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भवानीपुर अंतर कॉलेज नृत्य चैम्पियनशिप 2023 संपन्न
कोलकाता । भवानीपुर डांस चैंपियनशिप’ 2023 या बीडीसी नामक सबसे बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया। कोलकाता में सबसे बड़ी और एकमात्र अंतर-कॉलेज नृत्य प्रतियोगिता होने के नाते, बीडीसी ने इस वर्ष अपने 8वें संस्करण की मेजबानी की और प्रतियोगिता की थीम को ‘कार्निवल ऑफ क्यूरियोसिटीज़’ कहा गया।इस वर्ष भवानीपुर नृत्य चैम्पियनशिप में सात कार्यक्रम थे, जिनमें से प्रत्येक को सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन लाने के लिए डिज़ाइन किया गया था। उद्घाटन समारोह कॉलेज के जुबली सभागार में सुबह 10 बजे से शुरू हुआ। इसमें एनेक्ट कलेक्टिव का प्रदर्शन हुआ, जिसमें फ्लेम्स का हिस्सा होने का क्या मतलब है, इसका एक मजेदार अभिनय दिखाया गया। इस एक्ट ने लोगों के चेहरों पर खुशी और हंसी ला दी।
उद्घाटन समारोह का समापन फ्लेम्स द्वारा नृत्य की शक्ति पर बनाई गई एक लघु फिल्म के साथ हुआ, जिससे चैंपियनशिप के उद्घाटन कार्यक्रम की शुरुआत हुई।अलग अलग नृत्य हुए जिसके विषय भी अलग अलग रखे गए। बॉलीवुड डुओ/ट्रायो: इसकी थीम ‘समय यात्रा’ है – इसी खास थीम को ध्यान में रखते हुए पांच कॉलेजों ने इस आयोजन में हिस्सा लिया।विजेता स्थान टीएचके जैन कॉलेज ने हासिल किया, जबकि प्रथम रनर-अप स्थान भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज (मुख्य टीम) ने हासिल किया, और टेक्नो इंडिया ने दूसरा रनर-अप स्थान हासिल किया।
बॉलीवुड समूह नृत्य: बॉलीवुड समूह नृत्य का विषय “रहस्यमय फुसफुसाहट” था। प्रत्येक महाविद्यालय से पाँच टीमों ने भाग लिया; प्रत्येक कॉलेज ने 5+3 मिनट से कम समय में थीम को अपने अनूठे तरीके और शैली में दर्शाया। इसमें भवानीपुर कॉलेज विजेता रहा। सेंट जेवियर्स कॉलेज ने प्रथम रनर-अप स्थान प्राप्त किया और शिवनाथ शास्त्री कॉलेज ने द्वितीय रनर-अप स्थान प्राप्त किया। विशिष्ट प्रस्तुति के लिए बीईएससी की हंसिका चांडक को स्थान प्रदान किया गया। समूह लोक नृत्य का विषय ‘लोकगीत’ था और इसमें भाग लेने वाली 9 टीमों को पारंपरिक पोशाक और सहायक उपकरण पहनाए गए थे जो उस संस्कृति का सबसे अच्छा प्रतिनिधित्व करेंगे जो वे चित्रित कर रहे थे। टीमों को 4+1 मिनट से कम समय में प्रस्तुति करने के लिए कहा गया था। इस श्रेणी में प्रॉप्स का उपयोग स्पष्ट था क्योंकि इसमें डांडिया स्टिक और अन्य प्रकार के प्रॉप्स थे जो नृत्य की दिनचर्या को बढ़ाते थे। इस आयोजन के निर्णायक श्री धर्मेश बिमानी और डॉ.शेली पॉल थे। विजयी टीम भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज (ओटीएसई टीम), प्रथम रनर-अप का स्थान भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज (मुख्य टीम) ने हासिल किया, जबकि दूसरा रनर-अप स्थान सेठ आनंदराम जयपुरिया कॉलेज ने हासिल किया।
पश्चिमी समूह नृत्य में “अव्यवस्था” विषय रखा गया था और भाग लेने वाली 5 टीमों द्वारा किया गया। प्रदर्शन इसी तरह की अराजकता की भावना से भरा हुआ था। प्रत्येक टीम को प्रदर्शन के लिए 5+3 मिनट का समय मिला। इस कार्यक्रम के निर्णायक संचारी चक्रवर्ती और रीशव धानुक रहे । सभी टीमों ने एक ही प्रस्तुति में अलग-अलग कहानियाँ सुनाकर अपने समय का सदुपयोग किया। अंत में, भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज (वेस्टर्न मेन टीम) ने विजेता पुरस्कार जीता, जबकि जादवपुर विश्वविद्यालय ने प्रथम रनर-अप स्थान हासिल किया और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ होटल मैनेजमेंट (IIHM) को दूसरा रनर-अप स्थान दिया गया। सर्वश्रेष्ठ कलाकार का पुरस्कार बीईएससी (वेस्टर्न मेन टीम) के आशुतोष सिंह को दिया गया था।
ईस्टर्न ग्रुप डांस: “कार्निवल ऑफ शैडोज़” थीम के तहत इस श्रेणी में 8 कॉलेजों ने भाग लिया। 6+1 मिनट के साथ, टीमों ने बाल शोषण और महिला सशक्तिकरण जैसे विषयों को सबसे विस्मयकारी तरीके से चित्रित किया। इस श्रेणी में बहुत सारे प्रॉप्स भी थे जिनमें पर्दे शामिल थे जिनका उपयोग छाया की भावना पैदा करने के लिए किया जाता था। कार्यक्रम की निर्णायक रीना जाना और देबमित्रा सेनगुप्ता थीं। अंत में, भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज (पूर्वी मुख्य टीम) विजेता रही, शिवनाथ शास्त्री कॉलेज प्रथम उपविजेता और सेठ आनंदराम जयपुरिया कॉलेज द्वितीय उपविजेता रहा।
स्ट्रीट बैटल दो घंटे तक चला जिसमें एक बड़ी भीड़ एक घेरे में इकट्ठा हुई और इसके भीतर कलाकारों के लिए केंद्र मंच था। हिप हॉप संगीत और पॉप संस्कृति का उपयोग अधिक था क्योंकि थीम ही ‘डाउनटाउन डांस ऑफ’ थी। कार्यक्रम का प्रारूप 1vs1 फेसऑफ़ था। संगीत और राउंड का निर्णय शुभम सिंह उर्फ एंडलेस, रीशव धानुक और सैकत दास (डीजे)द्वारा किया गया । नर्तकों ने अपने प्रतिद्वंद्वी पर बढ़त हासिल करने के लिए पॉपिंग और लॉकिंग जैसी नृत्य की पश्चिमी तकनीकों का इस्तेमाल किया। इस आयोजन में दस महाविद्यालयों ने भाग लिया। अंत में, इवेंट के विजेता बंगाल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के पॉल थे और प्रथम रनर-अप इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ होटल मैनेजमेंट (आईआईएचएम) के ऋषभ थे।
सभी विजेताओं को कॉलेज प्रबंधन की ओर से नलिनी पारेख द्वारा उनके संबंधित पुरस्कार दिए गए। सभी घटनाओं के निर्णायकों में प्रो बी.कॉम (मॉर्निंग) की समन्वयक मीनाक्षी चतुर्वेदी, ब्लैक टाइगर इवेंट्स से गौरव बाजोरिया, डीन कार्यालय से प्रो दिव्या उद्देशी और प्रो समीक्षा खंडूरी रहे । समापन के बाद स्वयंसेवकों और प्रतिभागियों को बीडीसी 2023 की सफलता और नृत्य के प्रति जुनून का जश्न मनाने के लिए जुबली हॉल में बजाए गए संगीत पर नृत्य करने के लिए एक खुला मंच दिया गया। रिपोर्टर टीम में – पूजा डबराई और अनिकेत दासगुप्ता और फोटोग्राफर पारस गुप्ता, प्रियांशु चटर्जी, निश्चय आलोकित लाकड़ा, अंकित माझी, अग्रग घोष रहे। डॉ वसुंधरा मिश्र ने इस कार्यक्रम की जानकारी दी ।
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भवानीपुर कॉलेज की एन एस एस ने मनाया विश्व एड्स दिवस
एलिजाबेथ टेलर ने कहा कि यह बहुत ही बुरा है कि लोग ‘एड्स’ से मर रहे हैं लेकिन किसी को भी अज्ञानता से नहीं मरना चाहिए। इस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए भवानीपुर एजुकेशन सोसाइटी कॉलेज की एनएसएस इकाई ने 1 दिसंबर, 2023 को विश्व एड्स दिवस के अवसर पर रवीन्द्र सदन मेट्रो स्टेशन गेट नंबर पर एड्स जागरूकता कार्ड और लाल रिबन के वितरण के माध्यम से ‘रेड रिबन अभियान’ का आयोजन किया। एस्प्लेनेड मेट्रोस्टेशन गेट नंबर एक पर अभियान सुबह 9:00 बजे शुरू हुआ और दोनों टीमें अपने-अपने स्थानों पर गईं और विभिन्न आयु वर्ग के लोगों को कार्ड वितरित किए।
अभियान का उद्देश्य मृतकों को श्रद्धांजलि देना, एचआईवी/एड्स से जूझ रहे लोगों को सहायता प्रदान करना और आज कलंक को मिटाने के हमारे दृढ़ संकल्प को दोहराना है क्योंकि एचआईवी/एड्स के खिलाफ लड़ाई में भेदभाव और कलंक का कोई स्थान नहीं है। यह करुणा, समझ और समर्थन दिखाने का समय है।
कुल 18 विद्यार्थियों ने 500 कार्ड और एड्स का लोगो लाल रिबन वितरित किये। सभी ने इसे अच्छी तरह से नहीं लिया, लेकिन कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने वास्तव में इस पहल की सराहना की और यहां तक कि छात्र स्वयंसेवकों के साथ अपना दृष्टिकोण भी साझा किया। कार्ड वितरित करते समय टीम में से एक ने ‘इश्क फाउंडेशन’ के स्वयंसेवकों से भी मुलाकात की जो इसके लिए जागरूकता फैला रहे थे। स्वयंसेवकों ने दिन भर के अपने अनुभवों का आनंद लिया। रेक्टर और डीन प्रोफेसर दिलीप शाह, रेक्टर और छात्र मामलों के डीन, बीकॉम (मॉर्निंग) की समन्वयक मीनाक्षी चतुर्वेदी और कॉलेज के पूरे प्रबंधन को पूरे आयोजन में उनके अपार समर्थन के लिए धन्यवाद। कृपा सहल ने रिपोर्ट की और जानकारी दी डॉ वसुंधरा मिश्र ने ।
भवानीपुर कॉलेज में गणित के जादू पर विशेष सत्र
भवानीपुर कॉलेज में मानवाधिकार पर दो दिवसीय कार्यशाला
भवानीपुर कॉलेज द्वारा द बिग फैट इंडियन वेडिंग 2023 समारोह संपन्न
घटीं फैंटम वी गोल्ड की कीमतें, बाजार में आया स्पार्क गो 2024
आईसीएसआई ने प्रैक्टिसिंग कंपनी सेक्रेटरीज को लेकर किया 17वां क्षेत्रीय सम्मेलन
एमएसएमई के लिए इंडियन पैकेजिंग इंस्टीट्यूट में वेंडर डेवलपमेंट प्रोग्राम
घरेलू हिंसा का शिकार तो पुरुष भी हैं, बात उन पर भी हो
अक्सर हम हमेशा से सुनते आये हैं कि घरेलू हिंसा सिर्फ महिला ही सहती है लेकिन क्या कभी हमने सुना है की एक पुरुष भी घरेलु हिंसा का शिकार होता है । ये कहना सच है पुरुष महिला के मुक़ाबले शारीरिक रूप से मजबूत होता है लेकिन इसका ये मतलब नहीं की वो घरेलू हिंसा न सहता हो । और ये वो हिंसा होती है जिसे चाहकर भी कोई पुरुष किसी को बता नहीं सकता या बताना नहीं चाहता क्योंकि समाज मानने को तैयार नहीं और कानून का भी इस मामले में कोई सहारा नहीं है । आज के दौर में अगर एक महिला चाहे तो अपने पति या पुरुष को घरेलू हिंसा कानून के सहारे जेल भिजवा सकती है । लेकिन ये हक़ किसी पति या पुरुष को नहीं है ।
घरेलू हिंसा झेलने वाले पुरुष इस श्रेणी में सबसे पहला स्थान पति का होता है उसके बाद ससुर फिर जेठ फिर देवर और फिर कोई भी पुरुष जो की पति से ताल्लुक रखता है । जरूरी नहीं की पुरुष शादी शुदा हो अगर वो लिव इन में रह रहा है तो भी वो किसी न किसी रूप से घरेलू हिंसा का शिकार होता है । अगर कभी कोई पति या पुरुष ये बताने की कोशिश भी करेगा तो उसका मज़ाक उड़ाया जाएगा और उस पर व्यंग मारा जाएगा की एक औरत से पिट गया । थू है तेरी मर्दानगी पर । इसी कारण पति या पुरुष अपने हुए अत्याचार को किसी से कहता नहीं ओर अंदर ही अंदर घुलता रहता है और धीरे -धीरे बीमारी का घर बनता चला जाता है । और आखिर में एक दिन उसकी ज़िंदगी भी समाप्त हो जाती है ।
समाज में माना जाता है कि एक पति या पुरुष कभी भी महिला के जुल्मों का शिकार नहीं हो सकता है. उसे कई वैधानिक,सामाजिक कानूनों या आर्थिक मदद से सिर्फ इसलिए वंचित किया जाता है क्योंकि वह पुरुष है. आजकल तो समाचार पत्र, टीवी, सिनेमा आदि औरत को बहुत ताकतवर दिखाया जा रहा है. घर ही नहीं, कार्यक्षेत्र में भी उस का दबदबा होता है. घरेलू हिंसा के प्रकार कोई भी महिला खासतोर से पत्नी अपने पति या पुरुष का काफी तरीको से घरेलु उत्पीड़न करती है । जैसे कि मानसिक पीड़ा देना, पारिवारिक सदस्य से न मिलने देना, दोस्त और रिश्तेदार ओर आस पड़ोस से न मिलने देना, आत्महत्या करने की धमकी देना, नामर्द पुकारना, घर से निकलने को विवश करना, बात बात पर टोकना, थप्पड़ मारना, शारिरिक हिंसा, मारपीट करना, ठोकर मारना,दांत से काटना, लात मारना, मुक्का मारना, धकेलना, किसी अन्य रीति से शारीरिक पीड़ा या क्षति पहुँचाना, दुर्व्यवहार करने, अपमानित करने, नीचा दिखाने, प्रतिष्ठा का उल्लंघन, मौखिक और भावनात्मक हिंसा, अपमान, गालियॉं देना, चरित्र और आचरण पर दोषारोपण, पूरी सैलरी रख लेना, संभोग न करना,खाने में थूक देना, पति या पुरुष कि बिना मर्जी से संभोग करना, महिला का बात- बात पर आत्महत्या की धमकी देना, बेइज्जत करना, ताने देना, गाली-गलौच करना, झूठा आरोप लगाना, मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा न करना, मायके से न बुलाना,, शारीरिक प्रताड़ना, तलाक एवं मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा न करने की धमकी देना, चांटा मारना, धक्का देना, छीना झपटी करना, लकड़ी या हल्की वस्तु से पीटना, लात मारना, घूंसा मारना, माचिस या सिगरेट से जलाना,गंभीर रूप से पीटना, जिससे हड़डी टूटना या खिसकना जैसी घटनाएं शामिल है,गंभीर रूप से जलाना, लोहे की छड़, धारदार वस्तु या भारी वस्तु से वार करना। कभी कभी पति या पुरुष ये सब सह नहीं पता और आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाता है ।
घरेलू हिंसा के कारणअगर कोई महिला पति या पुरुष से ज्यादा सुन्दर है मतलब की अगर पति या पुरुष काला है तो उसको रंग भेद की टिप्पणी सहनी पड़ती है । अगर कोई महिला पति या पुरुष से ज्यादा पढी लिखी है मतलब की पति या पुरुष अगर कम पढ़ा लिखा है तो उसको अनपढ़ और गंवार आदि की टिप्पणी सहनी पड़ती है । अगर कोई महिला पति या पुरुष से ज्यादा कमाती है तो उसको कम कमाने का ताना झेलना पड़ता है । अगर कोई महिला पति या पुरुष से ऊंचे पद पर कार्य करती है तो उसको इस बात का भी ताना झेलना पड़ता है । कभी- कभी महिला पति या पुरुष के परिवार के साथ रहना नहीं चाहती और पति या पुरुष अपने परिवार को छोड़ना नहीं चाहता ये भी एक कारण होता है । कभी कभी महिला पति या पुरुष पर मालिकाना हक़ चाहती है और पति या पुरुष पर सम्पूर्ण अधिकार चाहती है । किसी किसी परिवार में महिला के मायके का दखल भी घरेलू हिंसा को बड़ावा देता है । किसी किसी महिला के शादी से पहले के अतिरिक्त विवाहेतर संबंध शादी के बाद भी चल रहे होते है या दफ्तर में किसी साथी के साथ प्रेम प्रसंग भी घरेलू हिंसा को बड़ावा देता है । महिला का बहुत ज्यादा शक्की होना । महिला का बहुत ज्यादा ज़िद्दी होना । महिला का बहुत ज्यादा खर्चीला होना । महिला की पेसो की भूख समाप्त न होना । महिला का बात बात पर झूठ बोलना।
कानून क्या कहता है – कानून के अनुसार घरेलू हिंसा सिर्फ एक महिला पर हो सकती है। किसी पति या पुरुष पर नहीं । हालांकि एक नाबालिग पुरुष घरेलू हिंसा का शिकार हो सकता है लेकिन अगर वो नाबालिग होते हुए शादी शुदा है तो वो कभी भी घरेलु हिंसा का शिकार नहीं हो सकता । पशुओं तक को हमारे समाज में सुरक्षा मिलती है लेकिन पति या पुरुष की सुरक्षा के लिए कोई कानून नहीं है. हक़ीक़त तो यह भी है कि जब हम पति या पुरुष पर अत्याचार के खिलाफ धरने या प्रदर्शन आदि करते हैं तो बहुत सारे पति या पुरुष उस में शामिल नहीं होते हैं । या तो शर्म महसूस करते हैं या अपने ऊपर होने वाले अत्याचारों के विरोध में आवाज उठाने से कतराते हैं कि समाज क्या कहेगा । पुरुषों पर होने वाले अत्याचार तब तक नहीं रोके जा सकते जब तक वे खुद अपने अधिकारों के लिए आवाज नहीं उठाते ।
दुर्भाग्य से हमारे देश में पति के पास पत्नी के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए घरेलू हिंसा अधिनियम जैसा कानून नहीं है… यह टिप्पणी कुछ महीने पहले ही मद्रास हाई कोर्ट ने घरेलू हिंसा से जुड़े एक मामले को लेकर दी थी। सवाल उठा कि क्या पुरुष भी घरेलू हिंसा का शिकार हो सकते हैं? हाल ही में इसका उदाहरण भी देखने को मिला। हरियाणा में हिसार के रहने वाले एक शख्स का वजन शादी के बाद कथित तौर पर पत्नी के अत्याचार की वजह से 21 किलो घट गया। इसी के आधार पर उसे हाईकोर्ट से तलाक की मंजूरी मिल गई। ऐसे मामले बढ़े हैं। बहुत से लोगों के लिए ये सोचना भी अविश्वसनीय है कि पुरुषों के साथ हिंसा होती है। वजह ये है कि पुरुषों को हमेशा से मजबूत और ताकतवर माना जाता रहा। लेकिन पारिवारिक विवादों को सुलझाने के लिए चलाए जा रहे तमाम परामर्श केंद्रों के आंकड़े इसका प्रमाण हैं कि पुरुष भी महिलाओं के उत्पीड़न के शिकार हो रहे हैं। घरेलू हिंसा से संबंधित शिकायतों में करीब 40 फीसद शिकायतें पुरुषों की हैं। इसमें ये बात भी सामने आई है कि महिलाओं को तलाक ही एकमात्र विकल्प सुझता है, वहीं पुरुषों का काउंसलिंग पर जोर होता है। यानी काउंसलिंग या किसी भी तरह से पुरुष रिश्ते को जारी रखना चाहते हैं।
क्या महिलाएं पुरुषों को करती है प्रताड़ित? – साल 2018 में व्हेन वाइफ बीट देयर हसबैंड, नो वन वांट्स टु बिलीव इट नामक शीर्षक से प्रकाशित लेख में कैथी यंग ने कई रिसर्च का जिक्र किया। इससे ये पुष्टि हुई कि वायलेंट रिलेशनशिप में महिलाओं के एग्रेसिव होने की आशंका पुरुषों जितनी ही है।
क्या कहते हैं आंकड़े – वैसे तो, भारत में ऐसा कोई सरकारी आकंड़ा नहीं मिला, जिससे घरेलू हिंसा में शिकार पुरुषों का पता चल सके। लेकिन पुरुषों के अधिकारों के लिए कार्यरत कुछ संस्थाएं इस दिशा में काम कर रही हैं। साल 2020 में लॉकडाउन के दौरान सेव इंडियन फैमिली फाउंडेशन की ओर से टेलीफोनिक सर्वे किया गया। इस दौरान इंदौर की पौरुष संस्था और राष्ट्रीय पुरुष आयोग समन्वय समिति दिल्ली को भी पुरुष हेल्पलाइन पर कई शिकायतें मिली। इसमें पाया गया कि लॉकडाउन के दिनों में पत्नियों द्वारा अपने पतियों को प्रताड़ित करने के मामलों में 36 फीसदी की बढ़ोतरी हुई क्योंकि कई पुरुष काम छोड़कर घर पर बैठने गए, या फिर ऑफिस बंद होने से वर्क फ्रॉम होम करने लगे। ऐसे में वे पत्नियों के रवैये से डिप्रेशन में रहने लगे।
आत्म सम्मान गंवाने के डर से शिकायत नहीं कर पाते – कई संस्थाओं के सर्वे के मुताबिक ज्यादातर पुरुष सेल्फ रिस्पेक्ट के चलते अपनी पत्नी की शिकायत नहीं कर पाते। अगर कोई हिम्मत कर पुलिस को शिकायत करता भी है, तो अक्सर पुलिस ही उसे धमका देती है। वैवाहिक जीवन में पुरुष किस तरह प्रताड़ित होते है इसका उदाहरण प्रशासनिक व्यवस्था के बड़े ओहदों पर बैठे पुरुषों के मामले में भी देखने को मिला।
केस- 1 – साल 2018 में कानपुर के पुलिस अधीक्षक (पूर्वी) के पद पर तैनात रहे भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी सुरेंद्र कुमार दास की जहरीला पदार्थ खाने के कारण मौत हो गई। जांच में घरेलू कलह के कारण आत्महत्या की बात सामने आई।
केस- 2 – साल 2017 में बिहार के आइएएस अधिकारी मुकेश कुमार ने पत्नी से विवाद के कारण गाजियाबाद रेलवे स्टेशन के पास ट्रेन से कटकर अपनी जान दे दी थी। सुसाइड नोट में लिखा था कि वह अपनी पत्नी और अपने मां-बाप के बीच हो रहे झगड़े से बेहद परेशान थे।
घरेलू हिंसा से सुरक्षा अधिनियम पुरुष को नहीं देता सुरक्षा – नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट की मानें तो महिलाओं की तुलना में पुरुष ज्यादा आत्महत्या करते हैं। इसकी एक मुख्य वजह परिवार में चल रही कलह और रिश्तों से उपजा डिप्रेशन भी है। वहीं, साल 2019 में ‘इंडियन जर्नल ऑफ कम्युनिटी मेडिसिन’ की रिसर्च के अनुसार हरियाणा के ग्रामीण क्षेत्रों में 21-49 वर्ष की उम्र के एक हजार विवाहित पुरुषों में से 52.4 फीसद ने जेंडर आधारित हिंसा का अनुभव किया। इन आकड़ों को देख लगता है कि जब संविधान लिंग, जाति और धर्म के आधार पर किसी तरह का फर्क स्वीकार नहीं करता, तो क्यों घरेलू हिंसा से सुरक्षा अधिनियम पुरुष को सुरक्षा नहीं देता? जबकि विकसित देशों में जेंडरलेस कानून वहां के पुरुषों को न केवल महिलाओं की तरह घरेलू हिंसा से प्रोटेक्शन देता है, बल्कि इस बात को भी स्वीकार करता है कि पुरुष भी प्रताड़ित होते हैं।
क्या तलाक से डरते हैं पुरुष – सेव इंडियन फैमिली फाउंडेशन और माई नेशन संस्था के ऑनलाइन शोध की मानें तो 98 प्रतिशत भारतीय पति तीन साल के रिलेशनशिप में कम से कम एक बार घरेलू हिंसा का सामना कर चुके हैं। दिल्ली हाइकोर्ट में वकील योगेंद्र ने बताया कि भारत में दहेज निरोधक कानून, घरेलू हिंसा अधिनियम, दुष्कर्म से संबंधित कानून सहित महिलाओं की सुरक्षा के लिए और भी कई कानूनी प्रावधान अमल में लाए गए हैं। लेकिन पुरुषों के साथ हिंसा के लिए कोई कानून नहीं। एक दशक पहले जहां एक हजार में मुश्किल से एक मैरिड कपल्स तलाक के लिए कोर्ट पहुंचता था, वहीं अब यह आंकड़ा बढ़ गया है। पुरुषों के कई मामले आते है जो अपने वैवाहिक जीवन से दुखी हैं और तलाक लेने की स्थिति से लगभग रोज गुजरते हैं। जब तलाक का कदम उठाते भी हैं तो उन्हें डर होता है कि कहीं उनका पक्ष सुने बिना ही क्रूर करार न दिया जाए।
क्या महिलाओं के लिए बने कानूनों का हो रहा दुरुपयोग? – साल 2018 में उत्तर प्रदेश में दो सांसदों ने ये मांग उठाई कि राष्ट्रीय महिला आयोग की तर्ज पर राष्ट्रीय पुरुष आयोग भी बने। इसे लेकर प्रधानमंत्री को पत्र भी लिखा था। इन्हीं में से एक सांसद का दावा था कि आज ऐसे कई पुरुष झेल में हैं, जो पत्नी प्रताड़ित है। लेकिन कानून के एकतरफा रुख और समाज में बदनामी के डर की वजह से वे घरेलू अत्याचारों के खिलाफ आवाज नहीं उठा रहें। कई तो सुसाइड करने को मजबूर हैं। पुरुष आयोग की मांग का समर्थन करने वाले लोगों का कहना है कि महिलाओं को सुरक्षा देने के लिए बनाए गए कानूनों का दुरुपयोग हो रहा है। कई तरह से पुरुषों को प्रताड़ित किया जा रहा है। अमेरिका के कानून से प्रेरित होकर धारा 498-ए बनाई गई। लेकिन दहेज प्रताड़ना का ये कानून भी एकतरफा नजर आया। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के अनुसार साल 2012 में इस कानून के तहत दर्ज मामलों में 1,97,762 लोगों को गिरफ्तार किया गया। इन मामलों में चार्जशीट यानी आरोप पत्र दाखिल करने की दर 93.6 फीसद है जबकि आरोपियों पर दोष साबित होने की दर महज 15 फीसद। वहीं, बलात्कार से संबंधित धारा 376 के तहत महिला का आरोप लगाने से ही आरोपी की गिरफ्तारी हो जाती है। अप्रैल 2013 से जुलाई 2014 के बीच दिल्ली में रेप के कुल 2,753 मामले दर्ज हुए, जिनमें से 1,464 मामले झूठे थे।
पुरुष विरोधी सोच बदलने को संस्थाएं कर रही काम – भारत में पहले पुरुषों के अधिकारों को लेकर कम ही आवाज उठती थी, लेकिन अब विभिन्न राज्यों में मेन्स राइट्स ऐक्टिविस्ट बैठक करने लगे हैं। यहां तक कि कई बार वे सड़कों पर उतरकर अपने हकों की बात भी करते हैं। मेन वेलफेयर ट्रस्ट के मेंबर सौरभ सिंह ने बताया कि हमारे देश में महिलाओं के मुकाबले शादीशुदा पुरुष ज्यादा सुसाइड कर रहे हैं। इससे उनके डिस्ट्रेस लेवल का पता चलता है। देश के अलग अलग राज्यों में काम कर रहीं हमारी संस्था को हर महीने 4 से 5 हजार पुरुषों की शिकायतें मिलती है। इसमें रिक्शा वाले से लेकर आईएएस ऑफिसर तक के लोग शामिल हैं। अधिकतर फाल्स रेप केस, मोलेस्टेशन, अननेचुरल सेक्स, झुठे मैरिज रेप के आरोपों से जुड़ी शिकायतों को लेकर फोन करते है।पुरुषों को जागरूक किया जाता है कि वे अपने हक की आवाज उठाएं। पुरुष हेल्पलाइन नंबर 8882-498-498 भी जारी किया गया है। इसके जरिये कोई भी पीड़ित पुरुष कभी भी फोन कर मदद मांग सकता है।
(स्त्रोत – क्वोरा में प्रकाशित राजस्थान विश्वविद्यालय के शुभम खत्री का आलेख)
घरेलू हिंसा : समस्या को समस्या न मानना ही सबसे बड़ी समस्या

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ
जिन्दगी को बेहतर ढंग से जीने की जो शर्त है वह भारी-भरकम है। अतः किसी से निभती है किसी से नहीं निभती। अमूमन तीन तरह के रवैये वाले लोग होते हैं। पहले वो लोग जो सफलता की ऊंचाइयों को छूना चाहते हैं। दूसरे वो लोग जो अपनी समस्याओं से उभरना चाहते हैं। एक तीसरा प्रकार भी है। इनमें वो लोग आते हैं जो समस्या को समस्या मानते नहीं बल्कि जिन्दगी का हिस्सा मानकर समझौते और किस्मत के झूले में झलते हुए पूरी जिन्दगी काट लेते हैं। यहीं से सबसे बड़ी समस्या की आगाज़ होता है। अगर लोग समस्या को समस्या मानेंगे ही नहीं तो, न तो उससे निकलने की कोशिश करेंगे और न ही कभी उससे निकल पायेंगे। ज्यादातर लोग इसी तीसरी श्रेणी में आते हैं। चाहे स्त्री हो या पुरुष, उनके साथ शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न होता रहता है और वे इसका विरोध तक नहीं कर पाते निकलना तो दूर की बात है।
ऐसी समस्याओं से निकलने का पहला कदम यही है कि अपने जीवन और अपने आप पर नज़र डालिए कि जो कुछ आपके जीवन में चल रहा है वह आपको गवारा अथवा मंजूर है भी या नहीं। अगर आपको किसी भी स्थिति या व्यक्ति से असहजता महसूस होती हैं, आपकी सहनशीलता को लांघ रही है, आप स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं तो उस अनुभूति की उपेक्षा न करें। खुद से या किसी भी व्यक्ति (आपको लगता हो जो आपकी स्थिति और आपको समझेगा) की सहायता लें और सहजता को पाने की ओर कदम उठायें। यह पहला कदम ही है जो सबसे भारी होता है। यह उठा लिया तो आगे का रास्ता दिखने लगता है। यह पहला कदम उठाना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है। यह पहला कदम है समस्या की पहचान करने का कदम। पहचान होगी तो ही उसका समाधान निकालने की मूहीम शुरू हो पायेगी। ऐसी स्थिति में खुद पर विश्वास और धैर्य ही सबसे बड़ा सम्बल होता है। इस दुनिया में कुछ भी असम्भव नहीं। नज़रिया बदलिए रास्ते खुद ब खुद मिल जायेंगे। आप सभी अपनी किस्मत खुद लिखने के काबिल है। आदमी असफल नहीं होता बल्कि काम करने के तरिके में सफलता-असफलता होती है। तरीके बदले और सफलता पाये। और जब तक सफलता का मूँह न देख लें तरिके बदलते रहें। कभी हार न मानने के जज्बे से ही आदमी हर परिस्थिति का केवल डटकर मुकाबला ही नहीं बल्कि उससे उभर जाने की भी क्षमता रखता है।
बदनसीबी यह भी है कि दुनिया अक्सर ताकतवर के साथ खड़ी होती है और कमज़ोर लोग छितरा जाते हैं। इसलिए खुद को कमज़ोर नहीं समझकर अपनी अंदर की ताकत को जगाने की जरूरत है। हमारे अंदर ही हमारे सारे सवालों का हल छिपा हुआ है जरूरत है बस तलाशने की।




