आर्थिक आजादी, वित्तीय बंधनों से मुक्त होकर, मनमर्जी तरीके से जीने का नाम है। हालाँकि आर्थिक आजादी प्राप्त करने के लिए कोई एक ऐसा फॉर्मूला नहीं है, जो सबके लिए फिट बैठे लेकिन कुछ वित्तीय मंत्र हैं जो निवेशकों को रास्ता दिखाते हुए वित्तीय स्वतंत्रता प्राप्त करने में मदद कर सकते हैं। जानिए 9 ऐसे टिप्स, जो आपको वित्तीय आजादी प्राप्त करने में मददगार साबित हो सकते हैं।
जरूरतें कम करें – वित्तीय स्वतंत्रता प्राप्त करने के बुनियादी उसूलों में से एक है अपनी क्षमता से कम खर्च करना। इसका मतलब है कि आप जितना कमाते हैं उससे कम खर्च करें। एक बजट बनाएं, अपने खर्चों पर नजर रखें और अनावश्यक खर्चों पर बचत और निवेश को प्राथमिकता दें।
पहले बचत फिर खर्च – पहले लोग खर्च करने के बाद जो बचता उसे बचाकर रखते थे। मगर अब समय पहले बचत करने और जो बचे उसे खर्च करने का है। इसी में आपको गुजारा करना होगा।
आय के नये तरीके तलाशें – सिर्फ जॉब पर भरोसा करना ठीक नहीं। आपको आय के अलग-अलग और नये-नये सोर्स तलाश करने होंगे। यदि आप जॉब करते हैं तो फ्रीलांस जैसे काम तलाश करें। बिजनेस वाले भी साइड इनकम के लिए कोई काम शुरू कर सकते हैं।
जल्दी शुरू करें निवेश – जैसे ही कमाना शुरू करें उसके बाद फौरन निवेश शुरू करें। जितना जल्दी आप निवेश शुरू करेंगे, उतना अधिक लंबे समय में आप बड़ा फंड तैयार कर सकते हैं।
कर्ज से बचें – हमेशा कर्ज से बचें। अगर मजबूरन कर्ज ले भी लिया तो उसका सही से मैनेजमेंट करना जरूरी है। जिम्मेदार डेब्ट मैनेजमेंट, जिसमें समय पर पेमेंट करना और बकाया राशि को कम करना शामिल है, आपके क्रेडिट स्कोर पर सकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।
आर्थिक लक्ष्य बनाएं – निश्चित, प्राप्त करने योग्य और समय से बंधा आर्थिक लक्ष्य बनाएं जो आपको संतुलन साधने में मदद करेंगे ।
जानकारी को लगातार बढ़ाएं – तेजी से बदलती दुनिया में, जानकारी रखना आपको नई स्थितियों, टेक्नोलॉजीज और अवसरों के अनुसार खुद को ढालने की सुविधा देगा। वित्तीय सफलता अक्सर वित्तीय साक्षरता पर निर्भर करती है।
धैर्यवान बनें और अनुशासन के साथ निवेश करें – वित्तीय स्वतंत्रता प्राप्त करने में समय और अनुशासन लगता है। धैर्य आपको असफलताओं को सहने की क्षमता देता है। ये आपके काम तब आएगा जब आपको निवेश करने पर नुकसान हो।
अपनी योजनाओं का नियमित आकलन करें और तालमेल बिठाएं – आर्थिक आजादी के लिए प्लान को रिव्यू करना जरूरी है। जैसे-जैसे परिस्थितियाँ बदलती हैं, अपने प्लान में भी बदलाव करने की आवश्यकता होती है। इसलिए रेगुलर बजट, निवेश और लक्ष्यों का आकलन करें।
9 आर्थिक सबक जो आएंगे काम, जीवन भर पैसों को लेकर बनाएंगे समझदार
जब महाकवि निराला ने दबा दिया लाइव प्रोग्राम में ही रेडियो उद्घोषक का गला
शुरुआती दौर में रेडियो की भाषा हिंदुस्तानी हुआ करती थी जिसमें उर्दू के शब्दों की भरमार रहती थी. तब रेडियो पर जो ड्रामे होते थे उन पर पारसी थियेटर का बहुत असर था । नाटकों में शहजादा राम और बेगम सीता जलवा अफरोज हुआ करते थे और महाराज दुष्यंत ‘परकट’ होते थे । यह ऐसी भाषा थी जिसको लेकर हिंदी प्रेमियों के मन में गहरा असंतोष था । प्रख्यात हिंदी सेवी पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी की अप्रत्यक्ष अगुवाई में यह सवाल उठाया गया कि रेडियो पर हिंदी का कोई कार्यक्रम क्यों प्रसारित नहीं होता? प्रख्यात समालोचक डॉ. रामविलास शर्मा, ‘माधुरी’ पत्रिका के संपादक पंडित रूप नारायण पाण्डेय, उपन्यासकार यशपाल, अमृतलाल नागर और भगवती चरण वर्मा जैसे साहित्यकार उनके साथ थे । इस पर यह तय हुआ कि हिंदी में कार्यक्रम प्रसारित किया जाएगा. लेकिन सवाल था कि उसे करेगा कौन?
लखनऊ रेडियो के डायरेक्टर थे हसीब साहब । उन्होंने बारी-बारी से सभी साहित्यकारों से अनुरोध किया कि वे साहित्यिक कार्यक्रम करने की जिम्मेदारी संभालें लेकिन इसके लिए कोई तैयार नहीं हुआ लेकिन सभी ने एकमत से नाम सुझाया- पंडित बलभद्र दीक्षित ‘पढ़ीस’ । पढ़ीसजी अवधी के कवि के रूप में विख्यात थे और रेडियो में कॉपिस्ट के रूप में काम कर रहे थे । उन्हें हिंदी के कार्यक्रमों का जिम्मा सौंप दिया गया ।
पढ़ीस जी ने सोचा कि हिंदी का कार्यक्रम किसी बड़े लेखक या कवि के रचनापाठ से शुरू हो । उस समय हिंदी के महाकवि पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ उरूज पर थे. पढ़ीसजी को महाकवि का बड़ा स्नेह प्राप्त था । वह निराला जी के पास गए और उनसे अनुरोध किया कि आप चलिए और रेडियो में कविता पाठ कीजिए । सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी ने शुद्ध बैसवारी में कहा- ‘सरठ, हुआं सहजादा राम और बेगम सीता रौनक अफरोज होति है और हमका तुम कहत हौ कि कविता पाठ करौ. को सार सुनी हुवां हमार कविता?’ पढ़ीसजी ने हाथ जोड़ कर कहा कि पंडितजी रेडियो अब बहुतों के पास पहुंच रहा है और, सोचिए कि एक साथ लाखों लोग आपकी वाणी सुनेंगे. बहरहाल महाकवि निरालाजी रेडियो पर काव्य-पाठ के लिए राजी हो गए ।
प्रोग्राम का दिन आया. लगभग साढ़े सात बजे सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी रेडियो स्टेशन पहुंच गए थे । कार्यक्रम रात आठ बजे प्रसारित होना था. पढ़ीस जी कार्यक्रम की उद्घोषणा लिखने के लिए निराला जी से बातें करने लगे कि वह कौन सी कविता पढ़ेंगे, कविता का क्या शीर्षक है आदि. निराला जी ‘राम की शक्तिपूजा’ का पाठ करने वाले थे । पढ़ीस जी ने सोचा कि हिंदी का पहला कार्यक्रम है, जरा ओजपूर्ण ढंग से उसकी शुरूआत हो, तो ‘राम की शक्तिपूजा’ से ज्यादा ओजपूर्ण और क्या हो सकता था ।
रेडियो में एक उद्घोषक थे अयाज साहब । वह रेडियो के निदेशक जेड. ए. बुखारी की आंखों के तारे थे । उन्होंने देखा कि इतना महत्वपूर्ण कार्यक्रम है तो उसकी उद्घोषणा तो उन्हीं को करनी चाहिए । अयाज साहब ने पढ़ीस जी से कहा ‘पंडित जी यह उद्घोषणा तो मैं ही करूंगा.’ पढ़ीस जी हक्के-बक्के से रह गए । बुखारी साहब की वजह से अयाज साहब की बात रेडियो स्टेशन में कोई टाल नहीं पाता था. पढ़ीस जी ने कहा- ‘ठीक है, आप चाहते हैं तो आप ही कीजिए उद्घोषणा ।’
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी स्टूडियो ले जाए गए । ड्यूटी रूम में ड्यूटी ऑफिसर रेडियो पर कान लगा कर बैठ गया । प्रतीक्षा होने लगी कि अब कार्यक्रम का प्रसारण शुरू होने वाला है । रेडियो पर उद्घोषणा हुई अभी आप फलां ‘पिरोगराम’ सुन रहे थे और अब होगा ‘कबीता पाठ’ । कबी हैं पंडित सूर्य कान्ता त्रिपाठा निराली. इसके बाद निराला जी का कविता पाठ आना चाहिए था लेकिन रेडियो पर जो आवाजें सुनाई देने लगीं उसे सुन कर ड्यूटी ऑफिसर को लगा कि शायद रेडियो में कोई खराबी आ गई है । उसने ठोंक-पीट कर देखा, रेडियो तो ठीक था. वह स्टूडियो की तरफ भागा. स्टूडियो के मोखे से झांक कर देखा कि अयाज साहब की गरदन निराला जी की फौलाद जैसी बाँह में फंसी हुई है । उनके मुंह से वही घुटी-घुटी आवाजें निकल रही हैं जो रेडियो पर सुनाई दे रही थीं ।उनके लाख कोशिश करने के बावजूद गरदन बाँह के शिकंजे से छूट नहीं पा रही थी और महाकवि रौद्र रूप में बैठे हुए हैं ।
ड्यूटी ऑफिसर यह दृश्य देख कर घबरा गया ।उसने स्टूडियो कॉरीडार में लगे इंटरकॉम से तुरंत कंट्रोल रूम को फोन किया कि काट कर जल्दी से फिलर लगाइए. इस बीच हल्ला मच गया कि स्टूडियो में कुछ हो गया है । लोग आ-आ कर देखते कि अयाज साहब महाकवि की एक बाँह में कुछ इस तरह जकड़े हुए हैं जैसे बिल्ली के पंजे में कोई चूहा ।
दरअसल उन दिनों आज की तरह शीशे की विभाजन दीवार के साथ उद्घोषक और कलाकार के लिए अलग-अलग स्टूडियो नहीं हुआ करते थे । कार्यक्रमों का प्रसारण भी सजीव हुआ करता था. उद्घोषक अगर संगीत के कार्यक्रम का प्रसारण कर रहा होता था तो कलाकार के पास बैठ कर उसी माइक्रोफोन से बोल देता था और अगर कविता या वार्ता की उद्घोषणा करता था तो वार्ताकार या कवि के कंधे की तरफ से अपनी गरदन जरा आगे निकाल कर उसी माइक से उद्घोषणा कर दिया करता था । इसी व्यवस्था के चलते अयाज साहब की गरदन महाकवि की एक बाँह की गिरफ्त में आ गई थी ।
इधर एक स्टूडियो में यह कांड चल रहा था और उधर पढ़ीस जी किसी दूसरे स्टूडियो में अगले कार्यक्रम को रिहर्सल करवाने में व्यस्त थे । किसी की हिम्मत नहीं थी कि वह आगे बढ़ता और निराला जी को शांत करता. समस्या यह थी कि अयाज साहब की गरदन कैसे छूटे? ‘पंडित जी कहां हैं? पडित जी को बुलाइए ‘ निराला ने गरज कर कहा.
पढ़ीस जी आए और स्टूडियों का दरवाजा खोल कर जैसे ही भीतर घुसे निराला जी का गुस्सा फूट पड़ा. वह उठ कर खड़े हो गए । अयाज साहब की गरदन उनके कुर्सी से उठते ही छूट गई और वह अपनी जान से कर भाग निकले ।
‘सरउ तुमसे कहा रहे कि हियां हमका कविता न पढ़वाओ. हमार नांव लेते है, कहते है सूर्या कान्ता त्रिपाठा निराली । अंदर तुम कहत हो कि लाखों लोग सुनिहै’… निराला जी का गुस्सा सातवें आसमान पर था । पढ़ीस जी ने उनसे माफी मांगी और कहा कि फिर से उद्घोषणा करा कर आपका काव्यपाठ करा देते हैं. ट्रांसमिशन एक्सटेंड हो जाएगा ।
निराला जी ने जवाब दिया “न, अब हियां से चलो, सीधे चलौ हियां से । ‘पढ़ीस जी ने अनुरोध किया कि स्टेशन डायरेक्टर साहब से तो मिल लीजिए, वह आपकी प्रतीक्षा में बैठे हैं ।उनके पास लइ चलिहौ तो उनहूं क मारब हम’ निराला जी ने कहा और चले गए. ज्यादातर लोगों को यही मालूम है कि उक्त घटना के बाद निराला जी फिर कभी रेडियो नहीं गए, लेकिन यह सच नहीं है ।
रेडियो से हिंदी में कार्यक्रम प्रसारित हों, इस मांग को लेकर पंडित श्रीनारायण चतुर्वेदी ने प्रयास तो बहुत किए लेकिन सरकारी सेवा में होने के कारण उनका सहयोग अप्रत्यक्ष ही रहता था । उनको बराबर लग रहा था कि सरकारी नीति न सिर्फ हिंदी को रेडियो में स्थापित होने देने में बाधक है बल्कि प्रसारित होने वाले कार्यक्रम भी स्तरहीन हैं । रेडियो से प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों का विवरण और प्रसारित कार्यक्रमों पर समीक्षा प्रकाशित करने के लिए चतुर्वेदी जी ने एक पत्रिका शुरू की जिसको नाम दिया ‘आकाशवाणी’।
इसी ‘आकाशवाणी’ पत्रिका के अंक पांच में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी का वह लेख प्रकाशित है जिसे उन्हें रेडियो पर पढ़ने नहीं दिया गया था । उस लेख में निरालाजी ने सरकार की भाषा नीति की आलोचना की थी और बताया था कि किस तरह ‘हिंदुस्तानी’ के नाम पर ‘उर्दू’ को हम पर थोपा जा रहा है और किस तरह साधारण हिंदी शब्दों को भी जबरन उर्दू शब्दों में बदल दिया जाता है । पत्रिका के अंक एक में निराला जी की कविता ‘यमुना के प्रति’ प्रकाशित है जो उन्होंने 1941 में लखनऊ रेडियो द्वारा प्रसारित एक कवि सम्मेलन में पढ़ी थी ।
रेडियो पर कविता पाठ की फीस
1960 में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला अंतिम बार आकाशवाणी आए. इस बार स्टेशन था इलाहाबाद । निराला जी एक दिन दस-साढ़े दस बजे के आसपास रिक्शे से रेडियो स्टेशन के गेट पर उतरे. प्रसिद्ध कवि गिरिजाकुमार माथुर स्टेशन डायरेक्टर थे. उनको खबर दी गई कि निराला जी आए हैं । वह भागे-भागे आए और महाकवि को सम्मानपूर्वक अपने कमरे में लिवा ले गए. यह वह समय था जब डायरेक्टर के कमरे में बैठने का सौभाग्य सब को नहीं मिला करता था ।
“गिरिजाकुमार, हम रेडियो पर कविता पढ़ब’ निरालाजी ने कहा तो माथुर साहब तो जैसे आसमान से धरती पर गिरे । गिरिजाकुमार माथुर ने तुरंत प्रोग्राम सेक्रेटरी को बुलाया और अनुबंध पत्र तैयार करके लाने को कहा । ‘पंडित जी, यह एक औपचारिकता है, इस कांट्रेक्ट पर हस्ताक्षर कर दीजिए-‘ माथुर साहब ने निराला जी के सामने कांट्रेक्ट रखते हुए सविनय कहा । ‘दस हजार रूपैया ल्याब’ निराला जी ने कहा तो माथुर साहब सोच में पड़ गए कि अब क्या करें?
दस हजार रुपये तो अगर भारत सरकार भी चाहती तो नहीं दे सकती थी. किसी कलाकार की अधिकतम फीस एक सौ रुपये से ज्यादा नहीं हो सकती थी और निराला जी एक ही बात दोहराए जा रहे थे कि ‘दस हजार रूपैया ल्याब और कविता पढ़व ।’ सुबह से दोपहर होने को आई. ऑफिस का सारा काम-काज रूका पड़ा था. निराला जी की शर्त मानी नहीं जा सकती थी और वह कविता पाठ करने पर अड़े हुए थे और वह भी अपनी शर्तों पर ।
निराला जी जब तक स्मृतिभ्रंश के शिकार हो चुके थे. कोई सोची हुई बात दिमाग में ज्यादा समय तक टिकती नहीं थी और जल्दी ही पहली बात पर कोई दूसरी बात स्थान बना लेती थी ।
हुआ यूं था कि निराला जी को खबर मिली कि सुमित्रानंदन पंत अस्वस्थ हैं । वह दारागंज के अपने घर से पंत जी को देखने निकले थे. ।चंद्रमुखी ओझा ‘सुधा’ की बहिन चंद्रकांता त्रिपाठी रेडियो में कलाकार थीं और वह निरालाजी को लेकर रेडियो आ गई थीं कि निरालाजी माथुर साहब से कह देंगे तो उनकी फीस बढ़ जाएगी. रेडियो पहुंच कर निराला जी के दिमाग से चंद्रकांता त्रिपाठी की फीस बढ़वाने की बात निकल गई और रेडियो में कविता पढ़ने की बात आ गई ।
शाम होने को आई. आफिस बंद होने का समय हो गया. निराला जी स्टेशन डायरेक्टर के कमरे में अपनी जिद के साथ जमे कि ‘दस हजार ल्याब अउर कविता पढ़ब ।’ किस की हिम्मत कि निराला जी से जाने के लिए कहता. माथुर साहब ने युक्तिभद्र दीक्षित को बुलवाया और रूंआसे हो कर कहा कि किसी तरह निराला जी को यहां से ले जाओ.
निराला जी को हथेली पर मल के तैयार की जाने वाली तंबाकू खाने का शौक था । युक्तिभद्र दीक्षित भी तंबाकू खाते थे । पहले वह निराला जी के सामने तंबाकू नहीं खाते थे लेकिन एक बार जबसे निराला जी ने उन्हें खाते पकड़ लिया था और सामने खाने को कह दिया था तब से वह उनके सामने भी तंबाकू खाने लगे थे. दीक्षित जी माथुर साहब के कमरे में घुसे ।’अच्छा, तुम हिंयई हो?’ निराला जी ने दीक्षित जी को देखते ही पूछा ।
‘जी पंडित जी ।’
‘तुमसी महतारी कइसी है? निरालाजी ने पूछा.
‘महतारी क तौ तुमही कांधे पर भइंसा कुण्ड पहुंचाए आए रहयो, अब महतारी के पूछत हो ।” दीक्षित जी ने याद दिलाया.
‘अच्छा चलौ, तमाखु खवाओ.’ निराला जी ने कहा.
‘हां हां, तमाखू बनाइत है. आप तो पंतजी क देखै जात ‘- दीक्षित जी ने कहा.’
‘हां. पंतजी क देखै जाएक है’ – निराला जी को याद आ गया कि वह किस काम से घर से निकले थे । दीक्षित जी ने माथुर साहब से कह कर कार पहले से तैयार करवा रखी थी । उन्होंने निराला जी को कार में बैठाया और महाकवि चले गए पंत जी को देखने ।
पुस्तकः वाणी आकाशवाणी
लेखकः नवनीत मिश्र
प्रकाशकः सूचना विभाग, भारत सरकार
मूल्यः 120 रुपये
कुष्ठ रोग से स्वस्थ हुए, परिवार ने नहीं अपनाया, बुजुर्ग जोड़े ने किया विवाह
बालासोर । बालासोर के रेमुना ब्लॉक स्थित सरकारी कुष्ठ रोग उपचार केंद्र में 4 साल तक इलाज कराने वाले 63 साल के दासा मरांडी अब इस बीमारी को हरा चुके हैं । उनके परिवार ने चर्म रोग होने के बाद उन्हें त्याग दिया था । कुछ ऐसी ही स्थिति 65 साल की पद्मावती की थी । उन्हें भी 10 वर्ष तक उपचार के दौरान अस्पताल में अकेले छोड़ दिया गया था । उनके पति की मौत हो गयी थी और परिवार के अन्य सदस्यों ने उसे अपने हाल पर छोड़ दिया ।
दासा मरांडी और पद्मावती जब कुष्ठ रोग से उबरे तो इसके बावजूद उनके परिवारों ने उन्हें अपनाया नहीं. अपने हाल पर छोड़ दिया । बालासोर के एक वकील और सामाजिक कार्यकर्ता निरंजन परीदा ने कहा, ”रूढ़िवादी ग्रामीण समाज में एक वक्त में कलंक मानी जाने वाली इस बीमारी को लेकर अब भी लोगों की मानसिकता बदली नहीं है ।” अपने सगे-संबंधियों द्वारा छोड़ दिए जाने के बाद दासा और पद्मावती ने बाकी की जिंदगी एक साथ गुजारने का फैसला किया है ।
दासा मरांडी ने बताया कि उनकी इच्छा के अनुसार कुष्ठ रोगी उपचार केंद्र के अन्य रोगियों और कर्मियों ने हिंदू रीति रिवाजों के अनुसार उनकी शादी करायी । उन्होंने कहा, ”हम कई वर्षों से करीब थे. पहले मैंने उन्हें शादी का प्रस्ताव दिया और वह मान गयीं.” वे उपचार केंद्र के नजदीक बने एक पुनर्वास केंद्र में रहेंगे।
बालासोर के मुख्य जिला चिकित्सा अधिकारी और अतिरिक्त जिला चिकित्सा अधिकारी ने नवविवाहित बुजुर्ग दंपति के साथ ही कुष्ठ रोग उपचार केंद्र के कर्मचारियों तथा अन्य रोगियों को बधाई दी जिन्होंने शुक्रवार को एक मंदिर में विवाह समारोह की व्यवस्था की । उपचार केंद्र की एक कर्मचारी दुर्गा मणि उपाध्याय ने बताया कि शादी का सारा खर्च केंद्र के कर्मचारियों ने वहन किया । बालासोर के अतिरिक्त जिला चिकित्सा अधिकारी डॉ. मृत्युंजय मिश्रा ने कहा, ”दोनों पूरी तरह स्वस्थ हो गए हैं और वह दूसरे लोगों की तरह खुशहाल और सामान्य जीवन व्यतीत कर सकते हैं ।”
स्नातक कार्यक्रमों के विद्यार्थियों के लिए इंटर्नशिप अनिवार्य, मिलेगा क्रेडिट अंक
नयी दिल्ली । विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए मसौदा दिशानिर्देशों के अनुसार, स्नातक कार्यक्रमों में पढ़ने वाले छात्रों को अनिवार्य रूप से इंटर्नशिप करनी होगी और उन्हें इसके लिए क्रेडिट से सम्मानित किया जाएगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के अनुरूप “स्नातक छात्रों के लिए इंटर्नशिप और अनुसंधान इंटर्नशिप के लिए दिशानिर्देश” का मसौदा जारी किया गया, जो छात्रों को अवसर प्रदान करने के लिए स्नातक (यूजी) पाठ्यक्रम में अनुसंधान और इंटर्नशिप को शामिल करने पर जोर देता है।
कैसे और कितने क्रेडिट अंक मिलेंगे
ड्राफ्ट गाइडलाइन में कहा गया है कि राष्ट्रीय उच्च शिक्षा योग्यता फ्रेमवर्क (एनएचईक्यूएफ) और स्नातक कार्यक्रम (सीसीएफयूपी) के लिए पाठ्यक्रम और क्रेडिट फ्रेमवर्क के अनुसार तीन साल की यूजी डिग्री/चार साल की यूजी डिग्री (ऑनर्स)/चार साल की यूजी डिग्री (रिसर्च के साथ ऑनर्स) के आवश्यक न्यूनतम 120/160 क्रेडिट में से कम से कम दो से चार क्रेडिट इंटर्नशिप के लिए आवंटित किए जा सकते हैं। यूजी डिग्री प्रोग्राम में नामांकित छात्रों के लिए चौथे सेमेस्टर के बाद 60 से 120 घंटे की इंटर्नशिप अनिवार्य होगी।
पटना हाईकोर्ट में पहली बार हिंदी में सुनाया गया फैसला
पटना । देश की न्यायिक अवस्था में आमतौर पर किसी भी केस से जुड़ा हुआ फैसला अंग्रेजी में ही सुनाया जाता है, लेकिन पटना हाईकोर्ट में पहली बार इस परंपरा को तोड़कर एक मामले में फैसला हिंदी में सुनाया गया । पटना हाई कोर्ट के न्यायाधीश डॉ अंशुमान ने एक केस से जुड़े मामले में हिंदी में फैसला सुना कर एक नई परंपरा की शुरुआत की । दरअसल जस्टिस डॉक्टर अंशुमन की सिंगल बेंच में शराब बरामदगी की से जुड़े एक मामले में आरोपी विकास कुमार के जमानत याचिका पर सुनवाई हुई. याचिकाकर्ता की तरफ से वकील इंद्रदेव प्रसाद पैरवी कर रहे थे । बता दें कि, न्यायिक व्यवस्था में हिंदी को बढ़ावा देने के लिए इंद्रदेव प्रसाद ने पहले भी देश के कई हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं डाली हैं और न्याय की व्यवस्था में हिंदी के इस्तेमाल के लिए काफी लंबे समय से लड़ाई लड़ते आ रहे हैं । पटना हाई कोर्ट में भी जब बुधवार को याचिकाकर्ता की तरफ से पैरवी कर रहे थे तो वह हिंदी में ही अपनी बात रख रहे थे । इस मामले में इंद्रदेव प्रसाद याचिकाकर्ता विकास कुमार को शराब से जुड़े एक मामले में गलत तरीके से पुलिस के द्वारा आरोपी बनाने को लेकर था.
जस्टिस डॉ. अंशुमन की कोर्ट में इंद्रदेव प्रसाद ने हिंदी में ही अपनी बात रखी और फिर बहस पूरी हुई । दिलचस्प बात यह है कि दोनों तरफ की दलील सुनने के बाद जब इस मामले में फैसला सुनाने का वक्त आया तो न्यायाधीश डॉ. अंशुमान ने इंद्रदेव प्रसाद से पूछा कि वह अपना फैसला अंग्रेजी में सुनाएं या फिर हिंदी में ? न्यायाधीश डॉ. अंशुमन की तरफ से हिंदी में फैसला सुनाने की पेशकश पर वकील इंद्रदेव प्रसाद तो पहले चौंक गए और फिर उन्होंने न्यायाधीश से अपील की कि अगर वह हिंदी में अपना फैसला सुनाएंगे तो देश के न्यायिक व्यवस्था में हिंदी को बढ़ावा देने के लिए एक सार्थक पहल होगी । न्यायाधीश डॉ.अंशुमान ने वकील इंद्रदेव प्रसाद की बात को मानते हुए फैसला हिंदी में सुनाया और आरोपी विकास कुमार को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया । इसी दौरान एक और दिलचस्प वाकया हुआ, क्योंकि आमतौर पर न्यायाधीश अपना फैसला अंग्रेजी में ही सुनाते हैं तो उनके फैसले को कोर्ट के स्टेनो अंग्रेजी में ही लिखा करते हैं मगर जब इस मामले में न्यायाधीश डॉ. अंशुमान ने हिंदी में फैसला सुनाना शुरू किया तो स्टेनो को भी अंग्रेजी में फैसला लिखने में दिक्कत हुई जिसके बाद हिंदी जानने वाले दूसरे स्टेनो को बुलाया गया और फिर फैसला पारित हुआ ।
मां के पीड़ित होने का उल्लेख करते हुए उच्च न्यायालय ने बच्चे का संरक्षण बुआ को सौंपा
मुम्बई । बंबई उच्च न्यायालय ने एक बच्चे का संरक्षण उसकी बुआ को सौंपते हुए कहा कि लड़के की मां गंभीर मनोवैज्ञानिक विकारों से पीड़ित है और उसके पिता बहुत गुस्सैल स्वभाव के हैं। न्यायमूर्ति आर आई छागला की एकल पीठ ने कहा कि अदालत को इस तरह के मुद्दे पर विचार करने के दौरान बच्चे के नैतिक कल्याण और उसके शारीरिक स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर अवश्य विचार करना चाहिए।
बच्चे की अभिभावक नियुक्त करने और उसे उसका संरक्षण प्रदान करने का अनुरोध करते हुए महिला द्वारा दायर याचिका पर अदालत ने पांच अक्टूबर को आदेश जारी किया । न्यायमूर्ति छागला ने आदेश में जिक्र किया कि उन्होंने बच्चे से बातचीत की और पाया कि वह याचिकाकर्ता के साथ भावनात्मक जुड़ाव रखता है क्योंकि वह जन्म के बाद से ही उसकी सरपरस्ती में रहा है।
पीठ ने कहा, ”अदालत को बच्चे के नैतिक कल्याण के साथ-साथ उसके शारीरिक स्वास्थ्य पर भी विचार करना चाहिए।” न्यायमूर्ति छागला ने कहा कि मौजूदा मामले में संरक्षक होने के अपने क्षेत्राधिकार का उपयोग करने में न्यायालय की भूमिका लागू होती है।
अदालत ने कहा, ”बच्चे को जन्म देने वाली मां गंभीर मनोवैज्ञानिक विकारों से पीड़ित है और इस अदालत में आदेश पारित करने के दौरान इस पर भी गौर किया गया है क्योंकि उसकी (जैविक मां) द्वारा काफी हंगामा किया गया, जिससे अदालत की कार्यवाही बाधित हुई। प्रतिवादी संख्या 1 (बच्चे का जैविक पिता) भी बहुत गुस्सैल स्वभाव का है।” पीठ ने कहा, ”अपने क्षेत्राधिकार का उपयोग करते हुए, मेरे विचार से बच्चे का कल्याण याचिकाकर्ता द्वारा सर्वश्रेष्ठ रूप से सुनिश्चित होगा और याचिकाकर्ता को बच्चे का सही मायने में और कानूनन अभिभावक घोषित करने की जरूरत है।”
अदालत ने बच्चे से मिलने-जुलने की उसके माता-पिता को अनुमति दे दी। महिला ने अपनी याचिका में दावा किया है कि जब बच्चे का जन्म हुआ था तब उसके भाई और मनौवैज्ञानिक विकारों से पीड़ित उसकी पत्नी ने बच्चे का संरक्षण उसे सौंपने की सहमति जताई थी। बच्चे का जन्म वाडिया अस्पताल में हुआ था जिसने याचिकाकर्ता के नाम से अस्पताल से छुट्टी देने का कार्ड बनाया था।
महिला एक विधवा है, उसकी अपनी कोई संतान नहीं है। उसने दावा किया कि बच्चे की देखभाल करने के लिए वित्तीय रूप से बेहतर स्थिति में है। उसने दावा किया कि जब कभी बच्चे को उसके माता-पिता के घर ले जाती वह वहां बीमार पड़ जाता और उसका उपचार कराने की जरूरत पड़ती थी।
बच्चे के पिता ने मार्च 2021 में मध्य मुंबई के भोईवाडा पुलिस थाने में एक शिकायत दायर कर आरोप लगाया था कि याचिकाकर्ता ने उनके बच्चे को अगवा कर लिया है और उसे अवैध रूप से अपने पास रखा है। महिला ने अपनी याचिका में कहा कि शिकायत दर्ज होने के बाद उसने बच्चे को उसके माता-पिता को सौंप दिया, लेकिन दो महीने बाद दंपति ने बच्चे का स्वास्थ्य खराब होने का हवाला देते हुए उसे वापस ले जाने को कहा था ।
काशी शिक्षा निकेतन ने धूमधाम से मनाया स्वर्ण जयंती समारोह
कोलकाता । गत 10 अक्टूबर को ‘काशी शिक्षा निकेतन’ ने अपनी स्थापना के 50वीं जयंती के उपलक्ष्य में स्वर्ण जयंती समारोह का आयोजन बड़े ही धूमधाम से विद्यालय प्रांगण में आयोजित किया। इस समारोह में मुख्य अतिथि के रुप में कोलकाता प्राथमिक विद्यालय पर्षद के सभापति कार्तिकचंद्र मन्ना और चक्र-2 की सब-इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल श्वाति घोष उपस्थित थी। विद्यालय के शिक्षक प्रभारी विधानचंद्र यादव ने बताया कि यह विद्यालय 1974 में स्थापित हुआ था और तब से लगातार यह गरीब तथा मध्यवर्गीय परिवार के बच्चों को शिक्षा देने का काम कर रहा है।
इस अवसर पर विद्यालय के भूतपूर्व अध्यापक बी. एन. त्रिपाठी और शिवशंकर शर्मा को स्मृति चिह्न, शॉल और पुष्पगुच्छ देकर सम्मानित किया गया। शिक्षक प्रभारी विधानचंद्र यादव ने सभापति कार्तिकचंद्र मन्ना और सब-इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल श्वाति घोष को अपने हाथों से स्मृति चिह्न तथा पुष्पगुच्छ देकर सम्मानित किया। अतिथियों का स्वागत तिलक लगाकर विद्यालय की शिक्षिका प्रियंका साव और उमेशचंद्र शर्मा ने किया। विभिन्न विद्यालयों के शिक्षक भी इस समारोह में भारी संख्या में उपस्थित थे। उपस्थित रहने वाले शिक्षकों में श्री चितबहाल विद्यापीठ ( चक्र-1) से विनोद यादव, अरविंद शिक्षा निकेतन से राजीव सिंह, भारती उच्च प्राथमिक विद्यालय से शशि प्रकाश सिंह, श्री सनातन धर्म विद्यालय से सुरेश सिंह, पाइकपाड़ा राजा मनींद्र विद्यालय से कार्तिक माइती, श्री सूर्या हिंदी विद्यालय से राजेश पांडेय, हरिजन पाठशाला न-1 से फिरोज अहमद खान, बापू शिक्षा सदन से संजय साव, बापू बालिका शिक्षा सदन से विमल साव, भगवती शिक्षा निकेतन से जया प्रभा एक्का, भगवती बालिका शिक्षा निकेतन से विजय जयसवारा, शास्त्री विद्यापीठ से विनीता कुमारी, अमरासी विद्या मंदिर से लक्ष्मीकांत सिंह, आदर्श शिशु निकेतन से ओंकारनाथ सिंह आदि रहे। कार्यक्रम का संचालन विधानचंद्र यादव ने किया। विनोद यादव ने धन्यवाद ज्ञापन किया। कार्यक्रम को सफल बनाने में विधानचंद्र यादव, उमेशचंद्र शर्मा, प्रियंका साव, शशि प्रकाश सिंह तथा विद्यालय के सभी छात्रों का विशेष सहयोग रहा।
23 साल में 20 हजार पोस्टमॉर्टम करने वाली बिहार की मंजू देवी
पटना: वो एक ऐसी महिला हैं जिनकी आपबीती सुन कर कोई भी दहल जाए। बिहार जैसे राज्य से आने वाली मंजू की कहानी सिर्फ डराने वाली ही नहीं, बल्कि एक मिसाल भी है। उनका जीवन देश के सबसे गरीब राज्यों में से एक बिहार की गंभीर वास्तविकताओं की एक तस्वीर है। साथ ही साथ ये हर बाधा पर दृढ़ता से विजय पाने की कहानी भी है। मंजू देवी (48) की शादी कम उम्र में ही हो गई थी, 26 साल की उम्र में उनके पांच बच्चे थे और फिर उनके पति की मृत्यु हो गई। अब सवाल यही था कि पूरी उम्र कैसे कटेगी, बच्चों का पालन पोषण कैसे होगा। बिहार के समस्तीपुर में, छोटे बच्चों वाली एकल माताओं के लिए आजीविका के विकल्प लगभग शून्य ही हैं। ऐसे में मंजू देवी ने ऐसी नौकरी करनी मंजूर की, जिसके बारे में एक महिला सोच कर भी कांप उठे। उसने एक ऐसी नौकरी ली जो चिकित्सकीय रूप से महत्वपूर्ण थी, लेकिन गहरे सामाजिक पूर्वाग्रहों को देखते हुए, बहुत कम लोगों इसे करना चाहते हैं। एक पोस्टमॉर्टम सहायक की नौकरी आखिर करना भी कौन चाहेगा, वो भी एक महिला। लेकिन मंजू ने नौकरी के इस विकल्प को चुन लिया। अब 23 साल के बाद मंजू का अंदाजा है कि उन्होंने एक दो नहीं बल्कि कुल 20 हजार शवों के पोस्टमॉर्टम किए। मंजू एक पोस्टमॉर्टम को आज तक नहीं भूली हैं। वो उस दिन को याद करती है जब एक स्थानीय डॉन का शव पोस्टमॉर्टम के लिए आया था। गुस्साए गुंडे बाहर ही थे और शव उन्हें सौंपने की मांग कर रहे थे। वह कहती हैं, इस कठिन काम में उनका सबसे खराब दिन वह था, जब उन्हें एक युवा रिश्तेदार के शव पर काम करना पड़ा, जो जलने से मर गया था। मंजू देवी के अपने शब्द ही उनके काम का सबसे अच्छा वर्णन करते हैं। 23 साल पहले, समस्तीपुर के सदर अस्पताल में पोस्टमॉर्टम कक्ष में अपने पहले दिन को याद करते हुए, वह कहती हैं ‘मेरे पहले दिन, एक 22 वर्षीय दुर्घटना पीड़ित का पोस्टमॉर्टम करना था। मुझे ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर ने बताया कि उसके सिर को खोलना और शरीर को काटना था, ताकि अंदरुनी जांच की जा सके।’ मंजू के मुताबिक मैं कांप रही थी, रो रही थी… लेकिन मैंने छेनी-हथौड़ा उठाई और मुर्दे का सिर खोला। फिर मैंने निर्देशानुसार चाकू से उसकी छाती और पेट को खोला। काम पूरा हो गया, मैं घर लौट आई, लेकिन मैंने उस दिन कुछ नहीं खाया, न ही उस रात सोई। उस पल को मैं कभी नहीं भूल सकती।’ लेकिन अब वही मंजू देवी नौकरी पर अनुभव और प्रशिक्षण के चलते एक प्रोफेशनल बन गई हैं। लेकिन उनके औजार आज भी वैसे ही पुराने हैं। जबकि वो पोस्टमॉर्टम जैसे अहम काम को करती हैं। मंजू ने 26 साल की अपनी मेहनत के बाद पांच छोटे बच्चों को पढ़ाकर बड़ा कर दिया। वो या तो सफल पेशेवर बन गए हैं या उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। मंजू देवी के दोनों बेटे संगीत में प्रतिभाशाली थे, उन्होंने संगीत में स्नातकोत्तर की डिग्री ली और अब संगीत के छात्रों के लिए एक शिक्षण केंद्र चलाते हैं। वह कहती हैं कि वह खुद संगीत में प्रतिभाशाली थीं, लेकिन जिंदगी ने उन्हें मौका नहीं दिया। उनकी दोनों बेटियां स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में हैं और सिविल सेवाओं के लिए अध्ययन कर रही हैं। बेटियां और बेटे कहते हैं कि ‘उन्होंने बहुत दर्द सहा है,हमें उन पर गर्व है’।
इजरायल से भारतीयों को वापस लाने के लिए सरकार ने शुरू किया ‘ऑपरेशन अजय’
इजरायल (Israel) पर फलस्तीन के चरमपंथी संगठन हमास के बीच जारी भीषण जंग के बीच भारत अपने नागरिकों की सुरक्षित वतन वापसी के लिए अभियान शुरू करने जा रहा है। इस अभियान का नाम ‘ऑपरेशन अजय’ रखा गया है। विदेश मंत्री डॉ. एस जयशंकर ने ट्वीट कर इसकी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि इस्राइल से वापस लौटने की इच्छा रखने वाले हमारे नागरिकों की वापसी की सुविधा के लिए ‘ऑपरेशन अजय’ लॉन्च किया जा रहा है। इसके लिए विशेष चार्टर उड़ानों और अन्य की व्यवस्थाएं की जा रही हैं।
विदेश में हमारे नागरिकों की सुरक्षा और भलाई के लिए हम पूरी तरह से प्रतिबद्ध हैं। इस्राइल में करीब 18,000 भारतीय नागरिक काम या पढ़ाई के सिलसिले में रह रहे हैं। यहां रहने वाले भारतीयों का एक बड़ा हिस्सा देखभाल करने वालों के रूप में काम करता है, लेकिन वहां लगभग एक हजार छात्र, कई आईटी पेशेवर और हीरा व्यापारी भी हैं। इस बीच हमास से लड़ने के लिए इस्राइल ने पक्ष और विपक्ष को मिलाकर बुधवार को एक आपातकालीन साझा सरकार का गठन किया।
प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने पूर्व रक्षा मंत्री व मध्यमार्गी विपक्षी दल के नेता बेनी गैंट्ज के साथ बैठक में साझा सरकार बनाने पर सहमति जताई जो पूरी तरह से युद्ध पर ध्यान केंद्रित करेगी। गैंट्ज की नेशनल यूनिटी पार्टी की तरफ से जारी संयुक्त बयान में यह जानकारी दी गई है। यह सरकार ऐसे समय में बनी है जबकि, हमास की सैन्य शाखा अल कासम ब्रिगेड ने दावा किया है कि उसके लड़ाके अभी इस्राइल के अंदर बने हुए हैं और लड़ाई जारी रखे हैं।
दरअसल, इस्राइल ने गाजा पर शासन करने वाले इस्लामिक चरमपंथी समूह हमास के हमले के खिलाफ जंग छेड़ रखी है। हमास के लड़ाकों ने सात अक्तूबर को देश के दक्षिण में घुसकर भीषण हमले किए थे। इस दौरान इस्राइल पर 5000 से ज्यादा रॉकेट दागे गए थ। इस्राइल की सेना के मुताबिक, इस्राइल में 155 सैनिकों सहित 1200 से अधिक लोग मारे गए हैं। वहीं, गाजा में अधिकारियों का दावा है कि जंग में 260 बच्चों और 230 महिलाओं सहित 950 लोग मारे गए हैं।
बंगाल का सुंदरबन इलाका बना 1 से 4 साल के बच्चों की कब्रगाह
दुनिया में सबसे ज्यादा यहीं डूबकर मर रहे बच्चे
पश्चिम बंगाल के सुंदरबन क्षेत्र में 1 से 4 साल की आयु के बच्चों की डूबने से होने वाली मौत की दर दुनिया भर में सबसे ज्यादा है। यहां प्रति लाख आबादी में 243 मौतें दर्ज की गई हैं। एक अध्ययन में यह बात सामने आई है। यह आंकड़ा 2016 से 2019 के बीच जुटाया गया है। अध्ययन में यह भी पाया गया कि इस क्षेत्र में 5 से 9 वर्ष की आयु के बच्चों में मृत्यु दर 38.8 प्रति लाख आबादी है। अक्टूबर 2016 से सितंबर 2019 तक सामने आई घटनाओं पर क्षेत्र के 19 प्रखंडों में यह अध्ययन किया गया था। इन 19 प्रखंडों में से 13 दक्षिण 24 परगना में जबकि छह उत्तर 24 परगना में हैं। यह अध्ययन हाल में प्रकाशित हुआ है।अध्ययन में कहा गया है, ‘लड़कों और लड़कियों के बीच मृत्यु दर में कोई अंतर नहीं है। अधिकतर बच्चे अपने घरों के 50 मीटर के भीतर तालाबों में डूब गए। घटना के समय उनकी प्राथमिक देखभाल करने वाले लोग घरेलू कामकाज में लगे हुए थे और उनके साथ नहीं थे।’तटीय सुंदरवन क्षेत्र में बच्चों डूबने की समस्या की भयावहता का अंदाजा लगाने के लिए गैर-सरकारी संगठन चाइल्ड इन नीड इंस्टीट्यूट (सीआईएनआई) ने वैश्विक एजेंसियों रॉयल नेशनल लाइफबोट इंस्टीट्यूशन (आरएनएलआई) और द जॉर्ज इंस्टीट्यूट (टीजीआई) के साथ मिलकर यह अध्ययन किया है।पश्चिम बंगाल के दक्षिण पूर्वी हिस्से में और बांग्लादेश के दक्षिण पश्चिमी भाग में सुंदरबन मैन्ग्रोव क्षेत्र है। मैन्ग्रोव क्षेत्र में छोटे पेड़ या झाड़ी उगती है। समुद्र तट के किनारे दलदली भूभाग में उगने की वजह से इन छोटे पेड़ों या झाड़ियों की जड़ें अक्सर नमक वाले पानी के नीचे, तलछट में होती हैं।ज्यादातर बस्तियां दूर-दराज में हैं और चिकित्सा सुविधाओं से बेहद दूर हैं। सुंदरबन के जल निकायों में मॉनसून के दौरान जल स्तर बढ़ जाता है जबकि तटीय क्षेत्र में भी चार से पांच साल के अंतराल में बाढ़ की घटनाएं होती हैं। बच्चों के डूबने की समस्या पर चिंता जताते हुए पश्चिम बंगाल के सुंदरबन मामलों के मंत्री बंकिम चंद्र हाजरा ने कहा कि राज्य सरकार इस समस्या के समाधान का प्रयास कर रही है। हाजरा ने कहा कि यह स्वीकार करने में हमें कोई हिचक नहीं है कि डूबने से बच्चों की मौत के मामले सामने आए हैं। फिलहाल विस्तृत रिपोर्ट नहीं है। उन्होंने कहा कि सुंदरबन के निवासियों को डूबने के खतरे के बारे में उसी तरह जागरुक करना चाहिए जिस तरह उन्हें डेंगू, मलेरिया या बाल विवाह को लेकर जागरुक किया जाता है। उन्होंने कहा कि यह समय की मांग है। हर साल हम कई युवाओं को डूब कर जान गंवाते देखते हैं। लोगों से इस समस्या के हल के बारे में पूछा जाना चाहिए।




