Monday, July 6, 2026
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शिव ही संगीत के आदिगुरु – प्रतिभा सिंह

प्रतिभा संगीत एकेडमी का उद्घाटन

टीटागढ़ । प्रतिभा संगीत एकेडमी का उद्घाटन वरिष्ठ संगीतकार नगेन्द्र चौधरी ने किया। एकेडमी की निदेशक प्रसिद्ध गायिका और फ़िल्म अभिनेत्री प्रतिभा सिंह ने कहा कि एकेडमी में गायन वादन और नृत्य में पारंगत कलाकार छात्रों को संगीत की तालीम देंगे। पवित्र सावन महीना शिव को अतिप्रिय है। यह एकेडमी भगवान शिव को समर्पित है। शिव ही संगीत के आदिगुरु हैं। भगवान शिव ने ही दुनिया में सबको नृत्य, वाद्य यंत्रों को बजाना और गाना सिखाया। राग शिवरंजनी की उत्पत्ति की कथा भी शिव से जुड़ी है। मान्यता है कि जब शिव तांडव कर रहे थे, तो उन्हें शांत करने के लिए साधु-संतों ने यह राग गाया था। समारोह में विशेष तौर पर उपस्थित कलाकार राकेश पाण्डेय, कुमार सुरजीत, बेबी काजल, साईं मोहन, शकुंतला साव, सुजाता गुप्ता, सुनीता सिंह, जय प्रकाश पाण्डेय आदि ने शिव भजनों की प्रस्तुति दी।

पर्यावरण, रोजगार और स्वास्थ्य के लिए फायदे का सौदा है पत्तलों में खाना

एक समय था जब किसी भी मांगलिक कार्य में या दुकानों पर पत्तलों का उपयोग हर जगह किया जाता था । पत्तलें उपयोग में तो अब भी लायी जा रही हैं मगर प्लास्टिक एवं थर्मोकॉल के कारण लोग इनका उपयोग कम करते हैं । दरअसल, पत्तल में खाना भारत की प्राचीन संस्कृति का अंग रहा है और रामायण से लेकर महाभारत में पत्तल के उपयोग का उल्लेख है । राजसूय यज्ञ में श्रीकृष्ण पत्तल उठाते हैं तो पत्तलों में छिपाकर पन्ना धाय महाराणा के पिता उदय सिंह के प्राण बचा लेती हैं । समय बदला और पत्तलों में सब्जी का रस या कोई भी तरल पदार्थ आम लोगों के लिए समस्या बन गया । पत्तलों में खाना लेकर खड़ा होना एक समस्या थी । हालांकि समस्या होती है तो समाधान होता ही है मगर समस्या यही है कि हम समाधान से अधिक विकल्प खोज लेते हैं । पत्तल को लेकर यदि शोध किये जाते, उसे मजबूत बनाने के तरीखे खोज लिए जाते तो योग की तरह पत्तल भी विश्व को भारत की अनुपम देन होता, जो है भी मगर इसके प्रचार की जरूरत है और उससे भी अधिक उपयोग की जरूरत है । अच्छी बात यह है कि आज स्टार्टअप की दुनिया में पत्तलों की वापसी हुई है और अब तो यह ई कॉमर्स साइटों पर भी बिक रहा है….मजे की बात यह है कि हमारी पत्तलों को विदेशी कम्पनियाँ हमें ही हर्बल और इको फ्रेंडली कहकर बेच रही हैं ।
ध्यान रखने वाली बात यह है कि सुपारी के पत्तों से बनी पत्तल या ऐसे कई पत्ते हैं, जिनसे बनी पत्तलें मजबूती वाली समस्या का समाधान कर चुकी हैं । बहरहाल हम आपको पत्तलों की बहुरंगी, पर्यावरण अनुकूल दुनिया में लिए चलते हैं और हमें लगता है कि पत्तल पर खाने के फायदे पढकर आप भी पत्तलों पर खाने से पीछे नहीं हटेंगे –


हमारे देश मे 2000 से अधिक वनस्पतियों की पत्तियों से तैयार किये जाने वाले पत्तलों और उनसे होने वाले लाभों के विषय में पारम्परिक चिकित्सकीय ज्ञान उपलब्ध है पर मुश्किल से पांच प्रकार की वनस्पतियों का प्रयोग हम अपनी दिनचर्या में करते हैं। आम तौर पर केले के पत्तों में खाना परोसा जाता है। प्राचीन ग्रंथों में केले के पत्तों पर परोसे गये भोजन को स्वास्थ्य के लिये लाभदायक बताया गया है।
आजकल महंगे होटलों और रिसोर्ट मे भी केले के पत्तों का प्रयोग होने लगा है। हर्बल आचार्य डॉ. दीपक आचार्य बताते हैं कि डिस्पोजल थर्माकोल में खाना खाने से उसमे उपिस्थ्त रसायन पदार्थ खाने में मिलकर पाचन क्रिया पर प्रभाव डालता, जिससे कैंसर होता है एंव डिस्पोजल के गिलास में बिस्फिनोल नामक केमिकल होता है जिसका असर छोटी आंत पर पड़ता है।                                                                                                                           ये हैं लाभ – पलाश के पत्तल में भोजन करने से स्वर्ण के बर्तन में भोजन करने का पुण्य व आरोग्य मिलता है। रक्त की अशुद्धता के कारण होने वाली बीमारियों के लिये पलाश से तैयार पत्तल को उपयोगी माना जाता है। पाचन तंत्र सम्बन्धी रोगों के लिये भी इसका उपयोग होता है। आम तौर पर लाल फूलों वाले पलाश को हम जानते हैं पर सफेद फूलों वाला पलाश भी उपलब्ध है। इस दुर्लभ पलाश से तैयार पत्तल को बवासीर (पाइल्स) के रोगियों के लिये उपयोगी माना जाता है। केले के पत्तल में भोजन करने से चांदी के बर्तन में भोजन करने का पुण्य व आरोग्य मिलता है। जोड़ों के दर्द के लिये करंज की पत्तियों से तैयार पत्तल उपयोगी माना जाता है। पुरानी पत्तियों को नयी पत्तियों की तुलना मे अधिक उपयोगी माना जाता है। लकवा (पैरालिसिस) होने पर अमलतास की पत्तियों से तैयार पत्तलो को उपयोगी माना जाता है।

ये भी मिलेगी राहत – सबसे पहले तो उसे धोना नहीं पड़ेगा, इसको हम सीधा मिट्टी में दबा सकते हैं। न पानी नष्ट होगा, न ही घरेलू सहायक की जरूरत पड़ेगी, मासिक खर्च भी बचेगा। न केमिकल उपयोग करने पड़ेंगे, न केमिकल द्वारा शरीर को आंतरिक हानि पहुंचेगी। अधिक से अधिक वृक्ष उगाये जायेंगे, जिससे कि अधिक आक्सीजन भी मिलेगी।                प्रदूषण भी घटेगा- सबसे महत्वपूर्ण झूठे पत्तलों को एक जगह दबाने पर, खाद का निर्माण किया जा सकता है, एवं मिट्टी की उपजाऊ क्षमता को भी बढ़ाया जा सकता है। पत्तल बनाए वालों को भी रोजगार प्राप्त होगा। सबसे मुख्य लाभ, आप नदियों को दूषित होने से बहुत बड़े स्तर पर बचा सकते हैं, जैसे कि आप जानते ही हैं कि जो पानी आप बर्तन धोने में उपयोग कर रहे हो, वो केमिकल वाला पानी, पहले नाले में जायेगा, फिर आगे जाकर नदियों में ही छोड़ दिया जायेगा, जो जल प्रदूषण में आपको सहयोगी बनाता है।
(साभार – गाँव कनेक्शन)

कुछ मिनटों की योग निद्रा से आप ले सकते हैं 8 घंटे की नींद

आज की जीवनशैली में हम कई तरह की बीमारियों का सामना करते हैं। इस व्यस्त जीवनशैली के कारण तनाम और मानसिक समस्याएं काफी अधिक बढ़ गई है। अत्यधिक स्ट्रेस होने के कारण आपको नींद की समस्या भी हो सकती है। कई लोगों को तनाव या अन्य बीमारी के कारण सही से नींद नहीं आती है। इस कारण से वे दिनभर थकान महसूस करते हैं। स्ट्रेस और बीमारियों को कम करने के लिए योग एक बेहतरीन विकल्प है। योग की मदद से आप कई तरह की समस्या से राहत पा सकते हैं। नींद न आने पर आप योग निद्रा भी कर सकते हैं। योग निद्रा आपकी नींद की समस्या को कम करेगा और आपको तनाव से राहत देगा। चलिए जानते हैं कि क्या है योग निद्रा और इसे कैसे करें….
क्या है योग निद्रा?
योग निद्रा को आध्यात्मिक नींद भी कहा जाता है। दरअसल योग निद्रा सोने व जागने के बीच की एक अवस्था है। इस अवस्था में आपके शरीर को आराम मिलता है और आपका माइंड रिफ्रेश होता है। योग निद्रा करने के बाद आपका शरीर एक ऊर्जा महसूस करता है। जिनकी नींद सही से पूरी नहीं होती है उनके लिए योग निद्रा बहुत फायदेमंद है। शुरुआत में योग निद्रा करते समय आप सो सकते हैं लेकिन धीरे-धीरे अभ्यास के ज़रिए आपको इसे ठीक से करना आ जाएगा।इसे करते समय आप जमीन पर मैट या कंबल बिछा लें। इसके बाद आप शवासन की तरह लेट जाएं। लेटने के बाद अपनी बॉडी को ढीला छोड़ दें और अपनी सांसों पर ध्यान दें। इसके बाद अपने अंतर्मन में झाकने की कोशिश करें। कुछ समय बाद आपका माइंड रिलैक्स हो जाएगा और आप शांति महसूस करेंगे।
बिहार स्कूल ऑफ योग के संस्थापक स्वामी सत्यानंद सरस्वती के अनुसार कुछ समय की योग निद्रा आपको घंटों की नींद से प्राप्त हुए आराम के सामान ही होती है। लगातार या नियमित रूप से योग निद्रा करने से आपका दिमाग पहले की अपेक्षा से कई अधिक सक्रिय हो जाता है। अगर आप नियमित रूप से योग करते हैं तो आप अन्य आसनों के बाद योग निद्रा कर सकते हैं।
क्या हैं योग निद्रा के फायदे?
योग निद्रा की मदद से आपका दिमाग शांत हो जाता है।
योग के अन्य आसन करने के बाद योग निद्रा करने से आपके शरीर का तापमान सामान्य हो जाता है।
योग निद्रा की मदद से आपका कंसंट्रेशन बढ़ता है और आपका दिमाग सक्रिय होता है।
स्ट्रेस रिलीफ के लिए योग निद्रा एक बेहतरीन विकल्प है जो आपके दिमाग को शांत करता है।
योग निद्रा की मदद से आप अपनी मेंटल हेल्थ को भी बैलेंस कर सकते हैं।
कैसे करें योग निद्रा?
योग निद्रा करने के लिए सबसे पहले आप एक खुली जगह चुनें जिसमें आपको कोई डिस्टर्ब न करें।
योग निद्रा करने के लिए ढीले कपड़े पहनें और नीचे बिछाने के लिए मैट या कंबल का इस्तेमाल करें।
इसके बाद मैट या कंबल पर शवासन की तरह लेट जाएं और आपनी बॉडी को रिलैक्स करें।
साथ ही अपने दिमाग को भी शांत करें और दिमाग में जो भी चल रहा है उसे भूल जाएं।
अब अपने ध्यान को आप दाएं पंजे या पैर पर ले जाएं और कुछ सेकंड तक वहां दयां केन्द्रित करें।
आप ध्यान को शरीर के ऊपर की ओर लाते हुए घुटनों व जांघों पर ध्यान दें।
यह प्रक्रिया अब आप बाएं पैर पर भी अपनाएं और ध्यान केन्द्रित करें।
इसके साथ आप अपने मध्य अंगों जैसे छाती, पेट व नाभि पर भी ध्यान केन्द्रित करने की कोशिश करें।
सभी जगह ध्यान केन्द्रित पर आप गहरी सांस लें और शरीर को रिलैक्स करें।
थोड़ी देर बाद आप दाहिने करवट लेते हुए, बाई ओर की नासिका से सांस बहार छोड़ दें।
इसके बाद आपके शरीर का तापमान सामान्य स्तर पर आ जाएगा और कुछ देर बाद आप उठकर बैठ जाएं।

मदर इंडिया – पितृसत्ता के खिलाफ स्त्री विमर्श का मुखर स्वर

कई क्लासिकल फिल्मों ने कई बॉलीवुड स्टार्स को रातों-रात स्टार बना दिया। इनमें से एक है ‘मदर इंडिया’। नारीवाद की नई लहर शुरू करने वाली इस फिल्म ने तीन पुरुषों को सुपरस्टार बना दिया। जिसमें सुनील दत्त, राज कुमार और राजेंद्र कुमार जैसे सितारों के नाम शामिल हैं। इस फिल्म में नरगिस ने मुख्य भूमिका निभाई, लेकिन यह पहली बार था कि एक शीर्ष अभिनेत्री अपनी युवावस्था में दो बड़े बच्चों की मां के रूप में बड़े पर्दे पर दिखाई दी। फिर जब ये फिल्म रिलीज हुई तो इसे देश के साथ-साथ विदेश में भी खूब प्यार मिला।
मदर इंडिया 1957 में रिलीज हुई थी। मेहबूब खान के निर्देशन में बनी यह फिल्म 1940 में आई फिल्म ‘औरत’ की रीमेक थी। जिसे इसकी ओरिजिनल फिल्म से भी ज्यादा प्यार मिला। यह फिल्म 60 लाख रुपए के बजट में बनी थी। जिसने बॉक्स ऑफिस पर 8 करोड़ का कलेक्शन किया था। ये अपने समय की रिकॉर्ड तोड़ कमाई थी।
ये फिल्म पितृसत्तात्मक समाज के खिलाफ सशक्त स्त्री की कहानी थी जो एक आम महिला की कहानी कहती है। इस फिल्म में नरगिस, सुनील दत्त, राजेंद्र कुमार और राज कुमार ने मुख्य भूमिका निभाई थी। ‘मदर इंडिया’ की कहानी गरीबी से जूझ रही राधा (नरगिस) नाम की एक ग्रामीण महिला के इर्द-गिर्द घूमती है जो अपने पति की अनुपस्थिति में अपने बेटों का पालन-पोषण करने और सभी बाधाओं से लड़ते हुए अपना जीवन यापन करने के लिए संघर्ष करती है। ऐसा कहा जाता है कि फिल्म का शीर्षक अमेरिकी लेखिका कैथरीन मेयो की 1927 की विवादास्पद पुस्तक मदर इंडिया का मुकाबला करने के लिए चुना गया था, जिसमें भारतीय संस्कृति की निंदा की गई थी।

डिजिटल शिक्षा, रोजगार और मूल्यपरक शिक्षा पर केन्द्रित होगा हिन्दी का नया पाठ्यक्रम – डॉ. राजश्री शुक्ला

राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू हो गयी है और इसे ध्यान में रखकर नये सिरे से पाठ्यक्रम बनाया जाने लगा है । उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अगर कलकत्ता विश्वविद्यालय की बात की जाए तो स्नातक एवं स्नातकोत्तर स्तर पर पाठ्यक्रम तैयार करने की प्रक्रिया आरम्भ हो चुकी है । इस परिप्रेक्ष्य में प्राध्यापकों को शामिल किया जा रहा है और हिन्दी के पाठ्यक्रम, पठन – पाठन को लेकर कार्यशालाएं आयोजित की जा रही हैं । ऐसी ही एक कार्यशाला गत 13 जुलाई को कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज में आयोजित की गयी थी । हिन्दी पठन – पाठन और पाठ्यक्रम को नये सिरे से संवारना इतना आसान नहीं है मगर समय की माँग को देखते हुए अब हिन्दी के पाठ्यक्रम में डिजिटल शिक्षा और रोजगार पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है । शुभजिता ने हिन्दी पठन -पाठन, पाठ्यक्रम समेत कई अन्य मसलों को लेकर कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी स्नातक अध्ययन बोर्ड की अध्यक्ष डॉ. राजश्री शुक्ला से बातचीत की । शुभजिता के पाठकों के लिए साक्षात्कार के महत्वपूर्ण बिन्दु प्रस्तुत हैं –
प्र. राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर आप क्या कहना चाहेंगी और इसका हिन्दी पाठ्यक्रम पर क्या प्रभाव पड़ सकता है ?
राष्ट्रीय शिक्षा नीति, मुझे लगता है कि काफी अच्छे तरीके से सोच – विचार कर बनायी गयी है और इसमें विद्यार्थियों के बहुमुखी विकास का सुझाव है । सीमाएं सभी जगह रहती हैं तो अपनी सीमाओं के साथ ही आगे बढ़ना होगा लेकिन बहुमुखी विकास का उपाय हैं इसके अन्तर्गत, जैसे विद्यार्थी एक साल पढ़कर तय करेगा कि कौन से विषय सबसे ज्यादा उसकी मति और गति है, तब जाकर के वह ऑनर्स चुनेगा ।
दूसरी बात यह है कि बहुत अच्छा हिस्सा यह है सीवीएसी..कॉमन वैल्यू ऐडेड कोर्स, इस कोर्स का होना उन सभी कमियों को दूर करेगा जिसकी चर्चा बार – बार सभी शिक्षाशास्त्री, खासकर हम जैसे शिक्षा से जुड़े हुए लोग कर रहे थे कि विद्यार्थियों को किताबी शिक्षा मिल जाती है, ज्ञान मिल जाता है लेकिन जीवन मूल्य नहीं मिल पाते । भारतीय पारम्परिक जीवन मूल्य जैसे – समावेशीकरण..अर्थात विभिन्नता में एकता, देखने में बाहरी विभिन्नता दिखने के बावजूद आन्तरिक जो एकात्मकता के जो सूत्र हैं, वह सूत्र, पर्यावरण अध्ययन । तो इस तरह के जो विषय शामिल किए गये हैं, वे बहुत स्वागत योग्य हैं ।
प्र. नये पाठ्यक्रम को लेकर किस तरह की चुनौतियाँ हैं ?
शुरुआत में सभी को थोड़ी मुश्किल लगती है क्योंकि पेपर का नाम बदल गया है, प्रश्नपत्रों के कोड बदले हैं और तीन साल के लिए पढ़ने वाला बी.ए. 4 साल के लिए हो गया है । इसमें एक खूबी यह है मुझे जो समझ में आती है कि तीन साल में भी बी.ए. पढ़कर भी लोग निकल सकते हैं । रोजगार की दृष्टि से सोचें तो बहुत सकारात्मक कदम है कि बी.ए. एक साल में पढ़कर भी विद्यार्थी को एक साल की डिग्री मिल जाएगी बी.ए. की, वह जहाँ कहीं भी जरूरत होगी, देकर रोजगारपरक कार्य में शामिल सकता है और तीन साल में भी पढकर निकल सकता है और उसकी बी.ए. की डिग्री तीन साल की बी.ए. की डिग्री होगी लेकिन जिन लोगों की उच्च शिक्षा में रुचि होगी, सिर्फ वह लोग 4 साल का बी.ए. करेंगे और उसके आगे एम.ए. करेंगे तो मैं व्यक्तिगत रूप से हमेशा यह सोचती थी कि भारत में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भीड़ बहुत है और गुणवत्ता की कमी है । यहाँ बी.ए. में ही गुणवत्ता की दृष्टि से विद्यार्थी समझ जाएगा कि उच्च शिक्षा की दिशा में उसकी रुचि है या इसकी रुचि रोजगारपरक दूसरे क्षेत्रों में है, तो वह 2 -3 साल में निकलकर दूसरे क्षेत्र अपना लेगा ।
जिनकी रुचि में शोध में, नये अनुसंधानों में, ज्ञान – विज्ञान को गहराई से पढ़ने में है, उच्च शिक्षा के क्षेत्र में है, वह लोग चौथे साल बी.ए. पढ़ेंगे और उसके बाद एम.ए. पढ़ेंगे । चौथे साल में बी.ए. में रिसर्च करना, यह भी सकारात्मक कदम है क्योंकि 3 साल पढ़ते – पढ़ते विद्यार्थी यह समझ जाता है कि रिसर्च कैसे करना चाहिए, उसे थोड़ा अन्दाज हो जाएगा कि शोध कैसे किया जाएगा । इससे एम. ए. के बाद पी.एच.डी. में जो शोध किया जाता है, उसकी गुणवत्ता में वृद्धि होगी क्योंकि एक बार वह सीख चुका रहेगा कि शोध कैसे करना है, और तब वह इसके बाद गुणवत्ता की दृष्टि से पी.एच.डी. के शोध में ज्यादा सकारात्मक योगदान कर सकेगा ।
प्र. क्या हिन्दी पाठ्यक्रम में डिजिटल शिक्षा को स्थान दिया जाने वाला है ?
यह जो हिन्दी वाला पाठ्यक्रम बना है, विशेषकर कलकत्ता विश्वविद्यालय ने जो पाठ्यक्रम बनाया है विद्यार्थियों के लिए और सभी विद्यार्थियों के लिए, इसमें डिजिटल लिटरेसी के नाम पेपर ही बना रहे हैं । डिजिटल लिटरेसी का पेपर पढ़ना – पढ़ाना आज की डिजिटल दुनिया और उसके बढ़ते महत्व को देखते हुए अत्यंत स्वागत योग्य है । आजकल विद्यार्थी सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते हैं, साथ ही यूपीआई का उपयोग कर रहे हैं, विभिन्न डिजिटल माध्यमों का उपयोग कर रहे हैं । इनसे लाभ तो हैं मगर इसके साथ ही इसके खतरे भी हैं, साइबर अपराध बढ़ रहे हैं, जानकारी के अभाव में विद्यार्थी ठगी का शिकार हो जाते हैं । डिजिटल साक्षरता के अध्ययन से विद्यार्थी को पता रहेगा कि सोशल मीडिया का प्रयोग करते हुए उसको कितनी दूर तक किस सीमा में रहना है, कितनी दूर तक जाना है । इन विचारों को ध्यान में रखते हुए कलकत्ता विश्वविद्यालय ने डिटिटल लिटरेसी के नाम से कोर्स बनाया है और हिन्दी के पाठ्यक्रम में भी डिजिटल साक्षरता के नाम से एक पेपर तैयार किया गया है । यह नया बनाया गया पेपर है जो हमारे हिन्दी के विद्यार्थियों को डिजिटलाइजेशन की दृष्टि से, डिजिटल दुनिया को समझने में बहुत मदद करेगा ।
प्र. पाठ्यक्रम को रोजगारपरक बनाने के लिए किस तरह के प्रयास किये जा रहे हैं ?
दूसरी बात यह है कि रोजगारपरक कार्यक्रमों के परिप्रेक्ष्य में विचार किया जाए तो पत्रकारिता तो अब हिन्दी के विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में अब यूँ ही पढ़ाई जा रही है लेकिन प्रयोजनमूलक हिन्दी, अनुवाद, पत्रकारिता, इस प्रकार के विषय हैं जो विद्यार्थियों को रोजगार के क्षेत्र में ले जाते हैं । उन विषयों पर अलग – अलग पेपर का पढ़ाया जाना और उनमें व्यावहारिक शिक्षा को ज्यादा बढ़ाया जाना, यह इस बार के पाठ्यक्रम में किया जा रहा है । पिछले कुछ वर्षों का उदाहरण दूँ तो कलकत्ता विश्वविद्यालय के एम. ए. के विद्यार्थी अब जिस संख्या में अध्यापक बनने के लिए आगे बढ़ते हैं तो करीब – करीब, उतनी ही संख्या या उससे अधिक अनुवादक, राजभाषा अधिकारी बनने के लिए इस प्रकार रोजगारपरक कार्यक्रमों की ओर बढ़ जा रहे हैं । अब ये विद्यार्थी जब बी.ए. से एम.ए. में आते हैं तो तब उनको यह समझ में आ जाता है कि अनुवाद पढ़कर वे रोजगार के क्षेत्र में सीधे आगे जा सकते हैं । शिक्षक बनने में जो समय लगता है, उस समय को छोटा करते हुए वे इस तरह के क्षेत्रों में आगे जा सकते हैं तो इन विषयों पर ज्यादा महत्व दिया जा रहा है, ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है ।
दूसरी बात यह है कि अभी हम लोगों ने अनुवाद वाले पेपर में दुभाषिया, बहुभाषिकता को भी पाठ्यक्रम में शामिल किया है तो बहुभाषिकता को शामिल करने से, दुभाषिये का कोर्स शामिल करने से बहुत लाभदायक हो रहा है ।आज भारत पर्यटन की दृष्टि से आगे बढ़ रहा है और इस क्षेत्र में दुभाषिये की बड़ी उपयोगिता है । दूसरी तरफ विश्व बाजार में भी भारत एक बहुत बड़े बाजार के रूप में उभर रहा है तो मल्टीनेशनल कम्पनियों में इस तरह की योग्यता रखने वाले लोगों की बहुत जरूरत पड़ रही है जो एक से अधिक या ज्यादा भाषाएं जानते हों । ऐसा लगता है कि विद्यार्थी रोजगार की दृष्टि से थोड़ा आगे बढ़ पाएंगे । कुछ सुविधाएं तो कम से कम जरूर होंगी ।
प्र. पारम्परिक पाठ्यक्रम क्या पूरी तरह बदलने जा रहा है ?
पारम्परिक पाठ्यक्रम को हम छोड़ेंगे नहीं बल्कि पारम्परिक पाठ्यक्रम में जो विषय कम हो रहे थे, जैसे व्याकरण का ज्ञान जरूरी है । पिछले कुछ वर्षों से हमने गौर किया कि व्याकरण में बहुत ज्यादा त्रुटियाँ विद्यार्थियों से बहुत ज्यादा हो रही थीं तो हमने अब उच्च शिक्षा में, बी.ए. की कक्षा में भी व्याकरण को शामिल किया जो पिछले कई वर्षों से, लंबे समय से कम हो गया था । इस विचार से कि स्कूल से विद्यार्थी व्याकरण पढ़कर आएंगे तो बार – बार व्याकरण उन्हें क्यों पढ़ाया जाए? लेकिन विद्यार्थियों के जीवन को देखकर, विद्यार्थियों की व्यावहारिक स्थिति को देखकर यह तय किया गया कि व्याकरण को स्नातक स्तर पर पाठ्यक्रम में लाया जाए । इस प्रकार पारम्परिक शिक्षा तो दी जा रही है लेकिन चूंकि सेमेस्टर हो गया है, पेपर बढ़ गये हैं, पेपर की संख्या बढ़ा दी गयी है तो पारम्परिक शिक्षा के कोर्स को भी थोड़ा कम किया गया है और उन जगहों पर व्यावहारिक शिक्षा को लाया जा रहा है, लागू किया जा रहा है ।
प्र. पाठ्यक्रम निर्माण की प्रक्रिया में प्राध्यापकों और विद्यार्थियों को किस तरह शामिल किया जा रहा है ?
बी.ए. में तो इस वर्ष से नया पाठ्यक्रम लागू हो गया । इस वर्ष दाखिला लेने वाले विद्यार्थी नया पाठ्यक्रम ही पढ़ेंगे । शिक्षकों से राय मशवरा तो आजकल लिया ही जाता है, आधिकारिक रूप से भी और अनौपचारिक रूप से शिक्षकों की राय मानकर के, चुनकर और सुनकर ही । राय -परामर्श चूंकि अधिक नहीं हो पाया था इसलिए हमने सिर्फ एक वर्ष का यानी दो सत्रों का ही पाठ्यक्रम बनाया और बाकी सारे पाठ्यक्रम का हिस्सा बनना अभी बाकी है और इसमें शिक्षकों की पूरी राय लोकतांत्रिक पद्धति से ली जा सके, इसके लिए हिन्दी का सहायक शिक्षा बोर्ड, उच्च शिक्षा बोर्ड, उसने यह तय किया कि इस प्रकार की कई कार्यशालाएं आयोजित की जाएं, जैसी कि कलकत्ता गर्ल्स कॉलेज में आयोजित की गयी जिससे अध्यापक अपनी ओर से अपनी राय तो बताएं ही कि कौन सा विषय रखना है, किन – किन विषयों में, किसको – किसको शामिल करना है, साथ ही प्रश्न कैसे बनेंगे, इसको लेकर हम लोगों की एक योजना है कि हम एक विस्तृत प्रश्न बैंक तैयार करेंगे तो प्रश्न बैंक होने पर अध्यापकों को पढ़ाने में सुविधा होगी, प्रश्न तैयार करने वालों को प्रश्नपत्र तैयार करने में सुविधा होगी, परीक्षकों को कॉपी देखने में सुविधा होगी और विद्यार्थियों को पढ़ने में सबसे अधिक सुविधा होगी ।
प्र. आमतौर पर पाठ्यक्रम में महिला रचनाकारों को समुचित स्थान नहीं मिल पाता, नये पाठ्यक्रम में क्या कुछ परिवर्तन देखने को मिलेंगे ?
यह योजना तो है कि महिला लेखन में सिर्फ एक महिला को शामिल कर लिया जाए, पूरे पाठ्यक्रम के अंत में, और वहाँ जाकर खुद को संतुष्ट कर लेना है तो इस भावना को छोड़कर आगे बढ़ना है क्योंकि यह पाठ्यक्रम ऐसे समय में बन रहा है जब स्त्री विमर्श अपनी परिपक्वता के दौर में आ चुका है । पुराने समय की भी अनेक विस्मृत कवयित्रियाँ, विस्मृत लेखिकाएं, इनका परिचय हमें प्राप्त हो रहा है । अभी हमने जितने पेपर बनाये हैं, उसके अन्तर्गत तो यह कार्य नहीं हो सका क्योंकि हमने मध्यकालीन काव्य तक, और आधुनिक युग में छायावादी काव्य तक ही पहुँच पाए हैं । फिर हमें भी अपनी सीमा का ध्यान रखना पड़ता है कि अगर हम अपने पाठ्यक्रम में 4-5 कवियों या लेखकों को ही स्थान दे सकते हैं तो उन रचनाकारों को गुणवत्ता की दृष्टि से, रचनात्मक संतुलन की दृष्टि से और आलोचकों के विचार से, सभी कसौटियों पर कसकर यह देखना होगा कि किसी एक स्थापित रचनाकार के स्थान पर किसी एक महिला रचनाकार को अगर रखने जाते हैं तो उनका प्रामाणिक ग्रन्थ उपलब्ध होना चाहिए । सिर्फ छिटपुट रचनाओं के आधार पर हम उन्हें पाठ्यक्रम में स्थान दे दें, ये करने की स्थिति में हम अभी नहीं हो पाए हैं लेकिन निश्चय ही हम लोगों ने इस बात पर विचार किया है कि स्त्री लेखन को, स्त्री रचनाकार को, पूरी धारा के बाद अन्त में एक पैराग्राफ में छोड़ा जाता है, उससे स्त्री को कहें, दलित को कहें, हाशिए के विमर्श को, आदिवासी के विमर्श को कहें, इनको हम एक पैराग्राफ में सीमित रखकर नहीं छोड़ेंगे बल्कि जिन रचनाकारों की चर्चा आज चल रही है, जिनकी प्रामाणिक रचनाएं उपलब्ध हैं, उनको हम पाठ्यक्रम में स्थान देंगे ।

स्वाधीनता सेनानी भी थीं मुंशी प्रेमचंद की पत्नी शिवरानी देवी

कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की पत्नी शिवरानी देवी न केवल साहित्य में निपुण थीं बल्कि कम ही लोगों को पता है कि उन्होंने आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों से जमकर लोहा लिया था। खुद प्रेमचंद ने शिवरानी के जेल जाने पर कहा था कि उन्होंने अपना सम्मान बहुत बढ़ा लिया है। आजादी की लड़ाई लड़ने वाली महिलाओं में उनका नाम वैसे दर्ज नहीं हुआ जैसे होना चाहिए था। वह उतना मशहूर नहीं हो पाईं लेकिन वह आजादी की लड़ाई लड़ने वाली महिलाओं के समूह की नेत्री थीं। स्वतंत्रता की लड़ाई में दुकानों पर विदेशी सामान की बिक्री का विरोध करने और धरना देने कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा था। उनका नाम था शिवरानी देवी वे हिंदी के महान साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद की पत्नी थीं। उन्होंने आजादी की लड़ाई न केवल संघर्ष बल्कि अपनी साहित्यिक कामों से भी आगे बढ़ाई थी।
पंडित नेहरू की मां स्वरूप रानी नेहरू की गिरफ्तारी के विरोध में भाषण
मशहूर आलोचक वीरेंद्र यादव कहते हैं, ‘मुंशी प्रेमचंद करीब साढ़े 6 साल लखनऊ में रहे। 1924-1930 तक वह अपने दो बेटों, बेटी और पत्नी शिवरानी देवी के साथ लखनऊ में निवास किया। मुंशी प्रेमचंद और शिवरानी आजादी की लड़ाई लड़ते हुए जेल जाना चाहते थे। शिवरानी आजादी की लड़ाई में दो महीने जेल में भी रहीं।’ शिवरानी को 11 नवंबर 1930 को अमीनाबाद के झंडेवाला पार्क में विदेशी सामान की बिक्री कर रहे दुकान के सामने धरना देने के कारण गिरफ्तार किया गया था। यादव कहते हैं, ‘वह हमेशा लोगों के सामाजिक के साथ-साथ आर्थिक विकास की बात करती थीं। वह स्वतंत्रता संग्राम में लगातार हिस्सा लेती रहीं। पूर्व पीएम जवाहर लाल नेहरू की मां स्वरूप रानी नेहरू की झंडेवाला पार्क में गिरफ्तारी के विरोध में शिवरानी देवी भाषण दिया था।’
महिला कार्यकर्ताओं की नेत्री थीं शिवरानी
उन्होंने कहा कि शिवरानी लगातार आजादी की लड़ाई में भाग लेती रहीं और वह इतना लोकप्रिय हो गई थीं कि जब कांग्रेस कार्यकर्ता मोहन लाल सक्सेना ने महिला वॉलिंटियर की लिस्ट बनाई तो शिवरानी को इसका कैप्टन बनाया था। यादव ने कहा कि आजादी की लड़ाई में उनके भाग लेने की सबसे खास बात ये थी कि उनके पति मुंशी प्रेमचंद को भी इसकी जानकारी तक नहीं थी। प्रेमचंद को यह जानकारी तब मिली जब उनके पास कांग्रेस वॉलिंटियर की सूची को हिंदी और उर्दू में अनुवाद के लिए भेजा गया था। यहां प्रेमचंद ने इसमें अपनी पत्नी का नाम देखा।
माताजी मुझे नौकरी में 23 रुपये मिलते हैं। अगर कहीं और मुझे 10 रुपये की नौकरी भी मिल जाए तो इस बुरी नौकरी को मैं लात मार दूं। मेरे लिए यह बेहद दुखदायी है कि मैं अपनी माताओं, बहनों की पूजा करने की बजाए उन्हें जेल ले जा रहा हूं।
मनोहर बंदोपाध्याय की किताब ‘लाइफ एंड वर्क्स ऑफ प्रेमचंद’ में शिवरानी देवी की गिरफ्तारी का विस्तारपूर्वक जिक्र है। ‘प्रेमचंद घर में’ शिवरानी की गिरफ्तारी के दौरान पुलिसवालों की भावनाओं का भी जिक्र है। किताब में लिखा है कि झंडेवाला पार्क में शिवरानी की गिरफ्तारी के दौरान एक पुलिसवाला भावुक हो गया। वह इन महिलाओं के देश की आजादी के लिए जेल जाने के इस जज्बे को देख भावुक हो गया था।
नौकरी तक छोड़ने को हो गया था तैयार पुलिसकर्मी
किताब में पुलिसवाले से बातचीत का भी जिक्र है। ‘माताजी मुझे नौकरी में 23 रुपये मिलते हैं। अगर कहीं और मुझे 10 रुपये की नौकरी भी मिल जाए तो इस बुरी नौकरी को मैं लात मार दूं।’ पुलिसवाले की इस बात को सुनकर शिवरानी ने उन्हें ढाढस बंधाया और कहा कि आप अपनी ड्यूटी कर रहे हैं। इसपर पुलिसवाले ने कहा कि आप कितनी महान हैं। यही वजह है कि आप जेल जा रही हैं। मेरे लिए यह बेहद दुखदायी है कि मैं अपनी माताओं, बहनों की पूजा करने की बजाए उन्हें जेल ले जा रहा हूं।’
खराब सेहत के बावजूद अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा
जेल से छूटने के बाद भी शिवरानी देवी चुप नहीं बैठीं। इस दौरान उनकी सेहत भी खराब होने लगी थी। उन्होंने जेल में सी क्लास के कैदियों से खराब बर्ताव और सर्दी के सीजन में कंबल नहीं देने के खिलाफ प्रदर्शन का आयोजन किया। उनके प्रदर्शन का ही नतीजा था कि अधिकारी उनकी मांगों के आगे झुक गए।
शिवरानी की गिरफ्तारी और प्रेमचंद की प्रतिक्रिया
लखनऊ विश्वविद्यालय के शिक्षक रविकांद चंदन ने बताया कि जब शिवरानी देवी को गिरफ्तार किया गया था तो प्रेमचंद वाराणसी में थे। बाद में वह जेल गए और पत्नी से कहा, ‘तुम नहीं, जेल में मैं हूं। क्योंकि मुझे अपने बच्चों की देखभाल करनी है।’ प्रेमचंद को लगता था कि वाराणसी से लौटने के बाद उन्हें कभी भी गिरफ्तार किया जा सकता है। बल्कि वह तो उस महान दिन का इंतजार कर रहे थे। वह इस बाद से गदगद थे कि उनकी पत्नी ने उनपर बढ़त बना ली है। प्रेमचंद ने कहा कि उनकी पत्नी से अपना सम्मान बहुत ऊंचा कर लिया है। पत्नी की गिरफ्तारी पर प्रेमचंद बोले – तुम नहीं, जेल में मैं हूं। क्योंकि मुझे अपने बच्चों की देखभाल करनी है।
एक निपुण साहित्यकार भी थीं शिवरानी
शिवरानी का हाथ साहित्य में भी निपुण था। लेकिन कुछ समय बाद ही उन्होंने इसे तिलांजलि दे दी। उन्होंने 1931 में अपनी पहली कहानी ‘साहस’ प्रकाशित किया था। इस कहानी की जानकारी भी प्रेमचंद को इसके प्रकाशित होने के बाद लगी। शिवरानी की अपने पति प्रेमचंद पर किताब ‘प्रेमचंद घर में’ प्रेमचंद के साहित्य के प्रति उनका अमूल्य योगदान है।
हर साल घर बदल देते थे
लखनऊ में रहने के दौरान यह जोड़ा हर साल अपने घर बदल लेता था। क्योंकि गर्मियों की छुट्टियों में प्रेमचंद अपने घर वाराणसी के लम्ही चले जाते थे। वह ऐसा इसलिए करते थे क्योंकि वह किराए पर खर्च वहन नहीं कर पाते।
शिवरानी और प्रेमचंद की शादी
मदन गोपाल की किताब ‘मुंशी प्रेमचंद’ के अनुसार, प्रेमचंद ने एक शादी के विज्ञापन वाले कॉलम में एक इश्तेहार देखा था। इस इश्तेहार में फतेहपुर जिले के सलीमपुर गांव के मुंशी देवीप्रसाद ने विज्ञापन दिया था कि उनकी बेटी जिसकी शादी 11 साल की उम्र में किया गया था। शादी के 3 महीने बाद ही वह विधवा हो गई। इस विज्ञापन को देखने के बाद प्रेमचंद ने अपनी शिक्षा और तनख्वाह की जानकारी भेजी। उन्होंने बाल विधवा से विवाह का प्रस्ताव भेजा। शिवरानी के पिता देवीप्रसाद जो आर्य समाज को मानने वाले थे, वह विधवा विवाह के समर्थक थे और उन्होंने एक पर्चा प्रेमचंद को भेजा और फतेहपुर बुलाए। उनको प्रेमचंद पसंद आए। उन्होंने प्रेमचंद को आने का किराया दिया और कुछ उपहार दिए। शिवरानी ने बताया कि उनकी शादी के प्रेमचंद के परिवार से सहमति नहीं मिली। इसके बाद प्रेमचंद ने इसके बारे में परिवार के किसी सदस्य को बताया भी नहीं। उन्होंने मुझसे शादी की। उस वक्त ये बहुत बड़ा कदम था।
अनुवाद कर घर चलाते थे प्रेमचंद
शिवरानी देवी साहित्य में निपुण तो थीं लेकिन अंग्रेजी में उनका हाथ तंग था। वह अंग्रेजी समझ नहीं पाती थीं। प्रेमचंद ब्रिटिश राज के दौरान सबसे प्रभावकारी अंग्रेजी अखबार ‘लीडर’ में छपे खबरों का अनुवाद करते थे।
शिवरानी की कहानी ‘साहस’, एक ढृढ़ लड़की की कहानी
शिवरानी ने अपनी कहानी साहस को चांद के संपादक को भेजी। संपादक ने अपनी मैगजीन में उनकी कहानी छाप दी। उन्होंने कहानी के लेखक का नाम लिखा था शिवरानी देवी, प्रेमचंद की पत्नी। सहगल ने प्रेमचंद को उस मैगजीन की कॉपी प्रतिज्ञा के किश्त के साथ भेज दी। उन्होंने कथा सम्राट को बधाई देते हुए कहा कि उनकी पत्नी ने भी लिखना शुरू कर दिया है। साहस एक ऐसे लड़की की कहानी थी जिसने अपनी शादी के वक्त अपने होने वाली पति की पिटाई की थी।
(साभार – नवभारत टाइम्स)

54वें गारमेंट बायर्स एंड सेलर्स मीट में 700 करोड़ का कारोबार

कोलकाता । पश्चिम बंगाल गारमेंट मैन्युफैक्चरर्स एंड डीलर्स एसोसिएशन की ओर से विश्व बांग्ला मेला प्रांगण में 20,21 और 22 जलाई को आयोजित तीन दिवसीय 54वें गारमेंट बायर्स एंड सेलर्स मीट में देश-विदेश के 700 से अधिक स्थानीय और राष्ट्रीय ब्रांडों ने भाग लिया। यह प्रदर्शनी इस क्षेत्र की सबसे पुरानी प्रदर्शनी है। इस मीट में देश-विदेश से आये 2000 से अधिक आगंतुकों ने लगभग 700 करोड़ रुपये का व्यापारिक लेनदेन किया। इस अवसर पर पश्चिम बंगाल गारमेंट मैन्युफैक्चरर्स एंड डीलर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष हरि किशन राठी ने कहा, इस उद्योग में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर लगभग 50 लाख से अधिक कर्मचारी जुड़े हुए है। इस मीट ने बंगाल में रेडीमेड गारमेंट उद्योग को बढ़ावा देने में खुद को हर बार साबित किया है। हम रेडीमेड गारमेंट के व्यापार और विपणन को बढ़ावा देने के लिए सरकार के प्रयासों की सराहना करते हैं। उन्होंने कार्यकारी समिति, प्रायोजकों और प्रतिभागियों की टीम के प्रति अपना आभार और सराहना व्यक्त की, जिन्होंने इस कार्यक्रम को सफल बनाया। उन्होंने प्रगति मैदान थाना और डब्ल्यूबीआईडीसी को भी उनके समर्थन और सहयोग के लिए उनके प्रति आभार प्रकट किया। वेस्ट बंगाल गारमेंट मैन्युफैक्चरर्स एंड डीलर्स एसोसिएशन में उपस्थित अन्य प्रमुख समिति के सदस्यों में: विजय करीवाला (वरिष्ठ उपाध्यक्ष), प्रदीप मुरारका (उपाध्यक्ष), देवेन्द्र बैद (माननीय. सचिव) , कन्हैयालाल लाखोटिया (कोषाध्यक्ष), प्रेम कुमार सिंहल (संयुक्त. कोषाध्यक्ष) के अलावा अमरचंद जैन, तरूण कुमार झाझरिया, आशीष झंवर, मनीष राठी, कमलेश केडिया, मनीष अग्रवाल, किशोर कुमार गुलगुलिया, विक्रम सिंह बैद, सौरव चांडक, विजय अग्रवाल, मनीष जैन, साकेत कुमार खंडेलवाल, अजय सुल्तानिया, राजीव केडिया, संदीप राजा, बृज मोहन मूंधड़ा, भुवन अरोड़ा, मोहित दुगड़- साथ कार्यकारी समिति के सदस्य, हरि प्रसाद शर्मा के साथ पूर्व अध्यक्ष चांद मल लढ़ा मौजूद थे।

कर्नाटक पर्यटन स्टैंड टीटीएफ कोलकाता 2023 में सर्वश्रेष्ठ साज – सज्जा वाला स्टैंड

कोलकाता । कर्नाटक पर्यटन ने टीटीएफ कोलकाता 2023 में सर्वश्रेष्ठ साज – सज्जा वाले स्टैंड का खिताब अपने नाम कर लिया । गत 14 जुलाई से 16 जुलाई तक विश्व बांग्ला कन्वेंशन सेंटर में आयोजित इस पर्यटन मेले में कर्नाटक के 100 वर्ग मीटर के विशाल स्टैंड में अपनी विरासत और वन्य जीवन को बढ़ावा देकर सराहना बटोरी । स्टैंड ने प्रतिष्ठित मैसूर पैलेस गेट को प्रदर्शित किया, जो राज्य की शाही विरासत का प्रतीक है। इसके अतिरिक्त, अपनी स्थापत्य सुंदरता के लिए प्रसिद्ध अच्युत मंदिर की संरचना को प्रमुखता से प्रदर्शित किया गया, जो कर्नाटक के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व को उजागर करता है।
टीटीएफ कोलकाता 2023 में कर्नाटक पर्यटन स्टैंड को सर्वश्रेष्ठ सजावट के लिए उत्कृष्टता पुरस्कार मिला। यह मान्यता स्टैंड की उत्कृष्ट प्रस्तुति और रचनात्मक डिजाइन को दर्शाती है, जो आगंतुकों के लिए एक व्यापक और दृश्यमान मनोरम अनुभव प्रदान करने के लिए कर्नाटक की प्रतिबद्धता को उजागर करती है। स्टैंड ने विरासत और वन्य जीवन के तत्वों को प्रभावी ढंग से संयोजित किया, जो राज्य के अद्वितीय आकर्षणों का व्यापक प्रतिनिधित्व प्रदान करता है। विरासत और वन्य जीवन को सहजता से एकीकृत करके, टीटीएफ कोलकाता 2023 में कर्नाटक पर्यटन स्टैंड ने आगंतुकों को एक व्यापक अनुभव प्रदान किया, जो उन्हें कर्नाटक की समृद्ध सांस्कृतिक टेपेस्ट्री और प्राकृतिक चमत्कारों का पता लगाने के लिए आमंत्रित करता है।
कर्नाटक पर्यटन स्टैंड का उद्घाटन राज्य के पर्यटन मंत्री बाबुल सुप्रियो ने किया । इस मौके पर श्री द्वारा किया गया। बाबुल सुप्रियो, पर्यटन मंत्री, पश्चिम बंगाल, , केएसटीडीसी की महाप्रबंधक इंदिरम्मा, केएसटीडीसी के प्रबंधक मनोज कुमार एवं जंगल लॉज एंड रिसॉर्टस के प्रबंधक मंजुनाथ भी उपस्थित थे । आयोजन के दौरान, कर्नाटक पर्यटन प्रतिनिधिमंडल ने घरेलू टूर ऑपरेटरों, ट्रैवल एजेंटों और अन्य प्रमुख हितधारकों के साथ चर्चा की। इन बातचीतों का उद्देश्य मौजूदा संबंधों को मजबूत करना और नई साझेदारियां स्थापित करना है, जिससे अंततः कर्नाटक में पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा।

भवानीपुर फुटसल 2023 में दिखा विद्यार्थियों का उत्साह

कोलकाता । “हम एक साथ खड़े हैं, हारें या जीतें – हम एक टीम हैं।” ये ऐसे शब्द हैं जो फुटबॉल जैसे खेल से पूरी तरह मेल खाते हैं। एक सार्वभौमिक प्रशंसक आधार के साथ, यह खेल दुनिया भर में छोटे और बड़े सभी रूपों में खेला जाता है। ‘फुटसल’ एक फीफा-मान्यता प्राप्त छोटे-पक्षीय इनडोर फुटबॉल खेल है जिसमें फुटबॉल के प्रकार के विपरीत प्रत्येक पक्ष में केवल 5 खिलाड़ियों की आवश्यकता होती है जिसमें 11 लोगों की आवश्यकता होती है। छात्रों को जीवंत और सक्रिय रखने के लिए, भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज ने भवानीपुर फुटसल 2023 का आयोजन किया, जो इस खेल में रुचि रखने वाले कई छात्रों के लिए एक शानदार अवसर था। कैंपस टर्फ इस तरह के आयोजन की मेजबानी के लिए एक उपयुक्त स्थान था क्योंकि खिलाड़ी अपनी सर्वश्रेष्ठ क्षमता से प्रदर्शन कर सकते थे जबकि दर्शक अपना उत्साह बनाए रखने के लिए उत्साहित रहते थे। कुल 56 टीमों ने भाग लिया, यह आयोजन 11, 12 और 13 जुलाई 2023 को हुआ।पहले दिन, यानी 11 जुलाई को, राउंड 1 के लिए 28 मैच निर्धारित थे जो कि क्वालीफाइंग राउंड था। पहले दिन के अंत में, 28 टीमें बची थीं। दूसरे दिन का खेल ख़त्म होने तक 14 टीमें खेल में बची थीं। अंतिम लेकिन महत्वपूर्ण बात, तीसरा दिन वह था जब विजेता सामने आएगा और अपनी सही स्थिति का दावा करेगा। तीसरे दिन चौथा राउंड या क्वार्टर-फ़ाइनल, सेमी-फ़ाइनल और फ़ाइनल सुबह 10:00 बजे से होंगे। जब तीसरा दिन समाप्त हुआ, तो टीम ‘अंकारा मेस्सी’ विजयी रही, टीम ‘वीकेंड वॉरियर्स’ प्रथम उपविजेता रही और टीम ‘6 सुपर स्ट्राइकर्स’ क्रमशः द्वितीय उपविजेता रही।
यह स्पष्ट था कि छात्र खेल के प्रति जुनूनी थे क्योंकि वे चिलचिलाती धूप में खेलते थे और भारी बारिश होने पर भी नहीं रुके। जब दोनों टीमों ने अपने मैचों के अंत में हाथ मिलाया तो सभी खिलाड़ियों ने बेहतरीन खेल भावना का परिचय दिया। कई टीमें अपने मैच से पहले और बाद में रणनीतियों का विश्लेषण करने और दूसरों को प्रोत्साहित करने के लिए टर्फ के बाहर अतिरिक्त समय बिताती थीं। 13 जुलाई को समापन समारोह में विजेता तीनों टीमों को हमारे डीन सर प्रो. दिलीप शाह द्वारा मेडल एवं प्रमाण पत्र से सम्मानित किया गया। दिलीप शाह ने कहा कि यह आयोजन एक सफल पहल था और कॉलेज अपने छात्रों को अपने कौशल दिखाने के लिए एक मंच प्रदान करने के लिए खेल से संबंधित अन्य कार्यक्रम आयोजित करता रहेगा। कुल मिलाकर 58 टीमें थीं। इस प्रकार लगभग 360 छात्रों ने खिलाड़ियों और स्वयंसेवकों के रूप में टूर्नामेंट में भाग लिया। वहाँ दो पेशेवर रेफरी थे जिन्होंने यह सुनिश्चित किया कि निष्पक्ष खेल हो। अंततः खेल स्वयं विजेता रहा क्योंकि दीवार पर लिखा था धूप हो या बारिश, मज़ा हो या दर्द, हानि हो या लाभ, हम सभी ने अपने खेल के लिए सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। रिपोर्ट किया अनिकेत दासगुप्ता ने और जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।

भवानीपुर कॉलेज ने फिल्म निर्माण के लिए एक नया समूह सेल्युलाइड बनाया

कोलकाता । भवानीपुर एजूकेशन सोसाइटी कॉलेज के विद्यार्थियों की फिल्म निर्माण में रुचि जगाने के लिए अपने कई समूहों में से एक समूह रील्स को नई पहचान का नाम सेल्युलाइड दिया । 2023 से प्रभावी, बिल्कुल नए कलेक्टिव, ‘सेल्युलाइड’ का गठन भावी फिल्म निर्माताओं को फिल्म निर्माण के 10 महत्वपूर्ण पहलुओं जैसे निर्देशन, उत्पादन प्रबंधन, छायांकन और पटकथा लेखन आदि में ज्ञान और मार्गदर्शन प्रदान करने के उद्देश्य से किया गया था। समूह के संरक्षक, सुप्रोवो टैगोर ने ‘फर्स्ट स्टेप फॉरवर्ड’ नामक एक पहल का आयोजन किया, जिसमें सत्रों की एक श्रृंखला में 30 से अधिक छात्रों ने भाग लिया, जो इस क्षेत्र में कौशल का उपयोग कर एक सफल कैरियर बनाने के लिए सहयोगी सिद्ध होगा। यह प्रसिद्ध उक्ति है एलेजांद्रो गोंजालेज की कि “फिल्म बनाना आसान है; एक अच्छी फिल्म बनाना युद्ध है। एक बहुत अच्छी फिल्म बनाना एक चमत्कार है।”
इसका पहला सत्र एक प्रेरणादायी रहा जो 14 जून को प्लेसमेंट हॉल में हुआ और इसका उद्देश्य छात्रों को सेल्युलाइड के विचारों से परिचित कराना था। इसमें छात्र भविष्य के सत्रों में भाग लेने के लिए उत्सुक दिखाई दिए।
दूसरा सत्र 27 जून को सोसायटी हॉल में हुआ। सभी विद्यार्थियों को 4 लघु फिल्में दिखाई गईं जिनमें डूडलबग, टू, चटनी, और अहिल्या थीं। विद्यार्थी फिल्मों के अनुभव में डूबने और फिल्मों में प्रतिबिंबित विचारों पर ध्यान केंद्रित किया ।
तीसरे सत्र में छात्र छात्राओं द्वारा पिछले सत्र में देखी गई चार लघु फिल्मों पर चर्चा करने और अपनी राय साझा करने के लिए कॉलेज में एकत्रित हुए। इस संवादात्मक सत्र में छात्र छात्राओं ने फिल्म निर्माण पर दूसरों और अपने दृष्टिकोणों पर विस्तार से चर्चा की। अंत में, 7 जुलाई को 4ए में सेल्युलाइड द्वारा आयोजित नवीनतम सत्र में फिल्म ‘बाराका’ की स्क्रीनिंग शामिल थी, जो डेढ़ घंटे की डॉक्यूमेंट्री फिल्म थी जिसमें कोई कहानी नहीं थी और जिसका मुख्य विषय यह था कि फिल्म को कैसे दर्शाया जाए।इस दुनिया में जीवन की त्रासदी और जीवंतता दोनों आपस में जुड़ी हुई हैं।
समय के साथ, सेल्युलाइड समूह का लक्ष्य अधिक से अधिक छात्रों को इसमें सक्रिय भाग लेने और फिल्म निर्माण की कला सीखने के माध्यम से विस्तार करना है। ऐसे और भी कई मनोरंजक सत्र और कार्यक्रम हैं जिनकी मेजबानी और आयोजन के लिए यह समूह तत्पर है। सेल्युलाइड के पहले बैच के विद्यार्थियों को अच्छे फिल्म और थियेटर निर्माण में विशिष्टता प्राप्त गुरु सुप्रोवो टैगोर मिले हैं जिन्होंने उन्हें सिखाने की योजना बनाई है। फिल्मों और वृत्तचित्रों में उनके अद्वितीय दृष्टिकोण को कैसे मूर्त रूप दिया जाए इस कौशल का विकास किया जाएगा । रिपोर्ट दी अनिकेत दासगुप्ता ने और जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।