मिदनापुर । विद्यासागर विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग की ओर से हिंदी दिवस के अवसर पर ‘हिंदी में रोजगार की संभावनाएं एवं चुनौतियाँ’ विषय पर परिचर्चा का आयोजन हुआ। इस अवसर पर हिंदी विभाग की छात्राओं द्वारा उद्घाटन गीत एवं विभागाध्यक्ष द्वारा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के सचिव प्रो. मनीष आर. जोशी द्वारा भेजे गए संदेश का पाठ किया गया । स्वागत वक्तव्य देते हुए विभागाध्यक्ष डॉ प्रमोद कुमार प्रसाद ने हिंदी में रोजगार की संभावनाओं की चर्चा करते हुए कहा कि हिंदी पढ़कर हम शिक्षक, अनुवादक, राजभाषा अधिकारी, रिसर्च अधिकारी, फ़ीचर लेखक, दुभाषिए, संवाददाता आदि बन सकते हैं। अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए प्रो. दामोदर मिश्र ने कहा कि मनुष्य जिन चीजों के कारण इतर प्राणियों से भिन्न है वह संस्कृति और सभ्यता है। सभ्यता और संस्कृति के मूल में भाषा है जो राष्ट्रीय एकता को बनाए रखती है। राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी की संभावनाएं और उससे मिलने वाले लाभ अधिक हैं। हिंदी के समक्ष प्रांतीय संकीर्णता,राजनीतिक स्वार्थ और आर्टिफिशियल इंटलीजेंस जैसी चुनौतियां भी हैं। विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. संजय जायसवाल ने कहा कि हिंदी भारतीय भाषाओं की आंगन है। इसका तमाम भारतीय भाषाओं के साथ सांस्कृतिक, राष्ट्रीय और सामासिकता का संबंध है। हिंदी में रोजगार की संभावना का प्रश्न नौकरियों के साथ हिंदी के प्रति हमारे व्यवहार और उसमें दक्षता हासिल करने से भी जुड़ा है। परिचर्चा में उष्मिता गौड़ा, सोनम सिंह, मदन शाह और नेहा शर्मा ने भी हिस्सा लिया। इस अवसर पर विभाग द्वारा आयोजित आशु भाषण प्रतियोगिता में प्रगति दुबे को प्रथम स्थान, नेहा शर्मा को द्वितीय स्थान, राया सरकार को तृतीय स्थान तथा नाजिया सनवर और श्रेया सरकार को विशेष स्थान मिला। इस अवसर पर विद्यार्थियों ने हिंदी के कई कवियों की कविताओं पर आधारित कविता कोलाज प्रस्तुति की। लक्ष्मी यादव, फ्रांसिस मारिया, पूनम, सिंपल, नम्रता राय, नाज परवीन, प्रीति तांती, रोजी परवीन, सत्यम पटेल, टीना परवीन, पूजा कुमारी, शाहीन किदवई, आर उमा,जूही कन्हैया, प्रतिमा पट्टनायक और रिया श्रीवास्तव ने काव्य पाठ किया। कार्यक्रम का सफल संचालन विभाग की शोधार्थी सुषमा कुमारी ने किया और धन्यवाद ज्ञापित करते हुए विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. श्रीकांत द्विवेदी ने कहा कि हिंदी के विकास और प्रगति के लिए हमें आलस्य छोड़ना होगा और हिंदी भाषा एवं साहित्य को समृद्ध करने के लिए उसका गहन अध्ययन-मनन भी करना होगा।
वाणी प्रवाह – हिन्दी है हम – कविता हिन्दी सिर्फ भाषा नहीं
“✍️दीपा ओझा”
“सिर्फ भाषा नहीं”
हिंदी, सिर्फ भाषा नहीं
हमारी माँ है,
जिसने ज्ञान दिया , पहचान दिया
देश नहीं, समाज नहीं
पूरे विश्व में स्थान दिया।
हिंदी, सिर्फ भाषा नहीं
भाव है ,
जिसने शब्द दिए, अभिव्यक्ति दी,
भावों को महसूस कर पाने की
गहरी शक्ति दी ।
हिंदी, सिर्फ भाषा नहीं
हमारी शिक्षा है
जिसने मान दिया, सम्मान दिया
हमें जीने को
गर्व पूर्ण अभिमान दिया।
हिंदी, सिर्फ भाषा नहीं
हमारी संस्कृति है
जिसमें साहित्य है, संगीत है
विभिन्न कलाओं से सम्पन्न
हमारी रीत है ।
हिंदी, सिर्फ भाषा नहीं
भारत की दड़कन,
भारत वासियों की प्रीत है ।
वाणी प्रवाह – हिन्दी हैं हम : वैज्ञानिक और पूर्णतः समर्थ भाषा

भाषा का लेकर चंदन, आओ कर लें अभिनंदन
की गर्व से हिन्दी बोलें, चलो हिन्दी के हो लें
संपूर्ण विश्व में एकमात्र भारत ही ऐसा देश है जो न केवल भौगोलिक क्षेत्रफल और जनसंख्या की दृष्टि से विशाल है अपितु हमें तो इस बात का भी गर्व है कि हमारे देश में लगभग 1652 विकसित एवं समृद्ध बोलियाँ प्रचलित हैं। इन बोलियों का प्रयोग करने वाले विभिन्न समुदाय अपनी-अपनी बोली को महत्त्वपूर्ण मानने के साथ-साथ उसे बोली के स्थान पर भाषा कह कर पुकारते हैं और उनमें से कुछ बोलियाँ ऐसी हैं भी जिनमें वे सभी गुण विद्यमान हैं जो किसी भी समर्थ भाषा में होने चाहिये।
ऐसे विराट और समृद्धशाली राष्ट्र में स्वाधीनता आंदोलन के काल में सम्पूर्ण देश के लिए संपर्क भाषा का चयन करना अत्यंत ही चुनौतीपूर्ण कार्य था। यह देश अपनी दासता की जंजीरों को तोड़ फेंकने के लिए तो संगठित था परन्तु एक संपर्क भाषा की अनिवार्यता अनुभव करते हुए भी इस प्रश्न पर सहमति नहीं हो पा रही थी कि विभिन्न प्रादेशिक भाषाओ में से किसे सम्पूर्ण देश के लिए संपर्क भाषा के रूप में प्रयुक्त किया जाए।
गहन विचार-विमर्श करने के उपरान्त स्वतन्त्रता संग्राम में जुटे हुए लगभग सभी प्रमुख नेता, राजनीतिज्ञ, क्रांतिकारी, साधु-संत और विद्वतजन इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि हिन्दी ही वह भाषा है जो सभी को एक सूत्र में पिरोने का सामर्थ्य रखती है, यही भाषा सेतु बनकर भावनात्मक स्तर पर सम्पूर्ण देश को एक करेगी। सबसे महत्त्वपूर्ण बात जो उन्हें लगी वह यह थी कि हिन्दी की अपनी स्वतंत्र लिपि है – देवनागरी लिपि – जो श्रेष्ठ वैज्ञानिक लिपि है और अपनी विशेषताओं के कारण सर्वगुण नागरी है।
विश्व पटल पर हिन्दी : यह सर्वविदित है की विश्व की समस्त भाषाओं की जननी संस्कृत ही है परन्तु इस देवभाषा का यदि कोई उत्तराधिकारी है तो वह हिन्दी ही है। अपनों के ही द्वारा दीन-हीन कहलाते हुए, अपमान का दंश झेलते हुए भी हिन्दी पूर्ण विश्वास से आगे बढ़ती चली गई और आज स्थिति यह है की यह भाषा वैश्विक स्तर पर प्रसिद्धि प्राप्त कर चुकी है। विश्वभर में हिन्दी का वर्चस्व तेजी से बढ़ता जा रहा है। आज वह विश्व के सभी महाद्वीपों तथा महत्त्वपूर्ण राष्ट्रों- जिनकी संख्या लगभग एक सौ चालीस है- में किसी न किसी रूप में प्रयुक्त होती है।
वर्तमान में वह बोलने वालों की संख्या के आधार पर चीनी के बाद विश्व की दूसरी सबसे बड़ी भाषा बन गई है। इस बात को सर्वप्रथम सन 1999 में “मशीन ट्रांसलेशन समिट’ अर्थात् यांत्रिक अनुवाद नामक संगोष्ठी में टोकियो विश्वविद्यालय के प्रो. होजुमि तनाका ने भाषाई आकड़ें पेश करके सिद्ध किया है। उनके द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार विश्वभर में चीनी भाषा बोलने वालों का स्थान प्रथम और हिन्दी का द्वितीय है। अंग्रेजी तो तीसरे क्रमांक पर पहुँच गई है।
इसी क्रम में कुछ ऐसे विद्वान अनुसंधित्सु भी सक्रिय हैं जो हिंदी को चीनी के ऊपर अर्थात् प्रथम क्रमांक पर दिखाने के लिए प्रयत्नशील हैं। डॉ. जयन्ती प्रसाद नौटियाल ने भाषा शोध अध्ययन 2005 के हवाले से लिखा है कि, विश्व में हिंदी जानने वालों की संख्या एक अरब दो करोड़ पच्चीस लाख दस हजार तीन सौ बावन (1,02,25,10,352) है जबकि चीनी बोलने वालों की संख्या केवल नब्बे करोड़ चार लाख छह हजार छह सौ चौदह (90,04,06,614) है। यदि यह मान भी लिया जाय कि आंकड़े झूठ बोलते हैं और उन पर आँख मूँदकर विश्वास नहीं किया जा सकता तो भी इतनी सच्चाई निर्विवाद है कि हिंदी बोलने वालों की संख्या के आधार पर विश्व की दो सबसे बड़ी भाषाओं में से है।
इक्कीसवीं सदी की भाषा : इस उत्तर आधुनिक काल में एक ओर जापान जैसे महान राष्ट्र की साठ प्रतिशत से अधिक आबादी लगभग साठ वर्ष को छूते हुए बुढ़ापे की ओर बढ़ गई है वहीं आज से लगभग 15 सालों के अंतर्गत अमेरिका और यूरोप का भी कुछ यही हाल होने वाला है। ऐसे में, विशाल जनसंख्या वाला भारत एक युवा राष्ट्र है, जिसे हम अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि मान सकते हैं। हमारे अलावा चीन भी अभी युवा और भारी जनसंख्या वाला देश है और यह बात आने वाले समय में दोनों ही देशों को लाभान्वित करेगी, जिसका कुछ हद तक परिणाम भी अब देखने को मिल रहा है। यह दौर विश्व भर में भारत के साथ-साथ हिन्दी के भी भाग्योदय का दौर है।
हमारे देश में 1980 के बाद चौसंठ करोड़ से ज्यादा बच्चे पैदा हुए हैं। जो विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों तथा अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक संस्थानों में शिक्षित हो रहे हैं। वे सन् 2025 तक पूर्ण विकसित और विभिन्न क्षेत्रों में प्रशिक्षित होकर अपनी सेवाएँ देने के लिए विश्व के समक्ष उपलब्ध होंगे। वे विश्व के सबसे तरुण मानव संसाधन होंगे जिस कारण दुनियाभर में उनकी पूंछ होगी। यही तरुण भारत जब विश्व के विभिन्न देशों की व्यवस्था और विकास परिचालन का सशक्त हस्ताक्षर बनेगा तब उसके साथ हिन्दी भी जायेगी। जब भारत विश्व की आर्थिक महाशक्ति बनेगा, व्यापार और उत्पादन दोनों ही भारत पर अधिक निर्भर होगा तब वैश्विक मंच पर स्वतः ही हिन्दी महत्वपूर्ण भूमिका का वहन करेगी। इतिहास में इसने भारत को जोड़ा था भविष्य में यह वैश्विक एकता का प्रतीक बनेगी और विश्वभाषा कहलाएगी।
वैज्ञानिक और पूर्णतः समर्थ भाषा : वह दिन बीत गए जब हिन्दी को असमर्थ बोलकर उसकी अवमानना की जाती थी, अब वह समर्थ भाषा के रूप में ख्याति प्राप्त है। विश्व की श्रेष्ठ भाषाओं में स्थान पाने वाली अन्य भाषाओं में भी हिन्दी जैसा गुण और तत्व नहीं है। यह एक ऐसी भाषा है जिसका सफर अ अनपढ़ से लेकर ज्ञ ज्ञानी तक परिलक्षित होता है। हमारी देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता तो सर्वमान्य है। देवनागरी में लिखी जाने वाली भाषाएँ उच्चारण पर आधारित हैं। हिन्दी की शाब्दी और आर्थी संरचना प्रयुक्तियों के आधार पर सरल व जटिल दोनों है। हिंदी भाषा का अन्यतम वैशिष्ट्य यह है कि उसमें संस्कृत के उपसर्ग तथा प्रत्ययों के आधार पर शब्द बनाने की अभूतपूर्व क्षमता है। वर्तमान में हिन्दी के पास पच्चीस लाख से ज्यादा शब्दों की सेना है। संसार की अन्यान्य भाषाओं के बहुप्रयुक्त शब्दों को उदारतापूर्वक ग्रहण करने का सामर्थ्य केवल हिन्दी में है।
इस भाषा की वैज्ञानिकता और सुव्यवस्था की छोटी सी झलक प्रस्तुत पंक्तियों से स्पष्ट होती है,
“सुनो क, ख, ग, घ, कंठ से उच्चरा, वहीं त, थ, द, ध दंत के हैं स्वरा,
ट, ठ, ड, ढ़ मूर्धन्य हुआ, य, र, ल, व अंतव्य हुआ, प, फ, ब, भ हैं ओष्ठे…”
संसार की बदलती चिंतनात्मकता तथा नवीन जीवन स्थितियों को व्यंजित करने की भरपूर क्षमता हिंदी भाषा में है, हमें इस दिशा में अब केवल अधिक बौद्धिक तैयारी तथा सुनियोजित विशेषज्ञता के साथ अपने कदम को बढ़ाने की आवश्यकता है।
साहित्य के क्षेत्र में :
भारत मां की गोद में जिसका, भोला बचपन बीता है
तुलसी ने मानस को रचकर, जनमानस को जीता है
सूर, कबीर, मीरा जिसके, थे सब रस के दीवाने
और बिहारी, घनानंद की ये ही मात पुनीता है
साहित्य जगत में हिन्दी की सृजन धारा लगभग बारह सौ सालों (आठवीं शताब्दी से लेकर वर्तमान में इक्कीसवीं शताब्दी) से प्रवाहित हो रही है। उसका काव्य साहित्य तो संस्कृत के बाद विश्व के श्रेष्ठतम साहित्य की क्षमता रखता है। उसमें लिखित उपन्यास एवं समालोचना भी विश्वस्तरीय है। आज हिंदी में विश्व का महत्त्वपूर्ण साहित्य अनुसृजनात्मक लेखन के रूप में उपलब्ध है और उसके साहित्य का उत्तमांश भी विश्व की दूसरी भाषाओं में अनुवाद के माध्यम से जा रहा है। “पद्मावत’, “रामचरित मानस’ तथा “कामायनी’ जैसे महाकाव्य विश्व की किसी भी भाषा में नहीं है। कबीर, तुलसी,सुर, जायसी, बिहारी, देव, घनानंद, गुरु गोबिंदसिंह, भारतेन्दु हरिश्चंद्र, जयशंकर प्रासद, पन्त, निराला, दिनकर, महादेवी वर्मा, धर्मवीर भारती, अज्ञेय आदि कवियों की रचनायों ने यह सिद्ध कर दिया है हिंदी में अपने भावों और विचारों को अभिव्यक्त करने की अद्भुत और अलौकिक शक्ति है। हमारे साहित्य का आंगन तो मुंशी प्रेमचंद जी की अद्वितीय कृतियों से भरा-पुरा है। वर्तमान समय में हिन्दी का कथा साहित्य भी फ्रेंच, रूसी तथा अंग्रेजी के लगभग समकक्ष है। आज हिंदी साहित्य की विविध विधाओं में जितने रचनाकार सृजन कर रहे हैं उतने तो बहुत सारी भाषाओं के बोलने वाले भी नहीं हैं। केवल संयुक्त राज्य अमेरिका में ही दो सौ से अधिक हिंदी साहित्यकार सक्रिय हैं जिनकी पुस्तकें छप चुकी हैं। समृद्धशाली हिन्दी साहित्य पूरे संसार में सम्मानित हो रहा है।
हिन्दी केवल विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की ही राष्ट्र भाषा नहीं है बल्कि पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, फिजी, मॉरीशस, गुयाना, त्रिनिदाद तथा सुरीनाम जैसे देशों की सम्पर्क भाषा भी है। वह भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों के बीच खाड़ी देशों, मध्य एशियाई देशों, रूस, समूचे यूरोप, कनाडा, अमेरिका तथा मैक्सिको जैसे प्रभावशाली देशों में रागात्मक जुड़ाव तथा विचार-विनिमय का सबल माध्यम है। हिन्दी के विकास रथ में हमें विधि, विज्ञान, वाणिज्य तथा नवीनतम प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में पाठ-सामग्री का तेजी से निर्माण करना होगा।
आज आवश्यकता है भारतीय जनमानस को अपनी हिन्दी के प्रति जागरूक होने की, उसे गर्व से व्यवहृत करने की। हम अंग्रेजों की दासता से तो मुक्त हो गए अब अंग्रेजी की बारी है। हमारा अँग्रेजी तथा विश्व कि किसी अन्य भाषा से कोई द्वेष नहीं है, हमें उन्हें अवश्य सीखना चाहिए, उनके समृद्ध साहित्य का आस्वादन करना चाहिए, उनमें उपलब्ध तकनीकी ज्ञान के भण्डार को आत्मसात करना चाहिए परन्तु इन सबके बीच अपनी हिन्दी का यथोचित सम्मान भी करना चाहिए।
(लेखिका कलकत्ता विश्वविद्यालय में पी.एच.डी. शोधार्थी हैं।)
प्रोफेसर प्रणय के संग्रहालय में साहित्य के पुरखे!

ऐसी विलक्षण सर्जना पर यदि किसी गुन के गाहक की दृष्टि पड़ती तो ये भी मैडम तुसाद या मकबूल फिदा हुसैन की पंक्ति में खड़े मिलते, लेकिन हिन्दी की कीर्ति पताका थामे धुन के पक्के प्रोफेसर प्रणय यश, वैभव की परवाह किए बगैर हिन्दी साहित्य के पुरखों को गढ़े जा रहे हैं।
उनके अनूठे संग्रहालय में अमीर खुसरो से लेकर दुष्यंत कुमार तक की पीढ़ी के साहित्यकारों की मूर्तियां विराजमान हैं।..यह वृस्तित सूची हिन्दी 170 साहित्यकारों की है।
खास बात यह कि इसमें जहाँ नीरज,किशन सरोज जैसे गीतकार हैं वहीं राजेन्द्र माथुर और प्रभाष जोशी भी शान से बिराजे हैं।
पहले जाने ये प्रोफेसर प्रणय कौन हैं और कहाँ रहते हैं..? प्रोफेसर प्रणय का ठिकाना फिलहाल मानिकपुर(चित्रकूट) है, पर कोई गारंटी नहीं कि वे कल भी यहीं रहेंगे। पाँच बरस पहले तक वे रीवा जिले के छोटे से कस्बे लालगाँव में थे।
वे यहाँ एक डिग्री कालेज में हिन्दी के प्रोफेसर थे। हिन्दी के साहित्यिक पुरखों को गढने का जुनून यहीं सवार हुआ। रिटायर होने के बाद वे डेरे-डकूले के साथ मूर्तियां भी बाँधकर ले गए अपने गृहग्राम मानिकपुर।
“खुसरो से लेकर दुष्यंत कुमार,सभी मिलेंगे प्रभाष जोशी राजेन्द्र माथुर के साथ।”
अब वे उस जगह की तलाश में हैं जहाँ एक ऐसा संग्रहालय बना सकें जिसमें अमीर खुसरो से लेकर नई पीढ़ी तक के यशस्वी साहित्यकारों की मूर्ति उनके कृतित्व-व्यक्तित्व के लेखांकन के साथ सजा सजा सकें।
वह जगह रीवा-सतना भी हो सकती है और भोपाल भी बशर्ते कोई संस्था या सरकार उनके गुन की गाहक बन सके।
फिलहाल रंगेय राघव की मूर्ति तराश रहे प्रणय बताते हैं कि कोई सौ साहित्यकारों की मूर्तियां वे गढ़ चुके हैं। उनकी सूची फिलहाल 170 की है पर मित्रों के सुझाव पर रोज जुड़ती जाती है।
जैसे आज ही मैंने तीन नाम सुझा दिए, हिन्दी आंदोलन खड़ा करने वाले डा.लोहिया, यशस्वी पत्रिका कल्पना के प्रकाशक बद्रीविशाल पित्ती और हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने की लड़ाई लड़ने वाले अनथक योद्धा श्यामरुद्र पाठक का। ये भी अब प्रणय की सूची में शामिल हैं।
फौरी याददाश्त के हिसाब से प्रणय जिन साहित्यकारों की मूर्तियां गढ़ चुके हैं उनमें ये सब हैं साथ ही वे कैफियत देते हैं कि हाँ इन्हें वरिष्ठता के क्रम से मत लीजियेगा। इन मूर्तिमान साहित्यकारों में हैं-
●सुनीति कुमार चटर्जी(भाषा वै.)
●भोलानाथ तिवारी ( भाषा वै.)
● कामता प्रसाद गुरु(व्याकरण )
●किशोरीदास बाजपेयी (व्याक)
● रामचंद्र शुक्ल ( आलोचक )
●नामवर सिंह (आलोचक)
● रामविलास शर्मा ( आलो .)
●माखनलाल चतुर्वेदी ( पत्रकार)
● प्रभाष जोशी
● राजेन्द्र माथुर
●चंदवरदायी
● जगनिक
●विद्यापति
●सुरदास
●मीरां
●कबीर
●तुलसी
● जायसी
● रसखान
●केशव
● रहीम
●भूषण
● भारतेन्दु
●प्रसाद ,
●निराला
●महादेवी
●राहुल सांकृत्यायन
● देवकी नंदन खत्री
● प्रेमचंद
● नागार्जुन
●त्रिलोचन
● मुकुटधर पाण्डेय
● अदम गोंडवी
●देवेन्द्र सत्यार्थी
● मुक्तिबोध
● यशपाल
●रेणु
● दिनकर
●अज्ञेय
● बालकृष्ण शर्मा नवीन
● श्रीलाल शुक्ल
● गोविन्द व्यास
●मन्नू भंडारी
●कृष्णा सोबती
●मृदुला गर्ग
● चित्रा मुद्गल
● नीरज
●दुष्यंत कुमार
● गोविन्द मिश्र
● किशन सरोज आदि हैं
प्रणय बताते हैं कि हिन्दी को खड़ी बोली का मान देने वाले अमीर खुसरो की मूर्ति अभी पिछले हफ्ते गढ़ी। चंदबरदाई को फिर से गढ़ना है क्योंकि उनकी मूर्ति में वे भाव अभी नहीं आ रहे हैं।
प्रोफेसर प्रणय स्वयं हिन्दी के यशस्वी साहित्यकार हैं। नागार्जुन के रचनाकर्म पर शोधकर डाक्टरी की उपाधि पाई। कविता, और कहानियों के कई संग्रह आ चुके हैं।
प्रणय सिद्धहस्त रेखाचित्रकार हैं। उनके रेखांकन देश की प्रसिद्ध पत्रिकाओं में प्रायः छपते रहते हैं। पेंटिंग्स का उनका अपना कलेक्शन है..उन्होंने वुडकार्विंग पर भी हाथ आजमाया।
प्रणय ने मूर्ति बनाने की निहायत नई शैली अपनाई। वे मूर्तियों को सीमेंट से तराशते हैं। प्रणय बताते हैं कि पहले छेनी- हथौड़ी के साथ शिल्प का काम करता था, उसमें दिक्कत यह थी कि भावभंगिमा में वह बारीकी नहीं आ पाती थी। फिर ऐसे पत्थरों का टोटा है जिसकी मूर्ति गढ़ी जा सके। तीसरे मूर्तियां बनाने का लक्ष्य बड़ा है और शिल्प का काम समय बहुत लेता है।
सीमेंट में आकृति कैसे सेट कर लेते हैं..? प्रणय बताते हैं कि पहले मिट्टी की मूर्तियां बनाते हैं, फिर उसे प्लास्टर आफ पेरिस में उतारकर फर्मा बना लेते हैं। उसी को सीमेंट में सेट कर लेते हैं। सीमेंट के काम में सफाई बहुत रहती है। मसलन झुर्रियाँ दर्शाना है या विशिष्ट भावभंगिमा देनी है तो इसमें आसान पड़ता है।
इनपर लागत का खर्चा कैसे जुटाते हैं? प्रणय का सीधा जवाब था- अपनी पेंशन से। यदि कलाकार का मेहनताना जोड़ दिया जाए तो अमूमन एक मूर्ति पर पच्चीस से तीस हजार की लागत आती है। चूँकि सामग्री का खर्चा डेढ़ दो हजार ही लगता है सो सब सध जाता है मेरा अपना मेहनताना मैं खुद ही हूँ।
प्रणय ने मूर्ति कला को व्यवसाय नहीं बनाया। प्रायः लोग मूर्तियां बनवाना चाहते हैं अच्छी खासी रकम देकर लेकिन यदि उस लोभ में फँस गया तो ये साहित्यिक पुरखे कल्पनाओं में ही धरे के धरे रह जाएंगे।
ऐसा कुछ विलक्षण काम करें यह ख्याल कहाँ से आया..? प्रणय बताते हैं कि नगर के चौराहों में नेताओं की मूर्तियां देखता हूँ तो लगता है कि यहाँ साहित्यकारों की होनी चाहिए.. बस यहीं से काम शुरू किया।
लेकिन अब मुश्किल इन सभी मूर्तियों के लिए संग्रहालय बनाने का है। जमापूंजी तो बची नहीं..। सतना के समीप दो एकड़ की जमीन ली है पर इस दृष्टि से वह जमी नहीं। देखता हूँ..कोई गुन का गाहक मिले तो उसी को ये सब सौंपकर मुक्त हो जाऊँ। इच्छा तो यह है कि राजधानी भोपाल में कहीं इन मूर्तियों के लिए जगह मिले।
प्रणय मजाक करते हुए कहते हैं कि आखिर इन पुरखों का भी तो कोई फर्ज बनता है किसी को यह सम्मति दें..कोई सेठ बद्रीविशाल पित्ती बनकर सामने आए..या भारतभवन पर अपनी पीठ ठोकने वाली सरकार ही कुछ सुने।
प्रणय स्वाभिमानी हैं, अपनी गढ़ी मूर्तियों में वे स्वयं को कबीर के निकट पाते हैं। कबीर माने निर्भय, अपना घर फूँककर मसाल दिखाने वाला। आज नहीं तो कल कोई न कोई गुन का गाहक मिलेगा और नहीं भी मिलेगा तो फिकर किस बात की..वे कहते हैं कि ये जिन्दगी तो मगहर में ही पल रही है न।
पुनश्च:
प्रो. प्रणय फिलहाल मानिकपुर(चित्रकूट) उप्र. में रहते हैं उनका मोबाइल नंबर है-
9451435245
कोई दाता-धर्मी, भामाशाह आपको मिले तो उसे इस लेख को जरूर पढ़ाइएगा..संभव है.. हिन्दी वांग्मय रचने वाले ये पुरोधा एक संग्रहालय में मूर्तिमान हो सकें.. और नई पीढी गर्वानुभूति कर सके।
काशी में होगी महिला गाइडों की नियुक्ति
वाराणसी । वाराणसी में पहली बार महिलाओं के लिए पर्यटन विभाग सीट आरक्षित कर रहा है. इसमें महिला गाइड शामिल होंगी । इसको लेकर के विभाग बाकायदा महिलाओं को प्रशिक्षण भी देगा. गौरतलब हो कि जी-20 में काशी आने वाली महिला मेहमानों के लिए महिला गाइड की आवश्यकता हुई थी जिसको देखते हुए विभाग में महिला गाइड्स की नियुक्ति के साथ उनके आरक्षण का प्लान बनाया गया है । पर्यटन विभाग की तरफ से इन महिला गाइड्स को नियुक्त किया जाएगा. इसके साथ ही इन महिलाओं को आज के परिवेश के हिसाब से प्रशिक्षण भी दिया जाएगा, जिससे वे विदेशी मेहमानों के साथ गाइड का काम कर सकें । जी-20 में इस बार विदेशी महिला मेहमानों को गाइड करने के लिए महिला गाइड की भी जररूत समझ में आई है । ‘वर्तमान में वाराणसी में पर्यटकों की संख्या बहुत ही अधिक हो गई है । बीते कई सालों के मुकाबले वाराणसी में पर्यटकों की संख्या 10 गुना बढ़ी है । इनमें घरेलू और विदेशी पर्यटकों दोनों की संख्या शामिल है । वाराणसी आने वाले पर्यटकों को वाराणसी के स्थानों से परिचित करा सकें, यहां के हेरिटेज, यहां के घाट का परिचय करा सकें. इसके लिए आवश्यकता है कि हम कुछ नए गाइड्स भी बनाएं । वाराणसी में महिला गाइड्स की संख्या लगभग 15 से 20 है । उनमें से बहुत से गाइड वर्तमान में काम कर रही हैं. कुछ नहीं भी कर रही हैं. इनको प्रशिक्षण के रूप में आज के परिवेश से परिचित कराने के लिए और कुछ नए गाइड्स को जोड़ने के लिए भी हम प्रयासरत हैं । विभाग के माध्यम से हम इन्हें प्रशिक्षण दिलाएंगे. इसके साथ ही पर्यटन उप निदेशक का कहना है कि, सभी गाइड्स को प्रशिक्षण दिलाने के साथ ही पर्यटन विभाग में जितनी महिला गाइड्स की आवश्यकता है, जल्द से जल्द उन्हें भी प्रशिक्षण दिलाया जाएगा । इस दौरान गाइड्स को बताया जाएगा कि वाराणसी में आने वाले पर्यटकों को किस तरह से वाराणसी के बारे में बताना है। उनका स्वागत किस तरह से करना है । इसके साथ ही वाराणसी की ऐसी कौन सी जगहें हैं ,जिनके बारे में उनका जानना जरूरी है. इसके साथ ही उन्हें अलग-अलग भाषाओं की ट्रेनिंग भी जा रही है, जिससे कि वह ठीक तरीके से विदेशी पर्यटकों को गाइड कर सकें। उन्हें लाइसेंस के साथ ही सर्टिफिकेट भी दिया जा रहा है ।
बंगाल में पोइला बैशाख को मनेगा राज्य दिवस
कोलकाता । पश्चिम बंगाल विधानसभा ने गत 7 सितंबर) को बांग्ला दिवस मनाने को लेकर एक प्रस्ताव पारित किया है। सीएम ममता बनर्जी ने कहा कि हम 15 अप्रैल को बांग्ला दिवस के रूप में मनाएंगे। वहीं, सीएम ममता बनर्जी ने एलान किया है कि राज्यपाल की मंजूरी के बावजूद हम 15 अप्रैल को बंगाल दिवस के रूप में मनाएंगे। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि भले ही राज्यपाल सीवी आनंद बोस ने प्रस्ताव को मंजूरी देने से इनकार कर दिया, लेकिन संकल्प के अनुसार यह दिन मनाया जाएगा। यह भी निर्णय लिया गया कि गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा लिखा गया प्रसिद्ध गीत ‘बांग्लार माटी, बांग्लार जोल (बंगाल की मिट्टी, बंगाल का पानी)’ राष्ट्रीय गीत की तर्ज पर राज्य गीत होगा।
15 अप्रैल को ‘बांग्ला दिवस’ के रूप में मनाया जाएगा: ममता बनर्जी
ममता बनर्जी ने आगे कहा,”पोइला बोइशाख, बंगाली कैलेंडर का पहला दिन, एक अत्यंत शुभ दिन माना जाता है। राज्य सरकार ने इस मामले पर कई प्रतिष्ठित व्यक्तियों से परामर्श किया और उनमें से अधिकांश ने ‘पोइला बोइशाख’ को पश्चिम बंगाल के राज्य दिवस के रूप में मनाने के पक्ष में आवाज उठाई।” उन्होंने आगे कहा कि अगर राज्यपाल प्रस्ताव को मंजूरी नहीं देते हैं तो भी मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। हम इसे राज्यत्व दिवस के रूप में मनाएंगे।
20 जून को स्थापना दिवस मनाने के खिलाफ ममता बनर्जी
बता दें कि केंद्र के निर्देश पर इस साल 20 जून को यहां राजभवन में राज्य का स्थापना दिवस मनाया गया था, ममता इसके खिलाफ है। इससे पहले चार साल पूर्व ममता सरकार ने बंगाल का नाम परिवर्तन को लेकर भी विधानसभा से प्रस्ताव पारित कराया था, लेकिन केंद्र ने इसकी मंजूरी नहीं दी है।
गणित की शिक्षिका से बनीं करोड़पति किसान, हजारों की जिंदगी बदली!
भोपाल । गणित में डिग्री। भोपाल के स्कूलों में सालों के शिक्षण का अनुभव। लोगों ने सोचा नहीं था कि प्रतिभा तिवारी करोड़ों रुपये का मुनाफेदार कृषि कारोबार खड़ा कर देंगी। यही नहीं, लगभग 1400 किसानों को ऑर्गेनिक फार्मिंग से उनकी आय दोगुनी करने में सहायता भी करेंगी। शादी के बाद प्रतिभा पति के साथ भोपाल में बस गईं। दोनों वहीं काम करने लगे। हालांकि, उनके पति के परिवार के पास भोपाल से 150 किमी दूर हरदा में 50 एकड़ जमीन थी। जब प्रतिभा हरदा आती थीं तो वह किसानों को अपनी ज्यादातर जमीन पर रसायन का इस्तेमाल करके फसल उगाते देखती थीं। एक छोटे से क्षेत्र में वे ऑर्गेनिक खेती करते थे। जब उन्होंने किसानों से भूमि के एक छोटे से टुकड़े पर जैविक फसलें उगाने का कारण पूछा तो जवाब मिला कि वे फसलें उनके खुद के उपभोग के लिए थीं। रसायनों का इस्तेमाल करके उगाई गई फसलें बाजार में बिक्री के लिए। इसने उन्हें बेचैन कर दिया। किसान अपनी फसलों में बहुत सारे रसायनों का उपयोग करते थे। प्रतिभा ने राज्य सरकार के कृषि विभाग की ओर से जैविक खेती पर आयोजित कार्यशालाओं और सेमिनारों में हिस्सा लेना शुरू किया। उन्होंने दिल्ली में ऑर्गेनिक खेती के एक कोर्स में भी दाखिला लिया। अपने पति और परिवार को भी जैविक खेती की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया। वे सभी झिझक रहे थे। इसलिए प्रतिभा ने सुझाव दिया कि वे एक छोटे से क्षेत्र में जैविक खेती करके शुरुआत करें। 2016 में उन्होंने जमीन के एक छोटे से हिस्से पर गेहूं उगाना शुरू कर दिया। पारंपरिक खेती से जैविक खेती में स्थानांतरित होने में लगभग तीन से पांच साल लगते हैं। कारण है कि भूमि को जहरीले रसायनों से छुटकारा पाना होता है। जैविक चीजों उपयोग करके मिट्टी की उर्वरता को पुनर्जीवित और सुधारना होता है।
शुरुआत में हाथ लगी निराशा
प्रतिभा शुरुआत में जिस जमीन पर जैविक खेती कर रही थीं वहां गेहूं की पैदावार 18 क्विंटल प्रति एकड़ से घटकर लगभग 10 क्विंटल प्रति एकड़ रह गई। उन्होंने जमीन के कुछ हिस्सों पर मूंग उगाने की भी कोशिश की। लेकिन कीटों ने पूरी फसल नष्ट कर दी। यह निराशाजनक था। लेकिन, उन्होंने इस झटके को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। जैविक उत्पादन की ओर बढ़ते हुए प्रतिभा ने साथ ही अपना जैविक उत्पाद ब्रांड ‘भूमिषा’ भी लॉन्च किया। उन्होंने 2016 में भोपाल में अपना स्टोर ‘भूमिषा ऑर्गेनिक्स’ शुरू किया। जहां गेहूं, चावल, दालें, मसाले, अचार, जड़ी-बूटियां, आटा, क्विनोआ जैसे खाद्य बीज और कोल्ड प्रेस्ड तेल सहित 70 प्रकार के जैविक खाद्य उत्पाद बेचे जाते हैं। भोपाल, दिल्ली और मुंबई में उनका लगभग 400 लोगों का कस्टमर बेस है। 2019 तक प्रतिभा ने अपनी पूरी जमीन को जैविक में बदल दिया। सरकार से सर्टिफिकेशन भी प्राप्त किया। वह गेहूं, कुलथी दाल, चने और अरहर जैसी फलियां उगाती हैं। उन्होंने रोजेला, मोरिंगा, हिबिस्कस और एलोवेरा जैसे औषधीय पौधे भी लगाए हैं। जैसे-जैसे मिट्टी कार्बनिक पदार्थों से समृद्ध होती गई, उसकी उपज में धीरे-धीरे सुधार हुआ। जैविक खेती के तहत फसल उत्पादन पारंपरिक खेती के बराबर हो गई। आज खेती और कृषि संबंधी गतिविधियों से उनका सालाना टर्नओवर एक करोड़ रुपये से ज्यादा है।
बंगाल में 40 हजार रुपये बढ़ा विधायकों का वेतन
कोलकाता । पश्चिम बंगाल के विधायकों के लिए बड़ी खुशखबरी है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने विधायकों के वेतन को लेकर बड़ी सौगात दी है। बता दें कि राज्य विधानसभा के मानसून सत्र के आखिरी दिन मुख्यमंत्री ममता ने विधायकों व मंत्रियों का वेतन 40 हजार रुपये प्रतिमाह बढ़ाने का एलान किया।
क्या मुख्यमंत्री का भी बढ़ेगा वेतन?
विधायकों का वेतन बढ़ाने का एलान करते हुए मुख्यमंत्री ममता ने कहा कि पहले देश में सबसे कम बंगाल के विधायकों का वेतन था। दरअसल, बंगाल के विधायकों को 10 हजार रुपये प्रतिमाह मिलता था, लेकिन ममता बनर्जी के एलान के बाद उनका वेतन बढ़कर 50 हजार रुपये प्रतिमाह हो गया, जबकि मंत्रियों को प्रतिमाह 51 हजार रुपये मिलेंगे।
इसी के साथ ही सवाल उठने लगे कि क्या मुख्यमंत्री के वेतन में भी बढोतरी होगी? हालांकि, मुख्यमंत्री ममता ने सदन को संबोधित करते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि मुख्यमंत्री के वेतन में कोई संशोधन नहीं होगा, क्योंकि वह लंबे समय से वेतन नहीं ले रही हैं।
बता दें कि राज्य मंत्रियों को 10,900 रुपये मिलते थे, जो अब 50,900 रुपये होंगे। पूर्ण प्रभार वाले कैबिनेट मंत्रियों को 11 हजार रुपये मिलते थे, जो अब 51,000 रुपये होंगे। कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री और विधायक मासिक वेतन के अलावा जो अन्य अतिरिक्त भत्ते पाने के हकदार हैं, वे वही रहेंगे।
सरकार की वेतन संरचना के अनुसार, राज्य के विधायकों को वेतन, भत्ते और समिति की बैठकों में भाग लेने के लिए अबतक मासिक कुल 81,000 रुपये मिलते थे। बढ़ोतरी के बाद अब से उन्हें कुल एक लाख 21 हजार रुपये मिलेंगे। इसी तरह अब से मंत्रियों को मिलने वाला वास्तविक मासिक भुगतान 1.10 लाख रुपये प्रतिमाह से बढ़कर लगभग 1.50 लाख रुपये प्रतिमाह हो जाएगा।
अंतरिक्ष की महाशक्ति बनेगा भारत, इसरो बनाएगा आसमान में दुनिया का तीसरा स्पेस स्टेशन
बंगलुरू । चंद्रयान-3 को चांद के दक्षिणी ध्रुव पर उतारकर इसरो ने एक ऐसा इतिहास रचा जिसकी दुनिया कायल हो गई । अब हमारा देश जल्द ही अंतरिक्ष की महाशक्ति के तौर पर जाना जाएगा. इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन और चीन के तियागोंग स्पेस स्टेशन के बाद भारत दुनिया का तीसरा स्पेस स्टेशन बनाएगा । चंद्रयान-3 मिशन के बाद भारत आदित्य L-1 मिशन लांच कर चुका है । अब बारी भारत के सबसे महत्वाकांक्षी मिशन गगनयान की है जो इसरो का पहला मानव मिशन होगा । ठीक इसके बाद भारत स्पेस स्टेशन प्रोजेक्ट पर काम शुरू करने वाला है जो उसे दुनिया की टॉप स्पेस एजेंसी की कतार में सबसे ऊपर लाकर खड़ा कर देगा ।
कैसा होगा भारत का स्पेस स्टेशन
भारत की ओर से जो स्पेस स्टेशन बनाया जाएगा उसका भार 20 टन होगा, जबकि इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन का भार तकरीबन 450 टन और चीनी स्पेस स्टेशन का वजन तकरीबन 80 टन तक है । इसरो की योजना इसे इस तरह तैयार करने की है ताकि इसमें 4-5 अंतरिक्ष यात्री रह सकें. इसे धरती की निम्न ऑर्बिट में स्थापित किया जाएगा. इसे लियो कहते हैं जो तकरीबन 400 किलोमीटर दूर है ।
2030 तक पूरा होगा सपना
भारत के स्पेस स्टेशन का ऐलान इसरो के निवर्तमान अध्यक्ष के सिवन ने 2019 में किया था । ये भी बताया था कि गगनयान मिशन के बाद भारत 2030 तक इस सपने को पूरा करेगा । दरअसल गगनयान मिशन इसका पहला चरण है जिसमें अंतरिक्ष यात्रियों को धरती से 400 किलोमीटर लियो कक्षा में भेजा जाएगा । जहां तक गगनयान मिशन जाएगा वहीं पर भारत ने स्पेस स्टेशन को स्थापित करने की योजना बनाई है। खास बात ये है कि भारत सरकार की ओर से स्पेस डॉकिंग जैसी तकनीक पर रिसर्च के लिए बजट में प्रावधान होने के बाद इस उम्मीद को और बल मिला । यह तकनीक स्पेस स्टेशन में प्रयोग की जाती है ।
अमेरिका देगा भारतीय एस्ट्रोनॉट को ट्रेनिंग
भारत का स्पेस स्टेशन बनकर तैयार होने से पहले ही अमेरिका भारतीय एस्ट्रोनॉट को प्रशिक्षण देगा. इसके लिए नासा और इसरो के बीच करार भी हो चुका है. 2024 में भारत के दो अंतरिक्ष यात्री इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन में भी जा सकते हैं। इससे पहले इन्हें अमेरिका के ह्यूस्टन में स्थित जॉनसन स्पेस सेंटर में ट्रेनिंग दी जाएगी। चंद्रयान-3 की लांचिंग के वक्त व्हाइट हाउस की ओर से जो बयान जारी किया गया था. उसमें भी इसकी पुष्टि की गई थी। व्हाइट हाउस की ओर से जारी बयान में कहा गया था कि भारत ने आर्टेमिस समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, चंद्रयान-3 की जानकारी इस मिशन के काम आएंगी और नासा भारत के एस्ट्रोनॉट को इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर रहने की ट्रेनिंग देगा. इसके अलावा केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने भी अपने बयान में कहा था कि गगनयान मिशन के बाद एस्ट्रोनॉट ट्रेनिंग लेने जाएंगे।
क्या होता है स्पेस स्टेशन
स्पेस स्टेशन अंतरिक्ष में ऐसा स्थान है जहां रहकर वैज्ञानिक तरह-तरह के रिसर्च करते हैं । यह स्टेशन लगातार धरती की ऑर्बिट में चक्कर लगाता रहता है । आम तौर पर एक एस्ट्रोनॉट को यहां 6 माह तक रहना होता है, उसके बाद दूसरा दल भेज दिया जाता है और पहला दल वापस आ जाता है । हर समय इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन पर कम से कम 7 एस्ट्रोनॉट रहते हैं, कभी-कभार इनकी संख्या बढ़ भी जाती है । इस इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन को 15 देशों ने मिलकर तैयार किया था । इसमें नासा, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी, कैनेडियन स्पेस एजेंसी, जापानी एयरोस्पेस एक्सपोरेशन एजेंसी और रूस की रॉसकॉसमॉस प्रमुख हैं. पहले इसे 2024 तक रहता था, लेकिन हाल ही में नासा ने इसे 2030 तक के लिए बढ़ा दिया है ।
हिन्दी दिवस विशेष – हिन्दी की अस्मिता को पहचान देने वाली नागरी प्रचारिणी सभा
नागरी प्रचारिणी सभा, हिन्दी भाषा और साहित्य तथा देवनागरी लिपि की उन्नति तथा प्रचार और प्रसार करनेवाली भारत की अग्रणी संस्था है। भारतेन्दु युग के अनन्तर हिन्दी साहित्य की जो उल्लेखनीय प्रवृत्तियाँ रही हैं उन सबके नियमन, नियन्त्रण और संचालन में इस सभा का महत्वपूर्ण योग रहा है। सभा का प्रधान कार्यालय वाराणसी में है और इसकी शाखाएँ नयी दिल्ली और हरिद्वार में। नागरीप्रचारिणी सभा के ही तत्वावधान में हिन्दी विश्वकोश, हिन्दी शब्दसागर तथा पारिभाषिक शब्दावली का निर्माण हुआ। सभा ने आर्यभाषा पुस्तकालय और मुद्रणालय स्थापित किया तथा सरस्वती नामक प्रसिद्ध पत्रिका का श्रीगणेश किया। हस्तलिखित ग्रन्थों की खोज और संरक्षण के लिये सन् १९०० से सभा ने अन्वेषकों को गाँव-गाँव और नगर-नगर में घर-घर भेजकर इस बात का पता लगाना आरम्भ किया कि किनके यहाँ कौन-कौन से ग्रंथ उपलब्ध हैं। सभा के ही प्रयत्न से सन् १९०० से उत्तर प्रदेश (तत्कालीन संयुक्त प्रदेश) में नागरी के प्रयोग की आज्ञा हुई और सरकारी कर्मचारियों के लिए हिन्दी और उर्दू दोनों भाषाओं का जानना अनिवार्य कर दिया गया। अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन का संगठन और सर्वप्रथम उसका आयोजन भी सभा ने ही किया था। भारत कला भवन नामक अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त पुरातत्व और चित्रसंग्रह का संरक्षण, पोषण और संवर्धन आरम्भिक नौ वर्षों तक यह सभा ही करती रही।
स्थापना
काशी नागरीप्रचारिणी सभा की स्थापना का विचार क्वीन्स कालेज, वाराणसी के नवीं कक्षा के तीन छात्रों – बाबू श्यामसुंदर दास, पं॰ रामनारायण मिश्र और शिवकुमार सिंह ने कालेज के छात्रावास के बरामदे में बैठकर की थी। बाद में १६ जुलाई १८९३ को इसकी स्थापना की तिथि इन्हीं महानुभावों ने निर्धारित की और आधुनिक हिन्दी के जनक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के फुफेरे भाई बाबू राधाकृष्ण दास इसके पहले अध्यक्ष हुए। काशी के सप्तसागर मुहल्ले के घुड़साल में इसकी बैठक होती थी। बाद में इस संस्था का स्वतंत्र भवन बना। पहले ही वर्ष जो लोग इसके सदस्य बने उनमें महामहोपाध्याय पं॰ सुधाकर द्विवेदी, जार्ज ग्रियर्सन, अम्बिकादत्त व्यास, चौधरी प्रेमघन जैसे भारत ख्याति के विद्वान् थे। यह वह समय था जब अंग्रेज़ी, उर्दू और फारसी का बोलबाला था तथा हिंदी का प्रयोग करनेवाले बड़ी हेय दृष्टि से देखे जाते थे। तत्कालीन परिस्थितियों में सभा को अपनी उद्देश्यपूर्ति के लिए आरम्भ से ही प्रतिकूलताओं के बीच अपना मार्ग निकालना पड़ा। किन्तु तत्कालीन विद्वन्मण्डल और जनसमाज की सहानुभूति तथा सक्रिय सहयोग सभा को आरम्भ से ही मिलने लगा था, अतः अपनी स्थापना के अल्प समय बाद ही सभा ने बड़े ठोस और महत्वपूर्ण कार्य हाथ में लेना आरम्भ कर दिया।
कार्य एवं उपलब्धियाँ
अपनी स्थापना के अनन्तर ही सभा ने बड़े ठोस और महत्वपूर्ण कार्य हाथ में लेना आरम्भ कर दिया। अपने जीवन के विगत वर्षों में सभा ने जो कुछ कार्य किया है उसका संक्षिप्त विवरण निम्नांकित है :
राजभाषा और राजलिपि
सभा की स्थापना के समय तक उत्तर प्रदेश के न्यायालयों में अंग्रेजी और उर्दू ही विहित थी। सभा के प्रयत्न से, जिसमें स्व. महामना पं॰ मदनमोहन मालवीय का विशेष योग रहा, सन् १९०० से उत्तर प्रदेश (तत्कालीन संयुक्त प्रदेश) में नागरी के प्रयोग की आज्ञा हुई और सरकारी कर्मचारियों के लिए हिन्दी और उर्दू दोनों भाषाओं का जानना अनिवार्य कर दिया गया।
नागरी कोर्ट कैरेक्टर
सन् 1896 में ब्रिटिश सरकार ने सरकारी दफ्तरों और अदालतों में फारसी अक्षरों की जगह रोमन लिपि लिखने का एक आदेश निकाला। सरकार के इस आदेश से नागरी प्रचारिणी सभा और हिन्दी सेवियों के बीच काफी उथल-पुथल मच गई। नागरी भाषा के समर्थकों को इस बात का भय था कि यदि अदालतों और सरकारी दफ्दरों में रोमन लिपि लागू कर दी गई तो अदालतों में नागरी भाषा का द्वार हमेशा के लिए बन्द हो सकता है। नागरी प्रचारिणी सभा ने अदालतों में रोमन लिपि के विरोध में आन्दोलन करना शुरू कर दिया। बाबू श्यामसुन्दर दास आन्दोलन को मुखर बनाने के लिए मुजफ्फरपुर गए; वे वहां परमेश्वर नारायण मेहता और विश्वनाथ प्रसाद मेहता से मिलाकर कुछ धन इक्ठ्ठा कर काशी लौट आए। इधर बाबू राधाकृष्ण दास ने नागरी कैरेक्टर लेख तैयार किया। बाबू श्यामसुन्दर दास ने इस लेख के पैम्पलेट छपवाकर लोगों में बटवा दिए। नागरी प्रचारिणी सभा और हिन्दी सेवियों के आन्दोलन का असर यह हुआ कि सरकार ने जुलाई 1896 में आज्ञापत्र जारी कर अदालतों में रोमन लिपि लिखने पर रोक लगा दी। नागरी प्रचारिणी सभा के सदस्य इस बात पर गहन विचार और विमर्श कर रहे थे कि नागरी भाषा को अदालतों में कैसे लागू करवाया जाए। सन् 1896 में भारतीय भवन का वार्षिक अधिवेशन हुआ जिसके सभापति जस्टिस नाक्स थे। इन्होंने सभा और पंडित मदनमोहन मालवीय से कहा कि आप लोग को अदालतों में नागरी भाषा को लागू करवाने के लिए प्रयास करना चाहिए। पंडित मदनमोहन मालवीय ने ‘कोर्ट कैरेक्टर एण्ड प्राइमरी एजुकेशन इन नार्थ वेस्टर्न प्रोविन्सेज एण्ड अवध’ (Court Character and Primary Education N.W. Provinees and Oudh) बड़े परिश्रम और लगन से तैयार किया। सन् 1898 बाबू श्यामसुंदर दास ने इस मेमोरियल का सार संक्षेप हिन्दी में ‘पश्चिमोत्तर प्रदेश तथा अवध में अदालती अक्षर और प्राइमरी शिक्षा’ शीर्षक से नागरी प्रचारिणी सभा की ओर से प्रकाशित कर नागरी के पक्ष में माहौल निर्मित करने में अहम भूमिका निभाई। इस लेख में नागरी भाषा को अदालतों में लागू करने के पक्ष में तमाम उदाहरण और दलीले पेश की गई थी और यह भी कहा गया था कि पश्चिमोत्तर प्रान्त की अदालतों में नागरी भाषा के लागू न होने से जनता को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
‘पश्चिमोत्तर प्रदेश तथा अवध में अदालती अक्षर और प्राइमरी शिक्षा’ लेख में कोर्ट आफ डाइरेक्टर के 30 सितबंर 1830 के आज्ञापत्र का उल्लेख करते हुए बताया गया कि यहाँ के निवासियों को जज की भाषा सीखने के बदले जज को भारतवासियों की भाषा सीखना बहुत सुगम होगा, अतएव हम लोगों की सम्मति है कि न्यायलयों की समस्त कार्यवाई उस स्थान की भाषा में हो।
नागरी प्रचारिणी सभा के कार्यकर्ताओं ने विभिन्न शहरों में घूम-घूम कर साठ हजार व्यक्तियों के नागरी कोर्ट मेमोरियल पर हस्ताक्षर करवाए। नागरी कोर्ट मेमोरियल पर हस्ताक्षर करवाने में केदारनाथ पाठक ने बड़ा योगदान किया था। उन्होने ब्रिटिश सरकार की परवाह किए बगैर कानपुर, लखनऊ, बलिया, गाजीपुर, गोरखपुर, इटावा, अलींगढ़, मेरठ, हरदोई, देहरादून, फैजाबाद आदि शहरों में घूम-घूम कर लोगों के मेमोरियल पर हस्ताक्षर करवाए। इस दौरान उनको राजद्रोह का मुकदमा भी झेलना पड़ा और जेल भी जाना पड़ा। ‘नागरी कोर्ट कैरेक्टर मेमोरियल’ साठ हजार व्यक्तियों के हस्ताक्षर सहित सोलह जिल्दों में पश्चिमोत्तर प्रांत के लेफ्टीनेंट गर्वनर एंटोनी मैकडानेल को सौंपे जाने का विचार किया गया। मैकडानेल को मेमोरियल देने के लिए सत्रह व्यक्तियों का एक प्रतिनिधिमंडल बनाया गया। इस प्रतिनिधि मंडल में जिन सत्रह व्यक्तियों को शामिल किया गया उनकी सूची सरस्वती पत्रिका के अप्रैल 1900 के अंक में छपे ‘पश्चिमोत्तर प्रदेश और अवध में नागरी अक्षर का प्रचार’ नामक लेख में दी गई है। वह सूची इस प्रकार है-
1. महाराज सर प्रतापनारायण सिंह बहादुर, के. सी. आई. ई., अयोध्या
2. राजा रामप्रताप सिंह बहादुर, माँडा इलाहाबाद
3. राजा घनश्याम सिंह, मुरसान, अलीगढ
4. राजा रामपाल सिंह मेम्बर लेजिसलेटिव कौंसिल, रापपुर, प्रतापगढ
5. राजा सेठ लक्ष्मणदास, सी. आई. ई., मथुरा
6. राजा बलवंत सिंह, सी. आई. ई., एटा
7. राय सिद्धेश्वरी प्रसाद नारायण सिंह बहादुर, गोरखपुर
8. राय कृष्ण सहाय बहादुर, सभापति देवनागरी प्रचारिणी सभा, मेरठ
9. राय कंवर हरिचरण मिश्र बहादुर, बरेली
10. राय निहालचन्द बहादुर, मुजफ्फर नगर
11. आनरेबल राय श्रीराम बहादुर, एम.ए.बी.एल. एडवोकेट अवध, मेम्बर प्रांतिक लेजिसलेटिव कौंसिल, तथा फेलो इलाहाबाद युनिर्वसिटी, लखनऊ
12. राय प्रमदादास मित्र बहादुर, फेलो इलाहाबाद युनिर्वसिटी
13. आनरेबल सेठ रघुबरदयान, मेम्बर प्रांतिक लेजिसलेटिव कौंसिल, सीतापुर
14. मुन्शी माधवलाल, रईस, काशी
15. मुन्शी रामनप्रसाद, एडवोकेट तथा सभापति कायस्थ पाठशाला कमेटी, इलाहाबाद
16. पंडित सुन्दरलाल बी.ए. एडवोकेट तथा फेलो इलाहाबाद युनिर्वसिटी
17. पंडित मदनमोहन मालवीय, बी.ए. एल.एल.बी., वकील हाईकोर्ट, तथा प्रतिनिधि काशी नागरी प्रचारिणी सभा।
2 मार्च 1898 को मदनमोहन मालवीय के नेतृत्व में सत्रह व्यक्तियों के प्रतिनिधि मंडल ने पश्चिमोत्तर प्रांत और अवध के लेफ्टीनेंट गर्वनर एंटोनी मैकडानेल को ‘कोर्ट कैरेक्टर एण्ड प्राइमरी एजुकेशन इन नार्थ वेस्टर्न प्रोविन्सेज’ सौंप दिया। नागरी प्रचारिणी सभा और महामना के नेतृत्व में चले इस आन्दोलन ने पश्चिमोत्तर प्रांत में कचहरियों और प्राइमरी स्कूलों में हिन्दी भाषा के लिए द्वार खोल दिया। 18 अप्रैल 1900 को पश्चिमोत्तर प्रांत और अवध के लेफ्टीनेंट गर्वनर एंटोनी मैकडानेल ‘बोर्ड आफ रिवेन्यु’ और हाई कोर्ट तथा ‘जुडिशियल कमिशनर अवध’ से सम्मति लेकर आज्ञापत्र जारी कर दिया।[1]
‘सरस्वती’ के अप्रैल 1900 के अंक में ‘पश्चिमोत्तर प्रदेश और अवध में नागरी अक्षर का प्रचार’ लेख में गर्वनर एंटोनी मैकडानेल के आदेश को अक्षरशः प्रकाशित किया गया। वह इस प्रकार है-
(१) सम्पूर्ण मनुष्य प्रार्थनापत्र और अर्जीदावों को अपनी इच्छा के अनुसार नागरी या फारसी के अक्षरों में दे सकते हैं।
(२) सम्पूर्ण सम्मन, सूचनापत्र और दूसरे प्रकार के पत्र जो सरकारी न्यायालयों वा प्रधान कर्मचारियों की ओर से देश भाषा में प्रकाशित किए जाते हैं, फरसी और नागरी अक्षरों में जारी होंगे और इन पत्रों की शेष भाग की खानापूरी भी हिन्दी भाषा में उतनी ही होगी जितनी फारसी अक्षरों में की जाए।
(३) अंग्रेजी अफसरों को छोड़कर आज से किसी न्यायालय में कोई मनुष्य उस समय तक नहीं नियत किया जायगा जब तक वह नागरी और फारसी अक्षरों को अच्छी तरह से लिख और पढ़ न सकेगा।
आर्यभाषा पुस्तकालय
सभा का यह पुस्तकालय देश में हिंदी का सबसे बड़ा पुस्तकालय है। ठाकुर गदाधर सिंह ने अपना पुस्तकालय सभा को प्रदान किया और उसी से इसकी स्थापना सभा में सन् १८९६ ई. में हुई। १९०३-०४ में यह विशेशरगंज स्थित अपने वर्तमान भवन में आया। विशेषतः १९वीं शताब्दी के अंतिम तथा २०वीं शताब्दी के आरंभिक वर्षो में हिंदी के जो महत्वपूर्ण ग्रंथ और पत्रपत्रिकाएँ छपी थीं उनके संग्रह में यह पुस्तकालय बेजोड़ है। हस्तलेखों का इतना बड़ा संग्रह कहीं और नहीं है। अनुपलब्ध और दुर्लभ ग्रंथों का ऐसा संकलन भी कहीं और मिलना मुश्किल है।
मुद्रित पुस्तकें डयूई की दशमलव पद्धति के अनुसार वर्गीकृत हैं। इसकी उपयोगिता एकमात्र इसी तथ्य से स्पष्ट है कि हिंदी में शोध करनेवाला कोई भी विद्यार्थी जब तक इस पुस्तकालय का आलोकन नहीं कर लेता तब तक उसका शोधकार्य पूरा नहीं होता। स्व. पं॰ महावीरप्रसाद द्विवेदी, स्व. जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’, स्व. पं॰ मयाशंकर याज्ञिक, स्व. डॉ॰ हीरानंद शास्त्री तथा स्व. पं॰ रामनारायण मिश्र ने अपने अपने संग्रह भी इस पुस्तकालय को दे दिए हैं जिससे इसकी उपादेयता और बढ़ गई हैं।
हस्तलिखित ग्रंथों की खोज
स्थापित होते ही सभा ने यह लक्ष्य किया कि प्राचीन विद्वानों के हस्तलेख नगरों और देहातों में लोगों के बेठनों में बँधे बँधे नष्ट हो रहे हैं। अतः सन् १९०० से सभा ने अन्वेषकों को गाँव-गाँव और नगर-नगर में घर-घर भेजकर इस बात का पता लगाना आरम्भ किया कि किनके यहाँ कौन-कौन से ग्रंथ उपलब्ध हैं। उत्तर प्रदेश में तो यह कार्य अब तक बहुत विस्तृत और व्यापक रूप से हो रहा है। इसके अतिरिक्त पंजाब, दिल्ली, राजस्थान और मध्यप्रदेश में भी यह कार्य हुआ है। इस खोज की त्रैवार्षिक रिपोर्ट भी सभा प्रकाशित करती है। सन् १९५५ तक की खोज का संक्षिप्त विवरण भी दो भागों में सभा ने प्रकाशित किया है। इस योजना के परिणामस्वरूप ही हिंदी साहित्य का व्यवस्थित इतिहास तैयार हो सका है और अनेक अज्ञात लेखक तथा ज्ञात लेखकों की अनेक अज्ञात कृतियाँ प्रकाश में आई हैं। आज सभा के पास 20 हजार से अधिक पांडुलिपियां, 50 हजार से अधिक पुरानी पत्रिकाएं और 1.25 लाख से अधिक ग्रंथों का भंडार है। हिंदी की इस थाती के संरक्षण के लिए संस्था के पास पर्याप्त धन नहीं है।
प्रकाशन
उत्तमोत्तम ग्रंथों और पत्रपत्रिकाओं का प्रकाशन सभा के मूलभूत उद्देश्यों में रहा है। अब तक सभा द्वारा भिन्न-भिन्न विषयों के लगभग ५०० ग्रंथ प्रकाशित हो चुके हैं। त्रैमासिक ‘नागरीप्रचारिणी पत्रिका’ सभा का मुखपत्र तथा हिंदी की सुप्रसिद्ध शोधपत्रिका है। भारतीय इतिहास, संस्कृति और साहित्य विषयक शोधात्मक सामग्री इसमें छपती है और निर्व्यवधान प्रकाशित होती रहनेवाली पत्रिकाओं में यह सबसे पुरानी है। मासिक ‘हिंदी’, ‘विधि पत्रिका’ और ‘हिंदी रिव्यू’ (अंगरेजी) नामक पत्रिकाएँ भी सभा द्वारा निकाली गई थीं किंतु कालांतर में वे बंद हो गई। सभा के उल्लेखनीय प्रकाशनों में हिंदी शब्दसागर, हिंदी व्याकरण, वैज्ञानिक शब्दावली, सूर, तुलसी, कबीर, जायसी, भिखारीदास, पद्माकर, जसवंसिंह, मतिराम आदि मुख्य मुख्य कवियों की ग्रंथावलियाँ, कचहरी-हिंदी-कोश, द्विवेदी अभिनंदनग्रंथ, संपूर्णानंद अभिनंदनग्रंथ, हिंदी साहित्य का इतिहास और हिंदी विश्वकोश आदि ग्रंथ मुख्य हैं।
हिन्दी विश्वकोश तथा हिन्दी शब्दसागर
उपर्युक्त कार्यों के अतिरिक्त हिन्दी विश्वकोश का प्रणयन सभा ने केंद्रीय सरकार की वित्तीय सहायता से किया है। इसके बारह भाग प्रकाशित हुए हैं। हिंदी शब्दसागर का संशोधन-परिवर्धन केंद्रीय सरकार की सहायता से सभा ने किया है जो दस खंडों में प्रकाशित हुआ है। यह हिंदी का सर्वाधिक प्रामाणिक तथा विस्तृत कोश है। दो अन्य छोटे कोशों ‘लघु शब्दसागर’ तथा ‘लघुतर शब्दसागर’ का प्रणयन भी छात्रों की आवश्यकतापूर्ति के लिए सभा ने किया है। सभा देवनागरी लिपि में भारतीय भाषाओं के साहित्य का प्रकाशन और हिंदी का अन्य भारतीय भाषाओं की लिपियों में प्रकाशित करने के लिए योजनाबद्ध रूप से सक्रिय हैं। प्रेमचंद जी के जन्मस्थान लमही (वाराणसी) में उनका एक स्मारक भी बनवाया है।
पारिभाषिक शब्दावली
८ वर्ष के परिश्रम से काशी नागरी प्रचारणी सभा ने १८९८ में पारिभाषिक शब्दावली प्रस्तुत की। हिंदी में पारिभाषिक शब्द निर्माण के इस सर्वप्रथम सर्वाधिक सुनियोजित, संस्थागत प्रयास में गुजराती, मराठी और बंगला में हुए इसी प्रकार के कार्यों का समुचित उपयोग किया गया। सभा का यह कार्य देश में सभी प्रचलित भाषाओं में वैज्ञानिक शब्दावली और साहित्य के निर्माण की शृंखलाबद्ध प्रक्रिया का सूत्रपात करनेवाला सिद्ध हुआ।
मुद्रणालय
सन् १९५३ से सभा अपना प्रकाशन कार्य समुचित रूप से चलाते रहने के उद्देश्य से अपना मुद्रणालय भी चला रही है। पुरस्कार पदक – विभिन्न विषयों के उत्तमोत्तम ग्रंथ अधिकाधिक संख्या में प्रकाशित होते रहें, इसे प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से सभा प्रति वर्ष कई पुरस्कार एवं स्वर्ण तथा रजत पदक ग्रंथकर्ताओं को दिया करती है जिनका हिंदी-जगत में अत्यंत समादर है।
अन्यान्य प्रवृत्तियाँ
अपनी समानधर्मा संस्थाओं से संबंधस्थापन, अहिंदीभाषी छात्रों को हिंदी पढ़ने के लिए छात्रवृत्ति देना, हिंदी की आशुलिपि (शार्टहैंड) तथा टंकण (टाइप राइटिंग) की शिक्षा देना, लोकप्रिय विषयों पर समय-समय पर सुबोध व्याख्यानों का आयोजन करना, प्राचीन और सामयिक विद्वानों के तैलचित्र सभाभवन में स्थापित करना आदि सभा की अन्य प्रवृत्तियाँ हैं।
सन् १९०५ में, काशी में कांग्रेस के अधिवेशन के अवसर पर एक भाषा सम्मेलन हुआ, जिसकी अध्यक्षता रमेशचन्द्र दत्त ने की और उसमें नागरीप्रचारिणी सभा के प्रांगण में लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने यह घोषणा की कि हिन्दी ही भारत की भाषा हो सकती है और देवनागरी लिपि वैकल्पिक रूप से भारत की सभी भाषाओं के लिए प्रयुक्त की जानी चाहिए तथा यह कार्य सभा को करना चाहिए। सुप्रसिद्ध मासिक पत्रिका सरस्वती का श्रीगणेश और उसके संपादनादि की संपूर्ण व्यवस्था आरंभ में इस सभा ने ही की थी। अखिल भारतीय हिंदी साहित्य संमेलन का संगठन और सर्वप्रथम उसका आयोजन भी सभा ने ही किया था। इसी प्रकार, संप्रति हिंदू विश्वविद्यालय में स्थित भारत कला भवन नामक अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त पुरातत्व और चित्रसंग्रह का एक युग तो संरक्षण, पोषण और संवर्धन यह सभा ही करती रही। अंततः जब उसका स्वतंत्र विकास यहाँ अवरुद्ध होने लगा और विश्वविद्यालय में उसकी भविष्योन्नति की संभावना हुई तो सभा ने उसे विश्वविद्यालय को हस्तांतरित कर दिया।
स्वर्ण जयन्ती और हीरक जयन्ती
संवत् २००० वि. (सन १९४३) में सभा ने अपनी स्वर्ण जयन्ती और महाराज विक्रमादित्य की द्विसहस्स्राब्दी जयन्ती मनाया। इसी तरह जीवन के ६० वर्ष पूरे करने के उपलक्ष्य में सं. २०१० (सन १९५३ ई) में अपनी हीरक जयन्ती के आयोजन बड़े समारम्भपूर्वक किए। इन दोनों आयोजनों की सर्वाधिक उल्लेखनीय विशेषता यह रही की ये आयोजन उत्सव मात्र नहीं थे, प्रत्युत इन अवसरों पर सभा ने बड़े महत्वपूर्ण, ठोस तथा रचनात्मक कार्यों का समारंभ किया। उदाहरणार्थ, स्वर्णजयंती पर सभा ने अपना ५० वर्षों का विस्तृत इतिहास तथा नागरीप्रचारिणी पत्रिका का विक्रमांक (दो जिल्दों में) प्रकाशित किया। ५० वर्षों की खोज में ज्ञात सामग्री का विवरण एवं भारत कला भवन तथा आर्यभाषा पुस्तकालय में संगृहीत सामग्री की व्यवस्थित सूची प्रकाशित करने की भी उसकी योजना थीं, किन्तु ये कार्य खंडशः ही हो पाए। परिव्राजक स्वामी, सत्यदेव जी ने अपना आश्रम सत्यज्ञान निकेतन इसी अवसर पर देश के पश्चिमी भागों में प्रचार कार्य का केंद्र बनाने के निमित्त, सभा को दान कर दिया। इसी प्रकार हीरक जयंती पर सभा के ६० वर्षीय इतिहास के साथ हिंदी तथा अन्यान्य भारतीय भाषाओं के साहित्य का इन ६० वर्षों का इतिहास, नारीप्रचारिणी पत्रिका का विशेषांक, हिंदी शब्दसागर का संशोधन-परिवर्धन तथा आकर ग्रंथों की एक पुस्तकमाला प्रकाशित करने की सभा की योजना थी। यथोचित राजकीय सहयोग भी सभा को सुलभ हुआ, परिणामतः सभा ये कार्य सम्यक् रूप से संपन्न कर रही है।
बौद्धिक तथा आर्थिक सहयोग
नाग्रीप्रचारिणी सभा से देश के अनेक नेता जुडे और इसकी बौद्धिक एवं आर्थिक सहायता की। सर आशुतोष मुखर्जी सभा के न्यासी मण्डल के अध्यक्ष बने और बाद में लाला लाजपत राय इस पद पर आये। सर तेजबहादुर सप्रू ने उस युग में सभा की आर्थिक एवं नैतिक सहायता की जो तब कई सहस्र रुपयों की थी। गोविन्दवल्लभ पन्त सन् १९०८ से प्रतिमाह डेढ़ रुपये से सभा की सहायता करने लगे। उन्होंने अपने सामाजिक और राजनीतिक जीवन की शुरुआत अपनी संस्था ‘प्रेम सभा’ को नागरीप्रचारिणी सभा से सम्बद्ध करके की। उस समय के राजा-महाराजाओं में काशी, उदयपुर, ग्वालियर, खेतड़ी, जोधपुर, बीकानेर, कोटा, बूँदी, रीवाँ आदि के राजाओं जहाँ इसे आर्थिक सहायता पहुँचाई, वहीं मोहनदास करमचंद गाँधी ने भी इसकी कार्यकारिणी के सदस्य के रूप में सहायता की और सन् 1१९३४ में यंग इंडिया में उन्होंने सभा की सहायता के लिए अपने हस्ताक्षर से अपील की। मोतीलाल नेहरू ने भी सभा की धन से सहायता की। सी.वाई. चिन्तामणि ने विधान परिषद् में सभा के भाषा के संबंध में विचारों का बराबर समर्थन किया तथा सर सुन्दरलाल आदि ने इसकी भरपूर सहायता की।




