात्री बैठ सकते हैं। ऐसे कुल 5 जलयान खरीदे जा रहे हैं। प्रत्येक की कीमत लगभग 4 करोड़ रुपये होगी। 100 यात्रियों का वहन करने वाले ऐसे कुल 10 कैटामरन जहाज खरीदे जा रहे हैं। इनकी औसत कीमत लगभग 2 करोड़ 60 लाख रुपये होगी। इसके अलावा, परिवहन विभाग ने पांच मोनोहल जलयान भी खरीदे हैं। इनमें 300 यात्री बैठ सकते हैं। प्रत्येक की अनुमानित कीमत लगभग 3 करोड़ 45 लाख रुपये है। कुल मिलाकर इसका खर्च लगभग 60–65 करोड़ रुपये होगा। इस्पात से बने ये सभी जलयान डीज़ल पर चलेंगे। नदी मार्ग के अलावा, ये तटीय क्षेत्रों में भी आसानी से यात्रा कर सकते हैं।
परिवहन विभाग के अधिकारियों का दावा है कि सामान्य लांच की तुलना में कैटामरन में यात्रा का समय आधा हो जाएगा। यात्रियों के लिए ये बहुत अधिक सुरक्षित होंगे। इसमें दो-दो इंजन होंगे। इसलिए बीच नदी में एक इंजन खराब होने पर भी किसी प्रकार का खतरा नहीं रहेगा। इसमें सेटेलाइट नेविगेशन की व्यवस्था होगी। यात्रियों के लिए आरामदायक सीट, बायो टॉयलेट और वातानुकूलन की सुविधा होगी। परिवहन विभाग के एक अधिकारी के अनुसार, कैटामरन में आमतौर पर दो हॉल होते हैं। दो हॉल के बीच पानी स्वतंत्र रूप से बहता है। एक हॉल वाले जहाज की तुलना में ये अपेक्षाकृत अधिक स्थिर होते हैं। कैटामरन उथले पानी में भी चल सकते हैं।
सरकारी सूत्रों की खबर के अनुसार, वर्ल्ड बैंक के ऋण के पैसे से ये सभी जलयान खरीदे जाएंगे। इसके लिए हाल ही में टेंडर बुलाया गया है, परिवहन विभाग के अधीनस्थ संगठन ‘वेस्ट बंगाल ट्रांसपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड’ द्वारा। जलयान सेवा शुरू करने से पहले राज्य सरकार हुगली नदी जलमार्ग पर कुल 50 जेटी का निर्माण कर रही है, जहाँ अत्याधुनिक जलयान सहित आधुनिक गुणवत्ता वाले जलयान को ठहराया जा सकेगा।
हुगली नदी मार्ग पर कैटामरन सेवा बिल्कुल नई नहीं है। वाम सरकार के समय एक निजी संस्था के पहल पर कोलकाता और हल्दिया के बीच नियमित कैटामरण (सिल्वरजेट) सेवा शुरू हुई थी लेकिन इसमें यात्रियों की कमी के कारण वह सेवा बंद हो गई। कुछ साल पहले, एक संस्था के साथ साझेदारी करके कोलकाता–मायापुर के बीच कैटमरण सेवा शुरू की थी इस्कॉन ने। इसमें मुख्य रूप से पर्यटक ही यात्रा करते हैं।
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अथर्व ने सुप्रीम कोर्ट में खुद जिरह कर हासिल की मेडिकल सीट

-प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण की पर ईडब्ल्यूएस होने पर नहीं मिली मेडिकल सीट 

-10 मिनट में पाई अनुमति 

 भोपाल । फरवरी की एक शाम। अदालत का कामकाज लगभग समाप्ति पर था। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अगुवाई वाली पीठ उस दिन की सुनवाई समाप्त करने की घोषणा करने ही वाली थी तभी एक आवाज सुनाई दी कि मुझे दस मिनट का समय देंगे? किसी वरिष्ठ वकील की नहीं बल्कि अदालत कक्ष में मौजूद एक किशोर की इस अपील ने मुख्य न्यायाधीश को चौंका दिया। इसलिए न्यायाधीशों ने उसकी बात सुनने की अनुमति दे दी। और वही 10 मिनट में 19 वर्षीय अथर्व चतुर्वेदी की जिंदगी बदल गई। मध्य प्रदेश के जबलपुर निवासी अथर्व ने कक्षा 12 उत्तीर्ण की है। अभावों में पले-बढ़े अथर्व की आंखों में डॉक्टर बनने का बड़ा सपना है। मेडिकल प्रवेश परीक्षा (नीट) उन्होंने दो बार पास की। 530 अंक भी प्राप्त किए लेकिन केवल सरकार की नीतिगत अक्षमता के कारण उनका सपना साकार नहीं हो पाया। कारण यह कि सरकारी कॉलेजों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) कोटे में उन्हें प्रवेश नहीं मिल सका। वहीं निजी कॉलेजों में मध्य प्रदेश सरकार अब तक यह कोटा लागू ही नहीं कर सकी है। परिणामस्वरूप प्रवेश परीक्षा पास करने के बावजूद पैसों की कमी से वह मेडिकल पढ़ाई का अवसर नहीं पा सके। भरी अदालत में अथर्व की याचिका और दलीलें सुनने के बाद संविधान के अनुच्छेद 142 के विशेष अधिकार का प्रयोग करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ‘नेशनल मेडिकल कमीशन’ और मध्य प्रदेश प्रशासन को निर्देश दिया कि 2025–26 शैक्षणिक सत्र के भीतर ही इस नीट-उत्तीर्ण अभ्यर्थी को निजी कॉलेज में ईडब्ल्यूएस कोटे के तहत प्रवेश का अवसर दिया जाए। शीर्ष अदालत की टिप्पणी थी कि राज्य की नीति लागू करने में देरी के कारण किसी योग्य छात्र को मेडिकल शिक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता। नीट के साथ-साथ इंजीनियरिंग में भी अथर्व का चयन हुआ था लेकिन उनका सपना डॉक्टर बनना है। इसलिए जब नीट में सफल होने के बाद भी ईडब्ल्यूएस कोटे के कारण मेडिकल पढ़ाई का सपना अटक गया तो सबसे पहले उन्होंने जबलपुर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। वहां उनकी दलील सुनकर न्यायाधीश ने व्यंग्य करते हुए कहा था डॉक्टर नहीं तुम्हें तो वकील होना चाहिए। गलत पेशा चुन रहे हो लेकिन इस टिप्पणी से अथर्व का मनोबल नहीं टूटा। अथर्व के पिता मनोज चतुर्वेदी पेशे से वकील हैं हालांकि उन्होंने कभी सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस नहीं की। कोविड लॉकडाउन के दौरान जब अदालतों में वर्चुअल सुनवाई शुरू हुई तब अथर्व ने ही पिता की मदद की। मनोज के शब्दों में – मेरे बेटे ने कभी कानून की पढ़ाई नहीं की लेकिन कोविड के समय उसने ऑनलाइन सुनवाई देखी। मुझे याचिका स्कैन कर अपलोड करने में भी मदद की। उसी अनुभव का उपयोग करते हुए अथर्व ने सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट से ‘स्पेशल लीव पिटिशन’ का प्रारूप डाउनलोड किया। पूर्व मामलों के फैसलों को ध्यान से पढ़ा फिर अपनी स्पेशल लीव पिटिशन का मसौदा तैयार किया। रजिस्ट्री की आपत्तियों को ठीक कर 6 जनवरी को ऑनलाइन याचिका दाखिल कर दी। यात्रा और दिल्ली में रहने का खर्च बचाने के लिए जबलपुर से ही पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन पूरी की। इस मामले में स्कूल की शिक्षिकाओं मित्रा मैडम और भारती मैडम ने भी उसकी मदद की। कम खर्च होने के कारण अथर्व की पढ़ाई महर्षि स्कूल में कराई गई थी। वहां इन दोनों शिक्षिकाओं ने उसे काफी सहयोग दिया ऐसा उसके पिता ने बताया। इसके बाद फरवरी में वह सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। उस दिन उनकी याचिका सुनी नहीं जाएगी यह समझकर आखिरी क्षण में अथर्व ने भरसक प्रयास किया और उसी में सफलता मिली। हालांकि यहां एक प्रश्न बना हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार को सात दिनों के भीतर अथर्व के प्रवेश की व्यवस्था करने का निर्देश दिया है लेकिन निजी मेडिकल कॉलेजों में ईडब्ल्यूएस कोटे के तहत फीस कितनी होगी इस पर कोई स्पष्ट दिशानिर्देश नहीं है। आशंका के बावजूद बेटे को निराश नहीं करना चाहते मनोज। अब तक बेटे को वही पढ़ाते थे। गर्वित पिता ने कहा कि मेरे बेटे ने कभी किसी चीज की जिद नहीं की। इस एक बार अपने सपने को पूरा करने के लिए उसने जिद की और इतनी दूर तक पहुंचा है। उसके सपने को पूरा करने के लिए जो भी करना पड़े, मैं तैयार हूं।

 

शुभजिता के दस वर्ष – डॉ. वसुंधरा मिश्र द्वारा प्रेषित शुभकामना संदेश

13 फरवरी 2016 को शुभजिता ने एक दशक की यात्रा की और सफलतापूर्वक आज अपने कार्यक्षेत्र को बढा़ रही है, यह बहुत ही सुखद संदेश है। मैं भी संभवतः विगत सात आठ वर्षों से लगातार इसकी गतिविधियों को पढ़ती रही हूँ ।इसकी संपादक और संस्थापक वरिष्ठ पत्रकार सुषमा त्रिपाठी की मेहनत रंग लाई है। हिंदी मीडिया और पत्रकारिता के क्षेत्र में सुषमा जी की दूरदर्शिता ने शुभजिता को उत्तरोत्तर आगे बढाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।हिंदी जगत में विभिन्न पोर्टल, वेबसाइट और पत्रिकाओं की प्रतिस्पर्धा में संघर्षों के बीच महानगर में हिंदी शुभजिता ने एक पहचान बनाई है जो काबिलेतारीफ है ।आज पुस्तक प्रकाशन , विज्ञापन, यूट्यूब और सोशल मीडिया से पूरी तरह से जुड़ी है शुभजिता। ईमानदार और निष्पक्ष होकर सुषमा जी ने एक महिला होते हुए हिंदी पत्रकारिता और मीडिया में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसी तरह शुभजिता उत्तरोत्तर उन्नति करती रहे। कहते हैं कि ‘कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती ‘। सुषमा जी ने इस यात्रा के कठिन दौर में हौसला नहीं छोड़ा और निरंतर अपने लक्ष्य के प्रति जागरूक रहीं। मंगलकामना के साथ बधाई और हार्दिक शुभकामनाएं

– डॉ वसुंधरा मिश्र, हिंदी प्राध्यापिका, भवानीपुर एडुकेशन सोसाइटी कॉलेज