उत्तर 24 परगना। फूलों की डालियां सज चुकी थीं, फल काटे जा चुके थे और आल्पना (द्वार सजाने) का काम जारी था। पीले वस्त्रों में सजे कचिकांचों के बीच धूप-धुना जलाकर पूजा शुरू करने की तैयारी पूरी थी, लेकिन हर साल की तरह इस बार भी पुरोहित की तलाश शुरू हुई। तभी सामने आया एक नया और चौंकाने वाला समाधान—कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई)।
बनगांव के सुभाषपल्ली निवासी सुषोभन घोष की पहल पर इस वर्ष सरस्वती पूजा पारंपरिक पुरोहित के बिना, एआई की मदद से संपन्न हुई। मोबाइल फोन के माध्यम से एआई द्वारा शुद्ध संस्कृत मंत्रों का उच्चारण कराया गया, जिसे सुनकर परिवार के सदस्यों और पड़ोसियों ने एक साथ मंत्रोच्चारण कर पूजा पूरी की। शुशोभन घोष ने बताया कि पुरोहित के इंतजार की समस्या को दूर करने के लिए उन्होंने यह प्रयोग किया। एआई की मदद से मंत्रों को पंचांग के अनुसार जांचा गया और सही विधि से पूजा संपन्न की गई। उन्होंने कहा कि आज हर किसी के पास मोबाइल और इंटरनेट है। सोचा, क्यों न एआई का इस्तेमाल कर देखा जाए। एआई ने पंचांग के नियमों के अनुसार पूरे मंत्र संस्कृत में पढ़े, जिससे हमलोग आसानी से पूजा कर सके। इस अनोखी पूजा में बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। महिलाओं ने भी संतोष व्यक्त करते हुए कहा कि एआई की सहायता से मंत्र और विधि समझकर पूजा करने से उन्हें मानसिक तृप्ति मिली। हालांकि इस घटना को लेकर पुरोहित समाज में मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली है। कुछ लोगों ने इसे भविष्य में पेशे पर असर डालने वाला बताया। वहीं, कई का मानना है कि एआई को सहायक के रूप में अपनाया जा सकता है, न कि पूर्ण विकल्प के तौर पर।
विद्या और बुद्धि की देवी की पूजा में एआई के इस प्रयोग ने यह संकेत दे दिया है कि आने वाले समय में मानव जीवन के साथ-साथ धार्मिक परंपराओं में भी तकनीक की भूमिका और बढ़ सकती है।
पुरोहित के बिना एआई से हुई सरस्वती पूजा
हावड़ा में 103 वर्षों से जारी है मां सरस्वती की अखंड साधना
-आज भी कायम ब्रिटिश कालीन रीत
हावड़ा। हावड़ा के पंचाननतला की संकरी गलियों में स्थित देवी सरस्वती का शताब्दी प्राचीन मंदिर श्रद्धा और भक्ति से ओत-प्रोत एक उत्कृष्ट परंपरा का वाहक बना हुआ है। एक नंबर उमेश चंद्र दास लेन स्थित यह सरस्वती मंदिर न केवल अपनी वास्तुकला के साथ साथ 103 साल पुरानी अटूट परंपरा के लिए भी जाना जाता है।
इस मंदिर की नींव 28 जून, 1923 को रखी गई थी। ब्रिटिश शासनकाल से ही यहां विद्या की देवी मां सरस्वती की नित्य पूजा का विधान चला आ रहा है। स्थानीय इतिहासकारों के अनुसार, इसे बंगाल के सबसे प्राचीन सरस्वती मंदिरों में से एक माना जाता है। मंदिर का नाम हावड़ा जिला स्कूल के पूर्व प्रधानाध्यापक उमेश चंद्र दास के नाम पर है। मंदिर में प्रतिष्ठित मां सरस्वती की चार फुट ऊंची प्रतिमा श्वेत पत्थर से निर्मित है, जिसे उमेश चंद्र दास के पुत्र रणेश चंद्र दास ने विशेष रूप से जयपुर से मंगवाया था। हंस पर विराजमान और हाथ में वीणा धारण किए हुए मां ‘महाश्वेता’ का यह रूप अत्यंत मनमोहक है।
इस मंदिर की सबसे विशिष्ट परंपरा ‘108 मिट्टी के पात्र’ हैं। सरस्वती पूजा के दिन देवी को 108 मिट्टी के सकोरों में बताशा और फल अर्पित किए जाते हैं। मंदिर के स्थापना काल से शुरू हुई यह रीत आज एक सदी बाद भी अपरिवर्तित है। वसंत पंचमी के अवसर पर पूरे मंदिर को बसंती रंग की आभा से सजाया जाता है, जहां छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक का तांता लगा रहता है।
कोलकाता में वायु प्रदूषण पर निगम की पहल काफी नहीं, मानते हैं पर्यावरणविद्
कोलकाता। कोलकाता में लगातार बढ़ते वायु प्रदूषण पर अंकुश लगाने के लिए कोलकाता नगर निगम (केएमसी) द्वारा उठाए गए कदमों को पर्यावरणविदों ने अपर्याप्त करार दिया है। कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा प्रदूषण के मुद्दे पर स्वत: संज्ञान लिए जाने के एक दिन बाद मेयर फिरहाद हकीम ने शहर के सभी थानों और ट्रैफिक गार्ड को सक्रिय भूमिका निभाने का निर्देश दिया था। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि ये प्रयास “बहुत कम और बहुत देर से” किए गए हैं। पर्यावरणविदों का कहना है कि कोलकाता लंबे समय से गंभीर वायु प्रदूषण की समस्या से जूझ रहा है, लेकिन कई आवश्यक उपायों को अब तक सख्ती से लागू नहीं किया गया। बुधवार को मेयर फिरहाद हकीम ने नगर निगम मुख्यालय में एक उच्चस्तरीय बैठक की अध्यक्षता की थी, जिसमें पर्यावरण विभाग और उद्यान विभाग के प्रभारी मेयर-इन-काउंसिल सदस्य, कोलकाता पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी तथा विभिन्न सरकारी और निजी एजेंसियों के प्रतिनिधि शामिल हुए। हालांकि, निगम सूत्रों के अनुसार, इस महत्वपूर्ण बैठक में राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का कोई प्रतिनिधि मौजूद नहीं था। बैठक में मेयर ने खुले में आग जलाने, वाहनों से निकलने वाले धुएं, सूखी पत्तियों और लकड़ी जलाने जैसी गतिविधियों पर सख्ती से नियंत्रण के निर्देश दिए। उन्होंने निर्माण स्थलों को घेरने, धूल अधिक उडऩे वाले इलाकों में नियमित रूप से पानी का छिडक़ाव करने और निर्माण कार्यों से उत्पन्न मलबे को सडक़ों पर जमा न होने देने पर भी जोर दिया। मेयर ने विक्टोरिया मेमोरियल के आसपास रेल विकास निगम लिमिटेड (आरवीएनएल) के निर्माण कार्यों के दौरान धूल नियंत्रण के लिए विशेष सतर्कता बरतने को कहा। साथ ही यह भी निर्णय लिया गया कि मेट्रो निर्माण स्थलों को हरे जाल (ग्रीन नेट) से ढका जाएगा और पर्याप्त पानी का छिडक़ाव अनिवार्य होगा। पुराने और प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों, खासकर काला धुआं छोडऩे वाले डीजल वाहनों पर निगरानी बढ़ाने के निर्देश भी दिए गए। मेयर ने कहा कि सडक़ों पर पड़े निर्माण मलबे को तेजी से हटाने के लिए विभागों के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत है। उन्होंने यह भी निर्देश दिया कि यदि किसी निर्माण स्थल पर नियमों का पालन नहीं किया गया तो कार्य रोक दिया जाएगा। इसके अलावा, शहर के विभिन्न हिस्सों में, खासकर सडक़ों पर, दिन में कम से कम 16 घंटे दो पालियों में स्प्रिंकलर और मिस्ट कैनन के जरिए पानी का छिडक़ाव किया जाएगा। पर्यावरणविद और ग्रीन टेक्नोलॉजिस्ट सोमेंद्र मोहन घोष ने कहा कि कोलकाता के लिए खराब वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) की स्थिति में ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (ग्रैप) को तत्काल लागू करना समय की मांग है। उन्होंने बताया कि डीजल वाहनों से निकलने वाला धुआं, कचरा जलाना और निर्माण से उडऩे वाली धूल शहर में प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं। जनवरी 2026 में कोलकाता में एक्यूआई 314 तक पहुंचने की बात भी सामने आई है, जो गंभीर श्रेणी में आता है। उन्होंने यह भी चिंता जताई कि दक्षिण कोलकाता के पर्यावरण-संवेदनशील रवींद्र सरोवर क्षेत्र में झील के किनारे खुले कचरा डंप से विषैले धूल कण हवा में फैल रहे हैं। साथ ही, सडक़ किनारे ठेलों और दुकानों में स्वच्छ ईंधन जैसे एलपीजी या विद्युत और सौर ऊर्जा आधारित उपकरणों के उपयोग पर जोर दिया गया। विक्टोरिया मेमोरियल जैसे ईको-सेंसिटिव जोन में डीजल वाहनों के प्रवेश पर रोक लगाने की भी मांग की गई। गौरतलब है कि, 19 जनवरी को कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सुजय पाल की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने पश्चिम बंगाल, विशेषकर कोलकाता में बढ़ते प्रदूषण पर स्वत: संज्ञान लिया था। इस मामले में एक स्वत: जनहित याचिका दर्ज की गई है, जिसे पहले से दायर दो अन्य जनहित याचिकाओं के साथ जोड़ा गया है। इस पर अगली सुनवाई 28 जनवरी को होगी।
एसएससी ने जारी की उच्च माध्यमिक शिक्षकों की अंतिम मेधा सूची
कोलकाता । पश्चिम बंगाल के हजारों शिक्षित युवाओं के लंबे समय से चले आ रहे इंतज़ार का अंत करते हुए स्कूल सेवा आयोग (एसएससी) ने बुधवार देर शाम उच्च माध्यमिक (कक्षा 11वीं–12वीं) के लिए शिक्षक नियुक्ति की अंतिम मेधा सूची जारी कर दी। आयोग के अनुसार, इस सूची में कुल लगभग 18 हजार 900 अभ्यर्थियों के नाम शामिल हैं, जिनमें से 12 हजार 445 रिक्त पदों पर शिक्षकों की नियुक्ति की जाएगी। आयोग ने इस बार नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता बरतते हुए पैनल, प्रतीक्षा सूची (वेटिंग लिस्ट) के साथ-साथ असफल अभ्यर्थियों की सूची भी सार्वजनिक की है। उल्लेखनीय है कि 11वीं–12वीं श्रेणी के 35 विषयों में कुल 12 हजार 445 रिक्तियां घोषित की गई थीं। इस नियुक्ति प्रक्रिया के तहत पहले चरण में 19 हजार 921 अभ्यर्थियों को बुलाया गया था। बाद में उच्च न्यायालय के निर्देश पर 156 अन्य अभ्यर्थियों को भी दस्तावेज़ सत्यापन के लिए आमंत्रित किया गया। इस प्रकार कुल 20 हजार 077 अभ्यर्थी इस प्रक्रिया में शामिल हुए। दस्तावेज़ सत्यापन की प्रक्रिया 18 नवंबर से चार दिसंबर तक चली। दस्तावेज़ सत्यापन के दौरान 1 हजार 287 अभ्यर्थियों की उम्मीदवारी निरस्त कर दी गई। आयोग सूत्रों के अनुसार, इसके पीछे मुख्य कारण आयु सीमा, जाति प्रमाण पत्र और शैक्षणिक योग्यता से संबंधित विसंगतियां रहीं। इसके अतिरिक्त, सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार कक्षा नौवीं–दसवीं और शिक्षणेतर कर्मचारियों की नियुक्ति में अनियमितताओं के कारण ‘दागी’ करार दिए गए 269 अभ्यर्थियों को भी सूची से बाहर किया गया है। साक्षात्कार के पश्चात 303 अन्य अभ्यर्थियों के नाम भी हटाए गए हैं। अब अभ्यर्थियों के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि नियुक्ति के लिए परामर्श (काउंसलिंग) प्रक्रिया कब से शुरू होगी। आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि गुरुवार से सोमवार तक राजकीय अवकाश है। ऐसे में 27 जनवरी, मंगलवार को कार्यालय खुलने के बाद ही परामर्श तिथियों की आधिकारिक घोषणा की जाएगी। हालांकि, विकास भवन के सूत्रों का संकेत है कि आगामी विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए इसी माह के अंत तक काउंसलिंग प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। गौरतलब है कि तीन अप्रैल को सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर राज्य में लगभग 26 हजार शिक्षकों और शिक्षणेतर कर्मचारियों की नियुक्तियां रद्द कर दी गई थीं। इसके बाद नए सिरे से परीक्षा और चयन प्रक्रिया शुरू की गई। वर्तमान सूची को लेकर भी विवाद सामने आए हैं। कई अभ्यर्थियों का आरोप है कि ‘योग्य’ और ‘कार्यरत’ शिक्षकों को अनुभव के 10 अंक दिए जाने के बावजूद अनेक पात्र उम्मीदवार अंतिम सूची से बाहर रह गए हैं या उन्हें प्रतीक्षा सूची में डाल दिया गया है।
नूतन ऊर्जा और ऊष्मा का संचरण करती है ‘वसंतपंचमी’
वसंतपंचमी (२३ जनवरी) पर विशेष
-आचार्य पं. पृथ्वीनाथ पाण्डेय
वसंत ऋतु की मस्ती और उल्लास के क्षण में वसंतपंचमी का पर्व मनाया जाता है। यह पर्व मानव-हृदय मे नूतन ऊर्जा और ऊष्मा का संचरण करता है। सरस्वती की आराधना इस पर्व की विशेषता है। वस्तुत: सरस्वती ‘कला’ और ‘साहित्य’ की देवी हैं, जिनका भारतीय संस्कृति में शीर्ष स्थान है। हमारे पौराणिक ग्रन्थों में सरस्वती ‘नागेश्वरी’, ‘भारती’, ‘शारदा’, ‘हंसवाहिनी’, ‘वीणावादिनी’ इत्यादिक नामों से विश्रुत हैं तथा अत्यन्त विस्तारपूर्वक उनकी महिमा का वर्णन भी किया गया है। इसी आधार पर देश के विभिन्न भू-भागों में वसंतपंचमी के अलौकिक अवसर पर माँ शारदा का अर्चन-पूजन-स्तवन अतीव श्रद्धापूर्वक किया जाता है। वसंतपंचमी का पर्व भगवती सरस्वती को समर्पित रहता है।
अब आइए! ‘वसंतपंचमी’ का व्याकरणिक ज्ञान प्राप्त करें। वसंतपंचमी में दो शब्द हैं :– ‘वसंत’ और ‘पंचमी’। हम पहले ‘वसंत’ शब्द को समझेँगे। यह ‘वस्’ धातु का शब्द है, जिसमे ‘झच्’ प्रत्यय जुड़ा हुआ है। इस प्रकार ‘वसंत’ शब्द का सर्जन होता है। हेमन्त और ग्रीष्म के मध्य की ऋतु ‘वसंत’ है। अब समझते हैं, ‘पंचमी’ को। पंचम शब्द मे ‘ङीष्’ प्रत्यय के जुड़ने से ‘पंचमी’ शब्द की रचना होती है। चान्द्रमास के प्रत्येक पक्ष की पाँचवीं तिथि ‘पंचमी’ कहलाती है। इस प्रकार ‘वसंतपंचमी’ का अर्थ हुआ- ‘माघमास की शुक्लपंचमी’। इसे ‘श्रीपंचमी’ भी कहा गया है। यदि आप ‘वसंतपंचमी’ को अलग-अलग करके ‘वसंत पंचमी’ लिखते हैं तो आपका लेखन अशुद्ध माना जायेगा। आप इसे शुद्धतापूर्वक दो प्रकार से लिख सकते हैं :– (१) वसंतपंचमी (२) वसंत-पंचमी।
‘वसंतपंचमी’ पर्व-आयोजन के मूल में एक मोहक कथा है। आप भी श्रवण करें :–
जब सृष्टि का आरम्भ होने का समय आ गया था तब भगवान् विष्णु ने ब्रह्मा को अपने पास बुलाया और उन्हें आदेश किया था- आप मनुष्य-योनि की रचना आरम्भ करें। ब्रह्मा ने भगवान् विष्णु का आदेश ग्रहण करने के पश्चात् मनुष्य-योनि की रचना की थी; परन्तु ब्रह्मा अपनी उस रचना से संतुष्ट नहीं थे। वे भगवान् विष्णु के पास पहुँचे और उनसे पुन: रचना करने के लिए अनुमति माँगी थी। विष्णु ने अपनी अनुमति दे दी थी। वे अपने लोक ‘ब्रह्मलोक’ लौट आये। अब वे सृष्टिरचना-प्रक्रिया से जुड़ गये। उन्होंने अपने कमण्डल से जल निकालकर उसे पृथ्वी पर छिड़क दिया था, जिसके कारण पृथ्वी में प्रतिक्रिया होने लगी, फलस्वरूप पृथ्वी पर कम्पन होने लगा तथा देखते-ही-देखते, एक अद्भुत शक्ति प्रकट हो गयी, जिसकी चार भुजाएँ थीं, जो सुदर्शना थी। उस चतुर्भुजी देवी के एक हाथ में वीणा और दूजा हाथ वर देने की मुद्रा में था। उनके अन्य दो हाथों में पुस्तक और माला थी। उस चतुर्भुजी देवी ने अपने प्रकट होते ही वीणा का सुमधुर झंकार किया था, जिससे संसार के समस्त जीवधारियों को वाणी प्राप्त हो गयी थी। उस प्रभाव का अनुभव करते ही, ब्रह्मा ने उस देवी का ‘वाक्देवी’/’वाग्देवी’/’वाणी की देवी सरस्वती’ का नामकरण किया था।
माँ सरस्वती की सर्वप्रथम आराधना करके ‘सरस्वती-पूजन’ का समारम्भ श्री कृष्ण ने किया था। इसके लिए सिर पर मुकुट, गले में वैजयन्तीमाला, हाथों में मुरली धारण करते हुए, उन्होंने सर्वप्रथम देवी सरस्वती की अभ्यर्थना की थी।
‘ब्रह्मवैवर्तपुराण’ के ‘प्रकृति- खण्ड’ में कहा गया है कि श्री कृष्ण द्वारा पूजित होने पर माँ सरस्वती समस्त लोक मे सबके द्वारा पूजी जायेंगी। इसी अवसर पर श्री कृष्ण ने सरस्वती को यह वर दिया था– हे सरस्वती! अब तुम्हारी पूजा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में प्रत्येक माघमास की शुक्लपंचमी की तिथि से समारम्भ हो जायेगी, जो यही विद्यारम्भ की तिथि भी कहलायेगी।
वास्तव में, सरस्वती जलदेवी हैं। सरस्वती नदी के नाम पर ही उनका उल्लेख किया जाता है। उनका जल हिमालय से निर्गत होता है, जो दक्षिण-पूर्व प्रवहमानता के साथ तीर्थराज प्रयाग-स्थित गंगा-यमुना के साथ संगम कर, ‘त्रिवेणी’ के नाम से अभिहित होने लगता है। सरस्वती को ‘वाग्देवी’ और ‘ज्ञानदेवी’ की संज्ञा से भी विभूषित किया गया है। उल्लेखनीय है कि प्राचीनकाल में इसी सारस्वत अवसर पर गुरुकुलों और आश्रमों के स्नातकों के ‘दीक्षान्त-समारोह’ आयोजित किये जाते थे।
वसंत को ‘ऋतुराज’ भी कहा जाता है। यों तो सिद्धान्तत: वसंत ऋतु तीन महीने की होती है; तापमान सामान्य रहता है; न तो अधिक शीत की ठिठुरन और न ही अधिक ग्रीष्म की तपन।
फाल्गुन (‘फागुन’ का तत्सम शब्द)-मास है; शिशिर ऋतु का अन्त हो रहा है। वह शीत, जिसने क्या मनुष्य, पशु, पक्षी, पौधे-पेड़; अर्थात् समस्त जड़-चेतनजगत् मे अपने तीक्ष्ण प्रहारों से ‘ठिठुरन’ ला दी थी, अब वही आतंकी शीत अन्तिम श्वास ले रहा है। हवा में गरमाहट आ गयी है। वसंत का आगमन हो रहा है। उसके स्वागत और अभिनन्दन के लिए लताओं और वृक्षों ने नूतन परिधान धारण कर लिये हैं। सरसों वासंती साड़ी पहन इतरा रही है; इठला रही है तथा वसुधा पर सर्वत्र बिछी हरीतिमा पर अठखेलियाँ खेल रही है। ऐसा प्रतीत होता है, मानो क्षितिज वसुन्धरा के साथ संवाद करने और अभिरम्भ (भींचकर गले लगाने के लिए उद्यत) करने के लिए मचल हो उठा हो; नभ में विहगवृन्द उन्मुक्त भाव के साथ अपने वक्षप्रान्त को लहरा-लहराकर यों उड़ान भर रहे हैं, मानो अवनि और अम्बर-तल में स्वच्छ चाँदनी सम्पूर्ण आभा और प्रभा के साथ अपनी समुपस्थिति अंकित करा रही हो; पक्षियोँ का कलरव यों प्रतीत होता है, मानो उनका वृन्द (समूह) समवेत स्वर मे ‘स्वागत-गान कर रहा हो; भौंरे विरुदावली गुनगुना रहे हैं; बौर की सम्पन्नता से आम की डालियाँ विनम्रतापूर्वक नतमस्तक हो रही हैं; वहीं पुष्पवाटिका मे रंग-विरंगे पुष्पों से सुशोभित पौधे यत्र-तत्र-सर्वत्र अपना सौरभ बिखेर रहे हैं। मन-प्राण को सम्मोहित करनेवाले ऐसे प्रफुल्ल वातावरण मे कुसुमाकर ‘वसंत’ का पादप्रक्षेप (पदार्पण) होता है।
वसंतऋतु में प्रकृति अपना नव शृंगार करती है। रंग-विरंगे पुष्पोँ से अलंकृत उसका कोमल शरीर दर्शकगण को मन्त्रमुग्ध कर लेता है। ऐसे वातावरण की सृष्टि होती है, मानो प्रकृति ‘नव वधू’-सी प्रतीत हो रही हो, जिससे प्रेरित होकर ही कोकिल कूजती है; भ्रमर गुनगुनाते हैं; अन्य पक्षी कलरव कर, उसका यशोगान करते हैं तथा मानव रागरंग और और वसंत की मादक गन्ध से मस्त हो जाते हैं। मस्ती के ऐसे ही क्षण मे ‘फाग’ का स्वर स्वत: फूट पड़ता है।
सृष्टि-सौन्दर्य की झाँकी वनो, उपवनो, पर्वतीय क्षेत्रों तथा ग्राम्यांचलों में ही देखने को मिलती है, जहाँ प्रकृति एवं निसर्ग के मनोहारी रूप के दर्शन होते हैं।
सुबह-शाम खेतों की ओर निकल आइए, आपको सरसों के पीले-पीले फूल, हवा मे लहराती जौ-गेहूँ की बालियाँ, छीमियाँ/छेमियाँ तथा श्वेत-नीले फूलोँ से लदे और धरती पर फैले हुए पौधे आपका मन मोह लेँगे और आम्र-मंजरियाँ अपनी सुगन्ध से आपको सम्मोहित कर लेंगी। नगरों में ऐसे मोहक परिदृश्य से नगरवासी वंचित रहते हैं। वसंत की बहार का वास्तविक आनन्द तो पर्वतीय और ग्रामीणजन ही ले पाते हैं।
वसंत के आगमन का प्रभाव प्रकृति पर ही नहीं, मानव के स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। वसंतऋतु में प्रात: उन्मुक्त और स्वच्छ हवा मे टहलना, स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद होता है। इससे पाचनशक्ति मे वृद्धि होती है और शरीर नीरोग रहता है। चूँकि वसंतऋतु मे वायु विशुद्ध और सुगन्ध से सराबोर रहती है इसलिए उसमे श्वास लेने से फेफड़ों मे किसी प्रकार के रोग होने की सम्भावना जाती रहती है। चारों ओर हर्ष और उल्लास का वातावरण होने से मन उत्साह से भरा रहता है; आलस्य पास फटकने नहीं पाता। इस प्रकार वसंतऋतु का आगमन मानव के लिए एक ईश्वरीय वरदान की भाँति है।
जो लोग ‘वसंतऋतु की उपयोगिता और महत्ता को मात्र हिन्दू-सम्प्रदाय में देखते-पाते हैं, उन्हें अपना दृष्टि-विस्तार करना होगा। सूफ़ी-सम्प्रदाय के धर्माचार्योँ ने भारत के मुसलमानों के मध्य वसंतऋतु की महिमा का मण्डन किया है। मुग़ल-काल से ही सूफ़ीजन के बहुचर्चित देव-उपासनास्थलों में वसंतपर्व की महत्ता को रेखांकित किया गया है, जिसका बोध करने के लिए ‘निज़ाम औलिया का वसंत’, ‘ख़्वाजा बख़्तियार काकी का वसंत’, ‘खुसरो का वसन्त’ इत्यादिक का अनुशीलन किया जा सकता है। अमीर खुसरो और निज़ामुद्दीन औलिया गीत-संगीत के साथ वसंतऋतु के प्रति आस्थावान् थे। सूफ़ी कवि खुसरो स्वरचित गीत-गायन करते थे :–
“आज वसंत मना ले सुहागन, आज वसंत मना ले। अंजन-मंजन कर पिया मोरी, लम्बे नेहर लगा ले।”
बांग्लादेश मे बंगाली कैलेण्डर के अनुसार, वसंतऋतु (बोशोन्तो उत्सोब) के प्रथम दिन बंगाली मास फाल्गुन का आयोजन किया जाता है और पश्चिम बंगाल में पारिवारिक उत्सव, मेला इत्यादिक आयोजित किया जाता है। पाकिस्तान मे वसंत पर्व सीमित रूप में मनाया जाता है। वहाँ का जनमानस इसी पर्व को ‘जश्ने बहाराँ’ के नाम से लगभग एक माह तक मनाता है। लाहौर और पंजाब में वसंत का उत्साह देखते ही बनता है। लाहौर में ‘वसंत-मेला’ का आयोजन धूमधाम के साथ किया जाता है। वहाँ के भारतीय कालूराम ने अट्ठारहवीँ शताब्दी के उस भारतीय बलिदानी की पुण्य स्मृति में वसंतपर्व का आयोजन समारम्भ किया था, जिसने इस्लाम धर्म स्वीकार करने से अस्वीकार कर दिया था। राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत उस वीर सुपूत का नाम ‘हक़ीक़त राय’ था। महाराजा रणजीत सिंह लाहौर में इसी अवसर पर कई उत्सव आयोजित करते थे; पतंगबाज़ी भी होती थी। पंजाबत प्रान्त में भी ‘वसंतपंचमी’ का हर्षोल्लास के साथ आयोजन किया जाता था। होलिकोत्सव का आरम्भ भी इसी अवसर पर होता है। भारतीय गाँवों मे सांस्कृतिक वातावरण का सर्जन होने लगता है; ढोलक पर थाप पड़ने लगती है। सम्पूर्ण वातावरण हर्ष और उल्लास से भर जाता है।
ऋतुराज वसंत वस्तुत: धरती पर भगवान् का प्रतिनिधि बनकर आता है। उसके साम्राज्य मे छोटे-बड़े, निर्धन-धनी प्रफुल्ल रहते हैं। वह जन-जन में नव कृति की उमंग भरता है। वह ऐसा उदार और कृपालु राजा है, जो जन-कल्याण के लिए अपनी सम्पूर्ण सम्पदा और विभूति जन-जन पर न्योछावर कर देता है। वह प्रतिवर्ष हमसे कुछ लेने के लिए नहीँ, अपितु देने के लिए ही आता है। ऐसे पर्व की जय हो, जो जड़-चेतन को अपने आगमन से प्रमुदित करता रहता है।
(लेखक, व्याकरणवेत्ता एवं भाषाविज्ञानी हैं।)
गुणवत्ता परीक्षण में फेल हुए 45 दवाओं के बैच
– 5 प्रमुख कंपनियां भी शामिल
कोलकाता । बंगाल स्वास्थ्य विभाग ने हाल ही में राज्य में दवाओं की गुणवत्ता को लेकर एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट जारी की है, जिसने चिकित्सा जगत और आम जनता के बीच चिंता बढ़ा दी है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी की गई ताजा सूची के अनुसार, विभिन्न कंपनियों द्वारा निर्मित दवाओं के 45 विशिष्ट बैच गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतर पाए हैं। इस सूची में राज्य की पांच प्रमुख फार्मास्युटिकल कंपनियों के नाम भी शामिल हैं, जो इस पूरे मामले को और अधिक गंभीर बनाता है। इस सूची में सबसे चौंकाने वाला नाम ‘पश्चिम बंगाल फार्मास्युटिकल्स’ का है, जिसके ‘रिंगर्स लैक्टेट सलाइन’ के एक विशेष बैच (03बी3911) को गुवाहाटी की एक लैब ने परीक्षण के बाद असुरक्षित घोषित किया है। गौरतलब है कि पिछले साल भी इसी कंपनी के सलाइन को लेकर काफी विवाद हुआ था, जिसके बाद सरकार ने इसके उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया था। इस बार भी दिसंबर में लिए गए नमूनों की जांच के बाद विभाग ने इसे फिर से विफल पाया हैराज्य की अन्य कंपनियों में हावड़ा की ‘लाइफ फार्मास्युटिकल्स’ का क्रोमोस्टेट इंजेक्शन, जगाछा स्थित ‘डायमंड ड्रग्स’ का एल्युमीनियम हाइड्रोक्साइड जेल, कोलकाता की ‘सनी इंडस्ट्रीज’ का पोटेशियम क्लोराइड और ‘कैपलेट इंडिया’ का ओआरएस (ओआरएस) घोल भी मानकों को पूरा करने में असमर्थ रहा। इन दवाओं के नमूनों की जांच कोलकाता की विभिन्न प्रयोगशालाओं में की गई थी। स्वास्थ्य विभाग ने केवल बंगाल ही नहीं, बल्कि गुजरात, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और उत्तराखंड की कंपनियों द्वारा निर्मित एंटीबायोटिक्स और कफ सीरप जैसे कई उत्पादों के विशिष्ट बैचों को भी इस सूची में शामिल किया है। विभाग ने स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि इन चिन्हित बैचों की दवाओं का उपयोग तुरंत बंद कर दिया जाए। साथ ही, संबंधित कंपनियों और वितरकों को आदेश दिया गया है कि वे बाजार में मौजूद इन दवाओं के स्टाक को अविलंब वापस लें (रिकॉल करें)। सरकार के इस कड़े रुख का उद्देश्य मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और दवाओं के निर्माण में बरती जा रही लापरवाही पर लगाम लगाना है।
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पाकिस्तान में 2.5 करोड़ बच्चे स्कूल से बाहर
इस्लामाबाद। पाकिस्तान के इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल एंड पॉलिसी साइंसेज की ताजा रिपोर्ट ने संघीय सरकार की शिक्षा आपात नीति की पोल खो दी है।रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 2.5 करोड़ ( 25 मिलियन) बच्चे अभी भी स्कूल से बाहर हैं। देश में शिक्षा पर कुल खर्च 5 खरब (500 बिलियन रुपये) तक पहुंच गया है। इस खर्च का बड़ा हिस्सा अब सरकार के बजाय आम पाकिस्तानी परिवार उठा रहे हैं। दुनिया न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल एंड पॉलिसी साइंसेज ने कहा कि देश के इतिहास में यह पहली बार है कि शिक्षा पर परिवारों का खर्च सरकार के शिक्षा बजट से ज्यादा हो गया है। रिपोर्ट के 15वें संस्करण के अनुसार, 25 मिलियन से ज्यादा बच्चे शिक्षा से वंचित हैं। आंकड़े बताते हैं कि जनता शिक्षा पर 280 अरब रुपये खर्च कर रही है, जबकि सरकारी निवेश घटकर 220 अरब रुपये हो गया है। नतीजतन, शिक्षा का 56 प्रतिशत वित्तीय बोझ जनता उठा रही है और सिर्फ 44 प्रतिशत सरकार उठा रही है। माता-पिता प्राइवेट स्कूलों की फीस पर 1,31,0 अरब रुपये , कोचिंग और ट्यूशन पर 613 अरब रुपये और शिक्षा से जुड़े अन्य निजी खर्चों पर 878 अरब रुपये खर्च करने के लिए मजबूर हैं। इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल एंड पॉलिसी साइंसेज के कार्यकारी निदेश डॉ. सलमान हुमायूं ने कहा कि जब शिक्षा पर परिवारों का खर्च सरकारी निवेश से ज्यादा हो जाता है, तो यह एक गंभीर समानता संकट का संकेत देता है। विश्व बैंक की वरिष्ठ शिक्षा विशेषज्ञ अजा फारुख के अनुसार, प्राइवेट स्कूलों का बढ़ता चलन इस बात का सबूत है कि परिवार सरकारी शिक्षा के दायरे से बाहर निकलना पसंद कर रहे हैं।
राज्य में सिविल सेवा के 140 पदों पर होगी नियुक्ति, अधिसूचना जारी
कोलकाता। पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश सरकार ने डब्ल्यूबीसीएस (पश्चिम बंगाल सिविल सेवा) अधिकारियों को बड़ी सौगात दी है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अधिकारियों से किया गया अपना वादा निभाते हुए राज्य में कुल 140 अतिरिक्त पदों के सृजन को मंजूरी दी है। इस संबंध में बुधवार को नवान्न से आधिकारिक अधिसूचना जारी की गई। राज्य के कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभाग के सचिव ने “राज्यपाल के आदेशानुसार” जारी अधिसूचना में बताया कि इस फैसले के तहत विशेष सचिव स्तर के 40 नए पद और संयुक्त सचिव स्तर के 100 नए पद बनाए गए हैं। नवान्न सूत्रों के अनुसार, इस निर्णय से डब्ल्यूबीसीएस (कार्यपालिका) अधिकारियों के एक बड़े वर्ग को पदोन्नति और वरिष्ठ प्रशासनिक जिम्मेदारियां मिलने का अवसर मिलेगा। लंबे समय से अधिकारी संगठन अतिरिक्त पदों के सृजन की मांग कर रहे थे। उल्लेखनीय है कि, डब्ल्यूबीसीएस अधिकारियों ने पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को पत्र लिखकर अपनी मांग रखी थी, जिस पर मुख्यमंत्री ने लिखित रूप से आश्वासन दिया था। विधानसभा चुनाव से पहले इस आश्वासन के अमल में आने को प्रशासनिक हलकों में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि वरिष्ठ पदों की संख्या बढ़ने से राज्य के प्रशासनिक ढांचे को मजबूती मिलेगी और अनुभवी अधिकारियों की सेवाओं का अधिक प्रभावी उपयोग सुनिश्चित किया जा सकेगा।
मकर संक्रान्ति पर आयोजित हुई अंतरंग काव्य गोष्ठी
कोलकाता। साहित्य और संस्कृति की राजधानी कही जाने वाली कोलकाता नगरी में यूं तो संस्थाओं की कमी नहीं है जो नियमित कार्यक्रम करवाती रहती हैं, इसके अलावा कुछ ऐसे साहित्य प्रेमी भी रहे हैं जो अपने आवास पर इस तरह के आयोजन चुनिंदा साहित्यकारों को लेकर किया करते थे। इधर हाल के वर्षों में रचनाकार के संस्थापक सुरेश चौधरी अपने आवास पर ऐसे आयोजन करते रहते हैं। उर्वशी श्रीवास्तव ने सबसे पहले अपने बचपन से लेकर अब तक के साहित्यिक सफर पर चर्चा की और फिर काव्य की रसधार में सभी ने मकर स्नान किया, जिसमें शामिल रहे- सर्वश्री प्रमोद शाह नफ़ीस, सुरेश चौधरी, विमला पोद्दार,रावेल पुष्प, मृदुला कोठारी, वसुंधरा मिश्रा,रचना सरन अन्य। इस तरह के अंतरंग आयोजन ने मकर संक्रान्ति को यादगार बना दिया।
पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी में पुस्तक मित्र कार्यक्रम
कोलकाता । पश्चिम बंग हिन्दी अकादमी, सूचना एवं संस्कृति विभाग, पश्चिम बंगाल सरकार के तत्वाधान में शुक्रवार 16 जनवरी 2025 को “पुस्तक मित्र” कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। पुस्तक मित्र श्रृंखला की यह पंचम कड़ी थी जिसकी चयनित पुस्तक थी प्रसिद्ध कवि, लेखक और विचारक सुरेश चौधरी ‘इन्दु’ जी का शोधपरक संकलन “भ्रम और भ्रांतियाँ”।इस पुस्तक में अनेक ऐसी हिंदू परंपराओं, जिन्हें हम रूढ़िवादिता या अंधविश्वास कहकर नकार देते हैं, उनसे संबंधित वैज्ञानिक तर्कों की व्याख्या और वर्षों से प्रसारित मिथकों की सत्यता भी आँकडों के साथ स्थापित की गई है।
पाठकों में पुस्तकों के प्रति जिज्ञासा जागृत करने के उद्देश्य से प्रारंभ की गई इस श्रृंखला का संयोजन और संचालन अकादमी की सदस्य रचना सरन और शुभा चूड़ीवाल करती हैं।
रचना सरन ने सभी अतिथियों का स्वागत कर कार्यक्रम प्रारम्भ किया। शुभा चूड़ीवाल ने विशेषज्ञों और लेखक का परिचय देते हुए कार्यक्रम की रूपरेखा स्पष्ट की। अकादमी के वरिष्ठ सदस्य रावेल पुष्प जी ने उत्तरीय और माला प्रदान कर अतिथियों का अभिनन्दन किया। कवि आलोक चौधरी ने सुरेश चौधरी जी द्वारा रचित जगदम्बा स्तुति प्रस्तुत की। डॉ. शिप्रा मिश्रा जी ,मीतू कनोडिया जी और प्रणति ठाकुर जी ने पुस्तक के कुछ महत्वपूर्ण अंशों का पाठ किया। विशेषज्ञ के रूप में डॉक्टर वसुंधरा मिश्र जी और डॉक्टर शुभ्रा उपाध्याय जी उपस्थित थीं। डॉ वसुंधरा मिश्रा ने कहा कि यदि हम सहस्त्र वर्षों की परंपराओं को सही तरीके से समझते, तो दृश्य भिन्न होता।संपूर्ण वांग्मय को गलत धारणाओं पर रखा गया है।पुस्तक के सभी अध्यायों पर उन्होंने समीक्षात्मक टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह की बातें लिखना एक लेखक के लिए यह चुनौती भरा कार्य है । अपनी बात रखते हुए डॉक्टर शुभ्रा उपाध्याय ने कहा कि इतिहास में उतना सत्य नहीं होता जितना साहित्य में क्योंकि इतिहास लिखवाया जाता है और साहित्य स्वयं लिखा जाता है। उन्होंने इस पुस्तक को समसामयिक मुद्दों के चिंतन -अचिंतन की गंभीर नोटबुक बताया और कहा कि यह पुस्तक भारतीयता की खोज है। लेखक सुरेश चौधरी ने अकादमी के प्रति आभार प्रकट करते हुए बताया कि इस पुस्तक को लिखने के लिए उन्होंने 7वर्ष तक शोध तथा तथ्यों की पुनः पुष्टि की। उन्होंने पुस्तक में संकलित तथ्यों के संदर्भों के बारे में भी जानकारी दी। दर्शकों ने बहुत रुचि के साथ इस कार्यक्रम को सुना और अपनी जिज्ञासाओं को लेखक के समक्ष रखा। उनके प्रश्नों का सुरेश चौधरी ने विस्तार से जवाब दिया। कार्यक्रम के अंत में रावेल पुष्प सर ने धन्यवाद ज्ञापित करके आने वाले कार्यक्रमों की घोषणा की। हिंदी अकादमी की इस अनोखी साहित्यिक श्रृंखला को सभी ने सराहा।




