कोलकाता । अंतरराष्ट्रीय क्षत्रिय वीरांगना महासभा पश्चिम बंगाल की ओर से इको पार्क में आयोजित एक महत्वपूर्ण बैठक में संस्था की इस वर्ष की भावी योजनाओ की रूपरेखा तैयार की गयी। राज्य महासभा की अध्यक्ष और प्रख्यात गायिका-अभिनेत्री प्रतिभा सिंह ने बैठक की अध्यक्षता की। बैठक के निर्णयों की जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि इस वर्ष से विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देने वाले पांच व्यक्तियों को पश्चिम बंगाल की पांच महान हस्तियों के नाम पर सम्मान दिया जायेगा, जिनमें स्त्री-पुरुष दोनों का समावेश होगा। इन सम्मानों में बंकिम स्मृति बंगाल विभूति सम्मान शामिल होगा। यह सम्मान अब प्रतिवर्ष दिये जायेंगे। उन्होंने कहा कि सम्मान को महान विरासत से जोड़ना इसलिए महत्वपूर्ण है कि सम्मान पाने वाले को यह याद रहे कि उस पर और उत्कृष्ट कार्य को करने की जिम्मेदारी है। उन्हें भी भावी पीढ़ी के लिए प्रेरक बनाना होगा। बैठक में महासभा की प्रदेश महासचिव प्रतिमा सिंह, उपाध्यक्ष रीता सिंह, कोषाध्यक्ष पूजा सिंह, सचिव किरण सिंह, संगठन सचिव सुमन सिंह, कार्यकारिणी सदस्य कांति सिंह, बबिता सिंह, बालीगंज इकाई की अध्यक्ष रीता सिंह, काशीपुर इकाई की संरक्षक गीता सिंह, अध्यक्ष मीनू सिंह, उपाध्यक्ष ललिता सिंह, कोषाध्यक्ष संचिता सिंह, सचिव मीरा सिंह, जन सम्पर्क सचिव रीना सिंह, सोदपुर इकाई की अध्यक्ष सुनीता सिंह, महासचिव आशा सिंह तथा नारी शक्ति की सदस्याएं इंदु पाण्डेय व रंजना त्रिपाठी उपस्थित थीं।
साइना नेहवाल ने किया सातवें एकल रन का उद्घाटन
“फ्रेंड्स ऑफ ट्राइबल्स सोसाइटी” की यूथ विंग “एफटीएस युवा” द्वारा आयोजित
कोलकाता । फ्रेंड्स ऑफ़ ट्राइबल्स सोसाइटी की यूथ विंग एफटीएस युवा ने रविवार को कोलकाता के गोदरेज वाटरसाइड में अपने वार्षिक फ्लैगशिप इवेंट “एकल रन” का आयोजन किया। इस महत्वपूर्ण इवेंट में 5000 से ज्यादा प्रतिभागियों ने इस मैराथन में अपनी चुनी हुई कैटेगरी – 21किमी, 10किमी, 5किमी और 3 किमी की नॉन-टाइम्ड/फन रन के लिए दौड़ लगाई। इस रन में बड़ी संख्या में सभी उम्र के लोगों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। एकल रन का उद्घाटन साइना नेहवाल ने किया, जो ओलंपिक मेडल जीतने वाली पहली भारतीय बैडमिंटन प्लेयर हैं। इस मौके पर मौजूद अन्य सम्मानित हस्तियों में मुकेश, सीपी (विधाननगर पुलिस कमिश्नरेट), राहुल देव बोस, (अभिनेता), देबद्रिता बसु (अभिनेत्री), पायल मुखर्जी (अभिनेत्री) के साथ इस संगठन के सा ही सीनियर मेंबर्स में सज्जन बंसल, रमेश सरावगी, रूपा अग्रवाल, राकेश झुनझुवाला, बुलाकी दास मिमानी, मनोज मोदी, किशन केजरीवाल, महेंद्र अग्रवाल, प्रवीण अग्रवाल, सुभाष मुरारका, अनिल करिवाला, मनोज कुमार चेतानी, विकास पोद्दार, विनय चुघ के साथ अन्य कई जाने-माने लोग इस आयोजन में मौजूद थे। मीडिया से बात करते हुए एफटीएस युवा विंग के कोलकाता चैप्टर के प्रेसिडेंट ऋषभ सरावगी ने कहा, “एकल रन एक शक्तिशाली मूवमेंट बन गया है, जो फिटनेस को मकसद के साथ जोड़ता है। इस साल के एडिशन ने हमारे इस विश्वास को और पक्का किया है कि मिलकर किए गए प्रयास सार्थक बदलाव ला सकते हैं। आज उठाया गया हर कदम भारत के दूर-दराज के इलाकों में बच्चों को शिक्षित करने में योगदान देता है। हम इस प्रभावशाली यात्रा का हिस्सा बनने के लिए हर पार्टिसिपेंट, वॉलंटियर और सपोर्टर को धन्यवाद देते हैं। इस अवसर पर एकल रन के राष्ट्रीय समन्वयक गौरव बागला ने कहा, ओलंपिक पदक विजेता साइना नेहवाल द्वारा एकल रन के 7वें संस्करण का उद्घाटन करना, हम सभी के लिए बहुत गर्व और प्रेरणा का क्षण रहा है। उनकी उपस्थिति ने हजारों प्रतिभागियों में ऊर्जा भर दी और इस संदेश को खूबसूरती से पुष्ट किया कि खेल, अनुशासन और शिक्षा मिलकर सार्थक सामाजिक बदलाव ला सकते हैं।
भवानीपुर एडुकेशन सोसाइटी कॉलेज में उमंग 2025 में पहुंचे शान
-प्रथम सर्वश्रेष्ठ विजेता रहा भवानीपुर एडुकेशन सोसाइटी कॉलेज
कोलकाता । भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज में चार दिवसीय उमंग 2025 गत 25 दिसम्बर को आरम्भ हुआ।विभिन्न रोमांचक कार्यक्रमों की श्रृंखला के साथ मंच उत्साह और ऊर्जा से परिपूर्ण रहा। शुरुआत में ही वंदना और अर्चना के साथ शास्त्रीय नृत्य और शिव स्त्रोतों से कॉलेज की छात्राओं के समूह ने नृत्य प्रस्तुति दी ।वेस्टर्न ग्रुप डांस और आर्म रेसलिंग मैचों से लेकर स्पेल ज़ेल और अंताक्षरी प्रीलिम्स तक, ऊर्जा व्याप्त रही । उमंग वार्षिक महोत्सव दो दशकों से अधिक समय से सिर्फ एक कॉलेज उत्सव नहीं महोत्सव रहा है – यह भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज का धड़कता हुआ दिल रहा है, एक उत्सव जहां प्रतिभा जुनून से मिलती है और रचनात्मकता की कोई सीमा नहीं होती है। उत्साहवर्धन प्रदर्शन और इलेक्ट्रिक संगीत से लेकर प्रेरक विचारों और अनफ़िल्टर्ड आत्म-अभिव्यक्ति तक, उमंग युवा, एकता और असीमित कल्पना का प्रतीक बन गया है।
पिछले कुछ वर्षों में, इसने हजारों छात्रों को मंच पर आते, अपनी कहानियाँ सुनाते और अपने पीछे प्रेरणा की गूँज छोड़ते देखा है जो इसकी विरासत को आकार देती रही है। ट्रांसफ़ॉर्मेशन, वंडरलैंड, नॉस्टेल्जिया और मेज़ अमेज़ जैसे विषयों ने बदलते समय को प्रतिबिंबित किया है – हर साल उमंग की कालातीत यात्रा में एक नया अध्याय जुड़ रहा है। इस वर्ष की थीम, “प्राचीन ज्ञान… अभी भी सुना है?” हमें आगे बढ़ने के लिए पीछे मुड़कर देखने के लिए आमंत्रित करता है – इतिहास, दर्शन और संस्कृति में दबे शाश्वत सत्य को फिर से खोजने के लिए यह उस ज्ञान का जश्न मनाता है जो सदियों से आगे है, हमें याद दिलाता है कि इस तेज़ गति वाले डिजिटल युग में भी, अतीत की आवाज़ें अभी भी मार्गदर्शन, शक्ति और उद्देश्य को फुसफुसाती रहती हैं। उमंग 2025 का मंच वह जगह है जहां प्राचीन कहानियां आधुनिक दिमागों से मिलती हैं, जहां हर प्रदर्शन समय की प्रतिध्वनि है, और हर रचना विरासत और नवाचार के बीच एक पुल है। यह सिर्फ एक घटना नहीं है – यह एक जागृति है। क्योंकि बुद्धि कभी नहीं मरती – इसे बस दोबारा सुना जाता है। यह थीम कॉलेज के रेक्टर और डीन प्रो दिलीप शाह के मस्तिष्क की उपज है जो भारतीय परंपराओं और संस्कृति को समृद्ध करते रहे हैं।
थीम की भविष्यवादी अपील ने छात्रों को हमारे राष्ट्र को एक शताब्दी की ओर ले जाने की कल्पना करके उत्सव को एक अनूठा आयाम दिया। पूरे कोलकाता से लगभग 95 से अधिक कॉलेजों और 4000 प्रतिभागियों ने इस चार दिवसीय उत्सव में भाग लिया, जिसमें 90 से अधिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए थे। ये आयोजन छात्रों के लिए मेजबान कॉलेज के समान आनंद का हिस्सा बनने और महसूस करने के व्यापक अवसरों का प्रतिनिधित्व करते हैं। कार्यक्रम में प्रदर्शन कला, साहित्यिक कला, ललित कला, इनडोर और आउटडोर खेल, प्रबंधन कौशल, फैशन वॉक और वीडियो गेम जैसे विभिन्न क्षेत्रों से चुने गए थे।
कार्यक्रम की शुरुआत कॉलेज के प्रबंधन प्रो. दिलीप शाह (छात्र मामलों के डीन) द्वारा मंच पर अध्यक्ष श्री रजनीकांत दानी को बुलाने के साथ हुई; वरिष्ठ उपाध्यक्ष मिराज डी. शाह, शालिनी डी शाह,नलिनी पारेख; रेणुका भट्ट; प्रदीप सेठ;अमीषा पटेल, राजू भाई आदि मैनेजमेंट पदाधिकारीगण, रेक्टर और डीन प्रो दिलीप शाह और प्रो. मीनाक्षी चतुर्वेदी वाइस प्रिंसिपल प्रातःकालीन कॉमर्स सत्र की उपस्थिति में पारंपरिक घंटे को बजाकर उमंग 2025 की आधिकारिक शुरुआत की गई।
उमंग 2025 के दूसरे दिन, कॉलेज के विभिन्न हिस्सों में एक साथ बीस कार्यक्रम चल रहे थे जिसमें -वन एक्ट प्ले, एकांकी, स्ट्रीट बैटल, फैशन फ्लैक, फोटोग्राफी शूटिंग, उमंग आइडल, कर्म का खेल, फैशन, स्कल्पचर पेंटिंग, डॉर्ट्ज, टेबल टेनिस, बंगाली क्रिएटिव राइटिंग, बीट बॉक्सिंग, बैटलग्राउंड, मोबाइल इंडिया पैरोडी पार्लियामेंट, हिंदी क्रिएटिव राइटिंग, रचना मंथन मोनोक्रोम पेंटिंग आदि ।
उमंग के तीसरे दिन नुक्कड़ नाटक, ट्रेडिंग, अस्त्र और और ओरा, फोटोग्राफी, शायरी, डिबेट उमंग, स्टोन पेंटिंग, कैरम वार, इंस्ट्रूमेंट बैटल, कलरफुल कटकाऊट आदि विभिन्न कार्यक्रम निरंतरता में चल रहे थे।
चौथे दिन फोटोग्राफी, रेडियो प्ले, नॉन गैस कुकिंग, सोलो क्लासिकल डांस, अन्त्याक्षरी , रियल क्रिकेट 24, मिस उमंग, पजल पेंटिंग, रिदम एंड रिजोनेंस, रीमिक्स, वेस्टर्न बैंड, रंगोली, फोटोग्राफी, बॉलीवुड ग्रुप डांस और क्लोजिंग सेरेमनी हुई।अत्यधिक ऊर्जावान बैंड प्रदर्शन ने शाम को कॉलेज के माहौल को रंगीन और खुशनुमा बना दिया । छात्र छात्राओं ने जम कर डांस किया। ‘मि. और सुश्री उमंग’ की घोषणा की गई। कॉलेज में समापन समारोह के आखिरी दिन छात्र मामलों के डीन, प्रो. दिलीप शाह ने उमंग 2025 के समग्र विजेताओं की घोषणा की, जहां महत्वपूर्ण स्थान भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी ने हासिल किया। अंतिम लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि चौथा और अंतिम दिन सबसे जादुई रहा क्योंकि बहुत लोकप्रिय और मधुर गायक शान ने अपनी शानदार उपस्थिति से उमंग की शोभा बढ़ाई।इस अवसर पर स्टूडेंट ऑफ द ईयर’ का पुरस्कार दिया गया जो सभी क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा को रखता है।
शान यानी शांतनु मुखर्जी (जन्म 30 सितंबर 1972), जिन्हें पेशेवर रूप से शान के नाम से जाना जाता है, एक भारतीय पार्श्व गायक, संगीतकार, अभिनेता और टेलीविजन होस्ट हैं। वह मुख्यतः हिंदी , बंगाली , कन्नड़ और तेलुगु भाषा में गाने रिकॉर्ड करते हैं। शान (गायक) ने कई हिट बॉलीवुड फिल्मों के लिए गाने गाए , जैसे ‘कल हो ना हो’, ‘तारे ज़मीन पर’, ‘फना’, ‘ओम शांति ओम’, ‘3 इडियट्स’, ‘धूम’, ‘सलाम नमस्ते’, ‘हम तुम’, ‘दिल चाहता है’, और ‘सांवरिया’ (जिसके लिए उन्हें ‘जब से तेरे नैना’ गाने पर फिल्मफेयर अवार्ड मिला था)। गायन के अलावा, उन्होंने ‘दमन’ जैसी फिल्मों में अभिनय भी किया है और ‘सा रे ग म प’ जैसे टीवी शो होस्ट किए हैं। कॉलेज के लगभग 273 छात्र स्वयंसेवकों की एक टीम को शामिल किया, जिन्होंने छात्र मामलों के डीन, रेक्टर प्रोफेसर दिलीप शाह के मार्गदर्शन में पूरी टीम का प्रबंधन किया। डॉ. वसुंधरा मिश्र ने जानकारी देते हुए बताया कि ‘उमंग 2025 के चार दिनों में कलाकारों, नर्तकों, नाटककारों, फैशनपरस्तों और रचनात्मक प्रतिभाओं की भरमार देखने को मिली। सभी प्रतिभागियों को पुरस्कृत किया गया। स्टार उमंग 2025 श्रद्धा सिंह को मिला जिसमें ईवी स्कूटी दी गई ।भवानीपुर कॉलेज के सर्वश्रेष्ठ छात्र का खिताब ऋषि अग्रवाल को मिला जिन्होंने एकेडमी और कॉलेज के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए।
ऑल इंडिया एनसीसी बॉयज़ ट्रैकिंग कैंप 2025 में भवानीपुर कॉलेज एनसीसी कैडेट शामिल
कोलकाता । भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज के एनसीसी कैडेट सीसी प्रियांशु झा, पीओ सीडीटी आदित्य चौधरी और पीओ सीडीटी शग्निक मित्रा, भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज के तीसरे वर्ष के छात्र और 2 बंगाल नेवल यूनिट एनसीसी के कैडेटों ने ट्रेक में भाग लिया।एनसीसी लड़कों का ट्रैकिंग कैंप 3 अक्टूबर, 2025 को एनसीसी निदेशालय पश्चिम बंगाल और सिक्किम के कैडेटों के साथ अपनी आगे की यात्रा के लिए 0400 बजे सियालदह में इकट्ठा होने के साथ शुरू हुआ।। उत्तर बंगाल की राजसी सुंदरता और उत्तर-पूर्व के प्राकृतिक परिदृश्यों को देखने के बाद, दल 4 अक्टूबर को 1400 बजे सिलचर पहुंचा और मिजोरम विश्वविद्यालय, आइजोल के पास बेस कैंप के लिए रवाना हुआ, जहां विभिन्न निदेशालयों के कैडेट इकट्ठे हुए। पंजीकरण और टेंट आवंटन के बाद, कैंप कमांडेंट ने कैडेटों को ट्रैकिंग कार्यक्रम, सुरक्षा प्रोटोकॉल और कैंप अनुशासन के बारे में जानकारी दी। उद्घाटन समारोह शाम को आयोजित किया गया, जिसके बाद सांस्कृतिक आदान-प्रदान हुआ जिसने कैडेटों के बीच एकता और टीम भावना को मजबूत किया। शिविर में ट्रेक की एक श्रृंखला शामिल थी, जिसकी शुरुआत सोलोमन के मंदिर तक 8 किमी की यात्रा से हुई, जहाँ कैडेटों ने नेविगेशन और मानचित्र-पठन कौशल का अभ्यास किया। इसके बाद मिज़ोरम विश्वविद्यालय के चारों ओर 10 किमी की पदयात्रा की गई, जिससे सहनशक्ति, समन्वय, मार्ग निर्धारण और पर्यावरण जागरूकता में वृद्धि हुई। मुख्य आकर्षण रेइक पीक (1,460 मीटर) की चुनौतीपूर्ण चढ़ाई थी, जहां कैडेटों ने टीम वर्क और दृढ़ संकल्प का प्रदर्शन किया, जिसकी परिणति शिखर पर एनसीसी ध्वज फहराने में हुई। कैडेटों ने मिज़ो संस्कृति को समझने के लिए स्थानीय निवासियों के साथ बातचीत की, आइज़ॉल के स्थानीय बाजारों और डर्टलैंग हिल्स का दौरा किया, और खेल कौशल को बढ़ावा देने वाले एक अंतर-निदेशालय मैत्रीपूर्ण वॉलीबॉल मैच में भाग लिया।
समापन समारोह में एनसीसी निदेशालय (पूर्वोत्तर क्षेत्र) के गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे, और प्रमाण पत्र प्रदान किए गए। शिविर 13 अक्टूबर, 2025 को समाप्त हुआ, जिससे कैडेटों को अविस्मरणीय यादें, स्थायी मित्रता और अमूल्य ट्रैकिंग अनुभव मिला। सीसी प्रियांशु झा, पीओ सीडीटी आदित्य चौधरी और पीओ सीडीटी शग्निक मित्रा दल के साथ ट्रैकिंग किए
*एनसीसी लड़कों का ट्रैकिंग कैंप, आइज़वाल
विदेशी तैनाती शिविर (ओएसडी) – एक अंतर्राष्ट्रीय समुद्री अनुभव
ओवरसीज डिप्लॉयमेंट कैंप (ओएसडी) भारतीय तटरक्षक बल और भारतीय नौसेना के सहयोग से राष्ट्रीय कैडेट कोर (एनसीसी) के तहत आयोजित एक प्रतिष्ठित प्रशिक्षण कार्यक्रम है। यह चयनित कैडेटों को एक परिचालन नौसैनिक जहाज पर जीवन के वास्तविक समय का अनुभव प्राप्त करने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय जल पर भारत का प्रतिनिधित्व करने का अवसर प्रदान करता है। सीसी प्रियांशु झा और पीओ सीडीटी शग्निक मित्रा, द भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज के तीसरे वर्ष के छात्र और 2 बंगाल नेवल यूनिट एनसीसी के कैडेटों ने भारतीय तट रक्षक जहाज (आईसीजीएस) विग्रह पर विदेशी तैनाती में भाग लिया। तैनाती में 15 नवंबर 2025 से 21 दिसंबर 2025 तक थाईलैंड, इंडोनेशिया और मलेशिया में अंतरराष्ट्रीय बंदरगाह शामिल थे। विदेशी तैनाती शिविर का प्राथमिक उद्देश्य कैडेटों को वैश्विक समुद्री वातावरण और नौसैनिक परंपराओं से परिचित कराना है। शिविर का उद्देश्य भारत और मित्र राष्ट्रों के बीच सद्भावना और सहयोग को बढ़ावा देते हुए नेतृत्व कौशल, समुद्री जागरूकता और अंतर्राष्ट्रीय समझ को बढ़ाना है। पारंपरिक प्रशिक्षण शिविरों के विपरीत, ओएसडी जहाज की दिनचर्या और औपचारिक कर्तव्यों में सक्रिय भागीदारी के माध्यम से अनुभवात्मक शिक्षा पर जोर देता है। आईसीजीएस विग्रह ने एक अनुशासित और संरचित दिनचर्या का पालन किया। कैडेटों ने मॉर्निंग फॉल-इन, जहाज रखरखाव कर्तव्यों और सीमैनशिप, सीपीआर, एनबीसीडी, एएसडब्ल्यू और ब्रिज संचालन में पेशेवर प्रशिक्षण सत्रों में भाग लिया। रंग रक्षक कार्यों और भूमध्य रेखा क्रॉसिंग समारोह जैसी औपचारिक गतिविधियों ने नौसैनिक रीति-रिवाजों और टीम वर्क को मजबूत करते हुए प्रशिक्षण का एक अभिन्न अंग बनाया। तैनाती में फुकेत (थाईलैंड), जकार्ता (इंडोनेशिया), और पोर्ट क्लैंग और कुआलालंपुर (मलेशिया) में पोर्ट कॉल शामिल थे। प्रत्येक बंदरगाह पर, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में लगे कैडेटों ने स्थानीय सशस्त्र बलों के साथ बातचीत की, सामुदायिक आउटरीच गतिविधियों में भाग लिया और स्वतंत्रता अवधि का अनुभव किया जो स्थानीय संस्कृति और परंपराओं में अंतर्दृष्टि प्रदान करता था। विदेशी तैनाती शिविर एक परिवर्तनकारी अनुभव था जिसने अनुशासन, लचीलापन, नेतृत्व और सांस्कृतिक जागरूकता को बढ़ावा दिया। आईसीजीएस विग्रह पर भारत का प्रतिनिधित्व करना बेहद गर्व की बात थी। शिविर एनसीसी यात्रा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर बना हुआ है, जो भाग लेने वाले कैडेटों के व्यक्तिगत और व्यावसायिक विकास में सार्थक योगदान देता है।आईएनएस विग्रह पर भवानीपुर एडुकेशन सोसाइटी कॉलेज के सीसी प्रियांशु झा और पीओ सीडीटी शग्निक मित्रा ने सफलतापूर्वक अपना प्रशिक्षण संपन्न किया। अखिल भारतीय नौकायन रेगाटा 2025–भारतीय नौसेना के प्रमुख बुनियादी नाविक प्रशिक्षण प्रतिष्ठान, आईएनएस चिल्का में एनसीसी निदेशालय ओडिशा द्वारा अखिल भारतीय नौकायन रेगाटा 2025 का सफलतापूर्वक संचालन किया गया। छह कुशल नौकायन कैडेटों की एक टीम ने इस प्रतिष्ठित राष्ट्रीय स्तर की नौकायन चैंपियनशिप में पश्चिम बंगाल और सिक्किम निदेशालय का प्रतिनिधित्व किया। पीओ सीडीटी शग्निक मित्रा और पीओ सीडीटी अर्शी आलम, भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज के तीसरे वर्ष के छात्र और 2 बंगाल नेवल यूनिट एनसीसी के कैडेटों ने रेगाटा में भाग लिया, हावड़ा स्टेशन से वे बालूगांव के लिए रवाना हुए, जहां से उन्हें आईएनएस चिल्का ले जाया गया। आगमन पर, शिविर की औपचारिकताएँ पूरी की गईं और सभी भाग लेने वाले निदेशालयों के कैडेटों को आवंटित बैरकों में समायोजित किया गया। रेगाटा का प्रारंभिक चरण मध्यवर्ती नौकायन और जल कौशल प्रशिक्षण पर केंद्रित था। कैडेटों ने पानी पर कठोर सत्रों में हिस्सा लिया जिसमें हवा की दिशा में और नीचे की ओर नौकायन, बोया राउंडिंग, रेसिंग स्टार्ट और पाल ट्रिमिंग तकनीकें शामिल थीं। सुरक्षा नौकाओं के निरंतर समर्थन से सुरक्षा प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन किया गया। रेसिंग और रेसिंग सिग्नल के नियमों पर एक जानकारीपूर्ण व्याख्यान ने कैडेटों की तकनीकी समझ को और बढ़ाया। आधिकारिक रेगाटा की शुरुआत एक प्रभावशाली उद्घाटन समारोह के साथ हुई, जिसमें भारतीय नौसेना और एनसीसी निदेशालय ओडिशा के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे। विभिन्न नाव वर्गों में प्रतिस्पर्धी दौड़ें आयोजित की गईं। पश्चिम बंगाल और सिक्किम निदेशालय की एसडब्ल्यू टीम ने सराहनीय प्रदर्शन करते हुए मजबूत राष्ट्रीय दावेदारों के बीच आठवां स्थान हासिल किया। इसके बाद, एसडी कैडेटों ने उत्कृष्ट समन्वय, सामरिक जागरूकता और नौकायन कौशल का प्रदर्शन करते हुए अत्यधिक प्रतिस्पर्धी बेड़े दौड़ में भाग लिया। निचली स्थिति तय करने के लिए अतिरिक्त दौड़ें आयोजित की गईं, जिससे सभी टीमों को मूल्यवान प्रतिस्पर्धी प्रदर्शन मिला।
अंतिम रेगाटा दौड़ में शीर्ष प्रदर्शन करने वाली टीमों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा देखी गई। चैंपियनशिप का समापन आईएनएस चिल्का सभागार में एक गरिमामय समापन और पुरस्कार वितरण समारोह के साथ हुआ, जहां विजेताओं को उनकी उपलब्धियों के लिए सम्मानित किया गया। कार्यक्रम का समापन एनसीसी ध्वज को औपचारिक रूप से उतारने के साथ हुआ, जो रेगाटा के सफल समापन का प्रतीक था। डॉ वसुंधरा मिश्र ने जानकारी देते हुए बताया कि शिविर प्रस्थान की औपचारिकताओं के साथ संपन्न हुआ, जिससे कैडेट अनुभव, सौहार्द और समुद्री उत्कृष्टता की गहरी भावना से समृद्ध हुए।आईएनएस चिल्का में पीओ सीडीटी शग्निक मित्रा और पीओ सीडीटी अर्शी आलम।अखिल भारतीय नौकायन रेगाटा में पश्चिम बंगाल और सिक्किम दल रहे। डाॅ वसुंधरा मिश्र ने जानकारी देते हुए बताया कि अखिल भारतीय नौकायन रेगाटा 2025, एनसीसी लड़कों का ट्रैकिंग कैंप, आइज़वाल, विदेशी तैनाती शिविर (ओएसडी) – एक अंतर्राष्ट्रीय समुद्री अनुभव आदि सभी कैंप सफलतापूर्वक संपन्न हुए।
कहानी पूर्वोत्तर की : भाग-4 प्राचीन भारतीय परम्पराओं वाला उत्तर-पूर्व और ब्रिटिश प्रभाव
डॉ. सोनिया अनसूया
भारत विश्व का सबसे विविधतापूर्ण राष्ट्र है जो भाषा, वेशभूषा, भोजन, पर्व, परंपरा आदि अनेक सांस्कृतिक एवं भौगोलिक विविधताओं का अद्भुत मिश्रण है। विविधता किसी भी राष्ट्र की समृद्धि व गौरवपूर्ण समावेशी इतिहास का सूचक है l फिर क्यों इस देश की विविधताओं पर प्रश्न उठा कर उनमें अलगाववाद का बीजारोपण किया जाता है? जिसमें मुख्य रूप से पूर्वोत्तर भारत को ही लक्षित किया जाता है। भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र (सम्प्रति असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड और त्रिपुरा राज्यों का समूह) भौगोलिक, पौराणिक, ऐतिहासिक एवं सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्राचीन ग्रंथों में पूर्व की पर्वत घाटियों एवं कन्दराओं के निवासी को “किरात” संज्ञा दी गई है। किरात शब्द संस्कृत की “कृ विक्षेपे” धातु से बना है जिसका अर्थ है विक्षिप्त अर्थात् टेड़ी मेडी गति वाला। पर्वत पहाड़ों के घुमावदार होने के कारण वहाँ के निवासियों की मैदानी भाग की भाँति सीधी गति न होकर विक्षिप्त गति होती है इसलिए पर्वत-कन्दरा के निवासी को किरात कहा गया। सर्वप्रथम यजुर्वेद में ‘किरात’ शब्द का प्रयोग मिलता है। सरोभ्यो धैवरम्उ पस्थावराभ्यो…..गुहाभ्य: किरातं सानुभ्यो जम्बकं पर्वतेभ्य: किम्पूरुषम् – {यजु. (30.16)}। प्रस्तुत मन्त्र में बताया गया है कि देश की उत्तम व्यवस्था के लिए क्षेत्र-विशेषज्ञ के अनुसार ही व्यक्ति की नियुक्ति करनी चाहिए। ऋषि कहता है कि (गुहाभ्य:) पर्वत कंदराओं के लिए (किरातं) किरात को नियुक्त करें। इस प्रसंग में पर्वत-कंदराओं में नियुक्त व्यक्ति को किरात कहा गया है।
इसी प्रकार अथर्वेद {कैरातिका कुमारिका सका खनति भेषजम् — अथर्वेद (10/414)} में भी पर्वत के शिखरों पर औषधि का खनन करने वाली कन्या को भी कैरातिका (किरात की पुत्री) कहा है। इसके उपरांत शतपथ ब्राह्मण {11.4.14} और पंचविंश ब्राह्मण {13.1.2.3} में किरातों के विशिष्ट परिवारों के कुल के संकेत मिलते हैं, जिसके अनुसार वे इस क्षेत्र के मूल निवासी हैं। मनुस्मृति के अनुसार भी सरस्वती और दृषद्वती (ब्रह्मपुत्र) नदी के मध्य का भूभाग आर्यावर्त कहलाता है {सरस्वतीदृषद्वत्योर्देवनद्योर्यदंतरम् ।- मनु. (2/17)} और इसके पूर्व में रहने वाला जनसमुदाय किरात कहलाता है जो गुण और कर्म के अनुसार क्षत्रिय है {शनकैस्तु क्रियालोपादिका: क्षत्रियजातय: । – मनु. (10/43)}। रामायण के किष्किन्धा काण्ड में जब राम सीता को खोज रहे हैं तब वे किरातों से भी मिलते हैं। इस प्रसंग में वाल्मीकि किरात जनसमुदाय के वैशिष्ट्य का वर्णन करते हैं कि किरात स्वर्ण वर्ण के, प्रियदर्शी हैं तथा अपने क्षात्र धर्म में तीक्ष्ण हैं {किराता: तीक्ष्ण चुडा: च हेमाभा: प्रियदर्शिना: । (4/40/27)}। महाभारत के सभा पर्व के अनुसार उस समय किरात वासुदेव पौंड्रक राजा के अधीन थे {वङ्ग पुण्ड्र किरातेषु राजा बलसमन्वितः, पौण्ड्रकॊ वासुदेवेति यॊ ऽसौ लॊकेअभिविश्रुतः । (14.20)}। विष्णु पुराण के अनुसार भी समुद्र के उत्तर से लेकर तथा हिमालय के दक्षिण तक का समग्र भूभाग भारत कहलाता था {उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् । वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र संततिः ।।}।
विष्णु पुराण में प्राग्ज्योतिषपुर के राजा नरकासुर और श्री कृष्ण के युद्ध का वर्णन है । इस युद्ध में नरकासुर द्वारा नगर की रक्षार्थ तीक्ष्ण धार वाले पाशों के प्रयोग का उल्लेख किया गया है- ‘प्राग्ज्योतिषपुरस्यापि समन्ताच्छशतयोजनं, आचिता मौरवैः पाशैः क्षुरान्तैर्भूर्द्विजोत्तम:’ {विष्णु पुराण (5.29.16)}। ब्रह्म पुराण के अनुसार भी भारत के पूर्व में किरातों का निवास है {पूर्वे किराता यस्यान्ते पश्चिमे यवनस्थिताः}। कालिका पुराण में तो विस्तार से किरात और उनके निवास का वर्णन किया गया है। कालिकापुराण के अनुसार ब्रह्मा ने प्राचीन काल में यहाँ स्थित होकर नक्षत्रों की सृष्टि की थी। इसलिए इंद्रपुरी के समान यह नगरी प्राग् (पूर्व या प्राचीन) + ज्योतिष (नक्षत्र) कहलायी– ‘अत्रैव हि स्थितो ब्रह्मां प्राङ् नक्षत्रं समार्ज ह, ततः प्राग्ज्योतिषाख्येयं पुरी शक्रपुरी समा’।
शास्त्रीय प्रमाणों के अनुसार इन किरात जनसमुदाय द्वारा शासित प्रदेश प्राग्ज्योतिष और कालान्तर में कामरूप कहलाता था जिसका वर्णन शतपथ ब्राह्मण, रामायण तथा महाभारत में उपलब्ध होता है। रामायण में किष्किन्धाकाण्ड में राम जब सीता को खोज रहे हैं तब उस प्रसंग में प्राग्ज्योतिष का उल्लेख मिलता है। सुग्रीव कहता है कि समुद्र के मध्य वराह नाम का 64 योजन का पर्वत है जिसके उत्तर में नरक राजा द्वारा शासित प्राग्ज्योतिष प्रदेश है, वहाँ की प्रत्येक गुहा में सीता को खोजना है {योजनानि चतु:षष्टि: वराहो नाम पर्वत: ।……रावण: सह वैदह्या मार्गितव्यस्तत्स्तत: । ।- किष्किन्धा. (4/42/30-32)}।
महाभारत काल से पूर्वोत्तर का गहरा संबंध है। महाभारत के विख्यात योद्धा राजा भगदत्त पूर्वोत्तर भारत के थे {प्राग्ज्योतिषधिपो शूरो म्लेच्छानामधिपो बली}। पांडवों ने अपना अज्ञातवास इसी क्षेत्र में व्यतित किया था। महाभारत के सभापर्व में अर्जुन और किरात वेशधारी के मध्य युद्ध का उल्लेख है। इस प्रसंग के आधार पर ही संस्कृत के यशस्वी कवि भारवि ने अपने काव्य “किरातार्जुनीयम्” की रचना की है। महाभारत में विभिन्न प्रसंगों में प्राग्ज्योतिष का 20 से अधिक बार उल्लेख हुआ है। कामरूप-नरेश भगदत्त ने महाभारत के युद्ध में कौरवों की ओर से भाग लिया था।
महाभारत में भगदत्त को प्राग्ज्योतिष-नरेश भी कहा गया है– ‘तत: प्राग्ज्योतिषः क्रुद्धस्तोमरान् वै चतुर्दश, प्राणिहोततस्य नागस्य प्रमुखे नृपसत्तम {भीष्म पर्व (95.46)}। कालिदास ने रघुवंश में रघु द्वारा प्राग्ज्योतिष नरेश की पराजय का काव्यमय वर्णन किया है {चकम्पे तीर्णलौहित्येतस्मिन् प्राग्ज्योतिषेश्वर: तद्गजालानतां प्राप्तैः सहकालागुरुद्रुभैः। (4.81)}। दिग्विजय यात्रा के लिए निकले हुए रघु के लौहित्य या ब्रह्मपुत्र को पार करने पर प्राग्ज्योतिषपुर नरेश उसी प्रकार भयभीत होकर कांपने लगा जैसे उस देश के कालागुरु के वृक्ष जो रघु के हाथियों से बंधे थे।
ऐतिहासिक तथ्यों के अतिरिक्त आज भी पूर्वोत्तर का समाज अपने को रामायण-महाभारत के पात्रों का वंशज मानती हैं । अरुणाचल प्रदेश का मिश्मी समुदाय खुद को भगवान कृष्ण की पटरानी रुक्मिणी का वंशज मानता है। रुक्मिणी अद्यतन अरुणाचल के भीष्मकनगर की राजकुमारी थीं। इस प्रदेश के सियांग जिले में स्थित मालिनीथान और ताम्रेश्वरी मंदिर का संबंध श्रीकृष्ण एवं रुक्मिणी से है। लोहित जिले में अवस्थित परशुराम कुंड एक प्रमुख तीर्थस्थल है जो भगवान परशुराम से संबंधित है। अरुणाचल में शिव मंदिर का वर्णन शिव पुराण के 17वें अध्याय के रुद्र खंड में आता है। आज अरुणाचल प्रदेश स्थित जीरो घाटी की करडा पहाड़ी पर सबसे बड़ा शिवलिंग है इतना विशाल शिवलिंग अभी तक कहीं और नहीं देखा गया है। धरती के ऊपर इसकी ऊंचाई 20 फीट है, जबकि इसका चार फीट हिस्सा धरती के नीचे है। कुल मिलाकर 24 फीट ऊंचा यह शिवलिंग आस्था का एक बड़ा केंद्र बन चुका है।
अद्यतन मेघालय की खासी पहाड़ी में रहने वाला जन समुदाय आज भी तीरंदाजी में प्रवीण है और वे तीरंदाजी करते समय यह अंगूठे का प्रयोग नहीं करता। क्योंकि उनका विश्वास है कि उनके पूर्वज ने अपना दाहिना अंगूठा गुरु दक्षिणा में दे दिया था, इसलिए तीर चलाते समय अंगूठे का उपयोग नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार नगालैंड के दीमापुर में रहनेवाली दिमाशा जन समुदाय खुद को भीम की पत्नी हिडिंबा का वंशज मानता है। वहाँ आज भी हिडिंबा का वाड़ा है, जहां राजवाड़ी में स्थित शतरंज की ऊँची-ऊँची गोटियाँ पर्यटकों के आकर्षण के केंद्र मानी जाती हैं। इन गोटियों से हिडिंबा और भीम का बाहुबली पुत्र घटोत्कच शतरंज खेलता था।
बोडो जन समुदाय खुद को सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा का वंशज तथा कार्बी आंगलंग में रहनेवाला कार्बी जन समुदाय स्वयं को सुग्रीव का वंशज मानता है। महाभारत काल में पूर्वोत्तर के राजवंशों के साथ वैवाहिक संबंधों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है । नगालैण्ड में नगा कन्या उलुपी से अर्जुन ने विवाह किया था। अर्जुन की दूसरी पत्नी चित्रांगदा को मणिपुर के ही मैतेयी समाज का माना जाता है। असम का तेजपुर नगर (महाभारतकालीन शोणितपुर) श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध और बाणासुर की पुत्री ऊषा के प्रेम का साक्षी है।
महाभारत के बाद इनका पहला उल्लेख समुद्रगुप्त द्वारा प्रयाग में स्थापित पाषाण स्तम्भ पर उल्लिखित शिलालेख पर मिलता है {समतट-डवाक-कामरूप-नेपाल-कर्त्तृपुरादि-प्रत्यन्त-नृपतिभिर्म्मालवार्जुनायन-यौधेय-माद्रकाभीर-प्रार्जुन-सनकानीक-काक-खरपरिकादिभिश्च5 सर्व्व-कर -दानाज्ञाकरण-प्रणामागमन}। जिसमें कामरूप को गुप्त साम्राज्य के अधीन बताया गया है। महाभारतोत्तर प्राग्ज्योतिष/कामरूप जिसे आज पूर्वोत्तर के नाम से जाना जाता है, में तीन अलग अलग वंशों ने शासन किया- वर्मन वंश, मलेच्छ वंश और पाल (या भौम पाल) वंश। तीनों वंशों के राजा नरकासुर से अपना रिश्ता जोड़ते थे और इसी आधार पर राजा की पदवी पर अधिकार करते थे।
असम में मिले शिलालेखों के अनुसार वर्मन वंश के विभिन्न राजाओं ने बड़ी तीव्रता से कामरूप का विस्तार किया। राजा भूतिवर्मन द्वारा अश्वमेध यज्ञ करने का भी उल्लेख है। कई वर्षों तक एक सशक्त राज्य के निर्माण और विस्तार के पश्चात् वर्मन वंश पर गौर राजा का आक्रमण हुआ जिसमें वे परास्त हुए और कुछ समय के लिए गौर वंश के अधीन हुए। परन्तु भूतिवर्मन के छोटे बेटे राजा भास्करवर्मन ने थानेसर के राजा हर्षवर्धन से मित्रता की और संयुक्त आक्रमण से गौर राजा शशांक पर विजय पायी।
इतिहासकार विलक्षण महाकवि कल्हण ने महाभारत युद्ध से कश्मीर की क्षात्र-परम्परा को काव्य की विषय वस्तु बनाकर ‘राजतरंगिणी’ में क्रमबद्ध विशद वर्णन किया है। जिसका रचना काल 10 वीं से 12 वीं शताब्दी के मध्य माना जाता है। कश्मीर का सम्बन्ध उस समय पूर्वोतर भारत से था। कश्मीर के राजकुमार का विवाह कामरुप की राजकन्या के साथ हुआ था। 8 वीं शताब्दी में कश्मीर के राजा ललितादित्य ने स्त्री-राज्य (मेघालय) तथा प्राग्ज्योतिष तक अपने राज्य का विस्तार किया था। उस समय प्राग्ज्योतिषपुर वर्मन वंश के कामरूप राज्य की राजधानी थी जो सम्प्रति गोहाटी (असम) है। मूल्यवान कालागुरु अर्थात् अगुरु या अगर के लिए सर्वोत्तम अनुकूल मौसम उत्तर पूर्व भारत का क्षेत्र है जो असम में प्राकृतिक रूप से बहुलता में उपलब्ध होते हैं। अगुरु का प्रयोग सुगन्धित इत्र, धूपधूम आदि बनाने में किया जाता है। जिसका वर्णन कल्हण ने भी किया है {शून्ये प्राग्ज्योतिषपुरे निर्जिहानं ददर्श सः । धूपधूमं वनप्लुष्टात्कालागुरुवनात्परम् । । (4. 171)}।
ललितादित्य उसके बाद ‘स्त्री राज्य’ पहुँचते हैं । स्त्री राज्य से अभिप्राय अद्यतनीय मेघालय है । प्राचीन असम का वर्णन करते हुए Calcutta Review {H. Lyngdoh, Introduction, pp. X-XI.} में भी H. Lyngdoh {Homiwell Lyngdoh, 1877-1958, Khasi physician, political leader, and social activist} लिखते हैं कि असम में Hieun Tsang के भ्रमण के समय कश्मीर के राजा ललितादित्य ने जैन्तिया साम्राज्य पर आक्रमण किया जिसे स्त्री राज्य कहतें हैं तथा पद्म श्री से सम्मानित असम इतिहासकार ‘सूर्य कुमार भुयान’ {Studies in the History of Assam, Laksheswari Bhuyan, 1965 के आधार पर} (1894–1964) के अनुसार अनेक इतिहासकारों का मानना है कि ‘स्त्री राज्य’ का अभिप्राय वर्त्तमान मेघालय के खासी और जयंती के मातृवंशीय समाज से है।
कल्हण तत्कालीन ‘स्त्री-राज्य’ का वर्णन करते हुए कहते हैं कि ललितादित्य की सेना को ‘स्त्री राज्य’ के मतवाले हाथियों के मस्तकों ने नहीं अपितु स्त्री-सौन्दर्य ने ही निष्प्रभ कर दिया, परन्तु स्त्री-राज्य की रानी ने ललितादित्य के प्रताप-भय से कांपते हुए समर्पण कर दिया {तद्योधान्विगलद्धैर्यान्स्त्रीराज्ये स्त्रीजनोऽकरोत् । तुङ्गौ स्तनौ पुरस्कृत्य न तु कुम्भौ कवाटिनाम् । । स्त्रीराज्यदेव्यास्तास्याग्रे वीक्ष्य कम्पादिविक्रियाम् । संत्रासमभिलाषं वा निश्चिकाय न कश्चन । । (4. 173-174) }। ललितादित्य ने अपने शासनकाल में व्यापार, चित्रकला, मूर्तिकला धार्मिक उत्सवों को महत्व दिया। अतः कलाप्रिय ललितादित्य ने विजयोपरांत अपनी विजय के चिह्न के रूप में उस विजित प्रदेश में मंदिर या मूर्ति आदि का निर्माण भी कराया था। स्त्री-राज्य (मेघालय) में भी नृसिंह भगवान की विलक्षण चुम्बकीय निराधार विलक्षण मूर्ति स्थापित की {एकमूर्ध्वं नयद्रत्नमधः कर्षत्तथापरम् । बद्ध्वा व्यधान्निरालम्बं स्त्रीराज्ये नृहरिं च सः । । (4. 185)}।
उपरोक्त वैदिक, ऐतिहासिक,पौराणिक आख्यानों, अभिलिखों, शिलालेखों, भग्नावशेषों, लोकमान्यताओं एवं प्रादुर्भूत हुए इन शिवलिंगों को देखकर यह सिद्ध होता है कि पूर्वोत्तर भारत सदियों से भारतवर्ष का ही अभिन्न अंग है। इस क्षेत्र के साथ भारतीय संस्कृति के सूत्र हजारों वर्षों से गूँथे हैं। पूर्वोत्तर भारत इस देश की भौगोलिक तथा सांस्कृतिक विविधता में एकत्व का एक अनुपम उदाहरण है। यह विविधता यहां के प्राकृतिक सौन्दर्य एवं जन-जीवन में सहज रूप से दृष्टिगोचर होती है। यह क्षेत्र 1947 तक मुख्य रूप से असम एवं बंगाल क्षेत्र में विभाजित था। देश-विभाजन के पश्चात् तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) के उत्तरी एवं पूर्वी क्षेत्र में असम एवं कुछ अन्य क्षेत्रों से अलग होकर धीरे-धीरे कालान्तर में असम, मेघालय, नागालैण्ड, मणिपुर, मिजोरम, त्रिपुरा तथा अरुणाचल प्रदेश इन सात राज्यों का गठन हुआ।
वर्तमान में भारत का यह क्षेत्र बांग्लादेश, भूटान, चीन, म्यांमार और तिब्बत- इन पांच देशों की अंतरराष्ट्रीय सीमा से संलग्न है। यह क्षेत्र अपने गौरवशाली इतिहास, समृद्ध संस्कृति, भाषा, परंपरा, रहन-सहन, पर्व-त्योहार आदि की दृष्टि से इतना वैविध्यपूर्ण है कि इस क्षेत्र को भारत की सांस्कृतिक प्रयोगशाला कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा। असंख्य भाषाएं व बोलियाँ, भिन्न-भिन्न प्रकार के रहन-सहन, खान-पान और परिधान, आध्यात्मिकता तथा नैसर्गिक सौन्दर्य के कारण यह क्षेत्र अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। जैव-विविधता, सांस्कृतिक कौमार्य, सामुहिकता-बोध, प्रकृति-प्रेम, अपनी परंपरा के प्रति सम्मान भाव पूर्वोत्तर भारत की अद्वितीय विशेषताएँ हैं।
पौराणिक और सांस्कृतिक दृष्टि से पूर्वोत्तर भारत का शेष भारत से गहरा संबंध है परंतु शेष भारतवासी अल्प संपर्क होने के कारण इस क्षेत्र की विशिष्टताओं से अनभिज्ञ हैं अथवा वे भ्रांत धारणाओं से ग्रस्त हैं। अंग्रेजों की औपनिवेशिक, विभाजनकारी तथा जनजातीय नीतियों और ईसाई शिक्षा ने पूर्वोत्तर क्षेत्र में अलगाववाद और उग्रता का बीजारोपण किया तथा स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरान्त उसको निरंतर उपेक्षित किया गया। आज भी अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो नीति’ को मजबूत करने वाली मैकॉले की शिक्षा पद्धति में अलगाववादी शिक्षा दी जाती है कि इस क्षेत्र की सभी जनजातियां मंगोल हैं, वे क्रूर जंगली तथा हिंसक हैं। परन्तु उनमें प्रचलित अनेक रीतियाँ, लोक-मान्यताएँ, जीवन-मूल्य तथा परम्पराएँ शेष भारत की परम्पराओं से लेशमात्र भी अलग नहीं हैं।
अंततः इन सब तुच्छ नीतियों ने पूर्वोत्तर के अधिकांश क्षेत्र को अलगाव की आग में झोंक दिया और उग्र रूप धारण किए इस अलगाववाद की जड़ें बहुत गहराई तक फैल गई हैं। सौभाग्य से इस समय भारत सरकार की ‘एक्ट ईस्ट नीति’ के क्रियान्वयन से आशा बढ़ी है। जिससे सांस्कृतिक आधार पर भारत के सुदूर प्रांतों-पूर्वोत्तर में समरसता, आत्मीयता बढ़ेगी। भारत के पड़ोसी देशों के साथ सुदृढ़ सम्बंधों का आधार भी यही होगा। इतना ही नहीं, भारत विश्व में न केवल आर्थिक या सामरिक बल्कि विश्व बन्धुत्व तथा विश्व कल्याण की उच्चतम सांस्कृतिक भावना को सशक्त, सुदृढ़ तथा सुसंगठित करेगा।
(लेखिका: डॉ. सोनिया (सहायकाचार्या, संस्कृत विभाग), हिन्दू महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय)
( स्रोत – ऑप इंडिया)
कहानी पूर्वोत्तर भारत की – भाग -3 पूर्वोत्तर भारत और महाभारत का सम्बन्ध
डॉ. सुधा कुमारी
भारत का पूर्वोत्तर हिस्सा जो सात राज्यों का समूह है, मुख्य भाग से काफी दूर माना जाता है। आज की तारीख में इस हिस्से में भेजा जानेवाला व्यक्ति थोड़ा असहज महसूस करेगा और इतनी दूर जाने से हिचकेगा। किन्तु यहाँ प्रवास करनेवाले को धीरे धीरे मालूम होता है कि यह भाग प्राचीन भारत से कितना जुड़ा हुआ था।प्राचीन कथाएँ इसका बयान करती हैं। विशेष रूप से महाभारत काल की कई यादें यहाँ से जुड़ी हुई हैं। पांडवों ने इस हिस्से में प्रवास किया था और महाबली भीम ने हिडिम्बा नामक युवती से विवाह किया था। हिडिम्बा आसाम के बोड़ो जनजाति की सुंदर लड़की थी और भीम एक वर्ष तक यहाँ वास कर पुत्र के जन्म के उपरांत वापस चले गए। यह इतिहास का दुखद हिस्सा है। ऊपर से हिडिम्बा और हिडिम्ब को राक्षस जाति का बताकर आर्यावर्त्त ने उस दुखी पत्नी के साथ कोई न्याय नहीं किया। उनका पुत्र घटोत्कच भी महाभारत युद्ध में पिता की ओर से लड़कर वीरगति को प्राप्त हो गया। इस जनजाति में कुछ समुदाय यज्ञ भी करते हैं। वे ब्रह्म में विश्वास करते है और हिडिम्बा देवी को अपने पूर्वज के रूप में पूजते हैं। बोड़ो जनजाति का यह क्षेत्र बांगलादेश से अवैध घुसपैठ के कारण उपद्रव ग्रस्त रहा है। दूसरी ओर, इस क्षेत्र में तेज बहती पहाड़ी नदियों ने मिट्टी कटाव और साथ में लाए हुए पत्थरों के जमाव के कारण काफी नुकसान पहुँचाया है।
बोड़ो जनजाति की भाषा देवनागरी लिपि में लिखी जाती है। इनमें कई लोग साहित्य में अत्यंत प्रतिभाशाली, हस्त शिल्पकार, कलाकार एवं खेल-कूद में अव्वल हैं। इनका क्षेत्र हस्तकला एवं कपड़े की उत्कृष्ट बुनाई के लिए प्रसिद्ध है और यहाँ की वस्त्रकला में सुंदर रंगों का प्रयोग किया जाता है। वैसे तो पूर्वोत्तर के हर राज्य में सूती वस्त्र की हथकरघा निर्मित सुन्दर कलात्मक पोशाकें बनती हैं। मगर आसामी रेशम की हथकरघा निर्मित कलात्मक पोशाकें पूर्वोत्तर राज्यों के अलावा पूरे भारत में विख्यात हैं। भारत के दूसरे राज्यों में भी आसाम का बना पाट रेशम और एरी रेशम काफी प्रचलित है। एरी रेशम बनाने की विधि को अहिंसक माना जाता है क्योंकि इसमें रेशम का कीड़ा नहीं मरता। हाँ, यह रेशम थोड़ा मोटा अवश्य होता है।
आसाम में तेजपुर का नाम सभी ने सुना होगा। तेजपुर में सैनिक छावनी है। पुराने समय में यहाँ नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एरिया (नेफा) का मुख्यालय रहा है। भौगोलिक दृष्टिकोण से आसाम को अपर आसाम (अरुणाचल प्रदेश से आसाम में प्रवेश करने वाला ब्रह्मपुत्र घाटी का पहाड़ी भाग ), मिडल आसाम ( ब्रह्मपुत्र घाटी का मध्य भाग ) और लोअर आसाम ( ब्रह्मपुत्र घाटी का आसाम से बांग्लादेश जाने वाला समतल भाग ) के रूप में देखा जाता है। ब्रह्मपुत्र अपर आसाम से प्रवेश करता है और लोअर आसाम में धुबरी होते हुए बांगला देश में पदमा नदी बनकर चला जाता है।
गुवाहाटी से 2 घंटे की दूरी पर स्थित तेजपुर शोणितपुर जिले का मुख्यालय है और ब्रह्मपुत्र के मध्य भाग पर यानी मध्य आसाम में अवस्थित है। चाय के बगान मध्य आसाम से अपर आसाम तक पाए जाते हैं। तेजपुर से चाय बगान और फैक्ट्रियाँ शुरू हो जाती है।आर्य कथाओं के अनुसार, तेजपुर की जनजाति के राजा बाणकी पुत्री उषा ने स्वप्न में श्रीकृष्ण के पोते अनिरुद्ध को देखा और मोहित हुई। उसकी सहेली चित्रलेखा ने उसके वर्णन करने पर अनिरुद्ध का चित्र बनाया और उसे हरण करके तेजपुर लाई जहाँ अनिरुद्ध ने भी उषा को पसंद किया। पर उनका विवाह आसान नहीं था। यहाँ श्रीकृष्ण की राजा बाण से लड़ाई हुई। इस युद्ध में श्रीशिव ने बाण राजा का साथ दिया। फिर काफी मुश्किल से युद्ध को रोका गया।उसके बाद अनिरुद्ध का विवाह उषा से हुआ। उस खूनी युद्ध की छाया शोणितपुर और तेजपुर के नाम पर पड़ी है। असमिया भाषा में ‘तेज’ का अर्थ ‘रक्त’ होता है और संस्कृत में शोणित का अर्थ भी ‘रक्त’ होता है।
उषा और चित्रलेखा की स्मृति दिलाता सुंदर उद्यान तेजपुर में चित्रलेखा पार्क कहलाता है जहाँ ऊँचे – ऊँचे तालवृक्षों की कतार है, छोटी- सी झील है और महाभारत कालीन समय का एहसास कराते पुराने चट्टानों के अवशेष हैं।यहाँ से थोड़ी दूर पर तेजपुर में ही अग्निगढ़ नामक एक सुंदर उद्यान है जो एक टीले पर स्थित है। यहाँ सीढ़ियों से ही जाया जा सकता है।यहाँ पर उषा को कैदकर रखा गया था क्योंकि आर्य जाति और जनजाति – दोनों ही उषा और अनिरुद्ध के विवाह के विरुद्ध थे।उस स्थिति को दर्शाती हुई मूर्तियाँ हर जगह लगी हुई हैं।
आसाम में गुवाहाटी शहर में जहाँ नीलाचल पर्वत पर देवी कामाख्या का निवासहै, वहाँ नरक नामक असुर का पर्वत बताया जाता है। यहाँ श्री कृष्ण ने उससे युद्ध किया और मार दिया था। कारण यह बताया जाता है कि वह एक असुर था, सोलह हजार कन्याओं को अपहरण कर बंदी बना चुका था और उनसे विवाह करनेवाला था।उन कन्याओं ने मुक्ति के बाद पिता के घर जाने से इन्कार किया क्योंकि कई वर्ष पूर्व अपहरण होने से घर का पता भूल गई थीं और नरकासुर की बंदिनी को पिता के घर सम्मान मिलना सुनिश्चित नहीं था।कृष्ण ने उन सभी कन्याओं से विवाह किया और द्वारका ले गए।आश्चर्य की बात है कि उन सोलह हजार कन्याओं में से किसी के घरवालों ने ढूँढा या नहीं, कृष्ण से विवाह के बाद भी वे कभी अपनी कन्याओं से मिलने आए या नहीं, इसका कुछ भी पता नहीं है।कृष्ण ने अपनी दैवी शक्तियों का प्रयोग किया होता तो वे सभी लड़कियाँ पिता के घर ससम्मान लौट सकती थीं।
आर्यावर्त्त की प्राचीन कथाओं में राजा बाण को असुर कहा गया है जबकि वह तेजपुर की जनजाति के राजा थे।उत्तर भारत के प्रसिद्ध हिंदी कवि भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने लिखा है :
‘बानासुर की सैन को, हनन लगे भगवान।’
यह असुर शब्द का प्रयोग ठीक नहीं।राजा बाण, नरक, बोडो जनजाति के राजकुमार हिडिम्ब और हिडिम्बा- यहाँ तक कि दक्षिण भारत के दानवीर राजा बलि को भी – इन्हीं शब्दों से संबोधित किया गया है।शायद आर्यों ने अपने सभी विपक्षी समुदायों और शत्रुओं के लिए ‘अनार्य’ उपाधि के साथ – साथ ‘असुर’, ‘दैत्य’ और ‘राक्षस’ – शब्दों का अनिवार्य रूप से प्रयोग किया था और अपनी लोक कथाओं में आवश्यकता के अनुसार उनके सींग – पूँछ भी उगा दिए थे।वर्ना धरती पर डायनासोर जैसे दैत्य तो मनुष्य के जन्म से बहुत पहले ही समाप्त हो चुके थे।
कृष्ण और भीम के बाद अर्जुन का जिक्र आता है। अर्जुन शिवजी को प्रसन्न कर पाशुपत अस्त्र पाने के लिये पूर्वोत्तर के जंगलों में तपस्या करने आए थे।शिव ने किरात (भील) के रूप में उनसे युद्ध कर परीक्षा ली और फिर प्रसन्न होकर पाशुपत अस्त्र प्रदान किया।अर्जुन का संबंध मणिपुर से बताया जाता है। वहाँ की राजकुमारी चित्रांगदा से अर्जुन ने विवाह किया था और एक पुत्र को जन्म भी दिया था। पर उसे अपने साथ नहीं ले गए और उनका वह पुत्र मणिपुर में माता के साथ ही रहा। आर्यकथाओं में इससे आगे का उल्लेख नहीं किया गया हैं। किन्तु मणिपुरी नृत्य में और वहाँ के एक समुदाय ( मेईटी ) की जीवन शैली और नृत्य – कला में महाभारत काल और कृष्णभक्ति की छाप स्पष्ट दिखाई देती है।
महाभारत में परशुराम का भी जिक् रहुआ है। परशुराम का सम्बन्ध पूर्वी अरुणाचल प्रदेश से है। हिंदी कथाओं के अनुसार परशुराम की माता रेणुका थीं जिनका उल्लेख गन्धर्व राज चित्रग्रीव के सन्दर्भ से किया गया है। परशुराम के पिता जमदग्नि ने पत्नी से क्रोधित होकर स्वयं रेणुका की हत्या न करके अपने बेटे से मातृह्त्या का यह जघन्य कृत्य करवाया। निश्चित रूप से जमदग्नि पितृसत्तात्मक (पुरुष प्रधान) समाज का प्रतीक है और यह घटना पितृसत्ता का ही परिणाम है। सम्पूर्ण घटना पूर्वोत्तर भारत के तपोवन में घटी थी। मातृह्त्या का जघन्य पाप करने के कारण परशुराम के हाथ शक्तिहीन हो गए और दुबारा फरसा उठा नहीं पाए। वह फरसा पत्थरों में ही गड़ गया। अपने पाप के बोझ से मुक्ति पाने के लिये परशुराम को पूर्वोत्तर भारत में लोहित नदी के तट( आज अरुणाचल प्रदेश का वर्तमान इलाका ) पर प्रवास करना पड़ा।यह स्थान दुर्गम और छुपा हुआ है। कई वर्षों तक वहाँ प्रवास करने और लोहित नदी की शीतल धार में स्नान करने के बाद परशुराम को मातृहत्या के भीषण पाप से मुक्ति मिली। हमारे हिंदी या आर्य कथा- साहित्य में ये लिखा गया है कि परशुराम ने माता की हत्या के बाद पिता से वरदान में माता का जीवन मांग लिया था। मगर परशुराम के पश्चात्ताप का यह जिक्र नहीं किया गया है। शायद नारियों की पूजा करनेवाला पुरुष – प्रधान आर्य समाज मातृहत्या को भी पुण्य समझता था!
लोहित नदी पापियों को मुक्ति दे या न दे, पर पूर्वी अरुणाचल प्रदेश का यह दुर्गम स्थल है अत्यंत मनोरम। सुंदर पर्वत, हरियाली से भरी ढलान, बड़े – बड़े सफ़ेद पत्थरों से भरा तट और ढलान से गिरता बर्फ – सा स्वच्छ शुभ्र प्रपात जो नीली धारा बनकर पत्थरों के तट के बीच अविकल, कलकल बहता है।इस स्थल का नाम ‘परशुराम कुंड’ परशुराम के नाम पर पड़ा है। यहाँ प्रतिवर्ष लोग स्नान करने आते हैं। पूर्वी अरुणाचल प्रदेश में परशुराम कुंड के रास्ते में तथा अन्य जगहों पर नारंगी के कई बगान हैं जिनके बारे में अधिकांश भारतीयों को पता भी नहीं होगा। वहाँ ‘ऑरेंज फेस्टिवल’ में पारम्परिक पोशाक में सांस्कृतिक आयोजन होते है। आवश्यकता है कि अरुणाचल प्रदेश की इस वन – सम्पदा का अच्छी तरह से उपयोग किया जाय और वहाँ नारंगी से सम्बंधित उद्योग- धंधे विकसित किये जायँ।
परशुराम कुंड से थोड़ी दूर पर नामसाई नामक जगह के पास बुद्ध का’ गोल्डन पगोडा’ है जिसके विशाल हरे – भरे प्रांगण में छोटे – छोटे गेस्ट हाउस बने हैं। भोजन की व्यवस्था गेस्ट हाउस से थोड़ा हटकर एक अलग भोजनालय में की गयी है।यह स्थान अत्यंत शांत और स्वच्छ है। अरुणाचल के इस इलाके के बाद उत्तर दिशा में आगे बढ़ने पर ब्रह्मपुत्र का दुर्गम तट आता है जिसके नीचे बड़े – बड़े पत्थरों से भरी ब्रह्मपुत्र नदी की तलहटी है। ढोला सदिया सड़क पुल 2019 में बना है।इससे पहले जाड़े में यहाँ ब्रह्मपुत्र नदी की धारा सूख जाने पर गाड़ियाँ इस दुर्गम पथ पर पत्थरों से गुजरकर नाव के पास पहुँचती थीं जो अपने आप में बहुत कठिन सफर होता था। इसके बाद रोइंग का तटवर्ती इलाका आता है जहां गाड़ियों को एक अलग तरह के पुल से गुजरना होता है। रोइंग के पश्चिम में काफी आगे जाने पर सियांग नदी के किनारे बसा पासीघाट है। रंग–बिरंगे पत्थरों से भरी सियांग की खूबसूरत घाटी के ऊपर सजा हुआ पासीघाट एक हिल – स्टेशन जैसा शांत और मनोरम दिखता है।यहाँ यह बताना आवश्यक है कि अरुणाचल प्रदेश का क्षेत्रफल काफी बड़ा है और इसके पूर्वी भाग से पश्चिमी भाग में जाने के लिए असम से होकर जाना पड़ता है। ये दोनों भाग पहाड़ों और नदियों से जुड़े है।पश्चिमी अरुणाचल में इसकी राजधानी ईटानगर और तावांग की खूबसूरत बर्फीली घाटी है जिसके दृश्य किसी भी सैलानी को कश्मीर की तरह मोह लेते है।
महाभारत काल के अति विशिष्ट पुरुषों का पूर्वोत्तर भारत से संपर्क और गहरा संबंध देखकर प्रतीत होता है कि हमने उन्हें समुचित आदर और महत्व नहीं दिया।इतनी सारी ऐतिहासिक बातें भारत के मुख्य भाग में ज्ञात नहीं होती हैं। इतिहास ने पूर्वोत्तर भारत और आर्य सभ्यता के इतने घनिष्ठ और आत्मीय संबंधों को तथा महत्त्वपूर्ण तथ्यों को बड़ी सावधानी से अपने पन्नों में छुपा लिया।इसके बावजूद, पूर्वोत्तर भारत जहाँ अर्जुन, भीम, अनिरुद्ध जैसे विख्यात कुमारों के दिल कभी धड़के थे और स्वयं कृष्ण ने विवाह किया था, आज भी देश की मुख्य धारा का आकर्षण केंद्र बना हुआ है।दिल्ली का राजपथ हो या कोई और जगह – असम का खूबसूरत फुलाम गामोसा (अंग वस्त्र) अक्सर मह्त्वपूर्ण कंधों को सुशोभित करता रहता है।अब समय आ गया है कि यहाँ की जनजातियों की अच्छी परंपराओं को मुख्य धारा में अपनाया जाय। पूर्वोत्तर भारत में सामाजिक विषमता और कुरीतियाँ न्यूनतम हैं।आपसी आदर और सम्मान है। सामाजिक व्यवस्था कुंठा मुक्त, सुसंस्कृत और सराहनीय है।
हिन्दी प्रधान प्रांतों में सामाजिक व्यवस्था पुरुष – प्रधान तो है ही, महिलाओं को अनावश्यक रूढ़ियों से सख्ती से जकड़कर भी रखती है। इन प्रांतों में एक भी उत्सव नहीं जिसे स्त्री- पुरुष, युवा- युवतियाँ, बालक- बालिकाएँ साथ- साथ आनन्दपूर्वक मनाएँ और संगीत पर उल्लास से थिरक सकें। केवल धार्मिक अनुष्ठान या फिर पति की पूजा वाले करवा चौथ जैसे व्रत होते हैं। होली के नाम पर हुड़दंग, कीचड़ और सामाजिक असुरक्षा अधिक दिखते हैं। होली के दिन कोई महिला सड़क पर सुरक्षित महसूस नहीं करती। दो – चार दिन पहले से ही होली का हुड़दंग शुरू हो जाता है। होलिका की जगह यदि अपनी गलत रीतियों को समाप्त कर दें तो बेहतर हो। एक दीवाली ही है जिसमें पटाखे, आतिशबाजी और दीपमाला धरा – गगन को प्रकाशमान करते हैं। पर दीपोत्सव में भी धार्मिक पुट दे दिया जाता है। हिंदी – प्रधान प्रान्तों में महिला सबसे ज्यादा असुरक्षित और हमले का शिकार होती है, राह चलते असभ्य दृष्टि और असभ्य शब्दवाणों को झेलती है। यदि पूर्वोत्तर की तरह सामूहिक उत्सव और प्रसन्नता के पर्व इन प्रांतों में भी आयोजित होते तो सामाजिक स्थिति बेहतर हो सकती थी। यह विचार हिंदीभाषी प्रान्तों को कम दिखाने के लिए नहीं है, बल्कि उन्हें शांति और उल्लास का संदेश देने के लिए है।
(स्रोत – नवभारत टाइम्स)
कहानी पूर्वोत्तर भारत की : भाग -2 प्राचीन आख्यानों में भारत और पूर्वोेत्तर भारत
आज जब भारत तकनीक, विज्ञान और वैश्विक मंच पर आगे बढ़ रहा है, उसी समय हमारे समाज के भीतर एक ऐसा मौन घाव भी है, जो दिखता नहीं—पर पीड़ा देता है। यह घाव है अपने ही देश के उत्तर–पूर्वी राज्यों (सेवेन सिस्टर्स) को “अलग” समझने का।
उनकी आँखों की आकृति, उनकी त्वचा का वर्ण,उनकी वेशभूषा,उनकी बोली— इन सबको आधार बनाकर जब कोई उन्हें “पराया” कह देता है, तो केवल एक व्यक्ति नहीं टूटता—भारत की आत्मा सिसकती है।
भारतवर्ष: केवल देश नहीं, संस्कार की भूमि
संस्कृत में “भारत” शब्द का अर्थ है—
“भा” धातु = प्रकाश, ज्ञान
“रत” = जो उसमें रत हो
भारत अर्थात—जो ज्ञान और धर्म के प्रकाश में रत हो। यह परिभाषा किसी नक्शे से नहीं,
चेतना से जुड़ी है।इस भारतवर्ष में उत्तर–पूर्व, उत्तर–पश्चिम, दक्षिण, मध्य—ये दिशाएँ थीं, विभाजन नहीं। वैदिक दृष्टि: एकत्व का घोष
ऋग्वेद उद्घोष करता है—
“संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।”
(ऋग्वेद 10.191.2)
व्याख्या:
– साथ चलो
– साथ बोलो
– और तुम्हारे मन एक हों यह मंत्र किसी सभा के लिए नहीं था, यह समूचे भारतवर्ष के लिए जीवन-सूत्र था।
उत्तर–पूर्व और वैदिक परंपरा का संबंध
कामरूप और शक्ति-साधना
असम का कामरूप केवल एक क्षेत्र नहीं था—
वह शक्ति की आराधना का केन्द्र था।
कामाख्या पीठ— जहाँ आज वैदिक मंत्र, तांत्रिक विधि और प्रकृति-पूजन एक साथ जीवित हैं।
यह वही शक्ति है जिसकी स्तुति में कहा गया—
“या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।”
प्राग्ज्योतिष और अरुणाचल
पुराणों में अरुणाचल क्षेत्र को प्राग्ज्योतिष कहा गया— जहाँ सबसे पहले सूर्य का प्रकाश पड़े।
यह केवल भौगोलिक सत्य नहीं,
आध्यात्मिक संकेत है— ज्ञान का प्रथम आलोक।
मणिपुर और महाभारत
जब कोई मणिपुर को “अलग” कहता है,
तो क्या वह यह भूल जाता है कि—
अर्जुन की पत्नी चित्रांगदा मणिपुर की राजकुमारी थीं
महाभारत केवल ग्रंथ नहीं, भारत की स्मृति है—
और मणिपुर उस स्मृति का अंग है।
संस्कृति अलग, संस्कार एक
संस्कृत में संस्कृति का अर्थ है— “संस्कारयति इति संस्कृति:” जो मनुष्य को संस्कारित करे, वही संस्कृति है।
उत्तर–पूर्व की संस्कृतियों में— प्रकृति को देवता माना गया पर्वत, नदी, वृक्ष पूज्य हैं,सामूहिक जीवन को प्राथमिकता है यही तो वैदिक दृष्टि है— “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।”
(अथर्ववेद)
विविधता पर नहीं, उपहास पर लज्जा होनी चाहिए, किसी की आँखें छोटी हैं— तो क्या उसकी देशभक्ति भी छोटी हो जाती है?
किसी का पहनावा अलग है— तो क्या उसका त्याग कम हो जाता है?
जिस दिन हम यह समझ लेंगे कि रूप नहीं, राष्ट्र भावना महत्वपूर्ण है, उस दिन भारत सच में एक होगा।
भारत एक देह है, उत्तर–पूर्व उसकी धड़कन
काशी आत्मा है,
तो कामाख्या शक्ति है।
यदि गंगा शिरा है,
तो ब्रह्मपुत्र प्राण है।
यदि राम भारत की मर्यादा हैं,
तो उत्तर–पूर्व भारत की मौन साधना है।
अंतिम संस्कृत संदेश
“अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥”
जो अपने-पराए का भेद करता है, वह संकीर्ण है। उदार वही है,
जिसके लिए पूरा भारत एक परिवार है।
आज पूर्वोत्तर के जिन सात राज्यों को सात बहनों के नाम से हम जानते हैं, वे राज्य पश्चिम बंगाल और असम के विभाजन के फलस्वरूप स्वतंत्र रूप से अस्त्तिव में आए हैं। ये छोटे राज्य मणिपुर, मेघालय अरूणाचल प्रदेश, नागालैंड, त्रिपुरा, सिक्किम और मिजोरम हैं। प्राग्तिैहासिक काल के पन्नों को खंगालें तो पता चलता है कि भगवान परशुराम और कार्तवीर्य अर्जुन के बीच जो भीषण युद्ध हुआ था, उसके अंतिम आततायी को परशुराम ने अरूणाचल प्रदेश में जाकर मारा था। अंत में यहीं के ‘लोहित क्षेत्र‘ में पहुंचकर ब्रह्मपुत्र नदी में अपना रक्त-रंचित फरसा धोया था। बाद में स्मृतिस्वरूप यहां पांच कुण्ड बनाए गए, जिन्हें समंतपंचका रूधिर कुण्ड कहा जाता है। ये कुण्ड आज भी अस्तित्व में हैं। इस क्षेत्र में यह दंतकथा भी प्रचालित है कि इन्हीं कुण्डों में भृगुकुल भूशण परषुराम ने युद्ध में मारे गए योद्धाओं का तर्पण किया था। परशुराम यही नहीं रूके, उन्होंने शुद्र और इस क्षेत्र की जो आदिम जनजातियां थीं, उनका यज्ञोपवीत संस्कार करके उन्हें ब्रह्मण बनाया और सामूहिक विवाह किए।
महाभारत काल में भगवान श्रीकृष्ण ने पूर्व से पश्चिम की सामरिक और सांस्कृतिक यात्रा की। द्वारिका एवं माणिपुर में सैन्य अड्डे स्थापित किए। इसीलिए इस पूरे क्षेत्र की जनजातियां अपने को रामायण और महाभारत काल के नायकों का वंशज मानती हैं। यही नहीं ये अपने पुरखों की यादें भी जीवित रखे हुए हैं। सूर्यदेव को आराध्य मानने वालीं अरूणाचल की 54 जनजातियों में से एक मिजो-मिष्मी जनजाति खुद को भगवान श्रीकृष्ण की पटरानी रूक्मणी का वंशज मनती हैं। दंतकाथाओं के अनुसार, आज के अरूणाचल क्षेत्र स्थित भीष्मकनगर की राजकुमारी थीं। उनके पिता का नाम भीष्मक एवं भाई का नाम रूक्मंगद था। जब कृश्ण रूक्मणी का अपहारण करने गए तो रूक्मंगद ने उनका विरोध किया। परमवीर योद्धा रूक्मंगद को पराजित करने के लिए कृश्ण को सुदर्शन चलाने के लिए मजबूर होना पड़ा। इस पर रूक्मणि का ह्रदय पसीज उठा और उन्होंने कृष्ण से अनुरोध किया कि वे भाई के प्राण न लें, सिर्फ सबक सिखाकर छोड़ दें। तब श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र को रूक्मंगद का आधा मुंडन करने का आदेश दिया। रूक्मंगद का यही अर्द्धमुंडन आज सेना के जवानों की ‘हेयर स्टाइल‘ मानी जाती है। मिजो-मिष्मी जनजाति के पुरूष आज भी अपने बाल इसी तरह से रखते हैं। दिल्ली में निदो नामक जिस युवक के बालों पर नोकझोंक हुई थी, उसके बाल इसी परंपरागत तर्ज के थे। वास्तव में वह भगवान कृष्ण द्वारा निर्मित परंपरा का निर्वाह कर रहा था, जिस कृष्ण की पूजा उत्तर भारत समेत समूचे देश में होती है। यदि वाकई देश के लोग इस लोककथा से परिचित होते तो शायद निदो पर जानलेवा हमला ही नहीं हुआ होता?
मेघालय की खासी जयंतिया जनजाति की आबादी करीब 13 लाख है। यह जनजाति आज भी तीरंदजी में प्रवीण मानी जाती है। किंतु हैरानी यह है कि धनुष-बाण चलाते समय ये अंगूठे का प्रयोग नहीं करते। ये लोग अपने को एकलव्य का वंशज मानते हैं। यह वही एकलव्य है, जिसने द्रोणाचार्य के मागंने पर गुरूदक्षिणा में अपना अंगूठा दे दीया था। इसी तरह नागालैंड के शहर दीमापुर का पुराना नाम हिडिंबापुर था। यहां की बहुसंख्यक आबादी दिमंशा जनजाति की है। यह जाति खुद को भीम की पत्नी हिडिंबा का वंशज मानती है। दीमापुर में आज भी हिडिंबा का वाड़ा है। यहां राजवाड़ी क्षेत्र में स्थित शतंरज की बड़ी- बड़ी गोटियां पर्यटकों के आर्कशण का प्रमुख केंद्र्र हैं। किवदंती है कि इन गोटियों से हिडिंबा और भीम का बाहुबली पुत्र वीर घटोत्कच शतरंज खेलता था।
म्यांमार की सीमा से सटे राज्य माणिपुर के जिले उखरूल का नाम उलूपी-कुल का अपभ्रंश माना जाता है। अर्जुन की एक पत्नी का नाम भी उलूपी था जो इसी क्षेत्र की रहने वाली थी। तांखुल जनजाति के लोग खुद को अर्जुन और उलूपी का वंशज मानते हैं। ये लोग मार्शलआर्ट में माहिर माने जाते हैं। अर्जुन की दूसरी पत्नी चित्रांगदा भी मणिपुर के मैतेयी जाति से थी। यह जाति अब वैष्णव बन चुकी है। असम की बोडो जनजाति खुद को सृष्टि के रचीयता ब्रह्मा का वंशज मानती है। असम के ही पहाड़ी जिले कार्बी आंगलांग में रहने वाली कार्बी जनजाति स्वंय को सुग्रीव का वंशज मानती है। देश के तथाकथित मार्क्सवादी प्रगतिशील इतिहासकार रामायण और महाभारत कालीन पात्रों व नायकों को भले ही मिथक मानते हों,लेकिन यह मिथकियता पूर्वोत्तर राज्यों के रहवासियों को रक्त व धर्म आधारित सांस्कृतिक एकरूपता से जोड़ती है तो यही वह स्थिति है, जिसका व्यापाक प्रचार संर्कीण सोच के लोगों को खंडित मानसिकता से उबार सकता है। हमारे प्राचीन संस्कृत ग्रंथों, लोक और दंत कथाओं में ज्ञान के ऐसे अनेक स्रोत मिलते हैं,जो हमें सीमांत प्रदेषों में भी मूल भारतीय होने के जातीय गौरव से जोड़ते हैं। लिहाजा जरूरी है कि हम सांस्कृतिक एकरूपता वाली इन कथाओं को पाठ्यपुस्तकों में शामिल करें ? पूर्वोत्तर राज्यों में रक्तजन्य जातीय समरसता के इस मूल-मंत्र से जातीय एकता की उम्मीद की जा सकती है।
(इनपुट – प्रवक्ता डॉट कॉम)
वायु सेना प्रमुख ने स्वदेशी हथियारों की आपूर्ति पर दिया जोर
नयी दिल्ली । एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (एडीए) की दो दिवसीय नेशनल सेमिनार ‘एयरोनॉटिक्स 2047’ रविवार को बेंगलुरु के सेंटर फॉर एयरबोर्न सिस्टम्स में शुरू हुई। सेमिनार के उद्घाटन संबोधन में वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने एक बार फिर स्वदेशी हथियारों की समय पर आपूर्ति करने पर जोर दिया है। उन्होंने एडीए को लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एलसीए) तेजस की उड़ान के 25 साल पूरे होने पर बधाई दी और आज के लगातार बदलते समय में वायु सेना को ऑपरेशनली तैयार रखने के लिए कहा। इस मौके पर डीआरडीओ के चेयरमैन डॉ. समीर वी कामत ने आयात पर निर्भरता कम करने के लिए स्वदेशी तकनीक विकसित करने पर जोर दिया, जिससे विकसित भारत @2047 का विजन पूरा हो सके। सेमिनार में आधुनिक एयरोस्पेस प्रौद्योगिकी के अलग-अलग पहलुओं का अन्वेषण करना है, जिसमें अगली पीढ़ी के एयरक्राफ्ट के लिए विनिर्माण और संयोजन, डिजिटल विनिर्माण, एरोडायनामिक्स, प्रोपल्शन टेक्नोलॉजी, फ्लाइट टेस्टिंग टेक्नीक, डिजिटल ट्विन टेक्नोलॉजी, सर्टिफिकेशन चैलेंज, फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम और एवियोनिक्स, फाइटर एयरक्राफ्ट में मेंटेनेंस चैलेंज, एयरक्राफ्ट डिजाइन पर ध्यान केंद्रित किया जाना है। सेमिनार में भारतीय अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के भविष्य और एलसीए तेजस के स्केच से स्क्वाड्रन तक के सफर के बारे में बताया जाएगा। एडीए ने एलसीए तेजस को डिजाइन और विकसित किया है, जिसके 5,600 से ज्यादा सफल फ्लाइट परीक्षण हो चुके हैं। इससे सरकारी लैब, एकेडमिक इंस्टीट्यूट और इंडस्ट्री समेत 100 से ज्यादा डिजाइन वर्क सेंटर जुड़े थे। एलसीए को चौथी पीढ़ी का फाइटर बनाने के लिए कार्बन कंपोजिट, हल्के मटेरियल, फ्लाई-बाय-वायर फ्लाइट कंट्रोल, डिजिटल यूटिलिटी मैनेजमेंट सिस्टम, ग्लास कॉकपिट वगैरह जैसी कई खास तकनीक विकसित की गईं।
कहानी पूर्वोत्तर भारत की : भाग -1 भारत की संवेदना- सात राज्य, सात बहनें
भारत के उत्तर -पूर्वी राज्य या पूर्वोत्तर भारत और अलग – अलग क्षेत्रों में अपना योगदान देने वाले वहां के लोग हमारे भारत का ही अभिन्न अंग हैं। हाल ही में देहरादून में एंजल चखमा कांड में जो हुआ, हम उसकी तह में नहीं जाते मगर पूर्वोत्तर भारत के साथ होने वाला सौतेला व्यवहार एक सच्चाई है। मोमो, चाइनीज और चीनी बुलाने वाले लोग यह नहीं जानते है कि ये राज्य भारत के लिए कितने जरूरी है और बेशकीमती हैं और इसके लिए दोषी हम और आप तो हैं ही, सरकारें भी हैं जिन्होंने हमारी किताबों तक, हमारी जनता तक इन राज्यों की संस्कृति को, इतिहास को, समस्याओं तक पहुंचने ही नहीं दिया। हमें गर्व होना चाहिए हमारी सात बहनों पर और उनके भाई सिक्किम पर, वे हैं जो हंमारी सीमाओं पर डंटे हैं, हमारी रक्षा कर रहे हैं। जिस जम्मू – कश्मीर पर सारे संसाधन खर्च किये जाते रहे, आज भी वहां के लोग खुद को भारतीय नहीं कहना चाहते मगर हमारी सात बहनों के वासी गर्व के साथ खुद को भारतीय कहते हैं। शुभजिता के संसाधन सीमित हैं मगर उद्देश्य एक कि हम अपनी सात बहनों और उनके भाई को समझें। आखिर ऐसे कैसे कोई बाहरी व्यक्ति हमें इनसे अलग करने की बात कहकर चला जाता है..तो एक कोशिश है हमारे सात राज्यों को समझने की…हम कोशिश करेंगे कि इन राज्यों की संस्कृति, उनका इतिहास, योगदान आप तक लाने की…जिसकी जानकारी हमने इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री से ली है। हम कोई क्रांति नहीं कर रहे, हम बस कोशिश कर रहे हैं कि भारत अपने हिस्से को समझे और समुचित सम्मान दे…शुरुआत परिचय से
-सम्पादक
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यह लेख जागरण जोश से जो गरिमा झा ने लिखा है
भारत के सात बहन राज्यों की राजधानियाँ: यह लेख भारत के सात बहन राज्यों और उनकी राजधानियों पर चर्चा करता है। बहन राज्यों के बारे में विस्तार से जानें। भारत की सात बहनों की राजधानियाँ: क्या आपको भारत के उत्तर-पूर्व में स्थित राज्यों के नाम याद हैं? क्या आप जानते हैं कि उत्तर-पूर्वी राज्यों में से सात बहनें हैं और एक उनका भाई है? ये राज्य न केवल अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण बल्कि अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विशिष्टता के कारण भी विशेष महत्व रखते हैं। ये राज्य हैं अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मिजोरम, मेघालय, नागालैंड और त्रिपुरा। आइए इनके बारे में और अधिक जानें।
भारत के सात बहन राज्य कौन से हैं?
पूर्वोत्तर के सात राज्यों को भारत के सात बहन राज्य कहा जाता है। ये राज्य हैं- अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मिजोरम, मेघालय, नागालैंड और त्रिपुरा। भारत के सात बहन राज्यों की यह उपाधि अक्सर पूर्वोत्तर के इन राज्यों को संदर्भित करती है। सिक्किम को आमतौर पर इन राज्यों का भाई कहा जाता है।
इन्हें भारत की सात बहनें क्यों कहा जाता है?
इन राज्यों को इनकी परस्पर निर्भरता और समानता के कारण सात बहनें कहा जाता है। इस नाम के पीछे एक और कारण यह है कि इन पूर्वोत्तर राज्यों तक पहुँचने का एकमात्र मार्ग सिलीगुड़ी कॉरिडोर है, जिसे ‘चिकन नेक’ के नाम से भी जाना जाता है। आइए भारत के सात राज्यों की राजधानियों पर एक नजर डालते हैं-
राज्य -अरुणाचल प्रदेश, राजधानी -ईटानगर
राज्य – असम, राजधानी-दिसपुर
राज्य – मणिपुर, राजधानी -इम्फाल
राज्य- मेघालय, राजधानी -शिलांग
राज्य – मिजोरम, राजधानी -आइजोल
राज्य – नगालैंड, राजधानी -कोहिमा
राज्य – त्रिपुरा, राजधानी -अगरतला
अरुणाचल प्रदेश – अरुणाचल प्रदेश का शाब्दिक अर्थ है भोर की रोशनी से जगमगाते पहाड़ों की भूमि। यह भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में सबसे बड़ा राज्य है। एनसीईआरटी के अनुसार, यह 20 फरवरी 1987 को भारत गणराज्य का पूर्ण राज्य बना। 20 जनवरी 1972 तक इसे उत्तर-पूर्वी सीमांत एजेंसी (एनईएफए) के नाम से जाना जाता था। इसके बाद, यह केंद्र शासित प्रदेश बन गया और इसका नाम बदलकर अरुणाचल प्रदेश कर दिया गया। एक रोचक तथ्य यह है कि अरुणाचल प्रदेश चार देशों – पश्चिम में भूटान, पूर्व में म्यांमार और उत्तर में तिब्बत और चीन – के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा करता है। राजधानी, ईटानगर का नाम राजधानी परिसर में स्थित 14वीं शताब्दी ईस्वी के ‘ईटा किले’ (ईंटों से बना किला) से लिया गया है।
असम – असम को अक्सर पूर्वोत्तर राज्यों का प्रवेश द्वार माना जाता है। यह राज्य सिलीगुड़ी के पास ‘चिकन नेक’ नामक भू-पट्टी के माध्यम से देश के शेष भाग से जुड़ा हुआ है। असम भूटान और बांग्लादेश के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा करता है। दिसपुर इसकी राजधानी है। एनसीईआरटी के अनुसार, असम मुख्य रूप से दो नदी घाटियों से मिलकर बना है: उत्तर में ब्रह्मपुत्र नदी और उसकी सहायक नदियों द्वारा निर्मित घाटी; और दक्षिण में बराक नदी और उसकी सहायक नदियों द्वारा निर्मित घाटी। इन दोनों घाटियों के बीच पहाड़ियों की लंबी श्रृंखला (कार्बी, उत्तरी कछार और बराइल) फैली हुई है, जो राज्य की अधिकांश हरियाली और वन्यजीवों का स्रोत हैं। इसी अनूठी भौगोलिक विशेषता के कारण राज्य को ‘लाल नदी और नीली पहाड़ियों की भूमि’ के नाम से भी जाना जाता है।
मणिपुर – मणिपुर का शाब्दिक अर्थ है ‘रत्नों की भूमि’। इसके उत्तर, पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम में क्रमशः नागालैंड, असम और मिजोरम स्थित हैं। इम्फाल मणिपुर की राजधानी है। राज्य मुख्य रूप से दो क्षेत्रों में विभाजित है: मध्य भाग में स्थित मैदानी क्षेत्र जिसे इम्फाल घाटी के नाम से जाना जाता है और पहाड़ी क्षेत्र। घाटी में मैतेई जनजाति के लोग रहते हैं, जबकि पहाड़ी क्षेत्रों में कुकी, पुरम, तंगखुल आदि जनजातियाँ निवास करती हैं।
मेघालय – मेघालय शब्द दो संस्कृत शब्दों से मिलकर बना है — ‘मेघ’ का अर्थ है ‘बादल’ और ‘आलय’ का अर्थ है ‘निवास’, इस प्रकार इसका अर्थ है ‘बादलों का निवास’। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, मेघालय भारत में सबसे अधिक वर्षा प्राप्त करने वाले राज्य के रूप में जाना जाता है। यह राज्य अपनी हरी-भरी पहाड़ियों और मनमोहक झरनों के लिए भी प्रसिद्ध है। उत्तर और पूर्व में यह असम से और दक्षिण और पश्चिम में बांग्लादेश से घिरा हुआ है। शिलांग मेघालय की राजधानी है। खासी, जयंतिया और गारो जनजातीय समूह इस राज्य के निवासी हैं। मेघालय को 21 जनवरी 1972 को पूर्ण राज्य का दर्जा प्राप्त हुआ।
मिजोरम- मिजोरम का अर्थ है ‘पहाड़ी लोगों की भूमि’। इसकी राजधानी आइजोल है। यह दक्षिण और पूर्व में म्यांमार और पश्चिम में बांग्लादेश के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा करता है। एनसीईआरटी के अनुसार, 1986 में भारत सरकार और मिज़ो नेशनल फ्रंट के बीच ऐतिहासिक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर के बाद, इसे 20 फरवरी 1987 को राज्य का दर्जा दिया गया था। भारत के सभी राज्यों में मिजोरम में जनजातीय लोगों की जनसंख्या सबसे अधिक है।
नगालैंड – नागालैंड सात बहन राज्यों में से एक है। इसकी सीमा पश्चिम में असम और म्यांमार, उत्तर में अरुणाचल प्रदेश और असम के कुछ हिस्से तथा दक्षिण में मणिपुर से लगती है। इसकी राजधानी कोहिमा है। एनसीईआरटी के अनुसार, 1947 में भारत की स्वतंत्रता के समय नागालैंड असम प्रांत का हिस्सा था। 1957 में असम के नागा हिल जिले और तुएनसांग सीमांत क्षेत्र को मिलाकर एक प्रशासनिक इकाई बनाई गई। इसके बाद 1 दिसंबर 1963 को इसे आधिकारिक तौर पर राज्य का दर्जा दिया गया।
त्रिपुरा -त्रिपुरा भारत का तीसरा सबसे छोटा राज्य है। अगरतला इसकी राजधानी है। त्रिपुरा उत्तर-पूर्व में असम और मिजोरम के साथ सीमा साझा करता है और उत्तर, पश्चिम और दक्षिण में बांग्लादेश से घिरा हुआ है। ब्रिटिश शासन के समय त्रिपुरा एक रियासत थी। 1949 में, यह राज्य स्वतंत्र भारत का हिस्सा बन गया।
(साभार – दैनिक जागरण जोश)
संस्कृति को सहेजिए, भारत सुरक्षित हो जाएगा
वर्ष 2026 आ गया है और यह वह समय है जब हम बहुत सी विषम परिस्थितियों से जूझ रहे हैं। बंगाल में इस वर्ष विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं और उस पार बांग्लादेश में हिन्दुओं का उत्पीड़न जारी है, वह मारे जा रहे हैं। दूसरी तरफ हम भारतीय ही एक दूसरे से अनजान हैं। सच कहा जाए तो इस देश को नेताओं द्वारा किये जा रहे तुष्टीकरण का दीमक चाट रहा है। एक तरफ दक्षिण भारत के लोग उत्तर भारतीय लोगों को स्वीकार करना नहीं चाहते। उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के लोगों को प्रताड़ित करना आम बात है। एसआईआर के बाद पता चल रहा है कि हमारे देश की सरकारी नौकरियों पर विदेशी बांग्लादेशी बैठे हैं और उनको प्रश्रय दिया जा रहा है। हम सब अपनी डफली, अपना राग बजा रहे हैं। कश्मीरी हैं कि वे खुद को भारतीय नहीं कहना चाहते है। मुस्लिम हैं कि उनको वंदे मातरम् से लेकर अशोक स्तम्भ तक आपत्ति है। हिन्दुओं को सिक्खों को अलग किया जा रहा है और उत्तर -पूर्व भारत को तो हमने कभी समझा ही नहीं। हमारी किताबों से पू्र्वोत्तर भारत गायब है। हम लोकतांत्रिक होने का चाहे जितना भी दंभ भरें मगर सरकारों का सौतेला व्यवहार एक सच्चाई है। विकास इन राज्यों तक नहीं पहुंचा और इसका फायदा अलगाववादी ताकतें उठा रही हैं। सच तो यह है कि अगर हमारे उत्तर पूर्व के लोग अपनी सूरत के कारण आपको मोमो, चाइनीज और बहुत कुछ लगते हैं तो डियर, बाकी भारतीयों आप भी बांग्लादेशी और पाकिस्तानी कहकर कूटे जा सकते हो, बाहरी हमले हमसे पहले हमारे उत्तर-पूर्व के भाई- बहन झेलते हैं, कड़ाके की ठण्ड झेलते हैं, विकास के मामले में सबसे पीछे रखे गए…और उनके कारण ही हमारे बोल वचन निकल रहे हैं। ये सरकारों की गलती है कि उत्तर पूर्व भारत का इतिहास, उनकी संस्कृति से हम अनजान हैं, वैसे भी उत्तर भारतीयों का मिजाज कुछ अलग ही रहता है, उनको धन्यवाद कहिये क्योंकि देश भक्ति में उत्तर- पूर्व भारत बाकी सब पर 20 छोड़िए 21 पड़ेगा। हैरत इस बात की है प्रताड़ित करने वालों में वह लोग भी शामिल हैं जो खुद दूसरे राज्यों से धक्के मारकर निकाले जा रहे हैं। हम कश्मीरी हैं, पंजाबी हैं, गुजराती, बिहारी, बंगाली, मद्रासी, कन्नड़ में बंटे हैं मगर भारतीय अब तक नहीं बन सके हैं। हमें याद रखना होगा कि अपनी पहचान को बनाए रखते हुए हमें अलग-अलग फूलों को गूंथने के लिए हिन्दी की जरूरत है। सरकारें लड़वाती रहेंगी मगर उस मानसिकता को बदलने की जरूरत है जिसने अहंकार की चाशनी में डुबोकर हमारी भारतीयता को ढक दिया है। भारत की रक्षा के लिए भारतीय संस्कृति को हर दिशा से सहेजना हम सबका कर्त्तव्य है। नववर्ष 2026 की हार्दिक शुभकामनाएं।




